Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अगस्त 21, 2018

1856-ममता फूटे

डॉ.कविता भट्ट

1
मैं ही बाँचूँगी
पीर-अक्षर पिय,
जो तेरे हिय।
2
नारी है देह
आत्मा-नर न नारी
मात्र चेतना।
3
देह तिलिस्म
आत्मा तटस्थ द्रष्टा
लिंग-भेद क्यों ?
4
दुस्साहस है
नारी में पुरुष -सा
किन्तु संस्कारी।
5
ममता फूटे
नैनों और वक्षों से
क्यों उत्पीड़न।
6
ममतामयी
रजवाड़ों में भी तो
चादर-सी थी।
7
कब पवित्र
नारी के विषय में
दृष्टि विचित्र।
8
नारी सुलगी
राख में चिंगारी-सी
मन ही मन।
9
हम न होंगे
धिक्कारेगा तुमको
सूना-सा द्वार।
10
डाकिया आँखें
मन के खत भेजें
प्रिय न पढ़े।
-0-

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Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 17, 2018

1855

डा. सुरेन्द्र वर्मा

1

नीला समुद्र

तरंगों के अन्दर

झाँकता सूर्य

2

दीपित वन

बिखरा चहूँ ओर

टेसू का रंग

3

जीने की राह

सितारे रूठ गए

कौन बताए

4

कभी डराए

डगमगाती नाव

सँभाले कभी

5

बांस की ओट

संगीत का फूटना

हवा की चोट

6

देखो तो ज़रा

आया लजाता दिन

शर्मीली धूप

-०-

डा. सुरेन्द्र वर्मा  / दस एच आई जी / एक सर्कुलर रोड /इलाहाबाद

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अगस्त 15, 2018

1854

शशि पाधा

 1

माँ के आशीष

पुत्र -संग रहते

सीमाओं पर।

2

राष्ट्र -रक्षक!

ह्रदय के तल से

तुम्हें प्रणाम!

3

धन्य वो भूमि

जहाँ पाँव रखते

वीर सेनानी।

4

संकल्प ध्येय

निर्भयता औ निष्ठा

 वीर कवच। 

5

पर्वत गाएँ

गाथा बलिदान की

धरती सुने।

 –०–

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 13, 2018

1853

पूर्वा शर्मा 

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 10, 2018

1852-साँझ से भोर तक

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

1

कँटीली राहें

पथरीली चढ़ाई

हाथ  थामना !

2

खड़े हैं लाखों

रक्तपायी  पथ  में

बचके चलो !

3

शंकित  दृष्टि

बींधती तनमन

दग्ध जीवन !

4

भाग्य का लेखा-

भला करके भी तो

सुख न देखा !

5

तुम्हारी आँखें

आँसू का समन्दर

पीना मैं चाहूँ।

6

पोंछ लो आँखें

सीने में छुप जाओ

क्रूर हैं घेरे ।

7

यज्ञ रचाया

मन्त्र भी पढ़े सभी

शाप न छूटा।

8

जलती रही

समिधा बन नारी

राख ही बची ।

9

छूटे तो छूटे

चाहे प्राण अपने !

हाथ न छूटे।

10

सिन्धु तरेंगें

विश्वास की है नैया

पार करेंगे।

11

मुस्कानें मरी

हँसी गले में फँसी

बधिक -पाश

12

कटे न पाश

खुशियाँ हुई कैद

पंख भी कटे।

13

प्राण हुए  हैं

अब बोझ भारी

चले भी आओ।

14

कैसा मौसम!

झुलसी हैं ऋचाएँ

असुर हँसें।

15

उर पाँखुरी

झेले पाषाण वर्षा

अस्तित्व मिटे।

16

ईर्ष्या सर्पिणी

फुत्कारे अहर्निश

झुलसे मन।

17

कहाँ से लाएँ

चन्दनवन मन !

लपटें घेरे।

18

अश्रु से सींचे

महाकाव्य के पन्ने

रच दी नारी ।

19

मन न बाँचा

अन्धे असुर बने

रक्तपिपासु ।

20

दर्द जो पीते

व्यथित के मन का

सुधा न माँगे।

21

मर जाऊँगा,

तुम्हारे लिए  जग में

फिर आऊँगा !

22

पूजा न  जानूँ

न देखा ईश्वर को

तुमको देखा !

23

प्रतिमा रोई

कलुष न धो पाई,

भक्तों ने बाँटे ।

24

व्यथा के घन

फट जाएँ जो कभी

पर्वत डूबें ।

25

नागनागिन

लिपटे तनमन

जकड़ा कण्ठ ।

26

पाषाण थे वे

 न पिंघले ,न जुड़े

टूटे न छूटे ।

-0-

 [सभी  रेखांकन ; रमेश गौतम]

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 7, 2018

1851

1-शशि पाधा

1

अक्षर झरे

कल्पना सरसि से

गागर भरे ।

2

ओ दोपहरी!

घनी घाम चुभती

संझा बुला री ।

3

क्यों दोहराऊँ

इस व्यथा -कथा को  

चुप पी जाऊँ  ।

4

धीर सद्भाव

करते तुरपाई

उधड़े रिश्ते।

5

मौन की भाषा

जो समझे, वो जाने

प्रेम दीवाने ।

-०-

2-शैलजा सक्सेना

1

दिन कमान

धूप जलता तीर

ज़ख्मी शरीर!

2

हवा बीमार

कैसे हो उपचार?

दिशायें स्त्बध!

3

दरकी मिट्टी

इतना क्यों हो गुस्सा?

पसीज भी लो!

4

मन है भारी,

झरते भाव-आँसू

शब्द भीगते!

5

सज्जित घर

खनकते न स्वर

बच्चे लापता !

-०-

3-विकास सक्सेना

1

फटा है जूता

उधड़ा है स्वेटर

हमारा कल।

2

कड़ी  है धूप

पेड़ों की घनी छाया

बचाये रूप।

3

माँ ने था  पीटा

पिता ने दुलराया

वो मुस्कुराया !

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अगस्त 4, 2018

1850

सुनीता काम्बोज 

1

खुश्क से रिश्ते

रूठी है जो बहार

भेजा है तार ।

2

क्यों हारा वीर

तृष्णाओं की जंजीर

मन अधीर ।

3

मन की मुंडेर

बैठा यादों का पंछी

उड़ता नहीं।

4

कौन हटाए

धूल की ये परत

थमी हवाएँ  ।

5

मन चौपाल

बैठे मेरे गोपाल

पूछते हाल ।

6

नींद न आए

टोटके बेअसर

सूना बिस्तर।

7

मन नूपुर

छम -छम बजते

ऑंखें हँसती  ।

8

रिश्ता अटूट

बाकी  है सब झूठ

मेरा -तुम्हारा ।

9

करूँ अंकन

जटिल उलझन

भ्रमित मन ।

10

ये लोभवृत्ति

छोड़ता नहीं मन

बड़ा निर्धन ।

11

समय करे

कुछ न मेरे हाथ

दिन या रात ।

12

ये मन दीन

विषयों में है लीन

प्यासी सी मीन ।।

13

संस्कृति- हीन

पतन की ही ओर

डूबती भोर।

14

अंतर यात्रा

खुद की ही तलाश

लिया संन्यास।

15

साथ न चले

अपाहिज ये रिश्ते

रहे रोकते।

16

डयोढ़ी  लाँघें

ये उद्दंड  तृष्णाएँ

संघर्ष जारी ।

17

नया जीवन

मिला कुछ खोकर

जगी  सोकर ।

-०-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 2, 2018

1849

डॉ.भावना कुँअर

 1
मौन के घर
भर गया है कोई
मीठे से स्वर।
2
मौन क्यूँ धारे
मन – परतें खोल
पा ले किनारे।
3
मौन है पूछे –
चुरा ले गया कौन?
बातों के सोते।
4
खुश था मौन
गुलदस्ता बातों का
लाया था कौन!

5
बरस पड़ीं
मौन से घिरी आँखें
पा अपनों को।
6
मेरी खामोशी
बरसों बाद बोली
मौका था होली।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अगस्त 2, 2018

1848

पढ़ने  के लिए कृति के नाम पर क्लिक कीजिए –

खोई हरी टेकरी( पर्यावरण -हाइकु ): डॉ.सुधागुप्ता 

 

  हाइफन( हाइकु विशेषांक ): सम्पादक -डॉ. कुँवर दिनेश सिंह  

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 1, 2018

1847

कृष्णा वर्मा

1

मेघ बरसे

चिट्टा दिन हो गया

धुँधली साँझ।

2

मचाए शोर

बादल मुँहजोर

धरा विभोर ।

3

लगीं नाचने

मोरपंखी इच्छाएँ

पर फैलाए।

4

मेघों ने घेरा

पावन उजाले को

रोया सवेरा।

5

मेघ दहाड़े

सूखे की आशंकाएँ

हुईं निर्मूल।

6

बूँदों ने धोया

दलिद्दर समूचा

धरती तृप्त।

7

घिर के छाए

बरस नहीं पाए

यादों के मेघ।

8

भीगें नयन

बरखा में प्रिय को

तरसे मन।

-0-

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