Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 16, 2018

1877

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

ठिठुरे रिश्ते।
सुखद आँच- जैसा 

स्पर्श तुम्हारा ।
2
कोई न आया
सर्द रात ठिठुरी
तू मुझे भाया।
3
हिमानी भाव
कोई यों कब तक
रखे लगाव।
4
काँपे थे तारे
बरसे थी नभ से
बर्फीली रूई।
5
जमी हैं झीलें
अपत्र तरुदल
ठिठुरे,काँपे।

6

गुलाबी सर्दी
गर्माहट देता है
साथ तुम्हारा।
7
सुख में भूलो
दुख में मुझे कभी
भुला न देना।
8
कुछ न बाँटो
पर थोड़ा -सा दुःख
मुझे भी देना।
9
घाव तुम्हारे
रिसे हैं निरंतर
मेरे भीतर।
10
प्यास बुझाई
जीभरके पिए थे
तेरे जो आँसू।
11
सीने लगाऊँ
हर अश्क तुम्हारा
मुझको सींचे।
12
सौ- सौ पहरे
फिर -फिर खुलते
घाव गहरे।
13
युगों से ओढ़ी
दुःख -भरी चादर
कैसे उतारूँ?
14
कुछ न जानूँ
धर्म -कर्म क्या होता
तुझको मानूँ ।
15
जग ये छोड़े
तुम प्राणों में रहो
इतना चाहूँ।
-0-

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Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 14, 2018

1876-बालमन

भावना सक्सैना

1

छल से परे

bhawna-saxena-e1542201185646सरल बालमन 

खोजे मायने। 

2

मन के भोले

सब से मिल बोलें

बैर न जानें। 

3

बहें निर्बाध

ज्यों उन्मुक्त सरिता

सब राहों से। 

4

चुलबुले से

नटखट चेहरे 

बोलती आँखें। 

5

करना चाहूँ

मंज़िल को हासिल

दिशा मुझे दो। 

6

कच्ची मिट्टी है

सँवार दो नेह से 

बस प्यार दो। 

7

मनमौजी हैं

घर भर कम हैं

खेल खिलौने। 

8

नन्ही बाहों में

भर लूँ मैं आकाश

उड़ना चाहूँ। 

9

डरा जाती है

मासूम -से मन को

रात की छाया। 

10

वर्षा का जल

मगन अपने में

खेले मचल। 

11

हँसते गाते

सीखे कितना कुछ

नन्हा- सा मन। 

12

सुन कहानी

करते मनमानी

बाल रतन। 

13

गुजर गई

बचपन कहानी

बीता वैभव। 

14

एक पल में

भूलें नाराज़गियाँ

बच्चों का मन। 

15

माँ का आँचल

दुलार पिता -संग

देता जीवन। 

16

खिली धूप है

बचपन के रंग

करें उजास। 

17

मिट्टी में सने

खिलखिलाते हुए

मोहते बाल। 

18 

परत चढ़ी

हैं अद्भुत स्मृतियाँ 

बचपन की। 

19

डोर पतंग

न  माँगे अब कोई

संग फोन है। 

20

व्यस्त मस्त है

तकनीक के संग

बालक आज। 

21

आँख- मिचौली

चंचल नटखट

भाए मन को। 

22

कैसे समझें

दुनिया के ढंग वो

बूझ न पाएँ। 

23

भेद-भरी है

अबूझ- सी पहेली

दुनिया सारी। 

24

बाहें फैलाए

राह तकें नयन

माँ को न पाएँ।

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 13, 2018

1875

डॉ0 सुरंगमा यादव

1

बाँध ले मन

नेह -बंदनवार

पी आये द्वार

2

मुकुलित थी

तुम्हें देख मन की

आशाएँ खिलीं ।

3

प्रीत के पाँव

बिन पायल बाजें

सुनता गाँव

4

ओस की बूँद

पल में खुशियों ने

आँखें लीं मूँद

5

मन होरसा

घिसा प्रेम चंदन

फैली सुवास

6

प्रेम का चीर

शोभित  मन पर

जग अधीर

7

रात प्रहरी

कैसे आऊँ मैं प्रिय !

लाँघ देहरी

8

नभ में तारे

उभरे मन पर

पीड़ा के छाले

9

आँसू का वेग

डूब रहीं आशाएँ

तट न पाएँ ।

10

र्षों का साथ

अहसास आज भी

हैं अनछुए

-0-

(होरसा-चंदन घिसने का पत्थर)

Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 7, 2018

1874

1-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु
1
दीप लिएअमा की रात
तुम पूर्ण चंद्रिका
उर में खिली।
2
दीप जलाऊँ
या तेरे  नयनों में
डूबूँ ,नहाऊँ।
3
आँखों के तारे
दीपोत्सव मनाएँ
प्राण जुड़ाएँ।
4
यादों में तुम
जगमग दिशाएँ
रोज दिवाली।
5
शब्दों के दीप
तुमने क्या जलाए,
धरा नहाए!
6
शब्दों में अर्थ
जैसे   हों एकमेक,
गुँथे मुझमें।
7
भाव-संगिनी
लय -प्रलय तक
मुझमें रमी ।
8
नश्वर देह
काल से परे सदा
तुम्हारा नेह।
9
भीतर तम
देहरी जगमग
घना अँधेरा !
10
किरण-शर
बींधे तम प्रखर
उजाला फूटा।

चौमुखा diyaa11
चौमुखा दिया
बनकर जला मैं
कभी तो आओ !

-0-

2-डॉ.जेन्नी शबनम

1.

छबीला दीया

ये रंगीली दिवाली

बिखेरे छटा।

2.

jenny (1) (1)साँझ के दीप

अँधेरे से लड़ते

वीर सिपाही।

3.

दीये नाचते

ये गुलाबी मौसम

खूब सुहाते।

4.

झूमती धरा

अमावस की रात

खूब सुहाती।

5.

७-deepakदीप- शिखाएँ

जगमग चमके

दीप मालाएँ।

6.

धूम धड़ाका

बेजुबान है डरा

चीखे पटाखा।

7.

ज्योत फैलाता

नन्हा बना  सूरज

दिवाली रात।

8.

धरती ने ओढ़ी

जुगनुओं की चुन्नी

रात है खिली।

9.

सत्य की जीत

दिवाली देती सीख

समझो जरा।

10.

पेट है भूखा

गरीब की कुटिया,

कैसी दिवाली?

-०-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 5, 2018

1873-यादों के पंछी

यादों के पंछी : आश्वस्त करते हाइकु

डा. सुरेन्द्र वर्मा

[यादों के पंछी : डा. सुरंगमा यादव,प्रकाशक :नमन प्रकाशन ,4231/1,अंसारी रोड,दरियागंज,नई दिल्ली-110002;पृष्ठ 108;मूल्य 250/-, वर्ष -2018 ]

डा. सुरंगमा यादव एक उभरती हुई हाइकुकार हैं। उनका यह पहला हाइकु संग्रह है। उनके कुछ हाइकु मैंने ‘सत्रह आखर’ वाट्स-एप पर भी देखे। मैं उन्हें पढ़कर पूरी तरह आश्वस्त हुआ हूँ।

यादों के पंछीमूलत: जापान की हाइकु काव्य-विधा अब भारत में पूरी तरह प्रतिष्ठित हो गई है। यह तीन पंक्तियों की 5-7-5 वर्ण-क्रम में  छोटी कविता है, जिसमें कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक बात कहने की कोशिश की जाती है। यों तो हाइकु के लिए कोई भी विषय अछूता नहीं है, लेकिन विशेषकर प्रकृति और प्रेम हाइकु काव्य के मुख्य प्रेरक रहे हैं।

डा. सुरंगमा ने हाइकु विधा की मर्यादा का पूर्ण पालन करते हुए, अपनी हाइकु कविताओं में प्रकृति के सौन्दर्य को बखूबी उभारा है। प्रकृति अनेक रूपों में प्रकट होती है। ऋतुओं के रूप में, रात्रि, प्रात, दोपहर और संध्या काल के रूप में, पेड़ पौधों, फूल, पत्तियों के रूप में, चाँद सितारों के रूप में–और भी न जाने कितने ही अन्य रूपों में …

ग्रीष्म ऋतु के बाद जब वर्षा आती है तो जहाँ वह एक ओर भीषण गरमी और कड़ी धूप की तपन से छुटकारा दिलाती है, वहीं वह आंसुओं की भाँति मानो मन का मैल भी धो देती है। मानसिक से लेकर भौतिक, पूरा परिवेश ही बदल जाता है। कवयित्री कहती है–

हवा बदली / छाई जब बदली / हुई सुहानी

घन घनेरे / घन घोर गर्जन / सहमी ग्रीष्म

ग्रीष्म उत्पात / उमड़ी बरसात / दुष्ट दमन

बरसों मेघ / धुले मन मलिन / पात सरीखा

बसंत तो हमेशा से ही प्रेम का सन्देश लेकर आता है। प्रेम और वसंत को जोड़ते हुए सुरंगमा जी कहती हैं, “बसंत आया / लगी फूलों की हाट / भटका भौंरा।” इसी प्रकार हेमंत ऋतु में भी उत्कट प्रेम से व्याकुल होकर प्रतीक्षारत नायिका अपने प्रिय के स्वागत के लिए बेचैन हो उठती है–

खंजन नैन / स्वागत को बेचैन / हेमंत पिया।

प्रेम एक ऐसी भावना है जो प्राय: शब्दों में प्रकट नहीं हो पाती। ऐसे में उसे कभी  आँसुओं में, कभी इशारों में, कभी स्वप्न में तो कभी स्मृति में संजो के रखा जाता है-

तेरे सपने / लेकर सोई-जागी / ऐसी लौ लागी

याद तुम्हारी / पावस बनकर / छाई नैनों में

मादक स्मृति / सिन्धु सरीखे नैन / डूबा सो पार

शब्द नहीं तो / कह दो संकेतों में / तुम मेरे हो

उत्कट प्रेम कभी मरता नहीं। स्मृतियों में सुरक्षित रहता है। यादों के पंछी कलरव करते रहते हैं और यादें एक-दो नहीं होतीं। कड़ी दर कड़ी अनेकानेक स्मृतियों की लड़ियाँ बन जाती हैं।

मनन बगिया / कलरव करते / यादों के पंछी

जोरूँ कड़ियाँ / यादों की तो बनती / लम्बी लड़ियाँ

विचर रही / मानस सागर में / याद हंसिनीं

स्मृतियों का निवास स्थान, ज़ाहिर है, व्यक्ति का मन ही होता है। मन हमारा सतरंगी यादों का इंद्र धनुष है। भूली-बिसरी, खट्टी-मीठी सभी यादें मन में ही तो रहती हैं। मन यादों का संगम है। किसी की कोई स्मृति जब मन में बस जाती है तो वह उस प्रिय पात्र से भी अधिक प्यारी हो जाती है जिसकी कि वह याद है-

याद तुम्हारी / लागे तुमसे प्यारी / आके ना जाती

इंद्र धनुष / सतरंगी यादों का / छाया मन में

भूली-बिसरी / खट्टी-मीठी यादों का / मन संगम

कवयित्री के अनुसार मनुष्य का मन केवल यादों का घर ही नहीं है, वह हमारे जीवन-नाटक का कुशल निर्देशक भी है। हमारी सारी दैहिक गतिविधियाँ उसी के इशारे पर चलती हैं। सच पूछा जाए तो वही हमारी नाव का खेवैया है और यही मेरा मन है ,जो कभी वैराग्य धारण कर ले तो केवल ‘मेरा’ नहीं रहता, सबको अपना बना लेता है।

मन है ऐसा / निपुण निदेशक / देह नचाए

मन नाविक / तन नौका लेकर / फिरे घूमता

मन वैरागी / सब जग लगता / अपना जैसा

डा, सुरंगमा के हाइकु काव्य में इस प्रकार के दार्शनिक भाव भी जगह-जगह बिखरे पड़े हैं। मनुष्य केवल वाह्य नेर्त्रों से ही नहीं देखता, यदि वह अन्दर झाँककर अपने अंतर चक्षुओं से देखे तो उसे पारमार्थिक सता के अनंत रूप दिखाई दे सकते हैं। वह कहती हैं–

अंतर चक्षु / खोल निहारे मन / रूप अनंत।

जब सब कुछ बिखर जाता है तो कभी-कभी आदमी को ऐसा लगता है ,मानों सब समाप्त ही हो गया। लेकिन सकारात्मक सोच की वकालत करने वाली हमारी कवयित्री निराश नहीं होती। सुबह कभी तो आएगी। बेशक आज अँधेरा है और यह रात जिद्दी भी हैं-हटीला तम / छिपा दीपक तले / षड्यंत्रकारी–लेकिन यह षड्यंत्र सफल होने वाला नहीं है। चोट खाकर और फिर सभलकर ही आदमी कुछ बन पाता है। सुरंगमा जी अपने काव्यात्मक अंदाज़ में स्पष्ट कहती हैं—

निराश नं हो / बाद रात्रि के प्रात / चलता क्रम

सूर्य अस्त / समापन नहीं ये / अल्प विराम 

सभल गया / चोट सह पत्थर / बना देवता

हिन्दी में इसलिए प्राय: उन रचनाओं को भी, जो हाइकु के अनुशासन का पालन करके राजनैतिक-सामाजिक विषयों पर टीका-टिप्पणी करती हैं, हाइकु के अंतर्गत ही ले लिया गया है। डा. सुरंगमा यादव अपने सामाजिक और राजनीतिक परिवेश के प्रति उदासीन नहीं हैं और उन्होंने  ऐसी अनेक हाइकु रचनाएँ की हैं जो परिस्थितियों पर काव्यात्मक टिप्पणियाँ हैं। इस प्रकार नारी की दयनीय स्थिति, बाढ़ का प्रकोप, दूषित हो रही नदियों की चिंता, बुजुर्गों की मानसिकता, आदि विषयों पर भी उन्होंने सुन्दर हाइकु रचे हैं। उनके हाइकु संसार में कोई विषय ऐसा नहीं है जो हाइकु विधा के लिए निषिद्ध हो।

मैं डा. सुरंगमा यादव की काव्य क्षमताओं पर पूरी तरह आश्वस्त हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि वे अवश्य ही कुछ ही अरसे में हिन्दी साहित्य में एक बड़ी हाइकुकार होकर उभरेंगीं।

डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो। 9621222778)

10, एच आई जी / 1, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद-211001

Posted by: हरदीप कौर संधु | अक्टूबर 26, 2018

1872

डॉ. सुरंगमा यादव

1

चौथ का चाँद

उठी नव तरंग

प्रेम -सिन्धु में

2

अर्ध्य चढ़ाऊँ

करवा-2अखंड सुहागन

मैं कहलाऊँ

3

प्यार तुम्हारा

है शृंगार हमारा

सबसे प्यारा

4

प्रीत पिया की

अमोल उपहार

मिला संसार

5

चाँद सलोना

आजा तरसें नैना

प्रीत बुलाए

6

चदा का रूप

देख रीझती गोरी

लगे अनूप

7

प्रेम की डोर

बन्धन है जन्मों का

ओर न छोर

8

अक्षत प्रेम

अर्पण करूँ पिया

भर दूँ जिया

9

सजी मेहरी

लिपी-पुती देहरी

चाँद निहारे

-०-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 25, 2018

1871

भावना सक्सैना

1

अहं का बीज

हो जब अंकुरित

खोए सम्मान। 

bhawna-saksena

2

अर्थ का मान

करता है अनर्थ

जीवन व्यर्थ। 

3

भीज मद में 

बिसराते रहे हैं

जीवन -सार। 

4

आत्म-मोह है

विषधर का मुख

लील ले प्राण। 

5

क्रोध का विष

हरता है सुरभि

हर मुस्कान। 

-०-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 20, 2018

1870

डॉ पूर्वा शर्मा

1

रोज़ दहन

फिर भी न मरता

अहं-रावण

2  

रावण घूमे

समस्त अयोध्या में

कहाँ हो राम?

3

नर में बसी

दशानन-वासना

सीता को नोंचे

4

नैवेद्य नहीं

 सम्मान -क्षुधा मात्र

 हर उमा को।  

-०-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अक्टूबर 7, 2018

1869

1-डॉ.सुरंगमा यादव

1

धूप घनी है

मुसकानों की छाया

बिखरा दो न!

2

प्रेम की नदी

समर्पण को ढूँढे।

सागर-मन

3

मन का कोना

स्मृतियों का कोलाज

सजा रखना ।

4

ये कहकहे

समय की धार में

पल में बहे ।

5

तुम बिछड़े

पदचाप अब भी

देती आहट ।

6

ओ रे! बदरा

इतना न इतरा

अति न भली ।

 7

स्वच्छंद मेघ

रोकेगा कौन भला

नदी का वेग ।

8

मेघों की धूप

घूँघट से झलके

गोरी का रूप

9

देह से परे

कभी मन को मेरे

छूकर देखो ।

10

ये रनिवास

सजी-धजी रानियाँ

प्रतीक्षालय।

-0-

2-डॉ.पूर्वा  शर्मा

1

बिखरा पड़ा

पतझड़-सा मन

तेरे आँगन ।

2

लजाती धूप

व्योम-पथ पे  खड़ा

मेघ है बड़ा ।

3

प्रेम बेड़ियाँ

पहनाई जो तूने

बेफिक्र  उडूँ ।

4

जिंदगी धूप

बना है छतनार

तुम्हारा प्यार ।

5

उड़ान भरे

मन मेघदूत-सा

प्रेम-नभ पे ।

6

निद्रा में लीन

श्वेत लिहाफ़ ओढ़े

गिरि शृंखला ।

7

हौले-हौले से 

चढ़े तेरे प्रेम का

मीठा ज़हर ।

8

हिलोरे खातीं

अश्रु भीगी लहरें

मन -सागर ।

9

झर ही गए

नैनों से कुछ मोती

पाकर तुझे ।   

10

यादों के गुच्छे

हरे-भरे भीगे-से 

इस वर्षा में ।

11

झर ही गए

जीवन-टहनी से        

दुःख के पात ।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 4, 2018

1868

अनिता मंडा

 1

जा मिली धूप

साँझ के आलिंगन

मिटी थकन।

2

दुख ने फिर
चिलम सुलगाई
साँझ बिताई

3

शब्दों का खेल
अधरों पर मधु
मन में मैल।

4

डूबा सूरज
रेत के सागर में
थार की साँझ ।

5

हुआ है नम
भीगकर ओस से
थार का मन।

6

थार की रातें
तारों से जगमग
वीरान राहें।

7

हवा उकेरे
रेत पर माँडनें
सजाए धोरे।

8

रोहिड़ा-पुष्प
बिराग धरे मन
खिले थार में।

9

थार का जोगी
पहने केसरिया
रुँख रोहिड़ा

10

थार को लाँघ
ढल गया सूरज
रक्तिम नभ

-0-

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