Posted by: हरदीप कौर संधु | दिसम्बर 11, 2019

2057

1-डॉ सुधा गुप्ता

1

शरद  ॠतुः

‘अलख निरंजन’

गाते खंजन।

2

शीत की मारी

पेट में घुटने दे

सोई है रात।

3

नई तैनातीः

कोहरा कोतवाल

क़हर ढाया!

4

आक्रान्ता शीत

आया नया पैगाम

हो क़त्ले-आम।

5

झील जमी है

शिकारे सहमे-से

खड़े हैं मौन।

6

बर्फ की मार

ठिठुरे हैं पहाड़

काँपते हाड़!

-0-

2-पुष्पा मेहरा

1

हारी रोशनी

बिछा शीतल पाटी

लेटा कोहरा ।

2

बेसुध नदी

शिराएँ जम रहीं

गति ही भूली ।

3

शीत-धुनकी

फैलाती धरा पर

पाले की रूई ।

4

शूलों की नोक

ओस-बूँद आ रुकी

हीरे सी सजी ।

5

नन्हे से पंछी

पेड़ों में छिपे बैठे

चूँ-चूँ भी भूले ।

6

नीला आकाश

कोहरा-शराब पी

औंधा हो पड़ा ।

7

मौन-भवन

कोहरे की नदी में

आकंठ डूबे ।

Posted by: हरदीप कौर संधु | दिसम्बर 8, 2019

2056


Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 6, 2019

2055

1-भावना सक्सैना

1

सधे न तृष्णा

घटे जीवन डोर

बेकल मन।

2

श्वास-श्वास है

लय, सुर, ताल में

जीवन गीत।

-0-

2-सुदर्शन रत्नाकर 

1

आग ही आग

जल गए जंगल

फैला है विष।

2

रखो विश्वास 

करो जिससे प्यार 

यही आधार ।

-0-

3-मंजूषा मन

1

शब्दों की धूप

दे गई कागज को

निखरा रूप।

2

जल जाएँगे

धरती पे अगर

जल न रहा।

3

नींद तुम्हारी

जो घेरे पलकों को

स्वप्न में आऊँ।

4-अनिता मंडा

1

साँझ ने बाँधी
आँचल में उदासी
बिखरी चुप्पी।

2.

दबा हृदय
चुप्पियों के बोझ से
ठिठकी साँसें।

Posted by: हरदीप कौर संधु | दिसम्बर 4, 2019

2054-यादों का लेखा

कृष्णा वर्मा

1

भरा है मन

अपनी व्यथाएँ जा

किसे सुनाएँ।

2

कानों में बोले

जब दूजों के होंठ

बहके होश।

3

दिल के पाश

रह गए सिमटे

कितने काश!

4

तड़पी रूह

यादों की बोरियों के

खुले जो मुँह।

5

बीती न झाँक

सिहरेगा मन औ

रोएगी आँख।

6

लहर -मोर्चे

भँवर में कश्तियाँ

निकालें कैसे।

7

सँभल लाँघो

हो कमज़ोर जब

नदी का पुल।

8

हुए पहाड़

मरा हास-विनोद

शून्य जीवन।

9

दिखें हरित

ढोएँ चुप्पी का भार

अत: विषाद।

10

यादों का लेखा

मन को शून्य होते

हमने देखा।

11

मिश्रित कथा

दुख-सुख का लम्बा

जीवन सफ़ा।

12

ज़ख़्मों के बाद

हौसलों का सुबूत

होंठों पे हास।

13

प्रीत का धागा

प्रेम के चरखे पे

काते सपन।

14

प्यार की डोर

इश्क़ की पतंग को

उड़ाए ज़ोर।

15

इश्क़ न कर

हो जाएगा दीवाना

बैरी ज़माना।

16

मिटी न पीर

इश्क़ तेरा ले डूबा

मन फकीर।

17

रहो समीप

ज्यों तुलसी चौरे पे

बलता दीप।

18

तुम्हारा प्यार

आषाढ़ की पहली

सोंधी फुहार ।

19

जलेंगे दीप

लाख रोकें आँधियाँ

हमारी बाट।

20

जिएगी मीन

शुष्क हो समंदर

होगी न क्षीण।

21

भय-कोहरा

सहमी पसलियाँ

लहू अचेत।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | दिसम्बर 3, 2019

2053

नेवा: हाइकु

निम्नलिखित लिन्क को क्लिक करके हाइकु पढ़ सकते हैं

प्रधान सम्पादक – श्री इन्द्र माली

अतिथि सम्पादक -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 3, 2019

2052-जोगिनी गंध

वर्तमान युग परिवर्तन का युग है और परिवर्तन की यह प्रक्रिया जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में है। साहित्य भी इससे अछूता नहीं है। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि बदलते परिवेश में मानव के पास समयाभाव हुआ है और यान्त्रिकता के बाहुपाश में समाये मनुष्य के पास अब इतनी फ़ुर्सत नहीं है कि वह साहित्य को अधिक समय दे सके। ऐसे में निश्चित रुप से साहित्यकारों को ही अधिक प्रयास करने होंगे। कम शब्दों में अधिक अभिव्यक्ति भरनी पड़ेगी। ऐसे में यह युग लघुकविता या सूक्ष्मकविता का अधिक है। सूक्ष्म कविताओं में हाइकु कविता का अपना विशिष्ट स्थान है। हाइकु 5/7/5 वर्ण-क्रम में एक त्रिपदीय छन्द है। यह छन्द केवल सत्रह वर्णों की सूक्ष्मता में विराट को समाहित करने की अपार क्षमता रखता है। यह छन्द जापान से भारत आया और हिन्दी सहित अनेक भाषाओं ने इसके शिल्प को आत्मसात् कर लिया। वर्तमान में हिन्दी हाइकु के अनेक संकलन एवं संग्रह प्रकाशित हो रहे हैं। इन्हीं में से एक है-‘जोगिनी गंध’। इस हाइकु-संग्रह की सर्जक हैं- शशि पुरवार।

शशि पुरवार ; हाइकुकार

विभिन्न विधाओं के माध्यम से लेखन में सक्रिय शशि पुरवार जी एक शानदार हाइकु कवयित्री हैं। कम शब्दों में बड़ी बात कह लेने का हुनर एक अच्छे हाइकु कवि की पहली विशेषता है। 5/7/5  वर्ण-विन्यास के क्रम में कुल तीन पंक्तियों, यानी कि सत्रह वर्णों में सागर की गहराई माप लेने की क्षमता का कौशल हाइकु की अपनी विशिष्टता है। प्रकृति तक सीमित हाइकु को हिन्दी ने जीवन के प्रत्येक रंग से भर दिया है।

जोगिनी गंध के माध्यम से हाइकु कवयित्री शशि पुरवार जी ने हिन्दी हाइकु साहित्य के विस्तार में अपना योगदान भी सुनिश्चित किया है। आपके हाइकु जहाँ अपनी बात बहुत सरलता से कह देते हैं, वहीं अर्थ घनत्व की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हैं। विभिन्न विषयों के अन्तर्गत पाँच भागों में विभक्त और लगभग पाँच सौ हाइकु से सुसज्जित यह हाइकु-संग्रह स्वयं में विशिष्ट है।
देखें उनके कुछ हाइकु-
* छूटे संवाद/दीवारों पे लटके/वाद-विवाद।
* धूप सुहानी/दबे पाँव लिखती/छन्द रूमानी।
* प्रीत पुरानी/सूखे गुलाब बाँचे/प्रेम कहानी।
* जोगिनी गंध/फूलों की घाटी में/शोध- प्रबन्ध।
* रीता ये मन/ कोख का सूनापन/अतृप्त आत्मा।

प्रेम के बिना संसार गतिहीन है। प्रेम की अनुभूति शाश्वत है। प्रेम की सम्पदा अपार है। कवयित्री ने हाइकु के माध्यम से प्रेम के शाश्वत स्वरूप  और माधुर्य को  अभिव्यक्त किया है-
* नेह के गीत/आँखों की चौपाल में/मुस्काती प्रीत।
* प्रेम -अगन/रेत-सी प्यास लिये/मन-आँगन।
* आँखों में देखा/छलकता पैमाना/सुखसागर।
मन की थाह पाना सम्भव नहीं है। मन पर शशि जी का यह हाइकु विशिष्ट लगा-
* अनुगमन/कसैला हुआ मन/आत्मचिन्तन।
इसी आत्मचिन्तन से पीड़ा की छाया में स्मृतियाँ कोलाहल करती हैं-
* दर्द की नदी/लिख रही कहानी/ये नई सदी।
प्रत्येक मनुष्य प्रकृति से प्रेम करता है और जब वह प्रकृति के अनुपम सानिध्य में रहता है ,तो वह एक नई ऊर्जा से भर जाता है। यह प्रकृति की निश्छलता और अपनापन ही है। प्रकृति का अंश मनुष्य अपनी प्रत्येक आवश्यकता के लिए प्रकृति पर निर्भर है। ऐसे में शशि पुरवार जी ने पुस्तक का एक भाग प्रकृति को ही समर्पित किया है, जहाँ पर कई अच्छे हाइकु पढ़ने को मिलते हैं-
* हिम-से जमे/हृदय के जज़्बात/किससे कहूँ।
* मन -प्रांगण/यादों की चिनगारी/महकी चंपा
* सघन वन/व्योम तले अँधेरा/क्षीण किरण
* झरते पत्ते/बेजान होता तन/ठूँठ-सा वन।
* कम्पित धरा/विषैली पॉलिथीन/मानवी भूल।
हिन्दी हाइकु के वर्तमान स्वरूप के अन्तर्गत पुरवार जी ने जीवन का हर रंग भरने का सफल प्रयास किया है। यह प्रयास हाइकु के स्वरूप को स्पष्ट करता है। इस सन्दर्भ में कुछ और हाइकु-
* सूखे हैं पत्ते/बदला हुआ वक़्त/पड़ाव-अन्त।
* नहीं है भीड़/चहकती बगिया/महका नीड़।
* दिया औ’ बाती/अटूट है बन्धन/तम का साथी
* कलम रचे/संवेदना के अंग/जल तरंग।
* अधूरापन/ज्ञान के खिले फूल/खिला पलाश।
जोगिनी गंध के अन्तर्गत जापानी काव्य विधा के दो और मोती ताँका (5/7/5/7/7) और सेदोका (5/7/7/5/7/7) भी संग्रह में सम्मिलित किए गए हैं। पुस्तक में चालीस ताँका और बीस सेदोका सम्मिलित हैं। जोगिनी गंध से यह ताँका देखें-
“चंचल हवा/मदमाती-सी फिरे/सुन री सखी!/महका है बसंत/पिय का आगमन!’इसी क्रम में यह सेदोका भी उल्लेखनीय है-’मेरा ही अंश/मुझसे ही कहता/मैं हूँ तेरी छाया/जीवन भर/मैं तो प्रीत निभाऊँ/क्षणभंगुर माया।”
‘जोगिनी गंध’ कवयित्री शशि पुरवार जी का हिन्दी हाइकु-साहित्य को समृद्ध करने का सत्संकल्प है। वे आगे भी अपनी सर्जना से हिन्दी हाइकु को अभिनव आयाम एवं विस्तार देती रहेंगी, मुझे पूर्ण विश्वास है। ___________________________________
जोगिनी गंध(हाइकु संग्रह);हाइकुकार- शशि पुरवार,ISBN: 978-93-88839-30-3
पृष्ठ-144,मूल्य- ₹ 200,प्रकाशक- लोकोदय प्रकाशन, लखनऊ
___________________________________


सम्पर्क: डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’, 24/18, राधा नगर, फतेहपुर (उ.प्र.)- 212601
मो.- 9839942005
**********

Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 19, 2019

2051-हाइकु -विशेषांक

अक्तुबर -दिसम्बर अंक 39 डाउनलोड करने के लिए [ निम्नलिखित लिन्क को क्लिक कीजिए]

Posted by: हरदीप कौर संधु | अक्टूबर 21, 2019

2050

1-कृष्णा वर्मा

1

डाल के पंछी

बाँचते हवाओं से

पेड़ों की व्यथा।

2

रुत सावनी

बाहर बरसातें

भीगता मन।

3

जुलाहे बुन

सिरजन की धुन

मोहती मन!

4

छुएँ सपन

धड़के पलकों का

नाज़ुक दिल।

5

उतरा चाँद

पूनम की हवेली

प्रेम ले पाश।

6

कर्म निराले

अँधेरों में उजाले

वर्तिका पाले।

7

बंसवारियाँ

धरें अधरों पर

वेणु के स्वर।

8

मदिराए हैं

नख से शिख तक

प्रकृति अंग।

9

सूखे हैं धारे

मरे सरोवर औ

हंस बंजारे।

10

रिश्ते औ नाते

किश्तों में चलती हैं

अब तो साँसें।

11

उमर मरी

सुधियों की केतकी

हरी की हरी।

12

कंठ भर्राए

अतीत को समेटे

सुधि-चौराहे।

13

तेज़ जो चले

हवा बने तूफान

हौले ही भले।

14

होड़ के मारे

दौड़े ऐसी दौड़ कि

छूटे सहारे।

15

सुबह-शाम

अपनों की सोचते

हुई तमाम।

16

वक़्त की ढैया

दुर्दिन को ठेलते

टूटा पहिया।

17

कुतरें तोते

बाजों से मिल पंख

पखेरू रोते।

18

स्वजन खींचें

लक्ष्मन रेखाएँ क्यों

बाड़े बनाएँ।

19

गुपचुप -सी

दिल के पलने में

पलती पीर।

20

यादें तुम्हारी

तरल कर गईं

आँखें हमारी।

21

काँच के कंचे

दुनिया थी आबाद

बचपन की।

22

काठ के लट्टू

मन को थे नचाते

खुशी लुटाते।

23

टायर-हाँक

बटोरी थी खुशियाँ

हज़ारों लाख।

24

बिना काजल

चमकाएँ आँखें

बाल स्मृतियाँ।

Posted by: हरदीप कौर संधु | अक्टूबर 18, 2019

2049-चाँद

डॉ जेन्नी शबनम
1.
बिछ जो गई
रोशनी की चादर
चाँद है खुश।
2.
सबका प्यारा
कई रिश्तों में दिखा
दुलारा चाँद।
3.
सह न सका
सूरज की तपिश
चाँद जा छुपा।
4.
धुँधला दिखा
प्रदूषण से हारा
पूर्णिमा चाँद।
5.
चंदा ओ चंदा
घर का संदेशा ला
याद सताती।
6.
रौशन जहाँ
शबाब पर चाँद
पूनम रात।
7.
चाँदनी गिरी
अमृत है बरसा
पूर्णिमा रात।
8.
पूनो की रात
चंदा ने खूब किया
अमृत वर्षा।
9.
मुख मलिन
प्रकाश प्रदूषण
तन्हा है चाँद।
10.
दिख न पाया
बिजली भरमार
चाँद का मुख।

Posted by: हरदीप कौर संधु | अक्टूबर 9, 2019

2048

1-सविता अग्रवाल ‘सवि’

1

नभ है खुला

पंखों में भी है जोश

आ उड़ चलें।

2

सुहाना दिन

मित्रों -संग ठहाके

मन प्रसन्न।

3

हाथ बढ़ाओ

सबको अपनाओ

करो ना देरी।

4

मार्गदर्शक

निज हित को भूल

राह दिखाए।

5

बालक मन

बेपरवाह-सा हो

खुशियाँ लाए।

6

चढ़े ऊँचाई

संकल्प जब साथ

पाँव न रुकें।

7

सवेरा लाए

सुनहरा-सा दिन

मन हर्षाए।

8

सक्षम करे

पथरीली राहें ही

बल बढ़ाएँ।

9

प्रेम का दीप

मकान में जला

तो घर बना।

10

जला दीपक

उजास भरे मन

तम मिटाए।

-0-

सविता अग्रवाल ‘सवि’ , कैनेडा

दूरभाष: (905) 671-8707

email: savita51@yahoo. Com

-0-

2-मनमोहन कृष्ण ‘भगत जी’

1

मन में वैर

असीमित अनन्त

पले रावण। 

2

राम अतृप्त

रावण ही पोषित

कैसे हो वध

3

राम की सीमा

रावण अगणित 

कैसे हो वध !

4

ममता माँ की

असीमित खजाना

सदा लुटाती

5

बेटों में वैर

माता माँगती खैर

वृदाश्रम में।

6

मन -मन्दिर

सब कुछ अंदर

यकीन कर।

7

प्यार से बोल

कानो में मिश्री घोल

कुछ ना मोल।

8

जीवन नैया

कौन ले जाता पार

कौन जानता !

9

देखो गौरैया

मिल गया दाना

अँगना नाचे।

10

हरित तोता

गावे,मन को भावे

कैदी बेचारा।

11

बूँद- बूँद  से

भरते हैं मटके

खाली झट से

12

तू नही साथ

ये तो गलत बात

एकला चलो।

13

रात की चीखें

सुबह बन्द हुई

मुन्नी सो गई!

-0-सम्पर्क-365 अग्रसेन नगर,श्री गंगानगर 335001 राजस्थान

mmkgoyal@gmail.com

मो- 77420-55464

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