Posted by: डॉ. हरदीप संधु | दिसम्बर 6, 2016

1702

मन व्यथा का सच – मैं सागर सी

शिव डोयले

 साहित्य की विधाओं में से हाइकु  सत्रह वर्ण का जापानी छन्द है ,जिसमे  पाँच, सात पाँच में त्रिपदिक वृत्त में किसी भाव को बाँधना कौशल कवि कर्म है। हाइकु अब काव्य विधा में लोकप्रियता की और अग्रसर होता जा %e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82रहा।

हाइकु देखने में लघु परन्तु अर्थ में गहन होते हैं कम शब्दों में सार्थक प्रस्तुति है। इस विधा में काव्य साधना में रत प्रतिष्ठित कवयित्री मंजूषा मन का हाइकु-ताँका संग्रह “मैं सागर सी…” प्रकाशित हुआ है ।इसमे विषय- वैविध्य हैं, जीवन जगत् का बहुआयामी चित्रण समाहित है ,जिसमें मन के हर भाव पर रचे 405 हाइकु एवं 40 ताँका हैं।  हाइकु को पांच खंड में विभक्त किया गया है – प्रथम खण्ड में ‘करूँ वंदन’ द्वितीय में ‘पीर हमारी’ तृतीय में ‘प्रकृति रूप’ चतुर्थ में ‘मन के नाते’ पंचम खंड ‘सागर मन’ शीर्षक  लिखे गए हैं ।

प्रथम खंड ‘करूँ वंदन’ से शुभारम्भ किया है- ‘प्रथम पूज्य/लम्बोदर गणेश/शुभागमन।’

इस खंड में 21 हाइकु हैं, जो शुभ शुरुआत  का शुभ संकेत हैं:-

“गीता सुना दे/कृष्ण अब मुझे भी/जीना सीखा दे।”

द्वितीय खंड पीर हमारी सबसे बड़ा खंड है जिसके शीर्षक से ही अंदाज लग जाता है कि इसमें मन जी के जीवन के खट्टे- मीठे अनुभव की अनुभूति होगी। कहीं दर्द की कसक है तो कहीं व्यथाएँ बोलती  –

“यह जीवन /किस तरह बाँचूँ/ कोरा कागज।”

“गीली लकड़ी/बन धधकी साँसे/जली न बुझी।”

इस प्रकार के हाइकु सच का बयान हैं; जिन्हें लिखने में बनावट ,अनावश्यक शाब्दिक वाग्जाल से परे सहज गाम्भीर्य भावों से लिखे हैं, भावनाएँ मचलतीं रहीं, सुख दुख की भाँति तट से पाने की आस में खाली दु:खी हो लौट आती है तभी तो सार्थक शीर्षक दिया- ‘मैं सागर सी…’ कवयित्री का कोमल हृदय ‘मन’ आपदाएँ, विपदाएँ सहन करता हैं-

“मैं सागर सी/गहरे राज छुपा/मोती लुटाऊँ।”

“शब्द- संसार/ एक यही है मेरा/ जीवन सार।”

 अतीत की मधुरिम यादें कैलेंडर की तरह सहेजे हुए शब्द संसार में खो जाती है, दर्द की, वियोग की स्मृतियाँ, संघर्षशील, सम्वेदनाओं को प्रेम व्यथा में टूटता जीवन आँसू की स्याही से लिखे गये हैं मार्मिक भावपूर्ण हैं यथा-

उमर भर/पीते ही रहे आँसू/ प्यासे ही रहे।”

“प्यासा था मन/आँसू खूब मिले हैं/पीने के लिए।”

“जीवन गाथा/लिखी आँसू की स्याही/न बाँची जाए।”

आहत हृदय, टूटते सपनो  में भी आशा की किरण, जीने की चाह कुछ खोकर पाने की लालसा प्यार भरे शब्दों में अपनापन मिल जाये वन्दनवार सजाकर स्वागत को आतुर हैं। सूखी धरा हरी हो जाए चाहत इन हाइकुओं में देखी जा सकती है-

“फूलों की चाह/काँटों सँग हमने/किया निबाह।”

“स्वाति की बूँद/एक जो मिल जाती/मोती गढ़ते।”

रुमाल नहीं/दो मीठे बोल चाहें/भीगी पलकें।”

“मन साँकल/खोलो तुम आकर/सुख के पल।”

“भरे उड़ान/आसमान की ओर/पाएँगे छोर।”

उपर्युक्त हाइकु के बिम्ब और प्रतीक मन को छू जाते हैं। छोटी छोटी खुशियों को रेजगारी की तरह व्यक्त करती, जुलाहे की तरह बुना गया ताना -बाना आदि ऐसे हाइकु जिनका सौंदर्य मौलिकता अनूठी है। कहीं कहीं दार्शनिक भाव से रचित हैं-

ताना -बाना ये/कैसे बुना जुलाहे/मुझे सिखा दे।”

प्रकृति रूप तृतीय खण्ड में है जिसमें भोर, किरण, वृक्ष, सूरज, चाँद आदि को लेकर हाइकु रचे गए हैं , जिनमें मानवीकरण भी दिखाई देता है उदाहरणार्थ-

“प्यासी धरती/फ्ला न फूला कुछ/मन बंजर।”

“चाँद की प्याली/दूध से लबालब/मुन्नी मचली।”

“झील में चाँद/ज्यों लगे बड़ा प्यारा/प्यार तुम्हारा।”

 प्रेम प्यार में डूबी भावनाएँ एक असीम आनन्द को व्यक्त करतीं हैं प्रेम में बिछोह दुःख देता है। चतुर्थ खंड “मन के नाते” रिश्तों से जुड़ता है बेटी, मायका, ससुराल, माँ, ममता, रिश्ते नाते, प्रेम आदि कही  कहीं सन्देश की तरह आगाह करते, सचेत करते-

“नाता कागजी/क्यों निभाते  हो तुम/तोड़ो इसे भी।”

“माँ का आँचल/धूप हो या बारिश/बचाए सदा।

इस प्रकार की बात भुक्त भोगी ही कह सकता है, अनुभव की कलम से लिखा गया है। पंचम खंड में “सागर मन” शीर्षक को नई उम्मीद आशावादी विचारों की सहज अभिव्यक्ति है-

पंख पसारूँ/एक बार उड़ के/नभ निहारूँ।”

“दुआ कुबूल/नया साल लाएगा/नए ही फूल।”

 टूटे मन को जुड़ जाने की उमंग नई दिशा का बोध कराती है, सच है आज नहीं तो कल सुखद दिन आएँगे। हाइकु के पश्चात् पुस्तक में चालीस ताँका छन्द लिखे गए हैं जो 5-7-5-7-7 का वर्णिक छन्द होता है। कवयित्री ने ताँका भी भली प्रकार रचे हैं, इनमें रचनाकार का स्वाभिमान दिखाई देता है, दर्द को भी सुख की तरह अंगीकार करना उसका आत्मबल नारी का हौसला तारीफ के काबिल है-

“आँखों को मेरी/एक तो स्वप्न दे दो/पूरा जीवन/जी लूँ इस चाह में/सच ही ये सपना।

इस चाह को लेकर जिन खूबी है सराहनीय है कवयित्री का जीवन संघर्षों से भरा है वह इतनी थक चुकी है कि सुख सुविधाएं मुफ्त में भी मिलें तो स्वीकार नहीं। खुद्दारी को इस प्रकार ताँका में पढ़ा जा सकता है-

“भले कष्ट हो/सुख न लूँ भीख में/सह लूँ दु;ख/खुश रह लूँ ऐसे/दुःख में भी सुख ज्यों।”

“आँखों को मेरी/एक तो स्वप्न दे दो/पूरा जीवन/जी लूँ इस चाह में/सच हो ये सपना।”

मैं सागर सी… कृति हाइकु विधा की शृंखला में एक विशेष स्थान पा सकती है। रचनाएँ पाठकों के मन में छवि छोड़ने में समर्थ है , स्तरीय हैं, हल्कापन एवं कोरी कल्पना से रची नहीं गईं है। एकाकीपन की पीड़ा, टूटे मन की व्यथा को अनुभव की कलम से लिखा गया है ।यथार्थपरक रचनाएँ सदैव प्रभावकारी होतीं हैं॥मंजूषा मन ने इन्हें जी कर लिखा है, जिजीविषा है, एक प्यास की ललक प्रेम की आकांक्षाओं ने पुस्तक का रूप लिया है ।सागर सी गहराई में खोजने की कोशिश है मोती मिलना तय है।

कृति में हाइकु के साथ दिए गए चित्र -रेखांकन सुंदर हैं, जो चार चाँद लगा देते हैं। आवरण पृष्ठ मनमोहक है जिसमें नारी मन का सागर -सा फैलाव दिखाई देता है। चित्र -रंग का संयोजन खूबसूरत है ।मुद्रण भी साफ सुथरा है। संग्रह से हिंदी हाइकु साहित्य समृद्ध होगा, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है। पाठकों को अवश्य पसन्द आएगा।

“मैं सागर सी ( हाइकु-ताँका संग्रह): मंजूषा मन,.मूल्य – 140/- ;पृष्ठ – 96;प्रकाशक – पोएट्री बुक बाजार प्रकाशन, लखनऊ

-0-झूलेलाल कॉलोनी, हरिपुरा,विदिशा – 464001 (म.प्र.)

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 5, 2016

1701

1-डॉ ज्योत्स्ना शर्मा

1

 मोह या माया ?

समझ ही न पाए

क्या खोया ,पाया ?

2

घुप्प अँधेरा

उजली किरन सा-

है साथ तेरा                       

3

 थी तेरी आस

क्यों मिली भटकन

प्यास ही प्यास ।

4

माना ,था बुरा

मैंने दिल तपाया

हुआ न खरा ?                       

5

 चल दी साँझ

सिंदूरी आँचल में

सूरज बाँध ।                       

6

प्यासे को सिंधु

क्या जल देगा थोड़ा ?

खारा निगोड़ा ।                       

7

ओ मनमीत !

तुम बिन हमारे

रुँधे हैं गीत ।                       

8

 एक छुअन

यादों की खराशें हैं

व्याकुल मन ।                       

9

 नन्ही बच्चीसी

आशा मन में झाँके

सीधी-सच्ची सी ।                       

10

 रजत थाल

सुरमई तिपाई

ख़ाली क्यों धरा ?                       

11

जी तो ये करे

जी लें ऐसे मिलके

कि, जी ना भरे ।

12

ओ मनमीत !

हो तुम दूर ,मेरे

रुँधे हैं गीत ।

-0-

2-मंजूषा मन

1

रख जो आ
मनन्दिदीप
मिटा अँधेरा

2
लड़ता दीप
घने अँधेरे बीच
उजियारा दे

3
नया सवेरा
सुख लेकर आया
मन को भाया

4
लो उपहार
निर्धन से प्रेम ही
और न कुछ

5

मेरा ये प्रेम

बस यही है पास
छोटा संसार

6

प्रेम लाई हूँ

और न कुछ मेरा
मैं क्या दे सकूँ

7

जी कर जाना
कितना कठिन है
जी का लगाना

8

जी कर देखें
जीवन का जहर
पी कर देखें

9

प्रिय राधिका
प्रेम की वो मूरत
कृष्ण साधिका

10

हृदय बसी
श्याम की ही मूरत
प्यारी सूरत

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | दिसम्बर 1, 2016

1700

1-डॉ.सरस्वती माथुर

1

पलाशी मन

नदी की लहरों में

बहा दीप- सा।

2

ठिठुरे तारे

ओढ़ कर कोहरा

सो गये सारे

3

दो पीत पात

पतझड़ की रात

डाल से छूटे।

4

घूमते रहे

पतझड़ के पत्ते

सैलानी हुए ।

5

नदी किनारे

तितली -सी हवाएँ

यादों की रेत।

6

श्वेत केश थे

सागर लहरों के

खोलें हवा ने।

7

सितारों जैसा

टिमटिमाते देखा

जुगनू मन ।

8

कूकी कोयल

सोई हुई घाटियाँ

नींद से जागी।

9

मन लय भी

चरखे- सी चलती

यादें बुनती।

 -0-

2-ऋता शेखरमधु

1

हरी चुनरी

रुपहले कुन्तल

मक्का शृंगा

2

खेत में बाली

कृषक के घर में

खुशी निराली

3

मूँगफलियाँ

चट चट तोड़तीं

गिलहरियाँ ।

-0-

3– विजय आनंद
1
दर्द के साये
ये शाम की खामोशी
आँसू -मुस्काए
2
जीवन हारा
थके दिन के काँधे
शाम सँभाले
3
ज़िन्दगी अश्क़
पलकों पे ठहरी
ख्वाहिशों की लौ

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 1, 2016

1699

1प्रदीप कुमार दाश दीपक
1

धान की बाली
महकती कुटिया
खुश कृषक ।
2
होरी का मन
गोबर औ धनिया
रहें प्रसन्न ।
3
पूष की रात
हल्कू जा रहा खेत
मन उदास ।
4
जूही की कली
जग उपवन में
माली से छली ।
-0-

2-नरेंद्र श्रीवास्तव

1

रूप निहारे
घंटों बैठा दर्पण
बोर न होता।
2
चंचल मन
रेत-सी फिसलन
यौवन -तट।
3
आपका आना
सावन की तरह,
ग्रीष्म का जाना।
4
अँधेरा लगे
तेरे जाने के बाद
कुछ न दिखे।
5
मक्के के दाने
यादें बचपन कीं
मुँह में पानी।

6

शरद धूप
आँ
गन में आ खेले
शिशु सदृश्य।
7
नभ से आई
पवन ठिठुरती
कम्बल माँगे।

 -0-

3-मीरा गोयल

1

तितली बन
स्वछंद भटकतीं
बिसरी यादें।
2

कुण्ठित यादें
पीड़ित करें हिय

 भीजे नयन।
3

बचपन में
तितली सा उड़ता
मन अबोध।
4

किशोरावस्था
सपनों का महल
सजाये मन।
5

मधुर लगे
यौवन के सपने
सत्य न जाने।

 –0-Madan Goyal mgoyal@nc.rr.com

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | नवम्बर 28, 2016

1698

1-अनिता ललित

001

2-डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर

1

ओस की बूँदें

अपलक तारों की

व्यथा सुनाएँ!

2

दृग सजल

तेरी याद साजन

मोती ओस के।

3

खुशी- गम का

सुखद अहसास

बूँदें ओस की !

4

ओस मौसम

आस किरण जगी

भीगी प्रकृति!

5

मिली पूर्णता 

पाकर ओस स्पर्श

हँसते फूल !

-0-

3-प्रदीप कुमार दास ‘दीपक’

111

 

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | नवम्बर 27, 2016

1697

1-कृष्णा वर्मा

1

धन रस के

रसपान के मारे

झगड़े सारे।

2

बंदा कोई हो,

हो वो धन की खान

पाएगा मान।

3

दिल ना भरे

धन रस पीने को

कुकर्म करे।

4

धन शैतान

करा के गुणगान

दे अभिमान।

5

मरा ईमान

धन ही सर्वोपरि

बाकी नाकाम।

6

धन ख़ातिर

रोशन हैं बाज़ार

चोखा व्यापार।

7

रिश्ते ना प्यार

तँगे धन_ परदे

आँखों के द्वार।

8

कैसी खनक

काग़ज़ी टुकड़ों ने

बाँटी सनक।

9

धन जुनून

संवेदनाओं का हो

नित्य ही ख़ून।

10

मिटी मर्यादा

कोई संग साथ ना

धन से ज़्यादा।

11

धन शैतान

हिंसा के पाठ बाँचे

राहें अनाम।

-0-

2-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

धूप -किरन

तुम चन्दनमन

मेरा जीवन।

2

तुम स्पंदन

प्राणों की धड़कन

निर्मल मन।

3

युगों-युगों से

चले हो संग-संग

झेल तपन।

4

ये गहो हाथ

छूटे नहीं बन्धन

 पावन मन !

5

लो साँझ हुई

खो नहीं जाएँ कहीं

कसो बंधन।

6

मिली जो नहीं

अधरों की छुअन

 बढ़ी जलन ।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 25, 2016

1696

1-सुभाष चंद्र लखेड़ा

खोजा रात में 

पुराना कनटोपा 

सर्दी को देख।

बंद खिड़की 

रोके सर्द हवाएँ 

दद्दा बताएँ। 

लौटी रजाई 

मायके से अपने 

गद्दे से मिली।  

सर्दी को देख 

रात भी घबराई 

चाय बनाई। 

अंगीठी बुझी 

बुढ़ापे का असर 

काँपा बदन। 

-0-

2-प्रियंका गुप्ता

1

ग़मों की आँधी

ज़ोर बड़ा लगाए

उड़ा न पाए ।

2

मन बावरा

अपनी पहचान

खोजता फिरे ।

3

यादों के पंछी

भटकते रहते

जाने किधर ।

4

खामोश रहूँ

कभी तो समझोगे

दिल की ज़ुबाँ

5

उँगली छुड़ा

जाने कहाँ लुकाया

बचपन वो ।
-0

3-प्रदीप कुमार दाश दीपक
1
रात के रंग
मानो भेद रहे हों
तम के मर्म
2
चाँदनी रात
चेहरा चमकाती
कजरी रात ।
3
अंधेरी रात
एक दीप बताता
उसे औकात ।
4
चाँद तनहा
झील की पगडण्डी
चला अकेला ।
-0-

4-नरेंद्र श्रीवास्तव

1

सहर हुई
पक्षी चहचहा
नई उमंगें।
2
शरद धूप
आँगन में आ खेले
शिशु सदृश्य।
3
नभ से आई
पवन ठिठुरती
कम्बल माँगे।
4
शीत लहर
आकाश दूर खड़ा
चाँद से झाँके
5
रात दुबके
नभ ने बरसा
ठंड के गोले।

6

रात काँपती
शरद ठिठुरन
सूर्य न गा।
7

रात अकेली
सड़क से गुजरी
सर्द सन्नाटा।
-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | नवम्बर 23, 2016

1695

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Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 22, 2016

1694

डॉ.सुरेन्द्र वर्मा कृत ‘दहकते पलाश’ के प्रति मेरे भाव

पुष्पा मेहरा

dehakte-palashदर्शनशास्त्र के वरिष्ठ अध्येता,कवि,चिन्तक,लेखक,व्यंग्यकार,समीक्षक ,रेखाकार,हाइकुकार आदि विशेषणों से सर्वमान्य वर्मा जी का हाइकु-संग्रह ‘दहकते पलाश’ हाथ में आते ही सर्वप्रथम मन प्रश्न पूछने लगा कि रंग और गुणों से सम्पन्न,बसंत और फाग के रंग में फूला पलाश आखिर कवि मन को दाहक क्यों लगता है ,क्या एक ओर इसका गुनगुना सा मादक रंग,खिला –निखरा –निष्कलुष रूप, इसका तिर्यक भ्रूविलास और दूसरी ओर माया जनित सौन्दर्य और गुणों –अवगुणों के दर्पण को निहारता मानव मन स्वाभाविक स्पर्धा वश ईर्ष्या की आग में दहक उठता है ! ये सारे प्रश्न जो मेरे मन को कुरेद रहे थे उनके उत्तर मुझे इस संग्रह रूपी सागर में अवगाहन करने से स्वमेव ही प्राप्त हो गए।

वास्तव में यह हाइकु-संग्रह, एक कुशल सम्वेदनशील रचनाकार के मनोभावों ,गहन विचार ,गम्भीर सोच का, नाना बिम्बों –प्रतिबिम्बों के माध्यम से गढ़ा देश व समाज का स्पष्ट आइना है। पलाश का फूल एक साधारण फूल नहीं वह तो पुष्पराग है उसका स्वरूप तथा उसमें स्वयं को पूर्णतया समा लेने की मानव मन की अतिशय अप्राप्य लालसा ही मन को दग्ध करती है , तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो सारा जड़ –चेतन यानि कि सारा संसार चकित कर देने वाले विरोधाभास से गुज़र रहा है। एक  ओर यह संसार हँसते –खिलखिलाते पलाशवन की भाँति मोहक है तो दूसरी ओर प्रकृति,परिवार और समाज की नाना प्राकृतिक व स्वपोषित विसंगतियों से भरा पड़ा है जो कभी हमें उनसे निपटने का सुलझा मार्ग सुझाती हैं तो कहीं हमें असहाय बना के छोड देती हैं। प्रकृति समाज और उसकी इकाई इन्सान यहाँ तक की पशु –पक्षी,वन्य प्राणी सभी तो इसी घेरे में आबद्ध-संघर्षरत हैं इन्हीं भावों का चित्रण वर्मा जी ने ८ खंडों और उपखंडों में विभाजित इस हाइकु संग्रह में कुशलता से किया है। शेष रहा परिशिष्ट तो वह तो उनकी अन्य रचनाओं के प्रति वरिष्ठ साहित्यकारों के अभिमत की गूँज है। संक्षेपत: वर्मा जी ने जीवन-जगत के हर पक्ष को अपने हाइकु के माध्यम से वाणी दी है ,मैंने  इन्हीं तथ्यों पर प्रकाश डालने का,दूसरे शब्दों में रचनाकार की अनुभूतियों को स्वयं भी हृदयंगम कर उनको उकेरने का छोटा सा प्रयास किया है।

जन्मदात्री माँ की तरह धरती भी तो हमारी माँ ही है वह तो स्वर्ग से भी महान है, पूज्य है,सर्वोपरि है अत: वर्मा जी सर्वप्रथम धरती माँ की दयनीय स्थिति को याद करते हुए यह बताना नहीं भूलते कि नाना दु:खों को सहती-सदा शांत रहने वाली धरती दारुण दुःख का आघात पा जब कभी काँप कर अपनी पीड़ा का हमें अहसास करा देती है। शांति का साकार रूप धरा जब, प्राकृतिक आपदा भूकम्प के असह्यआघातसे अपनी प्रतिक्रिया दिखाती है तो मानवीय सम्वेदना की अनुभूति मन को उसकी मूक पीड़ा का अहसास कराने से नहीं चूकती, निम्न हाइकु मानवीकरण का उत्कृष्ट उदाहरण है –

  • भूकंप आया /शांत धरा का दुःख/समझ पड़ा।

ग्रीष्मऋतु की विभीषिका,गर्म लू के थपेड़े, जलाभाव से संत्रस्त पशु –पक्षी की व्यथा चंद वर्णों में मुखरित हो रही है। दहकती गर्मी का दृश्य प्रस्तुत करता मर्म भेदी निम्न हाइकु मन को हिला रहा है –

गर्म हवाएँ/ धरती पर निढाल /  हाँफता कुत्ता।

 चिड़िया प्यासी / नल की सूखी टोंटी /चोंच मारती।

सिक्के के दो पहलू की भाँति जीवन के भी दो पहलू की ओर इंगित करता अनुभवों की लड़ी पिरोता निम्न हाइकु जीवन की सच्चाई बता रहा है-

  • कुछ कड़वी/ निबौली सी ज़िन्दगी/कुछ मीठी सी।

पर्यावरण के प्रति जागरूक कवि जब देखता है कि जंगल कटते जा रहे हैं,मनुष्यों में बहशीपन बढ़ता जा रहा है, मनुष्य मानवीय आचरणों को भूल अमानुषिक व्यवहार करने पर उतारू है तो सहृदय मन चीत्कार कर स्वयं से और हम सबसे प्रश्न पूछता है कि बताओ तो ज़रा-

जंगल कटा/जंगलीपन बढ़ा/कैसा विकास।

उद्धृत है मौसम पर आश्रित घटते-बढ़ते समय की उपमा रबर से कर नया  उपमान प्रस्तुत करता निम्न हाइकु –

यह वक्त है/रबर सा खिंचता /सिकुड़ता है।

आज की स्वार्थी दुनिया में सभी अपने में खोए हैं ,एक दूसरे के दुःख –दर्द को सुनने –समझने व बाँटने वाला कोई भी नहीं है ,ऐसे आत्मकेंद्रित समाज की करुणा जगाने वाली स्थिति का दृश्य मात्र नन्हे हाइकु में समा कर इसकी गूढ़ता को दुगना –चौगुना कर रहा है –

  • सिमट रहे / घरों में लोग ,चीखें/बुलाती रहीं।

एक चिंतन शील विचारक जब जीवन –जगत से जुड़ा डगमगाती सामाजिक  स्थिति,अराजकता,बेरोजगारी,अशिक्षा,संकीर्णता,आतंक,हत्या-आगजनीसी भयावह स्थितियों के अनुभवों से गुजरता है तो उसके सारे अनुभव शब्दों में ढल कर प्रश्न बन जाते हैं और उत्तर खोजता –असहाय समाज नि:शब्द रह जाता है डॉ.वर्मा जी का निम्न हाइकु इसी का प्रमाण है –

  • कहाँ खो गयी /दिलों में इंसानों के /इंसानियत।

भरोसे की कमी ही परस्पर नाते –रिश्तों में फूट डालने का काम करती है और आपसी उदासीनता का कारण भी ,साथ में सदा सर चढ़ बोलने वाला अहंकार हर असंयमित व्यक्ति के मन की कोठरी से उछल –उछल कर उसी प्रकार बाहर आ जाता है जिस प्रकार हाथ की उँगली में पहनी गयी हीरे की अँगूठी की चमक–झलक छिप ही नहीं पाती ,ऐसे बिंब प्रधान हाइकु तो आम व्यक्ति के मनोभावों को सहजता से खोल कर रख देते हैं देखिये –

  • ऐसे या वैसे / भरोसा ही न रहा /जुड़ते कैसे।

  • कैसे छिपाऊँ/ अहं हीरे की कनी /अँगूठी जड़ी|

डॉ.वर्मा जी का दार्शनिक मन मायावी चकाचौंध में फँसे, जीवन-जगत की लुभावनी सच्चाई से अनभिज्ञ- अज्ञानी लोगों को सचेत करते हुए कहता है कि सुनो तो जिसे हम देख- सुन रहे हैं, जिसे हम सत्य मान रहे हैं वह सत्य नहीं है  –

  • देखा जो भी/केवल सत्याभास /सत्य नहीं था।

एक अज्ञात रहस्य में जीता, माया के चक्रव्यूह में फँसा व्यक्ति सत्य –असत्य का भेद नहीं समझ पाता ,जो दृश्यमान है वह सत्य नहीं है इस तथ्य को या तो जानता ही नहीं है या जानकर भी नहीं समझता कि ‘ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या,’ भ्रममें भूला ये मानव मन ही तो है जो मुझे भी लिखने को बाध्य कर है रहा कि सदा – ‘पालता भ्रम\रस्सी में साँप का\हमारा मन’।

     वास्तव में जग की रीति यही है कि कर्म कोई करता है और उस कर्म से प्राप्त सुख का उपभोग कोई अन्य ही करता . दूसरे शब्दों में कुआँ कोई खोदता है पानी कोई पीता है , मंच कोई सजाता है, स्क्रिप्ट कोई लिखता है और अभिनय कोई दूसरा ही करता है|  वस्तुत:वर्मा जी के जिस हाइकु को मैं उद्धृत कर रही हूँ वह उस छोटी सी बंद डिबिया की तरह है जिसको खोलने से कई झिलमिलाते रंग छिटक जाते हैं , प्रस्तुत है बहु भावार्थी हाइकु –

  • कोई उठाए /पालकी और बैठे /पालकी कोई।

   क्षमा कीजिएगा उपरोक्त हाइकु को पढ़ कर मैं स्वयं इसके दार्शनिक पक्ष की ओर बढ़ती हुई लिखने को विवश हो रही हूँ कि –

  • जगत मंच / मन के नेपथ्य में / है सूत्रधार।

 हर सजग कवि या कहानीकार सामयिक प्राकृतिक विषमताओं के अच्छे  – बुरे प्रभावों से प्रभावित अपनी मन:स्थिति के अनुरूप अपनी रचना की विषय-वस्तु अवश्य चुनता है, यही कारण है कि पर्यावरण के विनाश से उत्पन्न भयावह स्थितियों का सामना करते कवि मन की सम्वेदना निम्न हाइकु में उभर कर आई है –

बाढ़ दुर्भिक्ष / तूफ़ान ज़लज़ला/घर उजड़े।

बुद्धि चातुर्य के लिए साक्षर होना आवश्यक नहीं है यह मानना अनुचित न होगा कि साक्षरता बुद्धि को माँजती भर है बहुत सी अनपढ़ नारियाँ विद्वान पुरुषों को हर क्षेत्र में पीछे पछाड़ने की क्षमता रखती रही हैं और रखती भी हैं,निम्न हाइकु इसी भाव को दर्शा रहा है –

  • अनपढ़ स्त्री /साक्षर पुरुषों पे /पड़ती भारी।

शब्दों में संसार को समाहित करने की शक्ति होती है, बाजारवाद के इस युग में अर्थ के बिना सब व्यर्थ है इस पर व्यंग्य कसते हुए कवि का कहना है –

  • ईश्वर नहीं /है सर्वशक्तिमान /पैसा,बाज़ार।

वर्मा जी ने जहाँ मूल्यों के अवमूल्यन को स्वीकारा है वहीं माता –पिता के रिश्तों की गरिमा,भावनात्मक स्तर पर अपनी संतानों के प्रति उनका अटूट जुड़ाव तथा स्थायित्व का जो उत्कृष्ट उदाहरण निम्न हाइकु के माध्यम से चित्रित किया है वह परोक्ष रूप से माता –पिता के प्रति कर्तव्यबोध कराता बार –बार पढ़ने,समझने व से उन्हें हृदय से लगाये रखने की प्रेरणा दे रहा है –

  • ऊँचा गम्भीर / अचल हिमालय / पिता सरीखा।

  • बदला वख्त/ माता और पिता श्री / कब बदले।

 जिस प्रकार खादी का कम्बल शुरू में तो शरीर को चुभन देता है किन्तु धीरे-धीरे वही शीत से ठिठुरती काया को गर्मी का सुख देता है उसी प्रकार माता –पिता द्वारा दी गयी नैतिक शिक्षाएँ भी स्वतंत्र विचारों वाली संतानों को आरम्भ में तो बुरी अवश्य लगेंगी किन्तु जीवन के मैराथन में कहीं न कहीं सहायक होती हैं। निम्न हाइकु में इस भाव की लाक्षणिक अभिव्यंजना ग्राह्य है –

  • खादी कम्बल /चुभता तो बेशक /गरमी देता

     पारिवारिक सम्बन्धों में भाई –भाई के सम्बन्धों के विघटन से उद्वेलित मन से उपजा अनुत्तरित प्रश्न पाठक की सोच को झिन्झोरता है पर प्रश्न का उत्तर तो मानसिक तनाव के चक्रव्यूह से निकल ही नहीं पाता, उसने तो चक्रव्यूह भेदना सीखा ही नहीं, भाव की सहज अभिव्यंजना निम्न हाइकु में व्यंजित हो रही है –

  • एक जगह /हम पले–बढ़े,क्यों /अलग खड़े।

पुस्तकें जो हमारे ज्ञान का श्रोत हैं, नैतिक शिक्षा- प्राप्ति का उपलब्ध साधन हैं उनसे प्राप्त सतज्ञान को जीवन में अपनाने की प्रेरणा देता निम्न हाइकु आदर्श वाक्य की तरह प्रस्तुत है –

  • ढंग जीने का/सीखा जो पुस्तक से /उसे उतारो।

    हम सदैव दीपक से प्रकाश की अपेक्षा करते हैं अर्थात् सारे आदर्शों को हम   दूसरे में ही देखना चाहते हैं परन्तु मानव मूल्यों व सिद्धांतों की लीक का स्वयं  अनुपालन  करते हुए समाज के सम्मुख आदर्श प्रस्तुत करने की चाह करते भावों से भरी आवाहन करती लेखनी कहती है – 

  • स्नेह उड़ेलो/स्वयं ही बनो दीप /उजियारा दो।

श्रम का महत्व तथा एकता में बल का सकारात्मक संदेश देते अकर्मण्यता व अलगावबाद के वरोधी हाइकु समाज को सही दिशा सुझा रहे हैं देखिये –

  • गहरा खोदो /पाओगे जल मीठा / कर्मठ ज्ञान।

  • कंधे से कंधा / मिला करके चलें / पहुँच जाएँ।

    साक्षरता और ज्ञान मनुष्य की बुद्धि का विकास कर पशुओं से ऊँचा उठा, उन्हें तर्क संगत दृष्टिकोण देता है, पशुओं का तो बौद्धिक विकास ही पूरा नहीं हो पाता , उनके लिए ज्ञान का होना न होना बराबर है,निम्न हाइकु इंसानों के लिए शिक्षा के महत्व का संकेत कर रहा है –

  • पशु समान / यह मानव देही/ बिना ज्ञान के।

  • लीक-अलीक / दोनों ही पथ खुले / चुनना तुम्हें।

 डॉ.वर्मा जी के शब्द –शब्द में उनके अनुभवों की गहरी खनक है ,प्रस्तुत है अनुभूत सम्वेदना का निम्न भाव –

  • रोगी समाज /कहीं भी रखो हाथ/दर्द ही दर्द।

उपर्युक्त हाइकु नानक साहब के कहे शब्दों की कड़ी में कड़ी बन जुड़ रहा है कि ‘नानक दुखिया सब संसारा’।

भाग्य व नियति को हम सभी मानते हैं और यह भी समझते हैं कि हम कितना ही पंडितों से, घटने वाली अच्छी –बुरी घटनाओं के पल –छिन, दिन वा समय की जानकारी लेना चाहें किन्तु सम्भव नहीं हो पाता ना ही होनी को कोई टाल ही पाता है, जो होना है वह तो चुपचाप हो कर ही रहेगा,नियति की महिमा बताता तथा उस पर विश्वास करता वर्मा जी का हाइकु कहता है कि –

  • चुपचाप ही/ होता है सब कुछ /अपने आप।

 दुःख में अपने ही काम आते हैं दूसरे नहीं ,अपनेपन की आँच को गह्माता अपनत्व के बंधन में मन को बाँधने का सहज आग्रह करता हाइकु, कवि मन की निष्कलुष-सरल छवि उभार रहा है।प्रस्तुत है सत्यता पर टिका हाइकु जो पाठकों को भटकने से रोकना चाहता है –

  • कोई न आया / हाथ अपना ही था /वो काम आया।

परिवार ,समाज तथा राजनेताओं पर तीखा व्यंग्य बाण छोड़ता निम्न हाइकु अपनी अभिव्यंजना का सानी नहीं रखता –

  • चुपड़ी रोटी /लूट खाई पराई/मानो न मानो।

समाज में जाति व वर्ग गत भेदभाव का विरोधी कवि मन निम्न हाइकु के माध्यम से बता रहा है की हम सब इन्सान एक समान हैं, कोई भी छोटा या बड़ा नहीं है, भाव की लाक्षणिक अभिव्यक्ति मन को कुछ सोचने के लिए विवश करती है –

  • पाँचों उँगली/सभी एक नाप की /मानो न मानो।

जिस प्रकार वर्मा साहब जी के हाइकु में आपके भावों –अनुभावों की गूँज है उसी प्रकार ताँका व सेदोका में भी उनके अनुभवों का ताप है,तभी तो बर्फ़ का ठंडा शांत–निर्लिप्त टुकड़ा भी मानवी स्पर्श पा द्रवित हो ही जाता है,अर्थात स्नेहिल  सम्बन्धों की ऊष्मा हर शांत-तटस्थ मन को भी पिघला देती है। उदाहरण के रूप में प्रस्तुत है निम्न ताँका –

  • बर्फ़ का ठंडा /टुकड़ा ही क्यों न हो/शांत –निर्लिप्त /मानवी स्पर्श पाके /पिघल ही जाता है।

निम्न ताँका में नदी से प्रेरणा लेकर निरंतर आगे बढ़ कर ही लक्ष्य की प्राप्ति करना,अर्थात् अंतिम मंजिल पाने के लिए संघर्षों से टक्कर लेते हुए गति को ही जीवन की सार्थकता मानते हुए कवि ने लिखा है –

  • नदी बहती /कंकड़ों से जूझती /लक्ष्य पा जाती /क्यों न मैं आगे बढूँ /झंझटों से क्यों डरूँ

अंतिम सृजन खंड में मानवीय सम्वेदना से अभिभूत मन, मानवी अत्याचारों से रूँधी – गूँधी मौन,सहनशील ऊपर से कठोर पर भीतर से कोमल धरती से ही प्रश्न करता है कि बताओ तो –

  • धरती तुम /सतह पर सख्त/अंदर नीर –भरी, /कितने आँसू /रखे सुरक्षित हो /कोई नहीं जानता।

उपर्युक्त सेदोका मानवीकरण का सुंदर उदाहरण होने के साथ ही हर सहृदय मन को अभिभूत करने में पूर्णत: समर्थ है ,मुझे यह लिखने में संकोच नहीं हो रहा कि हमारी जीती –जागती माँ की भाँति यह धरती जितनी ऊपर से शांत,स्थिर व दृढ़ दिखती है भीतर से उतनी ही कोमल व सहृदय है,सदानीरा धरती की पीड़ा उसी की तरह अथाह है , उसके भीतर कितने आँसुओं का समन्दर समाया है हममें से कोई भी नहीं जान सकता, शायद शोषण से आहत की पीड़ा अव्यक्त ही रहती है ! 

निष्कर्षत: मैं इतना ही कहना चाहूँगी कि सम्माननीय डॉ.वर्मा जी का हाइकु संग्रह ‘दहकते पलाश‘आपके अनमोल भाव रंगों का सागर है,चाँदनी रात में जिसकी  तरंगों के साथ जीवन के ज्वार –भाटे के अनुभवों को आपने भरपूर जिया ही नहीं अपितु अपनी काव्य मंजूषा में सम्पूर्ण रूप से परत दर परत सहेज कर रख दिया, यही कारण है कि इस मंजूषा की जो भी परत खुलती है उससे एक कुशल–जागरुक शब्द शिल्पी का संदेश उभर कर आता है। सारांशत: –

  • अनुपम हैं /दहकते पलाश /रंग ही रंग।

-0-

दहकते पलाश’, (हाइकु-संग्रह):डॉ. सुरेन्द्र वर्मा ; प्रकाशक:अयन प्रकाशन – 1/20, महरौली ,नई दिल्ली 110030 ; संस्करण: 2016;  पृष्ठ :104 , मूल्य:220   रुपये

पुष्पा मेहरा , बी-201, सूरजमल विहार , दिल्ली-110092  फ़ोन :011-22166598

pushpa .mehra @gmail .com

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | नवम्बर 21, 2016

1693

1-मंजूषा मन

1

प्याली में सुख

प्रेम की एक चुस्की

मिटेंगे दुःख।

-0-

2-डॉ. सरस्वती माथुर

1

 हवा भँवर

बाँस बनों में आ

झांझर बजा

2

जीवन नाव

भँवर में घूमती

पार हो गई ।

3

भँवर जागे

दु:ख नदी उतरी

सपने डूबे।

4

मन प्रवाह

भँवर सा घूमा तो

नि:शब्द हुआ ।

5

मन की नाव

जीवन में पानी सी

भँवर उठे।

6

प्रेम भँवर

उत्सवी मौसम में

ढाये क़हर।

7

तेज़ भँवर

किनारा पा लिया तो

दुआ जिंदगी।

8

तन्हा सा मन

यादों के भँवर में

डूबता गया।

-0-

2-पूर्णिमा राय

1

ठण्डी बयार

जले नोट हजारी

पकड़ा चोर!!

2

मंद समीर

छुए इन गालों को

हूक सी उठी!!

3

चंचल बाला

वायु के वेग जैसी

सिहरे काया!!

4

 मन की दौड़

हिरणी की मानिंद

अन्तर्मन से!!

5

मन बावरा

हिरण की तरह

भरे कुलाँचे!!

6

कस्तूरी मिले

चाह है अपनों की

भटके मृग!!

7

मोहक खुश्बू

बसी हुई साँसों में

चाहे हिरणी!!

-0-

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