Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 16, 2021

2196

डॉ. सुरंगमा यादव 
1
सत्य छिपाएँ
करके उपक्रम
SURANGAM YADAVभ्रम फैलाएँ।
2
रिश्ते हैं कम
उनमें भी तनाव
घटा लगाव।
3
स्वार्थ  सैलाब
संबंधों का बहाव
विवश व्यथा।
4
चलो मनाएँ
‘मानवता बचाएँ ‘
दिवस कभी।
5
बिखरा पड़ा
आनॅलाइन प्रेम
सच्चा या झूठा?
6
प्रेम सिंचित
सूखते न किंचित
रिश्तों के खेत।
7
तप्त तवे पे
जल-बिन्दु-सी स्वाहा
क्रोध में मति।
8
मस्ती की शाला
लगती मधुशाला
है विष कन्या।
9
मुश्किल तो है
असंभव नहीं है
लीक तोड़ना।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अक्टूबर 7, 2021

2195

1-डॉ.नीना छिब्बर,   जोधपुर
1

नीन छिब्बरकोयल गाए

बासंती अनुराग

 बरसे राग।

2

बोले चिरैया-

खोल दे खिड़की

झाँकूँ अंदर।

3

भागे ये पाखी

 देख तप्त धरती

कर तू छाँव।

4

सीखो पाखी से

चोंच भर दानों में

भरना पेट।

5

सूना गगन

मेघ भी अनमन

पंछी व्याकुल।

6

 कटा वो वृक्ष

जिस पर था वास

पंछी उदास।

7

नभ आबाद

पंछी उड़े आजाद

शुभ संकेत।

8

नन्ही चिड़िया

लाई शुभ संकेत

लौटेंगे देश।

9

जोड़े तिनके

सँजोकर उम्मीद

नीड़- निर्माण।

10

है मधुमास

छेड़े वसंतदूत

मधुरगीत।

11

सूरज आया

संग में पाखी लाया

भरा आकाश।

12

निर्मल जल

चुगे मोती का चुग्गा

हंस- युगल।

13

तिनके चुन

गौरेया रही बुन

फिर से नीड़।

14

पंछी सिखाए

ऊँची उड़ान पर

जमीं पे ध्यान।

15

चहचहाना

इंगित करता है-

नया सवेरा।

-0-

2- रश्मि विभा त्रिपाठी 

1

rashmi vibhaमन औ प्राण 

करें नित्य आह्वान 

‘शैलपुत्री’ का।

2

मन- रंजन 

मात्र अवलंबन 

मातृ- वंदन ।

3

आस्था का दीप 

शुचिता से जलाऊँ 

माँ तुम्हें ध्याऊँ।

4

प्रेम- प्रदीप 

समर्पण का घृत 

स्वीकारो व्रत ।

5

माँ मैं अजान 

मेरा व्रत- विधान

तुम्हारा ध्यान ।

6

विरोधाभास

स्त्री- स्वरूप को पूजें

निष्ठा का ह्रास । 

7

दोहरी नीति

कन्या- पग पखारें 

स्त्री को दुत्कारें ।

8

युगों से ध्यानी 

ये मन- कर्म- वाणी

कृपा! कल्याणी ।

9

है अविराम 

यह जग -संग्राम

माँ त्राहि माम् ।

10

भक्ति निष्काम 

माँ ‘शैलपुत्री’ नाम

मुक्ति का धाम ।

11

कृपा अनन्य 

मैं हुई जप धन्य 

‘शैलपुत्री’ को ।

12

कटेंगे ग्रह 

कालिका अनुग्रह 

कल्याणकारी ।

13

धन्य अपर्णा!

निस्वार्थ बाँटे छाँव 

तू सप्तपर्णा ।

14

मेरे दुख से

माता होगी उद्विग्न 

हरेगी विघ्न ।

15

टारे अरिष्ट 

माँ शैलपुत्री इष्ट

कृपा विशिष्ट। 

16

अनन्य श्रद्धा 

अस्वीकार्य पाखंड

‘व्रत अखंड’ ।

17

शुचि भाव की

मन- प्राण- आहुति

मंगल स्तुति ।

18

शत्रुनाशिनी 

माँ शैलपुत्री- स्तुति 

दुखहारिणी ।

19

माँ चाहे निष्ठा 

मन- मंदिर में हो

प्राण- प्रतिष्ठा ।

20

माँ शैलपुत्री 

दे दुख से निर्वाण 

‘शक्ति’ प्रमाण ।

21

मातृ- स्तवन

शुभ- मंगलकारी

अम्बा- अर्चन ।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 3, 2021

2194

भीकम सिंह

1

धूल-धक्कड़

अपने पास रक्खें

गाँव-फक्कड़।

2

मौन छतों पे

ढूँढती फिरें बातें

जेठ की रातें।

3

दिखता चूल्हा

उपले की राख पे

ज्यों राह भूला।

4

ओस से चुन

खेतों की गुन-गुन

चली पवन।

5

आँखों में म्लान

लेके श्रमिक चला

भूला मुस्कान।

6

श्रम का स्वेद

ढुला ज्यों चुपचाप

देखके साँझ।

7

गाँव रखते

रास्ते सभी काँधे पे

पैर कीच में।

8

धरा की मूँठें

नीम और करंज

गाँवों से रूठे।

9

जकड़े खाद

खेतों की पसलियाँ

बढ़े उत्पाद।

10

भय के भाव

भूल गई मुस्कान

आया ज्यों गाँव।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 26, 2021

2193

1-डॉ. गोपालबाबू शर्मा

1

ज़िन्दगी वही

प्यासे जनों के लिए

नदी जो रही।

2

नदी भी प्यासी

पनघट है मौन

छाई उदासी।

3

दूध की नदी

आज भी है बहती

यूरिया -घुली।

4

नदियाँ गन्दी

करें हम कर्मों से

क्या अक़्लमन्दी।

-0-

2-दिनेश चन्द्र पाण्डेय

1.

पहाड़ पर,

गडरिये की छड़ी,

हाँकती धूप

2.

मोह-लालसा,

स्वर्ण मृग की खोज,

छलावा हाथ

3.

बूँद नदी की,

बहुत ऊँची उठी,

फिर नदी में।

4.

सागर तट,

मौजों के फेन टूटे,

पुनः जीवन।

5.

रंगीले मेघ,

छबीली धरा पर

निसार हुए.

6.

बेरोजगार,

जीवन का पहाड़

चढ़े तो कैसे?

7.

यही होता है,

फसल काटे कोई,

कोई बोता है।

8.

गुड़िया ब्याह,

माँ का कलेजा काटें,

बेटी के आँसू ।

9.

साँझ उतरी,

समेट रहा रवि

धूप– पोटली।

10.

मूसलाधार,

मिट्टी चाटने लगीं

नदियाँ सारी।

11.

सत्ता चरित्र

बर्फबारी के वक़्त,

सूर्य लापता।

12.

कोरोना -काल,

मुद्दतों में जुड़ा है

घर से नाता।

13.

पूस की रातें,

चुभे चीर अस्तर

हवा नश्तर।

14.

भोर ने बाँटी,

रात पहाड़ पर

बरसी चाँदी।

 15.

वाचनालय,

स्तब्ध हुआ मौन

चिंघाड़ा फोन।

16.

शान्ति -व्यवस्था,

कपोतों पर देता

बाज पहरा।

17.

दीप ने रचा

उजालों का संसार,

तम के पार।

18.

भक्तों के दल,

बिल्व वृक्षों के तले,

सावन आया।

19.

भीगी-सी भोर,

अता-पता धरा का,

मेघों से पूछे।

20.

वक्त का फ़र्क,

भोर का अख़बार

शाम को व्यर्थ।

21.

बुरांस खिले,

घुघूती की सीटी से

गूंजा पहाड़।

 (बुराँस–अरुणिम आभा लिये पहाडी फूल, घुघूती-मीठी आवाज की धनी छोटी पहाडी चिड़िया)

Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 23, 2021

2192

गौतम कुमार सागर

1

प्रेम के पत्र

भरित दीमक से

गौतम सागर - Copyयादें सिसके।

2

गिरह पड़े

बार-बार उलझे

साँसों का गुच्छा ।

3

प्रेम का जाल

हाथ में है जिसके

वो फँसा पड़ा।

4

नयन- कोर

अटका एक अश्रु

दृष्टि अछोर

5

नयन- सीप

अश्रु- महासागर

सपने मोती

6

वर्षा का तन

धरती का बदन

नव्य-सर्जन

7

फूल-  भीतर

मिट्टी की कोख में ही

पलती गंध

8

वादों का पान

मुख शब्द- रंगीन

नही यकीन

9

आस- कटोरा

दूध-जल मिश्रित

बनिए हंस

10

तुषार-वीणा

मरुस्थल का गीत

अजब सुर

11

गुलाबी गात

ईश्वरीय -संदेश

कन्या का जन्म

12

उषा- घूँघट

हटाता दिनकर

लजाती रात

-0-

गौतम कुमार ‘सागर’ 
शिक्षा  : स्नातक , एमबीए , सीएआईआबी
संप्रति : मुख्य प्रबंधक , राष्ट्रीयकृत बैंक , वडोदरा.
ईमेल  :-  gsagar6@gmail.com 
प्रकाशित पुस्तकें : सागर तुझमें कितना पानी (काव्य संग्रह),लाफिंग बुद्धा ( हास्य कविता संग्रह),
अजनबी जैसे हमसफर  ( लघुकथा– संग्रह ),आलेखावली  ( वित्त, बैंकिंग , अर्थ विषयों पर आलेख संग्रह),
भविष्य की भारतीय बैंकिंग : प्रौद्योगिकी के पंख , चुनौतियाँ एवं अवसर
-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 22, 2021

2191

डॉ. सुरंगमा यादव
1
कुहुक उठी
मन की अमराई
SURANGAM YADAVपाती है आई।
2
चलीं आँधियाँ
स्मृतियों का चँदोबा
कभी न उड़ा।
3
उमगे मन
प्रीत-गीत रचता
झूमे सावन।
4
प्रीत पुनीत
उर-घट पूरित
स्वीकारो मीत ।
5
आ, उठ चल!
किसी को तो करनी
होगी पहल।
6
चलता चल
सफलता का घर
है यहीं पर।
7
रेत- घरौंदा
लहरों ने आकर
पल में रौंदा।
8
सहमा गाँव
खतरे की रेखा पे
नदी के पाँव।
9
सूखी नदिया
लहरों की उम्मीदें
मन की क्षति।
10
क्यों ये रिवाज ?
मृत देह का साज
बेवा-सधवा।
11
अल्हड़ हवा
चिंगारी संग यारी
विपदा भारी।
-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 19, 2021

2190

दिनेश चन्द्र पाण्डेय

1

धरा के घाव

DINESH CHANDRA PANDEYजल का मरहम

झील -सृजन

2

खगों का शोर

उषा की लाल आँखें

खुलती गईं

3

ठंडा पहाड़

साँसें धुआँ छोड़तीं

काँपते हाड़

4

खिड़की पर

खग आकर बोले

भोर हो गई

5

ले इत्र गंध

महबूब की गली

चला गुलाब

6

शिशिर गया

महक उठे वन

देवदार के

7

शाम आ गई,

हाट में  सज रही

बेला की कली

8

मधुप उषा,

चूमे अम्बिया कभी

नीरज कली

9

पेड़ से दूब,

माँगती रह गई

थोड़ी सी धूप

10

आषाढ़ आया

यायावर मेघों ने

बसाई बस्ती

11

दीपक की लौ

हवाओं  की थपकी

आयी झपकी

12

बिखेर आई

सोना शिखरों पर

उनींदी उषा

13

नौका पाल की

थपेड़ों के सहारे

ढूँढें किनारा

14

रिश्तों की डोर
बुनता फिरता है
प्रेम- जुलाहा

15

केलि करती

कलियाँ हवा– संग

सरसों डोली

16

पिघली बर्फ ,

संबंधों की बगिया,

फिर महकी.

17

बच्चों ने घेरा,

पेड़ पर मचला

टपका आम

18

आम के बाग

मॉल निर्माण -क्षेत्र

लटका बोर्ड

19

अंबर- घट

नटखट सावन

तोड़के भागा

20

नारी की कथा

चारा-लकड़ी-पानी,

पहाड़ व्यथा

21

रौशन दीप

रात की सियाही में

घुले उजाले

-0-

दिनेश चन्द्र पाण्डेय, 8/450 जानकी सदन, जेलरोड, हल्द्वानी, जनपद-नैनीताल, उत्तराखंड-263139

Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 11, 2021

2189

भीकम सिंह
1
झूठा संदेह
खींच कर ले गया
रिश्तों का नेह।
2
शिशु के जैसे
कंधों पर चढ़े-चढ़े
सम्बंध थके।
3
गली में खड़े
अर्थहीन से रिश्ते
बेशर्म बने।
4
रिश्ता अज्ञात
दृगों में छिपा कोई
मूक आघात।
5
रिश्तों की टूट
पलक पुलिनों पे
छूटी ज्यों बूँद।
6
काला-सा रंग
ढूँढता पहचान
कान्हा के संग।
7
उम्र की छवि
शून्य में ताक रहा
बूढ़ा-सा कवि।
8
कली गा चुकी
खुशबओं के छंद
लगा के बंद।
9
उत्सव जगे
झूठ के मोर पंख
फिर से बँधे।
10
आँधी ले उड़ी
अधबना—सा नीड़
सोच में चीड़।
-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 6, 2021

2188

1-मंजूषा मन

1

MANJUSHA MANप्रेम तुम्हारा

तम में उजियारा

भोर का तारा।

2

 प्रेम के गीत

माथे पर अंकित

अधरों लिखे।

3

बरस जाएँ

आँखों की बदलियाँ

छूकर तुम्हें।

4

भोर किरण

अरुणिम आकाश

तुम्हारी याद।

-0-

2-आभा सिन्हा

1

आभा सिन्हाविश्वास- शीशा

इकबार जो टूटा

फिर न जुड़ा

2

ईश कुम्हार

गढ़े इंसाँ अपार

भिन्न प्रकार

3

झुर्रियाँ कहें-

गलियों से गुजरे

अनुभव के

4

रिश्ते शीशे- से

दरक के रिसते

रहे चुभते

5

मन बेचैन

न इक पल चैन

ढूँढते नैन

6

मन विमान

न तनिक थकान

भरे उड़ान

7

बेटी जो आई

दादी अम्मा मुस्काई

बजे बधाई

8

गुरु बादल

कृपा की बरसात

हो दिन रात

9

पिया की पाती

मरुस्थल के बीच

जलप्रपात

10

निशा टाँकती

आँचल में अपने

चाँद सितारे

-0-

3-रश्मि विभा त्रिपाठी

1

rashmi vibhaतुमने जो दी

निश्चल नेह- निधि

अनमोल है।

2

तुम्हारा स्नेह

इन श्वासों की पूँजी

पा मोद में ‘जी’ ।

3

निश्चल- नेह

डूबी तो उबरी हूँ

पीड़ा से पार !

4

निर्मल- नेह

नहाई तो मिला है

दुख से मोक्ष!

5

तुम्हारा प्रेम

अजेय रखता है

‘दुआ का नेम’ !

6

तुम्हारा प्यार

वसंत की बहार

मन के द्वार !

7

मेरी पूजा का

प्रभु से मिला फल

नेह- निश्चल ।

8

कौन सी विधि

पाती ये नेह- निधि

ईश- कृपा है !

-0-

4-डॉ. पूर्वा शर्मा

1

कुछ न कुछ

पूर्वा शर्माप्रतिपल सिखाता

जीवन-गुरु ।

2

सिखाता चला

जीवन फलसफा

वक्त-शिक्षक ।

काँच-से शिष्य

शिक्षक जो तराशे

हीरा बना दे ।

4    

ऐसा परस

लोह भी हुआ स्वर्ण 

गुरु-पारस ।

5

गुरु की माया 

भागती दुम दबा

तम की छाया ।

6    

स्वयं जलता

शिष्य को निखारता

सूर्य-सा गुरु ।

7     

तम की चाल

या जीवन- अकाल 

गुरु-मशाल ।

8     

ज्ञान, हौसला

बच्चों में भर देती

माता-शिक्षिका ।

माटी लचीली

सुंदर कृति गढ़े

गुरु-कुम्हार ।

शिष्य ना गुरु

ना कहीं गुरुकुल

सिर्फ गूगल ।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 22, 2021

2187

 

रक्षाबंधन हाइकु – रश्मि विभा त्रिपाठी ‘रिशू’

1

रक्षाबन्धनअक्षत, मौली

आशीष भरा थाल

गर्वित भाल।

2

रक्षाबंधन

निश्चल नेह-नाता

सहेजे मन।

3

छीने डॉलर

मिलाप-अवसर

एकाकी घर।

4

लाडो जो बाँधे

रक्षा-सूत्र कलाई

अजेय भाई।

5

लाडो ले आई

राखी और मिठाई

चहके भाई।

 6

कलाई बँधी

बहना की दुआएँ

जिलाती जाएँ।

7

उर-क्षितिज

स्थित नेह का तारा

विषाद हारा।

8

श्वास न टूटी

रक्षक नेह-बूटी

राखी अनूठी।

9

भेजते भाई

राखी पर्व बधाई

नेट पे आई।

10

चिट्ठी न तार

बधाई का अम्बार

लगा नेट पे।

11

लाडो बाँधती

कलाई पे दुआएँ

भाई हर्षाएँ।

12

श्रावण-मास

लाडो सँजोए आस

भाई न पास।

13

नेह से भरी

ज्यों पढ़ी पाती, झरी

सुख-मंजरी।

14

लाडो का दर्द

इया खुदगर्ज

भूले हैं फर्ज।

15

बाधा से बच

बाँध रक्षा-कवच

आयुष्मान हो।

16

सूनी कलाई

सरहद पे भाई

राखी न आई।

17

नेह से जड़ा

कच्चा, कोमल धागा

दायित्व बड़ा।

18

सावन आया

बहना जोहे बाट

भाई न आया।

19

विचरो कहीं

शुभ-सलूनो-रीत

बिसारो नहीं।

20

तुम्हें बधाई

राखी पर तो आए

भूले न भाई।

21

राखी पे भेजा

बहना ने अपार

भाई को प्यार।

22

चिट्ठी जो पाई

झूमे सैनिक भाई

राखी है आई।

23

मौली नेह की

फौजी पाए राखी पे

पाती गेह की।

24

भाई कृतार्थ

पा बहना की दुआ

अजेय हुआ।

25

कच्चे धागे में

गूँथे बहना प्यार

राखी-त्योहार।

26

रक्षा का सूत

तोड़े काल-पिंजर

भाई अमर।

27

रहे अटूट

ईश! डोरी नेह की

जाए न टूट।

28

कच्ची– सी डोर

नेह बाँधा कलाई

सँभालो भाई।

 29

बहना ने जो

तार बाँधा कलाई

मुदित भाई।

30

अप्रतिम है

बहना का ये प्यार

गुलाबी तार।

31

नव्य श्रावणी

नेट पे सजी थाली

नेह से खाली।

32

पर्व-प्राचीन

आधुनिक है रीत

शून्य में प्रीत।

33

मृदुल धागा

पिरोए मन स्नेही

जबाबदेही।

34

पर्व-उल्लास

स्क्रीन पे समेटा

गजब डेटा।

35

थाली में पड़ा

तागा श्रद्धा में जड़ा

बन्धन बड़ा।

Older Posts »

श्रेणी