Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 29, 2017

1772

विभा रश्मि 

1

दोपहरिया

चुभती लू की फाँसें

सुलगी साँसें

2

ग्रीष्म नौतपा 

उमसा चप्पा – चप्पा 

तड़की धरा । 

3

गर्मी राक्षसी

जिह्वा लपलपाती

ज्वाला उगले

4

नद मुहाने  

कटे हैं वन घने 

थार  बनेंगे ।

5

 झेलता वार 

 करुण है चीत्कार 

 मौनी पादप । 

6

अकाल – छाया

मनु व्यस्त  माया ले 

जर्जर खेती ।

7

नभ है सूना 

टेरे जलद – प्रिया

उत्साहित जी ।

8

भेजा संदेसा 

आ जा बदरा श्याम

चिठिया बाँच ।

9

तवा धरती 

पसीने की बूँदें भी

उड़ीं वाष्प हो  

10

 बालुका – टीबे 

आँधी बन उतरे 

 नद – नेत्रों में ।  

11

 चिया उदास

 भेंट चढ़े  हैं गाछ

 चौड़ाए पथ  

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 26, 2017

1771

1- सत्या शर्मा ‘ कीर्ति ‘

1

गुज़रे पल

उग आती झुर्रियाँ

उम्र डाली पे  ।

2

दौड़ता अश्व

जीवन पथ पर

मन सारथी ।

3

पूछते बच्चे

आँगन औ तुलसी

मिलते कहाँ ?

4

दिन गौरैया

चुगती जाती दानें

उम्र– खेत के ।

5

नए सृजन

रचे परमेश्वर

धरा चाक पे ।

6

हमारा मन

कमजोर पथिक

उदास आत्मा ।

 -0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 23, 2017

1770

1-डॉ. सुषमा गुप्ता

1

कड़वी बात

दे मन पर घाव

कभी न भरे।

2

कभी तो लौट

देख आकर ज़रा

वहीं है खड़े ।

3

निशब्द खड़ी

तारों में ढूँढती हूँ

कहां हो तुम ।

-0-

2-लता अग्रवाल

1

वनवास है 

पत्थर की अहल्या

परिहास है।

2

पूजे प्रतिमा

माने नहीं इंसान

करे अजान

3

पलते पाप

सौंदर्य अभिशाप

बिकते जिस्म

4

भरे बाजार

रावण के देश में

लूटी लाचार

5

दीमक जर्द

किताब जिंदगी की

मिटते हर्फ़

-0-

 लता अग्रवाल
शिक्षा  – एम  ए  अर्थशास्त्र. एम  ए  हिन्दी, एम एड. पी एच डी  हिन्दी.

प्रकाशन – शिक्षा. एवं साहित्य की विभिन्न विधाओं में 53  पुस्तकों  का  प्रकाशन. जिनमें 2कविता 2कहानी 2समीक्षा संग्रह ,5 बाल संग्रह, 20 रोल प्ले , 79 कहानियों का अब तक लेखन, लगभग 400 पेपर्स. कहानी . कविता. लेख  प्रकाशित आकाशवाणी  में पिछले 9 वर्षों से सतत कविता, कहानियों  का प्रसारण . दूरदर्शन   पर  संचालन. पिछले 22 वर्षों से निजी महाविद्यालय में प्राध्यापक एवं प्राचार्य ।
सम्मान -: अनेल सम्मान प्राप्त

सम्पर्क:निवास –  73 यश  बिला   भवानी  धाम  फेस  – 1 , नरेला  शन्करी . भोपाल – 462041

-0-

3-सविता अग्रवाल ‘सवि’,कैनेडा

1

शक की बूँद

विश्वास की गंध में

लाई दुर्गन्ध।

2

शक की नींव

प्रेम की इमारत

करती क्षीण ।

3

विश्वास मरा

शक का विष जब

मन में भरा ।

4

किया आघात

थी तो छोटी सी बात

टूटा विश्वास ।

-0-

4-अशोक शर्मा ‘भारती

1

तीर कमान

कटु शब्द जिह्वा से

देते आघात  ।

3

दुःख पहाड़

सुख रेत का कण

मानव मन ।

4

पाहन हुए

रूठकर साजन

मौन संवाद  ।

5

देखा है अक्स

जबसे आईने में

ये कौन हूँ मैं ।

6

नदी है नारी

बह रही युगों से

घर मंदिर  ।

7

नदी उदास

सागर से मिलन

खो गई प्यास  ।

8

लू की लपटें

साँसों को देती चीर

घटता नीर  ।

9

माटी की काया

फिर हो गई माटी

माटी में मिली

-0-

संपर्क :‘ स्मृतिका कुटीर ’,ई. के 435, स्कीम नं. 54,

विजय नगर, इंदौर (म.प्र) 452010

94259 00869

ashoksharmabharti@gmail.com

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 18, 2017

1769

आज डॉ सुधा गुप्ता जी का जन्म दिन है। आज वे कर्मशील जीवन के 83 वर्ष पूरे करके 84वें वर्ष में प्रवेश कर रही हैं।हाइकु-ताँका सेदोका-चोका और हाइबन के क्षेत्र में वे अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी हैं।समूचे हिन्दी -जगत को आपकी प्रतिभा और कर्मठता पर गर्व है।पूरा हाइकु परिवार आपके शतायु होने की मंगलकामना करता है। इस अवसर पर आपके कुछ चुने हुए हाइकु दिए जा रहे हैं।

डॉ हरदीप कौर सन्धु -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ]

1

लाल गुलाल

पूरी देह पे लगा

हँसे पलाश ।

2

युवा वैष्णवी

जोगिया टेसू धारे

वन में खड़ी ।

3

नाज़ुक कली

आग की लपटों में

धोखे से जली ।

नीड़ बेकार

शावक उड़ गए

पंख पसार ।

5

आँख छलकी

पहाड़ी संगीत-सी

शाम टीसती ।

6

चिनार-वन

फिर से लगी आग

जी हुआ ख़ाक ।

7

यादों की फाँस

निकलती ही नहीं

किरक रही ।

8

काठ के घोड़े,

चलता तन कर

माटी-सवार ।

9

चाँदी की नाव

सोने के डाँड लगे

रेत में धँसी ।

10

चिनार पत्ते

कहाँ पाई ये आग

बता तो भला।

11

आकाश बोला-

कोई एक बादल

गोद तो भरे।

12

जोगी वे पत्ते

पेड़ों के घर छोड़

निकल पड़े ।

13

लुक-छिपके

चार-दीवारी फाँद

आ कूदा चाँद।

14

तारों की  हँसी

हँसता है आकाश

लगती भली ।

15

लुप्त हैं वापी

खो गए सरोवर

गायब  हंस ।

-0- 2 

बहुत दिनों बाद 2 अप्रैल  2017 को सुधा दीदी से  मेरठ में मिला। दीदी ने तिलक लगाकर, अक्षत न्योछवर कर , नारियल भेंट किया और शॉल ओढ़ाया।ओढ़ाया।मुँह मीठा कराया। मेरे लिए इससे बड़ा उत्सव कुछ नहीं हो सकता। उसी अवसर के कुछ पल आपसे साझा कर रहा हूँ।

रामेश्वर काम्बोज


Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 15, 2017

1768

माँ

1-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

ईश्वर कहे-

मुझसे ज़्यादा दर्द

सिर्फ़ माँ सहे।

2

माँ को सताना

इसी जन्म में तय

नरक पाना।

3

बेटी का मान

सबसे बड़ी पूजा

जीवन-स्वर्ग।

4

वासना- कोढ़

छल की ओट में तू

इसे न ओढ़।

-0-

2- पुष्पा मेहरा

1

घर-आँगन

माँ देती है रोशनी

मोमबत्ती -सी  ।

2

काँपे थे पग

माँ ने उँगली थामी

जागा विश्वास ।

3

संस्कार-बीज

माँ ने मुझमें पोसे

गहरे जमे ।

4.

आशीष-छड़ी

माँ के हाथों ने फेरी

जादू हो गया !!

5

माँ जो मुस्काई

अँधेरे को मिली है

तारों की छाँव।|

-0-

Pushpa.mehra@gmail.com

-0-

3-डॉ.सरस्वती माथुर

1

मन में बसी

हम रोए,माँ रोई

हँसें ,तो हँसी ।

2

वात्सल्य- भरी

उँगलियाँ फिराती

माँ लोरी गाती।

3

जगाती है माँ

बचपन की भोर

 प्रीत -अगोर ।

4

माँ का क्या मोल

बनी नहीं तराज़ू

वो अनमोल

5

बड़ी गहरी

सागर की लहरों में

माँ है प्रहरी ।

6

माँ है विश्वास

कितनी रहे दूर

लगती पास ।

7

माँ है रोशनी

बच्चों के जीवन का

अंधेरा पीती।

8

माँ तो पूजा है

उन जैसा  जग में

कौन दूजा है?

9

माँ को नमन

बुनकर -सी बुने

हमारा मन ।

-0-

पुराने दिन

1- प्रियंका गुप्ता

1

पुराने दिन

शाख से गिरे पत्ते

जुड़ न पाएँ ।

2

टूटी उम्मीदें

जुड़ने के आसार

फिर न दिखें ।

3

उम्मीद की लौ

डगमगाई ज़रूर

बुझ न पाई ।

4

देकर हँसी

मेरे सूने लबों को

खुद रो दिया ।

5

सूना था मन

दस्तक दी तुमने

भर ही गया ।

6

छालों -सा फूटा

पुराना दर्द कोई

बह निकला ।

7

बादल गए

गर्मी की छुट्टियों में

नानी के घर ।

8

पेड़ों के नीचे

सोई पड़ी थी छाँव

कहीं न जाए ।

9

बादल लौटे

चुपके से बरसे

छुट्टियाँ ख़त्म ।

10

ऊँघती उठी

चाँद तारों को संग

ले गई रात ।

11

तन्हा -सा घर

गर्मी की दोपहरी

खामोश पड़ा ।

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 13, 2017

1767

1-सत्या शर्मा ‘कीर्ति ‘
1
टपकी बूँदे
हर प्यासी आँखों से
वर्षा तू कहाँ ?
2
बूँद- बूँद सा
फिसलता विश्वास
जल अभाव ।
3
सूखी ये आँखें
धरती है उदास
इंद्र नाराज ।
4
चिलचिलाती
जीवन की ये धूप
नेह-जल दो !
5
बहे नदियाँ
बस कागजों पर
प्यासा है मन ।
6
नदी- तलैया
प्यासी अनवरत
बरसो मेघ ।
7
कब से प्यासे
गागर व सागर
मीन उदास ।
8
चटके तन
बरस जा बदरा
पुकारे धरा ।
-0-

2-सुशील शर्मा

1

तुम्हारी यादें

तपी दुपहरी में

स्निग्ध छाया -सी।

2

शीतल छाया

माँ का प्यारा आँचल

मन को भाया।

3

अकेला साया

जाना पहचाना- सा

तनहा चला।

4

खामोश रात

सन्नाटों की आवाज़

तेरा आना सा।

5

दर्पण बिम्ब

मन का प्रतिबिंब

सच कहता।

6

मन के भाव

धूप और छाया से

बदलें रंग।

7

स्वप्न सुरीले

तुम्हारी स्निग्ध स्मृति

मन के बिम्ब।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 12, 2017

1766

Processed with MOLDIV

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2-डॉ सुरेन्द्र वर्मा 

1

भूखे को रोटी 

नंगे तन कपड़ा 

हरि शृंगार 

2

रास्ते में खड़े 

न हों दरकिनार 

चाहते प्यार 

3

आपकी बातें 

थोड़ी सी हाँ, थोड़ी ना 

भ्रम-विभ्रम 

4

नन्हा- सा शिशु 

होठों पे स्मित हास्य 

हाइकु लास्य 

5

खाली गागर 

प्यासा ही लौट गया 

अतृप्त मन 

6

कोई बताए 

कहाँ छिपा है जल 

प्राण पिपासा

7

कमरे बंद 

दोपहर खामोश 

कर्फ्यू सूर्य का 

8

सूर्य का तेज 

सह न पाई धरा 

दरारें पडीं 

9

वाह री गर्मी 

खिलखिलाते फूल 

ताना मारते 

—डा, सुरेन्द्र वर्मा / १०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१ 

(मो,) ९६२१२२२७७८ 

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 11, 2017

1765

डॉ.जेन्नी शबनम

1

किरणें ईं

खेतों को यूँ जगा

जैसे हो माई। 

2

सूरज जागा

पेड़ पौधे मुस्काए

खिलखिलाए। 

3

झुलसा खेत

उड़ गई चिरैया

दाना पानी। 

4

दुआ माँगता 

थका हारा किसान

नभ ताकता। 

5

जादुई रूप

चहूँ ओर बिखरा

आँखों में भरो। 

6

आसमाँ रोया

खेतिहर किसान

संग में रोए। 

7

पेड़ हँसते 

बतियाते रहते,

बूझो तो भाषा?

8

बहती हवा

करे अठखेलियाँ 

नाचें पत्तियाँ। 

9

पास बुलाती

प्रकृति है रिझाती

प्रवासी मन। 

10

पाँव रोकती,

बिछुड़ी थी कबसे

हमारी माटी। 

11

चाँद उतरा

चाँदनी में नहाई

सभी मड़ई। 

12

बुढ़िया बैठी

ओसारे पर धूप

क़िस्सा सुनाती। 

13

हरी सब्ज़ियाँ 

मचान पे लटकी

झूला झूलती। 

14

आम्र मंजरी

पेड़ों पर खिलके

मन लुभा 

15

गिरा टिकोला

खट्टा मीठठिगना

मन टिके ना। 

16

रवि हारता

गरमी हर लेती

ठंडी बयार। 

17

गप्पें मारती

पूरबा छैया

गाछी पे बैठी। 

18

बुढ़िया दादी

टाट में से झाँकती

धूप बुलाती। 

19

गाँव का चौक 

जगमग करता

मानो शहर। 

20

धूल उड़ाती 

पशुओं की क़तार

गोधूली वेला। 

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 10, 2017

1764

1-सुदर्शन रत्नाकर

1      

भोर की बेला

यात्रा पर निकला

सूर्य अकेला।

2

सोती है रात

चमकता है चाँद

देता पहरा।

3

ढूँढती रही

खुशियाँ दिन-रात

देखा न मन।

4     

गले लगाया

तरु ने वल्लरी को

दिया सहारा।

5

उलझी रही

काँटों की दुनिया में

फूल देखे न।

-0-

 2- सुशीला शिवराण

1

बजें घुँघरू

मंदिर कभी कोठे

यही किस्मत ।

2

रूह की धुन

हँसी कमनसीबी

पैरों से बँधी।

3

चीखीं दीवारें

घुँघरू के शोर में

बिकी आबरू।

4

भक्ति-मुजरा

श्रद्धा कभी लांछन

घुँघरू वही।

5

पीढ़ी तरसें

आँगन में घुँघरू

कभी तो बजें।

6

खोजा बहुत

नदी-घट-नयनों में

मिला न पानी।

7

दर्पण बोला

हू-ब-हू बोला सच

फिर भी रोळा।

8

हवा बासंती

लाई पिया की पाती

हँसती-गाती।

9

लिखे प्रकृति

प्रीत के अनुबंध

फूलों के संग।

10

नेह-निर्झर

क्लांत-श्रांत जग का

ज्यों हो पुष्कर।

11

कवि का कर्म

शब्दों का ताना-बाना

भावों का मर्म ।

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 8, 2017

1763

1- विभा रश्मि

1

माँ की ममता

शिशु का अधिकार 

निःस्वार्थ  प्यार ।

2

माँ की आँखों से

टपके जब आँसू 

ईश्वर रोया ।

3

लोरी गाकर

सुलाती माँ ललना 

बाँहें पलना ।

4

रेशमी डोरी

मीठी सुनाती लोरी 

झूला झुलाके ।

5

मैया दुलारी 

चंदा -सी है बिटिया 

फुर्र ज्यों चिया ।

6

मेरी माँ सुन ! 

तू भूखी क्यों रहती 

दुख सहती ।

7

माँ अनुरागी 

ममतामयी त्यागी 

रातों  में  जागी ।

8

शीतल छाँव

माँ के आलोड़न की 

पाए  शैशव ।

9

अँगुली थामे

शिशु चलना सीखे

माँ को क्यों  त्यागे ?

10

माँ नियरे आ 

कंठ मोहे तू लगा

कन्हैया तोरा ।

11

बुढ़ापे में माँ 

सम्मान की है भूखी 

खाती है रूखी ।

 -0-

2- डॉ.पूर्णिमा राय

1

स्वप्न झिंझोड़े

सुबक रही धरा

आऊँगा माँ!!

2

पास रह माँ

तुम बिन आकुल

मेरी ये साँसें!!

3

माँ तेरी यादें 

सुझाती रही राह

उंगली थामे!!

4

पृथ्वी की पीर

देख,भरते नैन

दूर है मैया!!

5

नयन भरे

माँ असीमित प्रेम

मिले दोबारा!!

6

अश्क तुम्हारे

सारे माँ अब मेरे

रख भरोसा!!

7

सुना माँ लोरी

मृत्यु का ये तांडव

देखा न जाए!!

8

माँ की लोरी

शहनाई के जैसे

गूँजे कानों में!!

9

फोन पे गान

धुँधली सी सुधियाँ 

लोरी गाती माँ!!

10

याद आज भी

स्वर्गलोक से मैया

सुना दे लोरी!!

11

माँ बच्चों संग                              

दिखे लाड लड़ाती

भाता है गाँव!!

-0-

डॉ.पूर्णिमा राय,

शिक्षिका एवं लेखिका

अमृतसर(पंजाब)

drpurnima01.dpr@gmail.com

-0-

3-चंचला इंचुलकर सोनी

1

तपे वसुधा
प्यासा हैं पनघट
कुम्भ उतान

2

तृप्ति की खान
शीतलता- पर्याय
माटी -गागर

3

नदी किनारे
पाप पुण्य ओसारे
कुम्भ पसारे

4

मोक्ष की चाह
विराट समागम
कुम्भ की थाह

5

गागर ऋणी
अद्भुत जिजीविषा
मरु- जीवन

6

गागर-गुण
बूँद-बूँद हैं सुधा
ग्रीष्म परीक्षा

7

रीती गागर
ले चली अग्निपथ
पनिहारन

8

रेतीला पथ
गागर भरी आस
तृषा अकथ

9

मृत्तिका शिल्प
दीनो का रोजगार
कुम्भ विकल्प

10

पूर्वज मानी
आखातीज पूर्णता
कुम्भ का पानी

-0-ccsonicc@gmail.com

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