Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 22, 2019

2012-तेरी ही आस

ज्योत्स्ना प्रदीप 

1

प्रणय-पत्र

चैत्र में खिले पुष्प

चित्रा नक्षत्र!

2

जेठ का मास

मन-मरू बसी है

तेरी ही आस ।

3

आषाढ़ माह

आशाओं की आड़ में

सूखा ही रहा!

4

कई सावन

उसकी मुस्कानों में

मनाते तीज!

5

भादो के घन

जब नैन समा

श्याम ही आ!

6

भादो भरा है

प्रेम घने घन से

मन तरा है!

7

खोलूँ कपाट

आश्विन की है बाट

आ जाना प्रिय ।

8

उजाले भर

कार्तिक घर-घर

होता हर्षित!

9

गोरी-सी सर्दी

कार्तिक कोमलांग

गुलाबी प्रीत!

10

सखी बनके

आँसू अगहन के

सोखती धूप!

11

पौष की रातें

बहाती हैं नैनों से

बर्फीले आँसू!

12

माघ भरोसे

आँसू वह कोसे-कोसे

जमाती शीत!

13

फागुन मास

मधुमाधव संग

ऋतु का रास!

-0-

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Posted by: हरदीप कौर संधु | अप्रैल 18, 2019

2011

डॉ.सुधा गुप्ता

1

अंजलि भर

बाँटे उजाला दीया

कभी न हारा ।

2

अंजुमन में

सारिका टेर  उठी  

निज धुन में ।

3

अपना देश  

ॠतु -परिवर्तन   

नूतन वेश ।

4

अब विदा दो

झरते पत्ते बोले  

पेड़ रो दिए ।

5

अबके साल

बादल मेहरबाँ  

धरा हैरान ।

6

अल्हड़ नदी

बाबुल-घर छोड़  

निकल पड़ी ।

7

आई जो आँधी  

चटाक टूटी डाल  

गिरा घोंसला ।

8

आई सजके  

सोलह  हैं शृंगार  

ॠतु बहार ।

9

आकाश -छत  

छेदों-भरी छतरी  

टपक रही ।

10

आकाश दीप   

जलाए  राह देखे  

रजनी बाला ।

11

आया आश्विन  

सुरभि की पिटारी

खोले शेफाली ।

11

आया चलके  

डगमग सवेरा  

हारा अँधेरा ।

12

आया सूरज  

घटाओं के तेवर  

देख , जा छुपा ।

13

आषाढ़ -मेघ ।

आते ही खोल बैठे ।

यादों  की पोथी ।

14

आषाढ़ सूखा

मेघदूत है रूठा  

यक्ष विकल ।

15

उखड़ी साँस  

आफ़त का मारा-सा

 घूमे शिशिर ।

16

उड़ी पतंगें  

आकाश हुआ  दंग  

कितने रंग !

17

उमंग-भरी  

शाखों पे गिलहरी

उड़न परी ।

18

उमड़ चलीं  

बाँध तोड़ नदियाँ  

बहाए गाँव ।

19

उषा की माला

टूटी, बिखरे मोती  

दूर्वा सहेजे ।

20

एक फ़रिश्ता  

फूल पर आ बैठा  

जागे हैं भाग ।

21

ओलों की मार  

बिजली का चाबुक  

डाँट-डपट ।

22

ओस की बूँदें

जमीं, बनी हैं मोती

दूर्वा पिरोती ।

23

ओस नहाई

फूल गजरा धारे  

मौलश्री हँसी ।

24

कपड़े फेंक

बन बैठा नीम  

नागा संन्यासी ।

25

कबरी खुली

गजरा बिखरा है

निशीथिनी का ।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अप्रैल 11, 2019

2010

 डॉ.पूर्वा शर्मा
1.
फुदके फाँदें
चाह गिलहरियाँ
तमाम उम्र।
2.
नेह तुम्हारा
शहरी ट्रैफिक-सा
थमता नहीं।
3.
कैसे लाँघती?
दिल-आँगन चुनी
याद चौखट।
4.
कंजूस लब,
नैनों के किये खर्च
भीगे से हर्फ़।
5.
तन्हाई में भी
तन्हा ना रह सकूँ
रूह में तू ही।
6.
तुम ठहरे
मेरी परछाई-से
हाथ न आते।
7.
चुरा के रखी
जीवन की ज़ेब में
तेरी वह हँसी।
8.
उठाए मैंने
ज़िंदगी के नखरे
बड़े खतरे।
9.
कुछ ही लम्हें
उधार दे ज़िंदगी
मुस्कुरा भी लूँ।
10.
यह ज़िंदगी
करतब दिखाती
बाज़ीगर-सी।
11.
प्रत्येक बार
ज़िंदगी के पते पे
तुम ही मिले।
-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 29, 2019

2009

प्रकृति

डॉ.जेन्नी शबनम 

1.
प्यार मिलता
तभी खिलखिलाता
प्रकृति-शिशु ।
2.
अद्भुत लीला
प्रकृति प्राण देती
संस्कृति जीती।
3.
प्रकृति हँसी
सुहावना मौसम
खिलखिलाया।
4.
धोखा पाकर
प्रकृति यूँ ठिठकी
मानो लड़की।
5.
कृत संकल्प
प्रकृति का वंदन
स्वस्थ जीवन।
6.
मत रुलाओ,
प्रकृति का रुदन
ध्वस्त जीवन।
7.
प्रकृति क्रुद्ध,
प्रलय है समीप
हमारा कृत्य।
8.
रंग बाँटती
प्रकृति रंगरेज़
मनभावन।
9.
मौसमी हवा
नाचती गाती चली
प्रकृति ख़ुश।
10.
घना जंगल
लुभावना मौसम
प्रकृति नाची।
11.
धूल व धुआँ
थकी हारी प्रकृति
बेदम साँसे।
12.
साँसें उखड़ी
अधमरी प्रकृति,
मानव दैत्य।
13.
खंजर भोंका
मर गई प्रकृति
मानव खूनी।
14.
खेत बेहाल
प्रकृति का बदला
सूखा तालाब।
15.
सुकून देती
गहरी साँस देती
प्रकृति देवी।
16.
बड़ा सताया
कलंकित मानव,
प्रकृति रोती।
17.
सखी सहेली
ऋतुएँ व प्रकृति
दुख बाँटती।
18.
हरी ओढनी
भौतिकता ने छीनी
प्रकृति नंगी।
19.

किससे बाँटे 
मुरझाई प्रकृति
अपनी व्यथा 
20.
जी भरके लूटा
प्रकृति को दुत्कारा
लोभी मानव।   

–0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | मार्च 21, 2019

2008

1-डॉ जेन्नी शबनम

1

रंगो की होली   

गाँठ मन की खोली   

प्रीत बरसी।   

2

पावन होली   

मन है सतरंगी   

सूरत भोली।   

3

रंगों की झोली   

आसमान ने फेंकी   

धरती  रँगी।   

4

हवा में घुले   

रंग भरे जज़्बात   

होली के साथ। 

5

होली रंग में   

दर्द के रंग घुले   

मन निश्छल। 

6

होली पहुँची   

छोटे पग धरके   

इस बसंत।

7  

पाहुन होली   

ज़रा देर ठहरी   

चलती बनी।

8   

रंग गुलाल   

सर -सर  गिरते   

खेले कबड्डी।   

9

न पी ,न पाई  

ये कैसी होली आई   

फीकी मिठाई।   

10

रंगों का मेला   

नहीं कोई पहरा   

गुम चेहरा।   

-0-

2-सत्या शर्मा ‘कीर्ति ‘
1

बिखरे रंग
छा गयी  खुशहाली
होली है आई ।

2
प्रेम में भींगा
सतरंगी चूनर
तेरे ही रंग ।
3
बासंती रंग
सरसों फूलों संग
भिंगोये तन ।
4
धानी  चूनर
ओढ़के सर पर
तुझे निहारूँ ।।
5
भींगता मन
अपनों के संग
होली के रंग ।।
6
कृष्ण मुस्काए
अधर धर बाँसुरी
राधा शर्माये ।।
7
सबसे प्यारा
हिंदुस्तान का रंग
तिरंगे- संग ।
8
गुलाबी रंग
दुल्हन सी शर्माए
होली मुस्काए ।

9
मत न खेलो
खून की होली
हर माँ बोली ।
10
होंठ यूँ बोलें
मिलके हमजोली
खेलेंगे होली ।
-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | मार्च 18, 2019

2007

वसंत ऋतु

डॉ. पूर्वा शर्मा

1

पूर्वा शर्माकेसरी धोती

टेसू-पगड़ी बाँधे

बौर भी माथे ।

2

दबे पाँव ही

चल पड़ा जाड़ा, ज्यों

वसंत आया ।

3

वन में आज

विराजे ऋतुराज

पुष्पों का राज ।

4

फूलों से फूली

परागों से महकी

वासंती धरा ।

5

पुष्पों की माला

गेहूँ, सरसों बाली

अप्सरा- बाला ।

6

बासंती टेसू

कहीं पे शाख सूर्ख

तो कहीं नैन ।

7

हवा सुगंधी

चीखकर कहती

ऋतु बसंती ।

8

हवा में गंध

पल्लव पुष्पों-संग

ऋतु मलंग ।

9

कैसे हो बयाँ

वसंत का तार्रुफ़

चंद लफ्जों में ।

10

क्षीण हो चली

वसंत प्रतीक्षा में

माघ की शीत ।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 28, 2019

2006

1-रेखा रोहतगी

1

सूर्य का रथ

आते-जाते रंग दे

आकाश पथ ।

2

यादें पूर्णिमा

बिखरे उजियारा

मन चन्द्रमा।

3

बनाते वृक्ष

बीज को, मिट्टी – पानी

धूप ही है-माँ ।

4

गुलाबी जाड़ा

झूमें चंपा-चमेली

दोनों सहेली ।

5

कड़क सर्दी

अमीर लोग रीझें

गरीब खीझें ।

6

उग आए हैं

मेरे शब्दों के पंख

तुझे जो सोचूँ ।

7

गली-गली में

है दुःशासन आज

कृष्ण चाहिए।

8

दुःख देकर

बड़ों को, सुख चाहें

आज के बच्चे ।

9

सँवर गई

माटी में मिलकर

तन की माटी।

10

तन -पिंजरा

रोता -गाता-नाचता

मन का पाखी।

11

ऊँचे खिलाड़ी

गिरकर नीचे वे

ऊँचा ही खेलें ।

12

आयु की बाती

जलती, बुझने को

देह का दीप ।

13

भला न लगे

हो कोई भी मौसम

जो तू न साथ।

14

जीवन्त -बोध

कराते हैं हाइकु

नवीन शोध।

15

नाता ही टूटा

हूँ शहर में गुम

गाँव जो छूटा।

-0-

2-परमजीत कौर ‘रीत’

 1

लगते प्रिय

खेल बचपन के

लुभाते सदा ।

2

मधुर यादें

नन्ही बाहें फैलाए

पास बुलाएँ ।

3

पथिक मन

अतीत की नगरी

नित्य भटके ।

4

व्यापक सिन्धु

है हर  अन्तर्मन

थाह कठिन ।

5

तैरते भाव

मन -सिंधु भीतर

उठता ज्वार ।

-0-Paramjeet Kaur <kaurparamjeet611@gmail.com

Posted by: हरदीप कौर संधु | फ़रवरी 25, 2019

2005

डॉ.पूर्णिमा राय
1
खुशबू फूलों की

मन की बगिया में
भरे सुगंध !
2
महका मन
खिला अंग-प्रत्यंग
सजी धरती
3
निशाँ रेत पे
सूचक  आहट के
थमा है वक़्त
4
माथा चूमती
सुनहली-सी धूप
नवल साँझ
5
सर्द आमद
खिला हुआ है चाँद
पिघला सूर्य
6
तेरी आगोश
सुकूँ का अहसास
सिमटा दर्द
7
चुप-सी रात
खिड़कियाँ बोलती
दिल की बात!!
8

दूरी तुम्हारी
छटपटाये रूह
रूठती साँसें!
9
भीगते नैन
पल-पल ढुलकें

ओस के मोती !
10
कभी जागती
कभी सोती हैं आँखें
राह निहारे!

11

सर्द हवाएँ
ठहरी कुदरत
तपते दिल!
12
जुदा न होते
होते हैं जो अपने
बुने सपने!!
-0drpurnima01.dpr@gmail.com

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 22, 2019

2004-रिश्ते

सविता अग्रवाल सवि’ , कैनेडा

1

रिश्ते जो टूटे

मन हुआ घायल

झरते आँसू।

2

छप्पर उड़ा

रिश्ते चरमरा

आया तूफान।

3

प्यार से भरी

रिश्तों की ये गागर

हाथ से छूटी

4

रिश्तों की प्यास

राह में थकान-सी

सही ना जा

5

रिश्ता उछला

सिन्धु में लहर-सा

रेत में मिला।

6

कैसा ये रिश्ता?

अपने हैं पराये

पास ना आएँ

7

रिश्तों की बर्फ़

बन गयी चट्टान

चढ़ा ना जाए

8

टूटे सम्बन्ध

रिश्ते, रिसते रहे

सीली दीवार।

9

रिश्तों की डोर

पतंग संग उड़ी

फिर भी कटी ।

10

रिश्तों में प्यार

पनपा बेपनाह

जाने क्यों रूठा?

11

रिश्तों की नाव

डगमग डोलती

डूब ही ग

12

ताले में बंद

सँजो रखे थे रिश्ते

चोरी हो गए

13

चटके रिश्ते

छोटी-सी ही थी बात

पड़ी दरार।

14

रिश्तों की गर्मी

लहू में हलचल

खिलता मन।

15

खेलते रिश्ते

गिरे, सँभले पर

उठ ना पाए।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | फ़रवरी 20, 2019

2003-आँख

डॉ.जेन्नी शबनम

1.

पट खोलती

दुनिया निहारती

आँखें झरोखा

2.

आँखों की भाषा

गर समझ सको

मन को जानो।

3.

गहरी झील

आँखों में है बसती

उतरो जरा।

4.

आँखों का नाता

जोड़ता है गहरा

मन से नाता।

5.

आँख का पानी

मरता व गिरता

भेद समझो।

6.

बड़ी लजाती

अँखियाँ भोली भाली

मीत को देख।

7.

शर्म व हया

आँखें करती बयाँ

उनकी भाषा।

8.

नन्ही आँखों में

विस्तृत जग सारा

सब समाया।

9.

खूब देखती

सुन्दर-सा संसार

आँखें दुनिया।

10.

छल को देख

होती है शर्मसार

आँखें क्रोधित।

11.

खूब पालती

मनचाहे सपने

दुलारी आँखें।

12.

स्वप्न छिपाती

कितनी है गहरी

अँखिया झील।

13.

बिना उसके

अँधियारा पसरा

अँखिया ज्योति।

14.

जी भर देखो

रंग बिरंगा रूप

आँखें दर्पण।

15.

मूँदी जो आँखें

जग हुआ ओझल

साथ है स्वप्न।

16.

जीवन खत्म

संसार से विदाई

अँखियाँ बंद।

17.

आँख में पानी

बड़ा गहरा भेद

आँख का पानी।

18.

भेद छुपाते

सुख -दुख के साथी

नैना हमारे

19.

मन की भाषा

पहचाने अँखियाँ

दिखाती आशा

20.

अँखियाँ मूँदी

दिख रहा अतीत

मन है शांत।

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