Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 16, 2018

1821

1-लक्ष्मीकांत

1

आतुर बालें
निकली हैं खेतों में
ढका सिवान ।

2

बीत चुका है
समय धुंधलका
उगी है लाली ।

3

कोयल कूकी
नहीं टूटा सन्नाटा
मन माटी का ।

4

उगा पहाड़
खेतों के आँगन में
पाथर-टीला ।

5

नदी बीच में
पूरा गाँव-गिराँव
रेत किनारे ।

6

किसे  ढूंढती
फुदकती चिडिया
बॉस-वनों में ।

7

फुदकते हैं
खरहे की तरह
मेरे सपने ।

8

शिरीष-फल
बजा रहे खंजडी
बीते युग की ।

9

उड़ चले हैं
छोर से पंक्तिबद्ध
बकुल-झुंड ।

10

डाक पत्र में
नहीं अटा जीवन
मेरी व्यथा का ।

11

उड़े रूमाल
सहेजा जो सालों से
किनके नाम?

12

बिदक गई
सब दुनिया सारी
पोत डूबते।

-0-tiwarimukul001@gmail.com

-0-

2-नरेंद्र श्रीवास्तव

1

रवि-रश्मियाँ
पवन-विमान से
धरा की सैर।
2
भोर से आस
साँझ से। शिकायत
यही ज़िन्दगी।
3
सूर्य किरणें
अँधेरा तलाशतीं
लौटीं निराश।
4
रात बैचेन
गगन संग चाँद
धरा अकेली।
5
रवि किरणें
धरा पर उतरीं
चित्र उकेरें।
6
उगा सूरज
सागर-दर्पण में
बिंब तुम्हारा।
-0-
पलोटन गंज ,गाडरवारा, जिला -नरसिंहपुर म.प्र.
मोबा.9993278808

-0-

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Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जनवरी 12, 2018

1820

पुष्पा मेहरा

1

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जनवरी 2, 2018

1819

1-नरेंद्र श्रीवास्तव

1

महकें पल
यत्र,तत्र,सर्वत्र
जीवन -पुष्प।
2
रोटी की आँच
पसीने की बूँदों से
तर दिवस।
3
दिन पहाड़
थक के सोई रात
स्वप्न देखती।
-0-पलोटन गंज ,गाडरवारा, जिला-नरसिंहपुर म.प्र.मोबा.9993278808

-0-

2-ऋतुराज दवे

1

मिलके खोज

कल्पना के हाथ में

बुद्धि की टॉर्च

2

कल्पना– घोडे़

बुद्धि हाथ लगाम

मन भी दौडे़

3

जीवन-घड़ी

घूमते कर्म काँटे

प्रेम बैटरी

4

यादों के घर

दिल के तहखाने

बिखरे पन्ने

5

प्रेम से मिल

धमनियों मैं दौड़ी

दिल की खुशी

6

भोर के संग

ऑक्सीजन निकली

बाग की सैर

7

बाग की बेंच

बीमार, बूढ़ा साथी

करती याद

8

मस्ती का ठेला

बचपन उत्सव

यारों का मेला

9

सपनों से बना

बचपन का घरौंदा

उम्र ने रोंदा

-0-

ऋतुराज दवे(7976327054),राजसमन्द,राजस्थान

-0-

3- रिदम ‘यश’ ( बाल हाइकुकार)

1

स्वेटर मेरा,

सबसे करीब है

जैसे हो दोस्त।

2

भाग -भागके

ठंड भगाता हूँ मैं

जैसे खिलाड़ी।

3

सूरज डूबा

कंबल व रजाई

झट से जागे।

4

शीतकालीन

छुट्टियाँ लग जातीं

दुबके सभी।

5

रात अँधेरी

सुबह है कुहरा

शाम रंगीन।

-0-

द्वारा-मंजूषा मन

Project Officer,Ambuja Cement Foundation,Rawan (chhattisgarh)

Mo. 98268-12299

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 2, 2018

1818

1-कमला निखुर्पा

गुजरा दिन

फिर नए साल का

तुम्हारे बिन।
-0-

2-रमेश कुमार सोनी

1

सभी कहते

पुराने दिन अच्छे

यादों में जिन्दा।

2

काँटों की राह

आओ नवल वर्ष

फूल खिलाओ ।

3

फाक़ों में बीता ,

हे नई भोर देना

भोग को दाने ||

4

वर्ष बदले

सवाल वहीं खड़े

जवाब माँगे ।

5

बीता जो वर्ष

पूर्ण विराम लिये

कहानी बना ।

6

फिर मिलेंगे

कह जाता है वर्ष

कभी ना मिला ।

-0-

3-डॉ.अखिलेश शर्मा
1

हवा हो गए
बचपन के स्वप्न
परी बनके
2

घायल नींद
सामाजिक कुरीति
बेटी सयानी
3

रचना-धर्म
कर्म प्रतिबद्धता
पंछी सिखाते।

4
शाश्वत सत्य
लयबद्ध ब्रह्माण्ड
है निराकार

5

मन है प्यासा
शोषित अभिलाषा
जीने की आशा

-0-296,कालानीनगर,एयरपोर्ट रोड़,इन्दौर

-0-

4-डॉ.पूर्णिमा राय

1
रंग-बिरंगी
अधखिली कलियाँ
नव उमंग !!
2
जग के मेले
सूर्य भी सुनहला
नवल भोर!!
3
मन की बात
कहता दिनकर
नव कली से!!
4
नव वधू-सी
उल्लासमय भोर
नववर्ष की!!
5
बीती रजनी
दिल से हो मिलन
नए साल में!!
6
चहकी धूप
मचली तितलियाँ
नवेली सोच!!
7
नव वधू-सी
किरणें उमंगों की
खिली प्रकृति।
8
हुआ सवेरा
दृढ़ संकल्प लिये
जागी चिड़िया।
9
नया उजास
द्वार खटखटाए
दिखे मुस्कान।
10
प्रेम खुश्बुएँ
आ रहीं हैं फूलों से
नव तरंग!!
-0-
डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर (पंजाब )
वेबसाइट-www.achintsahitya.com

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 28, 2017

1817

1- डा.सुरेन्द्र वर्मा

1

आँखें हैं नम 

काँप रहे हैं होंठ 

विदाई वेला 

2

गरीब बेचारा

बीरबली  खिचड़ी 

तारों से तापे 

3

गर्दिश मारे 

आसमान को ओढ़ें 

ज़मीं बिछाएँ 

4

पंख सिकोड़े 

शाल ओढ़े गौरैया 

ढूँढ़ती धूप 

5

प्रात: प्रणाम 

सूर्यास्त को भी किन्तु 

करो नमन 

6

बाज़ न आए 

सूर्य करे ठिठोली 

सर्द मौसम 

7

बेमुरव्वत 

ओढ़ कर कोहरा 

सूरज सोया 

8

रात अँधेरी 

उजेले के क़तरे 

जुगनू , तारे 

9

साँझ समेटे 

आभा अकल्पनीय 

ढलता सूर्य 

10

सुबह शाम 

सूर्य को नमस्कार

स्वागत – विदा 

-0-

डा.सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी , १, सर्कुलर रोड,  इलाहाबाद – २११००` 

-0-

2-डा.राजीव कुमार पाण्डेय

1

सिंदूरी भाल

चेहरा सुर्ख लाल

प्रेम-कमाल।

2

माथे की बिंदी

सुहाग का तिलक 

जन्मों का रिश्ता।

3

कानों की बाली

नथ की सजावट

शोभा अपार।

4

होंठ रँगीले

प्रस्फुटित अक्षर

खिलते पुष्प।

5

तिरछी दृष्टि

नयनों का काजल

पिया बुलाये।

6

कष्ट हरण

करता आजीवन 

मंगलसूत्र।

7

गले का हार

अलौकिक शृंगार

सुखी संसार।

8

दोनों कलाई

खनकती चूड़ियाँ

छेड़ती राग।

9

अँगूठी नग

शकुंतला मिलाए

भूला दुष्यंत

10

मेहँदी सजी

गोरी के हाथों पर

पिया- स्मरण

11

छटा बिखेरे

कमर करधनी

लचक चली।

10

पाँव पैंजनी

छम छम वादन

आजा साजन।

11

पडे आँगन

महावरी चरण

मनभावन।

-0-पता 220 जी रामनगर,गाजियाबाद

dr.rajeevpandey@yahoo.com

-0-

3- डा.सुरंगमा यादव

1

प्रेम रतन

आलोक किरन -सा

छिप न पाए।

तेज आँधियाँ

बुझा सकीं न दीप

तेरी यादों का।

रात अँधेरी

कर गये रंगीन

स्वप्न तुम्हारे।

-0-असि0 प्रो0 हिन्दी,महामाया राजकीय महाविद्यालय महोना,लखनऊ

 dr.surangmayadav@gmail.com

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 10, 2017

1816

हाइकु

1-डॉ.जेन्नी शबनम

1

मन के भाव

छटा जो बिखेरते

हाइकु होते।

2.

चंद अक्षर

सम्पूर्ण गाथा गहे

हाइकु प्यारे।

3.

वृहत् सौन्दर्य

मन में घुमड़ता,

हाइकु जन्मा।

4.

हाइकु  ज्ञान –

लघुता में जीवन,

सम्पूर्ण बने ।

5.

भारत आया

जापान में था जन्मा

हाइकु काव्य।

6.

हाइकु आया

उछलता छौने -सा

मन में बसा।

7.

दिखे रूमानी

करे न मनमानी

नन्हा हाइकु।

8.

चंद लफ़्ज़ों में

अभिव्यक्ति सम्पूर्ण

हाइकु पूर्ण।

9.

मेरे हाइकु

मुझसे बतियाते

कथा सुनाते।

10.

हाइकु आया

दुनिया समझाने

हमको भाया।

-0-

2-शशि पाधा

1.

ओ री भौजाई!

पीहर सम्भालना

मैं तो पराई।

2.

मोरे बाबुल!

बिटिया परदेस

पीर बिछोड़े।

3.

मधुमालती !

तू क्यों न संग आई

दूँ मैं दुहाई।

4.

तुलसी मैया!

मुझे याद रखना

अपने ब्याह।

5.

रोको कहारों!

बाबुल का अंगना

छोड़ा न जाए।

6.

माँ! सुनो ज़रा

अँखियाँ न बरसें

मेरी सौगंध।

7.

सखी सहेली!

बाँध देना गठरी

गुड्डी पटोले।

8.

ऊँची मुँडेरें

झिलमिल दीपक

बाबुल– घर।

9.

ओ पुरवाई!

संदेसा क्यों न लाई

जा हरजाई।

10.

निक्की बहना!

कहीं मत छुपाना

मिट्टी खिलौने।

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | दिसम्बर 5, 2017

1815

1-डॉ कविता भट्ट

1

जब भी रोया

विकल मन मेरा

तुमको पाया।

2

निर्मल बहे

पहाड़ी झरने सा

प्रेम तुम्हारा।

3

नेह तुम्हारा

सर्दी की धूप जैसा

उँगली फेरे।

3

गूँज रही है

मन-नीरव घाटी

प्रेम-बाँसुरी।

4

प्रेम-अगन

अनोखे आलिंगन

बर्फीली सर्दी।

5

मुझे बुलाए

मूक स्वीकृति-सी

तेरी मुस्कान

-0-

2-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

1

अश्रु विकल

जब-जब बहते।

तुमको सोचूँ।

 2

तुमको पाया

पल-पल अघाया।

प्यास तुम्हीं थीं।

3

ताप मिटे हैं

अधर- छुअन से

तन-मन से ।

4

स्वर्गिक सुख

तेरा भुजबन्धन

महामिलन ।

5

बाहों के घेरे

जब कसे तुम्हारे

दर्द मिटे हैं।

6

सिन्धु-अगाध

जब-जब मैं डूबा

तुम ही मिले।

7

थी सूनी घाटी

पुकार सुन भीगी

मन की माटी।

8

जीवन की लू

तपी थी मन की भू

नेह से सींची।

-0-

3-अनिता मण्डा

1.

चुप्पी के बूटे

दिलों के बीच उगे

फलते जाएँ।

2.

नेह-बंधन

ज्यों महके चंदन

शीतल मन

3.

मन-मुँडेर

उड़-उड़ आ बैठें

यादों के पाखी।

4.

जीवन पथ

किया है सुरभित

फूल से साथी

5.

थामा जो हाथ

पा लिया है हमने

फूलों सा साथ

6.

जीवन-नभ

सूरज से हो तुम

देना उजाला

7

चाँद का फूल

टहनी और खिला

है रुपहला।

-0-

4-सुनीता काम्बोज

1

दो अर्थी बातें

कभी नहीं  समझी

जीवन बीता ।

2

जाओ मत यूँ

रुक जाओ जरा -सा

बची हैं साँसें ।

3

मन तिजोरी

सपने और यादें

सब हैं कैदी ।

4

विस्फोट हुआ

ये जीवन बिखरा

कैसे समेटूँ ।

5

तुमको पाया

तोड़ सब दायरे

तुम न मिले ।

6

लूटने आई

दर्द की ये आहट

मेरा क्यों चैन ।

-0-

5-ज्योत्स्ना प्रदीप

1

आँखें क्यों फेरी

इन आँखों में प्रिय 

पीड़ा थी तेरी ।

2

रात की पीड़ा

विभा -रश्मियों  संग 

चाँद  की  क्रीड़ा !

3

अपना कोई 

दे गया है जो दर्द 

ख़्वाब है ज़र्द ।

4

मन -निशा में

आज भी चाँद-सा है

उसका ख़त।

5

सुख समेटा 

रात की गोद  में जो 

चाँद  आ लेटा ।

6

हिफाज़त से

दिल – दराज़ रक्खे 

उसके ख़त ।

7

मेरे निकट

लेकर करवट 

सोया  है  चाँद  

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 3, 2017

1814

डॉ.शिवजी श्रीवास्तव

1.

जागा संसार

गंध बाँट सो गया,

हरसिंगार।

2.

बाँचती उषा

प्रेम पत्र भोर का

मुस्काती धरा।

3.

नन्ही गौरैया

चहचहाए गाए

राग भैरवी।

4.

लगती भली

धूप अगहन की

माँ की गोद सी।

5.

चैन से सोया

रजनी की बाहों में

श्रमित सूर्य।

6.

पूनो की रात

लगी स्वर्ण बेंदी ज्यों

श्यामा के माथ।

-0-

(मार्गदर्शन / आयोजन – रमेश कुमार सोनी – कार्यक्रम अधिकारी , राष्ट्रीय सेवा योजना<शास. आदर्श उच्च. माध्य. विद्यालय – बसना [ छ.ग. ] ४९३५५४_हाइकु लेखन – कार्यशाला , छात्रों ने लिखे सुन्दर हाइकु –विषय – दोस्ती , मित्रता , यारी )

1

दोस्तों के साथ

खेलता युवा हुआ

मन का बच्चा ।   – भजन पटेल – 11वीं

2

मरे ना मारे

काटे न कटे कभी

यही है दोस्ती ।     – विष्णु पटवा – 11 वीं

3

यारों की यारी

मुसीबत है भारी

लगी बीमारी ।  – लोकेन्द्र जगत – 11वीं

4

दोस्ती हमारी

अंगूर गुच्छे जैसी

खट्टी – मीठी सी ।   – अर्जुन सेठ – १२ वीं

5

दोस्ती न्यारी है

लड़े – खेले हैं साथ

अब चैटिंग ।  – सुषेन भोई – 11 वीं

6

दोस्ती की बातें

यादों संग दिखाती

राहें नवेली ।  – देवेन्द्र पोर्ते – 12 वीं

7

पापा का डर

फिर भी निभा गए

दोस्ती छिप के ।  – प्रदीप चौहान – 11 वीं

-0-

कुछ अन्य विषयों पर हाइकु

1

तवे पे रोटी

भूख लगे सिंकती

पेट की आग ।  – जीशु कनर – 11वीं

2

अच्छी खबर

दूर तक फैलती

शब्दों की रैली ।   – भजन निषाद – 12 वीं

3

सपेरा आया

डर दिखा लूटा है

छोटा बाज़ार । – कमल राज पोर्ते – 12वीं

4

विलुप्त होंगे

कल प्रदूषणों से

आज जो हरे ।   – खीर सागर साव – 12 वीं

5

हवा मुझको

उड़ा ले जहाँ से

मुझे मिला दे ।  – शरद कुमार – 12 वीं

-0-प्रस्तुति-रमेश कुमार सोनी , ७०४९३५५४७६  

E mail – rksoni1111@gmail.com

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | नवम्बर 29, 2017

1813

1- डॉ.मीता अग्रवाल

1

भोर होते ही

आशियाना ढूँढ़ते

बेघर सारे।

2

रात होते ही

जुगनू चमकते

तारो के जैसे।

3

सन्नाटा बुने

झींगुर साँय- साँय

मनवा कॉपे।

4

मै ना बोंलूगी

जान पे खेलकर

संग हो लूगीं।

5

 वक्त के साथ

मिट जाते अक्सर

घाव गहरे।

6

मिलन संग

प्रीत की गहराई

मापी ना जाए।

7

मरते दम

सुन्दरता तुम्हारी

नैन बसाऊँ।

8

 मृत्युपर्यन्त

छूटते ना बंधन

संसार काया।

-0- श्री कमल भवन , पुरानी बस्ती, लोहार चौक, रायपुर,छतीसगढ़ 492001

meetaagrawalrpr@gmail.com

-0-

 2-सुशील शर्मा

1

हजार दु:ख

सहती हैं नदियाँ

बहती रहीं।

2

सूखती नदी

करती हैं सवाल

मुझे क्यों मारा।

3

घटती रेत

मरती हुई नदी

बनी है सोख्ता।

4

एक थी नदी

आने वाली पीढ़ियाँ

सुने कहानी।

5

बचा लो नदी

वरना न बचेगी

आगे की सदी।

6

कटता पेड़

लगता है अपना

कोई मरा है।

7

विकास पथ

नदी बनी मैदान

कॉलोनी कटी।

8

मेरा शहर

हाथ लिये आरी

छाँव तलाशे।

9

एक चिड़िया

पेड़ के ठूँठ पर

नीड़ में बैठी।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 25, 2017

1812

1-साँझ के हाइकु – रमेश कुमार सोनी

साँझ महके

प्रिया जूड़े में फँसा

पिया को ताके । 

2

साँझ पुकारे

सूर्य शर्म से लाल

चाँद जो झाँके । 

3

साँझ का सूर्य

बूढ़े की सुनो कोई

देर क्यों हुई ?

4

साँझ का मन

थका , बुझा ,रूठा -सा

पार्टी हो जाए । 

5

रातें डराती

प्रभु भजने लगी

संध्या की ज्योति । 

6

साँझ का गीत

मन चाहता मीत

बढ़ा लें प्रीत । ।

7

अच्छा दिन था

साँझ खुशी से लौटा

कल की चिंता !!

8

लोग लौटते

संध्या विदा कर के

थके सो गए । 

9

साँझ बताती

अँधेरों का गुनाह

घर लौटिए । 

10

भोर का भूला

घर लौटता रवि

संध्या की बेला । 

-0-जे पी  रोड – बसना , जिला – महासमुंद

[ छत्तीसगढ़ ] 493554 , मोबा – 9424220209

-0-

2-विभा रश्मि

1

मन का बच्चा 

कूद फाँदके थका 

लोरी सुनेगा ।

2

तोतों के झुंड 

नभ नापने उड़े

समूह-गान । 

3

घूँघट काढ़े 

न अब गाँव- गोरी

घुड़सवारी  । 

4

सफ़ेद भेड़ें

पहाड़ियाँ टपतीं 

ऊन ले भागीं ।

5

जलद सजे 

रँगे  खिज़ाब -केश

श्याम औ  श्वेत ।

6

अतिथि देवो  

प्रवासी ये  परिन्दे

झील नहाएँ  ।

7

उफ़्फ़  !  ये स्मॉग

धुनिया है धुनता 

मैली -सी रूई ।

9

हुई झंकृत

वीणा स्वर लहरी

दिल के हाथों ।

 -0-

3-कमला घटाऔरा
1
कैसा ये बीज
बिन बोए ही उगती
भ्रष्टों की पौध ।
2
ग्रहण लगा
ग्रस्त हुई है धरा
करो रे दान ।
3
बचा न धर्म
लोभ- पाश जकड़े
जन-जीवन ।
4
सोए , जागे न
नेता ले सुविधाएँ
कर्म से भागे ।
5
गिद्द दृष्टि से
रहते ताक लगा
फैले लुटेरे ।
-0-

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