Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 26, 2020

अरण्य की लौ!

(“फ़्लेम ऑफ़ द फ़ॉरेस्ट”: एक पाठकीय प्रतिभाव)

डॉ. सुधा गुप्ता

डॉ. कुँवर दिनेश  (मूलतः शिमला, हिमाचल प्रदेश निवासी,) द्विभाषी ― हिन्दी, इंग्लिश रचनाकार/हाइकुकार के रूप में ख्याति प्राप्त, समान रूप से दोनों भाषाओं पर पूर्ण अधिकार। मौलिक हाइकु-सृजन के साथ-साथ अनुवाद करना भी उन्हें प्रिय है।

सन् 2015 में “जापान के चार हाइकु सिद्ध” (बाशो, बुसोन, इस्सा, शिकि) शीर्षक से कुँवर दिनेश ने प्रत्येक के चयनित पचास हाइकु का अनुवाद हिन्दी में पुस्तकाकार प्रकाशित किया। प्रकाशन इतना मनोरम, कलात्मक, सुरुचिपूर्ण बन पड़ा कि हाइकु-प्रेमी जगत् (हिन्दी) ने हाथोंहाथ लिया; उक्त प्रकाशित पुस्तक ने अपार लोकप्रियता प्राप्त की।

नवीन प्रयोग से चमत्कृत करने वाले कुँवर दिनेश ने इसी वर्ष सन् 2020 में हिंदी भाषा के बत्तीस हाइकुकार के चयनित हाइकु (लगभग 150) का इंग्लिश भाषा में अनुवाद पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया, शीर्षक है “फ़्लेम ऑफ़ द फ़ॉरेस्ट” (“Flame of the Forest”)। शीर्षक ही आकृष्ट करता है ― ‘अरण्य की लौ’! आवरण पृष्ठ में प्रदीप्त लौ से अन्तरंग में छिपी लौ से परिचय पाने को हाइकु-प्रेमी उतावला हो उठता है…

आरम्भ में कुँवर दिनेश ने संक्षिप्त परिचय  (Introduction) में हिन्दी हाइकु का इंग्लिश भाषा में अनुवाद करने में आई कठिनाई,  समस्या और चुनौतियों का, तर्कपूर्ण ― भाषा की दृष्टि से दोनों के मूल अन्तर ― हिन्दी भाषा में वर्ण क्रम और इंग्लिश भाषा में syllabic meter में हाइकु रचना (जो सबसे बड़ी चुनौती है) जन्य असुविधा का स्पष्ट विश्लेषण किया है। मेरा विनम्र सुझाव है कि पाठक पहले इस आलेख को एकाग्रचित्त होकर पढ़े ― एक बार ― दो बार ― अच्छी तरह पूरी बात समझ लेने पर ही अनुवाद का वास्तविक आस्वाद-आनन्द उठा पाएगा!

कुँवर दिनेश का अनुवाद करते समय एक महत्त्वपूर्ण सूत्र: किसी भी हाइकु का अनुवाद करते समय इस बिन्दु पर ध्यान एकाग्र करना है कि हाइकु की मूल भावना संरक्षित रहे ― वह आहत न हो! यह सूत्र अनमोल है और यही है अनुवाद की सफलता की एकमात्र कसौटी।

प्रस्तुत पुस्तक में बाँए पृष्ठ पर हिन्दी हाइकु और दाँए पृष्ठ पर ठीक उसके सामने इंग्लिश अनुवाद दिया गया है जिससे तारतम्य बनाए रखने में सहज सुविधा हुई है। मेरे ज्ञान और निजी राय के अनुसार अनुवाद मूल हाइकु रचना के अधिकतम समीप बन पड़े हैं।

. . . हिन्दी के चयनित हाइकुकार, दिनेश के चिर ऋणी रहेंगे ― आभारी रहेंगे कि उनके हाइकु विश्व की प्रथम भाषा  (प्रसार की दृष्टि से) इंग्लिश (English) में अनूदित हो कर अन्तरराष्ट्रीय / वैश्विक साहित्यिक झरोखे में जा बैठे हैं!

मैंने Flame of the Forest के मूल हाइकु तथा इंग्लिश भाषा में अनुवाद दोनों को अपनी शक्ति और सामर्थ्य भर पढ़ा, शीर्षक स्वयं में कई अर्थ, कई संकेत समेटे है, पाठक अपनी रुचि और मनोजगत् की ‘पकड़’ से उन संकेतों को समझने के लिए पूर्ण स्वतंत्र है।

मेरे मन में एक विचार ने हाइकु का रूप लिया जिसे मैं दिनेश को अर्पित करती हूँ –

 जगाने आया
किरणपाँखी हंस
अरण्य की लौ!

( सूर्य, दिनेश)

इस अमर्त्य ‘लौ’ को खोज निकालने वाले अनथक साधक, ज्ञान-योग में सतत ज्ञान-रत योगी दिनेश को शत-शत बधाई, हार्दिक शुभकामना!

डॉ. सुधा गुप्ता
साकेत, मेरठ

रमा एकादशी, 11. 11. 2020

पुस्तक: Flame of the Forest: A Bilingual Anthology of Hindi Haiku in English Translation (फ़्लेम ऑफ़ द फ़ॉरेस्ट: हिन्दी हाइकु के इंग्लिश अनुवाद का द्विभाषिक संकलन); चयनकर्त्ता, अनुवादक एवं संपादक: डॉ. कुँवर दिनेश सिंह; प्रकाशक: गीतिका प्रकाशन, उत्तर प्रदेश; वर्ष: 2020; पृष्ठ: 108; मूल्य: ₹300 $10

Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 21, 2020

2097-‘नेवाः हाइकु’ का हिन्दी हाइकु विशेषांक

आदि काल से ऋषियों-मुनियों द्वारा मंत्र, श्लोक, दोहा इत्यादि लघु आकारीय काव्य विधाओं के माध्यम से जन-हित हेतु स्वयं को अभिव्यक्त करने की सुदीर्घ एवं सशक्त परंपरा रही है। इसके पीछे चिंतन-मनन की गहराई तथा स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए कम-से-कम बोलना उनका उद्देश्य रहा है।

वर्तमान में भी लघुआकारीय विधाओं का बोलबाला है; किन्तु आज इसके कारण भिन्‍न हें। आज व्यक्ति के पास धनार्जन के चक्कर में समय ही नहीं है, अत: अपनी बात को कम-से-कम शब्दों में कहना एवं पढ़ना उसको विवशता बन गई है। यही कारण है आज गजल, गीत, दोहा,  मुक्तक, ताँका, चोका, सेदोका, रेगा, हाइकु इत्यादि काव्य विधाएँ फल-फूल रही हैं ओर इन विधाओं के विकास हेतु लोग पर्याप्त श्रम-क़र हो रहे हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं के अंक भी प्रकाश में आ रहे हें। कुछ अंक तो ऐसे आ रहे हैं जिनसे हाइकु की प्रतिष्ठा क्रमशः बढ़ती ही जा रही है। ऐसा ही

एक अंक काठमांडू से प्रकाशित नेपाली भाषा की पत्रिका ‘नेवा: हाइकु’ जो वस्तुत: नेपाली भाषा में लिखे जा रहे हाइकु-काव्य को समर्पित है, का हिन्दी हाइकु पर केन्द्रित अंक (संवत्‌ 2071 श्रावण-भाद्र) प्रकाश में आया हे जिसके यशस्वी संपादक इन्दुमाली हैं; किन्तु हिन्दी-हाइकु॒ विशेषांक के अतिथि संपादक चर्चित कवि-कथाकार रामेश्वर काम्बोज  ‘हिमांशु’ हें।

इस अंक में क्रमशः: डॉ0 सुधा गुप्ता, डॉ0 भगवतशरण अग्रवाल, डॉ0 भावना कुँअर, डॉ0 हरदीप कौर सन्धु, ज्योत्स्ना प्रदीप, कमला निखुर्पा, डॉ0 जेन्‍नी शबनम, रचना श्रीवास्तव, डॉ0 ज्योत्स्ना शर्मा, प्रियंका गुप्ता,अनिता ललित, अनुपमा त्रिपाठी, शशिपाधा, कृष्णा वर्मा, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ , भावना सक्सेना, सुशीला शिवराण, जया नर्गिस, सीमा स्मृति, सुदर्शन रत्नांकर, डॉ0 सतीशराज पुष्करणा, डॉ0 उर्मिला अग्रवाल, डॉ0 कुँवर दिनेश सिंह, डॉ0 सुधा ओम ढींगरा, जितेन्द्र ‘जौहर’ , पूर्णिमा बर्मन और अनिता कपूर के हाइकु प्रकाशित हैं। इन सभी के हाइकुओं की विशेषता यह है कि हर हाइकु स्वयं को उद्धृत कराना भी प्रबल दावेदारी रखता है। ऐसा कम ही देखने में आता है। उदाहरणार्थ डॉ0 सुधा गुप्ता का निम्न हाइकु देखें जिसमें उन्होंने प्रतीकों के माध्यम से प्रात: काल का चित्रण करने में सफलता पाई है-

उषा की माला / टूटी, बिखरे मोती / दूर्वा सहेजे  (पृष्ठ-3)

        अब आप देखें कि प्रातःकाल ओस के कण मोतियों की तरह दूब पर चिपक जाते हैं। अब इससे ज़्यादा भाव खोलने की आवश्यकता नहीं। स्वयं ही भाव हृदय तक पहुँचकर अपना वांछित प्रभाव छोड़ने में सफल हो जाता हे।

इसके अतिरिक्त अन्य जो हाइकु हृदय तक सीधी पैठ बनाते मुझे महसूस होते हैं उनमें कुछ इस प्रकार हैं-

 धन्य है वर्षा / खेतों में कविताएँ / बोए किसान (डॉ0भगवत शरण अग्रवाल) ;

रात है काली / चलो जलाएँ  दीये / लिखें दिवाली (डॉ0 सतीशराज पुष्करणा)

लजीली धूप / मुँडर चढ़ बैठी / बच्ची-सी ऐंठी (रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ )

बैठी चाँदनी / हाथ पर हाथ धरे / कुछ न करे (डॉ0भावना कुँअर)

फूल-पंखुरी / तितली के पंख-सी / नाजुक दोस्ती (डॉ0 हरदीप कौर सन्धु)

खिड़की खोली / भोर-किरण आई / उम्मीद लाई (रचना श्रीवास्तव)

छलक उठे / दोनों नैनों के ताल / मन बेहाल (कमला निखुर्पा)

झरते पात / कह गए शाख से / गा मधुमास। (सुशीला शिवराण)

इत्यादि ऐसे इस अंक में अनेक-अनेक हाइकु हैं, जो शिल्प के साथ-साथ काव्यात्मक संवेदना को लेकर सहज ही सजीव हो उठे और काव्यात्मक संवेदना के कारण ही ये हृदयस्पर्शी बन गए हें।

हाइकु मात्र 5, 7, 5 सत्रह वर्णों की त्रिपदीय कविता नहीं है उसको विषय-वस्तु के अनुकूल शिल्प के साथ-साथ काव्यात्मक संवेदना कौ सहज-स्वाभाविक उपस्थिति नितान्त अनिवार्य हे। यही कारण है अभिधात्मक हाइकुओं की अपेक्षा लक्षणा एवं व्यंजना लिए हाइकु अपेक्षाकृत अधिक प्रभावकारी बनकर हृदय में उतर जाते हैं।

इस अंक के अतिथि संपादक रामेश्वर काम्बोज  ‘हिमांशु’ ने श्रेष्ठ हाइकुओं का चुनाव करने के साथ-साथ अपने अति संक्षिप्त संपादकीय के माध्यम से हाइकु की विकास-यात्रा के साथ-साथ उसके शास्त्रीय पक्ष को भी बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत करने में सफलता पाई है। अपने इन्हीं गुणों के कारण यह ‘हाइकु अंक’ मील का पत्थर बनने की पूरी क्षमता रखता है। इस विधा में शोधकार्य करने वालों के हेतु श्रेष्ठ उदाहरण चुनने में सहायक सिद्ध होगा।

-नेवा: हाइकु (नेपाली द्विमासिक पत्रिका का हिन्दी हाइकु विशेषांक) ;संपादक: इंदु माली। इस अंक के अतिथि संपादक: रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ , पता: हाइकन, हाइकु काव्य प्रतिष्ठान, पो बॉ न-139361 काठमांडू (नेपाल) , मूल्य: ₹0 50 (नेपाल) वार्षिक

-0-अभिनव प्रत्यक्ष  नवम्बर 2014, प्रधान सम्पादक  डॉ मिथिलेशकुमारी मिश्र

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 18, 2020

2096

मीनू खरे

Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 14, 2020

2095

1- डॉ. जेन्नी शबनम 

1.

धूम धड़ाका 

चारों ओर उजाला 

प्रकाश-पर्व!

2.

फूलों-सी सजी 

जगमग करती 

दीयों की लड़ी!

3.

जगमगाते 

चाँद-तारे-से दीये 

घोर अमा में!

4.

झूमती गाती 

घर-घर में सजी 

दीपों की लड़ी! 

5.

झिलमिलाता

अमावस की रात 

नन्हा दीपक!

6.

फुलझड़ियाँ 

पटाखे और दीये 

गप्पे मारते!

7.

दिवाली कही –

दूर भाग अँधेरा,

दीया है जला!

8.

रोशनी खिली 

अँधेरा हुआ दुखी 

किधर जाए!

9.

दीया जो जला 

सरपट दौड़ता 

तिमिर भागा!

10.

रिश्ते महके 

दीयों संग दमके 

दीवाली आई!

-0-

2-नरेन्द्र श्रीवास्तव

1

आँखों के आँसू

गालों से लुढ़कके

गिरे दिल पे।

2

नवीन रिश्ते

अँजुरी में समाए

बहते आँसू।

3

आँसू की बातें

किसी ने नहीं सुनी

उसने सुनीं।

4

प्यासा था वो

मेरी आँखों के आँसू

सारे पी गया।

5

जादुई स्पर्श

बहे आँखों के आँसू

उसके पास।

-0-

नरेन्द्र श्रीवास्तव,पलोटनगंज, गाडरवारा, जिला-नरसिंहपुर, म.प्र.487 551

मो.9993278808

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 14, 2020

2094

भावना सक्सैना

1
लौ दीपक की
हरे तम सघन
मन उजास।

2
दिया अधूरा
बिन स्नेह बाती के
संग अनूप।

3

बाती स्नेह की
करे जग उज्ज्वल
नन्हा -सा दिया।
4
दीप माटी का
दृढ़ बैरी अरि का
मन का मीत।

5
लौ अँजुरी में

तम अमा निशा का
हुआ विजित।
6
दीप मालाएँ
क्षितिज जगमग
देख मुस्काएँ।

7
पावन पर्व
मन में शुभ लाभ
भरें सुवास।
8
कंदील सजे
छज्जे, घर-आँगन
हुए रोशन।
9
खील बताशे
भरे कुल्हिया थाल
बाल गोपाल।

10
वंचित वर्ग
काँपती सी ढिबरी
लड़े अकेली।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 7, 2020

2093

1-हम – डॉ. जेन्नी शबनम

1.
चाहता मन
काश पंख जो होते
उड़ते हम!
2.
जल के स्रोत
कण-कण से फूटे
प्यासे हैं हम!
3.
पेट मे आग
पर जलता मन,
चकित हम!
4.
हमसे जन्मी
मंदिर की प्रतिमा,
हम ही बुरे!
5.
बहता रहा
आँसुओं का दरिया
हम ही डूबे!
6.
कोई न सगा
ये कैसी है दुनिया?
ठगाए हम!
7.
हमने ही दी
सबूत व गवाही,
इतिहास मैं!
8.
मिला है शाप,
अभिशापित हम
किया न पाप!
9.
अकेले चले
सूरज-से जलते
जन्मों से हम!
10.
अड़े ही रहे
आँधियों में अडिग
हम हैं दूब !

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 5, 2020

2092

1-जाड़ा- डॉ.महिमा श्रीवास्तव

1.

ठण्डी हवाएँ

प्रिय ने बिसराया

सर्द सी आहें।

2.

जाड़े की रात

मखमली रजाई

यादों ने ओढ़ी।

3.

मुँडेर चढ़े

गुनगुनी -सी धूप

संदेशे पढ़े।

4.

वर्षों पुरानी

ठिठुरती स्मृतियाँ

धूप दिखाई।

5.

गुलाबी ठंड

मदिर -सी बयार

प्रेम की ॠतु।

-0-

पता:34/1, सर्कुलर रोड, मिशन कंपाउंड के पास, झम्मू होटल के सामने,

अजमेर( राज.) 305001(Mob. 8118805670, Email: jlnmc2017@ gmail.)

    -0-

-0-

2- रमेश कुमार सोनी , बसना

1

लाज की आँच
पिघली नदी बनी
पिया बाहों में ।

2
सिंकते भुट्टे
प्रेम की सोंधी गन्ध
स्मृति बरसे ।

3
बेजोड़ हुस्न
दाँतों दबा दुपट्टा
जुल्फों में चाँद ।

4
बाड़ियाँ फली
लौकी , करेले , खीरा
मचान झूले ।

5

बासंती जूड़ा
रंग – बिरंगे फूल
दिल ले उड़े ।

6
थकके बैठी
बर्फ भरी नदियाँ
गले तो चलूँ ।

7
पेड़ों का गर्व
फूल – काँटे साथ हैं
राजी सब में ।

8
स्वाति बूँदों ने
सदैव मोती लिखे
सीप में दिखे ।

9
हवाएँ ढोती
बर्फ , कोहरे , पानी
काँवड़ भारी ।

10
मेघों के डेरे
पहाड़ी धर्मशाला
यात्री दूर के ।

11
सावन गीला
ठंडा पूस कँपाए
जेठ है प्यासा ।

12

रंगरेज़ वो
जिसे चाहे रंग दे
कोरा रहा मैं ।

13
नाचते – गाते
दुल्हन के सपने
घर बदले ।

14
पहाड़ चढ़े
गूँथे बेलों की शक्ति
अकेली डरे ।

15
मंज़िल पास
ख्वाबों के पाँव भारी
पीड़ा से खुशी ।

16

सपेरे डरे
इच्छाधारी लोगों से
दूध के धुले ।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अक्टूबर 27, 2020

2091

रश्मि विभा त्रिपाठी ‘रिशू’

1

मन है मौन

व्यथा समझे यहाँ 

ऐसा है कौन ?

2

जाने न बाँचे

कोई, नयन-भाषा

कैसे पढ़ेंगे?

3

वक्त की आँधी

गर्दिश ने तोड़ दी

रिश्तों की डोर

4

हुआ पराया

वो न लौटा आह! ज्यों

दुर्दिन आ

5

प्रेम-पूर्णिमा

बीतेगी अमावस

एगा चाँद

6

सुना दो गीत

प्रेम-वीणा बजाओ

ओ मेरे मीत

7

ह्रदय-दीप

आलोचना-आँधियो !

लौ बुझा दी क्या?

8

सर्द-सुबह

कुहासे की चादर 

ओढ़े है धरा

9

शाम का वक़्त 

स्मृति का चूल्हा जला

खौलती चाय

10

चलती राह

दौड़ी स्त्री, घर मिले

गिद्ध से बचे

11

दुख-दरिया

बहता चला जा

डूबता मन

12

हाँ पौंछ डाला

माँग-सिन्दूर नित

माँगें रखता

13

यादों से छुट्टी

मिले इतवार तो

सुस्ता लूँ ज़रा

14

सोचे आँगन

फुदकती थी यहाँ

गौरैया कहाँ ?

15

धूप चाही थी ?

छाँव पर चला दी

आरी  क्यों तूने

16

उर-वन में

डरावनी स्मृतियाँ 

सहमी हूँ मैं 

17

क्या निभाओगे ?

बुरा वक़्त आएगा

लौट जाओगे!

18

कुहासा-शाल

धरा ने ओढ़ी झट

ज्यों पूस आया

19

करील-वन

यादों के काँटे चुभे

रोता है मन

20

क्या जानूँ कौन

हटेगा मुखौटा तो

देखूँगी उसे

21

तेरी याद के

झरे हरसिंगार 

महका मन

22

मन का तरु

उड़ा जो प्रेम-पछी

मुरझा गया

23

यादों की बेल

विरह ऋतु में भी 

फूली– फली है 

24

मन पिरो

नित प्रेम के मोती 

साँसें महकीं

25

नगर-गाँव

धूप में तपे प्राण

बची न छाँव

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 25, 2020

2090-नया सवेरा

मीनाक्षी डबास

1

पूर्व दिशा से

रथ पर सवार

रवि निकला।

2

रश्मियाँ फैलीं

अंधकार मिटाके

सवेरा हुआ।

3

रंगीन छटा    

आकाश में बिखरी

चित्रकारी-सी।

4

ओस की बूँदें

पल्लवों पर बैठीं

बतियाती हैं।

5

मुर्गे की बाँग

घर-घर पहुँची

निद्रा भी टूटी।

6

जंगल जागे

नीरवता को त्यागे

जीवन जागा।

7

वन्य जीव भी

जाग्रत हो निकले

भोजन पाने।

8

कलियाँ जागीं

चुटकी बजाकर

की अठखेली ।

9

सुमन खिले

बाहें पसारकर

सुगंध फैली।

10

कमल खिले

सरोवर की हँसी

छनक उठी।

11

भँवरे गूँजे

फूलों पर विराजे

रस को पीने।

12

पक्षी चहके

कलरव सुनके

चहकी भोर ।

13

मधुवन में

रंगीन तितलियाँ

नृत्य करतीं।

14

पवन बही

मलय-वास संग

मन महके।

15

धूप बिखरी

शीत त्रस्त जन को

तपन मिली।

16

नदियाँ झूमीं

रश्मि चाँदी -सी बनी

चमका नीर।

17

गाएँ रँभाएँ

फिर पुकार हुई

चारे जो पाना

18

ग्राम.बालाएँ

पनघट को चली

नीर भरने।

19

बालक छोटे

खेलने को आतुर

बाहर भागे।

20

सड़कें चलीं

आगे कदम बढ़े

श्रम करने।

21

साँस-साँस में

ताज़ापन है लिये

आशाएँ जगीं।

22

नया सवेरा

दहलीज़ है खड़ा

कदम बढ़ा।

23

नवप्रभा ने

निराशा मिटाकर

उम्मीद गढ़ी।

24

कल था बाकी

आज पा ले उसको

समय तेरा।

25

मन में जोश

भुजबल तन में

गीत हो तेरा।

26

नया सवेरा

राह देखता तेरी

तू ! जाग भी जा।

-0-

शिक्षा – एम. ए. हिन्दी बी. एड. नेट 

शैक्षणिक सेवा – हिन्दी प्रवक्ता, शिक्षा निदेशालय,राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली,

 

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 21, 2020

2089

 

1-शबनम भारतीय

1

पिघली रातें

उदित दिनकर

जागी उम्मीदे

2

आशा निराशा

जीवन के पहिये

रख प्रत्याशा

3

जीवन– दुख

सुख का समंदर

हिम्मत चप्पू

4

सूरज -चाँद

मिलना – बिछुड़ना

देते संदेश

-0-

शबनम भारतीय, अध्यापिका ,फ़तेहपुर शेखावटी, सीकर,राजस्थान

shabnambhartia160@gmail.com>

-0-

2-डॉ महिमा श्रीवास्तव

1.

मनभावन

मुख फेरा तुमने

खुश तो हो ना ?

2.

भ्रमर तुम

स्वभाव है भुलाना

भोली कली को।

3.

पूजा की थाली

ठुकरा के निष्ठुर

प्रभु को खोजे।

4.

विरह -गीत

कौन सुनेगा मूढ़

सब  हँसेंगे।

5.

खेल पुराना

दिल तोड़ना, नया

काम क्या किया?

6.

चाँद जलाए

उदास– सी चाँदनी

ढलती जाए।

-0-

डॉ महिमा श्रीवास्तव, 34/1, सर्कुलर रोड, मिशन कंपाउंड के पास, झम्मू होटल के सामने, अजमेर( राज.)-305001
Email: jlnmc2017@ gmail.com
Mob. 8118805670

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