Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 23, 2021

2192

गौतम कुमार सागर

1

प्रेम के पत्र

भरित दीमक से

गौतम सागर - Copyयादें सिसके।

2

गिरह पड़े

बार-बार उलझे

साँसों का गुच्छा ।

3

प्रेम का जाल

हाथ में है जिसके

वो फँसा पड़ा।

4

नयन- कोर

अटका एक अश्रु

दृष्टि अछोर

5

नयन- सीप

अश्रु- महासागर

सपने मोती

6

वर्षा का तन

धरती का बदन

नव्य-सर्जन

7

फूल-  भीतर

मिट्टी की कोख में ही

पलती गंध

8

वादों का पान

मुख शब्द- रंगीन

नही यकीन

9

आस- कटोरा

दूध-जल मिश्रित

बनिए हंस

10

तुषार-वीणा

मरुस्थल का गीत

अजब सुर

11

गुलाबी गात

ईश्वरीय -संदेश

कन्या का जन्म

12

उषा- घूँघट

हटाता दिनकर

लजाती रात

-0-

गौतम कुमार ‘सागर’ 
शिक्षा  : स्नातक , एमबीए , सीएआईआबी
संप्रति : मुख्य प्रबंधक , राष्ट्रीयकृत बैंक , वडोदरा.
ईमेल  :-  gsagar6@gmail.com 
प्रकाशित पुस्तकें : सागर तुझमें कितना पानी (काव्य संग्रह),लाफिंग बुद्धा ( हास्य कविता संग्रह),
अजनबी जैसे हमसफर  ( लघुकथा– संग्रह ),आलेखावली  ( वित्त, बैंकिंग , अर्थ विषयों पर आलेख संग्रह),
भविष्य की भारतीय बैंकिंग : प्रौद्योगिकी के पंख , चुनौतियाँ एवं अवसर
-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 22, 2021

2191

डॉ. सुरंगमा यादव
1
कुहुक उठी
मन की अमराई
SURANGAM YADAVपाती है आई।
2
चलीं आँधियाँ
स्मृतियों का चँदोबा
कभी न उड़ा।
3
उमगे मन
प्रीत-गीत रचता
झूमे सावन।
4
प्रीत पुनीत
उर-घट पूरित
स्वीकारो मीत ।
5
आ, उठ चल!
किसी को तो करनी
होगी पहल।
6
चलता चल
सफलता का घर
है यहीं पर।
7
रेत- घरौंदा
लहरों ने आकर
पल में रौंदा।
8
सहमा गाँव
खतरे की रेखा पे
नदी के पाँव।
9
सूखी नदिया
लहरों की उम्मीदें
मन की क्षति।
10
क्यों ये रिवाज ?
मृत देह का साज
बेवा-सधवा।
11
अल्हड़ हवा
चिंगारी संग यारी
विपदा भारी।
-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 19, 2021

2190

दिनेश चन्द्र पाण्डेय

1

धरा के घाव

DINESH CHANDRA PANDEYजल का मरहम

झील -सृजन

2

खगों का शोर

उषा की लाल आँखें

खुलती गईं

3

ठंडा पहाड़

साँसें धुआँ छोड़तीं

काँपते हाड़

4

खिड़की पर

खग आकर बोले

भोर हो गई

5

ले इत्र गंध

महबूब की गली

चला गुलाब

6

शिशिर गया

महक उठे वन

देवदार के

7

शाम आ गई,

हाट में  सज रही

बेला की कली

8

मधुप उषा,

चूमे अम्बिया कभी

नीरज कली

9

पेड़ से दूब,

माँगती रह गई

थोड़ी सी धूप

10

आषाढ़ आया

यायावर मेघों ने

बसाई बस्ती

11

दीपक की लौ

हवाओं  की थपकी

आयी झपकी

12

बिखेर आई

सोना शिखरों पर

उनींदी उषा

13

नौका पाल की

थपेड़ों के सहारे

ढूँढें किनारा

14

रिश्तों की डोर
बुनता फिरता है
प्रेम- जुलाहा

15

केलि करती

कलियाँ हवा– संग

सरसों डोली

16

पिघली बर्फ ,

संबंधों की बगिया,

फिर महकी.

17

बच्चों ने घेरा,

पेड़ पर मचला

टपका आम

18

आम के बाग

मॉल निर्माण -क्षेत्र

लटका बोर्ड

19

अंबर- घट

नटखट सावन

तोड़के भागा

20

नारी की कथा

चारा-लकड़ी-पानी,

पहाड़ व्यथा

21

रौशन दीप

रात की सियाही में

घुले उजाले

-0-

दिनेश चन्द्र पाण्डेय, 8/450 जानकी सदन, जेलरोड, हल्द्वानी, जनपद-नैनीताल, उत्तराखंड-263139

Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 11, 2021

2189

भीकम सिंह
1
झूठा संदेह
खींच कर ले गया
रिश्तों का नेह।
2
शिशु के जैसे
कंधों पर चढ़े-चढ़े
सम्बंध थके।
3
गली में खड़े
अर्थहीन से रिश्ते
बेशर्म बने।
4
रिश्ता अज्ञात
दृगों में छिपा कोई
मूक आघात।
5
रिश्तों की टूट
पलक पुलिनों पे
छूटी ज्यों बूँद।
6
काला-सा रंग
ढूँढता पहचान
कान्हा के संग।
7
उम्र की छवि
शून्य में ताक रहा
बूढ़ा-सा कवि।
8
कली गा चुकी
खुशबओं के छंद
लगा के बंद।
9
उत्सव जगे
झूठ के मोर पंख
फिर से बँधे।
10
आँधी ले उड़ी
अधबना—सा नीड़
सोच में चीड़।
-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 6, 2021

2188

1-मंजूषा मन

1

MANJUSHA MANप्रेम तुम्हारा

तम में उजियारा

भोर का तारा।

2

 प्रेम के गीत

माथे पर अंकित

अधरों लिखे।

3

बरस जाएँ

आँखों की बदलियाँ

छूकर तुम्हें।

4

भोर किरण

अरुणिम आकाश

तुम्हारी याद।

-0-

2-आभा सिन्हा

1

आभा सिन्हाविश्वास- शीशा

इकबार जो टूटा

फिर न जुड़ा

2

ईश कुम्हार

गढ़े इंसाँ अपार

भिन्न प्रकार

3

झुर्रियाँ कहें-

गलियों से गुजरे

अनुभव के

4

रिश्ते शीशे- से

दरक के रिसते

रहे चुभते

5

मन बेचैन

न इक पल चैन

ढूँढते नैन

6

मन विमान

न तनिक थकान

भरे उड़ान

7

बेटी जो आई

दादी अम्मा मुस्काई

बजे बधाई

8

गुरु बादल

कृपा की बरसात

हो दिन रात

9

पिया की पाती

मरुस्थल के बीच

जलप्रपात

10

निशा टाँकती

आँचल में अपने

चाँद सितारे

-0-

3-रश्मि विभा त्रिपाठी

1

rashmi vibhaतुमने जो दी

निश्चल नेह- निधि

अनमोल है।

2

तुम्हारा स्नेह

इन श्वासों की पूँजी

पा मोद में ‘जी’ ।

3

निश्चल- नेह

डूबी तो उबरी हूँ

पीड़ा से पार !

4

निर्मल- नेह

नहाई तो मिला है

दुख से मोक्ष!

5

तुम्हारा प्रेम

अजेय रखता है

‘दुआ का नेम’ !

6

तुम्हारा प्यार

वसंत की बहार

मन के द्वार !

7

मेरी पूजा का

प्रभु से मिला फल

नेह- निश्चल ।

8

कौन सी विधि

पाती ये नेह- निधि

ईश- कृपा है !

-0-

4-डॉ. पूर्वा शर्मा

1

कुछ न कुछ

पूर्वा शर्माप्रतिपल सिखाता

जीवन-गुरु ।

2

सिखाता चला

जीवन फलसफा

वक्त-शिक्षक ।

काँच-से शिष्य

शिक्षक जो तराशे

हीरा बना दे ।

4    

ऐसा परस

लोह भी हुआ स्वर्ण 

गुरु-पारस ।

5

गुरु की माया 

भागती दुम दबा

तम की छाया ।

6    

स्वयं जलता

शिष्य को निखारता

सूर्य-सा गुरु ।

7     

तम की चाल

या जीवन- अकाल 

गुरु-मशाल ।

8     

ज्ञान, हौसला

बच्चों में भर देती

माता-शिक्षिका ।

माटी लचीली

सुंदर कृति गढ़े

गुरु-कुम्हार ।

शिष्य ना गुरु

ना कहीं गुरुकुल

सिर्फ गूगल ।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 22, 2021

2187

 

रक्षाबंधन हाइकु – रश्मि विभा त्रिपाठी ‘रिशू’

1

रक्षाबन्धनअक्षत, मौली

आशीष भरा थाल

गर्वित भाल।

2

रक्षाबंधन

निश्चल नेह-नाता

सहेजे मन।

3

छीने डॉलर

मिलाप-अवसर

एकाकी घर।

4

लाडो जो बाँधे

रक्षा-सूत्र कलाई

अजेय भाई।

5

लाडो ले आई

राखी और मिठाई

चहके भाई।

 6

कलाई बँधी

बहना की दुआएँ

जिलाती जाएँ।

7

उर-क्षितिज

स्थित नेह का तारा

विषाद हारा।

8

श्वास न टूटी

रक्षक नेह-बूटी

राखी अनूठी।

9

भेजते भाई

राखी पर्व बधाई

नेट पे आई।

10

चिट्ठी न तार

बधाई का अम्बार

लगा नेट पे।

11

लाडो बाँधती

कलाई पे दुआएँ

भाई हर्षाएँ।

12

श्रावण-मास

लाडो सँजोए आस

भाई न पास।

13

नेह से भरी

ज्यों पढ़ी पाती, झरी

सुख-मंजरी।

14

लाडो का दर्द

इया खुदगर्ज

भूले हैं फर्ज।

15

बाधा से बच

बाँध रक्षा-कवच

आयुष्मान हो।

16

सूनी कलाई

सरहद पे भाई

राखी न आई।

17

नेह से जड़ा

कच्चा, कोमल धागा

दायित्व बड़ा।

18

सावन आया

बहना जोहे बाट

भाई न आया।

19

विचरो कहीं

शुभ-सलूनो-रीत

बिसारो नहीं।

20

तुम्हें बधाई

राखी पर तो आए

भूले न भाई।

21

राखी पे भेजा

बहना ने अपार

भाई को प्यार।

22

चिट्ठी जो पाई

झूमे सैनिक भाई

राखी है आई।

23

मौली नेह की

फौजी पाए राखी पे

पाती गेह की।

24

भाई कृतार्थ

पा बहना की दुआ

अजेय हुआ।

25

कच्चे धागे में

गूँथे बहना प्यार

राखी-त्योहार।

26

रक्षा का सूत

तोड़े काल-पिंजर

भाई अमर।

27

रहे अटूट

ईश! डोरी नेह की

जाए न टूट।

28

कच्ची– सी डोर

नेह बाँधा कलाई

सँभालो भाई।

 29

बहना ने जो

तार बाँधा कलाई

मुदित भाई।

30

अप्रतिम है

बहना का ये प्यार

गुलाबी तार।

31

नव्य श्रावणी

नेट पे सजी थाली

नेह से खाली।

32

पर्व-प्राचीन

आधुनिक है रीत

शून्य में प्रीत।

33

मृदुल धागा

पिरोए मन स्नेही

जबाबदेही।

34

पर्व-उल्लास

स्क्रीन पे समेटा

गजब डेटा।

35

थाली में पड़ा

तागा श्रद्धा में जड़ा

बन्धन बड़ा।

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 21, 2021

2186

रश्मि विभा त्रिपाठी

rashmi vibha

 

 

 

 

 

 

RASHMI TRIPATHI_001

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अगस्त 18, 2021

2185

1-भीकम सिंह

1

सूर्य ज्यों चढ़ा

हो गए लथपथ

हिम के पथ।

2

बादल ओढ़े

पहाड़ पर चढ़े

हाँफते पथ।

3

झील के अंग

पत्थर चीर रहे

हवा के संग।

4

झील पे आते

सपने अँकुराते

सो नहीं पाते।

5

भोर में हवा

अलकें बिखराती

गूँथे जो मुआ।

6

माँग में हिले

जो गूँथकर कसी

राजसी हँसी।

7

स्वेद में तर

हंडे लिये जुगनू

दर-बदर।

8

हिम की ढाल

वर्षा की छुअन का

करे मलाल।

9

पुल के नीचे

झुँझलाई पवन

हिम को खींचे।

10

देखी सूर्य ने

जैसे घड़ी की सुई

हिमानी चुई।

11

जो भी-पत्थर

हवा की गोदी चढ़ा

उल्टा ही पड़ा।

-0-

2-रश्मि विभा त्रिपाठी ‘रिशू’

1

मैं प्रेम में हूँ

तू रंगा माया-रंग

बेमेल संग।

2

प्रेम प्राणों में

उड़ेले मकरंद

भीनी सुगंध।

3

प्रेम-प्रबंध

एकल अनुबन्ध

चित्त-निर्बंध।

4

मैं जाह्नवी-सी

ओ रे पाषाण मन

शिव-सा बन।

5

नि: शेष पृच्छा

पूर्ण हो प्रिय-इच्छा

यही शुभेच्छा।

6

चित्त-ग्रंथ की

लिपि को बाँचे कौन

अभेद्य मौन।

7

आएँ रिश्तों में

गलतफहमियाँ

बढें तल्खियाँ।

8

पारित करे

यामा तंद्रा-प्रस्ताव

स्वप्न-गुलाब।

9

न्यारा सुहास

नयनों में सुवास

स्वप्न-पलाश।

10

पलकों से जो

झरे तुम्हारे स्वप्न

नैना निमग्न।

11

सुरभि भरी

स्वप्नों की मौलसिरी

आँखों से झरी।

12

सावन में भू

धारे चूनर हरी

गाती कजरी।

13

प्रवहमान

श्रद्धा का अतिरेक

रुद्राभिषेक।

14

दुख से मुक्ति

मिले शिव के धाम

पीड़ा विराम।

15

भरे कलश

शुचि भाव जो दिखे

शंकर रीझे।

16

धरा जो आए

दूर्वा उठ बिछाए

हरा गलीचा।

17

धरा को भाई

मखमली चटाई

दूर्वा मुस्काई।

18

तापसी दूर्वा

श्री-चरण छू आज

चमके भाग।

19

भिनसार में

उजास ज्यूँ बिखरा

हर्षित धरा।

20

आस उर की

घटे-बढ़े नित्य ही

निशिकर-सी।

21

मानवता का

प्रतिमान तो गढ़ो

करुणा पढ़ो।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 16, 2021

2184-अम्बर बाँचे पाती

पुस्तक डाउनलोड करने  के लिए निम्नलिखित लिन्क को क्लिक कीजिए-

अम्बर बाँचे पाती

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अगस्त 14, 2021

2183-अमृत वेला

डॉ . हरदीप कौर सन्धु

1

अमृत वेला

चहकती चिड़िया

कुकड़ू रे कूँ।

2 .

अम्बर चाँद

दूध- भरी कटोरी

दूधिया रात।

3

चिबुड़कार्तिक दिन

चिबूड की सुगंध

भरा है खेत।

4

हवा का झोंका

धनिए की महक

भरे अँगना।

5

वीरान राह

खिले फूल बबूल

महकी हवा।

6

मेह -कतरे

बूँद-बूँद टपकते 

नहाएँ फूल।

7

एकांत राह

झोंके संग उड़ते

मैपल पत्ते।

8

वीरान घर

चक्की के दोनों पाट

खड़े अकेले।

9

ढलता सूर्य

बिन पत्तों का वृक्ष

लौटते पाखी।

10

म्बर धुआँ

बिन पत्तों के पेड़

उड़ती राख़।

11

पौष की धूप

आँगन में महके

सुर्ख गुलाब।

12

अश्विन हवा

वृक्ष से गिरे पत्ते

बदलें रंग।

13

सहज प्यार

हरी घास बिखरीं

सूखी पत्तियाँ।

14

गायब वृक्ष

धुआँ– धुआँ शहर

तपता दिन।

15

आँखों में खौफ़

देख कैमरा डरे

सहमी बच्ची।

16

20210114_112758नई नवेली

मेहँदी-रचे हाथ

माही का नाम।

17

चाँद अंबर

मन्द -मन्द मुस्काए

लाडली लाडो।

18

 पूर्णिमा रात

निर्झर शांत झील

उतरा चाँद। 

19

चाँदनी- छींटे

बिखरे अँगना में

धुली अँखियाँ।

20

मध्यम ज्योति

सुरोदी सुर छेड़े

हाथों की छोह।

21

उनींदे नैन

तारा -तारा अंबर

अधूरा चाँद।

22

चैत्र की रात

यादों की झिलमिल

तारों की लौ में।

-0-

अन्तिम चित्र -रमेश गौतम

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