Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 25, 2020

2090-नया सवेरा

 

 

1

पूर्व दिशा से

रथ पर सवार

रवि निकला।

2

रश्मियाँ फैलीं

अंधकार मिटाके

सवेरा हुआ।

3

रंगीन छटा    

आकाश में बिखरी

चित्रकारी-सी।

4

ओस की बूँदें

पल्लवों पर बैठीं

बतियाती हैं।

5

मुर्गे की बाँग

घर-घर पहुँची

निद्रा भी टूटी।

6

जंगल जागे

नीरवता को त्यागे

जीवन जागा।

7

वन्य जीव भी

जाग्रत हो निकले

भोजन पाने।

8

कलियाँ जागीं

चुटकी बजाकर

की अठखेली ।

9

सुमन खिले

बाहें पसारकर

सुगंध फैली।

10

कमल खिले

सरोवर की हँसी

छनक उठी।

11

भँवरे गूँजे

फूलों पर विराजे

रस को पीने।

12

पक्षी चहके

कलरव सुनके

चहकी भोर ।

13

मधुवन में

रंगीन तितलियाँ

नृत्य करतीं।

14

पवन बही

मलय-वास संग

मन महके।

15

धूप बिखरी

शीत त्रस्त जन को

तपन मिली।

16

नदियाँ झूमीं

रश्मि चाँदी -सी बनी

चमका नीर।

17

गाएँ रँभाएँ

फिर पुकार हुई

चारे जो पाना

18

ग्राम.बालाएँ

पनघट को चली

नीर भरने।

19

बालक छोटे

खेलने को आतुर

बाहर भागे।

20

सड़कें चलीं

आगे कदम बढ़े

श्रम करने।

21

साँस-साँस में

ताज़ापन है लिये

आशाएँ जगीं।

22

नया सवेरा

दहलीज़ है खड़ा

कदम बढ़ा।

23

नवप्रभा ने

निराशा मिटाकर

उम्मीद गढ़ी।

24

कल था बाकी

आज पा ले उसको

समय तेरा।

25

मन में जोश

भुजबल तन में

गीत हो तेरा।

26

नया सवेरा

राह देखता तेरी

तू ! जाग भी जा।

-0-

शिक्षा – एम. ए. हिन्दी बी. एड. नेट 

शैक्षणिक सेवा – हिन्दी प्रवक्ता, शिक्षा निदेशालय,राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली,

 

 

Posted by: हरदीप कौर संधु | अक्टूबर 21, 2020

2089

 

1-शबनम भारतीय

1

पिघली रातें

उदित दिनकर

जागी उम्मीदे

2

आशा निराशा

जीवन के पहिये

रख प्रत्याशा

3

जीवन– दुख

सुख का समंदर

हिम्मत चप्पू

4

सूरज -चाँद

मिलना – बिछुड़ना

देते संदेश

-0-

शबनम भारतीय, अध्यापिका ,फ़तेहपुर शेखावटी, सीकर,राजस्थान

shabnambhartia160@gmail.com>

-0-

2-डॉ महिमा श्रीवास्तव

1.

मनभावन

मुख फेरा तुमने

खुश तो हो ना ?

2.

भ्रमर तुम

स्वभाव है भुलाना

भोली कली को।

3.

पूजा की थाली

ठुकरा के निष्ठुर

प्रभु को खोजे।

4.

विरह -गीत

कौन सुनेगा मूढ़

सब  हँसेंगे।

5.

खेल पुराना

दिल तोड़ना, नया

काम क्या किया?

6.

चाँद जलाए

उदास– सी चाँदनी

ढलती जाए।

-0-

डॉ महिमा श्रीवास्तव, 34/1, सर्कुलर रोड, मिशन कंपाउंड के पास, झम्मू होटल के सामने, अजमेर( राज.)-305001
Email: jlnmc2017@ gmail.com
Mob. 8118805670

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 15, 2020

2088

डॉ महिमा श्रीवास्तव

डाॅ .महिमा श्रीवास्तव
1.
झरते पात
पतझड़-सा मन
रूठे साजन।
2.
मंद बयार
शरद सुहावना
मन कसके।
3.
धवल आभा
चाँद ने पसराई
याद वे आए।
4.
साँझ की बेला
चौखट से चिपकी
उदास आँखें।
5.
तमस छँटे
भोर का तारा हँसे
आशा भी जगे।
6.
शेफाली झरे
आँगन सुरभित
निराशा हरे।
7
कंपित बाती
हवा से सहमती
जलती रही।
8.
मन वीरान
बजे दूर बाँसुरी
हरती पीड़ा।
9.
आँखों का नूर
गया कमाने दूर
भूला सबको ।
10.
उम्र गँवाई
सबको खुश किया
ख़त्म है किस्सा ।
11.
पराई पीर
हरनी चाही मूढ़
उलझ गया ।
12.
वर्षा की बूंदें
विरहन झुलसे
चातक हँसे ।
13.
घनेरे मेघ
चमकती दामिनी
लौटें वे कब ।
14.
झरे सावन
कहाँ मनभावन
भीगा-सा मन ।
-0-

डाॅ .महिमा श्रीवास्तव,34 / 1, सर्कुलर रोड, मिशन कंपाउंड के पास,अजमेर (राज।) -305001
Mob. No.: 8118805670
Email: jlnmc2017@gmail. com
परिचय: डाॅ .महिमा श्रीवास्तव, चिकित्सक व मेडिकल शिक्षक।
M.B.B.S., M.S. (GYNAE& Obst.) ,M.S. (ANATOMY)
वरिष्ठ आचार्य, ज .ने.मेडिकल काॅलेज, अजमेर (राज।)
-साहित्यिक हिन्दी व अंग्रेज़ी पत्र-पत्रिकाओं में कथा, लघुकथा, कविताओं का प्रकाशन

Posted by: हरदीप कौर संधु | अक्टूबर 14, 2020

2087

नीलमेन्दु सागर
1
नई रोशनी
बाहर जगमग
घर अँधार।
2
हुआ विकास
नींव को छोड़ छतें
चढ़ीं आकाश ।
3
वहशी हवा
वर्षा की छेड़खानी
लुटी झोंपड़ी ।
4
अकाल वर्षा
डूबे गाँव शहर
प्यासे अधर ।
5
देखा चाँद
आँखें हुईं निहाल
मदांध लाल ।
6
गंध-पागल
हवा ने दी दस्तक
किवाड़ खुला ।
7
हल्दी की हँसी
हरे पल्लू से झड़ी
गाँठें न खुलीं ।
-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 11, 2020

2086-हाइकु पहेलियाँ

मुट्ठी में आकाश समा लेने वाली पहेली [ दैनिक ट्रिब्यून से साभार]

सत्यवीर नाहड़िया

नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करके आप दैनिक ट्रिब्यून में भी पढ़ सकते हैं

हाइकु पहेलियाँ

हाइकु आज जापान की सीमाएँ लाँघकर वैश्विक छंद बन चुका है। पाँच-सात-पाँच वर्णों की इस लघु कविता को आज विश्व की विभिन्न भाषाओं एवं बोलियों में विभिन्न प्रारूपों में तेजी से लिखा जा रहा है। इस लघुकाय छंद में रचना करना गागर में सागर भरना जैसा प्रयोग है। मुट्ठी में आकाश समा लेने की खूबी जिस रचनाधर्मिता में होती है, वही इस छंद के साथ न्याय कर पाती है। यदि इस छंद में पहेलियाँ रची जाएँ तो छंद के अलावा पहेलियों के प्राथमिक पक्षों को भी प्रमुखता से निर्वहन करना होता है। आलोच्य कृतियाँ हाइकु पहेलियाँ (प्रथम एवं द्वितीय अंक) में आठ सौ से ज्यादा पहेलियाँ संकलित की गई हैं, जिनमें कलम एवं कूंची से जुड़े बहुमुखी प्रतिभा के दिवंगत रचनाकार राधेश्याम जी हाइकु छंद तथा पहेलियों के सभी मूल तत्वों को निभाया है, जिसके चलते हाइकु पहेलियाँ रोचक बन पड़ी हैं। इन हाइकु रचनाओं को उनके सुपुत्र रमाकांत ने प्रकाशित करवा, उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी है। स्व. राधेश्याम जी ने हिंदी के अलावा अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू तथा संस्कृत में भी अनूठी रचनाधर्मिता से अपनी कलम का लोहा मनवाया है। प्रकृति, साहित्य, कला-संस्कृति, फल-फूल, देवी-देवता पौराणिक-ऐतिहासिक तथा सांसारिक पहलुओं पर रची इन पहेलियों में रोचकता एक विशेष तत्व है।

चार सड़क/ छोरियाँ बेधड़क/ दौड़ें कड़क (चौपड़), बावनी वाम/ राजा रानी गुलाम/चार सलाम (ताश), झोली में भरे/अजूबे खरे खरे/ बनिया फिरे(मदारी), जला तो कसा/ घी तेल में लसा/ नैनों में बसा (काजल) पिया उठाया/ मेरा भेद बताया/ नैना लजाया (घूँघट), पलटी मार/ सर पै बैठा यार/ जरा न भार (पगड़ी) जैसी पहेलियाँ हाइकु छंद में रच बस गई हैं। कुंडली मार/ चुरा मधु का प्यार/ बैठी छिनार तथा… पानी न पीता/ ताल में पड़ा जीता/ भरा न रीता नामक दोनों हाइकु क्रमश: इमरती व रसगुल्ला की पहेलियाँ हैं। इसी प्रकार हाइकुकार ने कुल्हड़ तथा चारपाई को हाइकु पहेलियों में बखूबी छंदबद्ध किया है :-

माटी का लाला/ जब काम निकाला/ घूरे पै डाला… चार तो खड़े/ वे चार लंबे पड़े/आठों ही भिड़े।

संग्रह में हाइकु के तीनों चरणों को तुकांत बनाकर हाइकुकार ने इनकी रोचकता को और बढ़ा दिया है। अर्जुन हेतु एक दो तीन/ बीबियाँ साढ़े तीन/ काठ प्रवीन, ऊधो के लिए श्याम दुलारा/ औरतों से भी हारा/ ज्ञान का तारा, कुबेर हेतु आठ रे दंतु/तीन पैर का जंतु/है धनबंतु,चाणक्य के लिए चोटी क्या खुली/ अरे गद्दी बदली/ तो नींद खुली, रावण हेतु पंडित बड़े/ नाम सोने में जड़े/ नारी ले उड़े। इसी प्रकार जड़ न जात/नभ चढ़ सुहात/ अक्षय पात (अमरबेल), कर कस ले/अधर से रस ले/खूब मसले (आम), बेचे मिठाई/ यह लंबू हलवाई/ तोड़कर खाई (खजूर), आई हाथ में/ नंगी करी बात में/नाचे दांत में (मूँगफली) आदि हाइकु पहेलियाँ प्रभाव छोड़ती हैं।

विषय विविधता, सुंदर छपाई, आकर्षक आवरण तथा दोनों कृतियों के अंत में सरलार्थ व शब्दार्थ का होना कृति की अन्य विशेषताएँ हैं। यह कृति बच्चों से बड़ों व आमजन से शोधार्थियों तक पसंद की जाएगी।

पुस्तक :हाइकु पहेलियाँ (प्रथम एवं द्वितीय अंक) रचनाकार : राधेश्याम प्रकाशक : साइबर विट. नेट, इलाहाबाद पृष्ठ : 186 व 169 क्रमश: मूल्य : रु. 250 प्रति अंक

-0-

http://www.cyberwit.net/authors/radhey-shiam

Posted by: हरदीप कौर संधु | अक्टूबर 6, 2020

2085

1-शशि बंसल गोयल

1
शापित चंदा
टूक-टूक झरता
व्याधित तन।
2
गिरा मावठा
माघ सिसक रहा
आशा धूमिल।
3
किनारे छोड़
लहरें बह रहीं
एकाकी मन ।
4
अँधेरी रात
टिमटिमाता तारा
आशा -किरण ।
5
पनाह पाती
निशा के आँचल में
डरी सड़क ।
6
फ़िसल गई
रफ़्ता -रफ़्ता ज़िंदगी
वक़्त की रेत ।
7
सघन मेघ
आच्छन्न पुनः रवि
शाश्वत बैर ।
8
गिरा कलश
रोली पग उकेरे
श्री आगमन ।
9
पौष की भोर
तुहिन -कण फैले
अलाव बुझे ।
10
छितरे बीज
वसुधा मुस्कुराई
गोद है भरी
-0-

2- साधना श्रीवास्तव

1
बूढ़े माँ-बाप
वृद्धाश्रम के द्वार
करें संताप
2
भीषण ताप।
मजदूर बेचारा
करे विलाप।
3
प्यासी धरती
चिलचिलाती धूप
धरा सहती।
4
तपती धरा
सूखे -सूखे दरख़्त
मानव डरा
5
दीपक- बाती
संग -साथ रहते
सबको भाए।
-0-
s.shrivastava1959@gmail.com

3- अशोक शर्मा भारती

1
चंचल हँसी
जैसे चटकी कली
फैली सुगंध ।
2
ओस की बूँदे
जहाँ- तहाँ बिखरी
चमके मोती ।
3
झरते पत्ते
माटी से मिल गले
हो गए माटी ।
4
महानगर
कांक्रीट का जंगल
नरपिशाच ।
ashoksharmabharti@gmail.com
-0-

4-सारिका भूषण

1
मन मछली
छटपटाता जीव
नारी जीवन।
2
बेजान तन
परदेश में लाडो
सिसकती माँ।
3
नया सूरज
खिल गईं कलियाँ
आत्मविश्वास।
4
सूखे लत्तर
गाए मेघ मल्हार
रोता किसान।
5
छूटती साँसें
पहाड़-सा जीवन
वृद्धाश्रम में।
6
जलती धूप
मंदिरों की घंटियाँ
आस्था अपार।
7
जलती चिता
शुरू हुई कहानी
टूटता घर।
-0- bhushan.sarika@gmail.com

5-संतोष कुमार सिंह

1
जाएँ किधर
चिड़ियाँ-सी बेटियाँ
बाजों का डर ।
2
मधु चुराके
बता रहा भँवरा
फूलों को गा के ।
3
उलझा सूत
सँम्हाले न सँम्हले
बिगड़ा पूत ।
4
माँग रही है
ये जहरीली हवा
खुद को दवा ।
5
छोटी को झूला
खरीद लाया बाप
बड़ी को दूल्हा ।
ksantoshb45@gmai।.com
-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अक्टूबर 3, 2020

2084

डॉ. जेन्नी शबनम
1.
एक सिपाही
अंग्रेजों पर भारी,
मिला स्वराज।
2.
देश की शान
जन-जन के प्यारे
बापू हमारे।
3.
कत्ल हो गया
अहिंसा का पुजारी,
अभागे हम।
4.
बापू का मान
हमारा अभिमान,
अब तो मानो।
5.
अस्सी थी उम्र,
अंग्रेजों को भगाया
निडर काया।
6.
मिली आजादी
साथ मिला संताप
शोक में बापू।
7.
माटी का पूत
माटी में मिल गया
दिला के जीत।
8.
निहत्था लड़ा
अस्सी साल का बूढ़ा,
कभी न हारा।
9.
अकेला बढ़ा
कारवाँ साथ चला
आखिर जीता।
10.
सादा जीवन
कड़ा अनुशासन
बापू की सीख।

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 25, 2020

2083

मीनू खरे

 

Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 23, 2020

2082

सुदर्शन रत्नाकर

1

शीतल छाँव

गाँव की पगडंडी

थके न पाँव।

2

प्रकाशपुंज

फैला है चहूँ ओर

मन अँधेरा।

3

मनभँवरा

मँडराता है रहता

नहीं मानता।

4

पाकर रंग

डूबते सूरज से

हँसा गगन

5

बादल डूबे

सूरज के रंग में

हुए सूरज।

6

आड़ी तिरछी

रेखाओं का जंगल

दुनिया सारी।

7

पथ कँटीला

बढ़ने को तत्पर

मन हठीला।

8

उड़ते रहे

पंछी आसमान में

नहीं था दाना।

9

निर्मोही बूँदें

बरसीं धरा पर

प्यासा है मन।

10

चमन हँसा

बुलबुलें चहकीं

हवा महकी।

11

आरती बेला

दीप जले ज्ञान का

मिटे अँधेरा।

12

यह दुनिया

अतिथि गृह बस

वापिस जाना।

13

सोचती रही

उम्र फिसल गई

रेत की नाईं

14

कैसी दुनिया!

सम्मान को तरसें

बूढ़ा-बुढ़िया।

15

रुकता नहीं

वक़्त किसी का नहीं

धोखा है देता।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 19, 2020

2081

मीनू खरे

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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