Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 24, 2019

ग्रीष्म ऋतु

डॉ.पूर्वा शर्मा
1.
लाडो धरा के
हाथ करता पीले
अमलतास।
2.
धरा की माँग
पूरी करे औ’ भरे
गुलमोहर।
3.
सोचता यही-
चूसूँ बर्फ का गोला,
स्वेदित रवि।
4.
सूर्य गुस्साया
वसंत के जाते ही
तमतमाया।
5.
ग्रीष्म ने भरा
धरा का पल्लू हरा
कैरी से लदा।
6.
पीले हो गए
आम, अमलतास
सूर्य भय से।
7.
महकी गली
श्वेत मोगरा कली
ग्रीष्म में खिली।
8.
धूल झोंकती
वसुधा की आँखों में
बैशाखी हवा।
9.
खीर-सा रूप
दूध जैसा मोगरा
केसरी धूप।
10.
माघ में लजा
जेठ में तपा, धूप
बदले अदा।
11.
ग्रीष्म में तपा
सिंदूरी गुलमोहर
शाख पर सजा।
12.
झुलसे रूप
जब चिलचिलाएँ
ज्येष्ठ की धूप।
13.
जेठ में दौड़े
श्रमिक नंगे पाँव
दमड़ी जोड़े।
14.
गर्मी की आन
चुस्की, कुल्फी औ’ आम
बच्चों की जान।

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Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 18, 2019

2020

1-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

चन्द्रमा

2-सुदर्शन रत्नाकर 

ratnakar didi (1)

ratnakar didi (2)

3- मंजूषा मन 

manjusha man (1)

manjusha man (2)

Posted by: हरदीप कौर संधु | मई 15, 2019

2019

रमेश कुमार सोनी 

1-पानी

1

पानी ढूँढते

पानी–पानी हो गए

पानी पूछिए।

2

आग लगी है

चलो कुआँ खोद लें?

पानी खरीदो।

3

शहरी कोठी

कैद हुआ झरना

गाँवों में प्यासा।

4

पानी सुस्ताता

प्याऊ की छाँव बैठे

प्यास ताकती

5

बंद कीजि

मटका -फोड़ स्पर्धा

पानी रोता है।

6

अंत समय

पानी पुकारे लोग

पुराना रोग।

7

पानी की ट्रेन

कभी मत ताकिए

वर्षा बचा लें।

8

ऐ पानी वालो !

पानी बचाना सीखो

जंग ना छेड़ो।

9

कैसे करोगे

आचमनसंकल्प?

जल पूछता

10

पानी जानता

सभ्यता की कहानी

जनता भूली।

11

नीर की पीर

पशु–पक्षी भोगते

पेड़ बचाते।

12

2-गर्मी

1

लू के सखा हैं

अंधड़–बवंडर

गर्मी -बतियाँ।

2

जिद्दी पसीना

धूप–गर्मी की बातें

बताने आता।

3

धूप बेचारी

छाँव ढूँढती फिरे

पैसा ना कौड़ी।

4

तालाब जाने

मीन होने का दर्द

पाले खाने को!

5

कुएँ–तालाब

बारिश में लॉटरी

गर्मी कंगाल।

6

मीन तड़पे

एक्वेरियम घिरी

तालाब ढूँढे।

7

कुएँ–तालाब

साझा संस्कृति पाले

तेरा ना मेरा।

8

पानी का मोल

कुआँ–तालाब जाने

सदा सहेजे।

9

गर्मी सहारा

तालाब तट वट

देखो मित्रता।

10

झख मारने

तड़ाग-तट बैठे

लोग बगुले।

-0-

रमेश कुमार सोनी

जे. पी. रोड-बसनाछत्तीसगढ़

Mobile–7049355476 / 9424220209

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 14, 2019

2018

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 10, 2019

2017-मायका सूना

ज्योत्स्ना प्रदीप
1
बिन माँ-पिता
जलती रही मन
दबी-सी चिता!
2
बिटिया रोई
मैके में नहीं कोई
बिन माँ-बाप ।
3
बेटी मैके में
अब हुई पराई
पिता न माई॥
4
तेरे बिन माँ ,
क्यों अपने ही छलें
सब बदले!
5
माँ आज होती
मैके में नहीं रोती
तन्हा बिटिया!
6
स्नेह तेरा था
मुस्कानों ने सर्वदा
मुझे घेरा था ।
7
पड़ा है मौन
पूछता तानपूरा
छेड़े रे कौन?
8
बोलती धीरे
तेरी कुछ तस्वीरें
मन को चीरे!
9
इक तस्वीर
अब तक अधूरी
तुझसे दूरी!
10
कूची अकेली
सूख गए हैं रंग
तेरा न संग!
11
माँ की दी हुई
वह अन्तिम साड़ी
प्रीत है गाढ़ी!
12
तेरा बनाया
पिता का वह चित्र
बिखेरे इत्र
13
तुझ बिन माँ
दालान की तुलसी
सूखी, झुलसी
14
नैना की धार
तेरा वह अन्तिम बार
सूना शृंगार!
15
सूना आवास
तू जो चली गई माँ
पिता के पास!
16
नैन हमारे
नभ के वह दो तारे
सदा निहारें ।

Posted by: हरदीप कौर संधु | मई 7, 2019

2016

1-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

घिरा आग में

व्याकुल हिरना सा

खोजूँ तुमको।

2

चारों तर

है घनेरा जंगल

कहाँ हो तुम!

3

प्यास बुझेगी

मरुथल में कैसे

साथ न तुम!

4

अँजुरी भर

पिलादो प्रेमजल

प्राण कण्ठ में।

5

शब्दों से परे

सारे ही सम्बोधन 

पुकारूँ कैसे!

6

भूलूँ कैसे मैं

तेरा वो सम्मोहन

कसे बन्धन।

7

तन माटी का

मन का क्या उपाय

मन में तुम।

8

तरसे नैन

अरसा हुआ देखे

छिना है चैन।

9

देह नश्वर

देही, प्रेम अमर

मिलेंगे दोनों।

-0-

2-डॉ.सुरंगमा यादव

1

पीड़ा के गीत

बन गए अब तो

साँसों के मीत

2

प्रेम के किस्से

दर्द की जागीर है

हमारे हिस्से

3

प्रेम की कमी

मन की धरा पर

दरारें पड़ीं

4

मन की कश्ती

आँसू के सैलाब में

बह निकली

5

जीवन– व्यथा

लिखने जब बैठी

बनी कविता

6

आँचल हरा

ढूँढती वसुंधरा

कहीं खो गया

7

सुनो कहानी

धरा और आँख में

घटता पानी

8

झूठी कसमें

सत्य का उपहास

न्याय की आस

9

परम्पराएँ

पाँव जो उलझाएँ

हमें न भाएँ

10

अल्ट्रासाउण्ड

सुनते ही सहमी

नन्ही अजन्मी

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 4, 2019

2015

अनुपमा अनुश्री

1

तप्त हवाएँ
जलता दिनकर
खिला मोगरा।

2

जीने के रंग
धूप छाँव के संग
हँ
सते फूल।

3

गर्मी के दिन
ठंडी सी पुरवाई
शीतल  रातें ।

4

आग ही  आग
जेठ की दोपहर
जलता सूर्य।

5

जीवनरथ
चले अनवरत
नयी आशाएँ।

6

खिलते दिल
जगमगाती रात
पूनम-चन्दा

7

अद्भुत सारे
उन्मुक्त नज़ारे
हसीं वादियाँ

8

खिलखिलाती
प्रस्फुटित पुष्पों-सी
चंचल हँसी।

-0-

ashri0910@gmail.com

Posted by: हरदीप कौर संधु | अप्रैल 28, 2019

2014-प्रभात पुष्प

1-कमला निखुर्पा
1
भाई अक्षत
बहनें सुर्ख रोली
रिश्तों की राखी ।
2.
आया है भैया
नाचे मन- मयूर
लूँ मैं बलैया।
3.
घर अँगना
था तुम बिन सूना
अब न जाना।
4.
माँगा है नेग
चिरजीवी हो भाई।
बाँटूँ मैं नेह।
-0-

2अनिता ललित
1
मूक थी बातें
सूना था परिवार
भैया जी बिना।
-0-
3-मंजूषा मन
1
समझा नहीं
मन की पीर कोई
आँख ही रोई।
2
साथी न कोई
पीड़ा और ग़म में
तुम भी नहीं।
3
भूल थी कोई?
ग़म को भुलाकर
प्रेम चाहना।
-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अप्रैल 26, 2019

2013

डॉ.सुरंगमा यादव के हाइकु निम्नलिखित लिंक पर क्लिक करके पढ़ और सुन सकते हैं

डॉ0 सुरंगमा यादव के हाइकु

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 22, 2019

2012-तेरी ही आस

ज्योत्स्ना प्रदीप 

1

प्रणय-पत्र

चैत्र में खिले पुष्प

चित्रा नक्षत्र!

2

जेठ का मास

मन-मरू बसी है

तेरी ही आस ।

3

आषाढ़ माह

आशाओं की आड़ में

सूखा ही रहा!

4

कई सावन

उसकी मुस्कानों में

मनाते तीज!

5

भादो के घन

जब नैन समा

श्याम ही आ!

6

भादो भरा है

प्रेम घने घन से

मन तरा है!

7

खोलूँ कपाट

आश्विन की है बाट

आ जाना प्रिय ।

8

उजाले भर

कार्तिक घर-घर

होता हर्षित!

9

गोरी-सी सर्दी

कार्तिक कोमलांग

गुलाबी प्रीत!

10

सखी बनके

आँसू अगहन के

सोखती धूप!

11

पौष की रातें

बहाती हैं नैनों से

बर्फीले आँसू!

12

माघ भरोसे

आँसू वह कोसे-कोसे

जमाती शीत!

13

फागुन मास

मधुमाधव संग

ऋतु का रास!

-0-

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