Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 10, 2017

1816

हाइकु

1-डॉ.जेन्नी शबनम

1

मन के भाव

छटा जो बिखेरते

हाइकु होते।

2.

चंद अक्षर

सम्पूर्ण गाथा गहे

हाइकु प्यारे।

3.

वृहत् सौन्दर्य

मन में घुमड़ता,

हाइकु जन्मा।

4.

हाइकु  ज्ञान –

लघुता में जीवन,

सम्पूर्ण बने ।

5.

भारत आया

जापान में था जन्मा

हाइकु काव्य।

6.

हाइकु आया

उछलता छौने -सा

मन में बसा।

7.

दिखे रूमानी

करे न मनमानी

नन्हा हाइकु।

8.

चंद लफ़्ज़ों में

अभिव्यक्ति सम्पूर्ण

हाइकु पूर्ण।

9.

मेरे हाइकु

मुझसे बतियाते

कथा सुनाते।

10.

हाइकु आया

दुनिया समझाने

हमको भाया।

-0-

2-शशि पाधा

1.

ओ री भौजाई!

पीहर सम्भालना

मैं तो पराई।

2.

मोरे बाबुल!

बिटिया परदेस

पीर बिछोड़े।

3.

मधुमालती !

तू क्यों न संग आई

दूँ मैं दुहाई।

4.

तुलसी मैया!

मुझे याद रखना

अपने ब्याह।

5.

रोको कहारों!

बाबुल का अंगना

छोड़ा न जाए।

6.

माँ! सुनो ज़रा

अँखियाँ न बरसें

मेरी सौगंध।

7.

सखी सहेली!

बाँध देना गठरी

गुड्डी पटोले।

8.

ऊँची मुँडेरें

झिलमिल दीपक

बाबुल– घर।

9.

ओ पुरवाई!

संदेसा क्यों न लाई

जा हरजाई।

10.

निक्की बहना!

कहीं मत छुपाना

मिट्टी खिलौने।

-0-

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Posted by: डॉ. हरदीप संधु | दिसम्बर 5, 2017

1815

1-डॉ कविता भट्ट

1

जब भी रोया

विकल मन मेरा

तुमको पाया।

2

निर्मल बहे

पहाड़ी झरने सा

प्रेम तुम्हारा।

3

नेह तुम्हारा

सर्दी की धूप जैसा

उँगली फेरे।

3

गूँज रही है

मन-नीरव घाटी

प्रेम-बाँसुरी।

4

प्रेम-अगन

अनोखे आलिंगन

बर्फीली सर्दी।

5

मुझे बुलाए

मूक स्वीकृति-सी

तेरी मुस्कान

-0-

2-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

1

अश्रु विकल

जब-जब बहते।

तुमको सोचूँ।

 2

तुमको पाया

पल-पल अघाया।

प्यास तुम्हीं थीं।

3

ताप मिटे हैं

अधर- छुअन से

तन-मन से ।

4

स्वर्गिक सुख

तेरा भुजबन्धन

महामिलन ।

5

बाहों के घेरे

जब कसे तुम्हारे

दर्द मिटे हैं।

6

सिन्धु-अगाध

जब-जब मैं डूबा

तुम ही मिले।

7

थी सूनी घाटी

पुकार सुन भीगी

मन की माटी।

8

जीवन की लू

तपी थी मन की भू

नेह से सींची।

-0-

3-अनिता मण्डा

1.

चुप्पी के बूटे

दिलों के बीच उगे

फलते जाएँ।

2.

नेह-बंधन

ज्यों महके चंदन

शीतल मन

3.

मन-मुँडेर

उड़-उड़ आ बैठें

यादों के पाखी।

4.

जीवन पथ

किया है सुरभित

फूल से साथी

5.

थामा जो हाथ

पा लिया है हमने

फूलों सा साथ

6.

जीवन-नभ

सूरज से हो तुम

देना उजाला

7

चाँद का फूल

टहनी और खिला

है रुपहला।

-0-

4-सुनीता काम्बोज

1

दो अर्थी बातें

कभी नहीं  समझी

जीवन बीता ।

2

जाओ मत यूँ

रुक जाओ जरा -सा

बची हैं साँसें ।

3

मन तिजोरी

सपने और यादें

सब हैं कैदी ।

4

विस्फोट हुआ

ये जीवन बिखरा

कैसे समेटूँ ।

5

तुमको पाया

तोड़ सब दायरे

तुम न मिले ।

6

लूटने आई

दर्द की ये आहट

मेरा क्यों चैन ।

-0-

5-ज्योत्स्ना प्रदीप

1

आँखें क्यों फेरी

इन आँखों में प्रिय 

पीड़ा थी तेरी ।

2

रात की पीड़ा

विभा -रश्मियों  संग 

चाँद  की  क्रीड़ा !

3

अपना कोई 

दे गया है जो दर्द 

ख़्वाब है ज़र्द ।

4

मन -निशा में

आज भी चाँद-सा है

उसका ख़त।

5

सुख समेटा 

रात की गोद  में जो 

चाँद  आ लेटा ।

6

हिफाज़त से

दिल – दराज़ रक्खे 

उसके ख़त ।

7

मेरे निकट

लेकर करवट 

सोया  है  चाँद  

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 3, 2017

1814

डॉ.शिवजी श्रीवास्तव

1.

जागा संसार

गंध बाँट सो गया,

हरसिंगार।

2.

बाँचती उषा

प्रेम पत्र भोर का

मुस्काती धरा।

3.

नन्ही गौरैया

चहचहाए गाए

राग भैरवी।

4.

लगती भली

धूप अगहन की

माँ की गोद सी।

5.

चैन से सोया

रजनी की बाहों में

श्रमित सूर्य।

6.

पूनो की रात

लगी स्वर्ण बेंदी ज्यों

श्यामा के माथ।

-0-

(मार्गदर्शन / आयोजन – रमेश कुमार सोनी – कार्यक्रम अधिकारी , राष्ट्रीय सेवा योजना<शास. आदर्श उच्च. माध्य. विद्यालय – बसना [ छ.ग. ] ४९३५५४_हाइकु लेखन – कार्यशाला , छात्रों ने लिखे सुन्दर हाइकु –विषय – दोस्ती , मित्रता , यारी )

1

दोस्तों के साथ

खेलता युवा हुआ

मन का बच्चा ।   – भजन पटेल – 11वीं

2

मरे ना मारे

काटे न कटे कभी

यही है दोस्ती ।     – विष्णु पटवा – 11 वीं

3

यारों की यारी

मुसीबत है भारी

लगी बीमारी ।  – लोकेन्द्र जगत – 11वीं

4

दोस्ती हमारी

अंगूर गुच्छे जैसी

खट्टी – मीठी सी ।   – अर्जुन सेठ – १२ वीं

5

दोस्ती न्यारी है

लड़े – खेले हैं साथ

अब चैटिंग ।  – सुषेन भोई – 11 वीं

6

दोस्ती की बातें

यादों संग दिखाती

राहें नवेली ।  – देवेन्द्र पोर्ते – 12 वीं

7

पापा का डर

फिर भी निभा गए

दोस्ती छिप के ।  – प्रदीप चौहान – 11 वीं

-0-

कुछ अन्य विषयों पर हाइकु

1

तवे पे रोटी

भूख लगे सिंकती

पेट की आग ।  – जीशु कनर – 11वीं

2

अच्छी खबर

दूर तक फैलती

शब्दों की रैली ।   – भजन निषाद – 12 वीं

3

सपेरा आया

डर दिखा लूटा है

छोटा बाज़ार । – कमल राज पोर्ते – 12वीं

4

विलुप्त होंगे

कल प्रदूषणों से

आज जो हरे ।   – खीर सागर साव – 12 वीं

5

हवा मुझको

उड़ा ले जहाँ से

मुझे मिला दे ।  – शरद कुमार – 12 वीं

-0-प्रस्तुति-रमेश कुमार सोनी , ७०४९३५५४७६  

E mail – rksoni1111@gmail.com

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | नवम्बर 29, 2017

1813

1- डॉ.मीता अग्रवाल

1

भोर होते ही

आशियाना ढूँढ़ते

बेघर सारे।

2

रात होते ही

जुगनू चमकते

तारो के जैसे।

3

सन्नाटा बुने

झींगुर साँय- साँय

मनवा कॉपे।

4

मै ना बोंलूगी

जान पे खेलकर

संग हो लूगीं।

5

 वक्त के साथ

मिट जाते अक्सर

घाव गहरे।

6

मिलन संग

प्रीत की गहराई

मापी ना जाए।

7

मरते दम

सुन्दरता तुम्हारी

नैन बसाऊँ।

8

 मृत्युपर्यन्त

छूटते ना बंधन

संसार काया।

-0- श्री कमल भवन , पुरानी बस्ती, लोहार चौक, रायपुर,छतीसगढ़ 492001

meetaagrawalrpr@gmail.com

-0-

 2-सुशील शर्मा

1

हजार दु:ख

सहती हैं नदियाँ

बहती रहीं।

2

सूखती नदी

करती हैं सवाल

मुझे क्यों मारा।

3

घटती रेत

मरती हुई नदी

बनी है सोख्ता।

4

एक थी नदी

आने वाली पीढ़ियाँ

सुने कहानी।

5

बचा लो नदी

वरना न बचेगी

आगे की सदी।

6

कटता पेड़

लगता है अपना

कोई मरा है।

7

विकास पथ

नदी बनी मैदान

कॉलोनी कटी।

8

मेरा शहर

हाथ लिये आरी

छाँव तलाशे।

9

एक चिड़िया

पेड़ के ठूँठ पर

नीड़ में बैठी।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 25, 2017

1812

1-साँझ के हाइकु – रमेश कुमार सोनी

साँझ महके

प्रिया जूड़े में फँसा

पिया को ताके । 

2

साँझ पुकारे

सूर्य शर्म से लाल

चाँद जो झाँके । 

3

साँझ का सूर्य

बूढ़े की सुनो कोई

देर क्यों हुई ?

4

साँझ का मन

थका , बुझा ,रूठा -सा

पार्टी हो जाए । 

5

रातें डराती

प्रभु भजने लगी

संध्या की ज्योति । 

6

साँझ का गीत

मन चाहता मीत

बढ़ा लें प्रीत । ।

7

अच्छा दिन था

साँझ खुशी से लौटा

कल की चिंता !!

8

लोग लौटते

संध्या विदा कर के

थके सो गए । 

9

साँझ बताती

अँधेरों का गुनाह

घर लौटिए । 

10

भोर का भूला

घर लौटता रवि

संध्या की बेला । 

-0-जे पी  रोड – बसना , जिला – महासमुंद

[ छत्तीसगढ़ ] 493554 , मोबा – 9424220209

-0-

2-विभा रश्मि

1

मन का बच्चा 

कूद फाँदके थका 

लोरी सुनेगा ।

2

तोतों के झुंड 

नभ नापने उड़े

समूह-गान । 

3

घूँघट काढ़े 

न अब गाँव- गोरी

घुड़सवारी  । 

4

सफ़ेद भेड़ें

पहाड़ियाँ टपतीं 

ऊन ले भागीं ।

5

जलद सजे 

रँगे  खिज़ाब -केश

श्याम औ  श्वेत ।

6

अतिथि देवो  

प्रवासी ये  परिन्दे

झील नहाएँ  ।

7

उफ़्फ़  !  ये स्मॉग

धुनिया है धुनता 

मैली -सी रूई ।

9

हुई झंकृत

वीणा स्वर लहरी

दिल के हाथों ।

 -0-

3-कमला घटाऔरा
1
कैसा ये बीज
बिन बोए ही उगती
भ्रष्टों की पौध ।
2
ग्रहण लगा
ग्रस्त हुई है धरा
करो रे दान ।
3
बचा न धर्म
लोभ- पाश जकड़े
जन-जीवन ।
4
सोए , जागे न
नेता ले सुविधाएँ
कर्म से भागे ।
5
गिद्द दृष्टि से
रहते ताक लगा
फैले लुटेरे ।
-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | नवम्बर 23, 2017

1811

[ हिन्दी हाइकु ने विगत वर्षों में अपना परिवार बनाया है। यह संयुक्त परिवार आपसे में बहुत आत्मीयता से सबको अपनाता चला है। कुछ साथी केवल छपने के लिए आए, कुछ समय बीता फिर बिदा हो गए।कुछ ऐसे भी आए ,जिन्होंने कुछ सीखने का प्रयास नहीं किया। वे अल्पकाल के लिए ठहरे, फिर अपना अलग कोना चुन लिया। हाइकु से जुड़ा एक ऐसा भी समूह है, जो शुरू से आज तक जुड़ा है। सिर्फ़ हाइकु से नहीं , बल्कि रचनाकारों से भी, उनके सुख -दु;ख से भी; सदैव कल्याण की कामना के साथ। आज के अंक में कमला निखुर्पा से मंजूषा मन तक, स्नेह की डोर में बँधे। मंजूषा जी ने साँझ का सूरज भेजा, तो जो उद्गार मन में उठे , यहाँ उकेर दिए । समयाभाव के कारण कुछ साथी   उपस्थित नहीं हो सके। अगले अंकों में उनका इन्तज़ार रहेगा।]

साँझ का सूरज

19 नवम्बर 2017

 

 

 

 

1- कमला निखुर्पा ( प्राचार्या, केन्द्रीय विद्यालय,  पिथौरागढ़)

1

साँवली साँझ

को स्वर्णिम सौगात

भेंटता रवि ।

2

सजा विहान

दिवस अवसान

नयनाभिराम।

3

नाचते मेघ

पहन के पगड़ी

किरणों -जड़ी।

4

छुप के खड़ी

साँझ की सौतन

रात निगोड़ी।

5

रात चोरनी

समेट स्वर्ण सारा

भागती चली ।

-0-

2-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

सांध्य गगन

कर गया उदास

एकाकी मन।

2

स्वर्णिम मेघ

लुभाते गगन को

कुंचित केश।

3

घटा में धूप

मोह गया मन को

तेरा ये रूप।

4

फैला गगन

उमड़ते ये घन

मेरा ही मन।

-0-

3-अनिता मण्डा

1

बेफ़िक्र रंग

बिखेरता सूरज

साँझ-बेला में।

2

अँधेरे लिखें

रात की पाण्डुलिपि

गुनाहों-भरी।

3

स्वर्ण-रश्मियाँ

पीताभ गगन में

जाल बिछाएँ।

-0-

4-भावना सक्सैना

1

साँझ के रंग

कैनवस आसमाँ

नयन रँगे।

2

बादल-फाहे

दमक स्वर्णाभा से

करें शृंगार।

-0-

5-मंजूषा मन

1

जाता सूरज

कल फिर आऊँगा

कहके चला।

2

बुझते हुए

न रोया ये सूरज

मन क्यों रोए।

3

तुम्हारी छवि

बादल या सूरज

सब तरफ।

4

उगे या ढले

कुछ सिखाता चले

देखो ये सूर्य।

5

ढलती बेला

न चले साथ कोई

पंछी अकेला।

-0-

6-ज्योत्स्ना शर्मा

1

सुघड़ बाला

ले हाथों में दीपक

बाला , सँभाला ।

2

संध्या डुबोए

सागर के जल में

स्वर्ण कटोरा ।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 22, 2017

1810

अनिता मण्डा

1
आकाश-मन
घट-बढ़ करता
चाँद का पेड़।
2
बरसी आँखें
बालू की थी दीवारें
ढहती गई।
3
बिल्ली की गंध
कबूतरों के झुंड
फ़ुर्र से उड़े।
4
आएगी हवा
खोल दो वातायन
मिटे घुटन।
5
तारे उतरे
रात की छाती पर
जुगनू जैसे।
6
चाँद-पतंग
उदास आसमान
उड़ाता रहे।
-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | नवम्बर 18, 2017

1809

 संतोष गर्ग  

1

 जय गणेश

काट दो सभी क्लेश

छूटे न देश ।।

2.

खिले हो ऐसे

लग रहे हो जैसे

फूल गुलाब ।।

3

कितना प्यारा

इस जग से न्यारा

संग तुम्हारा ।।

4

मन की बात

छूटे कभी न साथ

दुआ करूँ मैं ।।

5

खिलते रहो

तुम से भी पहले

मैं  मुरझाऊँ ।।

6

उससे कहूँ

वादा निभाना तुम

खुद से डरूँ ।।

-0-

संतोष गर्ग,#126, एच आई जी,सेक्टर-71 मोहाली 

santoshgarg1211 <santoshgarg1211@gmail.com>

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 13, 2017

1808

संगीता दत्ता,किलकारी’ बिहार बाल भवन के सौजन्य से  प्राप्त हाइकु [ publication@kilkaribihar.org ]

  1- प्रिंयतरा भारती,   संत जेवियर्स स्कूल, वर्ग- 8

 1

मोर-सी नाचूँ

झमाझम बारिश

मेरी ख्वाहिश

2

सदानीरा हैं

सुख– दुःख दोनों ही

इन नैनों के

3

सारे चेहरे

पड़े सुर्ख, मैंने जो,

बनाया मूर्ख

4

 माँ ने कहा कि

 मेरे लिए जादू तो

 है मेरा शिशु

5

कालातीत था

भूला दिया समझ

कि अतीत था।

6

जि़न्दा मैं अभी,

ऐ मौत, खेल फि़र

खेलना कभी

7

ख्याल आजाद

होते हैं, फि़र भी ये

मन में कैद

8

नन्ही कोपलें

खुशियाँ बिखेरेंगी

इस धारा पे

9

गगनचुम्बी

बनूँगी जरूर ही

एक दिन मैं

10

दीपक बन

फैलाऊँ उजियारा

संसार में मैं

-0-

2- खुशबू सिन्हा ,संत मैरीज स्कूल,वर्ग- 9

1

बिछे थे काँटे,

जन्मी जब बिटिया

खिले कमल

2

पेड़ काटते

जि़दगी से खेलते

आँसू न आते

3

है रामबाण

 सुशिक्षा ज़िन्दगी का

 मानव गढ़े।

4

हम बच्चों की

 किताबों में  भरे हैं

 हीरे व  मोती

5

पंछी की बोली

गजब लगी मीठी

पेड़ों पे डोली।

6

फ़ूलों के बाग

काँटे भरी राह है

हमें मिलाती।

7

घर मेरा ये

सपनों से भरा है

नई ज़िन्दगी।

-0-

3- राजेश्वरी,डी- पी- एस  दानापुर,वर्ग- 6

1

हम हमेशा

 कूड़ा कूड़ेदान में

 डालें भइया

2

गर्मी इतनी

 पंखा चलाओ जब

 तपेंगे हम

3

पेड़ ना काटो,

हम सब के लिए

जीवन हैं ये ।

4

बंदर भाई,

उछले पेड़ पर,

गिरे नदी में

5

तितली उड़ी,

 आसमान को छूने,

 थक गई वो

6

 बारिश आई,

 मोर नाचा, साथ ही

 जंगल नाचा

7

सुबह हम

सब खेल खेले थे,

पसीना छूटा

8

टीचर आए !

सब शोर मचाए,

हैं बच्चे भागे

9

सर्दी आई

 नाक लाल हो गई,

 आग जला ली

10

आँधी है आई

 सारे कपड़े उड़े,

 जल्दी भाग ना

-0-

4 रानी कुमारी,कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स,वर्ग- स्नातक 1

1

कौन है यहाँ

जो दुःख न भोगा है

राम हैं रोए।

2

गिरी उसकी

पलकों पर बूँद

औ’ आँसू बनी

3

ये मेरी कश्ती

मझधार मे फ़ँसी

खेके रहूँगी।

4

जिद है मुझे

आसमाँ  को छूकर

भू पे लाने की

5

पा गया कुछ

वो पागल बना था

यही सच है

6

मोहब्बत का

 काफि़ला निकला है

 काँटों की गली।

7

उँगलियों को

पकड़ तुमने माँ

ग दिखाया।

8

मन वीणा है

मोहब्बत संगीत

जीने यही है।

9

ये झुकी आँखें

उनसे गिरी बूँदें

 टपका दर्द।

10

टूटकर भी

 न टूटे मंजिल पर

 जाने की ज़िद।

-0-

5- सृजन कुमार,लीटरा वैली,वर्ग- 6

1

माँ बड़ी प्यारी

लोरी हमें सुनाती

खुद सो जाती

2

पापा का पैसा

तुरंत खर्च होता

कम बचता

3

 दीदी हैं अच्छी

 बहुत हैं पढ़ती

 खेलतीं नहीं

4

बिजली भागी

पंखा हो गया बंद

पसीना बहा।

5

तेज़ी से उड़ी

बादलों के ऊपर

 मेरी पतंग

6

अइयो रामा!

 आइसक्रीम खा

 मज़ा आ गया।

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | नवम्बर 5, 2017

1807

1-सुदर्शन रत्नाकर

1

कौन सुनता

दिल स्वयं सहता

दर्द की घातें।

2

घायल मन

मरहम न पट्टी

रिसता खून।

3

आज के रिश्ते

रेतीले घर हों जैसे

भुरभराते।

4

अजनबी से

रह रहें हैं लोग

ऊँचे मकान।

5

बहुत सहा

ये तन्हाई का गम

भरा है प्याला।

-0-

2- डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

1

सुनो तो ज़रा

दिल ही तो सुनता

दिल का कहा ।

2

हैं अनमोल

ज़ख़्मों को भर देते

दो मीठे बोल ।

3

उधड़ी मिली

रिश्तों की तुरपन

गई न सिली ।

4

फाँस थी चुभी

मुट्ठी में अँगुलियाँ

बँधी न कभी ।

5

अरी तन्हाई !

शुक्रिया संग मेरे

तू चली आई ।

-0-

3-अनिता मण्डा
1
उठाके थका
वेदनाओं का भार
बैचेन मन।
2
ठिठके तारे
रातरानी महकी
चाँद से मिल।
3
अपने लगें
विरह- भरे गीत
पीर एक -सी।
4
छल-बल की
हो रही बरक़त
पाप का घड़ा।
5
दंग चौराहे
गुमराह भीड़ में
ट्रैफ़िक जाम।
6
धूप-छाँह की
चादर पेड़ तले
हवा से हिले।
7
एक तमाचा-
समाज के मुँह पे
भिखारी बच्चे।
8
मेरे सुर में
उदासी का संगीत
तुमने चीन्हा।
9
छिपे ना राज़
पढ़ती सब कुछ
मन की आँखें।
10
पेड़ बदलें
ऋतुओं की पोशाक
चुपचाप से।
11
अनुभूतियाँ
सिलवटों में लिखी
मुख पे सजी।
12
मटमैला- सा
मन का कैनवस
खिले न रंग।
-0-

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