Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 18, 2019

1891

बुध सिंह नडालों

( पंजाबी से अनुवाद : रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ )

1

बीमार माँ की

धुँधली जैसी याद

मन उदास ।

2

आख़िरी वक़्त

मृत्यु की शय्या पर

माँ याद आई ।

3

आँखों से दूर

माँ -बाप  मजबूर

बेटी बिदेस ।

4

खुली खिड़की

फैल गया भीतर

पूरा अम्बर ।

5

दीप जागता

नदिया में तैरता

मौज मनाता।

6

पंछी चहके

क़ायनात महकी

बहार आई ।

7

चिड़िया झूले

बिज्स्ली के तारों को

झूला बनाके।

8

आशा के बीज

निराशा  की फ़सल

सभी रिश्ते ।

9

अरे विश्वास !

देखी गंगा घाट पे

तेरी ही लाश ।

10

कुछ हैं रिश्ते

बनकर फ़रिश्ते

दुःख हरते ।

-0-

[‘काही दे फुल्ल सग्रह’से]

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Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 17, 2019

1890

डॉ पूर्वा  शर्मा

1

सर्द-जीवन

तेरा पश्मीना-नेह

लपेटे फिरूँ ।              

2

 माघ है आया,  

कोहरे के बुर्के में

चाँद लजाया ।

3

खूब लजाती

हिम घूँघट काढ़े

दुल्हन शीत ।   

4

सहमा तन

पौषी हिमी हवाएँ

शूल चुभाए ।

5

शीत सहती

हिम का बोझा ढोती 

नन्ही पत्तियाँ ।

6

चाँद भी काँपे

जब धरा स्वयं को

हिम से ढाँके ।

7

शीत लहर

रवि भी लपेटता

धुँध लिहाफ ।

8

पर्वत ओढ़े 

हिम का मफलर,    

सफ़ेद कोट ।

9

श्वेत वसन

पहने हिमालय  

धुनी जमाए ।

10

झूमे-थिरके  

हिम घुँघरू बाँधे  

शीत यौवना ।

11

खग काँपते

पात, तड़ाग स्तब्ध    

शीत प्रकोप ।

Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 13, 2019

1889

ज़िंदगी
अनिता ललित

1
थकी! आहत!
फिर भी है चलती-
यही ज़िंदगी!
2
सिली-उधड़ी
ख़ुशियों के पैबन्द
सजी ज़िंदगी।
3
किसे पुकारे
अपनों के हाथों ही
लुटी ज़िंदगी।
4
आगे न पीछे
धुँआँ ही धुँआँ बस
गुम ज़िंदगी।
5
रातों को जागे
भोर की आस नहीं
कैसी ज़िंदगी!
6
साँसों की माला
गिन-गिन के जीती
हारी ज़िंदगी।
7
दिखे है कुछ!
नक़ाबों की आड़ में
छले ज़िंदगी।
8
सूझे न राह
टूटे ख़्वाब चुनती
ज़ख़्मी ज़िंदगी।
9
है भटकती
सूनी राहों में खोई
तन्हा ज़िंदगी।
10
जल रही है
बेबसी की आग में
ज़िंदा ज़िंदगी।
-0-

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 3, 2019

1888

डॉ जेन्नी शबनम

1.

हे नव वर्ष

आखिर आ ही गए,

पर जल्दी क्यों?

2.

उम्मीद जगी-

अच्छे दिन आएँगे

नव वर्ष में।

3.

मन से करो

इस्तकबाल करो

नव वर्ष का।

4.

पिछला साल

भूलना नहीं कभी,

मिली जो सीख।

5.

प्रेम ही प्रेम

नव वर्ष कामना,

सब हों सुखी।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 1, 2019

1887-नूतन वर्ष

1-भावना सक्सैना
1
मन क्यारी में
रोप कर आशाएँ
सींचें सोच से।
2
हर दिशा में
नव स्वर संगीत
करे स्वागत।
3
नूतन वर्ष
मिल करें संकल्प
फैलाएँ हर्ष।
4
नया अंदाज़
दे खुशियों को पंख
नया आगाज़।

-0-

डॉ0 सुरंगमा यादव

1

नव प्रभात

बहे अब सर्वत्र

प्रेम की वात ।

2

सोया निढाल

अतीत के अंक में

गुज़रा साल ।

3

नवल वर्ष

फिर से निखरेंगे

मलिन पात ।

4

खींचती मुझे

नव वर्ष की भोर

तुम्हारी ओर ।

5

जल बिन्दु-सा

समय सागर में

समाया वर्ष ।

6

वर्ष के पृष्ठ

रात-दिन बाँचते

वेदपाठी-से ।

7

रात-दिन की

थामकर उँगली

चलता वर्ष ।

8

आशा की नौका

नववर्ष नदी में

चलो उतारें ।

9

हर्ष ही हर्ष

सबके जीवन में

छाये उत्कर्ष ।

10

मिटे उदासी

आनंदित हों सारे

भारतवासी ।

11

मिटें रूढ़ियाँ

आहत न हों अब

नयी पीढ़ियाँ ।

12

प्रेम रंगोली

घर-घर सजाए

ये नववर्ष ।

13

पुनर्जन्म ले

फिर-फिर आते हैं

वही महीने।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 24, 2018

1886

वृद्ध जीवन-डॉ जेन्नी शबनम

1.

उम्र की साँझ

बेहद डरावनी

टूटती आस।

2.

अटकी साँस

बुढ़ापे की थकान

मन बेहाल।

3.

वृद्ध की कथा

कोई न सुने व्यथा

घर है भरा।

4.

दवा की भीड़

वृद्ध मन अकेला

टूटता नीड़।

5.

अकेलापन

सबसे बड़ी पीर

वृद्ध जीवन।

6.

उम्र जो हारी

एक पेट है भारी

सब अपने।

7.

धन के नाते

मन से हैं बेगाने

वृद्ध बेचारे।

8.

वृद्ध से नाता

अपनों ने था छोड़ा

धन ने जोड़ा।

9.

बदले कौन

मखमली चादर

बुढ़ापा मौन।

10.

बहता नीर

यही जीवन रीत

बुढ़ापा भारी।

11.

उम्र का चूल्हा

आजीवन सुलगा

अब बुझता।

12.

किससे कहें?

जीवन-साथी छूटा

ढेरों शिकवा ।

13.

बुढ़ापा खोट

अपने भी भागते

कोई न ओट।

14.

वृद्ध की आस

शायद कोई आए

टूटती साँस।

15.

ग़म का साया

बुजुर्ग का अपना

यही है सच।

16.

जीवन खिले

बुजुर्गों के आशीष

खूब जो मिले।

17.

टूटा सपना

कौन सुने दुखड़ा

वृद्ध अकेला।

18.

वक्त ने कहा –

याद करो जवानी

भूल अपनी।

19.

वक्त है लौटा

बुज़ुर्ग का सपना

सब हैं साथ।

20.

वृद्ध की लाठी

बस गया विदेश

भूला वो माटी।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 23, 2018

1885

1-नरेंद्र श्रीवास्तव
1

शीत काँटे-सी
मौसम गुलाब-सा
मन तितली।
 2
शीतल रातें
मौसम रजाई में
दुबका ,लेटा।
3
शीत हवाएँ
बर्फ के गोले लिये
खोजें सूरज।
4
शीत के किस्से
अलाव ने सुनाए
रात ऊँघती।
5
काँपती रात
सूर्य !सूर्य! जपती
धूप की माला।
6
नभ से आई
पवन ठिठुरती
कंबल माँगे।
-0-

2-अनिता मण्डा

1.
बुझा दी साँझ
करते हुए याद
बीते पलों को

2.
पार्क में बैठ
एकांत हरा किया
घर आ गए
3.
चूमती बहे
लहर को लहर
हमसफर

-0-

3-सुशील शर्मा 

1

ठंड में पेड़ 

रात भर ठिठुरा 

ओढ़ता धूप। 

2

चीखती रात

तनहा तारों- संग 

छिपी  चाँदनी।

3

सभ्य मानव 

पर्यावरण रक्षा 

आरी -कुल्हाड़ी। 

4

शब्द वीरान 

खोखले से खामोश 

झरते पत्ते। 

5

खूनी मंज़र 

सहमा -सा शहर 

सत्ता ज़हर। 

6

रात में चाँद 

छत पर टहले 

बिंदी लगाए। 

Posted by: हरदीप कौर संधु | दिसम्बर 21, 2018

1884

सविता अग्रवाल सवि’, कैनेडा

1

यादें सखियाँ

एकांत का सहारा

करे बतियाँ।

2

यादें हैं झूला

पेंग बढ़ा झुलातीं

खूब  हँसातीं।

3

यादें किताबें

हर पन्ने पर लिखी

कितनी बातें।

4

यादें सारथी

जीवन के रथ को

ये ही चलातीं।

5

यादें बुखार

दर्द से कराहतीं

तन तपातीं।

6

यादें लहरें

तट से टकरातीं

जिंदा हो जातीं।

7

यादें छाया-सी

थकान होती जब

देतीं आराम।

8

यादें तालाब

तट घेरे में घिरी

बँधी रहतीं।

9

यादें प्रकाश

चमकती रहतीं

छूतीं आकाश।

10

यादें धुआँ-सी

चिमनी से निकल

नभ में लुप्त।

11

यादें पागल

यहाँ वहाँ डोलतीं

ढूँढतीं धाम।

सविता अग्रवाल “सवि” , कैनेडा

दूरभाष: 1-905-671-8707

email: savita51@yahoo. com

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 16, 2018

1883-पतंग

कमला  निखुर्पा

1

मैं तो पतंग

डोर तेरे हाथों में

खोजूँ अनंत ।

2

कागद अंग

लागा नेह का रंग

उड़ी पतंग ।

3

संयम डोर

थाम उड़ चली मैं

क्षितिज ओर ।

4

मन पतंग

हौसलों की उड़ान

देखे जहान।

5

हवा भी कहे

सारथी बनूँ मैं भी

झोंके जो सहे।

-0-

(15.12.2018)

Posted by: हरदीप कौर संधु | दिसम्बर 8, 2018

1882

1-कृष्णा वर्मा

1

अर्थहीन हैं

जीवन की साँझ में

मुहैया सुख।

2

क्या वो सम्बन्ध

दुख में हो लोप

सुख में संग।

3

एँ त्योहार

मन हो सतरंगी

उत्सवी द्वार।

4

कैसे अजूबे

विकास की नैया में

बैठके डूबे।

5

र्ष्या का मारा

पाली हैं उदासियाँ

इंसाँ बेचारा।

6

क्या समझाना

स्व: का हुआ ज़माना

प्यार निमाणा।

7

शत्रु जो ऐंठे

तरकश के तीर

चुप क्यों बैठें।

8

दूर देश से

जोड़े जीवन नाते,

 उलझे खाते।

9

उल्टा व्यापार

छपके न बिकते

बिकके छपें।

10

बड़े क्या हुए

हँसी कहकहे तो

सब खो गए।

11

मोह की खूँट

बाँध ममता- खूँटा

स्वयं को लूटा।

-0-

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