Posted by: हरदीप कौर संधु | जुलाई 4, 2018

1844

कमला निखुर्पा
1
छत पे बैठ
टिप् टिप् बजाए
सावन साज।
2
खोल के बाहें
झुक झूम लहरे
तरु भी आज।
3
पग में बाँध
बूँदों की पैंजनिया
बरखा नाची ।
4
गाए दादुर
कुहूक- मन कूके
सुर हैं भीजे ।
5
रस गागर
छलकाए बदरा
नशीली धरा।

-0-

2-सुशील शर्मा

1
नन्ही -सी बूँद
गाल को चूमकर
रफूचक्कर।
2
पानी की बूँद
बादल पे लटकी
मन पपीहा।
-0-
3-अजय चरणम्
1
उग आऊँगा
नन्हे पत्ते बनके
टूँठ वृक्ष में।
2
फूलों की गंध
बयाँ कर रही है
पास हो तुम।
-0-अजय चरणम्, पूरब अजीम गंज,हवेली खङगपुर,
मुंगेर- 811213 (बिहार)9572171909

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Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 23, 2018

1843-नवागत

रश्मि शर्मा 
1
ख़ाली जीवन
मुस्कान की वजह –
केवल तुम
2
हुई बारिश
यादों का रेनकोट
मैं रही सूखी
3
जब भी खिले
अमलतास फूल
वो हमें मिले
4
कैसे कहूँ कि
तुम्हारे न होने से
क्या-क्या बदला
5
झड़ी पत्तियाँ
बहुत उदास है
गुलमोहर
6
सरकी शाम
अँधेरे की बाहों में
उगा उजाला
7
रिहा न करो
आँखों में क़ैद रखो
आँसू समझ
8
जलती धरा
बरस पड़ी बूँदें
फैल गई ख़ुशबू
9
मद्धिम हवा
फिर से दिला गए
आपकी याद
10
न पूछो कोई
उदासी का सबब,
नसीब यही
11
एक भ्रम था
है कोई मेरे पास,
अब सच है
12
आज की रात
चाँदनी में उनकी
याद आएगी
13
देखा हमने-
कपूर की तरह
उड़ता प्यार
14
शाम का अर्थ
तुम्हारी ही आहट
फैली लालिमा
15
तुम नहीं हो
स्याह है आसमान
धुँधला सब
16
ज़िंदगी मेरी
साँसें तेरे नाम की
जीवन पूर्ण
17
नाज़ुक डाल
छुप गया सूरज
नहीं है रात
18
मन चिड़िया
दुनिया बहेलिया
कौन बचाए
19
सर्द सुबह
कुहासे की चादर
धुँधली राह
20
भर दो रंग
ख़ाली है जीवन का
ये कैनवास
21
लरजती है
सीप की तलाश में
स्वाति बूँद
-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 31, 2018

1842

1-डॉ.कुँवर दिनेश

1

कहीं बुराँश
वसन्तवह्नि लिये
कहीं पलाश

2

ज़रूरी काम
ठहर जा शहर!
ट्रैफिक जाम

3

हर पहर
कहे व्यथा नदी की
हर लहर

4

नदी में बाढ़
नेता-अधिकारी की
मैत्री प्रगाढ़

5

उषा काल में
खगों की आकुलता
डाल डाल पे

6

साँझ सावनी
शिमला क्षितिज पे
बदली घनी

7

 

सोए हैं सब
जग रहा जुगनू
जगती शब

8

राह पुरानी

बच्चों की किलकारी

शाम सुहानी

(‘जग रहा जुगनू’: हाइकुसंग्रह-2018से)

 

-0-

कुँवर दिनेश

जन्म:10 जून 1973

जन्मस्थान: नई दिल्ली। मूलत: शिमला, हिमाचल प्रदेश।

शिक्षा: एम.ए. (इंग्लिश), पीएच.डी. (इंग्लिश)

प्रकाशित कृतियाँ- 10 हिन्दी काव्यसंग्रह: पुटभेद (2003), कुहरा धनुष (2006), उदयाचल (2009), धूप-दोपहरी (2010), आँगन में गौरैया (हाइकु 2013),  पगडण्डी अकेली (हाइकु 2013), बारहमासा: हाइकुमाला (2014), उम्मीदों का क़फ़स (2014), दोहा वल्लरी  (2015), जापान के चार हाइकु सिद्ध (काव्यानुवाद, 2015), जग रहा जुगनू (हाइकु 2018)

+ 14 अंग्रेजी काव्य संग्रह, 5 अंग्रेजी साहित्यालोचना पुस्तकें, 5 अंग्रेजी साहित्यालोचना संपादित पुस्तकें।

संपादन: हाइफन हिन्दी हाइकु विशेषांक (2014)

सम्मान व पुरस्कार: हिमाचल प्रदेश राज्य साहित्य अकादमी पुरस्कार– 2002,आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान,सारस्वत सम्मान-2010,भारतेन्दु हरिशचंद्र साहित्य सम्मान,शब्दश्री सम्मान  इत्यादि।

अन्य:

+देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में तथा अंतर्जाल पर कविताएँ, कहानियाँ, समीक्षाएँ, आलेख एवं साक्षात्कार प्रकाशित।

+अंग्रेज़ी साहित्यालोचना पुस्तकें ताईवान, तमिलनाडू, कर्णाटक, हरियाणा, गुजरात, छत्तीसगढ़ एवं हिमाचल प्रदेश के विश्वविद्यालयों द्वारा यू.जी./पी.जी. व एम.फिल. स्तर के पाठ्यक्रमों के लिए अनुमोदित/अनुशंसित।

+हिन्दी व अंग्रेज़ी काव्य पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में एम.फिल. और पीएच. डी.स्तर के शोधकार्य।

प्रसारण: आकाशवाणी और दूरदर्शन, शिमला + साधना टी.वी. से काव्य, वार्ता, चर्चा का प्रसारण।

+ जनवरी-फ़रवरी २०१६ में कविता संग्रहउदयाचल” (२००९) का आकाशवाणी, शिमला से धारावाहिक प्रसारण।

सम्प्रति: एसोसिएट प्रोफेसर  (अंग्रेजी ) + संपादक : हाइफन

संपर्क:  #3, सिसिल क्वार्टर्स, चौड़ा मैदान, शिमला 171004 हिमाचल प्रदेश, भारत।

ईमेल– kanwardineshsingh@gmail.com

मोबाइल- +919418626090

 

-0-

2.डॉ0 सुरंगमा यादव

  1

ग्रीष्म भौकाल

पंथी पंछी बेहाल

हुए निढाल

2

चीर कलेजा

दिखलाती धरती

मेघ पसीजा

3

हाँफता सूर्य

गर्मी की दोपहर

ढा कहर

4

ग्रीष्म उत्पात

आ ग बरसात

मिली निजात

5

सूर्य का कोप

घबरा उठी नदी

दुर्बल हुई

6

ग्रीष्म प्रचंड

बरसती अगन

तप्त पवन

7

ताप बढ़ाए

सूर्य उत्तरायण

रोष दिखाए

8

धूप चादर

गरमी में गरम

सर्दी में नर्म

-0-

डॉ0 सुरंगमा यादव,असि0 प्रो0   हिन्दी,महामाया राजकीय महाविद्यालय महोना

लखनऊ

dr.surangmayadav@gmail.com

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 26, 2018

1841

प्रिय साथियो  !

आज आपके साथ ई-पुस्तक के रूप में निम्न लिखित संग्रह साझा करा रहे हैं , आप पुस्तक के दिए गए नाम  पर क्लिक करके इन पुस्तकों को  पढ़ सकते हैं .

सम्पादक/ रचनाकार की अनुमति के बिना किसी सामग्री का उपयोग अन्यत्र नहीं किया जा सकता और न इन पुस्तकों के किसी  अंश का उपयोग आर्थिक लाभ  के लिए  किया जा सकता है  .यह शुद्ध  रूप से ज्ञानात्मक  यज्ञ है .

1चंदनमन ( हाइकु -संगह)-सं-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’.डॉ.भावना कुँअर

2मिले किनारे (ताँका -चोका -साझा संग्रह  ) रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, डॉ.हरदीप कौर संधु

3-भावकलश  ( हिन्दी  का प्रथम संपादित ताँका-संग्रह ) सं-रामेश्वर काम्बोज

‘हिमांशु’.डॉ.भावना कुँअर

4-यादों के पाखी हिन्दी  का प्रथम संपादित विषयाधारित हाइकु संग्रह )-सं-रामेश्वर

काम्बोज  ‘हिमांशु’.डॉ.भावना कुँअर , डॉ.हरदीप कौर संधु

5-अलसाई चाँदनी (प्रथम संपादित सेदोका -संग्रह ) सं-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’.

    डॉ.भावना कुँअर, डॉ.हरदीप कौर संधु

6-उजास साथ रखना (प्रथम संपादित चोका -संग्रह ) सं-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’.

डॉ.भावना, कुँअर, डॉ.हरदीप कौर संधु

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 17, 2018

1840

आज हिन्दी हाइकु की संस्थापिका एवं सम्पादक बहन  डॉ.हरदीप  सन्धु जी का जन्म दिन है IMG-20180513-WA0037।  पूरे हाइकु परिवार की और से कोटि-कोटि शुभकामनाएँ! हम सब आशा करते हैं  कि आप पुनः सक्रिय होकर इस हाइकु -परिवार को और समृद्ध करेंगी । काम्बोज

1-विभा रश्मि 

1

अमृतधार 

संवेदना  – वेदना 

अब बरसा । 

2

अमृतमय 

वाणी-जीते समर 

ओ रे अजय ।

3

अमृतवर्षा 

आकाश से झरती

प्यासी धरती ।

4

अमृत-स्वर 

कोकिल कंठ -पान 

हो महादान ।

5

अमृतरस 

जिह्वा  लिपटकर 

हो समरस  ।

6

अमृतपल 

जीवन हो सफ़ल 

मस्तक उठा ।

-0-

2-कृष्णा वर्मा

1

शब्द है लोरी

माँ के ममत्व से

बाँधती डोरी।

2

शब्द कीर्तन

बहे भक्ति-संगीत

जगाए प्रीत।

3

शब्द वे लौ

बुझते प्राणों को दे

आशा की टोह।

4

शब्द तो मंत्र

भूले को राह पर

लाए तुरंत।

5

शब्द है ज्ञान

भटके हुए मन

पाएं निर्वाण।

6

शब्द संबंध

मन से मन जोड़े

मिटाए द्वंद्व ।

7

शब्द हैं मीत

फूल रीझ मुस्काएँ

भौरों के गीत।

-0-

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 13, 2018

1839

डॉ.जेन्नी शबनम

1.

माँ की ममता

नाप सके जो कोई

नहीं क्षमता।

2.

अम्मा के बोल

होते हैं अनमोल

मत तू भूल।

3.

सब मानती

बिन कहे जानती

प्यारी प्यारी माँ।

4.

दुआओं भरा

खजानों का भंडार

माँ का अँचरा।

5.

प्रवासी पूत

एक नजर देखूँ,

माँ की कामना।

6.

घरौंदा सूना

पाखी-से उड़े बच्चे

अम्मा उदास।

7.

माँ ने खिलाया

हर एक निवाला

नेह से भीगा।

8.

हुलसा मन

लौटा प्रवासी पूत

माँ का सपूत।

9.

प्रवासी पूत

गुजर गई अम्मा

मिला न कंधा।

10.

माँ की मुराद

फूलों-सा मुस्कुराए

हमारा बच्चा।

-०

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 11, 2018

1837

1-मैं हूँ उद्गीत

-डॉ.कविता भट्ट

1

मैं हूँ उद्गीत

भँवर -से गाते हो

मुझे ओ मीत

2

मैं हूँ पाँखुरी

तुम रंग हो मेरा

सदैव संग

3

तुम प्रणव

मैं श्वासों की लय हूँ

तुम्हें ही जपूँ

4

प्रतीक्षारत

तापसी योगिनी मैं

तू योगीश्वर

5

शैल नदी -सी

प्रत्येक शिला पर

लिखा संघर्ष

6

प्रकृति आद्या

चेताए मानव को

तोड़ती भ्रम

7

दिग-दिगन्त

कुपित मानव से

फूटा रुदन

8

संध्या व भोर

ये प्रकृति नचाए

खींचती डोर

9

मद में चूर

मानव  की पिपासा

प्रकृति दूर

10

उमड़े ज्वार

मन समंदर में

भाटा -विचार

11

बाहर तूफाँ

मन के भीतर का

उससे भारी

12

मूल कारण

प्राकृतिक कोप का

अतिक्रमण

13

जो वीर वेश

तरु जूझे आँधी से

अब भी शेष

14

पाहन हूँ मैं

तुम हीरा कहते

प्रेम तुम्हारा

15

तुम हो  शिल्पी

प्रतिमा बना डाली

मैं पत्थर थी

-०-

2-उठा तूफान

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

उठा तूफान

झरे मन के पात

लगा आघात।

2

छोड़ गए वे

विजन में अकेले,

रहे जो साथ।

3

उड़ी घनेरी

घमंड- भरी धूल

आँखों में चुभी।

4

सिन्धु हो तुम

मैं तेरी ही तरंग

जाऊँगी कहाँ ?

5

छोडूँगी कैसे!

चाहे चाँद बुलाए

लिपटूँ तुझे।

6

सिन्धु उदास

सो गई हैं लहरें

कोई न पास।

7

उदास तट

खो गई है आहट

अँधेरी रात।

8

छोड़ो न हाथ

घुमड़ी हैं घटाएँ

सम्बल तुम्हीं।

9

आँधी झकोरे

डाल- पात बिखरे

तुम्हीं समेटो।

10

लिपटी लता

लाख आएँ आँधियाँ

तरु के संग।

11

टूटा जो पेड़

छोड़ गए थे पाखी

लता लिपटी।

12

तुम छा गए

मन- अम्बर पर

बन सौरभ।

13

कभी तो आओ

बाहें फैलाकरके

गले लगाओ ।

14

कभी जो मिलो

बन उर -कलिका

सदा ही खिलो।

15

एक ही रूप,

प्रभुवर हों मेरे,

या मेरा चाँद।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 11, 2018

1838

1-दिव्य प्रकाश
सत्या शर्मा ‘कीर्ति ‘

1

दिव्य प्रकाश
ज्योतिर्मय ब्रह्मांड
शुभ प्रभात ।
2
नीला आकाश
सुनहरी- सी धूप
दिव्य स्वरूप ।
3
चैतन्य मन
पुकारे बारंबार
शिव ओंकार ।
4
पवित्र मन
रोली अक्षत धूप
जैसा स्वरुप ।

5

मन- चंदन

हो गंगा- सा पावन

करें वंदन ।

6

मधुर वाणी

गूंजे शंख ध्वनि -सी

हृदयद्वार ।

-०-

2- माँ  के साये

 सीमा सिंघल, सदा 

1

माँ  के साये में

मन बचपन -सा

खिलखिलाए !

2

माँ की ममता

मुस्कान जीवन की

खुशियाँ बसें !

3

माँ दुआओं की

वर्षा करती जाती

भीगता मन !

4

अमृत  बूँद

माँ लगती मन को

तृप्त संसार !

5

माँ की छाया में

जीवन सँवरता

जाना न भूल !

-०-

3-नदिया सूखी

अजित महाडकर 

1

झरने सूखे

अजित महाडकर-

कैसे बुझाए प्यास

पौधे उदास l

2

नदिया सूखी

पेड -पौधे भी सूखे

किसान भूखे l

3

सूखा पड़ा है

ना पानी तालाब में

न ही  आँखों में l

4

घने बादल

आसमान पे छाए

पपीहा गाए l

5

सज -धजके

चाँद उभर आया

चमका साया l

6-

काले बादल

अँखियाँ भर आईं

उदासी छाई l

7

सुहाना समां

बरसते बादल

आओ ना पास l

-०- ajitmahadkar@gmail.com

६०४/शांतिवन,आज़ाद नगर १,ठाणे, महाराष्ट्र- ४००६०१

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 23, 2018

1836

 1-पृथ्वी -दिवस 

भावना सक्सैना

1

बेहाल धरा

सहे कृत्य -कुकृत्य

दग्ध हृदय।

2

माँ है ये धरा

सींच रक्त, स्वेद से

सहेजो इसे।

3

नदी जंगल

शुद्ध वायु विहीन

लगें श्रीहीन।

4

उखड़ी साँसें

माँगें सौम्य पवन

थका जीवन।

5

स्वेद धरा का

पोसता है जीवन

कृतज्ञ मन।

-0-

2-नारी-

डॉ0 सुरंगमा यादव

1

कामुक अंधे

घूम रहे बेखौफ

आज दरिंदे

2

कैसे हालात

बाला- वृद्धा -बच्चियाँ

झेलें संताप

3

युग बदला

बदले न दुष्कर्मी

ये हठधर्मी

4

नारी -विमर्श

पाए सही उत्कर्ष

रूढ़ियाँ तोड़ो

5

अग्नि- परीक्षा

फिर भी परित्यक्ता

बनी है सीता

6

मानवी हूँ मैं

धीरज धरा-सा है

परीक्षा बस

7

चारदीवारी

बनी सीलिंग फैन

घूमती नारी

8

विधवा नारी

अघोषित साध्वी-सी

बनी बेचारी

9

बनते शूर

नारी का अपमान

करते क्रूर

10

सचेत सीते

कितने ही मारीच

आज घूमते

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 20, 2018

1835

धूप कुंदन-लुभाए मन

डा. सुधा गुप्ता

डा. सुरेन्द्र वर्मा हिन्दी जगत में एक जाना माना नांम है। आप दर्शन-शास्त्र के गंभीर अध्येता हैं और अनेक विधाओं के रचनाकार हैं। एक ओर दर्शान एवं नीतिशास्त्र पर गंभीर लेखन, दूसरी ओर व्यंग्य, कविता, हाइकु जैसी विधाएँ। हाइकु लेखन में पर्याप्त प्रसिद्धि है। सर्वप्रथम श्री कमलेश भट्ट ‘कमल’ द्वारा संपादित “हाइकु-1999” में मैने डा. वर्मा के हाइकु पढ़े थे जिनमें उनका दर्शन झिलमिलाता था—

“मौत पर है / एक तीखी टिप्पणी / यह ज़िंदगी” और “सुख हमारे / भागती-सी शाम की / परछाइयां”

यथार्थ से जुदा एक यह हाइकु भी मुझे बहुत अच्छा लगा था–

“धरती पर / यदि टिके रहो तो / नभ छूलोगे”

उस समय तक उनकी हाइकु छंद में रची श्रमण सूक्तियाँ “सूक्तिकाएँ” प्रकाशित हो चुकी थी जो काफी चर्चित रही।

“धूप कुंदन” आकर्षक आवरण वाली एक सजिल्द पुस्तक है। ‘प्राक्कथन–हिन्दी हाइकु’ में हाइकुकार ने संक्षेप में इस विधा पर अपने सुलझे हुए विचार प्रस्तुत किए हैं। धूप कुंदन विविध वर्णी रचना है जिसमे अनुक्रम इस प्रकार है। 1.-हाइकु रचनाएँ। 2.-हास्य-व्यंग्य हाइकु। 3.-हाइकु पहेलियाँ। 4.-सुखन हाइकु। 5.-हाइकु-जापानी गूँज।

हाइकु रचनाओं के कुछ खूबसूरत हाइकु–

उगता चाँद / संग डूबता सूर्य / जीवन-मृत्यु

करकते हैं / जो पूरे नहीं होते / आँखों में स्वप्न

कितनी मौतें / भोगी मैंने, जीवन / एक इसी में

हाइकुकार अकेलेपन की पीड़ा को इस प्रकार अंकित करता है–

घिरती सांझ / घिरता सूनापन / जान अकेली

कभी डराता / कभी तसल्ली देता / अकेलापन

फरनीचर / भरा हुआ है घर / कितना खाली

मिट न पाया / भीड़ में रहकर / अकेलापन

हाइकुकार की यही दार्शनिक वृत्ति उसे जीवन के विभिन्न पक्षों को तटस्थ रह कर, एक दृष्टा की भाँति देखने को प्रेरित करती है। डा. वर्मा को प्रकृति से प्रेम है और उनकी कूची ने सुन्दर प्रकृति दृश्यों का चित्रांकन किया है–

पहने साड़ी / सरसों खेत खड़ी / ऋतू वासंती

फूले पलाश / कोयल बोले बैन / चैत उत्पाती

लुटाती मस्ती / बयार ये वासंती / फगुनहट (वसंत)

तपे आग में / अमलतास, टेसू / उतरे खरे

दस्तक देती / महक मोगरे की / खोलो कपाट (ग्रीष्म)

दबी धरा में / मुक्त हो गई गंध / स्वागत वर्षा (पावस)

नाचती हुई / गिरती हैं धरा पर / पीली पत्तियाँ

पग पग पर / पापड-सी टूटतीं / पीली पत्तियाँ (शिशिर)

एक शालीन साहित्यकार अपनी प्रणय भावना भी परिष्कृत रूप से अभिव्यक्त करता है। डा. वर्मा इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं–

तूम्हारा आना / दो पल रुक जाना / दो-दो वसंत

तुम आईं तो / धूप खिली आँगन / ऋतु बदली

याद तुम्हारी / सर्दियों में धूप-सी / आती सुखद

पन्नों में दबी / पीली पांखुरी गिरी / हो गई ताज़ी

प्राय: प्रत्येक संवेदनशील रचनाकार के जीवन में कभी न कभी ऐसा होता है कि यदि कोई विचार या भाव मन में आ जाए, जब तक अभिव्यक्त न हो जाए तो मन बेचैन हो उठाता है, नींद नहीं आती आदि। डा. वर्मा ने इसे यूं कहा है—

जगता रहा / हांइकु सारी रात / उचटी नींद

प्रतीकों का सुन्दर प्रयोग इस काव्य संग्रह की विशेषता है। प्रतीकार्थ ध्वनित होते ही अभिधार्थ बहुत पीछे छूट जाता है। अभिप्रेत अर्थ पूरी तरह पाठक को बाँध लेता है। —

लड़े जा रही / अपने ही बिम्ब से / मूर्ख चिड़िया

शिशु चिड़िया / को मोह रहा कब / फूटे अंडे से

प्यासा परिंदा / भरे घट तक आ / गिरा बेसुध

दबंग दिया / जलते रहने की / जिद में बुझा

‘हास्य व्यंग्य हाइकु’ पाठक का मनोरंजन करने में समर्थ हैं। शब्द से उत्पन्न चमत्कार दर्शनीय है–

मनहूसियत / ओढ़ कर पड़े हैं / श्री बोरकर

श्रीमती गंधे / उचकाती हैं कंधे / डालती फंदे

राजनीति के सन्दर्भ में श्लेषार्थ प्रकट होते ही ‘साहित्य’ का सौन्दर्य खिल उठता है–

गाय को मिली / रोटी अनुदान में / खा गया कुत्ता

सर्प नाचते / भैस बजावे बीन / ऋतु रंगीन

कुत्ता उसका / पूर्व जन्म का मित्र / पूंछ हिलाता

पहेलियाँ और सुखन हाइकु पढ़कर पाठक निश्चय ही अपने बचपन में लौट आता है। हाइकु जापानी गूँज के अंतर्गत जो हाइकु दिए गए हैं वे सीधे अनुवाद न होकर छायानुवाद / भावानुवाद हैं। अत: अनुगूँज की सार्थकता सिद्ध हो जाती है।

शीर्षक हाइकु से समापन करती हूँ, “लुभाए मन / जाड़े की सर्दी में / धूप कुंदन”। ‘धूप कुंदन’ हाइकु संग्रह सचमुच मन लुभाता है। अशेष शुभकामनाएँ।

धूप-कुंदन (हाइकु संग्रह) डा. सुरेन्द्र वर्मा / उमेश प्रकाशन / 100 लूकरगंज, इलाहाबाद / पृ.112 मूल्य, रु.125 / –

 डा. सुधा गुप्ता

120 बी / 2 साकेत, मेरठ (उ। प्र।)  

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