Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 18, 2021

2170

पखेरू

1-डॉ. जेन्नी शबनम

1.

नील गगन

पुकारता रहता –

पाखी, तू आ जा!

2.

उड़ती फिरूँ

हवाओं संग झूमूँ

बन पखेरू।

3.

कतरे पंख

पर नहीं हारूँगी,

फिर उडूँगी।

4.

चकोर बोली –

चन्दा छूकर आएँ

चलो बहिन।

5.

मन चाहता,

स्वतंत्र हो जीवन

मुट्ठी में विश्व।

6.

उड़ना चाहे

विस्तृत गगन में

मन पखेरू।

7.

छूना है नभ

कामना पहाड़-सी

हौसला पंख।

8.

झूमता मन,

अनुपम प्रकृति

संग खेलती।

-0-

2-सत चित आनंद

भावना सक्सैना

1

कृष्ण कृपालु

सत चित आनन्द

बस तुम ही।

2

सर्व कारण

परमेश्वर कृष्ण

भज रे मन।

3

श्यामल कांति

पीताम्बर हैं धारे

मात दुलारे।

4

दाऊ के साथी

गोपियों के दुलारे

नंद गोपाल।

5

तान वंशी की

ब्रज मण्डल भर

करे बावरी।

6

आत्म का ज्ञान

रहस्य जीवन का

बड़ा सहज।

7

नैनों में स्नेह

वात्सल्य करुणा भी

अद्भुत छवि।

8

वंशी की तान

दिव्य अलौकिक

ले जाए पार।

9

कितने विष्णु

गूढ़ रहस्य यह

सब न जानें।

10

वेदना पूर्ण

 विछोह परम का

मिलें तो कैसे ।

11

परम कृष्ण

पहचानो भक्ति से

छूटे बन्धन।

12

पूर्णावतार

सोलह कला स्वामी

परमेश्वर।

13

भटके आत्मा

कितने जन्मों तक

पाए न कृष्ण।

14

कृष्ण मोक्ष हैं

परम शक्ति वह

उन्हीं को ध्याओ।

15

जीवन ध्येय

भवबन्धन मुक्ति

भजो कृष्ण को।

16

नत मस्तक

सर्वस्व समर्पित

प्रभु के भक्त।

17

परम कृष्ण

शिव भक्तावतार

भक्ति में रत।

18

कितने लोक

इस भू से परे हैं

क्या जानें हम।

19

तुमको ध्याऊँ

सृष्टा, कर्ता, हरता

तुम हो कृष्ण।

20

परा अपरा

शक्तियाँ अलौकिक

जान अचंभा।

21

नेह सरिता

मैं करूँ आचमन

बनो कृपालु।

22

धेनु चरैया

साँवरा सलोना है

नन्दगोपाल।

23

दही माखन

ग्वाल बालों के संग

लीला रचाई।

24

राधा के प्रिय

मोर मुकुट धारे

कुंजन ठाड़े।

25

दिव्य बालक

देव करें दर्शन

नन्दगोपाल।

26

छूने को चरण

यमुना में उछाल

जाने रहस्य।

27

खुले बन्धन

सोए सब प्रहरी

मार्ग प्रशस्त।

28

मथुरा छोड़

निकले  वसुदेव  

घन गरजे।

29

समझूँ कैसे

आदि कारण रूप

बद्धजीव मैं।

30

सम्पूर्ण विश्व

परमेश्वर शक्ति

सारांश मात्र।

31

पूर्ण सदा ही

हो जनक शक्ति के

अति कृपालु।

32

सृष्टि विराट

पश्चात प्रलय के

लीन प्रभु में।

35

दिव्य गुण हैं

सत्ता विशुद्धतम

श्रीभगवान।

36

कंस पूतना

कितने ही असुर

किया उद्धार।

37

भक्त पुकारें

दौड़े आते हैं प्रभु

भक्त वत्सल।

38

कुंती कहती

कष्ट में संग प्रभु

कष्ट मीत हैं।

39

प्रभु कथा को

परीक्षित ने त्यागा

सब ऐश्वर्य।

40

अर्चा विग्रह

प्रभु रूप अनूप

सदा निहारूं।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 17, 2021

2169-प्राण-पखेरू

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु’

 1

प्राण -वर्तिका

निशदिन जलती

याद में तेरी।

2

प्राणहीन मैं

जब से छूटा हाथ

तुम्हारा साथ।

3

प्राण की रज्जु

मैंने बाँधी तुमसे

तुम जीवन !

4

नदी -किनारे

चक्रवाक युगल

प्राण विकल।

5

ब्रह्मरंध्र में

अनुनादित नाम

तुम्हीं हो प्राण !

6

द्रवित जल

उतरा शिखरों से

तुम्हीं तो हो न?

7

रक्त- शिराएँ

उद्वेलित हो उठीं

तुझे छू प्राण!

8

तुझमें डूबूँ

जब इस जग से

प्राण उड़ें ये।

9

तुम क्या जानों

जी लिया जो जीवन

प्राण तुम्हीं थे!

10

प्राण विकल

कब होगा तुमसे

महामिलन!

11

भारी अंधड़

तपता मरुथल

प्राण रुदन।

12

प्राण-पखेरू

उड़ा चीर अम्बर

काँपीं दिशाएँ

Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 12, 2021

2168

 डॉ. कविता भट्ट

1

शैल मुदित

IMG-20200409-WA0039जन्मी जो सुन्दर– सी

बिटिया नदी।

2

मंगलगान

ध्येय लोककल्याण

नदी महान।

3

तरु मुस्काए

मरुथल भी गाए

नदिया भाए।

4

धरा हर्षित

नदिया उद्गमित

जी पुलकित।

5

जीवन -थार;

पिय! तुम नदिया

अमृत-धार।

6

जग पाषाण;

बहें नदी समान-

स्त्रियाँ महान।

 7

नदी-संघर्ष

मूक-बधिर तट

तथापि हर्ष।

8

जीवन -शिला-

आपदा ने ढहाया

नदी का किला।

9

नन्दन वन-

सुरसरि जीवन

झाँको तो मन।

10

सुख सरिता-

ध्यान सुमुख धरो

शंकर पिता।

11

मन-अर्पण

जिन पग निकसी

गंगा पावन।

12

पार्वती रूठी

जटा शंकर धरे

गंगा अनूठी।

13

शिव सम्मुख

नतमस्तक गंगा

तोय-तरंगा।

14

प्रिया महान!

गंगा-सागर जाना

एक ही ध्यान

 15

मीलों चलती-

नदी– मन सागर-

प्रीत पलती।

16

डाकिया नदी

नित पर्वत चिठ्ठी

सागर देती।

17

निश्छल बहे-

नदी-सा गतिमान

जीवन रहे।

18

रहे शिखर-

हिम, सरित बन

अम्बर घन।

19

निष्ठुर प्रेमी-

सागर ने न बाँची

नदी की पाती।

20

पुण्य-सलिला

कृतघ्न को भी सींचे

उदारमना।

21

जीवन प्रश्न

थकेगा न हारेगा-

नदी-सा मन।

22

जागी लगन,

सागर से मिलन

नदी मगन।

 23

जड़ जगत

नदिया-सा जीवन

सदा चेतन।

24

है गतिशील

समाधिस्थ चलती

कोटिशः मील।

25

नदी महान-

सिखाए संघर्ष में

आनंदगान।

26

विनम्र साध्वी-

नभ से धरा तक

तू ऋषिकन्या!

27

मुक्त तरंगा-

जग तारणहार

पावन गंगा।

28

ओ जगदम्बे!

भव बाधा बहा दो

जाह्नवी गंगे।

29

गुंजायमान

सधे सुर नदी के

संगीत जान ।

30

मैं हूँ नदिया

तुम समुद्रशिला

फिर भी पाना ।

 31

चरण चूमे

प्यासी धरा नदी के

मगन घूमे ।

32

द्रवित होओ

कृतघ्न मत ठनो

नदी से बनो ।

33

गंगा महान

अमित प्रताप है

करें सम्मान।

34

झरती रहे

आशीष धरा पर

धरती रहे।

35

अमृतदान

प्रत्येक बूँद है री

गंगा महान।

36

मोक्षदायिनी

पुनः-पुनः जन्म लूँ 

तेरी ही धरा

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 10, 2021

2167

डॉ.भीकम सिंह

1

धूप की तल्ख़ी

खेतों के ज़ख़्म छिले

मेघ ही सिले।

2

खेतों की क्यारी

डूब गयी बाढ़ में

व्यवस्था हारी।

3

ये खेतिहर

कंधों पर ढोते मौन

स्वेद में तर।

4

है साहूकार

किसानों की बस्ती में

सहमे द्वार।

5

हल्की धूप से

महका पथवारा

कार्तिक आया।

6

लीप के भूसा

गेहूँ का बोरा चला

किसान छला।

7

संदेह जैसा

खरपात है फैला

खेतों ने झेला।

8

खेत ज़िद पे

रौ में ही बहे पानी

बनाई नाली।

9

मिट्टी का चूल्हा

प्रश्नों की आग झहे

कुटुंब सहे।

10

बंद करने

पुआल की उड़ाने

कसी कमाने।

11

ग्राम्य जीवन

मौसम पर निर्भर

रूठे अक्सर।

12

ओस ही बीने

चरवाहा हठीला

दूब से छीने।

13

मेघों से रूठी

खलिहानों पर टूटी

गुस्सैल हवा।

14

गन्ने की खोई

गुड़ कोल्हू सुखाता

गंध में धोई।

15

खेतों में घुसी

कोलतारी सड़के

स्वप्न भटके।

16

खेतों की रातें

गुदगुदी चाँदनी

करती बातें।

17

बिटौड़े उगे

गाँवों का कूबड़ ज्यों

भादों से दिखे।

18

फूँकनी फूँकी

माँ की  आँखें भरीं

रोटियाँ सूखी।

19

फूँकती है माँ

अंधे चूल्हे में आग

छेड़ते राग।

20

खाद बिखरी

खेतों में आ-आकर

शस्य निखरा।

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 7, 2021

2166

सागर/ पुष्पा मेहरा

1.

झील-2पूनो की रात

चाँद में खोना चाहे

सिन्धु बेताब।

2.

ताप से जले

द्रवित हिमशैल

सिधु में कूदे।

3.

थकी नदिया

सागर की गोद में

चैन से सोई।

4.

योग-निरत

तट पर दौड़ रहीं

सिन्धु लहरें।

5.

नदी को भाई

सिन्धु की गहराई

उसी में खोई।

6.

साँझ को देख

सिन्धु के आगोश में

सूर्य समाया।

7.

अंतर तक

रेत को भिगो गया

सिन्धु का नेह।

8.

छोड़के जाए

वासना का ज़हर

तट पर सिन्धु।

9.

पूनो की रात

चाँद का मुख धोने

दौड़ा सागर।

10.

झील-सी आँखें

सागर से मन में

माँगें पनाह ।

11.

श्रीदामा नदी

सिन्धु श्याम से भेंटी

श्याम हो गई।

12.

जीवन-सिन्धु

नित ही धडकता

मीन ये मन।

Pushpaa.mehra @gmail. com

-0-

2-रात्रि विशेष / रश्मि विभा त्रिपाठी

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पूर्णिमा-पर्व

रात के माथे सजा

चाँद का टीका

2

सो रहा जग

जागती निशा-वधू

चाँद आस में

3

सँझा के जाते

क्षितिज से उतरी

रजनी-परी

4

दिनावसान

चाँद-चूनर ओढ़ी

निशा-वधू ने

5

सोया संसार

चाँद करे शृंगार

निशा-वधू का

6

नवल गात

धवल चाँदनी में

नहाई रात

7

चाँद जो आए

अल्हड़ किशोरी-सी

निशा लजाए

8

चाँद ने छुआ

विभावरी का मुख

चमक उठा

9

तम रुलाए

रात प्रतीक्षा में है

चाँद आ जाए

10

मूँद लीं आँखें

चाँद को कैसे विदा

करती निशा

11

रात्रि-उत्सव

तारों की है पंगत

चन्द्रिका-भोज

12

अमा की घड़ी

जोह रही है निशा

चाँद की बाट

13

आँखों की कोर

जले रजनी-भोर

झरे अँजोर

14

अमा की घड़ी

अकेली रात खड़ी

तम-देहरी

15

अमा की घड़ी

घोर तम से लड़ी

अकेली रात।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 5, 2021

2165

डॉ. जेन्नी शबनम

1.

द्रौपदी-धरा

दुशासन मानव

चीर हरण।

2.

पाँचाली-सी भू

कन्हैया भेजो वस्त्र

धरा निर्वस्त्र।

3.

पेड़ ढकती

ख़ामोश-सी पत्तियाँ

रें न शोर।

4.

पीली पत्तियाँ

चुपके झरी, उगी

नई पत्तियाँ।

5.

पुराना भूलो

नूतन का स्वागत

यही प्रकृति।

6.

पत्तियाँ नाची

सावन की फुहार

पेड़ हर्षाया।

7.

प्रकृति हाँफी

जन से होके त्रस्त

देगी न माफ़ी।

8.

कैसा ये अंत

साँसें बोतल-बंद

खरीदो, तो लो।

9.

मानव लोभी

दुत्कारती प्रकृति –

कब चेतोगे?

10.

कोई न पास

साइकिल उदास,

गाड़ी ही ख़्वाब।

11.

विषैले प्राणी

विषाणु व जीवाणु

झपटे, बचो!

12.

पीके ज़हर

हवा फेंके ज़हर,

दोषी मानव।

13.

हवा व पानी

सब हैं प्रदूषित,

काया दूषित।

14.

दूरी है बढ़ी

प्रकृति को असह्य,

झेलो मानव।

15.

प्रकृति रोती

मानव विनाशक

रोग व शोक।

16.

असह्य व्यथा

किसे कहे प्रकृति

नर असंवेदी।

17.

फैली विकृति

अभिमानी मानव

हारी प्रकृति।

18.

दुनिया रोई

कुदरत भी रोई,

विनाश लीला।

19.

पर्यावरण

प्रदूषण की मार

साँसे बेहाल।

 

20.

धुँध या धुँआ,

प्रदूषित संसार,

समझें कैसे?

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 26, 2021

2164

भीकम सिंह

1

गाँवसोता यूँ गाँव

तपती दोपहरी

सिकोड़े छाँव।

2

गाँव  आ गए

शहरों के रस्ते में

कटे सस्ते में।                                                              

3

भोर को तान

साँझ कंधों पर ढोता

गन्ना किसान।

4

नहरें दूर

खेतों के गले सूखे

डीज़ल फूँकें।

5

खेत से बैल

दूर का रिश्ता हुआ

ताख पे जुआ।

6

स्तब्ध-सा खेत

ॠतुओं के खोखले

दावे को देख।

7

हाथ से पोंछा

ओस से भीगा दर्द

मौन अँगोछा।

8

मेघों के दल

खेतों में उतरे हैं

लेकर हल।

9

सूर्य से तनी

खेतों के कोर सूखे

आँखों में नमी।

10

रूठा ज्यों घन

दर्द से चटका त्यों

खेतों का तन।

11

स्वेद से भीगा

लूओं में खलिहान

शेष थकान।

12

सूखे खेतों से

गर्म निकली साँस

मुस्काई काँस।

13

कटा समूचा

खेत बँटवारे में

दर्द अनूठा।

14

हरे खेतों के

पीले पड़े चेहरे

बढ़े पहरे।

15

लीपे धूप में

देहरी और द्वार

खेत ओस में।

-0-

[चित्र;गूगल से साभार]

Posted by: हरदीप कौर संधु | मई 18, 2021

2163

आज आदरणीया डॉ.सुधा गुप्ता जी का जन्मदिन है। आप आज से 88 वें वर्ष में प्रवेश कर रही हैं। विश्व स्तर पर हाइकु, ताँका, चोका म हाइबन और सेदोका को गुणात्मक रूप से आपने स्थापित किया है। आपकी भाषा की गहनता पढ़कर ही जान सकते हैं। यह बात अलग है कि कुछ अकवि दरिद्र भाषा का के कारण इस विधा को प्रदूषित भी कर रहे हैं। हाइकु में काव्य को सँजोना केवल वही सृजक कर सकता है, जिसकी भाव-भूमि उदात्त हो, जिसका भाषा पर सुदृढ़ अधिकार हो । यह विशेषता आपकी रचनाओं के प्रमुख गुण हैं। सभी रचनाकारों और सहृदय  पाठकों की ओर से आपको कोटि-कोटि मंगलकामानाएँ!

[ डॉ. हरदीप कौर सन्धु, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ]

डॉ.सुधा गुप्ता

1

SUDHA GUPTAAनदिया रानी

यत्र-तत्र-सर्वत्र

चूनर  धानी।

2

नदी कछार

मँडराती चिड़ियाँ

खोजती कीड़े।

3

नदी किनारे

टिटिहरी न जाने

किसे पुकारे  !

4

नदी किनारे

सरकण्डों में छिपी

जल-कुक्कुटी।

5

नदी की छाती-

फटी, लोग कहते-

बाढ़  आ गई।

6

नदी निकली

झूमती-बलखाती

घुमक्कड़ी पे।

7

नदी,  पोखर

झिल्ली  झनकारती

अँधेरी रात।

8

तट पे जलीं

धू-धूकर आशाएँ

नदी उदास।

9

नदी  की  धार

बहते  जाते पत्ते

बड़े  लाचार।

10

नदी  न  रोती

सूखे  हैं सारे  आँसू

रेत  में   सोती।

11

नाव न  माझी

एकाकिनी तापसी

बहती गंगा।

12

बहती धारा

आगे बढ़ती जाए

छूटा किनारा।

13

ताप बढ़ेगा

हिम नद गलेंगे

बाढ़ बनेंगे।

14

रस की झारी

है नाना रूपधारी

जल मायावी।

15

न, कहीं न था

जल का ओर-छोर

श्वेत-चादर्।

16

गातीं चट्टानें

सरस जलगीत

निष्छल प्रीत।

17

मोती-सा जल

उर्मियाँ अविरल

पूत चरित्र।

18

जीवनदात्री

विष से भर डाली

माँ मन्दाकिनी।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | मई 16, 2021

2162-ॠताशेखर ‘मधु’ और हाइगा

ॠताशेखर ‘मधु] का हाइगा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान है। हिन्दी  का प्रथम हाइगा- संग्रह  2013 में [रंगीन चित्रों के साथ ] प्रकाशित हुआ। इस्के प्रकाशन का श्रेय आपको ही जाता है।   आप चुपचाप काम करने में विश्वास रखती हैं। उनके  बेजोड़ कार्य की  एक झलक आप सबके लिए प्रस्तुत है।‘ हिन्दी -हाइगा’ का ऑन लाइन  विमोचन 15 जून 2013 को रामेश्वर काम्बोज द्ब्रारा किया गया। पटना दूरदर्शन से 20 मार्च 2018 को लाइव कार्यक्रम भी ॠताशेखर ‘मधु’ ने प्रस्तुत किया।  प्रसिद्धि से कोसों दूर आप साहित्य-साधना में व्यस्त हैं। हिन्दी हाइकु आपके इस महत्त्वपूर्ण कार्य का सम्मान करता है।

1-IMG-20210516-WA0087

2--हाइगा सूची

-हाइगा सूची - Copy

 

3-IMG-20210516-WA0085

Posted by: हरदीप कौर संधु | मई 12, 2021

2161-नदी (हाइकु-संग्रहों से )

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

01-RAMESHWAR KAMBOJ HIMANSHUहेरते तट
नदी कब रुकी है
उफनी भागी।

2

नदियाँ सूखीं

उजड़े पनघट

गलियाँ मौन 1

3

नहाने आते

जब चाँद -सितारे

तट हर्षाते।

4

निर्मल जल

मिल गया कीच में

ख़ुद खो गया।

5

नेह के नीर!

हर लेना प्रिय की

तू सारी पीर।

6

पहाड़ी नदी-

बलखाती कमर

किसी मुग्धा की।

7

प्यास बुझेगी

मरुथल में कैसे

साथ न तुम !

8

तुम्हारा प्यार-

कल-कल करती

ज्यों जलधार।

9

दर्द  की नदी

पार करते बीती

पूरी ही सदी। [बन्द कर लो द्वार संग्रह से]

10

दुःख- नदी के

पार अगर जाना

सीखो मुस्काना।

11

दुःख की नदी

डूबकर पार की

तैर न सके।

12

नदी का तीर

हुआ निर्मल नीर

हर ली पीर ।

13

लहरें उठीं

तर हो गई धारा

भीगे किनारे।

14

शापित तट

अघा गए पीकर

जीवन-घट।

15

शीतल धारा

चूमती ही जा रही

प्यासा किनारा ।

16

तट की बाहें

थामे हुए गोद में

शिशु-तरंगें। [मेरे सात जनम-संग्रह से]

17

धरा का बल

नदियाँ कल-कल

गाते झरने ।

18

उफनी नदी

ढोरों -सी डकारती

उगले फेन।

19

पाप से भरीं

सह न पाईं बोझ

नदियाँ मरीं।

20

आँखों में बचा

नदियों में सूखा है

सारा ही पानी।( माटी की नाव)

-0-

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