Posted by: हरदीप कौर संधु | अप्रैल 5, 2020

2013-दीपक

1-डॉ.जेन्नी शबनम 

1.

आस्था का दीया
बुझने मत देना
ख़ुद के प्रति !

2.

देता सन्देश 

जल-जलके दीया-

रोशनी देना !

3.

मन का दीया
जल ही नहीं पाता
किसी आग से ! 

4.

नन्हा दीपक

बिन थके जलता 

हिम्मत देता !

5

दीपक जला 

मन खिलखिलाया 

उजास फैला !  

-0-

2-कृष्णा वर्मा

1

अँधेरी रात

जला एक दीपक

मिटेगा त्रास।

2

संकट-घड़ी

आस का दीप जला

हारेगी वृत्ति।

3

सहमीं  साँसें

प्रेरणा दीप जला

राहत बाँट!

4

प्रेम दीप से

क्रूर काल-क्रोध कोउग्रता

देना है  मात।

5

गा प्रेम-राग

दया का दीप जला

हरो संताप।

6

आपत्काल है

दिलों में उत्साह के

जला चिराग़।

7

रोशनी बाँटो

अपने पराए के

दुख को छाँटो।

-0-

3-गुंजन अग्रवाल

 1

जी भर जिया

बुझने से पहले

नन्हा-सा दीया

2

बुझ ही गया

ओसारे में जलता

बूढ़ा सा दीया 

3

अघोरी शिवा

जला आई दुआरे

मनौती दीया

4

दिवस मास

दीया बाती के साथ

पलती आस।

5

जला न बुझा

सुलगता ही रहा

प्रेम का दीया ।

6

नेह की बाती

अँधेरे को समेट

बाहें फैलाती।

7

उगता सूर्य

करता प्रज्वलित

कुपित धरा

8

सूर्य है अड़ाड़ा

दीपक प्रज्वलित

अँधेरा पड़ा।

9

थम जा वात

दीप से दीप जला

दीवाली रात। 

10

नभ से व्योम 

 जुगनू-से दमके 

असंख्य दीप।

11

देहरी-दीप

बाहर आपाधापी

भीतर पीप।

12

दीप शिखाएँ

कर जाती रोशन

घोर निशाएँ।

13

तोड़ डालेंगे

तम के सब बन्ध

दीपक नन्हे

14

दीपक तले

अगण्य तिमिर हैं

नाग ज्यूँ पले।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 2, 2020

2012-पुकारे जीव

कमला निखुर्पा

1

दूषित जल 

हवा है ज़हरीली 

रूठी प्रकृति ।

2

घरों में कैद

श्रेष्ठ मानव जाति

रुकी संसृति। 

3

नन्हा विषाणु

करे नरसंहार 

कैसी विकृति।

4

पुकारे जीव

जियो और जीने दो!

यही संस्कृति ।

                -0-

प्राचार्या, केन्द्रीय विद्यालय , पिथौरागढ़, उत्तराखण्ड

01 अप्रैल 2020

Posted by: हरदीप कौर संधु | मार्च 30, 2020

2011

1-सुदर्शन रत्नाकर

1

तेरे कारण

थम गया जीवन

अरे! कोरोना।

2

बढ़ी दूरियाँ

अपनों के भीतर

तेरे कारण।

3

युद्ध समान

लड़ना है सबको

तभी बचेंगे ।

4

चेत भी जाओ

नहीं हुई है देर

कहना मानो।

5

डरना नहीं

विश्वास है रखना

भाग जाएगा ।

6

स्वस्थ रहना

जीवन है जो जीना

रास्ता न कोई।

7

समझो बात

न निकलो बाहर

बचना है तो।

8

छोटा -सा जीव

सम्पूर्ण जगत ने

घुटने टेके

9

संकट घड़ी

भूल भेदभाव को

रक्षा करो न।

10

करता वार

कमजोर पे जल्दी

न जा बाहर।

11

सन्नाटा छाया

आदिकाल है आया

गुफ़ा में बैठे।

12

विपदा भारी

सबकी है लाचारी

ना घबराना ।

13

ध्यान लगाना

एकांत में रहना

अच्छा सोचना।

14

कगार पर

मिटने को सभ्यता

सम्भल जाएँ।

15

बदला लेती

दोहन का प्रकृति

जब भी छेड़ा।

16

बचाने वाले

बस ईश तुम्ही हो

हम पुकारें।

-0-

ई-29,नेहरू ग्राउण्ड,फ़रीदाबाद 121001

मो. न. 9811251135

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 27, 2020

2010

रमेश कुमार सोनी

Posted by: हरदीप कौर संधु | मार्च 23, 2020

2009-कोरोना-कहर

 1-सीमा सिंघल ‘सदा’

1

कुछ करो ना

जीने के लिये जंग

तुम करो ना !

2

पहल तेरी

सबको लाये साथ

तुम चलो ना !

3

स्वस्थ तन से

स्वस्थ मन से रहो

हट करो ना !

4

जीवन– मंत्र

सतर्क सदा रहो

जप करो ना  !

5

देश हित में

जन जन ये मानो

साथ चलो ना !

-0- sssinghals@gmail.com

 -0-

2-डॉ. पूर्वा शर्मा

 1

काश फैलता !

अमन-प्रेम ऐसे

कोरोना जैसे ।

2

मिले-दिखे ना

ये बेबस इश्क़ है

या है कोरोना ?

3

रोग से बचे

कभी करें सलाम

कभी नमस्ते ।

4

कुतर रहा

मूस बन कोरोना

विश्व का नक्शा ।

5

बड़ा घातक

परमाणु बम-सा

जीव कोरोना ।

6

विरह-अस्त्र

यही है हथियार

कोरोना पस्त ।

7

बचो, बचाओ

कोरोना की चपेट

मास्क लपेट ।

8

घातक साया

विश्व पे मँडराया

कोरोना– माया ।

9

निगल गया

विध्वंसक कोरोना

घर- नगर ।

10

रहे ज्यों जुदा

कोरोना को दे भगा

एकता दिखा ।

11

सूनी गलियाँ

कोरोना का कहर

बंद शहर ।

12

फिज़ा में फैला

कोरोना का ज़हर

थमा सफ़र।

13

रास्ते हैं चुप

दिन में भी सन्नाटा

जन भी मूक ।

-0-

3-सत्या शर्मा ‘ कीर्ति ‘

1

शुद्ध पवित्र

शाकाहार भोजन

भोग कटोरी।

2

करोना मार

अन्तर्भेदी चीत्कार

सभी लाचार ।

3

बंद घरों में

विषाणु के डर से

जन जीवन।

4

सिखाता वक्त

सात्विक हो भोजन

तुम करोना।

5

हैरान इंसाँ

सूक्ष्म सा विषाणु  है

नाच नचाए।

6

मासूम जीव

करतें  आर्त्तनाद

हत्या करो ना।

7

धरो हिम्मत

खत्म होगा करोना

तुम डरो ना।

8

करोना मार

मचा हाहाकार

सुनो चीत्कार।

9

सुनो ना प्रभु

करुण ये पुकार

सब लाचार।

10

मौत का टीका

करोना वायरस

हमें लगाए।

-0-

4-प्रीति अग्रवाल

1.
विपदा भारी
हे प्रकृति माता तू
क्षमा कर दे!
2.
रुष्ट प्रकृति
सहती कब तक
जग नादानी।
3.
सहनशक्ति
आखिर कब तक
धरा दर्शाती।
4.
प्यार -दुलार
हुआ बहुत अब
दंड की बारी!
5.
नियम टूटे
खिलवाड़ हो चुका
निर्णय क्षण!
6.
यूँ मनमानी
कब तक चलती
आखिर व्यापी।
7.
रूठे जब माँ
कयामत समझो
कैसे मनाएँ?
8.
सुना करते
प्रलय है निश्चित
धैर्य न छोड़ो !
9.
किया हमारा
परदे हुए फ़ाश
सामने आया।
10.
दिख रहा जो
केवल है ट्रेलर
पिक्चर बाकी!!
-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 20, 2020

2008-गौरैया

डॉ. जेन्नी शबनम

1.

ओ री गौरैया,

तुम फिर से आना

मेरे अँगना।

2.

चित्र-डॉ.नूतन डिमरी गैरोला

मेरी गौरैया

चीं चीं चीं चीं बोल री,

मन है सूना।

3.

घर है सूना,

मेरी गौरैया रानी

तू आ जा ना रे।

4.

लुप्त अँगना

सूखे ताल- पोखर

रूठी गौरैया।

5.

कंक्रीट फैला

कहाँ जाए गौरैया

घोंसला टूटा।

6.

प्यासी गौरैया

प्यासे ताल- तलैया

कंक्रीट-वन।

7.

बिछुड़ी साथी

हमारी ये गौरैया

घर को लौटी।

8.

झुंड के झुंड

सोनकंठी गौरैया

वन को उड़ी।

9.

रात व भोर

चिरई करे शोर

हो गई फुर्र।

10.

भोज है सजा

पथार है पसरा

गौरैया खुश।

11.

दाना चुगती

गौरैया फुदकती

चिड़े को देती।

12.

गौरैया बोली –

पानी दो घोंसला दो

हमें जीने दो।

13.

गौरैया रानी

आज है इतराती

संग है साथी।

14.

छूटा है देस

चली है परदेस

गौरैया बेटी।

15.

फुर्र- सी उड़ी

चहकती गौरैया

घर वीराना।

-0- पथार=सुखाने के लिए फैलाया गया अनाज

Posted by: हरदीप कौर संधु | मार्च 19, 2020

2007- डॉ.भगवतशरण अग्रवाल के दस हाइकु

डॉ.सुधा गुप्ता

डॉ.भगवतशरण अग्रवाल हिन्दी हाइकु कविता-संसार का एक बहु चर्चित, प्रशंसित एवं सुस्थापित नाम है। अपनी महत्त्वाकांक्षी योजनाओं को बनाने तथा उनके त्वरित कार्यान्वयन के लिए भी डॉ.अग्रवाल सुख्यात हैं। उनके कवित्व की सुगन्धि अनेक रूपों में फैली है। यहाँ मैं उनके हाइकुकार रूप की संक्षिप्त चर्चा कर रही हूँ।

डॉ.अग्रवाल हाइकु के सैद्धान्तिक पक्ष के तात्त्विक मार्मिक विश्लेषण के अतिरिक्त हाइकु की रचना में सिद्धहस्त हैं। हाइकु काव्य का गम्भीर अध्येता हो अथवा साधारण पाठक, सभी इस पर सहमत हैं कि हाइकु अपनी लघुकाया-मात्र सतरह वर्ण के छोटे से शरीर में कुछ ऐसा अवश्य लिए हैं जो बरबस मन को खींचता है-कुछ ऐसा संकेत जो पढ़ते ही मन को आह्लादित कर दे, उत्फुल्लता से भर दे – हाइकु की ऐसी वक्रता जो सहसा अर्थ को उद्घाटित कर पाठक-मन को चौंका कर रसप्लावित कर दे-पाठक का यह अनुभव कि बिना चेताए कोई लहर आकर उसे अपने साथ खींच कर, बहा कर ले गई है-यही है एक समर्थ-सफल हाइकु की पहचान, एक मात्र कसौटी! भारतीय काव्यशास्त्र में जिसे ‘ध्वनि-काव्य’ कहा गया है, ‘शब्द-शक्ति’ में जो ‘लक्षणा’ ‘व्यंजना’ की शक्ति है, ‘वाग्-वैदग्ध्य’ से जिस चमत्कार की सृष्टि होती है-हाइकु प्रथम बार पढ़ने में थोड़ा-सा अर्थ देकर, धीरे-धीरे खिलते फूल की भाँति भीतरी परत-दर-परत अर्थ खोलता चलता है-वही हाइकु उत्कृष्ट है।

डॉ.अग्रवाल के अब तक (यह आलेख लिखे जाने तक) पाँच हाइकु-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। उनका प्रथम हाइकु-संग्रह ‘शाश्वत क्षितिज’ हिन्दी हाइकु जगत का पहला संग्रह है जो ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। अपनी पसन्द के कुछ हाइकु यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ-

1- जोड़ता बच्चा / झड़े हुए पत्ते को / क्या कहूँ उसे?(शाश्वत क्षितिज, 13)

हाइकुकार आरम्भ करता है बच्चे से। बच्चा झरे हुए पत्ते को पुनः उसकी शाख से जोड़ना चाहता है और हाइकु की तीसरी पंक्ति समाप्त होती है-‘क्या कहूँ उसे’ से साधारण-सी बात, गहरे में छिपाए अर्थ का अनूठा आकर्षण लिए है- मनुष्य की मूढ़ता, अबोधता, अल्पज्ञता सभी कुछ है! बच्चे को क्या कहूँ? क्या हम सब इसी ‘असम्भव’ कोशिश में नहीं लगे हुए हैं? मानव मन में छिपा बैठा ‘बच्चा’ झड़े पत्ते को पुनः शाख से जोड़ना चाहता है। सुन्दर हाइकु है।

2- नदी हँसी थी / घरौंदे बनाने पै / मेरे-तुम्हारे (शाश्वत क्षितिज 182)

हाइकुकार शब्दों का ‘निपुण चयन कर्त्ता’ है। केवल ‘नदी हँसी थी’ कहकर एक हाइकु में इतना अर्थ भर दिया कि व्याख्या के लिए पूरा पृष्ठ भी कम रहेगा। मानव, जीवन भर यही तो करता है-बड़े मनोयोग से घरौंदा बनाता है और समय की नदी गुप-चुप हँसती रहती है … केवल कुछ क्षण का खेल और एक लहर आकर बहा ले जाती है। हँसी की व्यंजना-शक्ति अपूर्व है। नदी की हँसी घरौंदे की असारता,क्षणभंगुरता,व्यर्थश्रम की मूर्खता-सभी कुछ का पूरा अहसास करा देती है। मुझे अत्यंत प्रिय है-

3- फूल ने देखा / बड़ी हसरतों से / टूटते वक्त(टुकड़े-टुकड़े आकाश-123)

फूल का तोड़ा जाना सुनिश्चित है, ‘काल’ का माली आएगा और तोड़ कर ले जएगा किन्तु टूटते वक्त फूल ‘बड़ी हसरतों से’ देखता है-अधूरी इच्छाएँ, जीवन को मन भर जीने की ललक और टूट जाने की विवशता सभी कुछ हसरतों में समा गया है।

मानव जगत् और पशु-पक्षि-जगत् ही नहीं, बहुत नन्हे, नगण्य से जीव-जंगनू और मेंढक भी जिजीविषा के उद्दाम वेग में उल्लसित हो उठे हैं, इसका अनुभव बहुत कोमल भावनाओं वाला सहृदय कवि ही कर सकता है-

4- पावस-रात / पिकनित मनाते / नाचें जुगनू (शाश्वत क्षितिज्ञ- 189)

5- वर्षा के झोंके / बतियाते मेंढक / चाय-पकौड़ी (टुकड़े-टुकड़े आकाश – 110)

मानव ने अपनी कल्पना से पत्थर में ईश्वर (देवता) को गढ़ा, फिर उसे सर्वशक्तिमान नियंता मान कर उसी से मनचाही वस्तु माँगने लगा-यह उसकी कैसी ‘बुद्धिमानी’ है?

6- पहले गढ़े / पत्थरों से देवता / उन्हीं से भीख? (अर्घ्य, 30)

हाइकुकार के प्रश्न का उत्तर देना सरल नहीं है।

आज हमारे देश में चोरी-डकैती इस कदर बढ़ चुकी है कि हमारे देवालयों में ‘भगवान्’ तक सुरक्षित नहीं हैं — मन्दिरों से दुर्लभ मूर्तियों की चोरी की घटनाओं से इस तरह आतंकित कर दिया है कि प्रायः प्रत्येक मन्दिर में ‘शयन आरती’ के पश्चात् मुख्य पट बन्द कर, ताले जड़ दिए जाते हैं। हाइकुकार का आहत मन पूछता है-

7- आरती कर / ताले में बन्द किया / सो गए हरि?( टुकड़े-टुकड़े आकाश – 35)

‘सो गए हरि?’ की अबूझ व्यथा पृष्ठ-दर-पृष्ठ व्याख्या में भी नहीं समा पाएगी। एक सीधे-सादे भक्त का सरल सा सवाल है-‘सो गए हरि’? सुनो, ताले में बन्द होकर नींद आ जाती है न? समाज की विकृति जन्य मानसिकता से उत्पन्न विवशता को मनुष्य तो क्या, स्वयं भगवान् भी ढोने को मजबूर हैं——

सामाजिक विडम्बना ने ऐसी स्थिति ला दी है जिससे कभी न कभी, किसी न किसी बिन्दु पर मानव को ‘दो-चार’ होना ही पड़ता है-

8- जलता नीड़ / हवा दे रहे पत्ते / उसी पेड़ के (अर्घ्य-24)

मानव -जीवन की भयंकर त्रसदी-आजीवन श्रम से जो नीड़ बनाया था, जल रहा है (परिवारों की टूटन, संघर्ष और बिखरना) चलो, यह तो नियति का खेल था, जिसे होना ही था _ किन्तु सबसे बड़ा कटु सत्य जो असह्य है, वह यह कि आग को और-और भड़काने के लिए उसी पेड़ के पत्ते हवा दे रहे हैं। सचमुच प्रतीक रूप में दूर तक अर्थ फेंकते इस हाइकु की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। आज बड़े से बड़े उद्योगपति (अरब पति) और सामान्य से सामान्य गृहस्थ का यही नज़ारा है। रात-दिन जागकर, श्रम करके जिन संतान रूपी पत्तों को हरियाली से भरा, वही ‘नीड़’ को जलाने हेतु तत्परतापूर्वक ‘हवा दे रहे’ हैं।

9- तूफानी रात / पेड़ों पे जमी बर्फ / पंछी बेचैन (अर्घ्य-9)

शीत की जिन जानलेवा भीषण ठण्ड भरी रातों में मानव समाज का एक वर्ग, सुविधाजनक घरों को बन्द कर, मोटे बिछौने-रजाई-कम्बलों में सो रहा होता है, ऐसे में पंछी जिनका एक मात्र सहारा खुले आकाश के नीचे पेड़ों की डालियों में कुछ तिनकों से बना घोंसला होता है, तूफानी रात ने उसे तहस-नहस कर दिया, पेड़ों पर बर्फ जम गई ऐसे में पंछी की बेबसी और छटपटाहट शोचनीय है। दूसरे अर्थ में ‘पंछी’ सर्वहारा वर्ग की ओर संकेत करता जो आज भी ‘बे घर’ होते हुए सड़क के किनारे, फुटपाथ पर या डिवाइडर पर आँधी-पानी में रात बिताने को बाध्य है।

भारत ऋतुओं का देश है जिसमें ‘वसन्त’ का महत्त्व सर्वोपरि है। सभी जानते हैं कि ‘शिरीष’ का वसन्त विलम्ब से आता है। वसन्त की सुषमा से जब प्रकृति लक-दक हो उठती है, तब ‘शिरीष’ पत्ते गिरा कर खड़ा रहता है, कुछ सूखी फलियाँ (छिम्मियाँ) लटकी रहती हैं। मैंने उसी स्थिति पर ‘शिरीष’ पर तंज कसते हुए एक हाइकु लिखा था-

नंगे बदन / शिरीष का वसन्त / सूखी छिम्मियाँ (तरु देवता)

फिर मुझे पढ़ने को मिला डॉ.अग्रवाल का हाइकु-

10- फागुन भर / पैंजनी बजाती रही / शिरीष-फली (टुकड़े-टुकड़े आकाश-123)

वाह। क्या कल्पना है। कवि की सकारात्मक सोच एवं संवेदनशीलता देखते ही बनती है। जिसे मैंने ‘सूखी छिम्मियाँ’ कह कर नकार दिया, दुत्कार दिया वही सूखी छिम्मी भावुक कवि की ‘पैंजनी’ बन गई। मैंने स्वयं अपना तिरस्कार किया-तुम स्वयं को कवि मानती हो? व्यर्थ —- बिल्कुल व्यर्थ —– एक तो पत्रहीन शिरीष की खिल्ली उड़ाई ‘नंगे बदन’ कहकर दूसरे उसकी झुर्रियाँ और सिलवटों को ‘सूखी छिम्मी’ बना कर उपहास का पात्र बनाया —- देखो —- एक सच्चा भावुक संवेदनशील हृदय उन सूखी फलियों से पैंजनी बना कर वसन्तोत्सव मना रहा है —कवि-हाइकुकार डॉ.भगवत शरण अग्रवाल अपनी भावयित्री और कारयित्री प्रतिभा से ऐसी सर्जना करते हैं जो नमन के योग्य हैं।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 18, 2020

2006

1-डॉ.अर्पिता अग्रवाल

1

बरसा पानी

मेघों की गोद भरी

बही नदिया

2

बादल रूठे

सूखा अंत:स्थल तो

फटी धरती

3

आया सैलाब

छोड़े बालू के टीले

खेत बंजर।

4

रंग-बिरंगे 

महक रहे फूल

जीवंत मन

5

हँसी जो हवा

झरे हरसिंगार

सजी धरती

6

अल्हड नदी

संगमरमर पे

नाचती चली

7

कच्छ का रण

चाँदनी रेत पर

रात्रि उत्सव

-0-

2-डॉ.शिवजी श्रीवास्तव

Posted by: हरदीप कौर संधु | मार्च 17, 2020

2005-वसन्त

कमला निखुर्पा

1

द्वार पे खड़ा

फूलों के हार लिए

छैला बसंत।

2

मची है धूम

बहकी है कलियाँ

नाचे बगिया।

3

कोई सरसों

कोई टेसू सी लाल

अबीरी गाल।

4

चंचल हवा

करे मीठी ठिठोली 

पंखुरी झरी।

5

लगाए टेर

कोयल बड़बोली

सुने सहेली।

6

खुली की खुली

पलकें न झपकीं

न्यारा बसंत।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 15, 2020

2004-हाइगा

पूर्वा शर्मा

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