Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 17, 2018

1840

आज हिन्दी हाइकु की संस्थापिका एवं सम्पादक बहन  डॉ.हरदीप  सन्धु जी का जन्म दिन है IMG-20180513-WA0037।  पूरे हाइकु परिवार की और से कोटि-कोटि शुभकामनाएँ! हम सब आशा करते हैं  कि आप पुनः सक्रिय होकर इस हाइकु -परिवार को और समृद्ध करेंगी । काम्बोज

1-विभा रश्मि 

1

अमृतधार 

संवेदना  – वेदना 

अब बरसा । 

2

अमृतमय 

वाणी-जीते समर 

ओ रे अजय ।

3

अमृतवर्षा 

आकाश से झरती

प्यासी धरती ।

4

अमृत-स्वर 

कोकिल कंठ -पान 

हो महादान ।

5

अमृतरस 

जिह्वा  लिपटकर 

हो समरस  ।

6

अमृतपल 

जीवन हो सफ़ल 

मस्तक उठा ।

-0-

2-कृष्णा वर्मा

1

शब्द है लोरी

माँ के ममत्व से

बाँधती डोरी।

2

शब्द कीर्तन

बहे भक्ति-संगीत

जगाए प्रीत।

3

शब्द वे लौ

बुझते प्राणों को दे

आशा की टोह।

4

शब्द तो मंत्र

भूले को राह पर

लाए तुरंत।

5

शब्द है ज्ञान

भटके हुए मन

पाएं निर्वाण।

6

शब्द संबंध

मन से मन जोड़े

मिटाए द्वंद्व ।

7

शब्द हैं मीत

फूल रीझ मुस्काएँ

भौरों के गीत।

-0-

 

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Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 13, 2018

1839

डॉ.जेन्नी शबनम

1.

माँ की ममता

नाप सके जो कोई

नहीं क्षमता।

2.

अम्मा के बोल

होते हैं अनमोल

मत तू भूल।

3.

सब मानती

बिन कहे जानती

प्यारी प्यारी माँ।

4.

दुआओं भरा

खजानों का भंडार

माँ का अँचरा।

5.

प्रवासी पूत

एक नजर देखूँ,

माँ की कामना।

6.

घरौंदा सूना

पाखी-से उड़े बच्चे

अम्मा उदास।

7.

माँ ने खिलाया

हर एक निवाला

नेह से भीगा।

8.

हुलसा मन

लौटा प्रवासी पूत

माँ का सपूत।

9.

प्रवासी पूत

गुजर गई अम्मा

मिला न कंधा।

10.

माँ की मुराद

फूलों-सा मुस्कुराए

हमारा बच्चा।

-०

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 11, 2018

1837

1-मैं हूँ उद्गीत

-डॉ.कविता भट्ट

1

मैं हूँ उद्गीत

भँवर -से गाते हो

मुझे ओ मीत

2

मैं हूँ पाँखुरी

तुम रंग हो मेरा

सदैव संग

3

तुम प्रणव

मैं श्वासों की लय हूँ

तुम्हें ही जपूँ

4

प्रतीक्षारत

तापसी योगिनी मैं

तू योगीश्वर

5

शैल नदी -सी

प्रत्येक शिला पर

लिखा संघर्ष

6

प्रकृति आद्या

चेताए मानव को

तोड़ती भ्रम

7

दिग-दिगन्त

कुपित मानव से

फूटा रुदन

8

संध्या व भोर

ये प्रकृति नचाए

खींचती डोर

9

मद में चूर

मानव  की पिपासा

प्रकृति दूर

10

उमड़े ज्वार

मन समंदर में

भाटा -विचार

11

बाहर तूफाँ

मन के भीतर का

उससे भारी

12

मूल कारण

प्राकृतिक कोप का

अतिक्रमण

13

जो वीर वेश

तरु जूझे आँधी से

अब भी शेष

14

पाहन हूँ मैं

तुम हीरा कहते

प्रेम तुम्हारा

15

तुम हो  शिल्पी

प्रतिमा बना डाली

मैं पत्थर थी

-०-

2-उठा तूफान

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

उठा तूफान

झरे मन के पात

लगा आघात।

2

छोड़ गए वे

विजन में अकेले,

रहे जो साथ।

3

उड़ी घनेरी

घमंड- भरी धूल

आँखों में चुभी।

4

सिन्धु हो तुम

मैं तेरी ही तरंग

जाऊँगी कहाँ ?

5

छोडूँगी कैसे!

चाहे चाँद बुलाए

लिपटूँ तुझे।

6

सिन्धु उदास

सो गई हैं लहरें

कोई न पास।

7

उदास तट

खो गई है आहट

अँधेरी रात।

8

छोड़ो न हाथ

घुमड़ी हैं घटाएँ

सम्बल तुम्हीं।

9

आँधी झकोरे

डाल- पात बिखरे

तुम्हीं समेटो।

10

लिपटी लता

लाख आएँ आँधियाँ

तरु के संग।

11

टूटा जो पेड़

छोड़ गए थे पाखी

लता लिपटी।

12

तुम छा गए

मन- अम्बर पर

बन सौरभ।

13

कभी तो आओ

बाहें फैलाकरके

गले लगाओ ।

14

कभी जो मिलो

बन उर -कलिका

सदा ही खिलो।

15

एक ही रूप,

प्रभुवर हों मेरे,

या मेरा चाँद।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 11, 2018

1838

1-दिव्य प्रकाश
सत्या शर्मा ‘कीर्ति ‘

1

दिव्य प्रकाश
ज्योतिर्मय ब्रह्मांड
शुभ प्रभात ।
2
नीला आकाश
सुनहरी- सी धूप
दिव्य स्वरूप ।
3
चैतन्य मन
पुकारे बारंबार
शिव ओंकार ।
4
पवित्र मन
रोली अक्षत धूप
जैसा स्वरुप ।

5

मन- चंदन

हो गंगा- सा पावन

करें वंदन ।

6

मधुर वाणी

गूंजे शंख ध्वनि -सी

हृदयद्वार ।

-०-

2- माँ  के साये

 सीमा सिंघल, सदा 

1

माँ  के साये में

मन बचपन -सा

खिलखिलाए !

2

माँ की ममता

मुस्कान जीवन की

खुशियाँ बसें !

3

माँ दुआओं की

वर्षा करती जाती

भीगता मन !

4

अमृत  बूँद

माँ लगती मन को

तृप्त संसार !

5

माँ की छाया में

जीवन सँवरता

जाना न भूल !

-०-

3-नदिया सूखी

अजित महाडकर 

1

झरने सूखे

अजित महाडकर-

कैसे बुझाए प्यास

पौधे उदास l

2

नदिया सूखी

पेड -पौधे भी सूखे

किसान भूखे l

3

सूखा पड़ा है

ना पानी तालाब में

न ही  आँखों में l

4

घने बादल

आसमान पे छाए

पपीहा गाए l

5

सज -धजके

चाँद उभर आया

चमका साया l

6-

काले बादल

अँखियाँ भर आईं

उदासी छाई l

7

सुहाना समां

बरसते बादल

आओ ना पास l

-०- ajitmahadkar@gmail.com

६०४/शांतिवन,आज़ाद नगर १,ठाणे, महाराष्ट्र- ४००६०१

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 23, 2018

1836

 1-पृथ्वी -दिवस 

भावना सक्सैना

1

बेहाल धरा

सहे कृत्य -कुकृत्य

दग्ध हृदय।

2

माँ है ये धरा

सींच रक्त, स्वेद से

सहेजो इसे।

3

नदी जंगल

शुद्ध वायु विहीन

लगें श्रीहीन।

4

उखड़ी साँसें

माँगें सौम्य पवन

थका जीवन।

5

स्वेद धरा का

पोसता है जीवन

कृतज्ञ मन।

-0-

2-नारी-

डॉ0 सुरंगमा यादव

1

कामुक अंधे

घूम रहे बेखौफ

आज दरिंदे

2

कैसे हालात

बाला- वृद्धा -बच्चियाँ

झेलें संताप

3

युग बदला

बदले न दुष्कर्मी

ये हठधर्मी

4

नारी -विमर्श

पाए सही उत्कर्ष

रूढ़ियाँ तोड़ो

5

अग्नि- परीक्षा

फिर भी परित्यक्ता

बनी है सीता

6

मानवी हूँ मैं

धीरज धरा-सा है

परीक्षा बस

7

चारदीवारी

बनी सीलिंग फैन

घूमती नारी

8

विधवा नारी

अघोषित साध्वी-सी

बनी बेचारी

9

बनते शूर

नारी का अपमान

करते क्रूर

10

सचेत सीते

कितने ही मारीच

आज घूमते

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अप्रैल 20, 2018

1835

धूप कुंदन-लुभाए मन

डा. सुधा गुप्ता

डा. सुरेन्द्र वर्मा हिन्दी जगत में एक जाना माना नांम है। आप दर्शन-शास्त्र के गंभीर अध्येता हैं और अनेक विधाओं के रचनाकार हैं। एक ओर दर्शान एवं नीतिशास्त्र पर गंभीर लेखन, दूसरी ओर व्यंग्य, कविता, हाइकु जैसी विधाएँ। हाइकु लेखन में पर्याप्त प्रसिद्धि है। सर्वप्रथम श्री कमलेश भट्ट ‘कमल’ द्वारा संपादित “हाइकु-1999” में मैने डा. वर्मा के हाइकु पढ़े थे जिनमें उनका दर्शन झिलमिलाता था—

“मौत पर है / एक तीखी टिप्पणी / यह ज़िंदगी” और “सुख हमारे / भागती-सी शाम की / परछाइयां”

यथार्थ से जुदा एक यह हाइकु भी मुझे बहुत अच्छा लगा था–

“धरती पर / यदि टिके रहो तो / नभ छूलोगे”

उस समय तक उनकी हाइकु छंद में रची श्रमण सूक्तियाँ “सूक्तिकाएँ” प्रकाशित हो चुकी थी जो काफी चर्चित रही।

“धूप कुंदन” आकर्षक आवरण वाली एक सजिल्द पुस्तक है। ‘प्राक्कथन–हिन्दी हाइकु’ में हाइकुकार ने संक्षेप में इस विधा पर अपने सुलझे हुए विचार प्रस्तुत किए हैं। धूप कुंदन विविध वर्णी रचना है जिसमे अनुक्रम इस प्रकार है। 1.-हाइकु रचनाएँ। 2.-हास्य-व्यंग्य हाइकु। 3.-हाइकु पहेलियाँ। 4.-सुखन हाइकु। 5.-हाइकु-जापानी गूँज।

हाइकु रचनाओं के कुछ खूबसूरत हाइकु–

उगता चाँद / संग डूबता सूर्य / जीवन-मृत्यु

करकते हैं / जो पूरे नहीं होते / आँखों में स्वप्न

कितनी मौतें / भोगी मैंने, जीवन / एक इसी में

हाइकुकार अकेलेपन की पीड़ा को इस प्रकार अंकित करता है–

घिरती सांझ / घिरता सूनापन / जान अकेली

कभी डराता / कभी तसल्ली देता / अकेलापन

फरनीचर / भरा हुआ है घर / कितना खाली

मिट न पाया / भीड़ में रहकर / अकेलापन

हाइकुकार की यही दार्शनिक वृत्ति उसे जीवन के विभिन्न पक्षों को तटस्थ रह कर, एक दृष्टा की भाँति देखने को प्रेरित करती है। डा. वर्मा को प्रकृति से प्रेम है और उनकी कूची ने सुन्दर प्रकृति दृश्यों का चित्रांकन किया है–

पहने साड़ी / सरसों खेत खड़ी / ऋतू वासंती

फूले पलाश / कोयल बोले बैन / चैत उत्पाती

लुटाती मस्ती / बयार ये वासंती / फगुनहट (वसंत)

तपे आग में / अमलतास, टेसू / उतरे खरे

दस्तक देती / महक मोगरे की / खोलो कपाट (ग्रीष्म)

दबी धरा में / मुक्त हो गई गंध / स्वागत वर्षा (पावस)

नाचती हुई / गिरती हैं धरा पर / पीली पत्तियाँ

पग पग पर / पापड-सी टूटतीं / पीली पत्तियाँ (शिशिर)

एक शालीन साहित्यकार अपनी प्रणय भावना भी परिष्कृत रूप से अभिव्यक्त करता है। डा. वर्मा इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं–

तूम्हारा आना / दो पल रुक जाना / दो-दो वसंत

तुम आईं तो / धूप खिली आँगन / ऋतु बदली

याद तुम्हारी / सर्दियों में धूप-सी / आती सुखद

पन्नों में दबी / पीली पांखुरी गिरी / हो गई ताज़ी

प्राय: प्रत्येक संवेदनशील रचनाकार के जीवन में कभी न कभी ऐसा होता है कि यदि कोई विचार या भाव मन में आ जाए, जब तक अभिव्यक्त न हो जाए तो मन बेचैन हो उठाता है, नींद नहीं आती आदि। डा. वर्मा ने इसे यूं कहा है—

जगता रहा / हांइकु सारी रात / उचटी नींद

प्रतीकों का सुन्दर प्रयोग इस काव्य संग्रह की विशेषता है। प्रतीकार्थ ध्वनित होते ही अभिधार्थ बहुत पीछे छूट जाता है। अभिप्रेत अर्थ पूरी तरह पाठक को बाँध लेता है। —

लड़े जा रही / अपने ही बिम्ब से / मूर्ख चिड़िया

शिशु चिड़िया / को मोह रहा कब / फूटे अंडे से

प्यासा परिंदा / भरे घट तक आ / गिरा बेसुध

दबंग दिया / जलते रहने की / जिद में बुझा

‘हास्य व्यंग्य हाइकु’ पाठक का मनोरंजन करने में समर्थ हैं। शब्द से उत्पन्न चमत्कार दर्शनीय है–

मनहूसियत / ओढ़ कर पड़े हैं / श्री बोरकर

श्रीमती गंधे / उचकाती हैं कंधे / डालती फंदे

राजनीति के सन्दर्भ में श्लेषार्थ प्रकट होते ही ‘साहित्य’ का सौन्दर्य खिल उठता है–

गाय को मिली / रोटी अनुदान में / खा गया कुत्ता

सर्प नाचते / भैस बजावे बीन / ऋतु रंगीन

कुत्ता उसका / पूर्व जन्म का मित्र / पूंछ हिलाता

पहेलियाँ और सुखन हाइकु पढ़कर पाठक निश्चय ही अपने बचपन में लौट आता है। हाइकु जापानी गूँज के अंतर्गत जो हाइकु दिए गए हैं वे सीधे अनुवाद न होकर छायानुवाद / भावानुवाद हैं। अत: अनुगूँज की सार्थकता सिद्ध हो जाती है।

शीर्षक हाइकु से समापन करती हूँ, “लुभाए मन / जाड़े की सर्दी में / धूप कुंदन”। ‘धूप कुंदन’ हाइकु संग्रह सचमुच मन लुभाता है। अशेष शुभकामनाएँ।

धूप-कुंदन (हाइकु संग्रह) डा. सुरेन्द्र वर्मा / उमेश प्रकाशन / 100 लूकरगंज, इलाहाबाद / पृ.112 मूल्य, रु.125 / –

 डा. सुधा गुप्ता

120 बी / 2 साकेत, मेरठ (उ। प्र।)  

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 17, 2018

1834

1-कृष्णा वर्मा

1

सिरजे चाँद

पगड़ंडियों पर

प्रेम की रास।

2

रात हो शांत

बैठ करे चंदा से

बातें एकांत।

3

सोने ना देतीं

महकती हवाएँ

प्रीत जगाएँ।

4

प्रीत के धागे

चंदा से नैन लगे

रजनी जागे।

5

कहे चाँद से

रात, भरो खलाएँ

पास आ जाएँ।

6

होती जो डोर

चंदा, खींच ले आती

अपनी ओर।

7

तम सन्नाटे

दुख सुख बाँटते

कर के बातें।

8

चाँद शालीन

निशा की बातें सुन

हुआ विलीन।

-0-

2-प्रियंका गुप्ता

1

भैया पराया

ताना देती बहना

शादी के बाद ।

2

मोह के धागे

कलाई पर बाँधे

विदेशी भैया ।

3

साथ न छूटे

खूब हुई लड़ाई

भैया न रूठे ।

4

आओगे तुम

बैठी थाल सजाए

इंतज़ार में ।

5

पीले पत्ते- सा

झर रहा था प्यार

गीली मिट्टी में ।

6

गुलाब बोया

फूल तो झर गया

काँटे हैं बाकी ।

7

आँखों में डूबी

फिर नहीं उबरी

दिल की कश्ती ।

8

सच्चा या झूठा

कोई न बता पाए

आँखों के सिवा ।

-0-

3-रमेश कुमार सोनी , बसना [ छ.ग. ]

1

कोई आएगा

गुलमोहर झरे

कौवा पुकारे ।

2

रिश्तों के गाँव

सदा लम्बी है छाँव

रुतबा बड़ा ।

3

शहर बँटा

घर , मेरा -तुम्हारा

टोला उनका !!

4

खौफ में घर

बस्ती में आग लगी

विश्वास जला ।

5

कर्ज बैंकों के

शौक पूरा कराते

उम्र गिरवी ।

6

समस्या जिन्दा

दफ्तरी फाइलों में

अर्जी ना मर्जी ।।

7

पैसा चाबुक

जग है घोड़ागाड़ी

ऐश सवारी ।

-0-

4-पुष्पा मेहरा

1

लहरें ऊँची

सीमा के बाहर हो

सुनामी बनें ।

2

पूनो की रात

मचल रहा सिन्धु

चाँद के लिए ।

3

तम विरोधी

तेजोमय पतंग

सिन्धु में छिपा ।

4

फिरे जो दिन

रवि-किरण-बाण

तम को काटें ।

5

मन -मछली

इन्द्रियों के ताल में

आनन्द पाती ।

6

देवालयों की

बजाई घंटी ,पर

अन्तस् ना जागा ।

7

शंकालु मन

चुरा रही हैं आँखें

एक दूजे से ।

8

पढ़ते रहे

प्रेम की परिभाषा

गुन ना सके ।

9

आदर्श वाक्य

ग्रन्थों–पटों पे लिखे

पढ़े,ना गुने !!

10

जीवन -मठ

आनन्द से भर दो

जागो !चेतना ।

11

वक़्त का फेरा

प्रेम,दया–करुणा

हुए लापता !!

12

तम की बेड़ी

कटेगी तो दिखेगा

आकाश मेरा ।

-0-Pushpa .mehra @gmail.com

-0-

5- नरेंद्र श्रीवास्तव

1
शब्द काँटे ज्यूँ
गुलाब के जैसे भी
छूकर देखो।
2

मीठे बोलों से
घुली कड़वाहट
रिश्ते चंदन।
3

चुभते तीर
ज़बान सँभालना
बनते घाव।

4
प्रेम की भाषा
मरहम लगाता
मिटते घाव।

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मार्च 19, 2018

1833

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी की कलम गहन संवाद करती सब नवीनता लिये हुए है। आपके हाइकु बिम्ब विषय वस्तु को साकार करने में सक्षम हैं। आपकी हर रचना पढ़ते एक मनोहारी दृश्य साकार हो जाता है। आज आदरणीय रामेश्वर जी का जन्म दिन है। इस मंगलमय अवसर पर हम हिंदी हाइकु- परिवार के समस्त परिजनों की ओर से हार्दिक शुभकामनाऍं  भेजते हैं । सुख समृद्धि और स्वास्थ्य संजोए! जन्म दिन मंगलमय हो! 

आसान हो हर राह , हर राह हो खुशियाँ। हर पल हो  अति सुंदर , फूल खिलें मन-मन्दिर ! 

आप के लिए मेरी कलम आज कुछ ऐसा कह रही है  –
Rameshwar Kamboj Himanshu's profile photo, Image may contain: 1 person
धुप सोच ‘चों झरै कण- कण                   
झोली पवै चानण ही चानण 
 
मुझे ऐसा लग रहा है जैसे –

खुला आसमाँ 

वृक्ष तले समाधि 

करुणा जागी 

 हाइकु रचनाकारों तथा पाठकों की तरफ़  से आप को कोटि- कोटि शुभ कामनाएँ !
डॉ हरदीप कौर सन्धु 
Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 18, 2018

1832

1-कमला निखुर्पा

1

भरी -भरी थी

बदरा की अँखियाँ

बही नदियाँ ।

2

छप्प से गिरी

चपला गगन से

टूटी ,बिखरी ।

3

छलक उठा

सरवर का जाम

नशीली धरा ।

4

इक कोंपल

नन्ही-सीदो  कलियाँ

उगा हाइकु ।

5

गाए बरखा

रिमझिम के गीत

 बिजुरी नाचे।

-०-

2-कृष्णा वर्मा

1

भोर के कान

रात बीती कहता

प्रहरी चाँद।

भोर सुरूर

दमकी वसुंधरा

फूलों पे नूर।

-0-

3-पूर्वा शर्मा

1

सर्पिणी यादें

चिपकी लिपटी- सी

कहीं न जाती ।

2

शुष्क पात की

स्वर्ण झाँझर बाँधे

शाख थिरके ।

3

पुष्पों से लदी

पात रहित शाख

सुन्दर सजी ।

4

मन मोहती

पलाश पर बैठी

कूहू कूकती ।

5

चढ़ा है रंग

तेरी प्रीत का ऐसा

सूर्ख पलाश ।

6

गरबा घूमे

बवंडर में पात

डोलती फिरें ।

7

तेरी यादों में

नैनों से दिल तक

दरिया बहे ।

8

किसे निहारूँ ?

दोनों ही मनोहारी-

तुम औ चाँद ।

9

हैवानियत

ऐसी, नन्हीं कली भी

लहूलुहान ।

10

चल तन्हाई

चलें यहाँ से दूर

यहाँ कोई है !

-0-

purvac@yahoo.com

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मार्च 8, 2018

1831

1-कमला घटाऔरा

1

शाश्वत सत्य

एक नूर उसका

रौशन जग ।

2

आगत पल

जाने केवल वक्त

सोच क्यों करें ?

3

रिश्ता जन्मों का

मुड़ मुड़ मिलाता

कशिश- भरा

4

क्षितिज को छू

सिन्धु पाई नीलिमा

दिव्य मिलन ।

5

चूमके माथा

जगा गई भोर को

मात-रजनी ।

6

फैली लालिमा

आँखे मलती ऊषा

कहे- सोने दो ।

7

धूप कुँवरी

खड़ी पहाड़ पर

झरे स्वर्णाभा।

8

आओ सैलानी

राह तके धूपल

सिन्धु किनारा ।

-0-

2- डॉ ज्योत्सना सिंह

1

प्रभु नमन

तुम्हें अर्पण करूँ

श्रद्धा सुमन

2

मष्तिष्क पर

कविता केसर का

लगाऊँ टीका

3

ज्ञान दीपक

बना के प्रभु मुझे

स्वीकार करें

4

मेरी अर्चना

दरकता विश्वास

जोड़ती रहे।।

5

कंगाली भूख

निगल रही वासी 

सूखी रोटियाँ

6

व्याकुल भूख

तृप्ति पर लुटाती

ढेरों आशीष 

डॉ ज्योत्सना सिंह,(असिस्टेंट प्रोफेसर,जीवाजी युनिवर्सिटी)

सी 111 गोविन्दपुरी,ग्वालियर मध्यप्रदेश 474011

singh.jyotsna73@gmail.com>

-0-

3-विभा  रश्मि

1

पाल नौकाएं

समुद्र में अंधेरे 

लगातीं फेरे ।

2

समुद्र पुत्र 

मछुआरे कर्मठ 

जाल – रसरी । 

3

चंचल तन 

मौजें  हैं  नृत्यांगना

गंभीर मन ।

4

सोने – रूपा के

लपेटे हैं सितारे 

सुख – नज़ारे ।

5

चाँद जा बैठा 

अंक में लहरों के 

शिशु हिंडोला  ।

6

सूर्य रसरी 

नीरधि में पसरी 

बाँधा नेह में ।

7

गीत हैं गातीं

वेग से लहरातीं

फेन उड़ातीं । 

8

निर्मल मन

चाहतों की अगन 

प्रेयसी तीर ।

9

तकती रहूँ

नश्वर  ये  सौंदर्य

सहेजी  स्मृति  ।

-0-

4-मनीषा सक्सेना

1

स्वयं गलत

तर्क दे समझौता

दिल निगोड़ा

2

भूले न गलती

न रखे याद सही

बोझिल दिल

4

औरों की खुशी

स्वयं दिल दुखाये

रिश्ता निभाये

5

दिल की ठेस

माफी से भी ना जाए

माफी ही मांगे

 -0-

मनीषा सक्सेना

जी-१७ बेल्वेडीयर प्रेस कम्पाऊंड

मोतीलाल नेहरु रोड

इलाहाबाद २११००२

manisha.mail61@gmail.com

-0-

5-सुनीता शर्मा

1

प्रखर नारी 

असीमित संघर्ष 

कभी न हारी

2

कोरा आसमां

 मरुस्थल जमीन 

नारी जीवन 

3

बेटी मुस्कान 

मंगल मृदुगान

सबकी आशा

4

खुद्दारी जीती

आधुनिक कविता 

नारी नारीत्व

5

हरसिंगार 

आनंद दायिनी 

जग जननी

6

नारी सुमेधा

तन-मन वसुधा

मन हर्षाती

7

नारी चलती

जीवन पगडंडी

छाले छुपाती

8

रिश्ते संजोती

माँ-बहन-बेटी

घर संवारे

-0-

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