Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 16, 2018

1883-पतंग

कमला  निखुर्पा

1

मैं तो पतंग

डोर तेरे हाथों में

खोजूँ अनंत ।

2

कागद अंग

लागा नेह का रंग

उड़ी पतंग ।

3

संयम डोर

थाम उड़ चली मैं

क्षितिज ओर ।

4

मन पतंग

हौसलों की उड़ान

देखे जहान।

5

हवा भी कहे

सारथी बनूँ मैं भी

झोंके जो सहे।

-0-

(15.12.2018)

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Posted by: हरदीप कौर संधु | दिसम्बर 8, 2018

1882

1-कृष्णा वर्मा

1

अर्थहीन हैं

जीवन की साँझ में

मुहैया सुख।

2

क्या वो सम्बन्ध

दुख में हो लोप

सुख में संग।

3

एँ त्योहार

मन हो सतरंगी

उत्सवी द्वार।

4

कैसे अजूबे

विकास की नैया में

बैठके डूबे।

5

र्ष्या का मारा

पाली हैं उदासियाँ

इंसाँ बेचारा।

6

क्या समझाना

स्व: का हुआ ज़माना

प्यार निमाणा।

7

शत्रु जो ऐंठे

तरकश के तीर

चुप क्यों बैठें।

8

दूर देश से

जोड़े जीवन नाते,

 उलझे खाते।

9

उल्टा व्यापार

छपके न बिकते

बिकके छपें।

10

बड़े क्या हुए

हँसी कहकहे तो

सब खो गए।

11

मोह की खूँट

बाँध ममता- खूँटा

स्वयं को लूटा।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 4, 2018

1881-विशेषांक [160 हाइकु ]

 [वर्णक्रमानुसार]

अलाव–सा है,/सर्द रात पीड़ा में /स्पर्श तुम्हारा। डॉ.कविता भट्ट

इतनी सर्दी ! / कोहरे की बेदर्दी / झेलें गरीब । सुभाष लखेड़ा

इन्द्रधनुष / सतरंगी है  झूला / झूलती धूप । शशि पाधा

उखड़ी साँस / आफत का मारा -सा / घूमे शिशिर । डॉ.शैलजा सक्सेना

उतार फेंकी / बादल की पोशाक / क्वार नभ ने । डॉ.सुधा गुप्ता

उफ्फ ये जाड़ा / सूरज भी दुबका / ओढ़ रजाई । सुभाष नीरव

ओस की रात /मोती सम चमके / वृक्ष ,पत्तियाँ । शान्ति पुरोहित

कभी तो चखो /सर्दी में हलुवे -सी / मेरी प्रीत है। डॉ.कविता भट्ट

कम्बल ओढ़े / ठिठुरता काँपता / सूर्य झाँकता । प्रियंका गुप्ता

करती रही / धूप से गपशप / चाय की प्याली । डॉ.सुधा गुप्ता

काँपता भोला / सिमटती बुधिया / शीत- लहर । भावना सक्सेना

काँपे कोहरा /जाड़ों की दुपहरी /सूर्य न आया  । डॉ.सरस्वती माथुर

कुहासा देख / कहाँ छिपा सूरज / गर्मी का शेख  सुशीला शिवराण

कैसे कटेगी / रात फुटपाथ पे / सोचता जाड़ा । डॉ.शैलजा सक्सेना

कैसे हैं भाग / तन शीत जकड़े / उदर आग। डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

कोहरा घना / दिन है अनमना / काँपते पात। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

कोहरा छाए / भूली -बिसरी बातें / याद दिलाए । सुभाष लखेड़ा

कोहरा ढके /अठखेलियाँ सारी/प्रिय -संग की । डॉ.कविता भट्ट

खटका द्वार / थरथराता पिल्ला / माँगता ताप । पुष्पा मेहरा

खिली शारदी  / चन्द्रमा की टिकुली / लगाए माथ । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

खुश अलाव /सुनता रात भर /कथा कहानी  ।रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

खो गए पंछी / कोहरे के पथ में / ढूँढते नीड़ । शशि पाधा

गर्म लिहाफ़/ आँखों में निरन्तर/स्वप्न -शृंखला। डॉ.कविता भट्ट

गुलाबी धूप / मोहिनी धरणी का / निखरा रूप । सुशीला शिवराण

चाकू चलातीं / ये पहाड़ी हवाएँ / चुभें तन में । रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

चाय की प्याली / मीत बनी सबकी / इठला रही । रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

चूमें तुषार / कोमल कुसुमों के / नर्म कपोल  । कृष्णा वर्मा

छाया कुहरा /प्रभात से है रूठा /आज रवि । डॉ.क्रान्ति कुमार

छीन न लेना /एक ही लिहाफ है  / तेरी प्रीत का। डॉ.कविता भट्ट

छुईमुई-सी / चुप मिले अकेली / धूप सहेली । डॉ.हरदीप कौर सन्धु

छोटे- से दिन / पलक छूमंतर / बीते न रात । शशि पाधा

जाड़े की धूप / गुनगुनाए गीत / कुनकुने- से । डॉ. हरदीप कौर सन्धु

जाड़े की रात / खुद को पा अकेला / चाँद भी रोया । ॠता शेखर ‘मधु’

जाड़े में रंक / फुटपाथ पे सोया / चुप से रोया । ॠता शेखर ‘मधु’

जीवन भर / अँगीठी -सी सुलगी /मन क्यों सीला। डॉ.कविता भट्ट

झील दर्पण / सिंगार कर झाँकी / शरद लक्ष्मी । डॉ.सुधा गुप्ता

टूटा छप्पर / कम्बल न रजाई / निर्धन कुटी । भावना सक्सेना

ठंड का हुक्म / धूप हुई घर में / नज़रबंद । रचना श्रीवास्तव

ठिठुरन में / सुख दे गई खूब / पूस की धूप । डॉ.सतीशराज पुष्करणा

ठिठुरा तन / एक प्याली चाय से / तृप्त है मन। ॠता शेखर ‘मधु’

ठिठुरी धरा /जम गईं नदियाँ /वायु -पहरा। गुंजन अग्रवाल

ठिठुरी धूप / मुँडेर चढ़ बैठी / बच्ची-सी ऐंठी। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु

ठिठुरी रात / किटकिटाती दाँत / कब हो प्रातः। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

डालता चौक / आँसू भीगी पातियाँ / माघ डाकिया। डॉ.सुधा गुप्ता

तिल की बर्फी / तिलकुट सम्भार / माघ त्योहार। डॉ.सुधा गुप्ता

तुम्हारा आना / सर्दी में लिहाफ-सा/साँसें दहकी। डॉ.कविता भट्ट

तुम्हारा प्रेम- / गरीब को अलाव  / मात्र सहारा। डॉ.कविता भट्ट

दिखे न कहीं / धूप ने ली शायद / आज की छुट्टी । रचना श्रीवास्तव

दिन चढ़ा है / शीत -डरा सूरज /सोया पड़ा है । डॉ.सुधा गुप्ता

दिन सिहरा / बादलों की चादर / छिड़कें बूँदें । अनिता ललित

दुबकी बैठी / घोंसले में गौरैया / पंख दबाए । डॉ.भावना कुँअर

देश की धूप / थपथपाए तन/ माँ का प्यार । डॉ.सुधा ओम ढींगरा

देश-रक्षा में /सर्द- शृंगार मेरा/मन तपता । डॉ.कविता भट्ट

दौड़ लगाएँ / धूप के खरगोश / हाथ न आएँ । डॉ.भावना कुँअर

धरती ने ली / शीत से फुरहरी / माँगा दोशाला । डॉ.सुधा गुप्ता

धरा ने बाँधी  / सफ़ेद नर्म गाती /  आस्माँ से माँगी । डॉ.जेन्नी शबनम

धुंध का घेरा / चढ़कर सूर्य पे / खाए उजाला । डॉ. हरदीप कौर सन्धु

धुंध ही धुंध  / बजती घंटियाँ दें / दिशा का बोध । रेखा रोहतगी

धूप आवारा / छुप करके बैठी / हाथ न आए । रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

धूप का रंग / चमकता आँखों में / सपना बन । तुहिना रंजन

धूप -जल में / आँखें मूँद नहाते / ठिठुरे पंछी । डॉ.सुधा गुप्ता

धूप जाँचती / ॠतुओं की शाला में / जाड़े की कॉपी। पूर्णिमा वर्मन

धूप -टुकड़ा / नैनों में सींच लिया / अंकुर फूटा । कमलेश चौरसिया

धूप सेंकती / गठियाए घुटने / वृद्धा सर्दी  के । डॉ. उर्मिला अग्रवाल

नदियाँ क्लांत / ओढ़े श्वेत लिहाफ /शांत हो सोईं । कृष्णा वर्मा

नभ से गिरी / पुष्प के होंठ छूने / बिंदास ओस । ज्योत्स्ना प्रदीप

नहीं दिखता / क्यों अपना पराया / कोहरा घना । अनुपमा त्रिपाठी

निखरी धूप /जाती हुई ज़िन्दगी /फिर  जी उठी । गुंजन अग्रवाल

नेह गायब / ठिठुरते सम्बन्ध / हम अकेले । डॉ.शैलजा सक्सेना

नेह तुम्हारा /सर्दी की धूप जैसा/उँगली फेरे। डॉ.कविता भट्ट

पड़ा है पाला / फसलें बेरौनक / चिन्ता गहरी । रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

पर्वत श्रेणी / धारे हैं हिम टोप / खेलें धुंध से । पुष्पा मेहरा

पसर गई /सरसों फूली शय्या / माघ की धूप । डॉ.भगवतशरण अग्रवाल

पाँव अकड़े / घुटने भी जकड़े / शीत डराए । रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

पीली साड़ी में / माघ मेला घूमेगी / लाडो सरसों । डॉ.सुधा गुप्ता

पूष की रातें/पिया तू सीमा पर /सिहरें तन । डॉ.कविता भट्ट

पूस की रात / ठिठुरती हवाएँ / दस्तक देतीं । डॉ.भगवतशरण अग्रवाल

पूस की रात / न बीती आज तक / बीते सौ पूस । प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

पौष की भोर / हरे शनील पर / बिखरे मोती । डॉ.सुधा गुप्ता

प्रेम-अगन/अनोखे आलिंगन/बर्फीली सर्दी। डॉ.कविता भट्ट

फिर बुनूँगी / याद के धागों से / स्वेटर अनूठे । डॉ.शैलजा सक्सेना

फोड़ी किसने / कोहरे की गागर / जीना दूभर । डॉ.भावना कुँअर

बंद तिजोरी / सूरज -हाथ चाबी / जाड़े की धूप । शशि पाधा

बच्चों को भाए /रूई -सा हिम,रचें /हिम मानव। –डॉ. सुधा ओम ढींगरा

बर्फ  की पाल/ बिछाके गया कौन / सब हैं मौन । डॉ.भावना कुँअर

बर्फ  -लिहाफ़/ ओढ़ खड़े पर्वत /संत- से लगे । डॉ.सरस्वती माथुर

बर्फ़ गिरे /शीशे -जड़ी प्रकृति /छुई न जाए। डॉ. सुधा ओम ढींगरा

बर्फ -चादर/ कली– सी सिमटती/देह की शोभा। डॉ.कविता भट्ट

बर्फीली भोर/ प्रिय-उष्णता–रश्मि/ कली-सी खिले । डॉ.कविता भट्ट

बर्फीली वर्षा /शीशे -सी चमका दे /सर्दी में धरा । डॉ. सुधा ओम ढींगरा

बर्फीली हवा / लो आ गई सताने / ले के बहाने । डॉ.भावना कुँअर

बर्फीली हवा/ पेड़ों पे कृशदेह/लटकी -झूले । डॉ.कविता भट्ट

बूढ़ा मौसम / लपेटे है कम्बल / घनी  धुंध का । रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

भोर ने ओढ़ा / कोहरे का दुपट्टा / धूप नाराज़ । कृष्णा वर्मा

मंजिले वही /कुहासे  ने निगले /डगर सभी । सुनीता अग्रवाल

मन पाषाण / बर्फीली संवेदना / कोहरा घना । कमला निखुर्पा

माघ आह्लाद / ताजा गुड़ की गंध / गाँव आबाद । डॉ.सुधा गुप्ता

माघ की छटा / नाच रहीं फसलें / घूँघट उठा । डॉ.सुधा गुप्ता

माघ की माया / नवान्न से भर दी / खेतों की काया । डॉ.सुधा गुप्ता

माघ की वर्षा / धराशायी हो गई / चना-फसल। डॉ.सुधा गुप्ता

माघ तरुण / ले मटर दुल्हिन / आया है घर । डॉ.सुधा गुप्ता

माघ बेचारा / कोहरे की गठरी / उठाए फिरे। डॉ.सुधा गुप्ता

माघ महिमा / शिल्पी तराश रहा / नव्य प्रतिमा। डॉ.सुधा गुप्ता

माघ हरषा / हरे शाक-पत्र की / कर दी वर्षा । डॉ.सुधा गुप्ता

माघ है क्रोधी / बर्फ  से नहलाई / धरती रो दी । डॉ.सुधा गुप्ता

माघ-अम्बर / उड़ी फिरें पतंगें / भरें उमंगें। डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

माघ-कटार  / निष्प्राण कर गई / फूल क्यारियाँ। डॉ.सुधा गुप्ता

मौसम संग / बदले अपने रंग / दम्भी सूरज । सुशीला शिवराण

रात काँपती / रजाई में दुबकी / भोर ठिठकी । डॉ.जेन्नी शबनम

रातों ने ओढ़ी / कोहरे की चादर / चाँद ठिठुरा । कमला निखुर्पा

रुई के फ़ाहे / ढाँपी प्रकृति सारी  /सर्दी का हिम । डॉ. सुधा ओम ढींगरा

रूठ के बैठा / बिसराकर  सुध/सूर्य है ऐंठा । गुंजन अग्रवाल

रूठा है रवि / छुपें लोग ग्रीष्म में / अब प्यार क्यों ? ज्योतिर्मयी पन्त

रूठी है धूप / बादलों में छुपी / मनाऊँ कैसे ? अनुपमा त्रिपाठी

रोती रहती / बिन माँ की बच्ची- सी / पूस की धूप । डॉ.सुधा गुप्ता

लजाई धूप/पलकें ना उठाए/नव वधू -सी. । डॉ.कविता भट्ट

लजीली धूप / सिमटी सिकुड़ी सी / बैठी ओसारे । डॉ.उर्मिला अग्रवाल

लपेटे हुए / कोहरे की चादर / धूप सो रही । प्रियंका गुप्ता

लाठी टेकता / सूरज यूँ गुजरा / ज्यों बूढ़ा बाबा । डॉ.जेन्नी शबनम

लिपटी धुंध / भयावह लगती / जाड़े की रात । ॠता शेखर ‘मधु’

शर्मीली धूप / कोहरे में से छने / सिंदूरी रंग । डॉ. हरदीप कौर सन्धु

शांत निर्मल / ज्यों सज्जन का मन / क्वार- गगन । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

शिकारे मौन / हो गए हैं उदास /जमी झील में । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

शीत आतंक / हवा रूप बदले / मारती डंक । कृष्णा वर्मा

शीत ॠतु में / बारिश की बौछारें / चुभें शूल -सी । अनिता ललित

शीत की धूप / माँ -सी लिपटकर / दे कोसा प्यार । कृष्णा वर्मा

शीत की मारी / पेट में घुटने दे / सोई है रात । डॉ.सुधा गुप्ता

शीत के दिनों / सर्प -सी फुफकारें /चले हवाएँ । डॉ.हरदीप सन्धु

शीत -प्रकोप /डरे, छुपे रवि के /सातों ही घोड़े । डॉ.क्रान्ति कुमार

शीत लहर / अदरक की चाय / गरम चुस्की । शशि पुरवार

शीत शरद /तुम बिन बैरी हो /कटु मुस्काए। डॉ.कविता भट्ट

शीतनिशा है /जीवन का संघर्ष  /तू रवि- रश्मि॥ डॉ.कविता भट्ट

शैतान जाड़ा / सबको है रुलाए / फिर भी भाए । डॉ.जेन्नी शबनम

श्वेत पंखुरी / रूई -सा झरे हिम / पूजे धरा को । ज्योतिर्मयी पन्त

सरकाकर / कोहरे का परदा / झाँके सूरज । रचना श्रीवास्तव

सर्द जंगल   / फुफकारती हवा / माघ नागिन । नीलमेन्दु सागर

सर्द रातों में / ओढ़ लेती है हवा / बर्फ ही बर्फ  । मंजु मिश्रा

सर्द लहर / ठिठुरती है काया / कहाँ हो धूप ? अनिता ललित

सर्द विरह,/सैनिक-प्रियतम/सर्दी की धूप । डॉ.कविता भट्ट

सर्द हवाएँ /करती  अट्टहास /काँपती धरा। सुनीता अग्रवाल

सर्दी की धूप / शरमाकर झाँकती / छिप-छिपके । अनिता ललित

सर्दी की धूप / शीतल तुम बिन / बर्फ  के जैसी । उमेश मोहन धवन

सर्दी की भोर / सहमी शरमाई / नव वधू-सी । मंजु मिश्रा

सर्दी में ली थी / गरमी में लौटाई /उसने धूप । डॉ.कविता भट्ट

सिहरी काँपी / बदली -सी वेदना / आज बरसी । शशि पाधा

सीना तान के / बर्फ  ओढ़के खड़ा / मौन शिखर । देवी नागरानी

सूरज ओट / छिप गईं किरनें / आँख-मिचौली । शशि पाधा

सूरज कहाँ ? / खोजते हलकान / सुबहो- शाम । रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

सूर्य को ढाँपे / एक मोटा बादल / खुद भी काँपे । डॉ.कुँवर दिनेश सिंह

सूर्य से कुट्टी / खोल दी है धुँध ने / गुस्से में मुट्ठी । डॉ.भावना कुँअर

सोच में बैठी / कैसे लाऊँ मैं दाना / ऐ धुंध जा ना । डॉ.भावना कुँअर

सोयी कलियाँ /सुख -भरी निंदिया/धुंध रजाई । सुनीता अग्रवाल

स्पर्श तुम्हारा  / भिखारी को कम्बल  / शीत-प्रतीक्षा। डॉ.कविता भट्ट

हँसी-ठहाके / कभी बिसरी यादें / आँखों में पानी । रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

हठीली धूप / भाव खाए कितना / पाकर रूप । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

हवा उड़ाए /कोहरे की चादर /सर्दी की भोर। डॉ.सरस्वती माथुर

हाथ में चाय / ओढ़ कम्बल , टोपी / बुढ़ापा बैठा । देवी नागरानी

हिम उतरा / ठुमक-ठुमक के / घाटी की गोद । कृष्णा वर्मा

हिम रुई -सा /बर्फ शीशे- सी दिखे / फिसलें ,गिरें । डॉ.सुधा ओम ढींगरा

हुआ लाचार / तन-मन पे भारी / चिल्ले की मार । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 28, 2018

1880

1- डॉ जेन्नी शबनम

1.

मन सोचता –

यह जीवन है क्या ?

अर्थ ढूँढता।

2.

बसंत आया

रिश्तों में रंग भरा

मिठास लाया।

3.

याद-चाशनी

सुख की है मिठाई

मन को भायी।

4.

फिक्र व चिन्ता

बना गए दुश्मन,

रोगी है काया।

5.

वक्त की धूप

शोला बन बरसी

झुलसा मन।

6.

सुख व दुख

यादों का झुरमुट

अटका मन।

 7.

खामोश बही

गुमनाम हवाएँ

ज्यों मेरा मन।

8.

मैं सूर्यमुखी

तुम्हें ही निहारती

तुम सूरज।

9.

मेरी वेदना

सर टिकाए पड़ी

मौन की छाती।

10.

छटपटाती

साँस लेने को

बीमार हवा।

 (23. 11. 18)

-0-

पुष्पा मेहरा

1.

प्रिय की याद

नित आ-आ-सताती,

वैरी मन की!

2.

मन जुड़ाती

कभी आग बनती

याद बरफ ।

3.

पास आ बैठे

कैसे छल करके

गायब हुए

4.

बहते आँसू

सिसकती धरती

सहती पीर।

5.

एक आशियाँ

सपनों का सुहाना

पल में टूटा।

6.

निष्ठुर हवा

दर्द नहीं समझी

टूटे पत्तों का।

7.

हवा खा रही

गंध भरे झकोरे

विष से भरे।

8.

आनन्द घन

सुषुप्ति का दरिया

तेरा आँचल!

9.

तट पर बैठी

कैसे खोलूँ कपाट

तेरे दर के !

10.

जीवन फूल

एक–एक पंखुरी

झरती रही।

11.

बीतती साँझ

नेह समेट, बाती

टिमटिमाती ।

12.

रिश्ते हमारे

झुर्रियों की तरह

सिमट रहे ।

13.

तमन्ना यही

छूटे ना साथ, जैसे

चाँद–चाँदनी ।

14.

साँझ की लाली

डूबते सूरज की

अमिट छाप ।

15.

सारा जीवन

धूप झेलती रही

साँझ को छाया ।

16.

एक आदमी

आम, मैं ही तो हूँ

कुचला हुआ !

-0-

3-नरेंद्र श्रीवास्तव

1

प्रेम दर्पण
मेरे चेहरे में भी
तुझे ही देखूँ।
2
प्रेम पागल
सोते-जागते में भी
तुझसे बातें।
3
प्रेम समीर
बहती आसपास
तेरी खुशबू।
4
प्रेम-पपीहा
अकेलेपन में भी
मिलन गीत।
5
प्रेम नदी में
बहते चले गए
तट न मिला।
-0-

पलोटन गंज ,गाडरवारा,487 551,जिला -नरसिंहपुर म.प्र.
मोबा.9993278808

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 24, 2018

1879

1-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

नेह से भरे

गंगा नहाके आए

मृदु वचन।

2

भोर  मुस्काई
मुकुलित  कमल
नैन तुम्हारे ।
3
जन्मों की माया
कैसे है बाँधे जीव
मन व्याकुल।

-0-

2-कृष्णा वर्मा

1

अर्थहीन हैं

जीवन की साँझ में

मुहैया सुख।

2

क्या वे संबंध ?

दुख में हो आलोप

सुख में संग।

3

आएँ त्योहार

मन हो सतरंगी

उत्सवी द्वार।

4

कैसे अजूबे

विकास की नैया में

बैठ के डूबे।

5

ईर्ष्या का मारा

पाली हैं उदासियाँ

इंसाँ बेचारा।

6

शत्रु जो ऐंठे

तरकश के तीर

चुप क्यों बैठें।

7

दूर देश से

जोड़े  जीवन -नाते,

उलझे खाते।

8

उल्टा व्यापार

छपके न बिकते

बिकके छपें।

9

बड़े क्या हुए

हँसी कहकहे तो

सब खो गए।

-0-

 

Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 20, 2018

1878

1-धर्म जैन

1

मन बादल

बरसा या पिंघला

पर पागल .

dharmtoronto@gmail.com

-०-

2-डॉ.हंसा दीप

1

सिक्कों जैसी  ही  

क़ीमत है  रिश्तों की

कम या ज़्यादा .

hansadeep8@gmail.com

-०-

3-स्नेह  सिंघवी

1

शब्दों को छोड़

मौन आज बोलेगा

आप भी  सुनें .

ssinghwi@gmail.com

-0-

( सृजन  तिथि  8 सितम्बर-2018)

Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 16, 2018

1877

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

ठिठुरे रिश्ते।
सुखद आँच- जैसा 

स्पर्श तुम्हारा ।
2
कोई न आया
सर्द रात ठिठुरी
तू मुझे भाया।
3
हिमानी भाव
कोई यों कब तक
रखे लगाव।
4
काँपे थे तारे
बरसे थी नभ से
बर्फीली रूई।
5
जमी हैं झीलें
अपत्र तरुदल
ठिठुरे,काँपे।

6

गुलाबी सर्दी
गर्माहट देता है
साथ तुम्हारा।
7
सुख में भूलो
दुख में मुझे कभी
भुला न देना।
8
कुछ न बाँटो
पर थोड़ा -सा दुःख
मुझे भी देना।
9
घाव तुम्हारे
रिसे हैं निरंतर
मेरे भीतर।
10
प्यास बुझाई
जीभरके पिए थे
तेरे जो आँसू।
11
सीने लगाऊँ
हर अश्क तुम्हारा
मुझको सींचे।
12
सौ- सौ पहरे
फिर -फिर खुलते
घाव गहरे।
13
युगों से ओढ़ी
दुःख -भरी चादर
कैसे उतारूँ?
14
कुछ न जानूँ
धर्म -कर्म क्या होता
तुझको मानूँ ।
15
जग ये छोड़े
तुम प्राणों में रहो
इतना चाहूँ।
-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 14, 2018

1876-बालमन

भावना सक्सैना

1

छल से परे

bhawna-saxena-e1542201185646सरल बालमन 

खोजे मायने। 

2

मन के भोले

सब से मिल बोलें

बैर न जानें। 

3

बहें निर्बाध

ज्यों उन्मुक्त सरिता

सब राहों से। 

4

चुलबुले से

नटखट चेहरे 

बोलती आँखें। 

5

करना चाहूँ

मंज़िल को हासिल

दिशा मुझे दो। 

6

कच्ची मिट्टी है

सँवार दो नेह से 

बस प्यार दो। 

7

मनमौजी हैं

घर भर कम हैं

खेल खिलौने। 

8

नन्ही बाहों में

भर लूँ मैं आकाश

उड़ना चाहूँ। 

9

डरा जाती है

मासूम -से मन को

रात की छाया। 

10

वर्षा का जल

मगन अपने में

खेले मचल। 

11

हँसते गाते

सीखे कितना कुछ

नन्हा- सा मन। 

12

सुन कहानी

करते मनमानी

बाल रतन। 

13

गुजर गई

बचपन कहानी

बीता वैभव। 

14

एक पल में

भूलें नाराज़गियाँ

बच्चों का मन। 

15

माँ का आँचल

दुलार पिता -संग

देता जीवन। 

16

खिली धूप है

बचपन के रंग

करें उजास। 

17

मिट्टी में सने

खिलखिलाते हुए

मोहते बाल। 

18 

परत चढ़ी

हैं अद्भुत स्मृतियाँ 

बचपन की। 

19

डोर पतंग

न  माँगे अब कोई

संग फोन है। 

20

व्यस्त मस्त है

तकनीक के संग

बालक आज। 

21

आँख- मिचौली

चंचल नटखट

भाए मन को। 

22

कैसे समझें

दुनिया के ढंग वो

बूझ न पाएँ। 

23

भेद-भरी है

अबूझ- सी पहेली

दुनिया सारी। 

24

बाहें फैलाए

राह तकें नयन

माँ को न पाएँ।

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 13, 2018

1875

डॉ0 सुरंगमा यादव

1

बाँध ले मन

नेह -बंदनवार

पी आये द्वार

2

मुकुलित थी

तुम्हें देख मन की

आशाएँ खिलीं ।

3

प्रीत के पाँव

बिन पायल बाजें

सुनता गाँव

4

ओस की बूँद

पल में खुशियों ने

आँखें लीं मूँद

5

मन होरसा

घिसा प्रेम चंदन

फैली सुवास

6

प्रेम का चीर

शोभित  मन पर

जग अधीर

7

रात प्रहरी

कैसे आऊँ मैं प्रिय !

लाँघ देहरी

8

नभ में तारे

उभरे मन पर

पीड़ा के छाले

9

आँसू का वेग

डूब रहीं आशाएँ

तट न पाएँ ।

10

र्षों का साथ

अहसास आज भी

हैं अनछुए

-0-

(होरसा-चंदन घिसने का पत्थर)

Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 7, 2018

1874

1-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु
1
दीप लिएअमा की रात
तुम पूर्ण चंद्रिका
उर में खिली।
2
दीप जलाऊँ
या तेरे  नयनों में
डूबूँ ,नहाऊँ।
3
आँखों के तारे
दीपोत्सव मनाएँ
प्राण जुड़ाएँ।
4
यादों में तुम
जगमग दिशाएँ
रोज दिवाली।
5
शब्दों के दीप
तुमने क्या जलाए,
धरा नहाए!
6
शब्दों में अर्थ
जैसे   हों एकमेक,
गुँथे मुझमें।
7
भाव-संगिनी
लय -प्रलय तक
मुझमें रमी ।
8
नश्वर देह
काल से परे सदा
तुम्हारा नेह।
9
भीतर तम
देहरी जगमग
घना अँधेरा !
10
किरण-शर
बींधे तम प्रखर
उजाला फूटा।

चौमुखा diyaa11
चौमुखा दिया
बनकर जला मैं
कभी तो आओ !

-0-

2-डॉ.जेन्नी शबनम

1.

छबीला दीया

ये रंगीली दिवाली

बिखेरे छटा।

2.

jenny (1) (1)साँझ के दीप

अँधेरे से लड़ते

वीर सिपाही।

3.

दीये नाचते

ये गुलाबी मौसम

खूब सुहाते।

4.

झूमती धरा

अमावस की रात

खूब सुहाती।

5.

७-deepakदीप- शिखाएँ

जगमग चमके

दीप मालाएँ।

6.

धूम धड़ाका

बेजुबान है डरा

चीखे पटाखा।

7.

ज्योत फैलाता

नन्हा बना  सूरज

दिवाली रात।

8.

धरती ने ओढ़ी

जुगनुओं की चुन्नी

रात है खिली।

9.

सत्य की जीत

दिवाली देती सीख

समझो जरा।

10.

पेट है भूखा

गरीब की कुटिया,

कैसी दिवाली?

-०-

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