Posted by: हरदीप कौर संधु | फ़रवरी 15, 2020

चमकी धूप

1-कैलाश बाजपेयी

1

आया वसंत

सुरभित हो ग

दिग-दिगंत ।

2

आया वसंत

सरसों के खेतों में

पधारो कंत ।

3

ऋतु वसंत

पीत वर्ण दिशाएँ

जागी आशाएँ

-0-कैलाश बाजपेयी 128/862 ,वाई ब्लाक किदवई नगर, कानपुर-208011
मोबाइल नम्बर-6388850346

-0-

2-कृष्णा वर्मा

1

सुधी तुम्हारी

सजल हुए नैन

प्रीत के मारे।

2

बुझेगा नहीं

रखा जो सीने पर

प्रेम-अंगार।

3

ढूँढते फिरे

मिले ही नहीं कहीं

बातों के सिरे।

4

तुमने मुझे

जब-जब नकारा

और सँवारा।

5

कोर-कोर की

कुंज गलियन में

डोलते अश्रु।

6

उगी अकड़

तो ढीली हो जाएगी

प्रेम- पकड़।

7

बरसी याद

अनकही बातों ने

किए संवाद।

8

कैसा ये मोड़

चटकी दो पल में

प्रेम की डोर।

11

खोला दिल ने

ग़मों का पुलिन्दा तो

ख़ुद ही रोया।

12

कच्ची उम्र के

ख़्वाबों के रंग कभी

होते न पक्के।

13

क्यों बेसबब

ज़िंदगी का सफ़र

गुम साहिल।

14

चमकी धूप

बेड़ी पहने हवा

बैठी है चुप।

15

मरीं घटाएँ

सूखीं शोख़ नदियाँ

कौन जिलाए!

16

प्रीत– लगन

धरा के प्रेम रवि

तापे अगन।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | फ़रवरी 13, 2020

यही तो प्यार

1-प्रीति अग्रवाल

1.

सितारों जड़ी

रात की चुनरिया

चाँद-सा पिया!

2.

संग पिया का

सब कुछ वार दूँ

कुछ न माँगूँ।

3.

बेपनाह है

तुमसे मुहब्बत

ओर न छोर!

4.

मेरी बन्दगी

वफ़ा के सिलसिलें

भुला पाओगे?

5.

मैं पहचानूँ

कदमों की आहट

पिया तुम्हारे।

6.

कैसे रोकती?

चाँद-सितारें छूने

निकलें थे वो।

7.

मेरी धरती

तुमसे प्रियतम

मेरा आकाश !

8.

प्रीत की डोर

खींचे है, न माने

तेरी ही ओर।

9.

मिले, बिछड़े

गर्दिश में सितारें

मेरे तुम्हारे!

10.

तुम्हारा प्यार

है लाख नियामत

कैसे भुला दूँ ?

-0-

2-ज्योत्स्ना प्रदीप

1

किरणें गुम

सूरज से तफ़्तीश

करती  भोर !

2

रोईं  थी रात

तुषार के आघात

सह न सकी !

3

बिखर गया

कोहरे का वज़ूद

रश्मियों से ही !

4

सुनो मयंक

फैला धुंध-आतंक

बनो विद्रोही !

5

यही तो प्यार

वो प्रसून ओस का,

उठाता  भार !

6

रात्रि  का आज

अतिथि  है  तुषार

प्रेम – सत्कार !

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 10, 2020

सजा आकाश

डॉ.अर्पिता अग्रवाल

1

आदि न अंत

सागर हुआ मानो

शिव का अंश ।

2

धरा की कोख

हरियाली के बीज

सींचे सावन।

3

सजा आकाश

भोर के सिंदूर से

खनकी धरा ।

4

मेघों का ढोल

जीवंत प्रकृति का

वर्षा-उत्सव।

5

ऋतुराज ने

बजाई जो बाँसुरी।

नाची प्रकृति ।

6

सरसों फूली

जब कोयल कूकी

वन दहके ।

7

भटका मन

मृगछौना-सा बन

आया वसंत ।

8

फोटो: निहित सक्सेना

सिंदूरी भोर

स्वर्णिम जल-राशि

गंगा का घाट।

9

वैशाखी हवा

झरती तितलियाँ

नीम- शाख से।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | फ़रवरी 7, 2020

दूषित हवा

चक्रधर शुक्ल

1

जीभ दुधारी

छोटी– छोटी बातों में

करे मक्कारी

2

रेत-खेत में

बाढ़ की चपेट में

गाँव-शहर

3

प्रदूषण से

आदमी घबराया

मॉस्क लगाया

4

बातें  बनाएँ

फल खाने वाले ही

पेड़ गिराएँ ।

5

बोल्डर गिरा

पहाड़ों पर मौत

बरखा सौत

6

दूषित हवा

सबको ही डराए

बीमारी लाए ।

7

नदी का पानी

गाँव में चढ़ आया

सन्नाटा छाया

8

तितलियों ने

फूलों को परखा है

बड़ी चर्चा है

9

प्रलोभन में

छला जाता मानव

लोभ दानव

10

बस्ते का बोझ

बच्चों पे बढ़ गया

कमर झुकी

-0-

एल0आई0जी0-1, सिंगल स्टोरी

बर्रा-06, कानपुर-208027

मो0नं0ः 9455511337

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 6, 2020

पर्यावरण

सुदर्शन रत्नाकर

1

ढूँढ रहा है

बरगद की छाँव

व्याकुल पंछी

2

टूटी टहनी

ढूँढ रहा है पाखी

उजड़ा नीड़

3

सर्वत्र फैला

ज़हर उगलता

नभ में धुआँ

4

नदी किनारे

कचरा है बहता

कहाँ है गंगा

5

नदियाँ मैलीं

दुखी हैं जलजीव

 नहीं ठिकाना

6

प्रतीक्षारत

कब होगा उद्धार

गंगा का जल.

7

बूँद बूँद को

तरस रहे प्राणी

क़ीमत जानी।

8

आग ही आग

जल गए जंगल

फैला ज़हर

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | फ़रवरी 5, 2020

मंज़िल कहाँ?

प्रीति अग्रवाल
1
तलाशतें हैं
हरपल वजूद
कौन हैं हम?
2
चल रहे हैं
चलते जा रहे हैं
मंज़िल कहाँ?
3
आए कहाँ से
अनबुझ पहेली
जाए कहाँ को?
4
कब रुकेगी
ख्वाबों की ये उड़ान
क्या होंगे पूरे?
5
तन्हा सफर
आखिर कब तक
संगी न साथी।
6
मेरे सवाल
तलाशते जवाब
मददगार?

Posted by: हरदीप कौर संधु | फ़रवरी 2, 2020

निर्मल मन लिये हाइकु के सात जन्मों की यात्रा

  बंद कर लो द्वार ( हाइकु- संग्रह) : रामेश्वर कांबोज हिमांशु , प्रकाशक – हिंदी साहित्य निकेतन , बिजनौर, मूल्य – ₹250 संस्करण –  2019, पृष्ठ – 124 

हाइकु  किसी क्षण की गहन संवेदनात्मक अनुभूति की प्राकृतिक अभिव्यक्ति है जिसमें कृत्रिमता का लेशमात्र भी अंश नहीं होता । एक अच्छा हाइकु उसके अभिव्यक्त चित्र को पाठक के समक्ष प्रकट कर देते हैं  ; यह गूढ़ साधना से उपजी एक लेखन कला है, जिसमें हाइकुकार के भाव,कल्पना और विचार व्यक्त होते हैं ,  जिसने उस दृश्य को महसूस करने के बाद पूर्ण संवेदना से उसका प्रकटीकरण किया है  । इन सजीव शब्दों का सामर्थ्य और उसकी नैसर्गिकता एक अच्छा हाइकु बनाते हैं । इसमें मौलिकता एवं काव्य तत्त्व उपस्थित होते हैं ; वर्णिक अनुशासन , सौंदर्य का चित्रांकन एवं सामयिकबोध  इसके मुख्य आधार हैं ।   हाइकु , हिंदी साहित्य में अब किसी परिचय की मोहताज नहीं ; क्योंकि अब इसके कई संग्रह निकल चुके हैं तथा कई पत्रिकाओं ने इसके विशेषांक निकाले हैं । ब्लॉग्स एवं विभिन्न वेब पत्रिकाएँ भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हैं और हिंदी का सम्मान बढ़ाने  में इसका विशेष योगदान हो रहा है। हाइकु ने हिंदी  साहित्य के क्षेत्र को अन्तर्राष्ट्रीय विस्तार दिया है । 

                   मुझे रामेश्वर कांबोज हिमांशु जी का हाइकु  संग्रह – ‘बंद कर लो द्वार’ को पढ़ने का अवसर मिला इसमें उन्होंने 661 हाइकु  संगृहीत किए हैं ।  इसकी भूमिका में वे लिखते हैं  –  यह निर्मल मन की तीर्थ यात्रा है  ; आपने प्रकृति के दो प्रकार अंतः एवं बाह्य प्रकृति का उल्लेख किया है ।  हाइकु  साहित्य का परिवेश एवं  आकाश को भारतीय  हिंदी साहित्य की परंपरा बताया है । इसे उन्होंने अपने साथियों को समर्पित किया है तथा बताया है कि  इन  हाइकु  से उनका सुख-दुःख का संबंध है । यह एक उच्च कोटि का संग्रह है ,जिसमें आपकी अभिव्यक्ति एवं अनुभव  के गूढ़ निचोड़ को आपने  7 खंडों में  प्रस्तुत किया है । 

               ‘आ जाओ द्वारे’ खंड  के अंतर्गत आपने दुनियावी  रिश्ते-नाते के महत्त्व एवं उनके दरकने के कारणों को अभिव्यक्त किया है ।  प्रकृति के साथ इनका तादाम्य  अनूठा बन पड़ा है । कभी कहते हैं  – काले बादल/ नभ  के  नयनों में /आँजें काजल ,  तो कभी कहते हैं – कलेजा चीर / कह ना पाते  पीर और उमड़े आँसुओं को  सहेली हवा  पोंछ कर निकल जाती है , रिश्तो को यही बहकी हवा उड़ाकर ले भी  जाती है।   

अंबर क्यारी / खरगोश बादल /दुबके  दौड़ें । 

अपने  लूटें /किस दर पर जाएँ /लूट लिखाएँ । 

अंधी रोशनी /टटोल रही रास्ता /कोहरा घना ।

‘ घटा में धूप’ के अंतर्गत आप कहते हैं कि  कमल खिला है या तुम्हारी मुस्कान -सी भोर खिल गई  है , गाँव  के स्वर्ग  में चुनाव विष बो  गया है । च,न्चल हवा टहनियों को मरोड़कर छेड़खानी करती है-

खिला कमल / या तुम मुस्काई  हो / भोर बनके

गाँव था स्वर्ग/  आकरके चुनाव /विष बो गया

चंचल हवा / मरोड़े टहनियाँ / छेड़ती गाछ । 

              ‘ जीवन संझा ‘ में  हाइकु का नयापन एवं ताजगी महसूस की जा सकती है  ; जब वे कहते हैं  यह साँझ जोगिया भेष  में उदास लगती है  । चुप्पी ताले जड़कर खड़ी है , धरा ने फसलों के रूप में गहने पहने हैं  , पक्षी झरोखों में आशीर्वाद बाँटते चहक रहे हैं । 

ठिठका चाँद /झाँका जो खिड़की से /दूजा भी चाँद । 

तन माटी का /मन का क्या उपाय /मन में तुम । 

            ‘ उड़ गया पखेरू’ के अंतर्गत विदा माँगते साँझ से  दिन , नभ को रौंदते पागल हाथी बन धूसर मेघा  ; नीम के बौर की भीनी खुशबू बिखेरती  हँसी ,  तो कहीं पहाड़ी नदी को किसी मुग्धा की बलखाती कमर की संज्ञा आपने दी  है । आपने कभी बच्चे को नन्हा फरिश्ता माना है ,तो कहीं  प्रियतम  में ईश्वर को देखते हैं  और पक्षियों का मिल बाँटकर चुगने में एकता का संदेश देते हैं ।  ये  हाइकु पढ़ने में अद्भुत सुंदर बन पड़े हैं और इनका निखार बेजोड़ है ।  

धान रोपती/छप- छप बदरी /अंबर क्यारी । 

नेह से भरे /गंगा नहा के आए /मृदु वचन। 

         ‘मन बावरे’ खंड के अंतर्गत प्यासी मुक्त डालियों का ताल में नीर चूमना , गगन में चीलों का झपट्टा मार कबड्डी खेलना  , मेघों की तुलना हिरण के कुलाँचों  से करना तथा दर्द अतिथियों का मुश्किलें लाना और देर से जाना जैसे नव प्रयोग इस हाइकु- संग्रह की नई देन है, जो हर नव लेखकों को सीखनी चाहिए ।  हाइकुकार काम्बोज जी ने पुरानी दृश्यों पर अपनी लेखनी चलाने से परहेज किया है ; यही इस संग्रह की आत्मा है-

मन बावरे /दर्द के साथ पड़ी / तेरी भाँवरे। 

 बजे नगाड़े /अंबर में मेघों के /खुले अखाड़े। 

           ‘अनुरागी आखर’ खंड के अंतर्गत  हाइकु के शब्दों का सौंदर्य और जादू अपनी ओर खींचता है । कहीं आपके शब्द खुशबू से नहाए थे, तो कहीं आपने शब्दों के दीप जलाए ; वाणी के जादू का आलिंगन कह उठते हैं कि  लोग जलेंगे जब हम साथ मिलकर चलेंगे। मौलिकता से  भरे शब्दों का सामर्थ्य इसे सजीव बना देता हैं- 

‘ मैं’ भी मिटेगा /’तुम ‘ भी क्या रहेगा /रहेंगे ‘हम’ । 

राजा से खड़े/ पुआल के कूँदड़े /हाथी से लगे। 

रूप तुम्हारा/शुभ मुहूर्त जैसा /मन उकेरा । 

 शुभ्र चंद्रिका/ शिशु रूप लेकर /गोद आ छुपी। 

                 ‘ स्वप्न जल ‘ खंड के अंतर्गत हवाएँ सिसकती हुई पहाड़ों से नदी के रूप में उतर रही हैं , रिश्तों  का फंदा मुँह बाँध रहे हैं , यादों के घाव सौ – सौ  पहरों के  बाद भी खुल जाते हैं  जब सर्दी की धूप स्वर्णिम हो जाती है ।  यही रिश्ते बुरे वक्त यानी साँझ में फरार हो जाते हैं, जिसका वक्त गवाह है  , इसे सिर्फ अपने ऊपर बीतने से ही जाना जा सकता है। 

हौले से बोलो / सोया है मुसाफिर /अरसे के बाद। 

हम  पाहुने /कुछ दिन के ही थे/ चलना होगा । 

स्वर्णिम मेघ/लुभाते गगन को/कुंचित केश । 

                     रामेश्वर  काम्बोज ‘हिमांशु’ जी ने इस संग्रह में सात खंडों के अंतर्गत हाइकु के सात जन्म की यात्रा  करा दी है । सभी हाइकु उत्तम बने हुए हैं यहाँ सभी का उल्लेख करना मुश्किल है , मेरी सभी को सलाह है कि पाठक इस संग्रह  को पूरा पढ़ें  । यह संग्रह शोधार्थियों एवं नव लेखकों के लिए  नव द्वार खोलता है। वर्तमान में प्रचलित एवं प्रकाशित हाइकु की दुनिया से बिल्कुल नए हाइकु की प्रस्तुति  यहाँ मन मोह लेती है।  इनका सामर्थ्य इतना गहरा है की पाठकों के समक्ष उस  अनुभूत दृश्य को  तत्क्षण प्रकट करते हैं  । यह गूढ़  साधना का प्रतिफल है , निश्चित ही यह संकलन लोगों को पसंद आएगा ;  हिंदी साहित्य में  यह मील का पत्थर साबित होगा आपका यह योगदान एक बार और याद रखा जाएगा । 

-0-

 रमेश कुमार सोनी,( राज्यपाल पुरस्कृत व्याख्याता एवं साहित्यकार) जेपी रोड , एच पी गैस के पास – बसना , जिला – महासमुंद ( छत्तीसगढ़ ) -493 554 

मोबाइल संपर्क- 70493 55 476

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 31, 2020

सोती है रात

सुदर्शन रत्नाकर

1

शीत पवन

ओस नहाई भोर

प्रफुल्ल मन।

2

सोती है रात

चमकता है चाँद

देता पहरा।

3

चाँदनी रात

हरसिंगार खिले

मौन में मिले।

4

कोहरा छाया

धरा ने ओढ़ लिया

लिबास नया।

 5

वसंती हवा

छूती सरसों पीली

हुई बावरी।

 6

डूबता सूर्य

नारंगी रंग घुला

नभ शर्माया ।

 7

निर्झर बहे

झर-झर झरता

दुख वो सहे।

 8

मुझे बुलाते

पेड़ों के झुरमुट

ठंडी हवाएँ ।

 9

रात की रानी

महकी रात भर

पिया न आए।

10

एकाकी खड़े

नारियल के पेड़

देते जीवन।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 29, 2020

बजा माँदल

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

बजा माँदल

घाटियों में उतरे

मेघ चंचल

2

चढ़ी उचक

ऊँची मुँडेर पर

साँझ की धूप

3

नन्हा सूरज

भोर-ताल में कूदे

खूब नहाए

4

लहरें झूला

खिल-खिल करता

चाँद झूलता

5

शोख़ तितली

खूब खेलती खो-खो

फूलों के संग

6

सिहरा ताल

लिपटी थी धुंध की

शीतल शॉल

7

उठते गए

भवन फफोले- से

हरी धरा पे

8

ठूँठ जहाँ हैं

कभी हरे-भरे थे

गाछ वहाँ पे

9

घायल पेड़

सिसकती घाटियाँ

बिगड़ा रूप

10

लोभ ने रौंदी

गिरिवन की काया

घाटी का रूप

11

हरी पगड़ी

हर ले गए बाज़

चुभती धूप

12

हरीतिमा की

ऐसी किस्मत फूटी

छाया भी लूटी

13

कड़ुआ धुआँ

लीलता रात-दिन

मधुर साँसें

14

सुरभि रोए

प्राण लूट रही हैं

विषैली गैसें

15

मुँह बाए हैं

प्यासे पोखर जहाँ

नीर वहाँ था

16

तरसे कूप

दो घूँट मिले जल

सूखा हलक

17

गीत न फूटे

अब सूखे कण्ठ से,

मौसम रूठे

18

पाखी भटके

न तरु- सरोवर

छाँव न पानी

19

सुगंध लुटी

पहली वर्षा में लो

दुर्गंध उड़ी

20

वसुधा-तन

रोम-रोम उतरा

विष हत्यारा

21

दुर्गंध बने

घातक रसायन

माटी मिलके

22

क्षय-पीड़ित

हुआ नील गगन

साँसे उखड़ीं

23

तन झुलसा

घायल सीने का भी

छेद बढ़ा है

24

गुलाब दुखी

बिछुड़ी है खुशबू

माटी हो गया

25

घास जो जली

धरा गोद में पली

गौरैया रोए

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 27, 2020

प्रकृति-द्वार

1-बेफिक्र धूप

डॉ .जेन्नी शबनम

1

ठठ्ठा करता

लुका-चोरी खेलता

मुआ सूरज।

2

बेफिक्र धूप

इठलाती निकली

मुँह चिढ़ाती।

3

बिफरा सूर्य

मनाने चली हवा

भूल के गुस्सा।

4

गर्म अँगीठी

घुसपैठिया हवा,

रार है ठनी।

5

ठिठुरा सूर्य

अलसाया- सा उगा

दिशा में पूर्व।

6

धमकी देता

और भी पिघलूँगा,

हिम पर्वत।

7

डर के भागा

सूरज बचकाना,

सर्द हवाएँ।

8

वक्त चलता

खरामा-खरामा-सा

ठंड के मारे।

9

जला जो सूर्य

राहत की बारिश,

मिजाज स्फूर्त।

10

शातिर हवा

चुगली है करती

सूर्य बिदका।

-0-

2-सिन्धु – तरंगें

सुदर्शन रत्नाकर

1

छूतीं आकर

सागर की लहरें

फूल हों जैसे।

2

स्पर्श तुम्हारा

झंकृत कर गया

अंतर-मन।

3

खिलीं खिलीं-सी

रेत पानी मिलीं -सी

सिन्धु – तरंगें।

4

लहराती हैं

हवा संग लहरें

हुईं बावरी।

5

जल में उठें

जल में हो विलीन

अस्तित्व खोएँ।

6

रोते रहते

रात भर सागर

कोई न साथ।

7

नीला सागर

सुनहरी लहरें

छूतीं किरणें।

8

मुझे बुलाता

लहराता सागर

गले लग जा।

9

छोटी -सी नाव

विस्तृत है सागर

कैसे हो पार!

10

लहरों -संग

लहरें बनकर

हुई सागर ।

-0-

Older Posts »

श्रेणी