Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 22, 2022

2231

रामेश्वर  काम्बोज ‘हिमांशु’

22 जनवरी -काम्बोज

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 18, 2022

2230

भीकम सिंह 

1

किलक पड़ा

पराजित-सा खेत

सूर्य ज्यों चढ़ा  ।

2

चारे का गट्ठ

हाँफता हुआ बढ़े 

लेकर लट्ठ  ।

3

सयानी बड़ी 

गाँवों की त्योंरियाँ  हैं

एमै ही चढ़ी  ।

4

दूब के अंग

परिणय से खिले

ओस ज्यों मिले ।

5

खेत पहने 

सरसों की पाँत से 

बने गहने  ।

6

उधड़े रस्ते 

आँधी में गाँव चले

गिर-पड़के  ।

7

ग्राम– देवता 

गाँव के स्वप्न ढ़ोता 

ज्यों इकलौता  ।

8

चार दानों को 

चक्की है मोहताज 

पीसे क्या आज  ।

9

खेतों में  लेके 

शहर की आदतें 

गाँव पहुँचे  ।

10

फटे जूतों-सी

गाँवों की शक्ल हुई

ज्यों अछूतों-सी  ।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 6, 2022

2229

दिनेश चन्द्र पाण्डेय

1.

गुम थी कहीं

बच्चों के बीच मिली

शैतान हँसी

2.

बिछुड़ा साथ

शिखरों ने लपके

मेघों के छौने

3.

शामियानों ने
रोक दी आवाजाही
सन्न है हवा

4.

किया इशारा

मुखबिर चींटी ने

बँटी मिठाई

5.

दौड़ती रोज़

घाटी से चोटी तक

बावरी धूप

6.

झेलते सदा

वर्षा का असंयम

जख्मी पहाड़

7.

भैंस पानी में,

ग्वाले बैठ किनारे,

बीन बजाते

तप्त धरती-

फिर भी गरीब की

ठंडी सिगड़ी

तूफ़ान बना

छोटे दीये के लिए

बड़ी परीक्षा

सफ़र चला

मंज़रों के ख़ज़ाने

खुलते गए

नहाती उषा

सरिता के आँचल

बिखरा रोली

छटपटाती

तटों से बतियाती

ज़िंदा है नदी

शोख़ कैमरा

शरद् पूर्णिमा में

ताज निहारे

नाचती धूल

झरोखे से झाँकती

जब भी धूप

ईद का मेला

पहाड़ों ने पहने

श्वेत वसन

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 5, 2022

2228

छवि निगम 

1

अंक में चाँद

CHHAVI NIGAMसूरज हृदय में

पग -प्रस्तर

2

नदी है नींद

उबरे सो जी लिए

डूबे सो मौत

3

जाने दो उन्हें

लौटे, तो तुम्हारे थे

नहीं.. तो नहीं !

4

रिश्ते बदले

वफ़ादार थे ख़त

पते बदले

5

यूँ जुड़े हम

प्रेम की परिधि मैं

केंद्र में तुम

6

तुम्हारा होना

भरना ख़ालीपन

सपना होना

7

ख़ुद को खोना

ख़ुदा में तुम्हें पाना

इश्क़ करना

8

पटल तन

चित्रकार जीवन

धनक मन

9

बर्फ़ के ताले

नम चाभी दिल की

कैसे खुलते ?

10

भुला बैठना..

है क्या इससे अच्छा

पेनकिलर ?

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 2, 2022

2227

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Posted by: हरदीप कौर संधु | दिसम्बर 31, 2021

2226-पाहुन प्यारे

पूनम सैनी

1

punam-sainयादें पुरानी

लाँघने को चली है

साल जो बीता

दुख से भरी

यादों को अलविदा

सुख की आशा

2

जनवरी की

चाह में दिसम्बर

हुआ अधीर

3

आ जाओ तुम

समेट के खुशियाँ

वर्ष नवीन

4

बीती पुरानी

भेद से भरी सब

दो बातें भुला

5

अपनाओ तो

नई यादें,खुशियाँ

फैलाती बाहें

6

आशा प्रेम से

भरने की जहाँ को

नए वर्ष में

7

तिलक लगा

स्वागत है तुम्हारा

पाहुन प्यारे

-0-

‘ हिन्दी हाइकु’ अन्तर्जाल से जुड़े सम्पादकों द्वारा वर्ष 2021 के हाइकु के सात सम्पादित विशिष्ट  संग्रह

विशेषइन संग्रहों के लिए पूरा व्यय सम्पादकों द्वारा किया गया। हाइकुकारों से कोई राशि नहीं ली गई। सबको लेखकीय प्रतियाँ निःशुल्क भेजी जा रही  हैं। इच्छुक पाठक मूल्य देकर प्रति मँगाने के लिए-09211312372 पर प्रकाशक संजय कुमार जी से सम्पर्क कर सकते हैं या https://www.amazon.in/s?me=A2UV5DLW4L6UU7&marketplaceID=A21TJRUUN4KGV पर ऑन लाइन क्रय के लिए सम्पर्क कर सकते हैं।

सभी सम्पादकों एवं हाइकुकारों का इन वैश्विक संग्रहों के लिए आभार!

1-पहाड़ी पर चन्दा (काँठा माँ जून): सम्पादक-डॉ . कविता भट्ट-ग़ढ़वाली में अनूदित 5 देशों के 43 चुने हुए   हाइकुकार-468 हाइकु

2-सप्तपदी: रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ( एक नवोदित सहित भारत के सात चुने हुए  हाइकुकार, सात या अधिक विषयों पर केन्द्रित) 624 हाइकु

3-सप्तपर्णा: डॉ . कविता भट्ट- ( एक एक नवोदित सहित भारत , यू एस, कैनेडा के सात चुने हुए   हाइकुकार, सात या अधिक विषयों पर केन्द्रित) 624

4-सप्तस्वर: सम्पादक डॉ . कुँवर दिनेश ( भारत के सात चुने हुए हाइकुकार, सात या अधिक विषयों पर केन्द्रित) 528 हाइकु

5-सप्तरंग: :सम्पादक-डॉ . सुरंगमा यादव , कृष्णा वर्मा (भारत से 6 और ऑस्ट्रेलिया से 1 चुने हुए   हाइकुकार, सात या अधिक विषयों पर केन्द्रित) 570 हाइकु

6-शैलशिखर( वैश्विक हिन्दी-हाइकु )-डॉ . हरदीप कौर सन्धु -डॉ कविता भट्ट( 5 देशों के  27 चुने हुए  हाइकुकार) 1216 हाइकु

7-स्वर्णशिखर( वैश्विक हिन्दी-हाइकु )- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ,डॉ .  हरदीप कौर सन्धु – 4 देशों के  40 चुने हुए  हाइकुकार) 1216 हाइकु।

Pahadhi Per Chanda Final

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Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 27, 2021

2224

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( चित्रः डॉ. कुँवर दिनेश)

Posted by: हरदीप कौर संधु | दिसम्बर 26, 2021

हाइकु त्रिंजण-एक सूक्ष्म- सा अजायबघर

एक सूक्ष्म– सा अजायबघर

हाइकु त्रिंजणमेरे लिए हाइकु  रंग-बिरंगी तस्वीरें हैं। (तस्वीरें -जैसे) स्फटिक के कंचे , बचपन की सँभाली हुई  गिट्टियाँ,अक्षरों के कसीदों की फूल-बूटियाँ और सुंदर गुड़ियों के सुंदर परिधान । (या फिर) कहीं मथानी, कहीं चक्की, कहीं चरखा, कहीं  दीपाधार पर जलता दीपक, कहीं चौका पोतती गृहिणी, कहीं चूल्हा जलाती युवती । यह सब एक जपमाला जैसा है, जिसका हर मनका पलक झपकने के समान कोई दृश्य है । यह वह मोती हैं, जिन्हें हरदीप अपनी यादों के समुद्र से निकालकर ला रही है। यह हरदीप द्वारा सृजित किया हुआ सूक्ष्म सा अजायबघर है।

 इस जपमाला, इस मुक्तामाल, इस सूक्ष्म- से अजायबघर का सृजन करने के लिए मैं डॉ. हरदीप कौर को बहुत-बहुत मुबारकबाद(/शुभकामनाएँ), आशीर्वाद एवं दुआएँ देता हूँ।– सुरजीत पातर(पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार)।

( हिन्दी रूपान्तर-परमजीत कौर-श्रीगंगा नगर

डॉ हरदीप सन्धु जी का पंजाबी हाइकु-संग्रह ‘हाइकु त्रिंजण” के नाम से आया है। इस संग्रह के बारे में आदरणीय सुरजीत पातर के विचार मनन करने योग्य हैं। हाइकु-जगत के लिए बहन हरदीप द्वारा किए गए कार्य की एक सम्मान जनक स्वीकृति।

Posted by: हरदीप कौर संधु | दिसम्बर 25, 2021

2222

भीकम सिंह

1

क्यों कहाँ-कैसा

नारी का आसमान

प्रश्नों के जैसा।

2

खूँटे से बँधी

नारी की अभिव्यक्ति

ज्यों प्रति-व्यक्ति।

3

हमदर्दी से

भरपूर लदी है

माँ की सदी है।

4

सात्विका-नारीपति की गली

एड़ियाँ उठा-उठा

उमर ढली।

5

संवाद लिखें

नेपथ्य से झाँकती

औरतें दिखें।

6

माँ का आँचल

पैबन्दों में भी छना

बेटों पर तना।

7

बूढ़ी हुई माँ

जला-जलाके चूल्हा

सेंकती कूल्हा।

8

्सात्विका-नारी-2नारी की प्यास

निर्जला एकादशी

जिए ज्यों घास।

9

पीहर लौटी

उदासियाँ लेकर

बाप की बेटी।

10

खामोशी ओढ़े

ससुराल की रातें

सूँघती बातें।

11

रस्तों पर काई

स्त्री के पाँव फिसले

सम्भाले भाई।

12

स्वेटर चुना

याद पहनने को

जो माँ ने बुना।

13

जड़ी मूँगे से

गुम हुई चाबियाँ

स्त्री के ढूँगे से।

14

नारी ने माना

घर को आसमान

भूली उड़ान।

15

तपा के तवा

नारियों ने इरादे

रखें हैं जवाँ।

16

चूल्हा फूँकके

डूबी आँसू में सारी

गाँव की नारी।

17

नयन लड़ा

स्वप्न देखे रंगीले

सिर पर घड़ा।

18

बेटा ज्यों सुना

फोन आँसू से सना

डूब गई माँ।

-0-

चित्रः सात्विका

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