Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जुलाई 8, 2017

1784

1-रचना श्रीवास्तव
1

शब्द रहित
भाव निहित होता
पिता का त्याग
2
पिता की बोली
अनुशासन -भरी
प्रेम- गागर
3
बादल पिता
चुपके से ढक ले
दर्द का सूर्य
-0-

2-मंजूषा मन

1

मिले ही नहीं

बिछड़े सौ- सौ बार

कैसा ये प्यार !

2

भूलें किसकी

जो मान ले अपनी,

बस उसकी।

3

छत टपकी

भीगे मन -आँगन

बरसे आँसू।

4

एक छतरी

रिमझिम फुहार

प्रेम बरसा।

-0-

3-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

साँझ का गान

छूकरके अम्बर

सिन्धु में डूबा।

2

एकाकी मन

भीड़ भरा नगर

जाएँ किधर !

3

पाएँगे कैसे

हम तेरी खबर

तम है घना।

4

आ भी तो जाओ

सूने इस पथ में

दीप जलाओ।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जुलाई 2, 2017

1783

1-कृष्णा वर्मा

1

वर्षा का ज़ोर

भिगोया हवाओं का

लो पोर-पोर।

2

मेघों की अदा

मनवा की बिजुरी

देते चमका।

3

किसने बोई

प्रेम धुन भीतर

दीखे ना कोई।

4

सावन रस

झरती जब बूँदें

मन बेबस।

5

बाँकी है रुत

बाँचे प्रेम कथाएं

भीगी बेसुध।

6

छिटके मेह

खिल-खिल महके

फूलों की देह।

7

छेड़ें ,चिढ़ाएँ

छितराए बौछार

तेज़ हवाएँ।

8

बूँदें क्या झड़ीं

कर गईं गीली आ

नैनों की गली।

9

देती धमकी

सावन पुरवैया

बूँदें बरसीं।

10

मेघ की चाल

सूरज को गुम कर

रुलाए ताल।

11

नए-पुराने

छप्पर का सच तो

सावन जाने।

12

लिखें धरा के

उर्वर आँचल पे

बूँदें उल्लास।

13

बूँदें क्या झरीं

बंधन तोड़ बौरी

नदिया बही।

14

हिया निहाल

सुन खपरैल पे

बूँदों की ताल।

15

शैतान मेह

सुनहरी धूप की

भिगोए देह।

16

बदली घिरी

जियरा में सलेटी

उदासी तिरी।

17

कहे किसान-

‘बरस जा बादल

बाकी लगान।’

18

मेघ बेदर्दी

करता मनमर्ज़ी

माने ना अर्ज़ी।

19

मेघा बरस

नदी के होंठ सूखे

खा रे तरस।

20

हठ का मारा

सूर्य को घेरे खड़ा

मेघ आवारा।

-0-

2-पुष्पा मेहरा

1

आई बरखा

हवा के ढोल बजे            

ताल दें पत्ते ।

2

दूर गगन

सतरंगी धनुक

धरा से मिला ।

3

ताप से जले

शीतल जल ओढ़े

आये बादल ।

4

साँस न लेते

टूटे बाँध से रोते

नभ के नैना ।

5

घिरी बदरी

जंगल में मंगल

मनाते पाखी।

6 ।

अँकवे फूटे ।

देखके बादल का

प्यार अनूठा ।

7

सोंधी सुगंध

कण-कण मुखर

प्रेम की पाती ।

8

आई है वर्षा

हँस रहे महल

रोते छप्पर ।

9

धुआँ विषैला

फैला है चारों ओर

नभ रुआँसा ।

10

सूखी नदियाँ

सीना धरा का चाक

पक्षी भी रूठे ।

11

वर्षा से भीगी

सोंधी गंध लपेटे

जागी धरती ।    

12

करें किलोल

डाल-डाल पखेरू

टूटी खुमारी ।

  13

नन्ही बुँदियाँ

बेला के तन पर

टैटू बनातीं ।

 14

पीकर जल

अघाई माँ धरती

हवा जुड़ाती ।

15

झुण्ड बनाके

गरजे जो बादल

दुबका सूर्य ।

16

घटाओं बीच     

मूक चाँद बाँचता

बंदी की पीड़ा ।

17

शीतल तट

तालाब से निकल

मेंढक मस्त ।

 18

आई पावस

रंगीन एलबम

धरा ने खोली ।

19

मस्ती में घन

पट-खोल-दिखाते

स्वर्ण-हँसुली ।

20

आया सावन

पेड़ों पे झूले पड़े   

झूले पे गोरी ।

-0-

Pushpa .mehra @gmail .com        

-0-

3- सुभाष चंद्र लखेड़ा

 

1

फटना नहीं 

बरसना प्यार से 

बादल पिया। 

2

तू बरसना 

जरूरत जितनी 

यही विनती।  

3

मन हरषे 

जब भी तुम आओ 

प्यास मिटाओ। 

4

खेती हो खूब 

फलें फूलें किसान 

रखना ध्यान। 

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जून 29, 2017

1782

1-डॉ जेन्नी शबनम

1

दोषी है कौन ?

धरा बनी अलाव,

हमारा कर्म। 

2

आग उगल

रवि गर्व से बोला – 

सब झुलसो। 

3

रोते थे वृक्ष –

मत काटो हमको,

अब भुगतो। 

4

ये पेड़ हरे

साँसों के रखवाले

मत काटो रे !

5.

बदली सोचे

आँखों में आँसू नहीं

बरसूँ कैसे?

6

बिन आँसू के

आसमान है रोया,

मेघ खो गए 

7

आग फेंकता

उजाले का देवता

रथ पे चला।

8

अब तो चेतो

प्रकृति को बचा लो,

नहीं तो मिटो। 

9

कंठ सूखता

नदी पोखर सूखे

क्या करे जीव?

10

पेड़ व पंछी

प्यास से तड़पते

लिपट रोते। 

-0-

2-सत्या शर्मा कीर्ति ‘                       

1

माता की गोद

मंदिर व मस्जिद

नन्हा सा देव ।

2

मेरा  ये हं

मिलने न दे मुझे

मेरे ही स्व से ।

3

प्रसव-काल

उभरें जिस्म पर

देव रेखाएँ ।

4

नन्हा सूरज

पहन पीली धूप

खेले धरा पे  ।

5

चन्दा व तारे

यायावर बनके

भोर को खोजे ।

6

माँ की ममता

नव सृजन पर

तृप्त हो झूमे ।

7

लेते हैं जन्म

हृदय की कोख में

भाव हमारे ।

8

अटकी बूँदे

बादलों के आँचल

आतुर धरा ।

9

कितनी सस्ती !

औरतों की अस्मत

तौलती आँखे ।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 29, 2017

1781

1-सुभाष चंद्र लखेड़ा

1

बादल पिया  

धरा का तुम बिन 

न लागे जिया। 

2

धरती प्यासी 

बरसो झमाझम  

मिटे उदासी।  

3

गोरे या काले 

जैसे भी हों बादल  

हों पानी वाले। 

4

हो हरियाली 

धरती मतवाली 

झूम उठेगी।

5

बरसो खूब 

तभी मेरे अंगना 

खिलेगी दूब।  

-0-

2-विभा रश्मि 

1

जलद लेके 

आ गया डाक बाबू 

भीगी चिठिया । 

2

राग  रसीले  

गाती गान सुरीले 

ठंडी बौछारें ।

3

इंद्रधनुषी 

सतरंगे तारों को

माँगे मानुषी ।

4

सूखी धरा पे 

टपटप टपकीं

बूँदें मस्तानी ।

5

जीवन जल 

पी रही धरा प्यासी 

सहस्र ओक ।

6

पखेरू भरे 

उड़ान गगन में 

मेघों से डरे ।

7

मेघ गर्जना 

तड़ित चमत्का 

नव सर्जना।

8

नौका ले चल 

नदिया  छल छल

तूफाँ के पल ।

9

मेघों ने बाँधी 

मन से प्रीत डोर 

बूँदों के आँसू  

10

ज़ख्म  हैं खा

दिल को  दर्द भा

पावस  आए

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जून 26, 2017

1780

ईद का चाँद

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

मटक लिया

खुशबू से सिंचित।

पूरा वसन्त।                       

 2

आँखों से पिया

रुपहला वसन्त

मन न भरा।                       

3

ले लूँ बलाएँ

सारी की सारी जो भी

द्वारे पे आएँ।

4

ठिठका चाँद

झाँका जो खिड़की से

दूजा भी चाँद।

5

होगी जो भोर

और भी निखरेगा

मेरा ये चाँद।

6

नभ का चन्दा

भोर में लगे फीका

मेरा ये नीका।                                                

 7

सात पर्दों में

तुम को यों छिपालूँ

देखूँ मैं तुम्हें।

8

माथा तुम्हारा

मन में झिलमिल

ईद का चाँद ।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 24, 2017

1779

शकुन्तला पालीवाल

शकुन्तला पालीवाल

शकुन्तला पालीवाल

1

अक्स प्रभु का

छिपा माँ के अंदर

सम्मान करो।

2

भीगी पलकें

कभी न रहे माँ की,

रहे खुश वो।

3

जीवन मेरा

कभी लगे पहेली

कभी सहेली।

4

जीत उसकी

थपेड़ों में टिका जो

आगे बढ़ा वो ।

5

अनकही हैं

सैंकड़ों बातें ऐसी

अब कहूँ वो ।

6

ये लगे कभी

तम हटेगा अभी

फैलेगी आभा ।

7

खूबसूरत

ये रंगीन दुनिया

ताज़गी देती ।

8

झाँकता मन

बन्द पिंजरें से भी

आशा के साथ।

9

खुशियाँ छार्इं

मिली तम को मात

हँसा दिवस।

10

कोंपलें फूटीं

नव सृजन हुआ

जागी आशाएँ

11

रंगों का मेला

ऐसे ही रहे सदा

नाचता मन ।

12

हम साया है

हम सफर है तू

जीवन मेरा ।

-0-

संक्षिप्त परिचय

 शकुन्तला पालीवाल

पिता का नाम : श्री विष्णु शंकर पालीवाल

माता का नाम : श्रीमती मंजु लता पालीवाल

जन्म तिथि : 03.05.1986

 पता : श्री विक्रम सिंह बया, 448, भूपालपुरा, शास्त्री सर्किल, उदयपुर-313001 (राजस्थान)

शिक्षा : एम. एस. सी. कृषि जैव प्रोद्योगिकी एवं आणविक जीव विज्ञान, बी. एड. , एम. ए. हिन्दी साहित्य

कार्यक्षेत्र : सहायक कृषि अधिकारी

ई – मेल : skys4shakku@gmail.com , shakku4smile@rediffmail.com

साहित्यिक प्रगति : अनेक विधाओं पर लेखन (हाइकु, कहानी लेखन, कविता लेखन, लघु कथा लेखन आदि) कविताएँ, लेख एवं लघु कथाएँ पत्र पत्रिकाओं एवं समाचार पत्र में प्रकाशित ।

स्थायी पता;जस्थान एग्रीकल्चर इण्डस्ट्रीज़,चित्तौड रोड, फतहनगर,जिला- उदयपुर     

 

 

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जून 20, 2017

1778

1फ़ौजी किसान-डॉ. जेन्नी शबनम

 1.

कर्म पे डटा

कभी नही थकता

फ़ौजी किसान। 

2.

किसान हारे

ख़ुदकुशी करते,

बेबस सारे। 

3.

सत्ता बेशर्म

राजनीति करती,

मरे किसान। 

4.

बिकता मोल

पसीना अनमोल,

भूखा किसान। 

5.

कोई न सुने

किससे कहे हाल

डरे किसान। 

6.

भूखा लाचार

उपजाता अनाज

न्यारा किसान। 

7.

 माटी का  पू

माटी को सोना बना

माटी में मिला

8.

क़र्ज़ में डूबा

पेट भरे सबका,

भूखा अकड़ा 

9.

कर्म ही धर्म

किसान कर्मयोगी,

जीए या मरे। 

10.

अन्न उगाता

सर्वहारा किसान

बेपरवाह। 

 11.

निगल गई

राजनीति राक्षसी,

किसान मृत

12.

अन्न का दाता

किसान विष खाता

हो के लाचार। 

13.

देव अन्न का 

मोहताज अन्न का

कैसा है न्याय?

14.

बग़ैर स्वार्थ

करते परमार्थ

किसान योगी। 

15.

उम्मीद टूटी

किसानों की ज़िन्दगी

जग से रूठी। 

16.

हठी किसान

हार न माने, भले

साँसें निढाल। 

17.

रंगे धरती

किसान रंगरेज,

ख़ुद बेरंग। 

18.

माटी में सना

माटी का रखवाला

माटी में मिला। 

19.

हाल बेहाल

प्रकृति बलवान

रोता किसान। 

-0-

2-डॉ. सरस्वती माथुर

1

शाखें हिला के

परिंदे ना उड़ाओ

तरू रोयेंगे।

2

नमकीन थीं

झील पार डोलतीं

मन हवाएँ ।

3

इमली बूटा

आँधी में शाखें हिली

पेड़ से टूटा ।

4

कच्ची सी धूप

आँगन बुहार के

रु पे चढ़ी ।

5

कुम्हार सूर्य

धूप की चाक पर

किरणें गढ़े

6

झीना घूँघट

चटक चाँदनी का

चाँद  उठा

7

मौसम संग

स्वप्न  बदलते ज्यूँ

धूप के रंग ।

8

भाड़ झोंकता

सूरज भभूजा

धूप सेंकता।

9

मन है लौ

समय लालटेन

यादें उजाले ।

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जून 15, 2017

1777

1-प्रियंका गुप्ता

1

सूखी धरती

दहकता गगन

तेरे ही कर्म ।

 2

मन जो तपे

प्रेम के छींटे मार

भीग जाएगा ।

 3

नारी का मन

तूने जाना ही नहीं

रहा अज्ञानी ।

 4

मिला न प्रेम

खोजते उम्र झरी

कस्तूरी बनी ।

 5

उँगली थाम

चलना था सिखाया

भूला वो अब ।

 -0-

2-पुष्पा मेहरा

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 13, 2017

1776


भावना सक्सैना

1

उगले आग

रोष में है प्रकृति

मानव जाग।

2

मेघ -सा छाया

धरती पे कुहासा

सँभल ज़रा सा।

3

यह क्या किया?

सूखे नदी- जंगल

दहकी धरा।

4

रोपे न वृक्ष

बिगड़ा संतुलन

घुटा है दम।

5

जल क्यों व्यर्थ

हर बूंद लिए है

अपना अर्थ। 

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जून 6, 2017

1775

1-रमेश कुमार सोनी

1

प्रकृति रूप

ऋतु वेश संवारें

जीवन न्यारे 

2

वट की लटें

धरा छूने निकले

बच्चों के झूले

3

जंगल घने

चुनौती देते खड़े

घुसो तो जानें

4

वन की भाषा

पशु – पक्षी बोलते

हम ही भूले

5

गाँव निगले

कंक्रीट अजगर

बने शहर

-0-बसना , छत्तीसगढ़ , मोबाल –  ९४२४२२०२०९

-0-

2-कशमीरी लाल चावला
1

पक्षी तो प्यासे

बूंद बूंद तरसे

आए ना मेघ

-0-

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