Posted by: डॉ. हरदीप संधु | नवम्बर 18, 2017

1809

 संतोष गर्ग  

1

 जय गणेश

काट दो सभी क्लेश

छूटे न देश ।।

2.

खिले हो ऐसे

लग रहे हो जैसे

फूल गुलाब ।।

3

कितना प्यारा

इस जग से न्यारा

संग तुम्हारा ।।

4

मन की बात

छूटे कभी न साथ

दुआ करूँ मैं ।।

5

खिलते रहो

तुम से भी पहले

मैं  मुरझाऊँ ।।

6

उससे कहूँ

वादा निभाना तुम

खुद से डरूँ ।।

-0-

संतोष गर्ग,#126, एच आई जी,सेक्टर-71 मोहाली 

santoshgarg1211 <santoshgarg1211@gmail.com>

Advertisements
Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 13, 2017

1808

संगीता दत्ता,किलकारी’ बिहार बाल भवन के सौजन्य से  प्राप्त हाइकु [ publication@kilkaribihar.org ]

  1- प्रिंयतरा भारती,   संत जेवियर्स स्कूल, वर्ग- 8

 1

मोर-सी नाचूँ

झमाझम बारिश

मेरी ख्वाहिश

2

सदानीरा हैं

सुख– दुःख दोनों ही

इन नैनों के

3

सारे चेहरे

पड़े सुर्ख, मैंने जो,

बनाया मूर्ख

4

 माँ ने कहा कि

 मेरे लिए जादू तो

 है मेरा शिशु

5

कालातीत था

भूला दिया समझ

कि अतीत था।

6

जि़न्दा मैं अभी,

ऐ मौत, खेल फि़र

खेलना कभी

7

ख्याल आजाद

होते हैं, फि़र भी ये

मन में कैद

8

नन्ही कोपलें

खुशियाँ बिखेरेंगी

इस धारा पे

9

गगनचुम्बी

बनूँगी जरूर ही

एक दिन मैं

10

दीपक बन

फैलाऊँ उजियारा

संसार में मैं

-0-

2- खुशबू सिन्हा ,संत मैरीज स्कूल,वर्ग- 9

1

बिछे थे काँटे,

जन्मी जब बिटिया

खिले कमल

2

पेड़ काटते

जि़दगी से खेलते

आँसू न आते

3

है रामबाण

 सुशिक्षा ज़िन्दगी का

 मानव गढ़े।

4

हम बच्चों की

 किताबों में  भरे हैं

 हीरे व  मोती

5

पंछी की बोली

गजब लगी मीठी

पेड़ों पे डोली।

6

फ़ूलों के बाग

काँटे भरी राह है

हमें मिलाती।

7

घर मेरा ये

सपनों से भरा है

नई ज़िन्दगी।

-0-

3- राजेश्वरी,डी- पी- एस  दानापुर,वर्ग- 6

1

हम हमेशा

 कूड़ा कूड़ेदान में

 डालें भइया

2

गर्मी इतनी

 पंखा चलाओ जब

 तपेंगे हम

3

पेड़ ना काटो,

हम सब के लिए

जीवन हैं ये ।

4

बंदर भाई,

उछले पेड़ पर,

गिरे नदी में

5

तितली उड़ी,

 आसमान को छूने,

 थक गई वो

6

 बारिश आई,

 मोर नाचा, साथ ही

 जंगल नाचा

7

सुबह हम

सब खेल खेले थे,

पसीना छूटा

8

टीचर आए !

सब शोर मचाए,

हैं बच्चे भागे

9

सर्दी आई

 नाक लाल हो गई,

 आग जला ली

10

आँधी है आई

 सारे कपड़े उड़े,

 जल्दी भाग ना

-0-

4 रानी कुमारी,कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स,वर्ग- स्नातक 1

1

कौन है यहाँ

जो दुःख न भोगा है

राम हैं रोए।

2

गिरी उसकी

पलकों पर बूँद

औ’ आँसू बनी

3

ये मेरी कश्ती

मझधार मे फ़ँसी

खेके रहूँगी।

4

जिद है मुझे

आसमाँ  को छूकर

भू पे लाने की

5

पा गया कुछ

वो पागल बना था

यही सच है

6

मोहब्बत का

 काफि़ला निकला है

 काँटों की गली।

7

उँगलियों को

पकड़ तुमने माँ

ग दिखाया।

8

मन वीणा है

मोहब्बत संगीत

जीने यही है।

9

ये झुकी आँखें

उनसे गिरी बूँदें

 टपका दर्द।

10

टूटकर भी

 न टूटे मंजिल पर

 जाने की ज़िद।

-0-

5- सृजन कुमार,लीटरा वैली,वर्ग- 6

1

माँ बड़ी प्यारी

लोरी हमें सुनाती

खुद सो जाती

2

पापा का पैसा

तुरंत खर्च होता

कम बचता

3

 दीदी हैं अच्छी

 बहुत हैं पढ़ती

 खेलतीं नहीं

4

बिजली भागी

पंखा हो गया बंद

पसीना बहा।

5

तेज़ी से उड़ी

बादलों के ऊपर

 मेरी पतंग

6

अइयो रामा!

 आइसक्रीम खा

 मज़ा आ गया।

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | नवम्बर 5, 2017

1807

1-सुदर्शन रत्नाकर

1

कौन सुनता

दिल स्वयं सहता

दर्द की घातें।

2

घायल मन

मरहम न पट्टी

रिसता खून।

3

आज के रिश्ते

रेतीले घर हों जैसे

भुरभराते।

4

अजनबी से

रह रहें हैं लोग

ऊँचे मकान।

5

बहुत सहा

ये तन्हाई का गम

भरा है प्याला।

-0-

2- डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

1

सुनो तो ज़रा

दिल ही तो सुनता

दिल का कहा ।

2

हैं अनमोल

ज़ख़्मों को भर देते

दो मीठे बोल ।

3

उधड़ी मिली

रिश्तों की तुरपन

गई न सिली ।

4

फाँस थी चुभी

मुट्ठी में अँगुलियाँ

बँधी न कभी ।

5

अरी तन्हाई !

शुक्रिया संग मेरे

तू चली आई ।

-0-

3-अनिता मण्डा
1
उठाके थका
वेदनाओं का भार
बैचेन मन।
2
ठिठके तारे
रातरानी महकी
चाँद से मिल।
3
अपने लगें
विरह- भरे गीत
पीर एक -सी।
4
छल-बल की
हो रही बरक़त
पाप का घड़ा।
5
दंग चौराहे
गुमराह भीड़ में
ट्रैफ़िक जाम।
6
धूप-छाँह की
चादर पेड़ तले
हवा से हिले।
7
एक तमाचा-
समाज के मुँह पे
भिखारी बच्चे।
8
मेरे सुर में
उदासी का संगीत
तुमने चीन्हा।
9
छिपे ना राज़
पढ़ती सब कुछ
मन की आँखें।
10
पेड़ बदलें
ऋतुओं की पोशाक
चुपचाप से।
11
अनुभूतियाँ
सिलवटों में लिखी
मुख पे सजी।
12
मटमैला- सा
मन का कैनवस
खिले न रंग।
-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 26, 2017

1806

    जापानी विधाओं की रचना का ऐतिहासिक शिलालेख

: रमेश कुमार सोनी

            डॉ. सुधा गुप्ता जी द्वारा रचित उक्त शोध ग्रन्थ को पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ , इस अद्भुत शोध ग्रन्थ में 1995 से लेकर अब तक की जापानी विधा के हाइकु , ताँका , सेदोका की भूमिकाएँ , समीक्षा , आलेख तथा उनके  पसंद की रचनाएँ समाहित हैं,जो उनकी  रचना संसार में संवेदनाओं के सूक्ष्मावलोकनों का जीवित संसार है ।

    इस संग्रह के द्वारा मुझे हाइकु की  विकास यात्रा की सम्पूर्ण जानकारी मिली , यह नए पाठकों तथा शोधार्थियों के लिए भी एक अनमोल साहित्यिक धरोहर है ; इसे सभी हाइकु लेखकों को अनिवार्यतः पढना चाहिए । बार – बार पढने का आमंत्रण देते इस पुस्तक को पढ़ते हुए ऐसा लगा जैसे मैं स्वयं उन पुस्तकों को पढ़ रहा हूँ ,जिनकी इसमें समीक्षाएँ, भूमिकाएँ और आलेख प्रकाशित हैं।  डॉ. सुधा गुप्ता जी की अपनी यह विशेषता है कि वे अपने शब्दों को बहकने नहीं देती , आश्चर्य होता है कि इतने लम्बे वक्त पर लेखन के दौरान वाक्यों का कोई दोहराव नहीं है ,वरना एक लेखक के साथ ऐसा संभव है । एक साथ इतने सारे जापानी विधा के हस्ताक्षरों को पढ़ना एक अद्भुत रोमांच रहा तथा उत्सुकता बनाए रखा ।

              डॉ. सुधा गुप्ता जी की हाइकु के लिए समर्पण इस ग्रन्थ के द्वारा प्रकट होती है कि वे बड़ी उदारता से नव लेखकों को प्रोत्साहित करने उनकी कृतियों को पूरा आशीर्वाद प्रदान करती रही हैं । इसमें मेरी पहली हाइकु संग्रह –रोली अक्षत का भी उल्लेख है।  इसके अलावा इसमें दी गई कुछ पुस्तकों को मैंने पढ़ा भी है । आपने पूर्ण सौम्यता से समीक्षा में  सभी को मातृवत् निर्देश दिया है ।यहाँ उनके शब्दों की शालीनता स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई है ; शब्दों का ऐसा अप्रतिम सौन्दर्य तथा अनुशासन युक्त संतुलन सदियों में कभी- कभार ही मिल पाता है ।

              इस विकास यात्रा को पाठकों तक लाने का श्रेय सुधा जी ने रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी को दिया है ,जो सर्वथा उपयुक्त है ; वाकई हाइकु की ऐसी निःस्वार्थ सेवा का एक दूसरा नाम आपने चरितार्थ किया है । हिन्दी हाइकु एवं त्रिवेणी ब्लॉग के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व को दिशा देते हुए नव लेखकों को प्रोत्साहित करना आसान कार्य नहीं है । बिखरे हुए ग्रंथों को समेटना , सम्पादित करना , प्रकाशित करना यह आपके श्रम की पराकाष्ठा का एक नायाब नमूना है ; सबसे बड़ी बात यह है  कि इस ग्रन्थ में संपादक का अपना कोई पृष्ठ नहीं है । इसमें आप  द्वय के योगदान एवं परिश्रम को नमन इस ग्रन्थ को कोई हाइकुकार पढ़े बिना सर्वथा अधूरा ही रहेगा ऐसा मेरा मानना है । एक अच्छे ग्रन्थ को पाठकों तक लाने के लिए – बधाई एवं साधुवाद स्वीकारिए ।

    हिन्दी हाइकु ,ताँका , सेदोका की विकास यात्रा एक परिशीलन: डॉ. सुधा गुप्ता; संयोजन:रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ;अयन प्रकाशन,1/20 महरौली , नई दिल्ली-110030;  संस्करण:2017; पृष्ठ:232 , मूल्य: 500रुपये.

-0- रमेश कुमार सोनी, बसना , छत्तीसगढ़-493554 ,मोबा.9424220209  

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अक्टूबर 21, 2017

1805

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 19, 2017

1804

1-जेन्नी शबनम

1.

तम हरता

उजियारा फैलाता

मन का दीया।

2.

जागृत हुई

रोशनी में नहाई

दिवाली-रात

3.

साँसें बेचैन,

पटाखों को भगाओ

दीप जलाओ।

4.

पशु व पक्षी

थरथर काँपते,

पटाखे यम।

5.

फिर से आई

ख़ुशियों की दिवाली

हर्षित मन।

6.

दिवाली रात

दीयों से डर कर

जा छुपा चाँद।

7.

अँधेरी रात

कर रही विलाप

दीयों की ताप।

8.

सूना है घर,

बैरन ये दिवाली

मुँह चिढ़ाती।

9.

चाँद जा छुपा

सूरज जो गुस्साया

दिवाली रात।

10.

झुमती रात

तारों की बरसात

दीयों की पाँत।

-0-

2 -सुशील शर्मा

1

मन का दीया 

जलती रहे बाती 

प्रेम का तेल।

2

दीपमालाएँ

झिलमिल सितारे 

जमीं पे सारे।

3

दीपक तले 

छिपता है तिमिर  

कहाँ भागता।

4

सजा रंगोली 

बैठीं हूँ दरवाजे 

आओ माँ लक्ष्मी।

5

आई दीवाली 

अँधेरी अमावस 

बनी दुल्हन।

6

दीपक की लौं 

अन्धकार चीरती 

अकेली खड़ी

7

घना तमस 

उजियारे की आस 

दीये के पास।

8

नेह के दीये 

ज्योतिर्मय हृदय 

जीवन जिए।

10

नन्हा दीपक 

दूर तक फैलाए 

आशा की आभा

11

हर आँगन 

अंजुरी भरकर 

बिखरा प्रेम।

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अक्टूबर 18, 2017

1803

कल्याणा

1-अनिता ललित 

1

इस बरस
पापा नहीं हैं साथ
दीये उदास।
2
कैसी दीवाली !
पापा की कुर्सी ख़ाली
दिल है भारी।
3
सूना आँगन
अँधेरे में सुबके
पापा के बिन।

4

माँ है उदास
खोई-खोई रहती

रो भी न पाती।

5

अँधेरा घन

है दिल में पापा की 

यादें रौशन !

6
दे के दुआएँ
न जाने कहाँ खोए
क्यों ऐसे सोए?
7

उनका प्यार  

आशीष भरा हाथ 

है मेरे साथ !

8

मेरे ईश्वर,!
मेरे पापा को देना
अपना साथ।

9

देना सुक़ून

सदा थामे रहना 

उनका हाथ !

-0- 

2-डॉ.पूर्णिमा राय

  1

आपसी स्नेह

भावना के दीपक

चलो जलाएँ!!

 2

जलते दीपक

तम मिटाने हेतु 

हुआ मिलाप!!

3

मन- आँगन

दीप की लौ बढ़ाती

प्रेम-सौहार्द!!

 4

सुखद स्पर्श

भावपूरित नैन

चमक लौ की!!

5

दीपक की लौ

निराशा में आशा को

करे सजीव!!

6

शुद्ध विचार

स्वस्थ वातावरण

दीप जलाना!!

 7

‘पूर्णिमा’-रात

चाहें सभी मनुज

दीप जलाओ!!

8

दीप माटी के

मनमोहक लगें

जलाके देखो!!

9

खरीदें दीये

रौनक चेहरे पर

निर्धन खिला!!

10

बिकें दीपक

दुआएं दामन में 

सजी दीवाली!!

-0-

डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर(पंजाब)

ईमेल–drpurnima01.dpr@gmail.com

वेबसाइट—www.achintsahitya.com

-0-

3-पुष्पा मेहरा

1

खोल के रखो

द्वार इस मन के

आए रोशनी ।

2

चंचल धारा

नेह डूबी वर्तिका

गन्तव्य ढूँढे ।

3

शान्त मन से

गाँठ-गाँठ खोलके

उजाला बुनें ।

4.

झिलमिलाते

आकाश में सितारे

धरा पे दीप ।

5

आकाशदीप

भेद रहे अँधेरा

संकल्पबद्ध ।  

6

प्रेम की बाती

मन के दिवले में

अक्षुण्ण जले ।

7.

जलता रहे

मानवता का दीप

खुशियाँ व्यापें ।

8

माटी का दीप

रुई की बाती-तेल

मिल के जले ।

9

नन्हे दीपक

एकता में बल है

बता के जलें ।

-0-Pushpa.mehra @gmail .com

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 17, 2017

1802

1-डा. सुरेन्द्र वर्मा 

1

दी जलाओ 

हर  अँधेरा कोना 

जगमगाओ

2

अँधेरा घना 

विपरीत हवाएँ 

दिया न डरा 

3

बैठो न चुप 

रात अँधियारी हो 

ज्योति जलाओ 

4

दीप धरा के 

आकाश की आँखों के 

बने  हैं तारे 

5

जगाए रखो 

आशा व प्रतीक्षा का 

नन्हा सा दीया 

6

उफ़ न करे 

वो तिल तिल जले 

हरे अँधेरा 

7

कठिन पथ 

राह आसान  करो

दिया जलाओ 

 

-0-10, एच आई जी / 1, सर्कुलर रोड ,इलाहाबाद –211001 

-0-

2-सुनीता काम्बोज

1

आए सितारे

झिलमिल धरती

दीवाली पर्व।

2

पर्व बाँटते

आनन्द की मिठास

जीवन हास

3

नूतन लगे

हर बार दीवाली 

बड़ी निराली ।

4

दूषित हवा

पटाखों का ये शोर

बढ़े बेचैनी।

5

माटी के दीप

देखो लगे हँसने 

मन बसने ।

6

करती बात

अमावस की रात

नभ के साथ ।

7

दीवाली आई

मन को भी बुहारे

करे सफाई ।

-0-

3-सारिका भूषण

1

घबरा रहा

चंचल शोख मन

अकेलापन

2

नाचता मन

सुखद है आभास

न सूनापन

3

मुसकाओ तो

खिलती हैं कलियां

बालपन की

4

रंगबिरंगे

सपनों का था मेला

वह अकेला

5

खिलखिलाते

सितारों की दुनिया

है बेमिसाल

-0-

4-जितेन्द्र वर्मा

1

अपने बच्चों को

चोंच मार उडाती

माता चिड़िया

2

कहाँ हो तुम?

मिलते क्यों नहीं हो?

बदला पता?

3

कैद है मन

भागता हुआ थका

कैद तुम्हारी

4

कोई नहीं है

मै हूँ और तुम हो

और ये सच

5

जलती शमा

पतंगे भी जलते

आग का  खेल

6

ठण्डी हवाएँ

घिर घिर के आएँ

तुम हो कहाँ?

7

पायल बजी

घुंघरुओं की ध्वनि

तुम जो आए ।

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अक्टूबर 9, 2017

1801

1-कमला निखुर्पा

1.

चौथ के चाँद

मोहक नज़र से 

हमें ना बाँध।

2.

चाँद लजाए

छलनी से निहारे 

धरा का चाँद।

3.

मन गगन 

हर पल रौशन

चंदा सजन ।

4.

पिया है चाँद

चाँदनी मैं उनकी 

पूनों जिंदगी।

-0-

2-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

हर आँगन

सुवासित हों रोम

बन चन्दन

2

जीवन-छन्द

अम्बर तक है डोरी

छू लिया चन्दा।

3

प्राण-पाहुने

रहें सदा ही साथ

हाथों में हाथ।

4

जन्म-जन्म से

जब गूँथा है प्यार

महका द्वार।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 7, 2017

1800

    ‘किलकारी’बिहार बाल भवन, शिक्षा विभाग बिहार सरकार की एक संस्था है। यहाँ बच्चों के साथ सृजनात्मक लेखन से संबंधित कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं। बच्चों ने कुछ  हाइकु लिखे हैं।किलकारी’ बिहार बाल भवन से जुड़ी संगीता दत्ता जी ने कई छात्रों के हाइकु भेजे हैं। उनमें से 4 छात्रों के हाइकु प्रकाशित कर रहे हैं। अन्य के हाइकु भी शीघ्र  प्रकाशित किए जाएँगे।

सम्पादक द्वय

1- अभिनंदन गोपाल,संत जेवियर्स स्कूल,वर्ग- 8

1      

काँटों के पार,

देखोगे तो मंजिल,

आती नज़र।

2      

बड़ा सुहाना,

है मौसम , तो करें,

हम मस्तियाँ

3      

हँसी हमेशा,

रखो इन ओठों पे,

फूलों-सी तुम

4      

कोई कविता,

मन में बस जाती,

होती है ऐसी।

5

 शरारतें तो

आखिर करेंगे ही,

बच्चे हैं हम।

चाँद उजला,

 कौन सी क्रीम यह,

लगाता भला !

जीवन बोया,

मुरझा गया अब,

वो तरुवर

8

 प्रभु को ढूँढ़ा,

 मैं जहाँ-जहाँ पे मैंने

 मुझे माँ दिखी।

9

इस मन को

 न बाँधों, करने दो,

 कल्पना नई

10

बनाया घर,

पर खुद को घर

 नसीब नहीं  

-0-

2- रौशन पाठक,संत कोलम्बस वर्ग- 8

1

कलम ही है

 हथियार हमारा

 इसे न छोड़ो

कोमल मिट्टी

 हर रूप है लेती

 उसका गुण ।

3

माँ का सपना

अच्छा इंसान बनूँ

 पूरा करूँगा ।

सम्मान करूँ

अपने बड़ों का मैं

 पाऊँगा प्यार।

5

 किताब मेरी

 सुनहरे रंग की

 मैं तो पढूँगा।

शिक्षा जरूरी

हम सबको मिले

 खुशियाँ बढ़ें।

कोरा कागज

और कलम मेरी

 हैं जिंदगानी ।

8  

सब दु:ख तो

हैं जीवन के अंग

लड़ेंगे संग।

जम़ी के रंग

उतारेंगे अपने

दिल में हम ।

-0-

3- अतुल रॉय,संत रवीन्द्र भारती चिद्यालय,वर्ग- 10

 

वो भूल गए

जैसे पतझड़ की

टूटी पत्तियाँ

ज़िन्दगी नदी

सुख-दुख के बीच

बहती सदा ।

हमारी बातें

माँ सब जान जाती

 न जाने कैसे

ख्वाबों के पर

 टूटते ही रहते

 बुलबुले– से

कैसी दुनिया

कहे बेटा बाप से

मेरा राज है

है छाई घटा

 बिजुरी चमकती

 बिखेरे छटा

7

 जन बदले

किलकी किलकारी

बेटी होने पे

-0-

4-    सम्राट समीर,    सर जी- डी- पाटलीपुत्र स्कूल,    वर्ग- 10

1

ओ री चिड़िया

 मैं उडूँ- संग तेरे

खुली हवा में

2  

सोच रहा हूँ

कुछ नया करूँ मैं

फूलों  के जैसा ।

3  

कोयल काली

हिली पेड़ की डाली

है मतवाली

4

मैं नन्हा बच्चा

पर दिल का हूँ मैं

बड़ा ही सच्चा

5

मुलाकात हो

नई शुरूआत हो

कुछ बात हो

6

मैं मूर्ख बना

दोस्तों को भी बनाया

मज़ा है आया

क्या नज़ारा है

आज ये मौसम तो

बड़ा प्यारा है

8

पेड़ों की छाँव

 याद आता है मुझे

 प्यारा वो गाँव

9

बारिश हुई

खुश हुए किसान

लौटी मुस्कान

10

पानी बचाओ

प्रकृति को फिर से

ताज़ा बनाओ

11

लड़के बोले

पेड़ो में लग गए

  अब टिकोले

-0-

Older Posts »

श्रेणी