Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 7, 2021

2130-झील

1-सुदर्शन रत्नाकर

1

झील- सी आँखें

देखतीं जब मुझे

डूबना तो है।

2

अक्स चाँद का

लिपटा है झील से

हो गए एक।

3

शांत है सोई

पर्वत की गोद में

आँख -सी झील।

4

एकांतवास

है शांत समाधिस्थ

पर्वतसुता।

5

नौका -विहार

झील के वक्ष पर

ख़ुशी अपार।

6

बर्फ़ है जमी

अहल्या-सी हो गई

सर्दी में झील।

7

यादों की नाव

तैरती है रहती

मन -झील में।

8

झील का जल

थरथराता रहे

चलें शिकारे।

9

नीरव रात

झील में उतरते

नहाने तारे।

10

तैरते हंस

झील -गोद में जब

माँ -सा सँभाले।

11

झील -जल  में

खिल रहे कुमुद

स्वर्ग- कानन।

-0-

ई-29,नेहरू ग्राउंड ,फ़रीदाबाद 121001

मोबाइल न.9811251135

-0-

2-प्रियंका गुप्ता

1

चाँद का अक्स

छू इठलाई झील

उसका न था ।

2

कौन पुकारे ?

तरंगित-सी झील

तट से बंधी ।

3

शांत-सी झील

सुन रही थी बातें

प्रीत से पगी ।

4

प्रेम से ताके

झील पे बैठा चाँद

सोई धरा को ।

5

छुए जो हवा

काँप उठती झील

प्रेम से भरी ।

Posted by: हरदीप कौर संधु | मार्च 5, 2021

2129-सागर 

फोटो: गूगल से साभार

रश्मि विभा त्रिपाठी ‘रिशू’

1

हँसा सागर

लो सूर्य लहरों से

मिलने आया

2

सागर-साक्षी

उमड़ती लहर

सूर्य-प्रेम में

3

थका औ हारा

सूर्य शाम को बैठा

सागर-गोद

4

उतरा सूर्य 

अम्बर से भू-लोक

छिपा सिन्धु में 

5

आ जाता रोज

लहरों से मिलने

प्रेमी सूरज 

6

रवि से सिन्धु

लहर जब मिली 

स्वर्ण- सी खिली

7

सागर-मन

क्या-क्या समाए पाए

थाह न कोई

8

सन्ध्या की बेला

सागर तट बैठा

सूर्य अकेला

9

सागर-तट

लहरों- संग खेले

बालक सूर्य

10

सोया सागर,

नींद से जगा गई

चंचल हवा

11

पूर्णिमा-रात

चंद्रमा सागर में 

गोते लगाता

2

सागर-नैन

बहे खारा-सा नीर

कुछ न कहे

13

निशा सिंधु के

सैर सपाटे पर

तारे निकले

14

रवि-चुम्बन 

पा लहर का मन 

करे स्पंदन 

15

योगी है सूर्य

सागर तट पे बैठा 

धूनी रमाए

16

रात के किस्से

छेड़ें चाँद सिन्धु को

सोने  नहीं दे

-0-

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 4, 2021

2128

1-पुष्पा मेहरा

1

कमल जागे

नीली झील में भौंरे

डोलने लगे ।

2

झील ये मन

सागर सी लहरें

तोड़तीं तट ।

3

सूखी है झील

सूर्य ना माप सका 

उसकी प्यास ।

4

झील ये मन

गहरे दबा-सोया     

जीवन पोथी ।

5

तोड़ ही गया

झील की खामोशियाँ

नन्हा कंकड़ ।

6

झील उदास

अमावस की रात

चाँद ना पास ।

7

हुआ कमल

नीली झील का जल

सजी रँगोली ।

8

आया बसंत

मोतियों -भरे थाल

झील में तैरें ।

9

कुहा से ढकी

अनमनी– सी पड़ी

झील अबोली ।

10

पूनो की रात     

चद्रमा का गुरूर

झील ने तोड़ा ।

11

ओस नहाए

झटक रहे पेड़

झील में लटें ।

12

झील– सा मन

सागर सा गहरा

भेद अभेद ।

13

झील -नयन

स्वप्न लहर बीच

मीन-हिलोरें ।

14

बंद पलकें

नैन झील किनारे

सोए दो भौंरे ।

 .mehra@gmail.com

-0-

2-रचना श्रीवास्तव 

1

झील है टाँकें 

आँचल में अपनी 

अनेकों तारे 

2

झील- दुल्हन 

बटोरे आँचल में 

तारों के मोती 

3

प्रेम की झील

उतरा था अकेला

मासूम चाँद

4

शक की गर्द

सूखी है प्रेम- झील

हंस है प्यासे

5

प्रेम का सोता

पर्वत से बहता

झील बनता

6

अपनी शक्ल 

है अम्बर निहारे 

नीली झील में

6

प्रेम- परिंदा

प्रतिबिम्ब निहारे

झील -दर्पण

7

शांत झील में 

काहे   मारा पत्थर 

उठी तरंगें 

8

बावरी घटा 

चूमकर पर्वत 

बरसे झील 

9

हुई सिंदूरी 

नीली साड़ी झील की 

सूरज डूबा 

10

माँ झील की 

गोद में आ समाया 

बालक चाँद 

11

हवा की मौज 

तारे खेवें झील में 

अपनी नैया 

12

सीधी पाँत में 

झील के आँगन में  

बत्तखें चले 

-0-

Los Angeles, CA

http://rachana-merikavitayen.blogspot.com/

Los Angeles, CA

http://rachana-merikavitayen.blogspot.com/

-0-

3-सविता अग्रवाल ‘सवि’

1

झील को देख

बादल लाये मेह

अटूट स्नेह।

2

चन्दा का बिम्ब

झील संग झूलता

झुलाती हवा।

3

दानी है झील

स्वयं जल में डूब

प्यास बुझाती।

4

चाँद लिखता

झील के पन्नों पर

प्रेम की पाती।

5

ठंडी हवाएँ

झील को डराकर

बर्फ़ बनाएँ।

6

नौका दौड़ती

झील को चूम-चूम

लुत्फ़ उठातीं।

7

कमल खिलें

कोख में रखकर

झील मुस्काये।

8

झील के होंठ

हवाओं का चुम्बन

थर्राया जल।

-0-

4-डॉ.महिमा श्रीवास्तव
1

झील में डूबा

चाँद  क्यों है उदास

रोई चाँदनी।

2

झील में नैया

खोजे माँझी सयाना

मिले किनारा।

3

झील से नैन

भरा पीर का नीर

डूबते स्वप्न ।

4

प्राची में लाली

स्वप्निल झील जगे

कमल हँसें।

-0-

5-प्रीति अग्रवाल

1.

झील किनारे

फिर तुम्हारी यादें

खूब रुलाएँ।

2.

झील ने पूछा-

कहाँ है तेरा साथी

रूठ गया क्या?

3.

झील सी आँखें

प्रियतम की मेरे

डूब न जाऊँ !

4.

झील के पार

चितचोर जो मेरा

उसका गाँव।

5.

सोई थी झील

यादों के कंकर ने

उसे जगाया।

6.

उदास झील

इंतज़ार में बैठी

थक के रोयी।

7

झील पुकारे-

उसी की सुन लो, जो

मेरी न मानो।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | मार्च 3, 2021

2127-हाइगा

 

 

सीमा सिंह [ श्री शक्ति]

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 2, 2021

2126

झील

 छाया चित्र -1 जुलाई -2018

काम्बोज-कैमरा

1-डॉ. सुरंगमा यादव 

1

मन की झील

रात भर चमका

यादों का चाँद। 

2

चाँद लेखनी

लहरों पर लिखूँ

प्रेम रागिनी।

3

झील में चाँद 

पकड़ने की जिद

हठीला मन।

4

झील में चाँद 

उमस भरी रात

नहाने आया।

5

सर्द मौसम

ठिठुर कर झील

ठहर गयी।

6

झील उदास

चाँद-सितारे पास

फिर भी दूर।

-0-

2-कृष्णा वर्मा 

1

झील के पात्र 

आन भरे चाँदनी

नूर -सौगात।

2

साँवली निशा

जुन्हाई के ताल में

बैठ नहाए।

3

वृक्ष विहारी 

झील के आइने में

अक़्स निहारें।

4

झील दुलारे 

लहरों के हिंडोले

झूलते तारे।

5

ताल का हाल 

दौड़-दौड़ नौकाएँ 

करें बेहाल।

6

शर्मीली झीलें

ओढ़ें कर चाँदनी

धू- सी खिलें। 

7

नौकाएँ जानें

झील की लहरों के

प्रीत -फसाने।

8

ठुनके झील

मसख़रे वृक्षों की 

छेड़छाड़ से।

9

स्नेही तलैया 

तारों को गोद बिठा 

लाड़ लड़ाए।

10

र्मि के झूले 

अंक ले चाँद गाए

 मीठी-सी लोरी। 

11

झील आगार

हँसें कुमुदनियाँ

भौंरे नाराज़।

-0-

3-नन्दा पाण्डेय

1.

झील की आँखें

स्वप्न समंदर का

थाह न पाए

2.

झील में डूबी

जिंदगी की किताब

हवा यादों की

3.

उष्ण जल को

छिपा कर आँखों में

झील को देखा

4.

जख्म झील का

रुदन नदियों का

किसने देखा

5.

हर्ष – शोक के

नीरव निर्झर में

डूबा है मन

6.

खुश्क पत्तियाँ

अंतहीन प्रेम में

निहारे झील

7.

आँखों में प्रेम

पहाड़ी झरनों सी

खिला पलाश

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | मार्च 1, 2021

परिचय

परिचय

डॉ .कविता भट्ट परिचय एवं रचनाएँ

जन्म तिथि एवं स्थान:06 अप्रैल, 1979, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड

शैक्षिक योग्यता: स्नातकोत्तर (दर्शनशास्त्र, योग, अंग्रेजी, समाजकार्य), यू .जी .सी. नेट –1-दर्शनशास्त्र, 2- योग ; पी-एच. डी. (दर्शन शास्त्र–योग विशेषज्ञ);डिप्लोमा- योग, महिला सशक्तीकरण, आई.टी.आई.

एवार्डेड: जे० आर० एफ०, आई सी पी आर, नयी दिल्ली , जी०आर०एफ०, आई सी पी आर, नयी दिल्ली , पी०डी०एफ० (महिला), यू जी सी, नयी दिल्ली।

ध्यापन: अनुसन्धान अनुभव- क्रमश: 8 और 14 वर्ष, दर्शनशास्त्र एवं योग विभाग, हे०न० ब० गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर गढ़वाल, उत्तराखंड

प्रकाशित पुस्तकें[सम्पादन]

  1. घेरंड संहिता में षट्कर्म, योगाभ्यास और योग

  2. योग परम्परा में प्रत्याहार

  3. योग दर्शन में प्रत्याहार द्वारा मनोचिकित्सा

  4. योग के सैद्धांतिक एवं क्रियात्मक पक्ष (कुछ पुस्तकें विश्वविद्यालयीय पाठ्यक्रम में सम्मिलित हैं)

  5. योग -मञ्जूषा (बहुविकल्पीय योग -प्रश्नोत्तर – संग्रह )

  6. योग-साधना,

  7. योग ;एक महान् भारतीय विरासत ,

  8. योग; सैद्धान्तिक एवं प्रायौगिक विवेचन,

  9. Yoga Manjusha

  10. सूर्य (ज्ञान-विज्ञान)

  11. चन्द्रमा (ज्ञान-विज्ञान)

  12. आज ये मन(काव्य -संग्रह ) ,

  13. मन के कागज़ पर(काव्य -संग्रह )

  14. घुँघरी(काव्य -संग्रह ),

  15. मीलों चलना है(काव्य -संग्रह )

सम्पादनस्वप्न – शृंखला( सम्पादित हाइकु -संग्रह -रामेश्वर काम्बोज के साथ ),गद्य-तरंग(गद्य -अनुशीलन )

प्रकाशित शोध-पत्र/आलेख: अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय शोध-पत्रिकाओं/पत्रिकाओं/समाचार-पत्रों/पुस्तकों में लगभग पचास से अधिक शोध पत्र/अध्याय/साक्षात्कार/लोकप्रिय लेख/पुस्तक समीक्षा आदि , अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओ में तथा ऑनलाइन अनेक लोकप्रिय हिंदी कविताएँ/हाइकु तथा ज्ञान-विज्ञान सम्बन्धी कुछ अध्याय पाठ्यक्रम में सम्मिलित। शैक्षणिक/साहित्यिक/सामाजिक गतिविधियाँ:विभिन्न राज्यों की साहित्य अकादमियों हेतु लेखन-व्याख्यान आदि शैक्षणिक गतिविधियों के सक्रिय/ विभिन्न राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों आदि में शोध-पत्र प्रस्तुतीकरण, आमंत्रित व्याख्यान और कवि सम्मेलनों में कविताओं का प्रस्तुतीकरण, योग शिविर आयोजन, आकाशवाणी से समकालीन विषयों पर वार्ताओं का प्रसारण।

उत्तरदायित्व; सलाहकार(कार्यक्रम सलाहकार समिति) एन सी एस सी टी ( विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी मन्त्रालय), भारत सकार, नई दिल्ली

राष्ट्रीय महासचिव: उन्मेष : ज्ञान-विज्ञान विचार संगठन, भारत

परामर्श-मण्डल: ‘हिन्दी चेतना’ (हिन्दी त्रैमासिक), हिन्दी प्रचारिणी सभा, कैनेडा।

प्रान्तीय अध्यक्ष (उत्तराखंड): कायाकल्प साहित्य-कला फाउंडेशन, नोएडा, उ. प्र.(भारत)

सह संपादिका: जिज्ञासा (ज्ञान-विज्ञान लोकव्यापीकरण की शोध -पत्रिका), उन्मेष : ज्ञान-विज्ञान विचार संगठन, जबलपुर, मध्य प्रदेश, भारत

स्थानीय संपादिका (उत्तराखंड): ‘साहित्य ऋचा’ साहित्यिक पत्रिका (वार्षिक), नोएडा, उ. प्र.( भारत)

सम्मान:[कतिपय]

  1. शिक्षा एवं साहित्य हेतु नारी अलंकरण सम्मान, आप और हम चेतना मंच, उ०प्र०,2017

  2. शैक्षिक एवं साहित्यिक गतिविधियों हेतु, कायाकल्प साहित्य भूषण सम्मान, कायाकल्प साहित्य- कला फाउंडेशन, नोएडा, उ प्र, 2017

  3. फ्यूँली कौंथिन सम्मान-2018

  4. राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना शिक्ष-सम्मान 2018

  5. डॉ मिथिलेश्कुमारी मिश्र जयन्ती-सम्मान-2018

  6. माँ नन्दा शक्ति सम्मान-2019

सदस्या: हिमालय लोक नीति मसौदा समिति, उत्तराखंड

सम्प्रति: फैकल्टी डेवलपमेंट सेण्टर, पी.एम.एम.एम.एन.एम.टी.टी.,प्रशासनिक भवन II, हे.न.ब.गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर (गढ़वाल), उत्तराखंड-)- 246174

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 28, 2021

2124-चाँद -दिनमान

1-चाँद ने झाँका

कमला निखुर्पा

1

पूर्वी झरोखा 

तरुओं की ओट ले 

कमला निखुर्पा

चाँद ने झाँका ।

2

किरणें चलीं 

छूने तरु- वसन 

चाँद मुस्काया ।

3

चकवा कोई 

दूर कहीं चहका

पी तू है कहाँ ।

4

मौन दिशाएँ

धीरे धीरे रजनी 

लोरी सुनाए ।

गगन-पथ

जगमग रोशन 

बटोही चाँद। 

-0- 

2- अटका दिनमान

भावना सक्सैना

1

वृक्ष-फुनगी

अटका दिनमान

माया का घेरा।

2

माया न छोड़े

विकट खड़ी घेरे

कसा है पाश।

3

भव -बन्धन

घायल पंछी– मन

छूट न पाए।

4

सर्व व्याप्त है

पहचाने न कोई

माया ठगिनी।

5

कर्मपाश में

बीता यह जीवन

बूझ न पाए।

6

माया अविद्या

अहंकार को पोसे

सत्य से दूरी।

7

रंगीन चश्मा

दिखे दृश्य कल्पित

जीव भ्रमित।

8

आत्म का ज्ञान

रहस्य जीवन का

गूढ़ बहुत।

9

जीव अभागा

दृष्टि पर परदा

बीता जीवन।

10

आँखों में नूर

अथक चला चल

गन्तव्य दूर।

 

Posted by: हरदीप कौर संधु | फ़रवरी 27, 2021

2123

किरन सिंह

1                          

चाँद बिंदिया।                      

रात के माथे पर

प्रणय बेला 

KIRAN SINGH2   

घना जंगल 

दानव –सी डराए

अँधेरी रात।

3

बर्फ़ से ढका 

निकेत है रुद्र का

दृश्य अनूठा 

4

रक्तिम नभ

लाल हो गई धरा 

खिला प्रभात 

5

बाजे मृदंग 

डमरू की ताल पे

नर्तक शिवा 

6

ऋतु बसंत 

बौराए बौर देख

भ्रमर गाएँ 

-0- kiransingh15@gmail.com

हैदराबाद, तेलंगाना 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 21, 2021

2122

1–सुदर्शन रत्नाकर

1

प्रेम अनंत

परिभाषा रहित

सींचता मन।

2

सत्य,प्रेम है

शेष सभी नश्वर

करें निष्ठा से।

2

बँधा है मन

प्रेम डोर के संग

सीवन पक्की।

5

प्रेम से छुआ

छुई-मुई सिमटी

लाजवंती सी।

-0-

2-डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

1.

सुर्ख गुलाब

डायरी में अब भी

तुम्हारी याद।

2.

आम बौराया

फागुनी बयार ने

चूमा जो उसे।

3.

कली हँस दी

होंठ से छू के उड़ा

एक भँवरा।

4.

तुम पतंग

मैं डोर बन पाता

चाँद छू आते।

-0-

3-अनिता ललित

1

बंद किया है
पलकों में चाँद को
नींद है रूठी।
2
प्रीत गहरी
डूबके जो उतरे
पार हो जाए।
3
सूनी गलियाँ
आहट पा धड़कीं
खिली कलियाँ।
4
पीर हमारी
तुम ही न समझे
आँख का पानी!
-0-

4-डॉ0 सुरंगमा यादव 

1

प्रेम तुम्हारा

लिखता मन पर

प्रणय– ग्रन्थ। 

2

प्रीत के पाँव 

बिन पायल बाजें

सुनता गाँव। 

3

तुम्हारा ख़त

सिरहाने पे रखा

सपनों– भरा।

4

प्रेम की नदी

समर्पण को ढूँढ़े

सागर मन।

-0-

5-डॉ .महिमा श्रीवास्तव

1

सच्चे प्रेम की

न लो कभी परीक्षा

रूठ जाएगा।

2

श्रद्धा सिंचित

प्रेम का उपवन 

सुगंध फैले।

3

प्रेम हँसाए

किन्तु रुलाए ज्यादा

 क्या कर पाएँ?

-0-
6-डॉ. पूर्वा शर्मा

1

क्या लिखूँ अब ?

प्रेम-महाकाव्य तो

दिल पे रचा ।

2

बंद या खुली

आँखों के मंज़र में

तुम्हारी छवि ।

3

पलाश नहीं,

‘सदाफूली’-सा नेह

रोज़ ही फूले ।

4

दिल-ताले की

एक ही ‘मास्टर की’

तुम हो वही ।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 20, 2021

2121

1-भीकम सिंह

1

देख के बूटे

रुओं के मन में

ज्यौं लड्डू फूटे ।

2

आम बौराया

भोर उपवन की

हुई  रँगीली ।

3

पुष्प महके

गंधों में साँस सनी

मन बहके ।

4

कोपलें बाँध

पेड़ों के सिर सजे

दूल्हा– से लगे ।

5

अलि बेसुध

करे कली से बातें

संध्या के आते ।

6

 झरे पत्तों के

सोए हुए सपनें

लगे जगने ।

7

भृंगों की टोली

पंख मुखर कर

पुष्पों से बोली ।

8

खुले-भोर में

कलियों की पलकें

हिलके , हल्के ।

9

अलि से जागी

कली में तरुणाई

तितली राज़ी ।

10

मेघों के बूते

इन्द्रधनु में रंग

रश्मि ने गूँथे ।

-0- एसोसिएट प्रोफेसर, मिहिरभोज कालेज, दादरी,गौतम बुद्ध नगर, उ प्र
bheekam02@gmail.com

 -0-

2-अरुण कुमार प्रसाद

1

दिवस भर।

रास्ते दिखाता रहे।

सूर्य धावक।

2

जले सर्वदा।

न दीया न ही बाती।

सूर्य -दीपक।

<gaaon@rediffmail.com

-0-

3-राजीव गोयल

1

गोधूलि बेला,

थक विश्राम करें

धूप के घोड़े

2

निगल गए

परिंदों के घोंसले

कंक्रीट वन

3

था क्या अधूरा

पूछती राधा मीरा,

प्रेम हमारा

4

थोड़ी– सी धूप

जमा करे जुगनू

खर्चे रात में

5

त्याग झोंपड़ी

रहने लगी धूप

कोठी में अब

6

त्यागता प्राण

कर सूर्य की पूजा

हरसिंगार

-0- rajiv.goel55@gmail.com

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