Posted by: हरदीप कौर संधु | जुलाई 18, 2021

2176

राजेश भारती

1

थकती नहीं

बस करती काम 

माँ को सलाम

2

दर्द भगाए

माँ  फूँक मारकर 

माँ जादूगर

3

चैन हैं पाते

माँ से लिपटकर 

बच्चे सो जाते

4

दूर बड़ी है

ससुराल हाथी की। 

जम्मू तवी है

5

बिल्ली नहाए

हल्दी वाले दूध से

खिलती जाए।

6

भारत माता

मैं तेरे चरणों में

शीश झुकाता 

7

दूर से भैया

दुर्जनों से हमारी

राम रमैया

8

हवा में डोले

तितली शर्माकर 

पंखों को खोले।

-0-राजेश भारती कैथल 136027 हरियाणा 
poemplusstudio111@gmail.com
Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जुलाई 15, 2021

2175

रश्मि विभा त्रिपाठी ‘रिशू’

1
दु:ख की धूप
1-RASHMI VIBHA TRIPATHI-26-11 - Copyसौम्य-स्मृति-वितान
मैं लेती तान।
2
प्रीति-प्रगाढ़
मन-नदिया-बाढ़
चढ़ा आसाढ़।
3
पिता का प्रेम
हर ले अवसाद
बाँटे आह्लाद।
4
मुदित मन
प्रिय-स्नेहिल-स्पर्श
मनाए हर्ष।
5
है संजीवनी
प्रेम तुम्हारा प्रिय
प्रफुल्ल-हिय।
6
उन्हें जो सोचूँ
प्रिय पाते संदेश
सुदूर-देश।
7
नेह-बौछार
तुम्हीं ने सींचा मन
सदाबहार।
8
अधर मूक
चीन्ही उर की हूक
धन्य वे नैन।
9
पाथर ही थी
प्रिये तू शिल्पकार
गढा आकार।
10
पा के दुलार
प्राण प्रिय को देते
निरा आभार।
11
स्वीकार लो
उर-प्रीति-अनन्य
हो जाऊँ धन्य।
12
आशीष वर
पा जाग उठा भाग्य
तुम्हीं आराध्य।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | जुलाई 11, 2021

2174

रश्मि विभा त्रिपाठी

डॉ. सुरंगमा यादव

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जुलाई 3, 2021

2173-निशा नशीली

पूनम सैनी

1

punam-sainसुन री रैना

पाहुन कब रुके

ढलेगी तू भी

2

सूरज चला

देकर निमंत्रण

काली रात को

3

रातों को चाँद

प्यारा होता है जैसे

मुझे हो तुम

4

रात का साया

मन पे गहराया

उचटी नींद

5

तुम्हारे नैना

फीकी -सी जिन आगे

काली ये रैना

6

निशा नशीली

मादक नींद- भरे

नैनों के जाम

7

अँधेरी रात

गिरी जब चाँदनी

जगमगाई

8

खामोश निशा

चीखते सन्नाटों से

गूंजता नभ

9

किसने सुना

रात की तन्हाई में

शान्त– सा स्वर

10

गुनगुनाते

छुपके से रात में

चाँद,सितारे

Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 30, 2021

2172

1-रश्मि विभा त्रिपाठीरिशू

1
रश्मि विभाधरा-आकाश
विचरती है आस
पंछी-प्रवास।
2
दो बूँद प्यास
लिये तृप्ति की आस
पाखी फिरते।
3
पिक जो गा
अमराई में गीत
घाटी लजाए ।
4
वृक्ष-वितान
फूटा जो पिक-गान

हँसा उद्यान ।
5
ले पाँख-धन
उड़ता अकिंचन
उन्मुक्त मन ।
6
बूढ़ी हवेली
पिक छोड़ अकेला
हवा हो गया ।
7
छज्जे-अटारी
नित्य ही बाट हेरें
पिकी को टेरें ।
8
आकुल पाखी
देख शिकारी-आँखें
सहमी पाँखें ।
9
पाखी की चाह
मिले माटी गगरा
जल से भरा ।
10
पुन: तर हों
सूखे बाबड़ी-कुआँ
पाखी की दुआ ।
11
तृप्त हों जाएँ
जेठ में यदि पाएँ
पाखी दो बूँद ।
12
अति आकुल
पाखी निहारें व्योम
बरसे सोम।
13
ऋतु-पावस
धरी शाखों के हाथ
पाँख-पोशाक।

-0-

2-रमेश कुमार सोनी

1

उड़ानें नापीं

ड्योढ़ी की बेड़ी खुली

आँचलशक्ति। 

2

पंछी सा मन

घर पिंजड़ा ऐंठे

सिंदूर रोता।

3

मन चहके 

स्याह पहरा टूटा

रंग महके। 

4

खेतदामन 

भोर खुशी उगाए 

दुःख खा जा 

 5

पंख जो खुले 

पहरे भी शर्माते 

नभ बुलाते।

6

भोर ने भरे 

पाखी में सरगम

खुशी चहके। 

 7

खेतों में उगे

जीवन का सवेरा

रंग भरने 

8

स्याह पिंजड़ा

पक्षी बंजारे तोड़े

भोर की खुशी। 

9

छँटा अँधेरा

सिंदूरी भोर चहकी

ड्योढ़ी खोलती। 

10

खेत गा उठे 

भोर में बैल लौटे

किसानराग। 

-0-

3-सुषमा मल्होत्रा( न्यूयार्क)

 1

सुषमा मल्होत्रामंदिर, घर

कुछ भी नहीं सूझे

रही घुटन l

2

बहे नदिया

शिखर से घाटी में

एक सन्देश l

3

सुहाना रूप

स्वर्णिम- सी काया

है पिपासित l

4

मेरे सपने

बिन पंख है उड़े

खींच लो मुझे l

5

जंगल कटे

हरियाली निर्जीव

पक्षी बेघर l

6

उष्णता बढ़ी

हिमनद पिघले

भू डूब गई l

7

मन मुदित

भोर  सुखदायिनी

आदित्य आया l

8

सुहानी उषा

दिनकर का रथ

मन हर्षित l

9

शीत की धूप

रवि का आकर्षण

प्रेम-बंधन l

10

तम का आना

सुखदायी यामिनी

हो समर्पण  l

-0-

sushmam626@gmail.com

 

 

 

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 27, 2021

2171-प्रतीक्षा

डॉ. कविता भट्ट

1-प्रतीक्षा

1

Dr.Kavita Bhattयही प्रतीक्षा-

हो जीवन वसन्त

दिग्-दिगन्त।

2

तुमसे मिलूँ

युगों से है प्रतीक्षा

पूर्ण हो इच्छा।

3

मौन प्रतीक्षा

यही है परिभाषा

मिलन आशा।

4

नैन सूखे हैं

प्रतीक्षा है मुखर

मूक अधर।

5

गंगाजल है

पावन है प्रतीक्षा

प्रेम समीक्षा।

6

मिलन- राग

प्रतीक्षा तुम गाओ

पी को सुनाओ।

7

अनुगुंजन

प्रतीक्षा के सुरों का

प्रिय सुनो ना!

8

सेज सजाई

प्रतीक्षा ने सजन

हो तो मिलन।

9

मेरे आँगन

प्रतीक्षा गीत गाए-

‘प्रिय आ जाए।’

10

दुःख जीवन

सुख की है प्रतीक्षा

करो समीक्षा।

11

प्रतीक्षारत

मैं योगिनी-सी ही हूँ

तुम महेश।

12

प्रिय! प्रतीक्षा

शीत -सी है चुभती

कब आओगे!

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 18, 2021

2170

पखेरू

1-डॉ. जेन्नी शबनम

1.

नील गगन

पुकारता रहता –

पाखी, तू आ जा!

2.

उड़ती फिरूँ

हवाओं संग झूमूँ

बन पखेरू।

3.

कतरे पंख

पर नहीं हारूँगी,

फिर उडूँगी।

4.

चकोर बोली –

चन्दा छूकर आएँ

चलो बहिन।

5.

मन चाहता,

स्वतंत्र हो जीवन

मुट्ठी में विश्व।

6.

उड़ना चाहे

विस्तृत गगन में

मन पखेरू।

7.

छूना है नभ

कामना पहाड़-सी

हौसला पंख।

8.

झूमता मन,

अनुपम प्रकृति

संग खेलती।

-0-

2-सत चित आनंद

भावना सक्सैना

1

कृष्ण कृपालु

सत चित आनन्द

बस तुम ही।

2

सर्व कारण

परमेश्वर कृष्ण

भज रे मन।

3

श्यामल कांति

पीताम्बर हैं धारे

मात दुलारे।

4

दाऊ के साथी

गोपियों के दुलारे

नंद गोपाल।

5

तान वंशी की

ब्रज मण्डल भर

करे बावरी।

6

आत्म का ज्ञान

रहस्य जीवन का

बड़ा सहज।

7

नैनों में स्नेह

वात्सल्य करुणा भी

अद्भुत छवि।

8

वंशी की तान

दिव्य अलौकिक

ले जाए पार।

9

कितने विष्णु

गूढ़ रहस्य यह

सब न जानें।

10

वेदना पूर्ण

 विछोह परम का

मिलें तो कैसे ।

11

परम कृष्ण

पहचानो भक्ति से

छूटे बन्धन।

12

पूर्णावतार

सोलह कला स्वामी

परमेश्वर।

13

भटके आत्मा

कितने जन्मों तक

पाए न कृष्ण।

14

कृष्ण मोक्ष हैं

परम शक्ति वह

उन्हीं को ध्याओ।

15

जीवन ध्येय

भवबन्धन मुक्ति

भजो कृष्ण को।

16

नत मस्तक

सर्वस्व समर्पित

प्रभु के भक्त।

17

परम कृष्ण

शिव भक्तावतार

भक्ति में रत।

18

कितने लोक

इस भू से परे हैं

क्या जानें हम।

19

तुमको ध्याऊँ

सृष्टा, कर्ता, हरता

तुम हो कृष्ण।

20

परा अपरा

शक्तियाँ अलौकिक

जान अचंभा।

21

नेह सरिता

मैं करूँ आचमन

बनो कृपालु।

22

धेनु चरैया

साँवरा सलोना है

नन्दगोपाल।

23

दही माखन

ग्वाल बालों के संग

लीला रचाई।

24

राधा के प्रिय

मोर मुकुट धारे

कुंजन ठाड़े।

25

दिव्य बालक

देव करें दर्शन

नन्दगोपाल।

26

छूने को चरण

यमुना में उछाल

जाने रहस्य।

27

खुले बन्धन

सोए सब प्रहरी

मार्ग प्रशस्त।

28

मथुरा छोड़

निकले  वसुदेव  

घन गरजे।

29

समझूँ कैसे

आदि कारण रूप

बद्धजीव मैं।

30

सम्पूर्ण विश्व

परमेश्वर शक्ति

सारांश मात्र।

31

पूर्ण सदा ही

हो जनक शक्ति के

अति कृपालु।

32

सृष्टि विराट

पश्चात प्रलय के

लीन प्रभु में।

35

दिव्य गुण हैं

सत्ता विशुद्धतम

श्रीभगवान।

36

कंस पूतना

कितने ही असुर

किया उद्धार।

37

भक्त पुकारें

दौड़े आते हैं प्रभु

भक्त वत्सल।

38

कुंती कहती

कष्ट में संग प्रभु

कष्ट मीत हैं।

39

प्रभु कथा को

परीक्षित ने त्यागा

सब ऐश्वर्य।

40

अर्चा विग्रह

प्रभु रूप अनूप

सदा निहारूं।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 17, 2021

2169-प्राण-पखेरू

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु’

 1

प्राण -वर्तिका

निशदिन जलती

याद में तेरी।

2

प्राणहीन मैं

जब से छूटा हाथ

तुम्हारा साथ।

3

प्राण की रज्जु

मैंने बाँधी तुमसे

तुम जीवन !

4

नदी -किनारे

चक्रवाक युगल

प्राण विकल।

5

ब्रह्मरंध्र में

अनुनादित नाम

तुम्हीं हो प्राण !

6

द्रवित जल

उतरा शिखरों से

तुम्हीं तो हो न?

7

रक्त- शिराएँ

उद्वेलित हो उठीं

तुझे छू प्राण!

8

तुझमें डूबूँ

जब इस जग से

प्राण उड़ें ये।

9

तुम क्या जानों

जी लिया जो जीवन

प्राण तुम्हीं थे!

10

प्राण विकल

कब होगा तुमसे

महामिलन!

11

भारी अंधड़

तपता मरुथल

प्राण रुदन।

12

प्राण-पखेरू

उड़ा चीर अम्बर

काँपीं दिशाएँ

Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 12, 2021

2168

 डॉ. कविता भट्ट

1

शैल मुदित

IMG-20200409-WA0039जन्मी जो सुन्दर– सी

बिटिया नदी।

2

मंगलगान

ध्येय लोककल्याण

नदी महान।

3

तरु मुस्काए

मरुथल भी गाए

नदिया भाए।

4

धरा हर्षित

नदिया उद्गमित

जी पुलकित।

5

जीवन -थार;

पिय! तुम नदिया

अमृत-धार।

6

जग पाषाण;

बहें नदी समान-

स्त्रियाँ महान।

 7

नदी-संघर्ष

मूक-बधिर तट

तथापि हर्ष।

8

जीवन -शिला-

आपदा ने ढहाया

नदी का किला।

9

नन्दन वन-

सुरसरि जीवन

झाँको तो मन।

10

सुख सरिता-

ध्यान सुमुख धरो

शंकर पिता।

11

मन-अर्पण

जिन पग निकसी

गंगा पावन।

12

पार्वती रूठी

जटा शंकर धरे

गंगा अनूठी।

13

शिव सम्मुख

नतमस्तक गंगा

तोय-तरंगा।

14

प्रिया महान!

गंगा-सागर जाना

एक ही ध्यान

 15

मीलों चलती-

नदी– मन सागर-

प्रीत पलती।

16

डाकिया नदी

नित पर्वत चिठ्ठी

सागर देती।

17

निश्छल बहे-

नदी-सा गतिमान

जीवन रहे।

18

रहे शिखर-

हिम, सरित बन

अम्बर घन।

19

निष्ठुर प्रेमी-

सागर ने न बाँची

नदी की पाती।

20

पुण्य-सलिला

कृतघ्न को भी सींचे

उदारमना।

21

जीवन प्रश्न

थकेगा न हारेगा-

नदी-सा मन।

22

जागी लगन,

सागर से मिलन

नदी मगन।

 23

जड़ जगत

नदिया-सा जीवन

सदा चेतन।

24

है गतिशील

समाधिस्थ चलती

कोटिशः मील।

25

नदी महान-

सिखाए संघर्ष में

आनंदगान।

26

विनम्र साध्वी-

नभ से धरा तक

तू ऋषिकन्या!

27

मुक्त तरंगा-

जग तारणहार

पावन गंगा।

28

ओ जगदम्बे!

भव बाधा बहा दो

जाह्नवी गंगे।

29

गुंजायमान

सधे सुर नदी के

संगीत जान ।

30

मैं हूँ नदिया

तुम समुद्रशिला

फिर भी पाना ।

 31

चरण चूमे

प्यासी धरा नदी के

मगन घूमे ।

32

द्रवित होओ

कृतघ्न मत ठनो

नदी से बनो ।

33

गंगा महान

अमित प्रताप है

करें सम्मान।

34

झरती रहे

आशीष धरा पर

धरती रहे।

35

अमृतदान

प्रत्येक बूँद है री

गंगा महान।

36

मोक्षदायिनी

पुनः-पुनः जन्म लूँ 

तेरी ही धरा

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 10, 2021

2167

डॉ.भीकम सिंह

1

धूप की तल्ख़ी

खेतों के ज़ख़्म छिले

मेघ ही सिले।

2

खेतों की क्यारी

डूब गयी बाढ़ में

व्यवस्था हारी।

3

ये खेतिहर

कंधों पर ढोते मौन

स्वेद में तर।

4

है साहूकार

किसानों की बस्ती में

सहमे द्वार।

5

हल्की धूप से

महका पथवारा

कार्तिक आया।

6

लीप के भूसा

गेहूँ का बोरा चला

किसान छला।

7

संदेह जैसा

खरपात है फैला

खेतों ने झेला।

8

खेत ज़िद पे

रौ में ही बहे पानी

बनाई नाली।

9

मिट्टी का चूल्हा

प्रश्नों की आग झहे

कुटुंब सहे।

10

बंद करने

पुआल की उड़ाने

कसी कमाने।

11

ग्राम्य जीवन

मौसम पर निर्भर

रूठे अक्सर।

12

ओस ही बीने

चरवाहा हठीला

दूब से छीने।

13

मेघों से रूठी

खलिहानों पर टूटी

गुस्सैल हवा।

14

गन्ने की खोई

गुड़ कोल्हू सुखाता

गंध में धोई।

15

खेतों में घुसी

कोलतारी सड़के

स्वप्न भटके।

16

खेतों की रातें

गुदगुदी चाँदनी

करती बातें।

17

बिटौड़े उगे

गाँवों का कूबड़ ज्यों

भादों से दिखे।

18

फूँकनी फूँकी

माँ की  आँखें भरीं

रोटियाँ सूखी।

19

फूँकती है माँ

अंधे चूल्हे में आग

छेड़ते राग।

20

खाद बिखरी

खेतों में आ-आकर

शस्य निखरा।

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