Posted by: हरदीप कौर संधु | अक्टूबर 7, 2018

1869

1-डॉ.सुरंगमा यादव

1

धूप घनी है

मुसकानों की छाया

बिखरा दो न!

2

प्रेम की नदी

समर्पण को ढूँढे।

सागर-मन

3

मन का कोना

स्मृतियों का कोलाज

सजा रखना ।

4

ये कहकहे

समय की धार में

पल में बहे ।

5

तुम बिछड़े

पदचाप अब भी

देती आहट ।

6

ओ रे! बदरा

इतना न इतरा

अति न भली ।

 7

स्वच्छंद मेघ

रोकेगा कौन भला

नदी का वेग ।

8

मेघों की धूप

घूँघट से झलके

गोरी का रूप

9

देह से परे

कभी मन को मेरे

छूकर देखो ।

10

ये रनिवास

सजी-धजी रानियाँ

प्रतीक्षालय।

-0-

2-डॉ.पूर्वा  शर्मा

1

बिखरा पड़ा

पतझड़-सा मन

तेरे आँगन ।

2

लजाती धूप

व्योम-पथ पे  खड़ा

मेघ है बड़ा ।

3

प्रेम बेड़ियाँ

पहनाई जो तूने

बेफिक्र  उडूँ ।

4

जिंदगी धूप

बना है छतनार

तुम्हारा प्यार ।

5

उड़ान भरे

मन मेघदूत-सा

प्रेम-नभ पे ।

6

निद्रा में लीन

श्वेत लिहाफ़ ओढ़े

गिरि शृंखला ।

7

हौले-हौले से 

चढ़े तेरे प्रेम का

मीठा ज़हर ।

8

हिलोरे खातीं

अश्रु भीगी लहरें

मन -सागर ।

9

झर ही गए

नैनों से कुछ मोती

पाकर तुझे ।   

10

यादों के गुच्छे

हरे-भरे भीगे-से 

इस वर्षा में ।

11

झर ही गए

जीवन-टहनी से        

दुःख के पात ।

-0-

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Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 4, 2018

1868

अनिता मंडा

 1

जा मिली धूप

साँझ के आलिंगन

मिटी थकन।

2

दुख ने फिर
चिलम सुलगाई
साँझ बिताई

3

शब्दों का खेल
अधरों पर मधु
मन में मैल।

4

डूबा सूरज
रेत के सागर में
थार की साँझ ।

5

हुआ है नम
भीगकर ओस से
थार का मन।

6

थार की रातें
तारों से जगमग
वीरान राहें।

7

हवा उकेरे
रेत पर माँडनें
सजाए धोरे।

8

रोहिड़ा-पुष्प
बिराग धरे मन
खिले थार में।

9

थार का जोगी
पहने केसरिया
रुँख रोहिड़ा

10

थार को लाँघ
ढल गया सूरज
रक्तिम नभ

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 28, 2018

1867-दुःख

दुःख

डॉ.जेन्नी शबनम

1.

दुःख का पारा

सातवें आसमाँ पे

मन झुलसा

2.

दुःख का लड्डु

रोज -रोज यूँ खाना

बड़ा ही भारी

3.

दुःख की नदी

बेखटके दौड़ती

बे रोक-टोक।

4.

साथी है दुःख

साथ है हरदम

छूटे न दम।

5.

दुःख की वेला

कभी तो गुजरेगी

मन में आस।

6.

दुःख की रोटी

भरपेट है खाई

फिर भी बची।

7.

दुःख अतिथि

जाने की नहीं तिथि

बड़ा बेहया।

8.

दुःख की माला

काश ये टूट जाती

सुकून पाती।

9.

मस्त झूमता

बड़ा ही मतवाला

दुःख है योगी।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 22, 2018

1866

1-प्रियंका गुप्ता

1

साथ जो छूटा

अधर हुए मौन

शब्द भी रूठे

2

तूने जो छोड़ा

तन्हाई फिर भी है

साथ हमेशा ।

3

लब हैं मौन

तन्हा मन की भाषा 

समझे कौन ?

4

दर्द की स्याही

बिखरी कागज़ पे

बनी कविता ।

5

हाथ पकड़

चलना था सिखाया

कहाँ वो साया ?

6

मन का भ्रम,

या मृगमरीचिका-

तेरा वो साथ ।

7

मौन जो टूटा

पार कर पाओगे

दर्द की धारा ।

8

तुमने कहा-

चुप रहना होगा;

आँखें बोल दीं

9

बेड़ी थी पाँव,

हाथ भी बाँध दिए

फिर भी तैरे ।

-०-

2-पुष्प मेहरा 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 19, 2018

1865

डॉ.पूर्वा शर्मा 

पूर्वा शर्माIMG-20180918-WA0000

डॉ.पूर्वा शर्मा ने हाइकु पर अपना  शोध कार्य  पूरा कर लिया  है , जिसकी अधिसूचना विधिवत् जारी  हो चुकी  है . हाइगा के इस अंक के साथ अधिसूचना की प्रति भी लगा रहे हैं. हिन्दी  हाइकु परिवार की और से  पूर्वा शर्मा को हार्दिक बधाई !

छाया :दिविज शर्मा

छाया :दिविज शर्मा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 15, 2018

1864

1-मीठी-सी बोली – डॉ.जेन्नी शबनम   

1

मीठी-सी बोली   

मातृभाषा हमारी   

ज्यों मिश्री घुली! 

2

हिन्दी है रोती   

बेबस व लाचार   

बेघर होती! 

3

प्यार चाहती   

अपमानित हिन्दी   

दुखड़ा रोती!

4  

अंग्रेज़ी भाषा   

सर चढ़के बोले   

हिन्दी ग़ुलाम!   

5

विजय- गीत   

कभी गाएगी हिन्दी   

आस न टूटी!

भाषा लड़ती   

अंग्रेज़ी और हिन्दी   

कोई न जीती!

7  

जन्मी दो जात   

अंग्रेज़ी और हिन्दी   

भारत देश!

8   

मन की पीर   

किससे कहे हिन्दी   

है बेवतन!

9

हिन्दी से नाता   

नौकरी मिले कैसे   

बड़ी है बाधा! 

10

हमारी हिन्दी   

पहचान मिलेगी   

आस में बैठी!   

-०-

2विजय आनंद
1
प्रयाण-वेला
वक़्त की अदालत
आँसू बरसे ।

2
साँसों के धागे
वक़्त की करवटें
टूटा सितारा ।

3
ख्यालों के जाल
सहमा मन मृग
वक़्त शिकारी।

०-Vijay Anand <vjeanand@gmail.com>

०-

3नरेंद्र श्रीवास्तव
1

पीड़ा बरसी
आँसू से भर गईं
झील सी आँखें।
2

आँसू ने लिखा
भाग्य पर निबंध
अँधेरा पढ़े।
3
आँसू भरे थे
नयनों के डिब्बे में
छूते ही गिरे।
4
आँसू आकर
देते रहे दिलासा
सूनेपन में।
5
शब्द अंगारे
कलेजे पर पड़े
आँसू बुझाये।
6
निष्ठुर हैं वे
आँसू की गरमी से
पसीजें नहीं।
  7
खुशी मिली तो
आँसू झट आ गए
यादें लेकर।

रेंद्र श्रीवास्तव,पलोटन गंज ,गाडरवारा, जिला -नरसिंहपुर म.प्र.487 551
narendrashrivastav55@gmail.com

Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 10, 2018

1863

1-भावना सक्सैना

1

क्षणिक सुख

बूँद -सा है जीवन

पल में लुप्त।

2

ताल उठाए

बूँदों की सरगम

मन को भाए।

3

बूँदों के गीत

हैं मधुर संगीत

सुनाएँ प्रीत।

4

ठिठके ज़रा

पल में टूट जाते

काँच के मोती।

5

काँपे पत्र पे

जीवन- सार लिये

बूँदें कोमल।

6

इठला चली

हवा के संग बही

बूँद ओस की।

7

बूँद जो चली

खारे पानी में गिरी

मोती हो खिली।

8

आँख से झरी

बूँद आँसू हो गई

दिल में चुभी।

9

तपती रेत में

बूँद नेह की मिली

जीवन बनी।

10

चमक उठी

पलकों पर ठिठक

धैर्य में ढली।

-0-

2-अनिता मण्डा

1.

जा मिली धूप

साँझ के आलिंगन

मिटी थकन।

2.

लिखे सावन

हरियाली -दास्तान

पढ़े आसमाँ ।

-0-

3-कृष्णा वर्मा

1

साझी दीवारें

भले हों घरों की हैं

जुदा पीड़ाएँ।

2

सर्द रवैया

आग लगाए बर्फ

सुलगे दिल।

3

हमारी हँसी

आँच पा मकई -सी

खिले मुस्काए।

4

ज़िंदगी है क्या?

बेदम हिचकी-सी

कुछ न और ।

5

कैसी है ताब

रौशन कर जाती

उसकी याद।

6

बिन दीवार

कर लेता है कैद

ये इंतज़ार।

7

माँ की दुआएँ-

कूजे में समंदर

आके समाए।

8

लफ़्ज़ों में बंधे

बेशुमार घुँघरु

लहरें स्वर।

-०-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 7, 2018

1862

1-डॉ.शैलजा सक्सेना

1

घर भीगता,

चू रही है छत भी,

ज्यों दुख रिसे।

 2

भीगे धरती,

आकाश की आँखों से

झरे फुहार !

 3

फैली सुगन्ध ,

प्रसविनी चमेली,

जन्मीं कलियाँ !

पगडंडियाँ,    

जंगल या स्मृति की

ले जातीं दूर।

 5

तरु  विह्वल

घायल है जंगल

मत काटो ,ना!

6

जुगनू -खुशी,

अमावसी पथ की

बने पाथेय!

 7

जब तू हँसे,

नन्हे होठों झरते

हरसिंगार!

-0-

2 – विभा रश्मि 

1

बरसा मेह

बरसाती नदिया 

खूब बौराई । 

2

आ जा रे मेघा

कजरा नयनों में

आँजती प्रिया ।

3

पगली हवा 

उड़ाए लिये जाए

बरखा रोके । 

4

थामा था हाथ 

झाड़ियों ने प्यार से

भीगा था साथ ।

5

ऋतु प्रिया ने 

गा मृदुल मल्हार

भिगोया मन ।

6

लहर  -गीत 

सुनूँगा मौन धारे

खड़ा किनारे ।

7

नैना छलके

जलद फाहे रोए

गले मिलके ।

Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 3, 2018

1861-सरस्वती माथुर

दुःखद समाचार कि हमारे बीच डॉ.सरस्वती माथुर नहीं रहीं .शनिवार को  इनका देहावसान  हो गया .  सरस्वती माथुर जी हिन्दी हाइकु और त्रिवेणी पर निरंतर  सक्रिय  रहती थी . 21 अक्तूबर से संपर्क क्या टूटा कि अब केवल निरंतर रचनाकर्म  की स्मृतियाँ ही शेष हैं . 7 अगस्त को प्रकाशित उनके हाइकु दिए जा रहे हैं . हाइकु परिवार के लिए यह बहुत बड़ी क्षति  है . ( सम्पादक द्वय )

डॉ.सरस्वती माथुर

 

1
भाई मिलता
बहिन से राखी पे
मन खिलता ।
2
राखी है तार
रसपगा त्योहार
भाव पावन
3
जोड़ेंगे दिल
भाई बहनों के ये
रेशमी धागे ।
4
हाथ में थाल
बहिन ले  बलैया
निरखे भैया ।
5
जरी के तार
राखी से  बाँध दिया
रिश्तों में प्यार ।
-0-

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अगस्त 31, 2018

1860

डॉ.कविता भट्ट

1                                                        

सूनी खिडकीसूनी खिड़की

राह निहारे तेरी,

आँखों में भर

मिलन का काजल

मचलता आँचल।

 

 

2

WomanintheRain

चूल्हा सीला- सा

लेकिन मैं सुलगी

इस सावन

पिय तुम प्रहरी

विरहन ठहरी ।

3

बसन्त आया

गुजरा चुपचाप,

अब की होली

सैनिक के घर में

करती थी विलाप !

4

चयन करे

शूल-शय्या गर्व से

सैनिक -प्रिया

उसे भी है कहना

महान वीरांगना ।

5

सूनी है घाटी

रो रहे देवदार

नदी उदास

दहली कल रात

नृशंस था प्रहार ।

6

स्तब्ध खड़ा है,

हिमालय के मन

उद्वेग बड़ा है,

मानवता के शव

गिनता  रात-दिन।                                 

7

चिनार

बूढ़ा चिनार

खड़े हो सीमा पर

रहा निहार

शव मातृ-भक्तों के

नैनों में सूनापन।

8

प्रायः रही है

निर्जीव संपत्ति -सी

युद्ध-द्यूत में

‘नारी  केवल श्रद्धा’

गाया ही जाता रहा ।

9

नारीपुरुष बना –

तर्क-न्याय प्रणेता

छद्मवेशी भी

अहल्या शिलामात्र

हाय! ये धर्मशास्त्र

10

रथ विराजे

या शीश कटे राजे

युद्ध में हारे-

सुन्दर पटरानी

कुछ नर्तकियाँ भी ।

11

पंचकन्या में

मन्दोदरी, तारा भी

कंदुक- सी ही,

रावण विभीषण

खेले सुग्रीव-बाली

12

राम न आए

उतरकर द्वार

राजा ठहरे !

सीता के वे उद्गार

तुलसी भूल गए ।

13

सीता-वीरता

रचते ‘उत्तर’ में 

तुलसीदास

तो कभी नहीं होता

आज भी बनवास

14

ऐतिहासिक

हारना या जीतना,

घृणित मानी

यह सर्जन -शक्ति !

क्यों सदा तिरस्कृता ।

[**सभी चित्र  एवं  जी आई ऍफ़ फ़ाइल गूगल से साभार .

**चिनार का वृक्ष  627 साल पुराना है .]

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