Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 15, 2018

1864

1-मीठी-सी बोली – डॉ.जेन्नी शबनम   

1

मीठी-सी बोली   

मातृभाषा हमारी   

ज्यों मिश्री घुली! 

2

हिन्दी है रोती   

बेबस व लाचार   

बेघर होती! 

3

प्यार चाहती   

अपमानित हिन्दी   

दुखड़ा रोती!

4  

अंग्रेज़ी भाषा   

सर चढ़के बोले   

हिन्दी ग़ुलाम!   

5

विजय- गीत   

कभी गाएगी हिन्दी   

आस न टूटी!

भाषा लड़ती   

अंग्रेज़ी और हिन्दी   

कोई न जीती!

7  

जन्मी दो जात   

अंग्रेज़ी और हिन्दी   

भारत देश!

8   

मन की पीर   

किससे कहे हिन्दी   

है बेवतन!

9

हिन्दी से नाता   

नौकरी मिले कैसे   

बड़ी है बाधा! 

10

हमारी हिन्दी   

पहचान मिलेगी   

आस में बैठी!   

-०-

2विजय आनंद
1
प्रयाण-वेला
वक़्त की अदालत
आँसू बरसे ।

2
साँसों के धागे
वक़्त की करवटें
टूटा सितारा ।

3
ख्यालों के जाल
सहमा मन मृग
वक़्त शिकारी।

०-Vijay Anand <vjeanand@gmail.com>

०-

3नरेंद्र श्रीवास्तव
1

पीड़ा बरसी
आँसू से भर गईं
झील सी आँखें।
2

आँसू ने लिखा
भाग्य पर निबंध
अँधेरा पढ़े।
3
आँसू भरे थे
नयनों के डिब्बे में
छूते ही गिरे।
4
आँसू आकर
देते रहे दिलासा
सूनेपन में।
5
शब्द अंगारे
कलेजे पर पड़े
आँसू बुझाये।
6
निष्ठुर हैं वे
आँसू की गरमी से
पसीजें नहीं।
  7
खुशी मिली तो
आँसू झट आ गए
यादें लेकर।

रेंद्र श्रीवास्तव,पलोटन गंज ,गाडरवारा, जिला -नरसिंहपुर म.प्र.487 551
narendrashrivastav55@gmail.com

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Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 10, 2018

1863

1-भावना सक्सैना

1

क्षणिक सुख

बूँद -सा है जीवन

पल में लुप्त।

2

ताल उठाए

बूँदों की सरगम

मन को भाए।

3

बूँदों के गीत

हैं मधुर संगीत

सुनाएँ प्रीत।

4

ठिठके ज़रा

पल में टूट जाते

काँच के मोती।

5

काँपे पत्र पे

जीवन- सार लिये

बूँदें कोमल।

6

इठला चली

हवा के संग बही

बूँद ओस की।

7

बूँद जो चली

खारे पानी में गिरी

मोती हो खिली।

8

आँख से झरी

बूँद आँसू हो गई

दिल में चुभी।

9

तपती रेत में

बूँद नेह की मिली

जीवन बनी।

10

चमक उठी

पलकों पर ठिठक

धैर्य में ढली।

-0-

2-अनिता मण्डा

1.

जा मिली धूप

साँझ के आलिंगन

मिटी थकन।

2.

लिखे सावन

हरियाली -दास्तान

पढ़े आसमाँ ।

-0-

3-कृष्णा वर्मा

1

साझी दीवारें

भले हों घरों की हैं

जुदा पीड़ाएँ।

2

सर्द रवैया

आग लगाए बर्फ

सुलगे दिल।

3

हमारी हँसी

आँच पा मकई -सी

खिले मुस्काए।

4

ज़िंदगी है क्या?

बेदम हिचकी-सी

कुछ न और ।

5

कैसी है ताब

रौशन कर जाती

उसकी याद।

6

बिन दीवार

कर लेता है कैद

ये इंतज़ार।

7

माँ की दुआएँ-

कूजे में समंदर

आके समाए।

8

लफ़्ज़ों में बंधे

बेशुमार घुँघरु

लहरें स्वर।

-०-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 7, 2018

1862

1-डॉ.शैलजा सक्सेना

1

घर भीगता,

चू रही है छत भी,

ज्यों दुख रिसे।

 2

भीगे धरती,

आकाश की आँखों से

झरे फुहार !

 3

फैली सुगन्ध ,

प्रसविनी चमेली,

जन्मीं कलियाँ !

पगडंडियाँ,    

जंगल या स्मृति की

ले जातीं दूर।

 5

तरु  विह्वल

घायल है जंगल

मत काटो ,ना!

6

जुगनू -खुशी,

अमावसी पथ की

बने पाथेय!

 7

जब तू हँसे,

नन्हे होठों झरते

हरसिंगार!

-0-

2 – विभा रश्मि 

1

बरसा मेह

बरसाती नदिया 

खूब बौराई । 

2

आ जा रे मेघा

कजरा नयनों में

आँजती प्रिया ।

3

पगली हवा 

उड़ाए लिये जाए

बरखा रोके । 

4

थामा था हाथ 

झाड़ियों ने प्यार से

भीगा था साथ ।

5

ऋतु प्रिया ने 

गा मृदुल मल्हार

भिगोया मन ।

6

लहर  -गीत 

सुनूँगा मौन धारे

खड़ा किनारे ।

7

नैना छलके

जलद फाहे रोए

गले मिलके ।

Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 3, 2018

1861-सरस्वती माथुर

दुःखद समाचार कि हमारे बीच डॉ.सरस्वती माथुर नहीं रहीं .शनिवार को  इनका देहावसान  हो गया .  सरस्वती माथुर जी हिन्दी हाइकु और त्रिवेणी पर निरंतर  सक्रिय  रहती थी . 21 अक्तूबर से संपर्क क्या टूटा कि अब केवल निरंतर रचनाकर्म  की स्मृतियाँ ही शेष हैं . 7 अगस्त को प्रकाशित उनके हाइकु दिए जा रहे हैं . हाइकु परिवार के लिए यह बहुत बड़ी क्षति  है . ( सम्पादक द्वय )

डॉ.सरस्वती माथुर

 

1
भाई मिलता
बहिन से राखी पे
मन खिलता ।
2
राखी है तार
रसपगा त्योहार
भाव पावन
3
जोड़ेंगे दिल
भाई बहनों के ये
रेशमी धागे ।
4
हाथ में थाल
बहिन ले  बलैया
निरखे भैया ।
5
जरी के तार
राखी से  बाँध दिया
रिश्तों में प्यार ।
-0-

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अगस्त 31, 2018

1860

डॉ.कविता भट्ट

1                                                        

सूनी खिडकीसूनी खिड़की

राह निहारे तेरी,

आँखों में भर

मिलन का काजल

मचलता आँचल।

 

 

2

WomanintheRain

चूल्हा सीला- सा

लेकिन मैं सुलगी

इस सावन

पिय तुम प्रहरी

विरहन ठहरी ।

3

बसन्त आया

गुजरा चुपचाप,

अब की होली

सैनिक के घर में

करती थी विलाप !

4

चयन करे

शूल-शय्या गर्व से

सैनिक -प्रिया

उसे भी है कहना

महान वीरांगना ।

5

सूनी है घाटी

रो रहे देवदार

नदी उदास

दहली कल रात

नृशंस था प्रहार ।

6

स्तब्ध खड़ा है,

हिमालय के मन

उद्वेग बड़ा है,

मानवता के शव

गिनता  रात-दिन।                                 

7

चिनार

बूढ़ा चिनार

खड़े हो सीमा पर

रहा निहार

शव मातृ-भक्तों के

नैनों में सूनापन।

8

प्रायः रही है

निर्जीव संपत्ति -सी

युद्ध-द्यूत में

‘नारी  केवल श्रद्धा’

गाया ही जाता रहा ।

9

नारीपुरुष बना –

तर्क-न्याय प्रणेता

छद्मवेशी भी

अहल्या शिलामात्र

हाय! ये धर्मशास्त्र

10

रथ विराजे

या शीश कटे राजे

युद्ध में हारे-

सुन्दर पटरानी

कुछ नर्तकियाँ भी ।

11

पंचकन्या में

मन्दोदरी, तारा भी

कंदुक- सी ही,

रावण विभीषण

खेले सुग्रीव-बाली

12

राम न आए

उतरकर द्वार

राजा ठहरे !

सीता के वे उद्गार

तुलसी भूल गए ।

13

सीता-वीरता

रचते ‘उत्तर’ में 

तुलसीदास

तो कभी नहीं होता

आज भी बनवास

14

ऐतिहासिक

हारना या जीतना,

घृणित मानी

यह सर्जन -शक्ति !

क्यों सदा तिरस्कृता ।

[**सभी चित्र  एवं  जी आई ऍफ़ फ़ाइल गूगल से साभार .

**चिनार का वृक्ष  627 साल पुराना है .]

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 27, 2018

1859

1-विजय आनंद

1
थोडा -सा प्यार
काँटों -सी अनबन
रिश्ते घायल
2
भूख का पेड़
चढ़ती दोपहरी
प्यास की खेती
3
आँसू की धार
सुख के पल डूबे
दिल का दर्द
4
वक़्त-
साँकल
अतीत की
बाँसुरी
स्वर सिसके

-0-Vijay Anand vjeanand@gmail.com

-0-

नरेंद्र श्रीवास्तव

1

सारी बलाएँ
अम्मा बनकर के
पेड़ों ने रोकी।
2
पवन बोली-
पेड़ों की छाँव तले
जीवन -सुधा।
3
पेड़ बचाओ
जीवन उसका भी
और हमारा।
4
हरे पेड़ों ने
धरा पर बनाई
शुभ रंगोली।
5
पेड़ लकीरें
धरा की हथेली में
जीवन रेखा।
6
पेड़ गुल्लक
जीवन ने
सँभाले
साँस के सिक्के।
7    

धूप मग  में
तपन का जुलूस
छाँव रक्षक।
–0- <narendrashrivastav55@gmail.com>

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अगस्त 26, 2018

1858-रक्षाबन्धन

1-ऋता शेखर ‘मधु’

1

भइया फूल

बहन है सुगंध

घर बगिया।

2

कोमल लता

नभ को छूने चली

भाई सहारा।

3

स्नेह की डोर

मोती -मोती में गुँथी

शुभ कामना।

4

भाई लेखनी

बहन अभिव्यक्ति

नेह का छंद।

5

स्वार्थ से परे 

अटूट नेह बंधन

रक्षा बंधन।

6

भेद न भाव

भाइयों की राखियाँ

एक समान।

7

बंद लिफाफा

द्वार पर डाकिया

विदेशी भाई।

8

बहना आई

खुशकिस्मत भाई

सजी कलाई।

9

सावन मास

हरी साड़ी, चूड़ियाँ

छाया उल्लास।

-०-

2-कमला घटाऔरा

1

वैदिक राखी

बाँधू ,भैया कलाई

दुआ पिटारी ।

2

बनाई राखी

जुटा पाँच सामग्री

नेह गूँथके ।

3

नेह -बंधन 

अमर ये युगों से

चलता आया ।

4

चाँद गगन

माँ के आँगन भाई

सुख सौ गुन ।

5

बाँध मैं राखी 

देखके मुख- चन्द्र 

बटोरूँ खुशी ।

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 25, 2018

1857

1-कमला निखुर्पा

1

कोई सिल दे 

वक्त की फटी जेबें 

खोए हैं लम्हें । 

2

पुकारो कोई 

ढल रहे चाँद को 

चकोर रोई। 

3

किसने सुनी

रातरानी की बातें 

पंखुड़ी झरी। 

4

धूप सहेली

अँगना आके  बैठी 

बूझे पहेली । 

– प्राचार्या केन्द्रीय विद्यालय पिथौराग

 

2- डॉ0 सुरंगमा यादव

1

यौवन माया

सुन मृगनयनी

धन पराया

2

आँसू पी जाऊँ

जग रीत निभाऊँ

मैं मुसकाऊँ

3

शब्द हैं मौन

आँसू हुए मुखर

समझे कौन!

4

बंद किवाड़े

फिर भी आ जाती हैं

पीड़ाएँ द्वारे

5

बरखा आई

अलसायी छतरी

ले अँगडाई

6

शब्दित हुईं

खामोशियाँ सहसा

जादू ये कैसा

7

सूना मंदिर

बज उठीं घण्टियाँ

तुम जो आ

8

वर्षा की रात

मेढकों की चौपाल

सुनाये हाल

9

नैनों का जल

आशाओं का काजल

बहा विकल

-०- डॉ0 सुरंगमा यादव,असि0 प्रो0 हिन्दी, महामाया राजकीय महाविद्यालय महोना, लखनऊ

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अगस्त 21, 2018

1856-ममता फूटे

डॉ.कविता भट्ट

1
मैं ही बाँचूँगी
पीर-अक्षर पिय,
जो तेरे हिय।
2
नारी है देह
आत्मा-नर न नारी
मात्र चेतना।
3
देह तिलिस्म
आत्मा तटस्थ द्रष्टा
लिंग-भेद क्यों ?
4
दुस्साहस है
नारी में पुरुष -सा
किन्तु संस्कारी।
5
ममता फूटे
नैनों और वक्षों से
क्यों उत्पीड़न।
6
ममतामयी
रजवाड़ों में भी तो
चादर-सी थी।
7
कब पवित्र
नारी के विषय में
दृष्टि विचित्र।
8
नारी सुलगी
राख में चिंगारी-सी
मन ही मन।
9
हम न होंगे
धिक्कारेगा तुमको
सूना-सा द्वार।
10
डाकिया आँखें
मन के खत भेजें
प्रिय न पढ़े।
-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 17, 2018

1855

डा. सुरेन्द्र वर्मा

1

नीला समुद्र

तरंगों के अन्दर

झाँकता सूर्य

2

दीपित वन

बिखरा चहूँ ओर

टेसू का रंग

3

जीने की राह

सितारे रूठ गए

कौन बताए

4

कभी डराए

डगमगाती नाव

सँभाले कभी

5

बांस की ओट

संगीत का फूटना

हवा की चोट

6

देखो तो ज़रा

आया लजाता दिन

शर्मीली धूप

-०-

डा. सुरेन्द्र वर्मा  / दस एच आई जी / एक सर्कुलर रोड /इलाहाबाद

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