Posted by: डॉ. हरदीप संधु | फ़रवरी 26, 2017

1728

1-हाइगा

अनिता मण्डा

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2-हाइकु

पुष्पा मेहरा

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Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 23, 2017

1727

1-कशमीरी लाल चावला
1

 आती अँधेरी
पवन संग नाचे
गिरते पात

-0-

2-डॉ पूर्णिमा राय

काक

1

कौआ शैतान

देखकर कोयल

हुआ बेहाल!!

2

सुन ओ कागा

मुँडेर पर आ जा

ले आ सवेर!!

3

कड़वी वाणी

खामोश हो जा काक

पिक है पास!!

4

काला तिलक

सजता मस्तक पे

खटके कौआ!!

5

ओ प्यारे कौए

ले शक्कर औ खीर

सुना संदेशा!!

-0-

चूड़ियाँ

 1

नन्हीं कलाई

चूड़ी पहन कर 

झूमे हवा -सी!!

2

चूड़ी- कंगन

जिन्दगी के रंग में

रँगे- खनके!!

3

चाँदी की चूड़ी

लगती स्वर्ण जैसी

पिया के संग!!

4

सजी चूड़ियाँ

विश्वास की नींव पे

हमसफर!!

5

सूनी कलाई

वधू है या विधवा

रुचि -अरुचि!!

6

नदी किनारा

हाथ में हैं चूड़ियाँ

राह निहारे!!

-0-

3- विभा रश्मि 

1

खानाबदोश
घुमंन्तू  दिल मेरा
साँझ – सवेरा ।
2
चुन्नी से बाँधी
कई गाँठें फ़िक्र की
हो खैरियत 
3
मन ने छाना
छलनी से  इतना
फिर भी धोखे ।
4
गीत गाता जा
तरन्नुम में झूम
जीवन -रस ।
5
चुप्पी तोड़ दे
कायनात सामने
कुछ तो बोल ।
6
चिड़ियाँ उड़ीं
नेह अँगना मुड़ीं
दाने  बिखरे ।
7
साँस के तार
भारी हो आएँ – जाएँ
किसको भाएँ !
8
रंगबिरंगी
पिया ने पहनाई
प्रीत चुँदरी ।
9

मन के रंग
बना देते मलंग
बजा मृदंग ।
10
कान्हा के संग
खेलन चल होरी
न जोरा जोरी ।
11
टेसू अरण्य
फाग उछाह-भरा
ताल औलय ।
12
अम्बर लाली
बहार ने उछाली
पल्लव – ताली 
13
नैनों के तीर
बैठे श्याम अधीर
राधा गम्भीर ।
14
उद्धव लिख-
गोपियाँ हैं विरही
कान्हा निर्मोही ।
15

चूड़ियाँ छन्न
छनकीं कलाई में
रंग बरसा ।
16
गगरी औंधी
उड़ी है माटी सौंधी
चूनर भीगी ।
-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | फ़रवरी 21, 2017

1726

1-डा.सुरेन्द्र वर्मा

1

नूतन  हेतु

टहनी से उतरे

बुज़ुर्ग पात ।

2

कोई न रोया

आँसुओं- से टपके

निराश पत्ते ।

3

पवन संग

झर-झर नाचते

गिरते पत्ते।

4

झर रहे हैं

पत्र पतझर में पात

टिक सकोगे?

5

जीर्ण पत्र था

हलके से झोंके में

टूटा बेबस ।

6

गिरते पत्र

निरुपाय -सा तरु

खड़ा  देखता ।

7

उम्रदराज़

एक -एक पाती को

झरते देखा ।

-0-(मो.९६२१२२२७७८),१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

-0-

2-अनिता मण्डा

1
हरे को पीला
करे बौराया फाग
मस्ती का राग।
2
उलझे हवा
आम्र मंजरियों से
भाँग का नशा ।
3
सिकुड़ी रातें
उठे सर्दी के ठाठ
यूँ आया फाग।
4
आहट पाई
फूलों ने फागुन की
बिखेरे रंग।
5
रंग उतरे
पहली बारिश में
केवल कच्चे।
6
छाई ख़ुमारी
चटकी हैं कलियाँ
लो आया फाग।
7
मद का प्याला
भरा फिर रीतता
नभ में चाँद।
8
ठहरें नहीं
लहरें बंजारन
एक ही ठाँव।
9
निर्वासित हो
नगर से वसंत
बसा जंगल ।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 15, 2017

1725

1-विनोद कुमार दवे

1                                          

ण्ड की मारी

अलसाई ऋतु है

धूप सेंकती।

2

कहाँ मिलन

प्रेम है मौन कथा

विरह व्यथा।

3

शिशिर आए

गिरते हुए पत्ते

व्यथा सुनाएँ।

4

सत्य भुलाया

पतझर मौसम

याद न आया।

5

सर्दी का जाना

शिशिर के द्वार पे

गर्मी का आना।

6

नश्वर देह

भोग और विलास

मिथ्या है प्यास।

7

कैसे जताएँ

अँधों के सपनों में

दृश्य न आए।

-0- davevinod14@gmail.com

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | फ़रवरी 11, 2017

1724

1-मंजु मिश्रा

1

नफरतों का
जो फैला है जंगल
ख़तम करो 
2
प्रेम का पर्व
बस एक दिन क्यों
रोज क्यों नहीं ?
3
सच है यही
फूलता फलता तो
बस प्यार है 

4

प्यार न हो तो
बेकार है जिंदगी
यकीन जानो

-0-

2-कृष्णा वर्मा

1

फगुनाहट

नूतन संवत्सर

की दे आहट।

2

ऋतु आरम्भ

रंगों की धूम मची

धरा कुटुम्ब।

3

जिया चुराएँ

ज़ाफरानी हवाएँ

प्रीत ढ़ाएँ

4

ओस धुली सी

पुष्पित पंखुड़ियाँ

टपके गंध।

5

चाँद शबाब

रिस रही चाँदनी

प्रेम सौगात।

6

फूला बसंत

साँसों की बगिया में

महके कंत

7

छिड़ी रागिनी

कोकिल हुए कंठ

झूले आनन्द

8

कर सिंगार

बासंती हवाओं ने

बाँटा ख़ुमार।

9

तरंग- गंध

सुधियों में आ घुली

मस्ती की भंग।

10

पी रुत ताड़ी

बौरा झूमीं शाख़ाएँ

चढ़ी ख़ुमारी

11

ताकती शाख

आस भरी आँखों से

खिला वैशाख।

 12

हवा मलंग

छू भरे सिहरन

फूलों के अंग।

13

हवा के पट

खुशबू की मोहर

लगाएं फूल।

14

ऋतु की कृति

रँगी पोशाकें धार

ड़ी प्रकृति।

15

कोकिल धुन

चुप्पी के ताले खुले

चाबी के बिन।

16

रमा वसंत

छाजन से टपकी

महुआ गंध।

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | फ़रवरी 9, 2017

1723

1-डा.आनन्द जोशी, नेपाल (सम्पादक नेवा: हाइकु)

1

dr-ananda-joshiताल निश्चल

सो रहा है शहर

गर्भ में लावा ।

2

गर्मी- मौसम

जल भी ज्वालामुखी

त्रस्त कोरल ।

3

खेत बगर

नदी भी प्रदूषित

विकास स्तव्ध ।

4

तृषित टापू

व्यस्त जन–युद्ध में

स्थायीत्व-पथ ।

5

शान्त समुद्र

डूब गया जहाज

स्तब्ध सुनामी ।

-0-

2-डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर।

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चित का चोर

करे कुंज- विहार

चोला बासंती!!

 

2

खिला यौवन

है उन्मत्त पवन

बसंत ऋतु!!

3

गया बसंत

इन्तज़ार के चिह्न

दिखे पत्तों पर!!

4

पीताभ तन

बसंत उपवन

हाथों में हाथ!!

5

बासंती छटा

है प्रिय बिन सूनी

सुदूर कंत!!

-0

3-कमला घटाऔरा

1

याद हो न हो

मन नहीं भूलता

जो पाया कभी ।

2

चिर जीवित

अहसास प्यार का

जाए न कहीं ।

3

शिकवा नहीं

अपनाया भुलाया

बेबसी होगी  ।

4

राह में लोग

मिलते जब कभी

यादें बनते ।

5

अकेले कहाँ ?

राह की हमराहीं

मधुर

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 2, 2017

1722

1-डॉ जेन्नी शबनम

1.

सूरज जागा

आँख मिचमिचाता

छटा बिखरी। 

2.

घना कोहरा

सूरज पर छाया

एक न सुना। 

3.

धुँध गहरी

सूरज भूला रास्ता

देह ठिठुरी। 

4.

देर से जागा

जाड़े से अलसाया

सूरज ठंडा। 

5.

ठंड से हारा

हुआ नतमस्तक

प्रतापी सूर्य। 

-0-

2-अनिता मण्डा

1
नव कोंपल
मुस्काए डाली पर
आया वसंत।
2

छाया: काम्बोज

छाया: काम्बोज

प्रकृति पाए
ऋतुपति का प्यार
झूमे बहार।
3
अल्हड़ चैत
बहें पुष्प-झरने
रंग-बिरंगे।
4
लाई महक
बसंत की आहट
सिकुड़ी रातें।
5

छाया: काम्बोज

छाया: काम्बोज

रंग-सुराही
फूलों पर उड़ेली
महक़ी हवा ।
6
हरा गलीचा
फुलवारी- क़सीदा
क्या ख़ूब सज़ा !

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जनवरी 27, 2017

1721

1-सुनीता शर्मा (गाजियाबाद)

1

इंद्रधनुषी 

सपनो का पहाड़ 

फूलों की घाटी 

अंतस् की ज्योत 

मानव जीवन के 

खोले कपाट ।

3

गाँव पिछड़े

संसाधन कारण 

ढूढ़ता मौन 

4

धानी चुनरी 

ओढ़े ज्यों ही धरती

आता बसंत

5

व्याकुल मन

कविता की संगति

भरे उड़ान

6

सर्द हवाएँ 

दीवार बने टाट

रोक ना पाए

7 

जले जंगल

झुलसे आसमान

हो अमंगल

8

मृत्यु सागर

भरे कर्म गागर

कभी तो डरो

9

वर्षा अमृत

सूखी धरा के छाले 

हो जाते तृप्त

10

आज का पल

सार्थक कर्म से हो

स्वर्णिम कल

11

तपती धरा

माँगती शीतलता

बूझो तो जरा

-0-

2-विजय आनंद
1
सुख की सेज़
स्वप्न सर्जक मन
अश्क़ो के हार
2
पागल यादें,
उलझते दिल से
शाम के साये

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 27, 2017

1720

1-रमेश कुमार सोनी, बसना छत्तीसगढ़

1

सभी लौटते

बीता वर्ष अच्छा था

राह एकाकी।।

3

काँटों की राह

आओ नवल वर्ष

पार लगाओ।।

4

फाक़ों में बीता

नई भोर दे जाना

भोग को दाने।।

5

कभी ना रुके

वक्त मुसाफिर है

शहर मेरे।।

6

बीती बिसारो

सँभालो आज प्यारे

नव संकल्प।।

7

वर्ष बदले

सवाल वहीं खड़े

जवाब मॉगे।।

8

नव प्रभात

चहकती आशाएँ

कहें शुभ हों।।

9

बाला षोडशी

नव भोर महकी

धरा उतरी।।

-0-

रमेश कुमार सोनी, जे.पी.रोड़ बसना 493554

rksoni1111@gmail.com

-0-

2-प्रदीप कुमार दाश ‘दीपक’

1
वर्ष नवल
सदा पूरे हों सभी
शुभ संकल्प ।
2
नवीन वर्ष
पग पग में मिले
सदा उत्कर्ष ।
3
ओस नवल
नव वर्ष का करे
भोर स्वागत ।
4
नया है वर्ष
उग आया सूरज
भोर नवल ।
-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 25, 2017

1719

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