Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 12, 2017

1734

1-जसप्रीत कौर-कक्षा 7, जलन्धर

1
माता पिता है
प्रभु का वरदान,
सबकी शान।
2
पानी  बचाना
अपने भारत को
आगे बढ़ाना।
3
देश की शान
बेटी प्रगति का है
नया रे नाम ।
4
आलू जो खाता
खूब गोलमटोल
वह  हो  जाता।

-0-

साक्षीकक्षा 7, जलन्धर

1
गी गूँजने
आँगन किलकारी
बिटिया प्यारी।
2
बीता जो पल
भूल उसे मानव
आगे निकल।
3
करो काम जी
सबके रखवाले
सदा राम जी

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मार्च 8, 2017

1733

1-भावना कुँअर

1

मिटे सन्ताप

लिखा हथेली पर

ज्यों तेरा नाम !

-0-

2भावना सक्सैना

1
सदा वारती
फिर भी हारती
जननी वह।
2
देह प्राण से
करती समर्पण
सारा जीवन।
3
लड़े ज से
अबला है सबल
काँच –सा  मन।
4
स्वयं से युद्ध
जीत अब निश्चित
मौन संकल्प।
5

भावों के रिश्ते

रहते उम्र भर

टूटें स्वार्थ के।   

6

गहन पीर

संवेदना -औषधि

हरती शूल।

7

करुणा -नीर

पड़े जो दर्द पर

विहँसें फूल।

8

पा स्नेह -सार

उपजे वेदना से

गीत करुण।

9

छाया- से सच्चे

मित्र संग चलते

हरते पीर।

-0-

3-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

घना अँधेरा

सिर्फ़ एक रौशनी

नाम तुम्हारा।

2

थामी हथेली

हल हुई पल में

हर पहेली।

3

वापस आओ

ये घर ये आँगना

बाट निहारें।

4

खुशबू फैली

नहाया हर कोना

तुम आ गए।

5

लौटे हैं पंछी

नीड़ हुए मुखर

चले भी आओ!

6

भोर में खिले

सभी फूल कहते-

गले  लगा लो!

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 6, 2017

1732

1-डॉ०पूर्णिमा  राय

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 सर्द हवाएँ 

बहकता मौसम 

रंगीन मन।। 

2

जाड़े की धूप 

एहसास गर्मी का 

धड़के दिल।।

3

ये शोरगुल

सिसकती दीवारें

 काँपे हृदय!! 

4

रात्रि पहर 

शान्त वातावरण 

साँसें ठहरीं!! 

5

हिम कणों से 

टपक रहे अश्रु 

 बिना बात के!! 

6

कदम रुके 

सहेज रही रिश्ते 

बिखरी आस!! 

 7

 आँसू या मोती 

सोनजूही के फूल 

लगते प्यारे!! 

8

मन का पंछी 

अकेला भाग रहा

मिले अपने। 

9

मन बेबस 

चाहता है उड़ना 

पंख विहीन।। 

10

मन निर्मल 

जैसे गंगा-यमुना  

धुलते पाप ।। 

11

 मन भँवरा 

इत उत डोलता 

चाहे कलियाँ। 

12

 मन बावरा 

 मिलन अभिलाषा 

 अटकी साँसें।। 

 13

मन क्रोधित 

स्वार्थ रंग में रँगा 

करे अहित।। 

-0-

ग्रीन ऐवनियू,घुमान रोड,

 तहसील बाबा बकाला

 मेहता चौंक-143114 अमृतसर,पंजाब।।

-0-

2- डॉ मधु त्रिवेदी

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अनेकानेक
रंग होली पर्व के
लाल गुलाबी

2

खिलते रंग
प्यार के, यौवन के
हर अंग में

3

हिय हुलसे
हूँ ओर बहता
प्रीत का रंग

4

नई उमंग
तरंग डूबा

गाता है मन

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मार्च 4, 2017

1731

1-सुरेन्द्र वर्मा  

1

रंग बरसे 

ज्यों पलाश दहके 

दिन फागुन 

2

गीतों में बसा 

बस प्यार ही प्यार 

मीठी बयार 

3

तन-मन से 

आरोह अवरोह 

श्वास फागुनी 

4

प्रसन्न मन

तोड़े रति-बंधन सब 

कान्हा की वंशी 

5

फूलों के द्वारे 

मँडराते भँवरे 

कली शर्माई 

6

होली में झूमें 

महुआ कचनार

बौरी बयार

7

 

धरे न धीर 

कूक कोयलिया की 

जगाती पीर 

8

रंगोगे रंग 

केसरिया सुगंध 

कहाँ हो कन्त 

9

महका बौर 

चू  पड़ा है महुआ  

रंग गुलाल   

-0-

2- प्रियंका गुप्ता

1

व्यापार बना  

शब्दों में रचा प्यार

बेमोल बिका ।

2

शब्दों के तीर

जितनी बार चले

घायल किए ।

3

प्रेम का खाता

खोला था जाने कब

ब्याज न मिला ।

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मार्च 1, 2017

1730

1-जेन्नी शबनम

1

हवा बसन्ती  

लेकर चली आई  

रंग बहार!  

2  

पीली ओढ़नी  

लगती है सोहणी  

धरा ने ओढ़ी!  

3  

पीली सरसों  

मस्ती में झूम रही,  

आया बसन्त!  

4  

कर शृंगार  

बसन्त ऋतु आई  

बहार छाई!  

5  

कोयल कूकी –  

या सखी बसन्त  !

साथ में नाचें!  

6  

धूप सुहानी  

छटा है बिखेरती  

झूला झूलती!  

7  

पात झरते,  

जीवन होता यही,  

सन्देश देते!  

8  

विदा हो गया  

ठिठुरता मौसम,  

रुत सुहानी!  

9  

रंग फैलाती  

कूदती फाँदती ये,  

बसन्ती हवा!  

10  

मधुर तान  

चहूँ ओर छेड़ती  

हवा बसन्ती!  

-0-

2-कृष्णा वर्मा

1

खिली कलाई

लाल हरी चूड़ियाँ

छनछनाईं।

 2

जिये सुहाग

चूड़ी की खनखन

गाए ये राग।

2

कंगन हार

बिन चूड़ी होता ना

पूरा सिंगार।

3

काँच का तन

छनक बतियाएँ

हरें पी मन।

4

मीठी मधुर

चूड़ी की झंकार

जगाए प्यार।

5

बजें अडोल

फिर खोलें चूड़ियाँ

प्रेम की पोल।

6

काँच या लाख

चूड़ी हर गोरी का

पहला ख़्वाब।

7

शीशा बदन

प्रीत हथकड़ियाँ

दुल्हन धन।

8

अजब दम

जोड़ें कच्ची चूड़ियाँ

पक्के संबंध।

9

रहे आबाद

बहनों का सुहाग

चूड़ियाँ राग।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 1, 2017

1729

1-डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

1

यूँ तो वीरानी

फैली है चारों ओर

भीतर शोर !

2

आँख में नमी

कहो क्या खलती है ?

हमारी कमी !

3

नन्हें क़दम

चलके आओ धूप

मेरे आँगन !

4

बोझ का मारा

फट पड़ता दिल

जैसे बादल !

5

धूप ,छाँव में

ख़ुशबू ,फूल कभी-

शूल पाँव में !

6

वादे आबाद

बेचैन करती है

आवारा याद !

7

पान-गिलौरी

खूब रंग लाती है

याद निगोड़ी !

8

किसकी याद ?

भोर के मुख पर

सुख-संवाद !

9

एक चाहत

सुना गई दुख को

सुख की बात !

10

तुम्हारे लिए

दुआ माँगता दिल

होंठ हैं सिए !

11

क्यों तड़पाना ?

नज़दीक आकर

यूँ दूर जाना !

12

मिलो हमसे

मिलती हैं ख़ुशियाँ

गम से जैसे !

13

भीगा तकिया

सीला हुआ रूमाल

कहते हाल !

14

सीली लकड़ी

सुलगती हो जैसे

ज़िन्दा हूँ ऐसे !

15

ओ मेरे मीत

नींद गाए रातों में

तेरे ही गीत !

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | फ़रवरी 26, 2017

1728

1-हाइगा

अनिता मण्डा

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2-हाइकु

पुष्पा मेहरा

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Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 23, 2017

1727

1-कशमीरी लाल चावला
1

 आती अँधेरी
पवन संग नाचे
गिरते पात

-0-

2-डॉ पूर्णिमा राय

काक

1

कौआ शैतान

देखकर कोयल

हुआ बेहाल!!

2

सुन ओ कागा

मुँडेर पर आ जा

ले आ सवेर!!

3

कड़वी वाणी

खामोश हो जा काक

पिक है पास!!

4

काला तिलक

सजता मस्तक पे

खटके कौआ!!

5

ओ प्यारे कौए

ले शक्कर औ खीर

सुना संदेशा!!

-0-

चूड़ियाँ

 1

नन्हीं कलाई

चूड़ी पहन कर 

झूमे हवा -सी!!

2

चूड़ी- कंगन

जिन्दगी के रंग में

रँगे- खनके!!

3

चाँदी की चूड़ी

लगती स्वर्ण जैसी

पिया के संग!!

4

सजी चूड़ियाँ

विश्वास की नींव पे

हमसफर!!

5

सूनी कलाई

वधू है या विधवा

रुचि -अरुचि!!

6

नदी किनारा

हाथ में हैं चूड़ियाँ

राह निहारे!!

-0-

3- विभा रश्मि 

1

खानाबदोश
घुमंन्तू  दिल मेरा
साँझ – सवेरा ।
2
चुन्नी से बाँधी
कई गाँठें फ़िक्र की
हो खैरियत 
3
मन ने छाना
छलनी से  इतना
फिर भी धोखे ।
4
गीत गाता जा
तरन्नुम में झूम
जीवन -रस ।
5
चुप्पी तोड़ दे
कायनात सामने
कुछ तो बोल ।
6
चिड़ियाँ उड़ीं
नेह अँगना मुड़ीं
दाने  बिखरे ।
7
साँस के तार
भारी हो आएँ – जाएँ
किसको भाएँ !
8
रंगबिरंगी
पिया ने पहनाई
प्रीत चुँदरी ।
9

मन के रंग
बना देते मलंग
बजा मृदंग ।
10
कान्हा के संग
खेलन चल होरी
न जोरा जोरी ।
11
टेसू अरण्य
फाग उछाह-भरा
ताल औलय ।
12
अम्बर लाली
बहार ने उछाली
पल्लव – ताली 
13
नैनों के तीर
बैठे श्याम अधीर
राधा गम्भीर ।
14
उद्धव लिख-
गोपियाँ हैं विरही
कान्हा निर्मोही ।
15

चूड़ियाँ छन्न
छनकीं कलाई में
रंग बरसा ।
16
गगरी औंधी
उड़ी है माटी सौंधी
चूनर भीगी ।
-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | फ़रवरी 21, 2017

1726

1-डा.सुरेन्द्र वर्मा

1

नूतन  हेतु

टहनी से उतरे

बुज़ुर्ग पात ।

2

कोई न रोया

आँसुओं- से टपके

निराश पत्ते ।

3

पवन संग

झर-झर नाचते

गिरते पत्ते।

4

झर रहे हैं

पत्र पतझर में पात

टिक सकोगे?

5

जीर्ण पत्र था

हलके से झोंके में

टूटा बेबस ।

6

गिरते पत्र

निरुपाय -सा तरु

खड़ा  देखता ।

7

उम्रदराज़

एक -एक पाती को

झरते देखा ।

-0-(मो.९६२१२२२७७८),१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

-0-

2-अनिता मण्डा

1
हरे को पीला
करे बौराया फाग
मस्ती का राग।
2
उलझे हवा
आम्र मंजरियों से
भाँग का नशा ।
3
सिकुड़ी रातें
उठे सर्दी के ठाठ
यूँ आया फाग।
4
आहट पाई
फूलों ने फागुन की
बिखेरे रंग।
5
रंग उतरे
पहली बारिश में
केवल कच्चे।
6
छाई ख़ुमारी
चटकी हैं कलियाँ
लो आया फाग।
7
मद का प्याला
भरा फिर रीतता
नभ में चाँद।
8
ठहरें नहीं
लहरें बंजारन
एक ही ठाँव।
9
निर्वासित हो
नगर से वसंत
बसा जंगल ।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 15, 2017

1725

1-विनोद कुमार दवे

1                                          

ण्ड की मारी

अलसाई ऋतु है

धूप सेंकती।

2

कहाँ मिलन

प्रेम है मौन कथा

विरह व्यथा।

3

शिशिर आए

गिरते हुए पत्ते

व्यथा सुनाएँ।

4

सत्य भुलाया

पतझर मौसम

याद न आया।

5

सर्दी का जाना

शिशिर के द्वार पे

गर्मी का आना।

6

नश्वर देह

भोग और विलास

मिथ्या है प्यास।

7

कैसे जताएँ

अँधों के सपनों में

दृश्य न आए।

-0- davevinod14@gmail.com

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