Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 14, 2019

2018

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Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 10, 2019

2017-मायका सूना

ज्योत्स्ना प्रदीप
1
बिन माँ-पिता
जलती रही मन
दबी-सी चिता!
2
बिटिया रोई
मैके में नहीं कोई
बिन माँ-बाप ।
3
बेटी मैके में
अब हुई पराई
पिता न माई॥
4
तेरे बिन माँ ,
क्यों अपने ही छलें
सब बदले!
5
माँ आज होती
मैके में नहीं रोती
तन्हा बिटिया!
6
स्नेह तेरा था
मुस्कानों ने सर्वदा
मुझे घेरा था ।
7
पड़ा है मौन
पूछता तानपूरा
छेड़े रे कौन?
8
बोलती धीरे
तेरी कुछ तस्वीरें
मन को चीरे!
9
इक तस्वीर
अब तक अधूरी
तुझसे दूरी!
10
कूची अकेली
सूख गए हैं रंग
तेरा न संग!
11
माँ की दी हुई
वह अन्तिम साड़ी
प्रीत है गाढ़ी!
12
तेरा बनाया
पिता का वह चित्र
बिखेरे इत्र
13
तुझ बिन माँ
दालान की तुलसी
सूखी, झुलसी
14
नैना की धार
तेरा वह अन्तिम बार
सूना शृंगार!
15
सूना आवास
तू जो चली गई माँ
पिता के पास!
16
नैन हमारे
नभ के वह दो तारे
सदा निहारें ।

Posted by: हरदीप कौर संधु | मई 7, 2019

2016

1-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

घिरा आग में

व्याकुल हिरना सा

खोजूँ तुमको।

2

चारों तर

है घनेरा जंगल

कहाँ हो तुम!

3

प्यास बुझेगी

मरुथल में कैसे

साथ न तुम!

4

अँजुरी भर

पिलादो प्रेमजल

प्राण कण्ठ में।

5

शब्दों से परे

सारे ही सम्बोधन 

पुकारूँ कैसे!

6

भूलूँ कैसे मैं

तेरा वो सम्मोहन

कसे बन्धन।

7

तन माटी का

मन का क्या उपाय

मन में तुम।

8

तरसे नैन

अरसा हुआ देखे

छिना है चैन।

9

देह नश्वर

देही, प्रेम अमर

मिलेंगे दोनों।

-0-

2-डॉ.सुरंगमा यादव

1

पीड़ा के गीत

बन गए अब तो

साँसों के मीत

2

प्रेम के किस्से

दर्द की जागीर है

हमारे हिस्से

3

प्रेम की कमी

मन की धरा पर

दरारें पड़ीं

4

मन की कश्ती

आँसू के सैलाब में

बह निकली

5

जीवन– व्यथा

लिखने जब बैठी

बनी कविता

6

आँचल हरा

ढूँढती वसुंधरा

कहीं खो गया

7

सुनो कहानी

धरा और आँख में

घटता पानी

8

झूठी कसमें

सत्य का उपहास

न्याय की आस

9

परम्पराएँ

पाँव जो उलझाएँ

हमें न भाएँ

10

अल्ट्रासाउण्ड

सुनते ही सहमी

नन्ही अजन्मी

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 4, 2019

2015

अनुपमा अनुश्री

1

तप्त हवाएँ
जलता दिनकर
खिला मोगरा।

2

जीने के रंग
धूप छाँव के संग
हँ
सते फूल।

3

गर्मी के दिन
ठंडी सी पुरवाई
शीतल  रातें ।

4

आग ही  आग
जेठ की दोपहर
जलता सूर्य।

5

जीवनरथ
चले अनवरत
नयी आशाएँ।

6

खिलते दिल
जगमगाती रात
पूनम-चन्दा

7

अद्भुत सारे
उन्मुक्त नज़ारे
हसीं वादियाँ

8

खिलखिलाती
प्रस्फुटित पुष्पों-सी
चंचल हँसी।

-0-

ashri0910@gmail.com

Posted by: हरदीप कौर संधु | अप्रैल 28, 2019

2014-प्रभात पुष्प

1-कमला निखुर्पा
1
भाई अक्षत
बहनें सुर्ख रोली
रिश्तों की राखी ।
2.
आया है भैया
नाचे मन- मयूर
लूँ मैं बलैया।
3.
घर अँगना
था तुम बिन सूना
अब न जाना।
4.
माँगा है नेग
चिरजीवी हो भाई।
बाँटूँ मैं नेह।
-0-

2अनिता ललित
1
मूक थी बातें
सूना था परिवार
भैया जी बिना।
-0-
3-मंजूषा मन
1
समझा नहीं
मन की पीर कोई
आँख ही रोई।
2
साथी न कोई
पीड़ा और ग़म में
तुम भी नहीं।
3
भूल थी कोई?
ग़म को भुलाकर
प्रेम चाहना।
-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अप्रैल 26, 2019

2013

डॉ.सुरंगमा यादव के हाइकु निम्नलिखित लिंक पर क्लिक करके पढ़ और सुन सकते हैं

डॉ0 सुरंगमा यादव के हाइकु

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 22, 2019

2012-तेरी ही आस

ज्योत्स्ना प्रदीप 

1

प्रणय-पत्र

चैत्र में खिले पुष्प

चित्रा नक्षत्र!

2

जेठ का मास

मन-मरू बसी है

तेरी ही आस ।

3

आषाढ़ माह

आशाओं की आड़ में

सूखा ही रहा!

4

कई सावन

उसकी मुस्कानों में

मनाते तीज!

5

भादो के घन

जब नैन समा

श्याम ही आ!

6

भादो भरा है

प्रेम घने घन से

मन तरा है!

7

खोलूँ कपाट

आश्विन की है बाट

आ जाना प्रिय ।

8

उजाले भर

कार्तिक घर-घर

होता हर्षित!

9

गोरी-सी सर्दी

कार्तिक कोमलांग

गुलाबी प्रीत!

10

सखी बनके

आँसू अगहन के

सोखती धूप!

11

पौष की रातें

बहाती हैं नैनों से

बर्फीले आँसू!

12

माघ भरोसे

आँसू वह कोसे-कोसे

जमाती शीत!

13

फागुन मास

मधुमाधव संग

ऋतु का रास!

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अप्रैल 18, 2019

2011

डॉ.सुधा गुप्ता

1

अंजलि भर

बाँटे उजाला दीया

कभी न हारा ।

2

अंजुमन में

सारिका टेर  उठी  

निज धुन में ।

3

अपना देश  

ॠतु -परिवर्तन   

नूतन वेश ।

4

अब विदा दो

झरते पत्ते बोले  

पेड़ रो दिए ।

5

अबके साल

बादल मेहरबाँ  

धरा हैरान ।

6

अल्हड़ नदी

बाबुल-घर छोड़  

निकल पड़ी ।

7

आई जो आँधी  

चटाक टूटी डाल  

गिरा घोंसला ।

8

आई सजके  

सोलह  हैं शृंगार  

ॠतु बहार ।

9

आकाश -छत  

छेदों-भरी छतरी  

टपक रही ।

10

आकाश दीप   

जलाए  राह देखे  

रजनी बाला ।

11

आया आश्विन  

सुरभि की पिटारी

खोले शेफाली ।

11

आया चलके  

डगमग सवेरा  

हारा अँधेरा ।

12

आया सूरज  

घटाओं के तेवर  

देख , जा छुपा ।

13

आषाढ़ -मेघ ।

आते ही खोल बैठे ।

यादों  की पोथी ।

14

आषाढ़ सूखा

मेघदूत है रूठा  

यक्ष विकल ।

15

उखड़ी साँस  

आफ़त का मारा-सा

 घूमे शिशिर ।

16

उड़ी पतंगें  

आकाश हुआ  दंग  

कितने रंग !

17

उमंग-भरी  

शाखों पे गिलहरी

उड़न परी ।

18

उमड़ चलीं  

बाँध तोड़ नदियाँ  

बहाए गाँव ।

19

उषा की माला

टूटी, बिखरे मोती  

दूर्वा सहेजे ।

20

एक फ़रिश्ता  

फूल पर आ बैठा  

जागे हैं भाग ।

21

ओलों की मार  

बिजली का चाबुक  

डाँट-डपट ।

22

ओस की बूँदें

जमीं, बनी हैं मोती

दूर्वा पिरोती ।

23

ओस नहाई

फूल गजरा धारे  

मौलश्री हँसी ।

24

कपड़े फेंक

बन बैठा नीम  

नागा संन्यासी ।

25

कबरी खुली

गजरा बिखरा है

निशीथिनी का ।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अप्रैल 11, 2019

2010

 डॉ.पूर्वा शर्मा
1.
फुदके फाँदें
चाह गिलहरियाँ
तमाम उम्र।
2.
नेह तुम्हारा
शहरी ट्रैफिक-सा
थमता नहीं।
3.
कैसे लाँघती?
दिल-आँगन चुनी
याद चौखट।
4.
कंजूस लब,
नैनों के किये खर्च
भीगे से हर्फ़।
5.
तन्हाई में भी
तन्हा ना रह सकूँ
रूह में तू ही।
6.
तुम ठहरे
मेरी परछाई-से
हाथ न आते।
7.
चुरा के रखी
जीवन की ज़ेब में
तेरी वह हँसी।
8.
उठाए मैंने
ज़िंदगी के नखरे
बड़े खतरे।
9.
कुछ ही लम्हें
उधार दे ज़िंदगी
मुस्कुरा भी लूँ।
10.
यह ज़िंदगी
करतब दिखाती
बाज़ीगर-सी।
11.
प्रत्येक बार
ज़िंदगी के पते पे
तुम ही मिले।
-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 29, 2019

2009

प्रकृति

डॉ.जेन्नी शबनम 

1.
प्यार मिलता
तभी खिलखिलाता
प्रकृति-शिशु ।
2.
अद्भुत लीला
प्रकृति प्राण देती
संस्कृति जीती।
3.
प्रकृति हँसी
सुहावना मौसम
खिलखिलाया।
4.
धोखा पाकर
प्रकृति यूँ ठिठकी
मानो लड़की।
5.
कृत संकल्प
प्रकृति का वंदन
स्वस्थ जीवन।
6.
मत रुलाओ,
प्रकृति का रुदन
ध्वस्त जीवन।
7.
प्रकृति क्रुद्ध,
प्रलय है समीप
हमारा कृत्य।
8.
रंग बाँटती
प्रकृति रंगरेज़
मनभावन।
9.
मौसमी हवा
नाचती गाती चली
प्रकृति ख़ुश।
10.
घना जंगल
लुभावना मौसम
प्रकृति नाची।
11.
धूल व धुआँ
थकी हारी प्रकृति
बेदम साँसे।
12.
साँसें उखड़ी
अधमरी प्रकृति,
मानव दैत्य।
13.
खंजर भोंका
मर गई प्रकृति
मानव खूनी।
14.
खेत बेहाल
प्रकृति का बदला
सूखा तालाब।
15.
सुकून देती
गहरी साँस देती
प्रकृति देवी।
16.
बड़ा सताया
कलंकित मानव,
प्रकृति रोती।
17.
सखी सहेली
ऋतुएँ व प्रकृति
दुख बाँटती।
18.
हरी ओढनी
भौतिकता ने छीनी
प्रकृति नंगी।
19.

किससे बाँटे 
मुरझाई प्रकृति
अपनी व्यथा 
20.
जी भरके लूटा
प्रकृति को दुत्कारा
लोभी मानव।   

–0-

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