Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 18, 2018

1832

1-कमला निखुर्पा

1

भरी -भरी थी

बदरा की अँखियाँ

बही नदियाँ ।

2

छप्प से गिरी

चपला गगन से

टूटी ,बिखरी ।

3

छलक उठा

सरवर का जाम

नशीली धरा ।

4

इक कोंपल

नन्ही-सीदो  कलियाँ

उगा हाइकु ।

5

गाए बरखा

रिमझिम के गीत

 बिजुरी नाचे।

-०-

2-कृष्णा वर्मा

1

भोर के कान

रात बीती कहता

प्रहरी चाँद।

भोर सुरूर

दमकी वसुंधरा

फूलों पे नूर।

-0-

3-पूर्वा शर्मा

1

सर्पिणी यादें

चिपकी लिपटी- सी

कहीं न जाती ।

2

शुष्क पात की

स्वर्ण झाँझर बाँधे

शाख थिरके ।

3

पुष्पों से लदी

पात रहित शाख

सुन्दर सजी ।

4

मन मोहती

पलाश पर बैठी

कूहू कूकती ।

5

चढ़ा है रंग

तेरी प्रीत का ऐसा

सूर्ख पलाश ।

6

गरबा घूमे

बवंडर में पात

डोलती फिरें ।

7

तेरी यादों में

नैनों से दिल तक

दरिया बहे ।

8

किसे निहारूँ ?

दोनों ही मनोहारी-

तुम औ चाँद ।

9

हैवानियत

ऐसी, नन्हीं कली भी

लहूलुहान ।

10

चल तन्हाई

चलें यहाँ से दूर

यहाँ कोई है !

-0-

purvac@yahoo.com

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Posted by: हरदीप कौर संधु | मार्च 8, 2018

1831

1-कमला घटाऔरा

1

शाश्वत सत्य

एक नूर उसका

रौशन जग ।

2

आगत पल

जाने केवल वक्त

सोच क्यों करें ?

3

रिश्ता जन्मों का

मुड़ मुड़ मिलाता

कशिश- भरा

4

क्षितिज को छू

सिन्धु पाई नीलिमा

दिव्य मिलन ।

5

चूमके माथा

जगा गई भोर को

मात-रजनी ।

6

फैली लालिमा

आँखे मलती ऊषा

कहे- सोने दो ।

7

धूप कुँवरी

खड़ी पहाड़ पर

झरे स्वर्णाभा।

8

आओ सैलानी

राह तके धूपल

सिन्धु किनारा ।

-0-

2- डॉ ज्योत्सना सिंह

1

प्रभु नमन

तुम्हें अर्पण करूँ

श्रद्धा सुमन

2

मष्तिष्क पर

कविता केसर का

लगाऊँ टीका

3

ज्ञान दीपक

बना के प्रभु मुझे

स्वीकार करें

4

मेरी अर्चना

दरकता विश्वास

जोड़ती रहे।।

5

कंगाली भूख

निगल रही वासी 

सूखी रोटियाँ

6

व्याकुल भूख

तृप्ति पर लुटाती

ढेरों आशीष 

डॉ ज्योत्सना सिंह,(असिस्टेंट प्रोफेसर,जीवाजी युनिवर्सिटी)

सी 111 गोविन्दपुरी,ग्वालियर मध्यप्रदेश 474011

singh.jyotsna73@gmail.com>

-0-

3-विभा  रश्मि

1

पाल नौकाएं

समुद्र में अंधेरे 

लगातीं फेरे ।

2

समुद्र पुत्र 

मछुआरे कर्मठ 

जाल – रसरी । 

3

चंचल तन 

मौजें  हैं  नृत्यांगना

गंभीर मन ।

4

सोने – रूपा के

लपेटे हैं सितारे 

सुख – नज़ारे ।

5

चाँद जा बैठा 

अंक में लहरों के 

शिशु हिंडोला  ।

6

सूर्य रसरी 

नीरधि में पसरी 

बाँधा नेह में ।

7

गीत हैं गातीं

वेग से लहरातीं

फेन उड़ातीं । 

8

निर्मल मन

चाहतों की अगन 

प्रेयसी तीर ।

9

तकती रहूँ

नश्वर  ये  सौंदर्य

सहेजी  स्मृति  ।

-0-

4-मनीषा सक्सेना

1

स्वयं गलत

तर्क दे समझौता

दिल निगोड़ा

2

भूले न गलती

न रखे याद सही

बोझिल दिल

4

औरों की खुशी

स्वयं दिल दुखाये

रिश्ता निभाये

5

दिल की ठेस

माफी से भी ना जाए

माफी ही मांगे

 -0-

मनीषा सक्सेना

जी-१७ बेल्वेडीयर प्रेस कम्पाऊंड

मोतीलाल नेहरु रोड

इलाहाबाद २११००२

manisha.mail61@gmail.com

-0-

5-सुनीता शर्मा

1

प्रखर नारी 

असीमित संघर्ष 

कभी न हारी

2

कोरा आसमां

 मरुस्थल जमीन 

नारी जीवन 

3

बेटी मुस्कान 

मंगल मृदुगान

सबकी आशा

4

खुद्दारी जीती

आधुनिक कविता 

नारी नारीत्व

5

हरसिंगार 

आनंद दायिनी 

जग जननी

6

नारी सुमेधा

तन-मन वसुधा

मन हर्षाती

7

नारी चलती

जीवन पगडंडी

छाले छुपाती

8

रिश्ते संजोती

माँ-बहन-बेटी

घर संवारे

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 2, 2018

1830

1- कृष्णा वर्मा

1

ऋतु हवाएँ

सिरजती इच्छाएँ

पर्व कथाएँ।

2

फाग सौगात

फूल के कुप्पा फूल

बाँटें सुवास।

3

सूर्य का हास

गाएँ उमग कर

रश्मियाँ फाग।

4

महकी धूप

तितलियाँ सराहें

फूलों का रूप।

5

मीठी छुवन

मादल बजे कहीं

वंशी की धुन।

-0-

2- डा. सुरेन्द्र वर्मा

1

फागुनोत्सव

पतझर बहार 

यही जीवन 

2

रंग लुटाते 

फूले फले पलाश 

वन दहके 

3

टेसू की आग 

पिघलाती सर्दियां

तपाती तन  

4

दीपित मन 

बिखरा चहुंओर 

टेसू का रंग 

5

आँखों के डोरे 

गुलाबी रंग डूबे 

रंग अजूबे 

6

झुण्ड में खड़े 

हंसते हैं पलाश 

होली उल्लास 

7

होली के गीत 

गाता मनमीत मेरा 

टेसू चितेरा 

-0-

3-सीमा सिंघल ‘सदा’

1

प्रेम फागुनी

मन के उत्सव में

भीगता रहे !

2

रंग गुलाल

चले भंग के संग

मचाते शोर !

3

धरा ने खेला

अम्बर- संग रंग

मचा धमाल !

4

होली के रंग

अपनों के संग हैं

कहे फागुन !

5

होली के रंग

पिचकारी के संग

भीगे गुलाल !

6

पीकर भंग

बोले होली है होली

रंगों की टोली !

-0-नेहरु नगर रीवा ,मध्यप्रदेश

4-सुशील शर्मा 

1

होली है आई

शीत ऋतु बिदाई

रंगीनी छाई। 

2

आओ कन्हाई

राधा होरी रचाई 

प्रेम दुहाई। 

3

पिया के पास 

मन भर उल्लास

रंगों की आस 

4

मादक गंध

अधर मकरंद

होली के रंग। 

5

बाजत ढोल

कान्हा करे किलोल 

प्रेम के बोल 

6

खेलत फाग 

मधुवन के बाग़ 

राधा के  राग 

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | फ़रवरी 27, 2018

1829

डॉ.सुधा गुप्ता

श्रद्धांजलि-सन्देश

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 26, 2018

1828

दिनांक 23 फरवरी को आपका पोस्ट किया हुआ शब्दों का उजाला में भगवतशरण अग्रवाल के निधन समाचार को पड़कर स्तब्ध रह गया । जिस बगैर-आडम्बर के वह काम करते थे, उसी तरह चुपचाप वे चले गए, किसी को कानों कान खबर तक नहीं हुई । आपको आभार प्रकट करना चाहूँगा की आपने उनकी खोज-खबर लेकर उनके निधन को और उनकी 88वीं जन्म तिथि को सार्वजनिक किया । यदि वे कुछ दिन और जीवित रह पाते तो वे निश्चित ही 88 वर्ष के हो गए होते ।

    सच पूछा जाए तो मेरा हाइकुलेखन उन्हीं के द्वारा प्रकाशित हाइकु-भारती पत्रिका से आरम्भ हुआ जिसमें वे मेरी रचनाओं को बहुत सम्मान पूर्वक स्थान देते थे । मैंने हाइकु लेखन 1998-99 से आरम्भ किया था और तभी “हाइकु पत्रिका” का प्रकाशन भी आरम्भ हुआ था । मैंने जब ‘हाइकु पहेलियाँ’ और ‘सुखन हाइकु’ लिखे तो उन्होंने इन रचनाओं को रेखांकित करते हुए अपने अद्वितीय ‘हाइकु काव्य विश्वकोश’ तक में इस प्रयोग का  उल्लेख किया । हाइकु के प्रति उनका उत्साह देखते ही बनता था । आज हिन्दी में जितने भी प्रतिष्ठित हाइकु रचनाकार हैं उनमें से अधिकतर की प्रतिष्ठा का बहुत कुछ श्रेय भगवतशरण अग्रवाल के प्रोत्साहन को जाता है जो उन सबको “हाइकु-भारती” पत्रिका के माध्यम से प्राप्त हुआ । यह मेरा सौभाग्य रहा कि मैं इस पत्रिका से आरम्भ से अंत तक जुदा रहा । 

     डा. अग्रवाल ने अपनी उच्च शिक्षा लखनऊ से प्राप्त की थी, लेकिन उन्होंने अपनी शैक्षणिक सेवाएं अहमदाबाद, गुजरात के एक महाविद्यालय को दीं जहाँ वे हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष रहे । उन्हें प्रसिद्धि मुख्यत: हाइकु लेखन और हिन्दी में हाइकु विधा के प्रचार-प्रसार से मिली लेकिन उन्होंने हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं पर भी काफी-कुछ काम किया है । मुझे पूरी उम्मीद है की उनके कुछ शिष्य उनके साहित्य के, हाइकु से इतर, अन्य पहलुओं पर भी शोध कार्य करके उसे प्रकाश में लावेंगे । अंत में उनको अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी कुछ रचनाओं को प्रस्तुत करने का मैं लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ जो मुझे बेहद पसंद हैं–

1

धन्य है वर्षा

खेतों में कविताएँ

बोते किसान।

2

लू से झुलसी

जेठ की दुपहरी

कराहे पंखे

3

फूला पलाश

यादों के दीप सजा

आया बसंत

4

पसर गई

सरसों फूली शय्या

माघ की धूप

5

कभी न जीती

मौत से जिंदगानी

हार न मानी।

-0-डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो.9621222778)

10, एच आई जी / 1, सर्कुलर रोड,इलाहाबाद -211001

Posted by: हरदीप कौर संधु | फ़रवरी 23, 2018

1827

बूँद में समा /सागर और सूर्य/ हवा ले उड़ी।

हाइकु के पुरोधा डॉ भगवत शरण अग्रवाल नहीं रहे। आज 23 फ़रवरी को 88 वर्ष के हो जाते। जनवरी की एक शाम को जब फोन किया तो

सन् 1989

उनकी ठहाके भरी आवाज़ नहीं आई। बहुत ही क्षीण स्वर में बोले –“काम्बोज जी, अभी अस्पताल  से लौटा हूँ तबियत ठीक नहीं है। फिर बात करूँगा।’’ उनका वह फिर नहीं लौट पाया।  मैं और दीदी डॉ सुधा जी फोन करते तो कोई फोन नहीं उठाता। हारकर दो दिन पहले  मैंने हाइकु की शोध छात्रा से कहा कि सूरत में आपका कोई परिचित हो ,तो  उनके घर पर किसी को भेजकर पता करा दीजिए। वह इस प्रयास में लगी थी कि कल पता चला -6 फ़रवरी को हाइकु से विश्वभर को जोड़ने वाले  उदारमना चुपचाप चले गए। हिन्दी हाइकु नियमित रूप से पढ़ते थे । किसी की अच्छी रचना होती तो मुझे फोन करके बताते और आग्रह करते कि मैं रचना कार को बता दूँ। मैं कभी किसी की बात से दुखी होता तो कहते-काम्बोज जी दो फ़ाइल रखो-एक फूलों की , एक पत्थरों की। फूलों की फ़ाइल अपने सामने रखो, उसे रोज़ देखो। कोई पत्थर भेजता है तो उसी दूसरी आइल में अलग रखो। उसको खोलकर न देखो।’’

 आज ऐसे कृपण विद्वान् बहुत हैं जो अपने से छोटों की प्रशंसा करने से परहेज़ करते हैं । डॉ अग्रवाल अच्छा लिखने वाले नए से नए रचनाकार की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा करते थे। ‘शाश्वत क्षितिज’ ( 1985)हिन्दी जगत क प्रथम हाइकु-संग्रह है ।‘ हाइकु भारती’ के माध्यम से आपने हाइकु को विस्तार दिया। ‘हिन्दी कवयित्रियों की हाइकु साधना’ के माध्यम से कुल 51 कवयित्रियों को प्रस्तुत किया जिनमें से छह कवयित्रियों के रचनाकर्म पर विस्तृत चर्चा की। ‘हाइकु-काव्य विश्वकोश’’विश्व का हाइकु साहित्य का प्रथम कोश है।

 आज के अंक में श्रद्धांजलि स्वरूप आपके कुछ हाइकु दिए जा रहे हैं। हिन्दी हाइकु से जुड़े साथी  हाइकु के इस अभियान को आगे बढ़ाएँगे ऐसी आशा है।

-0-

1

जब तक मैं

पहचानूँ ज़िन्दगी

मौत आ गई।

2

करना पड़ा

जो जीवन का सौदा-

तुम्हें माँगूँगा।

3

वर्षा में नहा

तुम ऐसे मुस्काए

फूल लजाए।

4

बौराए आम

स्वप्नों तक पहुँची

स्मृति-सुवास।

1

तुम्हारे बिना

दीवारें हैं, छत है

घर कहाँ है ?

2

मेरे घर में

छ: जने, चार दिशा

नभ और मैं ।

3

स्वप्न में जाग

जीत लिया संसार

फिर सो गए ।

4

शीतल लगे

जेठ की दुपहरी

प्रिया के संग।

5

कौन– सा राग

टीन की  छत पर

बजाती बर्षा।

6

वर्षा की रात

बतियाते मेंढक

चाय पकौड़ी।

3

सावन भादों

दिन देखें न रात

यादों के मेघ।

7

बूँद में समा

सागर और सूर्य

हवा ले  उड़ी।

8

अनादि  है जो

साथ में अनंत भी

वही तो हूँ  मैं।

9

तुम्हारे बिना

दीवारें हैं, छत है

घर कहाँ है ?

10

मेरे घर में

छ: जने, चार दिशा

नभ और मैं ।

11

शीतल लगे

जेठ की दुपहरी

प्रिया के संग।

12

कौन– सा राग

टीन की  छत पर

बजाती बर्षा।

13

वर्षा की रात

बतियाते मेंढक

चाय पकौड़ी।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 15, 2018

1826

1-डॉ सुरेन्द्र वर्मा

1

नभ एकाकी 

किससे करे बात 

ताके धरती 

2

कलियाँ  खिलीं 

कचनार बेबस 

मदनोत्सव 

3

पौन पागल 

बसंत आगमन 

पुष्प स्वागत 

4

साँस फूलती

साँय-साँय करती 

हवा बैरिन 

5

बजाते ताली 

पुरवाई जो चली 

पत्ते प्रसन्न 

6

देखो तो ज़रा 

आई शर्मीली धूप 

लजाता दिन 

7

बाँसों के बीच 

फूटता है संगीत 

हवा की चोट 

8

राजा बसंत 

औचक ही आ जाता 

ऋतु परेशां 

9

किलकारते 

कोपलों से झांकते 

पत्ते नवीन 

10

वसंतागमन 

याद आता भूलता 

नृत्य,गायन 

-0--डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८),१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड 

इलाहाबाद -२११००१  

-0-

2-रामेश्वर काम्बोज  ‘हिमांशु’

1

आशा न छोड़ो

भूलो विगत दुःख

मैं हूँ संग में ।

2

मधु चुम्बन

देकर खिला दूँगा

बुलालो मुझे।

3

नेह की आँच

पाएँगे तन- मन

मुस्काओ तुम

4

स्वप्न में आऊँ

पलभर न जाऊँ

तुम्हें तजके।

5

विरह मिटे

बाँध लेना बाहों में

पूरा जीवन ।

-0-

3-प्रियंका गुप्ता

1

तन्हा था मन

आकर रुक जाते

भर सा जाता ।

2

अकेलापन

ढूँढता फिरे मुझे

मैं छिपी रहूँ ।

3

यादों की पर्ची

लिख के रख दी थी

मन के पास ।

4

वादा था किया

भुलाओगे न कभी

याद भी है क्या?

5

रात थी रोई

खूब बारिश हुई

सबने सोचा ।

6

वो साया बना

अँधेरा जब हुआ

कहीं न मिला ।

7

टपके आँसू

तकिये में जा छिपे

ढूँढे न मिले ।

8

हिम्मत बाँधी

दुनिया जब रोके-

करना; ठानी ।

9

प्रेम छलावा

बड़ा मनभावन

चोट दे जाए ।

10

कड़ी है धूप

उधार दे दोगे क्या 

नेह-चादर ?

-0-

4-सीमा सिंघल

1

प्रेम- उत्सव

मन करे शृंगार

भीगें नयन ! ।

2

प्रीत के बोल

मन की देहरी पे

शोर मचाते !

3

प्रेम- संबंध

निभाता जब कोई

प्रेम हो जाता !

4

निश्छल प्रेम

अश्कों के मोती बाँधे

आँखों के सीप !

5

प्रेम- परीक्षा

जिसका परिणाम

सिर्फ प्रेम है !

6

जीवन कहे-

पेट की भूख रोटी

मन की प्रेम !

7

धागे प्रेम के

मन से मन बाँधे

जीवन भर !

-0- सीमा सिंघल,13/20,नेहरू नगर रीवा ,मध्यप्रदेश 486001

<sssinghals@gmail.com>:

-0-

5-चन्द्र प्रकाश वर्मा
1

खिला आकाश
टिमटिमाते तारे
चाँदनी रात।
2

पुरानी टंकी
पानी से बात करे
सारी उमर।

3

अंदर जाती
बाहर जाती साँसें
एक पथिक।                    –
-0-<
bhikhubhai204@gmail.com

Posted by: हरदीप कौर संधु | फ़रवरी 7, 2018

1825

1-पुष्पा मेहरा

1

हवा पछोरे

निज अंग-अंग से

हिम के कण ।

2

बदली ऋतु

धरती-सूरज की 

है साँठ-गाँठ ।

3

सुगंध भरी

खिल गईं कलियाँ

तृप्त हैं भौंरे ।

4

हँसतीं शाख

पग बढ़ाती धूप

सिंचित प्राण ।

5

बुढ़ाती शीत

गिनती,जीवन के

दो-चार दिन ।

6

सूखे पत्र हैं

झरेंगे अवश्य ये

आएँगे नए ।

7

झड़ने लगे

श्वेत बाल शीत के

आया हेमंत ।

8

घूमता चक्र

दिखा रहा क्रीड़ाएँ

छाया–धूप की ।

9

मदिरा भरे

महुओं को छूकर

हवा नशीली ।

10

राग औ रंग

जीवन के हैं अंग

कहे बसंत ।

11

पुलक भरी

धरा हुई यौवना

निखरे अंग  ।

12

नभ-हिंडोले

चढ़ी,झूल रही है

मीठी सी धूप ।

13

करे चकित

चौंध ये सतरंगी

रूप मोहनी ।

14

बुझाती प्यास

रूप,रस गंध पी

हवा नवेली ।

15

फूली लतर

ठूँठ के काँधे चढ़ी

स्वप्न देखती ।

16

प्यार के बोल

महका दें जीवन

यही बसंत ।

17

कुहा भगाते

फूल-छड़ी हाथ ले

काम पधारे ।

18

चारण भौंरे

निकले हैं काम को

देने बधावा ।

19

जन्में ना कभी

नफ़रत के बीज

फूले बसंत ।       

-0-

pushpa.mehra @gmail .com                      

-0-

2-अंजु गुप्ता

1

हैरान धरा,

उगाईं थीं फसलें,

मकान उगा !

2

सिमटे घन,

जब रूठ धरा से,

कृषक मरा !

3

छायी बदरी,

व्याकुल फिर मन,

गीला तकिया !

4

कर दमड़ी,

कसौटी पर रिश्ते,

अपना कौन?

5

नन्ही वो कली,

शायद ही मुस्काए,

रौंदी थी गई !

6

आकार लघु

गंभीरता समेटे

होते हाइकु !

7

गर्भ में कली

डरती क्या करती

की भ्रूणहत्या !

8

समन्दर तू,

मैं नदिया हूँ प्यासी,

मुकद्दर है !

9

जर्जर काया,

इच्छाएँ खंडहर,

जीने को मरे !

10

आड़ी – तिरछी ,

किस्मत की लकीरें ,

समझूँ कैसे !

11

मुठ्ठी में बन्द 

भविष्य है अपना 

बदलूं कैसे !

12

बन बैठे हो,

किसी और के तुम,

जलूँ न कैसे !

13

नम नयन,

गालों के सूखे आँसू,

पुकारें तुम्हें !

14

काँटों से भरी,

है ये प्रेम डगर,

डरे है मन !

15

सर्द हवाएँ

सियासत की भेंट

रिश्ते भी चढ़े !

16

चारदीवारी

हुई असुरक्षित 

रिश्ते विक्षिप्त

17

पिसी जिंदगी

मर्यादा-अमर्यादा

है अंतर्द्वन्द 

18

रिश्तों में छल,
पलभर का सुख,
अकेलापन !

 19

देखा दर्पण

देख खुद की छवि

सहमा अहं।

 20

छाई है धुंध,
सवाल बने रिश्ते, 
कसैले हुए !

 21

दुर्गम पथ
रख मन संबल
खिलते फूल ।

 22

रह सम्भल

गिरगिट-सा  इंसाँ 

पीठ पे वार

 23

पीहर छूटा

ससुराल पराया

अपना कौन ?

 24

हिम्मत रख

तन मन को साध

जीत लो जंग

अंजु गुप्ता

जन्मतिथि : 7 अक्तूबर

जन्मस्थान : कपूरथला

शिक्षा : एम बी ए, एम ए (इंग्लिश)

व्यवसाय : Soft Skill Trainer

सम्प्रति : हिसार

ई मेल : anju74gupta@gmail.com

सम्प्रति : हिसार

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 7, 2018

1824

1-डॉ कविता भट्ट

1

जीवन- पथ

विगत दुःख घट

आशा तुमसे।

2

नैन विकल-

लिखें पाती आँसू से

कभी तो बाँच।

3

पीत-पुष्प- सा

सुमुख मुरझाया

अब तो आओ ।

4

शीत शरद

तुम बिन बैरी हो

कटु मुस्काए।

5

मीत मन के

कभी तो आते तुम

स्वप्न बनके।

6

सलवटों -सी

मन-चादर पर

विरह -व्यथा ।

7

नित प्रयास

आँसू बाँचूँ तुम्हारे

दे दूँ मैं हास ।

-0-

2-मंजूषा मन
1
मुठ्ठी में रेत

जकड़के क्या पाया
पोरों से झरी।
2
भावुक मन
गले मिलके चाहे
फूट के रोना।
3
छूकर तुम्हें
बिखर जाए मन
चाहूँ बस ये।
4
टूटते हम
साथ न तेरा पाते
किधर जाते।
5
यादों के मोती
आँखें समन्दर हैं
खूब लुटाएँ।
6
कल ही आया
देखो लगा बीतने
नया साल भी।
7
याद न आए
तुम्हारी तुम जानो
हमें सताए।
8
भूलो जो तुम
भले ही भूल जाओ
हम न भूलें।
9
मैं याद आऊँ
नहीं ज़रूरी यह
याद सताए!
-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | फ़रवरी 3, 2018

1823

 1सुशील शर्मा

1

आया बसंत 

पतझड़ का अंत 

मधु से कंत 

2

ऋतु वसंत 

नवल भू यौवन

खिले आकंठ 

3

 शाल पलाश

रसवंती कामिनी 

महुआ गंध। 

4

केसरी धूप 

जीवन की गंध में 

है मकरंद 

5

कुहू के स्वर 

उन्मत्त  कोयलिया 

गीत अनंग। 

6

प्रीत पावनी 

पिया हैं परदेसी 

रूठा बसंत। 

7

प्रिय बसंत

केसरिया धरती

पीले गुलाबी।

0- Sushil Sharma [mailto:archanasharma891@gmail।com

 

2-ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

1
उम्र बढी। है
लौटा है बचपन
बूढ़ा है तन ॥
2
खोई मस्तियाँ
बङप्पन में मेरी
डूबी कश्तियाँ ॥
3
हूँ पचपन
हरकत ऐसी है
ज्यों बचपन ॥
4
मैँ भी हूँ जवाँ
उम्र घटती जाती
बढ़ती कहाँ ?
5

डूबता सूर्य
स्वागत करे चाँद
आ जा तू वर्ष
6
मत्त फसलें
रच दें इतिहास
यादों के दिन
7
​​​नई सौंगाते
बाँटता चला गया
नया था वर्ष।
8
क्षण ने बोई
दिन की जो फसलें
वर्ष ने काटी।
9
क्षण की आँधी
निगल गई वर्ष
यादों के साथ।
10
नहाए दिन
बन ठनके लाएँ
नया उत्कर्ष ।
11

वर्ष के पृष्ठ
लिखेगा इतिहास
यादों का पेन।
12
बुढ़ा गया है
सोलह का यौवन
आ जा सत्रह।
13
यादों के बीज
समय की भूमि पे
रचे साहित्य।
14
आओ  लिख दो!
मन की अभिलाषा
बोले ये वर्ष।
15
हाथों से रेत
फिसल गए दिन
यादों के बिन।
16

वधू लगाए
हाथों पर मेहंदी
वर मुस्काए।
17
मेहंदी रचे
मन की हथेली पे
खिले चेहरा।
-0-

ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

पोस्ट ऑफिस के पास,रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

opkshatriya@gmail।com

9424079675

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