Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जून 26, 2017

1780

ईद का चाँद

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

मटक लिया

खुशबू से सिंचित।

पूरा वसन्त।                       

 2

आँखों से पिया

रुपहला वसन्त

मन न भरा।                       

3

ले लूँ बलाएँ

सारी की सारी जो भी

द्वारे पे आएँ।

4

ठिठका चाँद

झाँका जो खिड़की से

दूजा भी चाँद।

5

होगी जो भोर

और भी निखरेगा

मेरा ये चाँद।

6

नभ का चन्दा

भोर में लगे फीका

मेरा ये नीका।                                                

 7

सात पर्दों में

तुम को यों छिपालूँ

देखूँ मैं तुम्हें।

8

माथा तुम्हारा

मन में झिलमिल

ईद का चाँद ।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 24, 2017

1779

शकुन्तला पालीवाल

शकुन्तला पालीवाल

शकुन्तला पालीवाल

1

अक्स प्रभु का

छिपा माँ के अंदर

सम्मान करो।

2

भीगी पलकें

कभी न रहे माँ की,

रहे खुश वो।

3

जीवन मेरा

कभी लगे पहेली

कभी सहेली।

4

जीत उसकी

थपेड़ों में टिका जो

आगे बढ़ा वो ।

5

अनकही हैं

सैंकड़ों बातें ऐसी

अब कहूँ वो ।

6

ये लगे कभी

तम हटेगा अभी

फैलेगी आभा ।

7

खूबसूरत

ये रंगीन दुनिया

ताज़गी देती ।

8

झाँकता मन

बन्द पिंजरें से भी

आशा के साथ।

9

खुशियाँ छार्इं

मिली तम को मात

हँसा दिवस।

10

कोंपलें फूटीं

नव सृजन हुआ

जागी आशाएँ

11

रंगों का मेला

ऐसे ही रहे सदा

नाचता मन ।

12

हम साया है

हम सफर है तू

जीवन मेरा ।

-0-

संक्षिप्त परिचय

 शकुन्तला पालीवाल

पिता का नाम : श्री विष्णु शंकर पालीवाल

माता का नाम : श्रीमती मंजु लता पालीवाल

जन्म तिथि : 03.05.1986

 पता : श्री विक्रम सिंह बया, 448, भूपालपुरा, शास्त्री सर्किल, उदयपुर-313001 (राजस्थान)

शिक्षा : एम. एस. सी. कृषि जैव प्रोद्योगिकी एवं आणविक जीव विज्ञान, बी. एड. , एम. ए. हिन्दी साहित्य

कार्यक्षेत्र : सहायक कृषि अधिकारी

ई – मेल : skys4shakku@gmail.com , shakku4smile@rediffmail.com

साहित्यिक प्रगति : अनेक विधाओं पर लेखन (हाइकु, कहानी लेखन, कविता लेखन, लघु कथा लेखन आदि) कविताएँ, लेख एवं लघु कथाएँ पत्र पत्रिकाओं एवं समाचार पत्र में प्रकाशित ।

स्थायी पता;जस्थान एग्रीकल्चर इण्डस्ट्रीज़,चित्तौड रोड, फतहनगर,जिला- उदयपुर     

 

 

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जून 20, 2017

1778

1फ़ौजी किसान-डॉ. जेन्नी शबनम

 1.

कर्म पे डटा

कभी नही थकता

फ़ौजी किसान। 

2.

किसान हारे

ख़ुदकुशी करते,

बेबस सारे। 

3.

सत्ता बेशर्म

राजनीति करती,

मरे किसान। 

4.

बिकता मोल

पसीना अनमोल,

भूखा किसान। 

5.

कोई न सुने

किससे कहे हाल

डरे किसान। 

6.

भूखा लाचार

उपजाता अनाज

न्यारा किसान। 

7.

 माटी का  पू

माटी को सोना बना

माटी में मिला

8.

क़र्ज़ में डूबा

पेट भरे सबका,

भूखा अकड़ा 

9.

कर्म ही धर्म

किसान कर्मयोगी,

जीए या मरे। 

10.

अन्न उगाता

सर्वहारा किसान

बेपरवाह। 

 11.

निगल गई

राजनीति राक्षसी,

किसान मृत

12.

अन्न का दाता

किसान विष खाता

हो के लाचार। 

13.

देव अन्न का 

मोहताज अन्न का

कैसा है न्याय?

14.

बग़ैर स्वार्थ

करते परमार्थ

किसान योगी। 

15.

उम्मीद टूटी

किसानों की ज़िन्दगी

जग से रूठी। 

16.

हठी किसान

हार न माने, भले

साँसें निढाल। 

17.

रंगे धरती

किसान रंगरेज,

ख़ुद बेरंग। 

18.

माटी में सना

माटी का रखवाला

माटी में मिला। 

19.

हाल बेहाल

प्रकृति बलवान

रोता किसान। 

-0-

2-डॉ. सरस्वती माथुर

1

शाखें हिला के

परिंदे ना उड़ाओ

तरू रोयेंगे।

2

नमकीन थीं

झील पार डोलतीं

मन हवाएँ ।

3

इमली बूटा

आँधी में शाखें हिली

पेड़ से टूटा ।

4

कच्ची सी धूप

आँगन बुहार के

रु पे चढ़ी ।

5

कुम्हार सूर्य

धूप की चाक पर

किरणें गढ़े

6

झीना घूँघट

चटक चाँदनी का

चाँद  उठा

7

मौसम संग

स्वप्न  बदलते ज्यूँ

धूप के रंग ।

8

भाड़ झोंकता

सूरज भभूजा

धूप सेंकता।

9

मन है लौ

समय लालटेन

यादें उजाले ।

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जून 15, 2017

1777

1-प्रियंका गुप्ता

1

सूखी धरती

दहकता गगन

तेरे ही कर्म ।

 2

मन जो तपे

प्रेम के छींटे मार

भीग जाएगा ।

 3

नारी का मन

तूने जाना ही नहीं

रहा अज्ञानी ।

 4

मिला न प्रेम

खोजते उम्र झरी

कस्तूरी बनी ।

 5

उँगली थाम

चलना था सिखाया

भूला वो अब ।

 -0-

2-पुष्पा मेहरा

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 13, 2017

1776


भावना सक्सैना

1

उगले आग

रोष में है प्रकृति

मानव जाग।

2

मेघ -सा छाया

धरती पे कुहासा

सँभल ज़रा सा।

3

यह क्या किया?

सूखे नदी- जंगल

दहकी धरा।

4

रोपे न वृक्ष

बिगड़ा संतुलन

घुटा है दम।

5

जल क्यों व्यर्थ

हर बूंद लिए है

अपना अर्थ। 

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जून 6, 2017

1775

1-रमेश कुमार सोनी

1

प्रकृति रूप

ऋतु वेश संवारें

जीवन न्यारे 

2

वट की लटें

धरा छूने निकले

बच्चों के झूले

3

जंगल घने

चुनौती देते खड़े

घुसो तो जानें

4

वन की भाषा

पशु – पक्षी बोलते

हम ही भूले

5

गाँव निगले

कंक्रीट अजगर

बने शहर

-0-बसना , छत्तीसगढ़ , मोबाल –  ९४२४२२०२०९

-0-

2-कशमीरी लाल चावला
1

पक्षी तो प्यासे

बूंद बूंद तरसे

आए ना मेघ

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 2, 2017

1774

1-विभा रश्मि

1

बरखा बूँदें 

गुदगुदातीं मन 

ग़ज़ब फ़न ।

2

लय ताल से 

रिमझिम बरसीं

हरस मन

3

पंख झाड़ता 

बाल्कोनी में परिन्दा 

बैठा  अल्गनी ।

4

नन्ही ने देखी  

बरसात पहली,

बूँदों से खेली ।

 5

 नीड़ों में बैठे 

 चूज़े रूठे ठुनके 

 भीगे माँ संग ।

6

रेत ने पी ली 

ओक भर बारिश

था कौतूहल ।

7

सिमटा ताल 

पावस देखकर 

नाचा दे ताली ।

8

दादुर गाते

बरखा गुणगान 

बेसुरी तान ।

-0-

2-डॉ.पूर्णिमा राय

1

झाँके भास्कर

बंद झरोखों से भी

झाँक दिल में!!

2

सूर्य दस्तक

हर घर-आँगन

प्रकाशमान!!

3

सूर्य किरण

जागरण संदेश

सोया मनुज!!

4

पूरब दिशा

बिखर गया सोना

निकला रवि!!

5

सूर्य दिशा से

लौ का कलश देख

भागा अँधेरा

6

सूर्य की लाली

धरा माँग सजाती

बनी दुल्हन!!

7

रश्मियाँ ओढ़े

प्रकृति सहचरी

खग कलोल!!

8

वक्त चादर

ओढ़ कर सिंदूरी

हो ली तुम्हारी!!

9

वक्त की सीख

तुम्हारा साथ प्यारा

उड़ान मेरी !!

10

वक्त बेवक्त

बादल  बरसे 

तुम जो आ!!

11

वक्त थपेड़े

दे ग अनुभव

पके हैं फल!!

12

घड़ी बीतती

यादों के कहकहे

बदला वक्त!!

13

लौट आ वक्त

बुजुर्गों की घनेरी

दे जा छाया!!

-0-

www.achintsahitya.com

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 31, 2017

1773

भावना सक्सैना

1

भीग जो आई

सुबह सुनहरी

हर्षा गगन।

2

बरखा बूँदें

लाई नवजीवन

शांत तपन।

3

दो बूँद जल

उठी सौंधी महक

थी तप्त धरा।

4

खोह से खींच 

लाई बरखा रानी

आँखों में पानी।

5

रूह में बसी

यादें कुछ पुरानी

जिंदा कहानी।

6

दिल के जख्म

अपनों की निशानी

प्रीत निभानी।

7

जीते रहें हैं 

तिक्त ,पर सुहानी

ये जिंदगानी।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 29, 2017

1772

विभा रश्मि 

1

दोपहरिया

चुभती लू की फाँसें

सुलगी साँसें

2

ग्रीष्म नौतपा 

उमसा चप्पा – चप्पा 

तड़की धरा । 

3

गर्मी राक्षसी

जिह्वा लपलपाती

ज्वाला उगले

4

नद मुहाने  

कटे हैं वन घने 

थार  बनेंगे ।

5

 झेलता वार 

 करुण है चीत्कार 

 मौनी पादप । 

6

अकाल – छाया

मनु व्यस्त  माया ले 

जर्जर खेती ।

7

नभ है सूना 

टेरे जलद – प्रिया

उत्साहित जी ।

8

भेजा संदेसा 

आ जा बदरा श्याम

चिठिया बाँच ।

9

तवा धरती 

पसीने की बूँदें भी

उड़ीं वाष्प हो  

10

 बालुका – टीबे 

आँधी बन उतरे 

 नद – नेत्रों में ।  

11

 चिया उदास

 भेंट चढ़े  हैं गाछ

 चौड़ाए पथ  

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 26, 2017

1771

1- सत्या शर्मा ‘ कीर्ति ‘

1

गुज़रे पल

उग आती झुर्रियाँ

उम्र डाली पे  ।

2

दौड़ता अश्व

जीवन पथ पर

मन सारथी ।

3

पूछते बच्चे

आँगन औ तुलसी

मिलते कहाँ ?

4

दिन गौरैया

चुगती जाती दानें

उम्र– खेत के ।

5

नए सृजन

रचे परमेश्वर

धरा चाक पे ।

6

हमारा मन

कमजोर पथिक

उदास आत्मा ।

 -0-

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