Posted by: हरदीप कौर संधु | फ़रवरी 7, 2019

2001-आँसू  ।

सविता अग्रवाल सवि’ (कैनेडा )

1

बिजली गिरी

कर्कश स्वर सुन

छलके आँसू  ।

2

बूढ़ा शरीर

दर्द से है पीड़ित

आँसू  बहाए ।

3

बेटी विदाई

आँसू  लेते बलाएँ

हुई पराई ।

4  

साथ है छूटा

मन हुआ उदास

थमे ना आँसू  ।

5

झरते आँसू

हुए तुम पखेरू

नभ निहारूँ

6

संदूक खुला

प्रेम पत्र जो मिले

टपके आँसू  ।

7

जवान बेटी

ज़िम्मेदारी है पूरी

कहते आँसू  ।

8

आँसू  की धार

सींचती रही मन

जीवन भर ।

9

टूटा खिलौना

ढुलक आये आँसू

कैसे मनाऊँ ?

10

निर्जीव तन

देखकर बेटे का

जमें हैं आँसू  ।

  -0- email : savita51@yahoo.com 

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Posted by: हरदीप कौर संधु | फ़रवरी 6, 2019

2000- यादें, केवल यादें

अनिता ललित

1

नहीं मिलेगी

सर्द लम्हों में अब

माँ -सी रज़ाई।

2

माँ को जो खोया

यूँ लगता है जैसे

जीवन खोया।

3

असीम कष्ट

माँ! तुमने जो सहे

मुझे कचोटें।

4

छूट गई माँ

अब सभी दुखों से

मिली है मुक्ति।

5

लाड़-दुलार

माँ-पापा संग गए

नाज़-नख़रे।

6

मन है भारी

खो गया बचपन

दूध-कटोरी।

7

न रहा साया

गहरा ख़ालीपन

माँ-पापा बिन।

8

थी इतराती

माँ-पापा के साए में! –

बीती कहानी!

9

चुप हूँ खड़ी

अब हुई मैं बड़ी,

खोजे आँगन।

10

भूली नादानी

मायके की गलियाँ

अब बेगानी।

11

जहाँ भी रहें

माँ-पापा की दुआएँ

संग हैं मेरे।

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 31, 2019

1899

1-कृष्णा वर्मा

1

खोखले रिश्ते

ताने उलाहने औ

झूठे बहाने।

2

झूठी अकड़

साधन -सुविधाएँ

रखें जकड़।

3

धोखा -कपट

बदले की लपट

मौके की ताक।

4

प्रेम न लाग

भ्रमित- सा विश्वास

बेतुका साथ।

5

होंठों पे हास

बेईमान कर्म का

जारी प्रयास।

-0-

2-प्रियंका गुप्ता

1

छिड़की हँसी

होंठों पर अपने

सूरज उगा ।

2

दुबक गया

थका-माँदा सूरज

समन्दर में ।

3

कहा था तूने-

छोड़ना नहीं हाथ,

खुद छुड़ाया ?

4

नागिन-स रात

सपनों को डँसके

भोर में छुपी ।

5

बक्सा खोला था

ख़्वाबो से भरा मिला

छूने से डरूँ ।

6

सोचते रहे-

ज़िन्दगी कैसे जीनी

मौत ले गई ।

7

यादों का पंछी

मुँडेर पे आ बैठा

बस देखूँ मैं ।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 31, 2019

1898

1-सुदर्शन  रत्नाकर 

 

2-भावना सक्सैना 

3-पूर्वा शर्मा

Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 28, 2019

1897

डॉ0 सुरंगमा यादव

1

मीत- मिलाप

चहुँदिशि बिखरा

प्रीत- पराग।

2

देखूँ छूकर

उमड़ा रत्नाकर

निष्ठुर चाँद ।

3

अभिलाषाएँ

मुग्धा बन के आएँ

खूब लुभाएँ ।

4

जन्मों का साथ

तभी तुम लगते

इतने ख़ास ।

5

दूर या पास

हर पल आभास

तुम हो साथ ।

6

तुम्हारे पास

प्रेम का पारावार

ओर न छोर ।

7

जीवन क्या है!

उड़ी, चढ़ी लो कटी

गिरी पतंग ।

8

बच्चों ने खाई

माँ तो देख अघाई

रोटी थी कम ।

9

एक ही छत

कमरों  की तरह

बँटे हैं मन ।

10

मन -दीवारें

क्रोध-घृणा के जाले

चलो निकालें।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 27, 2019

1896-मन के द्वार हज़ार

ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य-        

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ 

 भाषा मानव के अस्तित्व का एक अनिवार्य और अपरिहार्य प्राण -तन्तु है, गर्भनाल से जुड़े शिशु की तरह।  निरन्तर प्रवाह भाषा की सबसे बड़ी शक्ति है । यह शक्ति सामाजिक संवाद और चिन्तन धारा के प्रवाह के कारण गहन और व्यापक होती है ।  शब्दों की सहज ग्राह्यता ,जनमानस की सबसे बड़ी शक्ति है ।यही शक्ति भाषा के रूप में हमारे सामने आती है । यही शक्ति  उन्नत होकर बोली को भाषा और अवनत होने पर भाषा को बोली तथा घोर उपेक्षा के  कारण उसे विलुप्त भी कर सकती है ।आज हम अपनी बोलियों की उपेक्षा कर रहे हैं । प्रकारान्तर  से हम अपनी भाषाओं को कमज़ोर कर रहे हैं। छोटी-छोटी जलधाराओं  को  अगर गंगा में  मिलने से रोकेंगे तो प्रवाह- गहराई और पाट का घटना शुरू हो जाएगा। सहृदय कथाकार कवयित्री रचना श्रीवास्तव भाषा की ऊर्जा , ऊष्मा और शक्ति से वाकिफ़ है । इनका शब्द चयन इनके उदार हृदय की झलक दे जाता है ।इनके काव्य का कथ्य और भाषा दोनों ही नव्यता लिये होते हैं ।   इन्होंने कुछ हिन्दी हाइकु का अवधी अनुवाद मुझे दिखाया तो मैंने दो -तीन रचनाकारों के और हाइकु का अनुवाद करने के लिए निवेदन किया ।मैं चमत्कृत हो गया । अनुवाद में  मूल हाइकु के भाव की रक्षा करते हुए छन्दविधान को भी बनाए रखा । यह काम सचमुच बहुत कठिन था।  हाइकु के क्षेत्र में इससे पूर्व भी इस तरह के प्रयास हुए हैं। डॉ सत्यभूषण वर्मा और अज्ञेय जी ने जो अनुवाद किए हैं वे केवल अनुवाद हैं , हाइकु नहीं बन सके  हैं ।

डॉ भगवत शरण अग्रवाल ने ‘अर्घ्य( 1995) में अपने 65 हिन्दी हाइकु 18 भारतीय एवं 7 विदेशी भाषाओं में प्रस्तुत किए हैं। यह अनोखा और बड़ा कार्य रहा है ।कुछ भाषाओं में अनूदित हाइकु के  अनुवाद के साथ शिल्प भी बरकरार रहा है , जैसे:-

बैठतीं टिड्डी / गेहूँ की बालियों पै / किसान सोते

तीड बेसतां / घऊँने कणसले /खेडूत सूता (गुजराती)

लेकिन सभी भाषाओं की प्रवृत्ति ऐसी नहीं है कि छन्द का अनुपालन करते हुए अनुवाद किया जा सके । यह सब अनुवादक की सामर्थ्य पर निर्भर है । काव्य का अनुवाद वैसे  भी बहुत बड़ी चुनौती है । हाइकु -जगत् ने  डॉ भगवत शरण अग्रवाल के इस बड़े कर्य का विशेष नोटिस नहीं लिया ।हिन्दी और मराठी के प्रसिद्ध कवि श्याम खरे ने ‘महक’( 2008) 24 मराठी हाइकुकारों के हाइकु का अनुवाद हिन्दी में प्रस्तुत किया । अन्य रचनाकारों का  अनुवाद सिर्फ़ अनुवाद ही बन सका  है , हाइकु नहीं ।फिर भी खरे जी ने इस दिशा में एक सकारात्मक प्रयास किया ।इनके अपने कुछ हाइकु में ही छन्द का निर्वाह हो सका है , जैसे –

अलाव जले /हम नहीं जानते  / दु:ख वृक्षों का । (श्याम खरे)

शेकोटि जळे / मानवां कां न कळे / दु:ख वृक्षांचे (श्याम खरे)

    डॉ अंजलि देवधर ने ‘भारतीय हाइकु’( 2008) में 105 हाइकुकारों के एक -एक हाइकु का  अनुवाद अंग्रेज़ी में प्रस्तुत किया । इसे भी केवल अनुवाद ही कहा जाएगा, न कि अंग्रेज़ी हाइकु ।अंग्रेज़ी  सिलेबिक (अक्षर प्रधान ) भाषा है , न कि वर्ण प्रधान  अत: छन्द का अनुपालन करते हुए  अनुवाद करना  अत्यन्त  दुरूह कार्य  है।

जापानी हाइकु के अंग्रेज़ी अनुवाद की यह दिक्कत ‘वन हण्ड्रेड  फ़्रॉग्स’ ( हिरोआकि सातो-1983) में भी देखी जा सकती है ।

डॉ हरदीप कौर सन्धु जुलाई 2010 से पंजाबी हाइकु का अनुवाद हिन्दी में करती रही हैं । इनके हिन्दी अनुवाद में मूल की भावानुभूति के साथ हाइकु का शिल्प भी सुरक्षित रहा है । जून 2012 से इन्होंने हाइकुलोक में पंजाबी में भी छन्दानुशासन की रक्षा करते हुए अनुवाद किया है ।कुछ  अनुवाद गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में साथ-साथ प्रकाशित किए हैं ताकि दोनों भाषा-भाषी इनका रसास्वादन कर सकें । यह सही अनुवाद की दिशा में किया जा रहा सराहनीय कार्य है ।

हिन्दी -रात या दिन   /   आँसुओं का मौसम    / सदा निखरा  ।     ( डॉ सुधा गुप्ता)                                                                                                                                 

पंजाबी- रात जाँ दिन /  हँझुआं दा मौसम / सदा निखरे ।

हिन्दी – घटा-सी घिरी / कमलों की सुगन्ध / वह आए क्या? (डॉ भगवत शरण अग्रवाल)

पंजाबी -छाई है घटा / कमलां दी  खुशबू / की उह आए ?

         अभी 2013  जनवरी में ही कशमीरी लाल चावला और प्रो नितनेम सिंह के द्विभाषी ( पंजाबी-हिन्दी) हाइकु-संग्रह आए  हैं । इन दोनों संग्रहों में दोनों ही कवियों ने  दोनों भाषाओं में छन्दानुशासन का पालन किया है । मूल हाइकु साधारण हैं । अनूदित हिन्दी हाइकु  में  हिन्दी भाषा  के स्तरीय और व्यावहारिक प्रयोग की कमी खटकती है ; फिर भी एक उत्साहवर्द्धक शुरुआत तो हुई है । इसका स्वागत होना चाहिए ।

इसी कड़ी में रचना श्रीवास्तव ने हिन्दी ( खड़ी बोली ) के हाइकु का अवधी में अनुवाद किया है ; वह भी 32 रचनाकारों के 538 हाइकु का । यह काम अब तक किए गए हाइकु अनुवाद के क्षेत्र में किसी अकेले रचनाकार द्वारा किया गया बड़ा कार्य है। हाइकु के भाव और छन्द की रक्षा करते हुए इस काम को करना बहुत कठिन था । लेकिन जहाँ चाह , वहाँ राह । रचना श्रीवास्तव हिन्दी काव्य जगत में एक बहुचर्चित और प्रशंसित कवयित्री है , जिनकी भाव मधुरिमा और उर्वर कल्पना का अहसास पाठक महसूस करते रहे हैं । रचना श्रीवास्तव की यह प्रतिभा अनुवाद में भी प्रभावित करती है  ।इनकी अनुवाद -प्रतिभा के कतिपय उदाहरण देखिए-

डॉ भगवत शरण अग्रवाल -भोरवा साथे / ई केकर महक /बौराय मन ।

डॉ सुधा गुप्ता -चनार -पात /कहाँ पाईस आग /बतावा जरा ।

डॉ रमाकान्त श्रीवास्तव-  गावत मोर / पिरेम कै गितिया /उषा निहाल ।
डॉ भावना कुँअर-पंछी बनि कै / घूमत रहीं यादें /भुइयाँ गिरी  ।

डॉ हरदीप सन्धु-पियारी बेटी  /भोर कै आरती ,ई /पावन  बानी  ।

डॉ सतीशराज पुष्करणा-हँसा ऐ दोस्त /रोये से ई रतिया /छोट न होई ।

कमला निखुर्पा- गील पलक  / नयन पियाला  मा  / सिन्धु छ्लके ।

डॉ जेन्नी शबनम – अधूरी  आसा / भटकत  मनवा / नाही उपाय ।

डॉ अनीता कपूर- तू जो पेडवा / हम भयन पात / अब तौ रुको ।

पूर्णिमा वर्मन- बहिंयाँ उठा/ खजूर कै कतार / हम्मै  बुलावे ।

       रचना श्रीवास्तव ने हाइकु के भाव पक्ष और कलापक्ष दोनों का निर्वाह निपुणता से किया है ।अवधी में अनूदित इन हाइकु को पढ़ने से काव्य-माधुर्य का अनुभव किया  जा सकता है । अनुवाद में भाव की रक्षा करना सबसे बड़ी चुनौती है ,जिसे रचना श्रीवास्तव ने अत्यन्त सहज भाव से स्वीकारा ही नही बल्कि निभाया है । आपका यह कार्य सचमुच ऐतिहासिक महत्त्व का है । इस संग्रह में  तीन बाल हाइकुकारों ( सुप्रीत सन्धु , ऐश्वर्या कुँअर और ईशा रोहतगी)को भी शामिल किए गया हैं ।मैं आशा करता हूँ कि सुधीजन  इस कार्य के महत्त्व को सराहेगे और इस मिशन को और आगे बढ़ाकर  हाइकु जगत् को और समृद्ध करेंगे ।

         -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’  , 26 जनवरी , 2013

-0-

भूमिका -रचना श्रीवास्तव

 

जापानी कविता की  हाइकु से मेरा परिचय आदरणीय श्री रामेश्वर कम्बोज हिमांशु जी ने करवाया है पाँच सात पाँच की वर्णक्रम व्यवस्था में लिखी जाने वाली इस छोटी कविता पहले तो लगा कि  इतने कम शब्दों में भावों के प्रवाह को कैसे बाँधा जा सकता है ;पर भाई हिमांशु जी ने हिंदी हाइकु का लिंक भेजा ।इस लिंक पर जाकर जब मैने हाइकु के समुद्र में गोते लगाना प्रारंभ किया तब पता चला कि भावों को बाँध कर भी कितना खुला रखा जा सकता है ।इनका संसार ही निराला है  ।ये आपको बहकने नहीं देता ।लिखने वाले के भाव पढ़ने वाले तक पहुँच भी जाते हैं ।इसमें लिखा कम जाता है और समझा ज्यादा जाता है ।भाई हिमांशु जी के कहने पर ही मैने हाइकु लिखना प्रारंभ किया और कुछ ही दिनों में मुझे हाइकु लिखने में आनंद आने लगा । मै भाई हिमांशु जी का धन्यवाद कहे बिना नहीं रह सकती ; जिनके प्रोत्साहन से आज मै हाइकु लिखने लगी हूँ
हाइकु की धारा में बह ही रही थी की मेरे पर बाबा स्वर्गीय श्री रामचरित्र पाण्डेय जी की कुछ अवधी कविताएँ मेरी माँ श्रीमती विद्यावती पाण्डेय जी से मुझे पढ़ने को मिलीं । इसी से मन में विचार आया कि क्यों न हाइकु का अवधी में अनुवाद किया जाए ।यह वह भाषा है जिसको सुनकर बोल कर मै बड़ी हुई।खड़ी बोली बोली या अंग्रेजी भाषा बोली पर अवधी भाषा की मिठास मन के किसी कोने में सदा छिपी रही ।माँ को जब भी बोलते सुनती थी तो  बहुत अच्छा लगता था ।अतः हाइकुओं का अवधी अनुवाद करना प्रारंभ किया ।थोडा काम करके हिमांशु जी को दिखाया तो उन्होंने कहा “बहुत अच्छा काम किया है ;क्यों न और भी हाइकुकारों को इस में शामिल किया जाए “
उनके इस प्रोत्साहन भरे शब्दों ने मुझमे ऊर्जा भर दी और 32 हाइकुकारों के 538 हाइकु का अवधी अनुवाद का कार्य पूरा हुआ  । अनुवाद की यह यात्रा सरल न थी  । शब्दों का उचित चुनाव फिर वर्ण की गणना करना और उनका सही होना यह सब मिलाकर एक जटिल कार्य था ।अनुवाद करते समय कहीं पर जब कोई शब्द नहीं मिलता तब सोचती यदि माँ इसको कहती तो कैसे कहती और पिता जी इसका जवाब कैसे देते ।और बस मुझको शब्द मिल जाते अनुवाद की यह कठिन  यात्रा आसान होती गई ।  माता -पिता के आशीर्वाद ,परिवार के प्रेम ,भगवान की कृपा और भाई हिमांशु जी की सराहना के कारण मैं  कार्य करने में मै सफल रही ।

यहाँ एक बात और कहना चाहूँगी की संगणक(कम्प्यूटर )पर हिन्दी लिखना मुझे नहीं आता था ।करीब सात साल पहले मेरे पति श्री अविनाश श्रीवास्तव ने मेरे लिए हिंदी फॉण्ट डाउनलोड किया था और उन्ही के प्रोत्साहन से मैने संगणक पर हिंदी लिखना प्रारम्भ किया था ।अविनाश के ही कारण मेरी कविताएँ मेरी डायरी से निकल कर बाहर का संसार देख सकीं । मेरा सच्चा मार्गदर्शक होने के कारण  और मेरे हर कार्य में मेरा साथ देने के लिए मै अविनाश की प्रेरणा को मुख्य आधार मानती हूँ । सच कहूँ-पत्नी को पति का आत्मीय सहयोग मिलने से कोई काम  दुष्कर नहीं रह पाता । इनके लिए धन्यवाद शब्द   बहुत छोटा लगता है ।
डॉ श्री रमाकांत श्रीवास्तव जी ने मेरे इस अनुवाद को अपने आशीष वचनों से प्रकाशमान किया है मै उनकी आभारी हूँ आदरणीया दीदी डॉ सुधा गुप्ता जी का मुझको जो वात्सल्य मिला है , वह तो मेरे अधिकार जैसा हो गया । फ़्लैप के लिए उन्होंने मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए जितना लिख दिया , मैं उससे कभी उॠण नहीं होना चाहूँगा ।
अब यह पुस्तक आपके हाथों में हैं  ।मेरे अनुवादों की गंगा आपको सराबोर करने में कितना सफल हुई है ये तो आप गुणीजन ही बताएँगे ।आशा है अवधी भाषा को समर्पित मेरा ये छोटा सा प्रयास सफल हुआ होगा और आपके स्नेह शब्दों का हक़दार बन सकेगा ।आपके अमूल्य सुझावों  की मुझे प्रतीक्षा रहेगी ।
अब आपै कहीं कैयीसन लाग ई कितबिया ? आप सब कै आसिरवाद चाहीं।
रचना श्रीवास्तव
अमेरिका

 

Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 26, 2019

1895

‘स्वप्न शृंखला’ भावमुक्ताओं की मनमोहक माला

डॉ.आशा पाण्डेय

 ‘स्वप्न शृंखला’ रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ तथा डॉ. कविता भट्ट के सम्पादन में निकला हाइकु संग्रह है। इसमें कुल 30 हाइकुकारों के 1050 हाइकु संगृहीत हैं।
          हाइकु कविता की सबसे छोटी विधा है ,जो एक निश्चित पैमाने में लिखी जाती है । देखने में छोटी दिखने वाली इस रचना को लिखना बिल्कुल भी सहज नहीं है ,क्योंकि कम शब्दों में किसी भाव को मुकम्मल व्यक्त कर लेना या फिर घटना या चरित्र को प्रतिबिंबित कर देना सहज नहीं होता । जैसा कि इस पुस्तक की भूमिका में संपादक द्वय ने स्वीकार किया है “सूक्ष्म अति सूक्ष्म भाव को यदि तदनुरुप भाषा में बाँधना है ,तो यह तभी सम्भव है जब हाइकुकार के पास रचनात्मक तन्मयता हो,पूरी तरह भाव में डूब जाना और भाषा की मुखर शब्दावली हो, संवाद करता भाषा-सौंदर्य हो,ताश के पत्तों को फेटने वाली भाषा हाइकु को पदावनत ही कर सकती है, उसे सही काव्य नहीं बना सकती।”
         कभी-कभी देखने को मिलता है कि पंक्तियों के अंत में तुकांत मिलाया जाता है। यह गीत कविता आदि में तो ठीक है; किंतु हाइकु में यह उसके सौंदर्य को बाधित  करता है। नपे तुले शब्दों में गहन भाव को दर्शाना या चित्र खींचना ही इसका असली मकसद होता है।
        इस दृष्टि से संग्रह के सभी हाइकु खरे उतरते हैं।
         डॉ. सुधा गुप्ता का एक हाइकु देखिए, सुख राई-सा/ दुखों के परबत/ढोए जीवन। अब यहाँ शब्दों के अर्थ से तो ये अच्छा हाइकु है ही ,अपितु अनेक बिम्बों को भी समेटे हुए है।
      काम्बोज जी का पहला ही हाइकु- उठा तूफान/झरे मन के पात/लगा आघात । गहन भाव जगत् को समेटे है। इसमें केवल वर्णन भर नहीं है अपितु गहरे बिम्ब हैं, जो शब्दविन्यास से स्पष्ट हो रहे हैं। इन्हीं का दूसरा हाइकु, लिपटी लता/लाख आएँ आँधियाँ/तरु के संग। ये हाइकु एक गहरी और कोमल बात को व्यक्त कर रहा है। ये वह सुरक्षा भाव है जो वर्णनातीत है और इस हाइकु में बड़े सुंदर ढंग से व्यक्त हो रहा है।
     डॉ. भावना कुँअर का एक हाइकु, गिराओ मत/माँ के खुशबू वाले /पुराने आले
    डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा का हाइकु, यूँ तो वीरानी/फैली है चारो ओर /भीतर शोर। ये दोनों हाइकु रिश्तों की मिठास और कड़वाहट को  व्यक्त कर रहे हैं। एक ओर जहाँ माँ की खुशबू है वहीं दूसरी ओर किसी गहरे आघात की वीरानी छाई है।
         डॉ. कविता भट्ट के हाइकु प्रकृति का खूबसूरत चित्रण कर रहे हैं ,जहाँ सरसता है, कोमलता है, लजाई धूप/पलके न उठाये/नव वधू-सी।
      अपने कई हाइकु में कमला निखुर्पा ने राखी के त्योहार को बड़े सुंदर ढंग से व्यक्त किया है, राखी को चूमें/बचपन में झूमें /सिपाही भइया।
    सुदर्शन रत्नाकर के हाइकु प्रकृति की सुंदर बानगी प्रस्तुत करते हैं, धरा ने ओढ़ी/कोहरे की चादर/छुपा सूरज ।
      इसी प्रकार  प्रकृति और मानव मन का सुंदर चित्रण  डॉ. जेन्नी शबनम ने भी किया है, दुआ माँगता/थका हारा किसान/नभ ताकता।
    हाइकु विधा में सिद्धहस्त डॉ. शिवजी श्रीवास्तव  के सभी हाइकु बड़े सुंदर हैं । इनके हाइकु में भी प्रकृति और भौतिक जगत का सुंदर समन्वय दिखता है -1- जागा संसार /गंध बांट सो गया/हर सिंगार । 2-मोल न जाना/जब थे साथ पिता/अब आँसू है।

      भावना सक्सैना का ये हाइकु अपने सूक्ष्म रूप में प्रकृति के बहाने दर्द को खोलता है , पात पुराने/कहे एक कहानी/बीती जवानी ।
    प्रियंका गुप्ता,शशि पाधा , कृष्णा वर्मा,अनिता ललित, पुष्पा मेहरा,ज्योत्स्ना प्रदीप,अनिता मंडा,मंजूषा मन,सत्या शर्मा कीर्ति,     डॉ. सुषमा गुप्ता,  डॉ. शैलजा सक्सेना,  डॉ. पूर्वा शर्मा,रश्मि शर्मा,मंजू मिश्रा,  डॉ.  सुरंगमा यादव,चंद्रबली शर्मा, पूनम सैनी,  डॉ. हरदीप कौर सन्धु ,सभी के हाइकु विचार की गहनता एवं प्रकृति के सौंदर्य को समाये हुए प्रशंसनीय हैं।

     डॉ. हरदीप सन्धु का यह हाइकु , गहरी शाम/चहकती चिड़िया/ टूटी है चुप्पी।  प्रकृति के सहारे जीवन के संघर्ष और उदासी को व्यक्त किया है।
   स्वप्न शृंखला  संग्रह बड़ा ही सुंदर बन पड़ा है । प्रबुद्ध पाठकों में इसका समादर होगा, ऐसी आशा है ।

स्वप्न- शृंखला’ (हाइकु संग्रह): सम्पादक – रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, डॉ. कविता भट्ट, अयन प्रकाशन, दिल्ली, 2019, पृष्ठ :144, मूल्य:300 रुपये

 

सम्पर्क : डॉ. आशा पाण्डेय,  5 ,योगिराज शिल्प ,स्पेशल आई . जी . बंगला के सामने ,कैम्प

     अमरावती –444602 (महाराष्ट्र ),     दूरभाष – 0721 –2660396  , मो. -09422917252   ,    9112813033

 Email -ashapandey286@gmail.com

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 25, 2019

1894

 सुदर्शन रत्नाकर

1

सर्दी का दिन

उड़ जाता फुर्र से

ज्यों बचपन।

2

नहीं बीततीं

सर्दी की लम्बी रातें

वृद्धावस्था ज्यों।

3

हिमाच्छादित

मौन खड़े पर्वत

तप में लीन।

4

कोहरा छाया

ओढ़ लिहाफ़ सूर्य

निश्चिंत सोया।

5

धूप का धब्बा

दीवार पर टँगा

सूर्य सुस्ताया।

6

यादों की शॉल

ओढ़ घूमती रहूँ

सर्दी के दिन।

7

हिम का भार

उठाती है धरती

भरे मुस्कान ।

-0-

सुदर्शन रत्नाकर,ई-29,नेहरू ग्राउण्ड ,फ़रीदाबाद 121001

 

 

 

Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 23, 2019

1893

1-रचना श्रीवास्तव 

1

पड़े फफोले 

उसकी  देह पर 

पीड़ा में देश

2

देश हमारा 

देता आवाज़ हमें 

कब लौटोगे ?

3

सूना आँगन 

बुझी पीपल छाँव 

तुझे बुलाए 

4

सैनिक चला 

तिरंगे में सजके 

रोया था देश ।

5

ऊँचा मस्तक 

सूर्य सा चमके है 

भारत देश

6

संस्कार– युग 

भारत में बसा है 

ढूँढो तो  सही।

-0-

Rachana Srivastava
Freelance writer and Poet
Los Angeles, CA,
http://rachana-merikavitayen.blogspot.com/

 -0-

2-साँझ के हाइकु – रमेश कुमार सोनी

साँझ महके 

प्रिया -जूड़े में फँसा

पिया को ताके ।

साँझ पुकारे 

सूर्य शर्म से लाल 

चाँद जो झाँके ।

साँझ का सूर्य 

बूढ़े की सुनो कोई 

देर क्यों हुई

रातें डरातीं

प्रभु भजने लगी 

संध्या की ज्योति। 

साँझ का मन 

थका , बुझा, रूठा -सा 

पार्टी हो जाए ।

साँझ का गीत 

मन चाहता मीत 

बढ़ा लें प्रीत ।

अच्छा दिन था 

साँझ खुशी से लौटा 

कल की चिंता ।

लोग लौटते 

संध्या विदा करके 

थके सो गए ।

-0-

रमेश कुमार सोनी , बसना , छत्तीसगढ़ 

rksoni1111@gmail.com 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 21, 2019

1892

 1- धर्म जैन (धर्मपाल महेंद्र जैन )

1

कविता में स्त्री

समुद्र लगती है

तट तोड़ती।

2

तुम सुस्ता लो

रात के दो पहर

चाँद जागेगा।

3

तेरे ठिकाने

ख़ुश्बू छोड़ आया हूँ

सँवर लेना।

4

मेरे भीतर

लम्बी रात बाकी है

सोना किसे है।

-0-

2-पुष्पा मेहरा

1

हिम भार से

अकुलाती लहरें

उसाँसे भरें।

2.

बरसी बर्फ़

वादियाँ श्वेताम्बरा

मौन तापसी.

3.

बुन रहा है

श्वेत हिम चादर

मौन मसीहा।

4.

काँपे पटरी

कुहा-लपेटे सोए

थके श्रमिक।

5.

मस्त अलाव

ऊँची–ऊँची लपटें

हाथों को चूमें।

6.

शीत का भोर

दिखाई नहीं देता

हाथ को हाथ।

7.

गले आ पड़ी

शीत जादूगरनी

ले रही जान।

8.

काली रात में

आग की लपटें ज्यों

खिला पलाश!

9.

पी कर हुक्का

छोड़ रहा है धुआँ

बूढ़ा आकाश!

 

pushpa. mehra@gmail । com

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