Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 26, 2020

इंतजार की टीस

डॉ.पूर्णिमा राय

1

उदास रात
आँखों में आते आँसू
गीले कपोल!

2

तेरी याद में
इंतजार की टीस
उठती हूक!

3

खामोश लब
पलकों के किनारे
मोती लुढ़के!

4

सूनी है शय्या
चादर-सिलवटें
प्रेम- छुअन!

5

मन में टीस
बार-बार कूकती
तेरा ही नाम!

6

वक्त की बात
हैं रात का पहर
पंछी अकेला!

7

मरण-बेला
लग रही निकट
तेरे जाने से!

-0-

drpurnima01.dpr@gmail.com

Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 24, 2020

चिट्टी चादर

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

suraj ak rath1
धवल धरा
सूरज का रथ भी
आने से डरा।

 

 

2

हिम का गर्व
कर देती है खर्व
नन्ही-सी दूब।

 

 

3

चिट्टी चादर
भोर में  ही बिछाई
बैठो तो भाई।

4
संताप बड़ा
किसी का दुख पूछो-
ये पाप बड़ा। 

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 16, 2020

हिम जो झरे-1978

डॉ. कुँवर दिनेश 

1
हिम धवल –
धरा पर उतर
हो रहा जल!

2
आकाश झुके
हिम के स्वागत में
हवा भी रुके!

3
पवन रुके
हिम जब झरता –
मेघ भी रुके!

4
भू की तृषा से
हिम बरसता है
देव-कृपा से!

5
हिम जो झरे
कंक्रीट का शिमला
घावों को भरे!

6
बर्फ़ का हौआ
ख़ामोश शहर में
उड़ता कौआ!

7
हवा बर्फ़ानी –
सामना करने की
पेड़ों ने ठानी।

8
पेड़ चीड़ के
बर्फ़ में भी रहते –
हरे के हरे!

9
झोंके हवा के –
धौलाधार से आते –
बर्फ़ मिलाके!

डॉ. कुँवर दिनेश सिंह
प्राध्यापक  (अँग्रेज़ी) व संपादक: हाइफ़न, शिमला
kanwardineshsingh@gmail.com

Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 15, 2020

हिन्दी चेतना का हाइकु विशेषांक-85

हिन्दी चेतना का हाइकु विशेषांक-अंक 85[ अतिथि सम्पादक -कृष्णा वर्मा ] सभी रचनाकारों को डाक से भेजा जा चुका है। शीघ्र ही आप सबको मिल जाएगा।  हम यहाँ पर हिन्दी चेतना के इस अंक की पीडीएफ़ भी दे रहे हैं ,ताकि आप सहेजकर रखें और  उचित समझें तो अपने साथियों को भी भेजें। यहाँ यह बात स्पष्ट करना बहुत ज़रूरी है कि पत्रिका के प्रकाशन,  भारत में भेजने और फिर आप तक एक प्रति भेजने का खर्च लगभग 450 रुपये आता है।  अंक तैयार करने  में  16-20 हज़ार रुपये खर्च होते हैं।  इससे जुड़े लोगों की मेहनत अलग। यदि कुछ लोग अंक मिलने पर सूचना न दें, दूसरों की रचनाएँ न पढ़ें , अपनी प्रतिक्रिया न दें , तो क्या आप इसे उचित समझते हैं। अगर अंक में कुछ अच्छा लगता है, तो अपने साथियों को मेल कर सकते हैं। कमियों के लिए भी आप लिख सकते हैं।

एक बात और -जो हिन्दी हाइकु की मेल भविष्य में प्राप्त न करना चाहें , वे ज़रूर सूचित करें। हम उनको  भविष्य में   मेल नहीं भेजेंगे।जानकारी –

13 जनवरी में हिन्दी हाइकु देखने वाले=125

14 जनवरी में हिन्दी हाइकु देखने वाले=186

टिप्पणी करने वाले कितने हैं यह भी आप देख लीजिए।

डॉ हरदीप कौर सन्धु

ढ़ने  और डाउनलोड करने के लिए लिंक-

85-हिन्दी-चेतना-1-1

 

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 14, 2020

1976-पतंग-सी मैं

डॉ. पूर्वा शर्मा 

पतंग-सी मैं

पवन बन तुम

सहलाओ ना ।

उड़ ही चली  

जब बनके डोर

तुझसे जुड़ी ।

लहरा रही

सुख-दुःख पतंग

प्रत्येक छत ।

उम्मीद-माँझा

ख्वाहिशों की पतंग 

जीवन यही ।

डोर ना उड़े

पतंग के प्यार में  

खींचती चले ।

दुःख का माँझा

सुख की हवा चली

पतंग उड़ी ।

हालात-भट्टी

तिल-तिल है जला

जीवन-तिल ।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 11, 2020

1975

सविता अग्रवाल ‘सवि’

1

प्रातः की सर्दी

दाँ लगे बजने

चाय दे गर्मी।

2

सर्द हवाएँ

मुँह में धुँआ लाएँ

चाय उड़ाएँ।

चाय की प्याली

रजाई-सी गर्मी दे

ठण्ड को हरे।

चाय की चुस्की

ठण्ड घोल पी जाए

लाए चुस्ती।

5

सर्दी प्रचंड

हाथ में हथियार

चाय दे दण्ड।

ठण्ड के बाण

तन को भेद जाएँ

चाय निकाले।

हुई जो भोर

चाय के बर्तन से

उड़ती भाप।

8

न्यून हो पारा

तन में ताप लाए

चाय का प्याला।

-0-

savita51@yahoo.com

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 8, 2020

2074-आवारा कुत्ते

हाइकु-मालिका-मीनू खरे

 

पूस की रात

खुला आसमाँ और

आवारा कुत्ते!

क्या कहते हैं?

भौं-भौं करके ये 

आवारा कुत्ते!

रात भर ये

खुली जंग लड़ते

ठिठुरन से ।

अगले दिन

धूप से बतियाते 

आवारा कुत्ते!

 

हाड़ कँपाएँ

ठंड की लम्बी रातें

खुला आसमाँ।

सहनशक्ति

ओढ़कर सो जाते 

आवारा कुत्ते!

 

चन्द टुकड़े

रोटियाँ खाकरके

पूँछ हिलाते।

चौकीदारी से

हक़ अदा करते

आवारा कुत्ते!

आज का युग

आस्तीन के साँपों का-

हाँ ये सच है!

वफ़ादारी से

हैराँ कर जाते हैं

आवारा कुत्ते!

-0-

केन्द्र निदेशक ,आकाशवाणी , बरेली

meenukhare@gmail.com

Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 5, 2020

1973

प्रीति अग्रवाल

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 2, 2020

1972

शैल अग्रवाल  (यू. के.)
1
गाती है लोरी
लहरों से लिपटी
रात अँधेरी
2
जाल बिछाए
मछली को तकते
खड़े किनारे
3.
नयन-नाव
जीवन समंदर
जल अथाह
4
लेती हिलोरें
पतवारों के साथ
बँधी किनारे
5
हवा के साथ
मुड़ना ही होता है
कहते पाल
6
नाव औ पुल
जोड़ेंगे या तोड़ेंगे
पार ले जा के
7
उदास मन
लहरों-सा भटके
छोड़ किनारे
8
मौन की आस
समुद्र की प्यास
कैसे हो पूरी
9
मीठी नदी थी
पी गया है इसको
खारा सागर
10
जानूँ कैसे मैं
सागर गहरा है
डूबे बगैर!

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 1, 2020

1971-स्वप्न हों पूरे !

[मानसिक  प्रदूषण हमारी चेतना को नष्ट करने का सबसे बड़ा कुत्सित प्रयास है। नए वर्ष में ऐसे लोगों से बचें, जो लोग दूसरों को नष्ट करने का क्रूर आनन्द मनाते हैं, जो लोग  इतने निर्धन हैं कि दूसरों के  अच्छे कार्य के लिए दो  शब्द बोलने में भी परहेज़ करते हैंऐसे लोगों के लिए अपना बहुमूल्य समय नष्ट न करें; क्योंकि वे कुछ भी हों साहित्यकार नहीं  हो सकते।आप सबको  नए वर्ष की मंगलकामना के साथ -सम्पादक द्वय

डॉ. शिवजी श्रीवास्तव 

1

काल -डाकिया

मधुर पत्र बाँटे

नए साल में

2.

स्वप्न हों पूरे

खिलें सबके मन

नये साल में।

3

यही कामना,

बेटी रहें प्रसन्न,

नये साल में।

4.

तम रहे न

ज्योति की गंगा बहे

नए साल में।

5

क्या बदलेगा

केवल कैलेण्डर

नए साल में !

6.

नया बरस

चन्दा ,सूरज,तारे

जस के तस।

7.

नवल वर्ष

नव संकल्प करें,

प्रीत बिखेरें।

« Newer Posts - Older Posts »

श्रेणी