Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 7, 2021

2166

सागर/ पुष्पा मेहरा

1.

झील-2पूनो की रात

चाँद में खोना चाहे

सिन्धु बेताब।

2.

ताप से जले

द्रवित हिमशैल

सिधु में कूदे।

3.

थकी नदिया

सागर की गोद में

चैन से सोई।

4.

योग-निरत

तट पर दौड़ रहीं

सिन्धु लहरें।

5.

नदी को भाई

सिन्धु की गहराई

उसी में खोई।

6.

साँझ को देख

सिन्धु के आगोश में

सूर्य समाया।

7.

अंतर तक

रेत को भिगो गया

सिन्धु का नेह।

8.

छोड़के जाए

वासना का ज़हर

तट पर सिन्धु।

9.

पूनो की रात

चाँद का मुख धोने

दौड़ा सागर।

10.

झील-सी आँखें

सागर से मन में

माँगें पनाह ।

11.

श्रीदामा नदी

सिन्धु श्याम से भेंटी

श्याम हो गई।

12.

जीवन-सिन्धु

नित ही धडकता

मीन ये मन।

Pushpaa.mehra @gmail. com

-0-

2-रात्रि विशेष / रश्मि विभा त्रिपाठी

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पूर्णिमा-पर्व

रात के माथे सजा

चाँद का टीका

2

सो रहा जग

जागती निशा-वधू

चाँद आस में

3

सँझा के जाते

क्षितिज से उतरी

रजनी-परी

4

दिनावसान

चाँद-चूनर ओढ़ी

निशा-वधू ने

5

सोया संसार

चाँद करे शृंगार

निशा-वधू का

6

नवल गात

धवल चाँदनी में

नहाई रात

7

चाँद जो आए

अल्हड़ किशोरी-सी

निशा लजाए

8

चाँद ने छुआ

विभावरी का मुख

चमक उठा

9

तम रुलाए

रात प्रतीक्षा में है

चाँद आ जाए

10

मूँद लीं आँखें

चाँद को कैसे विदा

करती निशा

11

रात्रि-उत्सव

तारों की है पंगत

चन्द्रिका-भोज

12

अमा की घड़ी

जोह रही है निशा

चाँद की बाट

13

आँखों की कोर

जले रजनी-भोर

झरे अँजोर

14

अमा की घड़ी

अकेली रात खड़ी

तम-देहरी

15

अमा की घड़ी

घोर तम से लड़ी

अकेली रात।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 5, 2021

2165

डॉ. जेन्नी शबनम

1.

द्रौपदी-धरा

दुशासन मानव

चीर हरण।

2.

पाँचाली-सी भू

कन्हैया भेजो वस्त्र

धरा निर्वस्त्र।

3.

पेड़ ढकती

ख़ामोश-सी पत्तियाँ

रें न शोर।

4.

पीली पत्तियाँ

चुपके झरी, उगी

नई पत्तियाँ।

5.

पुराना भूलो

नूतन का स्वागत

यही प्रकृति।

6.

पत्तियाँ नाची

सावन की फुहार

पेड़ हर्षाया।

7.

प्रकृति हाँफी

जन से होके त्रस्त

देगी न माफ़ी।

8.

कैसा ये अंत

साँसें बोतल-बंद

खरीदो, तो लो।

9.

मानव लोभी

दुत्कारती प्रकृति –

कब चेतोगे?

10.

कोई न पास

साइकिल उदास,

गाड़ी ही ख़्वाब।

11.

विषैले प्राणी

विषाणु व जीवाणु

झपटे, बचो!

12.

पीके ज़हर

हवा फेंके ज़हर,

दोषी मानव।

13.

हवा व पानी

सब हैं प्रदूषित,

काया दूषित।

14.

दूरी है बढ़ी

प्रकृति को असह्य,

झेलो मानव।

15.

प्रकृति रोती

मानव विनाशक

रोग व शोक।

16.

असह्य व्यथा

किसे कहे प्रकृति

नर असंवेदी।

17.

फैली विकृति

अभिमानी मानव

हारी प्रकृति।

18.

दुनिया रोई

कुदरत भी रोई,

विनाश लीला।

19.

पर्यावरण

प्रदूषण की मार

साँसे बेहाल।

 

20.

धुँध या धुँआ,

प्रदूषित संसार,

समझें कैसे?

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 26, 2021

2164

भीकम सिंह

1

गाँवसोता यूँ गाँव

तपती दोपहरी

सिकोड़े छाँव।

2

गाँव  आ गए

शहरों के रस्ते में

कटे सस्ते में।                                                              

3

भोर को तान

साँझ कंधों पर ढोता

गन्ना किसान।

4

नहरें दूर

खेतों के गले सूखे

डीज़ल फूँकें।

5

खेत से बैल

दूर का रिश्ता हुआ

ताख पे जुआ।

6

स्तब्ध-सा खेत

ॠतुओं के खोखले

दावे को देख।

7

हाथ से पोंछा

ओस से भीगा दर्द

मौन अँगोछा।

8

मेघों के दल

खेतों में उतरे हैं

लेकर हल।

9

सूर्य से तनी

खेतों के कोर सूखे

आँखों में नमी।

10

रूठा ज्यों घन

दर्द से चटका त्यों

खेतों का तन।

11

स्वेद से भीगा

लूओं में खलिहान

शेष थकान।

12

सूखे खेतों से

गर्म निकली साँस

मुस्काई काँस।

13

कटा समूचा

खेत बँटवारे में

दर्द अनूठा।

14

हरे खेतों के

पीले पड़े चेहरे

बढ़े पहरे।

15

लीपे धूप में

देहरी और द्वार

खेत ओस में।

-0-

[चित्र;गूगल से साभार]

Posted by: हरदीप कौर संधु | मई 18, 2021

2163

आज आदरणीया डॉ.सुधा गुप्ता जी का जन्मदिन है। आप आज से 88 वें वर्ष में प्रवेश कर रही हैं। विश्व स्तर पर हाइकु, ताँका, चोका म हाइबन और सेदोका को गुणात्मक रूप से आपने स्थापित किया है। आपकी भाषा की गहनता पढ़कर ही जान सकते हैं। यह बात अलग है कि कुछ अकवि दरिद्र भाषा का के कारण इस विधा को प्रदूषित भी कर रहे हैं। हाइकु में काव्य को सँजोना केवल वही सृजक कर सकता है, जिसकी भाव-भूमि उदात्त हो, जिसका भाषा पर सुदृढ़ अधिकार हो । यह विशेषता आपकी रचनाओं के प्रमुख गुण हैं। सभी रचनाकारों और सहृदय  पाठकों की ओर से आपको कोटि-कोटि मंगलकामानाएँ!

[ डॉ. हरदीप कौर सन्धु, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ]

डॉ.सुधा गुप्ता

1

SUDHA GUPTAAनदिया रानी

यत्र-तत्र-सर्वत्र

चूनर  धानी।

2

नदी कछार

मँडराती चिड़ियाँ

खोजती कीड़े।

3

नदी किनारे

टिटिहरी न जाने

किसे पुकारे  !

4

नदी किनारे

सरकण्डों में छिपी

जल-कुक्कुटी।

5

नदी की छाती-

फटी, लोग कहते-

बाढ़  आ गई।

6

नदी निकली

झूमती-बलखाती

घुमक्कड़ी पे।

7

नदी,  पोखर

झिल्ली  झनकारती

अँधेरी रात।

8

तट पे जलीं

धू-धूकर आशाएँ

नदी उदास।

9

नदी  की  धार

बहते  जाते पत्ते

बड़े  लाचार।

10

नदी  न  रोती

सूखे  हैं सारे  आँसू

रेत  में   सोती।

11

नाव न  माझी

एकाकिनी तापसी

बहती गंगा।

12

बहती धारा

आगे बढ़ती जाए

छूटा किनारा।

13

ताप बढ़ेगा

हिम नद गलेंगे

बाढ़ बनेंगे।

14

रस की झारी

है नाना रूपधारी

जल मायावी।

15

न, कहीं न था

जल का ओर-छोर

श्वेत-चादर्।

16

गातीं चट्टानें

सरस जलगीत

निष्छल प्रीत।

17

मोती-सा जल

उर्मियाँ अविरल

पूत चरित्र।

18

जीवनदात्री

विष से भर डाली

माँ मन्दाकिनी।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | मई 16, 2021

2162-ॠताशेखर ‘मधु’ और हाइगा

ॠताशेखर ‘मधु] का हाइगा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान है। हिन्दी  का प्रथम हाइगा- संग्रह  2013 में [रंगीन चित्रों के साथ ] प्रकाशित हुआ। इस्के प्रकाशन का श्रेय आपको ही जाता है।   आप चुपचाप काम करने में विश्वास रखती हैं। उनके  बेजोड़ कार्य की  एक झलक आप सबके लिए प्रस्तुत है।‘ हिन्दी -हाइगा’ का ऑन लाइन  विमोचन 15 जून 2013 को रामेश्वर काम्बोज द्ब्रारा किया गया। पटना दूरदर्शन से 20 मार्च 2018 को लाइव कार्यक्रम भी ॠताशेखर ‘मधु’ ने प्रस्तुत किया।  प्रसिद्धि से कोसों दूर आप साहित्य-साधना में व्यस्त हैं। हिन्दी हाइकु आपके इस महत्त्वपूर्ण कार्य का सम्मान करता है।

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2--हाइगा सूची

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Posted by: हरदीप कौर संधु | मई 12, 2021

2161-नदी (हाइकु-संग्रहों से )

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

01-RAMESHWAR KAMBOJ HIMANSHUहेरते तट
नदी कब रुकी है
उफनी भागी।

2

नदियाँ सूखीं

उजड़े पनघट

गलियाँ मौन 1

3

नहाने आते

जब चाँद -सितारे

तट हर्षाते।

4

निर्मल जल

मिल गया कीच में

ख़ुद खो गया।

5

नेह के नीर!

हर लेना प्रिय की

तू सारी पीर।

6

पहाड़ी नदी-

बलखाती कमर

किसी मुग्धा की।

7

प्यास बुझेगी

मरुथल में कैसे

साथ न तुम !

8

तुम्हारा प्यार-

कल-कल करती

ज्यों जलधार।

9

दर्द  की नदी

पार करते बीती

पूरी ही सदी। [बन्द कर लो द्वार संग्रह से]

10

दुःख- नदी के

पार अगर जाना

सीखो मुस्काना।

11

दुःख की नदी

डूबकर पार की

तैर न सके।

12

नदी का तीर

हुआ निर्मल नीर

हर ली पीर ।

13

लहरें उठीं

तर हो गई धारा

भीगे किनारे।

14

शापित तट

अघा गए पीकर

जीवन-घट।

15

शीतल धारा

चूमती ही जा रही

प्यासा किनारा ।

16

तट की बाहें

थामे हुए गोद में

शिशु-तरंगें। [मेरे सात जनम-संग्रह से]

17

धरा का बल

नदियाँ कल-कल

गाते झरने ।

18

उफनी नदी

ढोरों -सी डकारती

उगले फेन।

19

पाप से भरीं

सह न पाईं बोझ

नदियाँ मरीं।

20

आँखों में बचा

नदियों में सूखा है

सारा ही पानी।( माटी की नाव)

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 10, 2021

2160-गाँव

भीकम सिंह

1

बिजूका खड़ा

बीच खेत में लड़ा

अपराजित।

2

पानी की गंध

रहट की पीठ पर

ढूँढते पंच।

3

सूत-कपास

तन्हाई अटेरती

काकी उदास।

4

मेघ मुकरा

खेतों के हृदय में

दंश उभरा।

5

ले, औने-पौने

चकरोड़ चली हैं

बीजों को बोने।

6

फसलें आके

खलिहानों में बैठी

कीमत आँके।

7

पानी सींचता

खेतों की गर्म  साँसें

अंकुर प्यासे।

8

सुर्खी-बटोर

धुँए-सा उड़ा भूसा

मंडी की ओर।

9

झूठी सौगात

साँकलो में है जहाँ

वो है- देहात।

10

सन्नाटा उगा

पगडंडियों पर

खेतों में उज्र।

11

खजूर बड़ी

पैर छू कर जाती

तपती हवा।

12

मेघों की छाँव

दूर कहीं अटकी,

धूप में गाँव।

13

भोर ले आई

खेतों का निमंत्रण

करो बुआई।

14

द्वारों पर है-

साहूकारी दस्तकें

मस्तक झुके।

15

बया का नीड

खाली खेतों के बीच

ढूँढता सीड।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | मई 6, 2021

2159

अनिता मण्डा

डॉ.शैलजा सक्सेना

1

समय धर्म

रह घर अंदर,

यही सत्कर्म!

2

कालाबाज़ारी !

मृत आत्माओं वाले

भ्रष्ट व्यापारी!

3

अश्रु-सरिता

डगमग डोलती

जीवन-नैया!

4

घर में बंदी

चूल्हे सिसकते हैं

काम में मंदी!

5

दुनिया डरे

कब होगा ख़त्म ये

जिए ना मरे!

6

मौत का डर!

मास्क- मनौती बाँधे

रहना घर!

7

घने बादल

बिजली की स्याही से

लिखते हाल!

8

पैरों की थाप

पानी के चहबच्चे

कूदती हँसी!

9

याद बारात

सपनों की आँखों में

उतरी रात।

10

प्रेम बाँसुरी

मीड पे काँपे जिया

मुस्काए पिया!

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अप्रैल 30, 2021

2158

1-शोनाली श्रीवास्तव (कैलीफ़ोर्निया)

1

सिंदूरी माँग

सूर्य की किरणों से

जगमगाएशोनाली श्री्वास्तव

2

आँखों में नमी

चितकबरे पत्ते

गिरे लब पर

3

पाँव घुँघरू

बाँधकर चली मैं

मन की गली

4

धरा के फूल

किसान की दुनिया

उगले मोती

5

महामारी से

उजड़ते दामन

सिमटे आँसू

6

सुनी राह पे

लुढ़कती पत्तियाँ

भोर की बेला

7

रमता जोगी

अंग लगाए भस्म

चिलम भरे

8

लॉकडाउन

बंद शिक्षा दुकान

उड़े पखेरू

9

कड़क ठंड

लकड़ी से उड़ता

सफ़ेद धुआँ

10

कक्षा की ड्योढ़ी

हाथ कटोरा लिये

भीख माँगता

11

ऊँचे महल

शीशे चमका रहे

श्रमिक हाथ

12

भोर की बेला

बर्फ़ -चादर ओढ़े

घर की छत

13

ढलता सूर्य

दौड़ती गाड़ियों की

भागमभाग

14

पुष्प से पुष्प

मँडराए तितली

सूर्य उदय

-0-

मनीष श्रीवास्तव( (कैलीफ़ोर्निया)

1

गर्मी की छुट्टी-

मनीष श्रीवास्तवहुड़दंग हो रहा

नानी के घर

2

भोर का सूर्य-

वृक्षों पर जमी है

ओस की बूँदें

3

प्रेम दिवस-

चौखट पे खड़ी माँ

बाट-निहारे

4

सब्ज़ी का ठेला –

सूनी सड़क पर

तैनात फ़ौजी

5

सजल नैन –

चिड़िया उड़ गई

पंख पसारे

6

रसोई घर –

आँख में आँसू भरे

माँ धौंके चूल्हा

7

माता की चौकी –

ड्योढ़ी पर खड़ी माँ

भिक्षा माँगती।

8

सर्दी की भोर –

पानी के तसले में

पक्षी नहाए

9

शंख की ध्वनि-

नहाकर छिड़का

गंगा का जल

10

जाड़े की धूप-

झूले पर झगड़ें

भाई -बहन

11

सूर्यास्त बेला –

मास्क में तट पर

शान्ति से बैठे

-0-

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 29, 2021

2157

विनीता तिवारी (वर्जिनिया, यू एस ए)

1.

कहाँ सम्भव!

विनीता तिवारीदायरों में रहते

ऊँची उड़ान।

2.

मास्क दस्ताने

दो हज़ार बीस का

साज- शृंगार!

3.

रिश्तों की ज़मीं

बिना प्यार विश्वास

रही उजाड़!

4.

अहं ये मेरा

जागा रहा हमेशा

सोती रही मैं

5.

इंद्रधनुष!!

आकाश में बिखरा

होली का रंग

6.

दूसरी बार

कोरोना से लाचार

दरो- दीवार

7.

सत्ता कोई हो

ग़रीबों का शोषण

वैसा का वैसा

8.

हरियाली से

पुलकित धरती

मुदित मन

9.

तेज रफ़्तार

उलझनें हज़ार

जीवन सार!

10.

मन चंचल

विषयों से निर्मल

बैरागी कल!

–0-

 

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