Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अगस्त 31, 2018

1860

डॉ.कविता भट्ट

1                                                        

सूनी खिडकीसूनी खिड़की

राह निहारे तेरी,

आँखों में भर

मिलन का काजल

मचलता आँचल।

 

 

2

WomanintheRain

चूल्हा सीला- सा

लेकिन मैं सुलगी

इस सावन

पिय तुम प्रहरी

विरहन ठहरी ।

3

बसन्त आया

गुजरा चुपचाप,

अब की होली

सैनिक के घर में

करती थी विलाप !

4

चयन करे

शूल-शय्या गर्व से

सैनिक -प्रिया

उसे भी है कहना

महान वीरांगना ।

5

सूनी है घाटी

रो रहे देवदार

नदी उदास

दहली कल रात

नृशंस था प्रहार ।

6

स्तब्ध खड़ा है,

हिमालय के मन

उद्वेग बड़ा है,

मानवता के शव

गिनता  रात-दिन।                                 

7

चिनार

बूढ़ा चिनार

खड़े हो सीमा पर

रहा निहार

शव मातृ-भक्तों के

नैनों में सूनापन।

8

प्रायः रही है

निर्जीव संपत्ति -सी

युद्ध-द्यूत में

‘नारी  केवल श्रद्धा’

गाया ही जाता रहा ।

9

नारीपुरुष बना –

तर्क-न्याय प्रणेता

छद्मवेशी भी

अहल्या शिलामात्र

हाय! ये धर्मशास्त्र

10

रथ विराजे

या शीश कटे राजे

युद्ध में हारे-

सुन्दर पटरानी

कुछ नर्तकियाँ भी ।

11

पंचकन्या में

मन्दोदरी, तारा भी

कंदुक- सी ही,

रावण विभीषण

खेले सुग्रीव-बाली

12

राम न आए

उतरकर द्वार

राजा ठहरे !

सीता के वे उद्गार

तुलसी भूल गए ।

13

सीता-वीरता

रचते ‘उत्तर’ में 

तुलसीदास

तो कभी नहीं होता

आज भी बनवास

14

ऐतिहासिक

हारना या जीतना,

घृणित मानी

यह सर्जन -शक्ति !

क्यों सदा तिरस्कृता ।

[**सभी चित्र  एवं  जी आई ऍफ़ फ़ाइल गूगल से साभार .

**चिनार का वृक्ष  627 साल पुराना है .]

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Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 27, 2018

1859

1-विजय आनंद

1
थोडा -सा प्यार
काँटों -सी अनबन
रिश्ते घायल
2
भूख का पेड़
चढ़ती दोपहरी
प्यास की खेती
3
आँसू की धार
सुख के पल डूबे
दिल का दर्द
4
वक़्त-
साँकल
अतीत की
बाँसुरी
स्वर सिसके

-0-Vijay Anand vjeanand@gmail.com

-0-

नरेंद्र श्रीवास्तव

1

सारी बलाएँ
अम्मा बनकर के
पेड़ों ने रोकी।
2
पवन बोली-
पेड़ों की छाँव तले
जीवन -सुधा।
3
पेड़ बचाओ
जीवन उसका भी
और हमारा।
4
हरे पेड़ों ने
धरा पर बनाई
शुभ रंगोली।
5
पेड़ लकीरें
धरा की हथेली में
जीवन रेखा।
6
पेड़ गुल्लक
जीवन ने
सँभाले
साँस के सिक्के।
7    

धूप मग  में
तपन का जुलूस
छाँव रक्षक।
–0- <narendrashrivastav55@gmail.com>

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अगस्त 26, 2018

1858-रक्षाबन्धन

1-ऋता शेखर ‘मधु’

1

भइया फूल

बहन है सुगंध

घर बगिया।

2

कोमल लता

नभ को छूने चली

भाई सहारा।

3

स्नेह की डोर

मोती -मोती में गुँथी

शुभ कामना।

4

भाई लेखनी

बहन अभिव्यक्ति

नेह का छंद।

5

स्वार्थ से परे 

अटूट नेह बंधन

रक्षा बंधन।

6

भेद न भाव

भाइयों की राखियाँ

एक समान।

7

बंद लिफाफा

द्वार पर डाकिया

विदेशी भाई।

8

बहना आई

खुशकिस्मत भाई

सजी कलाई।

9

सावन मास

हरी साड़ी, चूड़ियाँ

छाया उल्लास।

-०-

2-कमला घटाऔरा

1

वैदिक राखी

बाँधू ,भैया कलाई

दुआ पिटारी ।

2

बनाई राखी

जुटा पाँच सामग्री

नेह गूँथके ।

3

नेह -बंधन 

अमर ये युगों से

चलता आया ।

4

चाँद गगन

माँ के आँगन भाई

सुख सौ गुन ।

5

बाँध मैं राखी 

देखके मुख- चन्द्र 

बटोरूँ खुशी ।

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 25, 2018

1857

1-कमला निखुर्पा

1

कोई सिल दे 

वक्त की फटी जेबें 

खोए हैं लम्हें । 

2

पुकारो कोई 

ढल रहे चाँद को 

चकोर रोई। 

3

किसने सुनी

रातरानी की बातें 

पंखुड़ी झरी। 

4

धूप सहेली

अँगना आके  बैठी 

बूझे पहेली । 

– प्राचार्या केन्द्रीय विद्यालय पिथौराग

 

2- डॉ0 सुरंगमा यादव

1

यौवन माया

सुन मृगनयनी

धन पराया

2

आँसू पी जाऊँ

जग रीत निभाऊँ

मैं मुसकाऊँ

3

शब्द हैं मौन

आँसू हुए मुखर

समझे कौन!

4

बंद किवाड़े

फिर भी आ जाती हैं

पीड़ाएँ द्वारे

5

बरखा आई

अलसायी छतरी

ले अँगडाई

6

शब्दित हुईं

खामोशियाँ सहसा

जादू ये कैसा

7

सूना मंदिर

बज उठीं घण्टियाँ

तुम जो आ

8

वर्षा की रात

मेढकों की चौपाल

सुनाये हाल

9

नैनों का जल

आशाओं का काजल

बहा विकल

-०- डॉ0 सुरंगमा यादव,असि0 प्रो0 हिन्दी, महामाया राजकीय महाविद्यालय महोना, लखनऊ

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अगस्त 21, 2018

1856-ममता फूटे

डॉ.कविता भट्ट

1
मैं ही बाँचूँगी
पीर-अक्षर पिय,
जो तेरे हिय।
2
नारी है देह
आत्मा-नर न नारी
मात्र चेतना।
3
देह तिलिस्म
आत्मा तटस्थ द्रष्टा
लिंग-भेद क्यों ?
4
दुस्साहस है
नारी में पुरुष -सा
किन्तु संस्कारी।
5
ममता फूटे
नैनों और वक्षों से
क्यों उत्पीड़न।
6
ममतामयी
रजवाड़ों में भी तो
चादर-सी थी।
7
कब पवित्र
नारी के विषय में
दृष्टि विचित्र।
8
नारी सुलगी
राख में चिंगारी-सी
मन ही मन।
9
हम न होंगे
धिक्कारेगा तुमको
सूना-सा द्वार।
10
डाकिया आँखें
मन के खत भेजें
प्रिय न पढ़े।
-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 17, 2018

1855

डा. सुरेन्द्र वर्मा

1

नीला समुद्र

तरंगों के अन्दर

झाँकता सूर्य

2

दीपित वन

बिखरा चहूँ ओर

टेसू का रंग

3

जीने की राह

सितारे रूठ गए

कौन बताए

4

कभी डराए

डगमगाती नाव

सँभाले कभी

5

बांस की ओट

संगीत का फूटना

हवा की चोट

6

देखो तो ज़रा

आया लजाता दिन

शर्मीली धूप

-०-

डा. सुरेन्द्र वर्मा  / दस एच आई जी / एक सर्कुलर रोड /इलाहाबाद

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अगस्त 15, 2018

1854

शशि पाधा

 1

माँ के आशीष

पुत्र -संग रहते

सीमाओं पर।

2

राष्ट्र -रक्षक!

ह्रदय के तल से

तुम्हें प्रणाम!

3

धन्य वो भूमि

जहाँ पाँव रखते

वीर सेनानी।

4

संकल्प ध्येय

निर्भयता औ निष्ठा

 वीर कवच। 

5

पर्वत गाएँ

गाथा बलिदान की

धरती सुने।

 –०–

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 13, 2018

1853

पूर्वा शर्मा 

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 10, 2018

1852-साँझ से भोर तक

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

1

कँटीली राहें

पथरीली चढ़ाई

हाथ  थामना !

2

खड़े हैं लाखों

रक्तपायी  पथ  में

बचके चलो !

3

शंकित  दृष्टि

बींधती तनमन

दग्ध जीवन !

4

भाग्य का लेखा-

भला करके भी तो

सुख न देखा !

5

तुम्हारी आँखें

आँसू का समन्दर

पीना मैं चाहूँ।

6

पोंछ लो आँखें

सीने में छुप जाओ

क्रूर हैं घेरे ।

7

यज्ञ रचाया

मन्त्र भी पढ़े सभी

शाप न छूटा।

8

जलती रही

समिधा बन नारी

राख ही बची ।

9

छूटे तो छूटे

चाहे प्राण अपने !

हाथ न छूटे।

10

सिन्धु तरेंगें

विश्वास की है नैया

पार करेंगे।

11

मुस्कानें मरी

हँसी गले में फँसी

बधिक -पाश

12

कटे न पाश

खुशियाँ हुई कैद

पंख भी कटे।

13

प्राण हुए  हैं

अब बोझ भारी

चले भी आओ।

14

कैसा मौसम!

झुलसी हैं ऋचाएँ

असुर हँसें।

15

उर पाँखुरी

झेले पाषाण वर्षा

अस्तित्व मिटे।

16

ईर्ष्या सर्पिणी

फुत्कारे अहर्निश

झुलसे मन।

17

कहाँ से लाएँ

चन्दनवन मन !

लपटें घेरे।

18

अश्रु से सींचे

महाकाव्य के पन्ने

रच दी नारी ।

19

मन न बाँचा

अन्धे असुर बने

रक्तपिपासु ।

20

दर्द जो पीते

व्यथित के मन का

सुधा न माँगे।

21

मर जाऊँगा,

तुम्हारे लिए  जग में

फिर आऊँगा !

22

पूजा न  जानूँ

न देखा ईश्वर को

तुमको देखा !

23

प्रतिमा रोई

कलुष न धो पाई,

भक्तों ने बाँटे ।

24

व्यथा के घन

फट जाएँ जो कभी

पर्वत डूबें ।

25

नागनागिन

लिपटे तनमन

जकड़ा कण्ठ ।

26

पाषाण थे वे

 न पिंघले ,न जुड़े

टूटे न छूटे ।

-0-

 [सभी  रेखांकन ; रमेश गौतम]

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 7, 2018

1851

1-शशि पाधा

1

अक्षर झरे

कल्पना सरसि से

गागर भरे ।

2

ओ दोपहरी!

घनी घाम चुभती

संझा बुला री ।

3

क्यों दोहराऊँ

इस व्यथा -कथा को  

चुप पी जाऊँ  ।

4

धीर सद्भाव

करते तुरपाई

उधड़े रिश्ते।

5

मौन की भाषा

जो समझे, वो जाने

प्रेम दीवाने ।

-०-

2-शैलजा सक्सेना

1

दिन कमान

धूप जलता तीर

ज़ख्मी शरीर!

2

हवा बीमार

कैसे हो उपचार?

दिशायें स्त्बध!

3

दरकी मिट्टी

इतना क्यों हो गुस्सा?

पसीज भी लो!

4

मन है भारी,

झरते भाव-आँसू

शब्द भीगते!

5

सज्जित घर

खनकते न स्वर

बच्चे लापता !

-०-

3-विकास सक्सेना

1

फटा है जूता

उधड़ा है स्वेटर

हमारा कल।

2

कड़ी  है धूप

पेड़ों की घनी छाया

बचाये रूप।

3

माँ ने था  पीटा

पिता ने दुलराया

वो मुस्कुराया !

-0-

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