Posted by: हरदीप कौर संधु | अप्रैल 7, 2022

2247

1-चाँदझील और चाँद

सुदर्शन रत्नाकर

1

छिपा सूरज

रात के रथ पर

आ बैठा चाँद।

2

पहने वस्त्र

धवल चाँदनी के

निकला चाँद।

3

चाँद मुस्काया

तारे खिलखिलाये

अम्बर जागा।

4

चाँदनी खिली

श्वेत चादर बिछी

मोतियों वाली।

5

चाँद ने झाँका

बादलों की ओट से

धरा मुस्काई।

6

चाँद मुस्काया

खिली धरती- काया

बिखरी आभा

7

चाँद निकला

तारों से जब मिला

नभ मुस्काया।

8

भोर की बेला

छिप गए हैं तारे

चाँद अकेला।

9

सोती है रात

चमकता है चाँद

देता पहरा।

10

जब भी आता

सुधा है बरसाता

नभ में चाँद।

11

चाँद -किरनें

फैली आसमान में

शीतल रात।

12

बेचारा चाँद

जागता रात भर

तारों के संग ।

13

दूध कटोरा

हाथ लिये घूमती

रात चाँदनी।

14

सजा गगन

माथे पर बिंदिया

चाँद सलोना।

15

चाँदनी रात

उतरती किरणें

ज्यों हों परियाँ।

16

पूस की रात

कोई नहीं बाहर

चाँद अकेला।

17

चंदा आओ न

बादलों के झूले में

संग गाओ न।

18

चाँद सलोना

फैली मस्त चाँदनी

कहे, छू लो ना।,

19

चाँद अकेला

ढूँढ रहा है तारे

यादों का मेला।

-0-सुदर्शन रत्नाकर,ई-29, नेहरू ग्राउंड,फ़रीदाबाद 121001

-0-

2- धूप

अशोक ‘ आनन ‘

1

धूप के संग –

आ धमका सूरज ।

भिनसारे से ।

2

सुबहलॉन में बैठ –

धूप का अख़बार ।

बाँच रही लू ।

3

गाँव – शहर –

सूरज ने जलाए ।

लू के अलाव ।

4

सूरज फिर –

आग बबूला हुआ ।

धरा झुलसी ।

5

कंठ – पपीहा –

प्यासे ही रहे सदा ।

रेत – समय ।

6

रोज़ जड़ते –

गालों पर थप्पड़ ।

लू के थपेड़े ।

7

धधक रही –

दोपहर लावा – सी ।

झुलसी सृष्टि ।

8

रेत – नदियाँ –

तड़पें मछलियाँ ।

मौसम लावा ।

9

बर्फ की भाँति –

पिघल रहे तन ।

भिनसारे से ।

-0- 11/82 , जूना बाज़ार , मक्सी, जिला : शाजापुर ( म.प्र.)-पिनकोड : 465 106

Email : ashokananmaksi@gmail.com

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अप्रैल 5, 2022

2246

 अनिमा दास

1.

ANIMA DASढलता सूर्य

गिनता रहे पल

शेष वयस

2.

मधु गीत से

शून्य आकाश गूँजे

रिक्त मन के

3.

रहती स्व में

युवा की संवेदना

वृद्ध– वेदना

4.

मृदु मृदा– सी

इच्छाएँ प्रामीत– सी

जीर्ण भाषा में

5.

लताएँ सुनो

अस्त कंचन भर

पीड़ाएँ गिनो

6.

शब्द असंख्य

मायामहल मन

घन– गुंजन

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 1, 2022

2245

1- अवधी हाइकु-रश्मि विभा त्रिपाठी

1-पं रश्मि त्रिपाठी - Copy1

सपने केरी

का-का कहनि कही

तुमका हेरी।

2

ई जनम का

साधे हवै हमका

सुधि तुम्हरी।

3

रहा जियाइ

उमिरिया बढाइ

नेह तुम्हार।

4

तुमका पूजी

अउर नाहीं काम

तुमही राम।

-0-

2-प्रीति अग्रवाल

1.
preeti-aggarwalमाथे को चूमा
तुमने या चाँद ने
पता न चला।
2.
तारों की छाँव
पिघलता आसमाँ
बाहों में चाँद।
3.
छुई- मुई-सी
सिमटी लजाकर
सोच तुम्हें मैं।
4.
जल्द आओगे
चाहे झूठा ही सही
वायदा करो।

5.
साँझ की डोली
क्षितिज की तरफ
चलती चली।
6.
सिले थे होंठ
तुम कैसे समझे
जी की बतिया ।
7.
धूप- छाँव का
अजब है तमाशा
यह जिंदगी।
8.
पुराने दिन
बेवजह दस्तक
वक़्त- बेवक़्त!
9.
छिले हैं पंख
हौसलों के सहारे
भरूँ उड़ान!
10
आवारा राहें
सुबह की निकलीं
शाम को लौटें।
11.
नयन सजे
सतरंगी सपनें
काजल मिले।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | मार्च 22, 2022

2244

भीकम सिंह 

1

छोड़के गया 

bheekam singhपर्यटकों  का सुख 

वनों में दुःख।

2

थक गए हैं 

अभागे-से पहाड़ 

ढ़ोते- कबाड़ ।

3

कहती कथा 

शैवाल में प्लास्टिक 

ताल की व्यथा।

4

वन विकल

देशद्रोही हवाएँ 

हुई सफल।

5

चढ़े ट्रैकर 

पहाड़ों की देह पे

झूठे नेह से।

6

कूड़े के ढेर 

वक्ष से  लगा-लगा 

पहाड़ थका।

7

कूड़े पे गिरे

अभागे वन-फूल

किसकी भूल?

8

नदी अशुद्ध 

करती विसर्जन 

मन से बुद्ध।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | मार्च 21, 2022

2243

रश्मि विभा त्रिपाठी

1

करूँ कामना

तुम रहो सदैव

आनन्दमना।

2

करूँ वन्दन

नित्य सुख सघन

प्रभु उन्हें दो।

3

है निवेदन

प्रतिपल मगन

प्रभु वे रहें।

4

प्रभु उनको

तू रखना सम्भाले

वे भोले-भाले!

5

दो आशीर्वाद!

प्रभु प्रिय मनाएँ

सदा आह्लाद।

6

तुम सम्राट!

राजसी ठाट-बाट

सदियों रहे।

7

उदार मन

करूँ राजतिलक

आओ राजन!

8

देखकरके

आँखें जाती हैं बँध

तुम्हारा कद।

9

वक्त आएगा

तुम्हारा कीर्तिमान

फहराएगा।

10

पास न आए

तुम्हें जरा-सा दुख

छू भी न पाए।

11

प्रभु से चाहूँ

मैं तुम्हारी समृद्धि

सुख में वृद्धि।

12

है अविभाज्य

तुम सुख-साम्राज्य

बढ़ाते चलो।

13

तुम फूल-से

सदा खिलखिलाओ

खुश्बू फैलाओ।

14

तुम सूर्य-से

अँधेरे भय खाते

थरथराते!

15

तुम रंग-से

धन्य भाग हों बड़े

जिसपे पड़े!

16

तुम शिव-से

स्वयं विष पी लिया

जीवन दिया!

17

17

करते क्षमा

कौन सी मैं उपमा

तुम्हें अब दूँ?

 

18

तुम सरल

मन बड़ा निर्मल

मन्दाकिनी- सा!

 

19

तुम गंगा- से

जो आचमन करे

निश्चय तरे!

 

20

तुम शैल- से

मात्र मन- मैल से

टूट पड़ते!

 

21

यही माँगती

तुम फूलो औ फलो

सुख में पलो।

22

 उन्नत भाल

उनके आशीष का

ये है कमाल।

23

पाया आशीष

तुमसे प्रफुल्लित

प्राण-शिरीष।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 19, 2022

2242-रंग बरसे

शशि पाधा

1

नेह- उल्लास

है रंगों का उल्लास

रंग हज़ारबिखरा हास

2

इंद्रधनुष

झर-झर झरती

रंग-  गगरी

3

बाजे मृदंग

गली में हुड़दंग

उत्सवी गीत

4

मन फागुन

अंग-अंग उमंग

आँखें गुलाल

5

रंग बरसे

झूम-झूम थिरके

मन मयूर

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | मार्च 19, 2022

2241-तुम्हीं से आस

 रश्मि विभा त्रिपाठी

1

2-ॠतुराजवसंत आए

हाथों में ले गुलाल

रँगने गाल।

2

तुम्हीं से आस

हर्ष और उल्लास

होली-दिवाली।

3

तुम्हारे बिन

सारे रंग हैं फीके

क्या करूँ जीके?

4

तुम्हारे बिन

रंग केसरी-धानी

हुए बेमानी।

5

तुम जो छूटे

हुए आस के रंग

भद्दे-बेरंग।

6

रहे छिटक

प्रिय प्रेम का रंग

गाढ़ा, चटक।

7

सुधि-गुलाल

चमकाए मुखड़ा

गुलाबी गाल।

8

एक उमंग

तुम अपने रंग

मुझे रँग दो।

9

मुझपे चढ़ा

प्रिये! तुम्हारा रंग

चटख बड़ा।

10

माथे लगाएँ

वे आशीष की रोली

मनाऊँ होली।

11

रंग जो घुला

प्रिय तेरी याद का

संताप धुला!

12

आया फागुन

प्रिये! फाग की धुन

भीगे औ झूमे!

13

तुमसे बना-

जीवन– इंद्रधनुष

उत्सव मना!

14

तुम्हारी दुआ

खिला देती जीवन

मन फगुआ।

15

पावन होली!

प्राणों में आ प्रिय ने

केसर घोली।

16

माह फागुन

मन झूमता, गाता

फाग की धुन।

17

तुम सतत

देते मन को रंग

अनगिनत!

18

मन की डाल

टेसू के फूल खिले

तुम जो मिले।

19

तुम्हारी दुआ

खिला हरसिंगार

जीवन हुआ।

20

कितने रंग!

करे खूब बौछार

तुम्हारा प्यार।

21

तुम्हारा प्यार

मानो हरसिंगार

खिले, रँग दे।

-0-

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 18, 2022

2240

डॉ. जेन्नी शबनम 

1.

दे गया दगा

रंगों का ये मौसम,

मन है कोरा।

2.

गुज़रा छूके

कर अठखेलियाँ

मौसमी-रंग।

3.

होली है आई

मन ने दगा किया

उसे भगाया।

4.

दुलारी होली

मेरे दुख छुपाई

देती बधाई।

5.

सादा- सा मन

होली से मिलकर

बना रँगीला।

6.

होलिका-दिन

होलिका जल मरी

कमाके पुण्य।

7.

फगुआ मन

जी में उठे हिलोर

मचाए शोर।

8.

छाए उमंग

खिलखिलाते रंग

बसन्ती मन।

9.

ख़ूब बरसे

ज्यों दरोग़ा की लाठी

रंग-अबीर।

10.

बिन रँगे ही

मन हुआ बसन्ती

रुत है प्यारी।

11.

कैसी ये होली

रिश्ते_ नाते छिटके

अकेला मन।

12.

छुपके आई

कुंडी खटखटाई

होली भौजाई।

13.

माई न बाबू

मन कैसे हो क़ाबू,

अबकी होली।

14.

अबकी साल

मन हो गया जोगी,

लौट जा होली!

15.

पी ली है भाँग

लड़खड़ाती होली

धप्प से गिरी।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 7, 2022

2239

विभय कुमार ‘दीपक’

1

विभय कुमारचाँद ने कहा ,

निकलते – ढलते ,

था दुख सहा।

2

पीले रंग की ,

चादर- सी बिछी है ,

फूली सरसों।

3

मंडराता है ,

भंवरा कली पर ,

मजबूरी है।

4

जलतरंग ,

मन भीतर बजे ,

जो पिया संग।

5

छोटा सा गड्ढा ,

बना तालाब जैसा ,

नहाई मैना।

-0-

विभय कुमार ‘दीपक’

प्रकाशन:दीपक की रोशनी ( गीत / गज़ल संग्रह ), सितारों सा दीपक, एक दीपक जला,दीपक राग (नवगीत-संग्रह),गज़लों के दीपक (गज़ल- संग्रह ), जवाकुसुम ( मुक्तक -संग्रह )

सम्पर्क -vibhai.kumar26@gmail.com

Posted by: हरदीप कौर संधु | फ़रवरी 28, 2022

2238

भीकम सिंह

1

bheekam singhखेतों से झाँके

खरपतवार ज्यों

घुसपैठिए।

2

भड़के खेत

बिल्डर्स की फब्तियाँ

कसती पेंच।

3

डर से भागे

खड़े हो गए खेत

कस्बों के आगे।

4

गाँव तो फँसा

नगर परिधि में

जैसे ही घुसा।

5

खिली सरसों

हसरत के दिन

चले बरसों।

6

ब्याज ही पाटे

कर्ज में फँसे गाँव

सजा-सी काटे।

7

गाँव आए हैं

मैख़ाने की जद में

छोड़-हद नै।

8

दीपक डरे

गाँवों में सभी घर

तम से भरे।

9

बनाने पैठ

मीलों चले हैं गाँव

करने पैंठ।

10

ज़ेब में खेत

दलाल लेके घूमें

किसान स्वेद।

-0-

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