Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 3, 2017

1748

कृष्णा वर्मा

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अप्रैल 3, 2017

1747

अनुपमा  त्रिपाठी

1

साँझ एकाकी 

कलरव गुनती 

लिखती पाती ।

2

खिलते अब  

सभी रंग मन के 

बसंत आया ।

3

फुलवा  चुन 

रे मन अब सींच 

प्रीत- बेलरी ।

4

 गूँध लाओ री 

सुघड़ मालनिया

फूलन हार ।

5

बसंत गाओ 

राग रंग बगरे 

पर्व मनाओ !

6

नेहा लगाए 

बैरी साँझ न बीते 

आस न जाए। 

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मार्च 29, 2017

1746

हाइकु काव्य में मानवीकरण हेय या प्रेय ?

-नीलमेन्दु सागर

       जापानी हाइकु अपनी विशेषताओं के कारण आज विश्व-साहित्य में प्रेय से श्रेय की सम्माननीय स्थिति में आ गया है । परन्तु प्रत्येक देश की अपनी सीमा , आकृति और संस्कृति होती है तथा प्रत्येक भाषा की अपनी प्रकृति होती है और उसके अपने संस्कार भी  होते हैं । स्वभावतः जापानी हाइकु को देशांतर की यात्राओं में अपने मौलिक स्वरूप और स्वभाव को सुरक्षित रखते हुए , अपने आहार –व्यवहार में अनेक परिवर्तन-परिष्कार स्वीकारने पड़े हैं । आहार का तात्पर्य यहाँ हाइकु के उपजीव्य से है , विषय-वस्तु से है ,और व्यवहार का बाह्याचारित हाव-भाव से।

       प्रसंगवश मानवीकरण के जो मुख्य विचारणीय बिंदु मन में उभरते हैं -वे हैं हाइकु , हाइकु और मानवीकरण ,तथा हिन्दी हाइकु काव्य में मानवीकरण ।

       यह तो विश्वविदित है कि हाइकु 5-7-5 अक्षरक्रम की अतुकान्त त्रिदल रचना है ; परन्तु यही सब कुछ नहीं है । मूल वस्तु है -हाइकु का कविता होना । इस लघु सप्तदशाक्षरी काया में जड़ा भावोन्मेष से परिपूरित काव्यात्मक सौन्दर्य का कलात्मक चित्रांकन।जापानी काव्य को मूल में पढ़ने एवं समझने-समझाने व विश्लेषित करने वाले भारतीय विद्वान् प्रो० सत्य भूषण वर्मा के अनुसार- हाइकु वस्तुतः सांकेतिक अभिव्यक्ति की कविता है । शब्दों में जो कहा जाता है वह संकेत मात्र है ,शेष पाठक की ग्रहणशक्ति  पर छोड़ दिया जाता है । परन्तु शब्दों में जो कुछ कहा जाता है , वह इतनी सावधानीपूर्वक चयनित , इतनी सरलता और सहजता से कथित ( प्रस्तुत ) और सूचना – संकेत से इस प्रकार अंतर्गन्थित होता है कि सजग और ग्रहणशील पाठक उसमें अनेक छिपे सत्यांशों की भी झलक पा जाता है । हाइकु में वर्णन- विस्तार , व्याख्या- विश्लेषण ,उपदेश-परामर्श, कवि का मंतव्य आदि के लिए कोई स्थान नहीं है । वह तो सत्य या सत्यांश की सहज, सांकेतिक एवं चित्रात्मक वस्तुनिष्ठ अभिव्यक्ति है । हाइकु का उपजीव्य प्रकृति है ;जिसका एक अभिन्न अंग मनुष्य भी है। प्रसिद्ध जापानी हाइकु कवि मात्सुओ बाशो (1644-94) का मानना है कि वस्तु में प्रविष्ट होकर उसके सहज जीवन और उसमे निहित भावों को देखने और आत्मसात् करने से कविता स्वतः फूट निकलती है । वास्तव में हाइकु आकार की लघुता में निमिषमात्र की तीव्र सहजानुभूति की अचूक अभिव्यक्ति वाली महान कविता है ।

       हाइकु के सन्दर्भ में जानने की सर्वाधिक बड़ी और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हाइकु कवि सृष्टि के प्राणियों और पदार्थों को उनके वास्तविक रूप में देखने और अभिव्यक्त करने को प्राथमिकता देता है । हाइकु कविता हमें जिस सहजता , सरलता और वस्तुनिष्ठता तक ले जाने में सक्षम है ,वह आलंकारिक भाषा के प्रयोग से संभव नहीं है । यही कारण है कि हाइकु कवि उपमा , रूपक , मानवीकरण , तुकात्मक छंद आदि से यथासंभव परहेज करता प्रतीत होता है । उसका मानना है कि काव्यालंकार आदि वस्तु के यथातथ्य स्वररूप को देखने एवं जानने –समझने में अवरोध उत्पन्न करते हैं ।इसलिए आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि जापानी हाइकुकार यह कहते पाए जाते हैं कि उपमा घृणास्पद होती है – ( comparisons are odious )वे परम्परागत रूप में सिद्धांततः मानते आए हैं कि हाइकु सहज अभिव्यक्ति की अलंकार हीन कविता है (Haiku is comparisionless poetry of suchness )।

       पर क्या व्यवहार में जापानी हाइकु कवि अलंकृत भाषा के प्रयोग से बच पाए हैं ? यह मानते हुए भी  कि मानवीकरण ( Personification / anthropomorphism / gijinka ) हाइकु के लिए हेय एवं यथासंभव त्याज्य है । जापानी हाइकु को रूप , रंग , जीवंतता और दिशा देने वाले महान कवि बाशो , बुसान इस्सा सहित अनेक जापानी कवियों ने जाने-अनजाने प्रकृति का मानवीकरण किया है और बड़ी सहजता और बड़ी सफलता से किया है , यथा –

   1-जलते सूर्य को / सागर में डुबो रही / मोगामि नदी । -मात्सुओ बाशो (1644-94।)

            – मूल से अनुवाद : सत्य भूषण वर्मा

    2-छोटा जंगली बत्तख / यों अकड़कर कहता / मैंने तल तक जाकर सब कुछ देख लिया   है ।- जोसो (1661-1704) – मूल से अनुवाद : प्रभाकर माचवे

 3-बसंत का डूबता सूर्य / पैर रख रहा / पर्वतीय तीतर की पूँछ पर ।- योशा  बुसान   (1716-84) -अंग्रेजी से अनुवाद : अंजलि देवधर

4-मेरा अधीनस्थ / एक कौआ/ नए वर्ष में पानी में नहा रहा ।-कोबायाशी इस्सा (1763- 1827)-अंग्रेजी से अनुवाद : अंजलि देवधर

5-मेरी बीमारी की बिस्तर की करवटों / का साथ देते हुए / पतझड़ के झींगुर ।- माशाओका   शीकी (1867-1902) -अंग्रेजी से         अनुवाद : अंजलि देवधर

 6-ओस की एक बूँद / बैठी एक पत्थर पर / एक हीरे के समान ।-कावाजाता बोशा (1900-1941) -अंग्रेजी से अनुवाद : अंजलि देवधर

7-शरद की वर्षा लिटा देती है /हल्दी के फूल/पूरे खिले हुए ।- ओनो  रिन्का (1904-1982)- अंग्रेजी से अनुवाद : अंजलि देवधर

       इन हाइकुओं में मोगामि नदी , जंगली बत्तख , डूबता सूर्य , कौआ , करवट और झींगुर , ओस की बूँद तथा शरद की वर्षा का मानवीकरण हुआ है , जो सायास नहीं लगता । सच तो यह है कि इन दृष्टान्तों में कवि के सूक्ष्म निरीक्षण और उसके चित्रात्मक प्रतिफलन से हम प्रभावित होते हैं । अभिव्यक्ति स्वभावोक्ति जैसी लगती है –‘सूक्ष्मवस्तु स्वभावस्य यथावद् वर्णन’ । सहज मानवीकरण के कारण ही इन हाइकुओं में चित्रित प्राकृतिक दृश्यों के व्यापक अर्थ- संकेत उजागर होते हैं ।

मानवीकरण और कविता का सहजात सम्बन्ध है । काव्य के तीन ही उपजीव्य हैं – मानव , मानवेतर प्रकृति और इस असीम , अनन्त सृष्टि-चक्र को चलाने वाला कोई अदृश्य किन्तु सर्व व्याप्त परमात्मा ; जिसे चाहे हम जिस किसी नाम से पुकारें । लेकिन मानव , प्रकृति और परमात्मा के अनिवार्य अंतर्सम्बन्धों को देखने , समझने –बूझने और अभिव्यक्त करने वाला एकमात्र प्राणी है -स्वयं मनुष्य –सृष्टि की सर्वोत्तम ऊँचाई का सत्य-‘सबार ऊपरे मानुष सत्य तोमार ऊपरे नाई ।’ इसलिए काव्य में प्रकृति का ( और कभी-कभी अदृश्य परमात्मा का भी )मानवीकरण और मनुष्य का प्रकृती करण  काव्य-सृजन की स्वाभाविक प्रक्रिया मानी जा सकती है ।हाइकु सृजन के लिए तो शायद अनिवार्यता की सीमा तक , क्योंकि हाइकु सामान्य कविता नहीं कविता का सार स्वरूप है । पाश्चात्य हाइकु काव्य  समीक्षक जॉर्ज फ्रॉस्ट (georg frost) ने सही कहा है कि हाइकु सार्थक स्पर्श , स्वाद , शब्द ,दृश्य और गंध की कविता है ।यह मानवीकृत  प्रकृति और प्रकृतस्थ मानवता है , अतः इसे सार / सत्त्व स्वरूप कविता कहा जा सकता है। (Haiku is the poetry of meaningful touch , taste , sound , sight and smell , it is humanized nature and naturalized humanity , and as such may be called poetry in its essence George Frost )

       मानवीकरण ( Personification ) को अलंकारविदों ने पाश्चात्य अलंकार माना है ;जो भ्रामक- सा लगता है । काव्य में अलंकर के गंभीर अध्येता राम रघुवीर ने अपने ग्रन्थ ‘अलंकार-समुच्चय’ के अनुक्रम में मानवीकरण को ‘कतिपय पाश्चात्य अलंकार’ के अंतर्गत परिगणित किया है , जो उन्हीं के द्वारा दिए गए उदाहरणों से गलत प्रतीत होता है । उनका एक उदाहरण सूरदास से है – ‘ हृदय चौकी चमकि बैठी सुभग मोतिन हार’ । यहाँ मोतियों के हार ( अचेतन ) के चमक कर बैठने में मानव -व्यवहार का आरोप है । उनका एक दूसरा उदाहरण बिहारी से है –

              अरुण सरोरुह-कर-चरन , दृग-खंजन , मुख-चंद ।

                समै आइ सुन्दरि शरद , काहि न करत अनंद ।।

       शरद्  ऋतु पर सुन्दरी  का आरोप है । शरद्  सुन्दरी अंगी है और उसके अंग हैं – चन्द्रमुख (आकाश में ); दृग-खंजन (अंतरिक्ष में चंचल ); अरुण कमल-कर-चरन (सरोवर में )।

       तात्पर्य यह कि मानवीकरण काव्य का कोई बाहरी उपादान या पाश्चात्य अलंकार नहीं है ,अपितु कविता का एक सहजात गुण है, जो किसी अमूर्त या अचेतन वस्तु पर मानव के व्यवहार या रूप का आरोप करता है और काव्य-भाषा में वक्रता और चमत्कृति लाकर उसको प्रभावपूर्ण बनाता है । पाश्चात्य साहित्य में ही नहीं , मानवीकरण प्राचीनकाल से ही भारतीय संस्कृत काव्य और तदुपरांत  हिन्दी  तथा संदर्भित वर्तमानकालिक आयातित कहे जाने वाले भारतीय देश-काल-परिवेश-अनुमोदित और भाषा -संस्कार से संपोषित हिन्दी हाइकु का तादात्म्य गुण रहा है । कहीं बाहर से लाकर ऊपर से धारण किया गया कोई अलंकर नहीं । कालिदास का मेघदूत , पत्नी -विरह -विदग्ध श्री राम का लता-तरु-पाती और खग-मृगादि से पूछना , सुमित्रानंदन पन्त की ‘गोरी ग्रीवा बाहों वाली चम्पई धूप’, निराला की ‘मेघ के घनकेश’ वाली वर्षा -सुन्दरी , महादेवी की क्षितिज से धीरे-धीरे उतर कर अभिसारिका नायिका की तरह विहँसती आती ‘वसंत-रजनी’ , प्रसाद की ‘ऊषा नागरी’ का अम्बर पनघट में तारा-घट डुबोना , माखन लाल चतुर्वेदी का बलि पथ पर बिखर जाने की अभिलाषा वाला ‘पुष्प’ ,अशोक बाजपेयी की बारिश का ‘धरती को ….अपनी असंख्य उँगलियों से’  गुदगुदाना आदि सहृदय पाठक को चमकृत और प्रभावित करने वाले सहज उद्भूत मानवीकरण के उदाहरण हैं । फिर हिन्दी हाइकु भारतीय- काव्य की इस परंपरागत सहज शैली से कैसे वंचित रह सकता है ?

       हिन्दी में हाइकु-लेखन को आन्दोलन का स्वरूप प्रदान करने वाले प्रथम व्यक्ति -प्रो० सत्य भूषण वर्मा थे , जिन्होंने जे० एन० यू० में जापानी भाषा-विभाग की अध्यक्षता सँभालते हुए अन्तर्देशीय  पत्र  पर ‘हाइकु’ नामक एक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया ,जो सन 1977 से आरम्भ होकर बारह वर्षों बाद 1989 में बंद हो गई । इस लघु ‘हाइकु’ पत्रिका में प्रारम्भ से छपने वाले हिन्दी हाइकुकार हैं :-वेदज्ञ आर्य , सत्यानन्द जावा , उर्मिला कौल, कृष्णलाल बजाज ,बलदेव वंशी, उदयभानु ‘हंस’ ,सत्यपाल चुघ,पद्मा सचदेव , मोतीलाल जोतवाणी, रामकृष्ण विकलेश, सतीश दुबे, सावित्री  डागा , कमला रत्नम् आदि । सन् 1980 के बाद शैल सक्सेना ,भगवतशरण अग्रवाल , विद्याबिन्दु सिंह , राधेश्याम,  डॉ शैल रस्तोगी , डॉ सुधा गुप्ता , आदि अनेक हाइकुकार  भी ‘हाइकु’ पत्रक से जुड़े  । ‘हाइकु’ में छपे इन रचनाकारों के कतिपय हाइकु इस बात का के पुष्ट प्रमाण हैं कि हिन्दी  हिन्दी हाइकु ने अपने प्रारम्भिक दिनों में भी मानवीकरण के माध्यम से  प्रकृति और  मानव  के सहज तादात्मय सम्बन्ध  को बड़े ही जीवन्त  और चमत्कृत  रूप में  प्रस्तुत किया है  । द्रष्टव्य  हैं निम्न उदाहरण –

1-भुजाएँ फैला /माँगता प्रणयी देवदार / धूप का उपहार । -उर्मिला कौल (1978)

2-किशोर चन्द्र /सोया जवान रात के साथ /कमल उदास । उदयभानु हंस(1978)

3-टूटी बागडोर / सूरज के घोड़ों की / कौओं का शोर ।-कृष्ण लाल बजाज(1979)

 4-चौंक छिपी द्रुत / भाप नहाती / गोरी विद्युत्  । -जगदीश कुमार (1980)

  5-नाक पे बैठी /पानी चुआती रही /शीत हठीली ।-राधेश्याम (1986)

हाइकु पत्रक का प्रकाशन बन्द होने के बाद  हिन्दी में  हाइकु-लेखन को अग्रसर करने में ‘हाइकु-भारती’ ( डॉ भगवतशरण अग्रवाल), हाइकु दर्पण ( सं-जगदीश व्योम)  , कविताश्री ( सं-नलिनीकान्त), त्रिशूल( सं-महावीर सिंह) , नालन्दा-दर्पण( सं-स्वर्ण किरण), मुक्त कथन( सं –जनार्दन सिंह) , आरोह-अवरोह, उदन्ती ,हिन्दी चेतना, वीणा, अभिनव इमरोज़ की भूमिका सराहनीय रही हैं ।अब तो  देश की छोटी- बड़ी पत्रिकाएँ हाइकु छापने में गौरव  महसूस करती हैं। सैंकड़ों की संख्या में  देश-विदेश के हाइकुकार अपने स्वतन्त्र हाइकु-संग्रह लेकर उपस्थित हुए हैं और हो रहे हैं । आए दिन अन्तर्जाल पर  व्यापक रूप से  हाइकु की उपस्थिति अलग से हाइकु –प्रेमियों  का ध्यान खींचती है। अन्तर्जाल की पत्रिकाओं में अनुभूति ने बरसों पहले हाइकु को स्थान दिया था ।जुलाई 2010 में शुरू हुए  हिन्दी हाइकु( सम्पादक द्वय-डॉ हरदीप सन्धु-ऑस्ट्रेलिया, रामेश्वर काम्बोज-भारत)  ने हाइकु को 97 देशों तक पहुँचा दिया , जिसमें इस समय लगभग 13 हज़ार हाइकु , 260 हाइकुकार ,1090 पोस्ट मौजूद  हैं । विगत चार वर्षों में हिन्दी हाइकु ने  विश्वभर  की बहुत-सी नई प्रतिभाओं को मंच प्रदान किया है । ऐसा लगता है कि समसामयिक हिन्दी काव्य के बहुलांश  और सर्वाधिक  महत्त्वपूर्ण अंश हिन्दी हाइकु-काव्य के  रूप में ही संसार के सामने आ रहे हैं।इसलिए हिन्दी हाइकु को हिन्दी काव्य के इतिहास में गौरवपूर्ण स्थान दिलाने में सक्रिय भूमिका निभाने वाले  हाइकुकारों और हाइकु संकलनों को गिनना कठिन  है । फलत: कुछ बहुचर्चित हाइकुकारों के हाइकुओं में मानवीकरण को रेखांकित करने से अधिक गुंजाइश तत्काल सम्भव नहीं है। ऐसे हाइकु कवियों में उर्मिला कौल , शैल रस्तोगी , आदित्य प्रताप सिंह, डॉ भगवत शरण अग्रवाल, रमाकान्त श्रीवास्तव, नलिनीकान्त, नीलमेन्दु सागर , सुरेन्द्र वर्मा  , श्याम खरे ,डॉ सुधा गुप्ता,मिथिलेश दीक्षित , उर्मिला अग्रवाल आदि को प्रथम पंक्ति में रखा जा सकता है; जिन्होंने मानवीकरण का प्रयोग न केवल प्रचुरता से किया है ; बल्कि उसमें संकेत, चमत्कार और चित्रात्मकता  लाने में  प्रशंस्य सफलता भी पाई है।

1-उर्मिला कौल: उर्मिल कौल हिन्दी हाइकु के शैशव काल से ही लिखती और छपती रही हैं। उनका एक प्रासंगिक हाइकु पहले ही उद्धृत किया  जा चुका है।  यहाँ  तीन  उदाहरण द्रष्टव्य हैं-

            1-उकडूँ बैठी  / शर्मसार पहाडी / ढूँढ़ती  साड़ी  ।  

            2-ओढ़ सो गई / शरद की चाँदनी /भोली धरती ।

            3-पावस नाची /टूट गए घुँघरू/झन-झंकार ।

पहाड़ी का उकड़ू बैठना उस निर्वसन महिला की विवशता का चित्रण करता है, जो निर्वसन होने के कारण  सिमटकर  बैठी है । वह शर्मसार होने के साथ ही अपनी खोई हुई साड़ी को ढूँढ़ रही है । वृक्षों के अन्धाधुन्ध कटान ने हरियाली रूपी साड़ी को तार-तार कर दिया है । इस हाइकु में पर्यावरण विनाश की चिन्ता बहुत तीव्रता से अभिव्यक्त हुई है। भोली धरती का शरद की निर्मल चाँदनी को ओढ़कर सोना बहुत सहज चित्रण है ।तीसरे हाइकु में पावस का जमकर नाचना, इतना नाचना कि झन-झंकार करते हुए घुँघरू टूटकर बिखर गए। पावस की बड़ी-बड़ी बूँदें जब जमकर पड़ती हैं ,तो मस्ती में  डूबकर नाचती हुई  किसी  कुशल  नृत्यांगना  का दृश्य साकार कर देती हैं।  मानवीकरण के प्रयोग से इस हाइकु की अभिव्यक्ति कई गुना प्रखर हो गई है ।

2-डॉ शैल रस्तोगी : शैल रस्तोगी ने हज़ारों  हाइकु कविताएँ लिखी हैं। अपने हाइकुओं में उन्होंने प्रचुरता से  और बड़े ही प्रभावशाली ढंग से मानवीकरण  शैली का प्रयोग किया है। वस्तुत: प्रकृति के चित्रपट पर परिवेश प्रभावित मानवीय संवेदनाओं के बहुरंगी चित्त अंकित करने का अद्भुत कौशल  है  शैल रस्तोगी में।प्रकृति के मानवीकरण पर उनकी स्त्री-सुलभ सहज मसृणता और परम्परागत जातीय संस्कार  की अमिट छाप है, जो सरसरी तौर से देखने पर भी साफ़ दिखाई पड़ती है।

           अलस धूप / आँगन में लेटी है / रानी बेटी ।

            कली कुँवरि / पाँव ज़मीन पर /आकाश ताके ।

           दोपहर में  / समेटती आँचल / ऊँघती हवा

इन हाइकुओं में क्रमश: धूप , कली और हवा का मानवीकरण हुआ है । नारी मनोविज्ञान का पारदर्शी चित्रण इन हाइकुओं के सौन्दर्य में चार चाँद लगाता है।

3-प्रो आदित्य प्रताप सिंह : प्रो आदित्य प्रताप सिंह हिन्दी हाइकु के कटु आलोचक रहे हैं। वे जीवनभर जापानी हाइकु के मौलिक गुणों के कट्टर समर्थक रहकर हाइकु की जगह हायकू लिखते रहे हैं।  अपने  यहाँ चिरहुला( रीवा) में उन्होंने एक हायकू समाज की भी स्थापना की । उनका हिन्दी हाइकु के क्षेत्र में एकला चलो रे वाला विचार भी पढ़ने को मिला और दृष्टान्त स्वरूप उनके  ढेर सारे हायकू भी।  हिन्दी हाइकु में जापानीपन और शुद्धीकरण के पक्षधर थे वे।  फिर भी उनके कतिपय हायकू मानवीकरण की सहज शैली में रचित होने के कारण हिन्दी हाइकु की प्रथम पंक्ति में खड़े दिखते हैं, यथा-

       बाँसों  को लड़ा / हवा हो गई हवा । झुलसा वन ।

        झलकी बस । जलेबी गली फिर । डस गई ।

        कहाँ की जल्दी ? / लालिम साँझ चली / लगा हल्दी ।

हवा( मानवीकृत) बाँसों  को लड़ाकर हवा हो गई ( भाग गई) और वन झुलस गया । संकेत है कि कैसे घर-फोड़ू आदमी परिवार के बीच मतभेद पैदाकर उसके संगठित समाज को बर्बाद कर देते  हैं। जलेबी गली चमकती चितकबरी पीठ वाली टेढ़ी-मेढ़ी नागिन का रूप और डसने की उसकी प्रकृति लेकर सचेतन हो उठी है।लालिम साँझ हल्दी लगाकर प्रेमाभिमुख अभिसारिका सी सजीव और समुत्सुक है,किन्तु कहाँ की जल्दी है उसे किसको पता। मानवीकरण के अच्छे उदाहरण हैं ये हाइकु।

4-डॉ भगवतशरण अग्रवाल :हिन्दी हाइकु लेखन के क्षेत्र में प्रो आदित्य प्रताप सिंह की कटु आलोचना और मुखर विरोध को संयम, सहिष्णुता और शालीनता से झेलने वाले डॉ भगवतशरण अग्रवाल वर्त्तमान हिन्दी हाइकुकारों के मार्गदर्शक एवं अभिभावक सदृश हैं। उन्होंने अच्छे हाइकु ही नहीं लिखे हैं , हाइकु के सम्बन्ध में बहुत कुछ लिखा है, जो सार्थक और सुन्दर है। बरसों तक वे हाइकु भारती पत्रिका के माध्यम से हाइकु आन्दोलन को गति और दिशा देते रहे । पुस्तक के रूप में उन्होंने हाइकु-काव्य विश्वकोश सहित कई मानक प्रकाशन दिए । सिद्धान्त और व्यवहार दोनों रूपों में डॉ अग्रवाल ने हाइकु के बिम्ब , प्रतीक , मानवीकरण आदि की उपयोगिता स्वीकारी है। उदाहरण स्वरूप निम्नांकित हाइकुओं में मानवीकरण की मोहक छटा द्रष्टव्य है-

     पूस की रात। ठिठुरती हवाएँ / दस्तक देतीं।

        उल्टे-पलटे / रातरानी की गन्ध / यादों के पन्ने ।

       तुम्हारी यादें / रात रात करती / फूलों से बातें

यहाँ ठिठुरती हवाएँ , रातरानी की गन्ध, तुम्हारी यादें मानवी स्वभाव और कार्य को आचरित करती हैं , जिससे इन हाइकुओं की भाषा  सहज संवेद और प्रभावपूर्ण हुई हैं।

5- रमाकांत श्रीवास्तव :आधा दर्जन से भी अधिक हाइकु-संग्रहों के रचनाकार संपादकाचार्य डाँ०रमाकांत श्रीवास्तव संभवतः हिंदी के वरीयतम  जीवित हाइकुकार है। इनकी हाइकु कविताओं में समाज, राष्ट्र,राजनीति, बालमनोविज्ञान, आदि विषय प्रमुखता से चर्चित हुए है। परन्तु हाइकु में मानवीकरण से इन्हें भी परहेज नहीं। इनकी कतिपय हाइकु कविताएँ प्रकृति के सहज सुन्दर मानवीकरण के सराहनीय उदाहरण के रूप में हमारे समक्ष उपस्थित है–

       खिले कमल /जलाशय ने खोले /नेत्र अनेक।

       महुआ खड़ा /बिछा श्वेत चादर /किसे जोहता।

        गाँव मुझको /ढूढ़ता,मैं गाँव को /खो गए दोनों।

यहाँ क्रमशः ‘जलाशय’ ‘महुआ’ और ‘गाँव’ तीनो सचेतन (मानव ) की तरह व्यवहार करते चित्रित किए गए हैं। दृश्य बिम्ब के अच्छे उदाहरण हैं ये।

6- नलिनीकांत: अंडाल (प० बंगाल ) से प्रकाशित होने वाली ‘कविता श्री’ पत्रिका के यशस्वी सम्पादक और अनेक हाइकु कविताओं और ऋचाओं के सुनामी रचनाकार  नलिनीकांत हिंदी के सुचर्चित वरिष्ठ हाइकुकारों में एक हैं।हाइकु में मानवीकरण के प्रसंग में उनके अनेक हाइकु हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं –

    उषा कुमारी /नाची कि फैल गया /घाघरा लाल।

     नहा रहा है /चाँद मलमल के /देह जल में।

   झाऊ वन में /लेट रही चाँदनी/चितकबरी।

इन उदाहरणों में क्रमशः ‘नाची’ ‘नहा रहा है’और ‘लेट रही’ क्रिया पदों से क्रमशः उषा ,चाँद और चाँदनी पर मानव के गुणों का आरोप किया गया है। तीनों हाइकुओं में प्रांजल दृश्य बिम्ब उभरते हैं जो पाठक को अनायास प्रभावित कर देते हैं।

7. नीलमेंदु सागर : नीलमेंदु सागर के हाइकुओं में मानवीकरण विषय पर स्वयं नीलमेंदु सागर क्या कहें ? अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना उचित नहीं। परन्तु आपके अवलोकनार्थ तीन हाइकु यहाँ भी प्रस्तुत हैं। आप स्वयं देखें इनमें प्रकृति (Nature)मानव प्रकृति (स्वभाव)और मानवीय संवेदनाओं को आचरित कर सका है अथवा नहीं। वे तीन हाइकु हैं –

       हरा दुपट्टा /ओढ़े खड़ी पहाड़ी /शालीन नारी।

     दिन की हत्या /लहुआई  कटार/धो रही संध्या।

   भुतही रात /हाँकती रही गाछ / डाइन हवा।

8-सुरेन्द्र वर्मा : गाँधी दर्शन के मर्मज्ञ डाँ० सुरेन्द्र वर्मा विचारक ,व्यंयकार और समीक्षक तो हैं ही जापानी काव्य -विधा हाइकु से भी उनका गहरा नाता है।हाइकु को केंद्र में रखकर उन्होंने कई समीक्षात्मक निबंध भी लिखे हैं और बड़ी संख्या में हाइकु कविताएँ भी लिखी हैं जिनमें प्रकृति का भरपूर मानवीकरण देखा जा सकता है।बानगी के रूप में उनके अधोलिखित  तीन हाइकु अवलोकनीय हैं-

    जगाए दर्द /करे कनबतयाँ /हवा फागुनी।

     फूलों में छिपी /गंध करे चुगली /चंपा शरमाई।

     दस्तक देती /महक मोगरे की /खोलो कपाट

फागुनी हवा का कनबतियाँ करना ,गंध का चुगली करना, चंपा का शर्माना,मोगरे की महक का दस्तक देना मानवीय व्यापार हैं जो इन प्राकृतिक वस्तुओं पर आरोपित हुए हैं।                                                                                                            

9.श्याम खरे :संगीतज्ञ (एम० ए०) सिविल इंजीनियर रामकृष्ण सदाशिव  खरे (श्याम खरे) की हिंदी हाइकु सेवा अविस्मरणीय है। वे हाइकुकार और अनुवादक दोनों हैं। हिंदी-मराठी हाइकुओं के पारस्परिक रूपांतरण के साथ -साथ उन्होंने प्रचुर मात्रा में हाइकु कविताएँ लिखी हैं जिनमें बहुरंगी प्रकृति की अनेक मुद्राएँ मानवीकृत हुई हैं।चन्द उदाहरण द्रष्टव्य हैं-

            रात रानी को / सुबह होते होते / नींद आ गई

            बूढ़ा आकाश / छितराकर बैठा / धवल केश

            जुगनू गया / अँधेरे के  जिस्म में/जख्म दे गया

प्रकृति (रात रानी,बूढ़ा आकाश और जुगनू )के मानवीकरण की कैसी मार्मिक ,चमत्कारपूर्ण  और प्रभावशाली छटा है इन हाइकुओं  में !

10. सुधा गुप्ता : हाइकु में मानवीकरण विषयक कोई भी चर्चा डाँ. सुधा गुप्ता की चर्चा के अभाव में अधूरी मानी जाएगी ,क्योंकि उनके हाइकु हाइकु कविता नहीं, जीवंत प्रकृति की अविकल काकली हैं। मनोरम क्रीड़ा-कौतुक हैं।सुधा गुप्ता, हाइकु और प्रकृति से जो त्रिदल बनता है वहीं उनका हाइकु है। उनके हाइकुओं में प्रकृति रूप-रस-गंध सहित विराजमान मिलती है। स्वभावतः स्वभावोक्ति, बिम्ब, प्रतीक, मानवीकरण एवं कतिपय अन्य अलंकर भी सुधा गुप्ता के प्रकृति-चित्रण में सहायक रहे हैं।मानवीकरण की मोहक छटा तो देखते ही बनती है उनके हाइकु में

            ठसक बैठी/ पीला घाघरा फैला / रानी सरसों ।

            बाँसों के वन /मचलती हवा ने /बजाई सीटी ।

            चुप है नदी /कुछ भी न कहती /बस,बहती ।

प्रथम उदहारण में सरसों का मानवीकरण हुआ है। वह गर्वीली युवती (रानी) की तरह पीला घाघरा फैला ठसक बैठी है।बड़ा जीवंत चाक्षुष बिम्ब है यह। साथ ही शरदांत का ऋतुबोध भी है यहाँबसंत के आने का संकेत। दूसरे उदहारण में हवा को मचलने और सीटी बजाने जैसे मानवीय गुणों से लैस किया है।बसंत ऋतु का संकेत है इसमें।मार्मिक मानवीकरण का उदहारण है यह।नदी का मानवीकरण बहुत गहरे अर्थ का संकेतक है।

नारी जीवन की सम्पूर्ण व्यथा-कथा सुनाती प्रतीत होती है सुधा गुप्ता की नदी।यहाँ नदी सुधा गुप्ता की जीवन-धारा की जीवंत प्रतीक बन गई।तंत्र– विद्या में स्त्री को नदी ही माना गया है। चुप नदी उस स्त्री का स्वरूप है, जो बिना शिकवा-शिकायत के अंत तक बहती रहती है।नदी का ऐसा मानवीकरण सुधा गुप्ता ही कर सकती है।

11.मिथिलेश दीक्षित : प्राणवंत प्रकृति की स्नेहिल सहचरी डाँ० मिथिलेश दीक्षित भी है। उन्होंने  हाइकु के सैद्धातिक पहलुओं पर अध्ययन, मनन और लेखन किया। साथ ही, हाइकु के क्षेत्र में उनकी सृजनात्मक उपलब्धियाँ भी प्रचुर और मूल्यवान् हैं। उदाहरणार्थ उनके दो –तीन हाइकुओं का  उल्लेख अपेक्षित है। उनका एक हाइकु है ‘चाँदनीं रात /जानकर हँसती/मन की बात’.यहाँ ‘चाँदनी रात’ में मानवीय प्रकृति का आरोप है। वह एक प्रगल्भ नायिका की भाँति प्रेमी के मन की बात जानकर हँस देती है। उनके हँसने में स्वागत का भाव भी हो सकता है और उपेक्षा का भी –स्वीकार का भी और तिरस्कार का भी। उनके दूसरे हाइकु ‘खोल के पाँखे/ तालाब के जल में /तैरती शाखें’ में ‘तैरना’ क्रिया के द्वारा शाखों में चेतनता का भाव आरोपित हुआ है। चाक्षुष बिम्ब स्पष्ट है। डाँ० मिथिलेश का तीसरा हाइकु है ‘चुरा ले गया /पतझर पाहुन/ कपड़े –लत्ते’.पतझर पाहुन भी है और कृष्ण चोर भी। इस हाइकु में ‘पतझर’ का मानवीकरण हुआ है जो प्रत्यक्ष है, लेकिन ‘कपड़े –लत्ते’ से पेड़ो का अप्रत्यक्ष मानवीकरण भी ध्वनित होता है। कपड़े-लत्ते चुराने (और वह भी प्रिय पाहुन के द्वारा) का संकेत पाठक को नटवर कृष्ण द्वारा जल में नहाती गोपियों के कपड़े चुरा लेने तक ले जा सकता है। पतझर का स्पष्ट ऋतु संकेत तो है ही ।सांकेतिकता,चित्रात्मकता और प्रभावान्विति के कारण यह हाइकु मानवीकरण का उत्तम उदाहरण माना जा सकता है।

12.उर्मिला अग्रवाल :उर्मिला अग्रवाल हाइकु की श्रीवृद्धि में निरन्तर सक्रिय हैं।अपने कई संग्रहों के माध्यम से उन्होंने अपनी उपस्थिति  दर्ज़ कराई है । इनके तीन हाइकुओं में  मानवीकरण का सुन्दर प्रयोग है- 

            1-आए है जेठ /कैसे आए  अँगना /पर्दे में छाया।

            2-धूप सेंकती / गठियाए घुटने / वृद्धा सर्दी के ।

            3-लजीली धूप /सिमटी सिकुड़ी सी / बैठी ओसारे

भारतीय समाज में जेठ का रिश्ता  बहुत सम्मानजनक होता है ।इसे जेठ मास के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा सकता है।वृद्धा सर्दी और लजीली धूप का दृश्यबिब बड़े गहरे संकेत से पाठक को चमत्कृत करता है। भारतीय परिवारों की प्राय: गरीब वृद्धाएँ जाड़े की ॠतु में धूप सेंककर ही तो अपने गठियाए घुटनों के दर्द से राहत  पाती हैं । बुढ़ापे में( विशेषकर महिलाओं में) गठिया-वात रोग  प्राय: पाया जाता है -यह संकेत भी इस हाइकु में ध्वनित होता है। धूप में नारी के लज्जाभाव का आरोपण है। लज्जावश स्त्रियाँ सिमट –सिकुड़कर  बैठती हैं और कम से कम जगह घेरती हैं। जाड़े की धूप ओसारे पर थोड़ी ही तो आती है; इसीलिए वह लजीली है ।इन उदाहरणों में मानवीकरण के कारण स्पष्ट यथार्थ बिम्ब उभरते हैं, जो पाठक के मन पर प्रभाव डालने में सफल हैं।

       हाइकु में मानवीकरण के प्रसंग में उपर्युक्त केवल 12 हाइकुकारों की सोदाहरण चर्चा का अर्थ यह नहीं है कि शेष अनगिनत हाइकुकारों की रचना में प्रकृतिपरकता और मानवीकरण का अभाव है देश-काल की सीमा का ध्यान रखते हुए अनेक बहु चर्चित नामों में से कुछ की चर्चा (वह भी कम से कम शब्दों में)हमारी विवशता रही। हिंदी हाइकु तो इतना सौभाग्यशाली है कि दिन अनुदिन उत्तरोत्तर पल्लवित, पुष्पित और फलित हो रहा है। हाइकु की इस विकासोन्मुखता के पीछे असंख्य वरिष्ठ, प्रौढ़,युवा और युवतर हाइकुकारों का अकूत योगदान है। सुखद आश्चर्य यह भी है कि हिंदी हाइकु कविता की विकास यात्रा में संख्यात्मक और गुणात्मक दोनों दृष्टियों से, स्त्रियों का योगदान पुरुषों की अपेक्षा कहीं बढ़-चढ़ कर है।

        इन अनगिनत शेष हाइकुकारों के हाइकुओं में भी मानवीकरण की एक से बढ़कर एक छटा दृष्टिगत होती है। इसलिए देश –काल की बंदिशों के बावजूद उनमें से कुछ नामों की सूची (कुछ उदहारण सहित )प्रस्तुत करने का लोभ संवरण नहीं हो रहा है। हो सकता है कि यह निम्नांकित लघु सूची हाइकु में मानवीकरण के प्रेमी उन पाठकों के लिए ,जो समय, श्रम और खोजी प्रवृत्ति के धनी है, ‘एक संकेतिका’ का काम कर सके ।अत: सूची प्रस्तुत है –

 1.शैल सक्सेना बाँस के वन /बाँसुरी बजा रहा /वायु चपल।

 2.मुचकुंद शर्मा प्रकृति परी/ नाची धूप साड़ी में /हवा गाड़ी में।

 3.आ० भगवत दुबे ले पिचकारी /बसंत ने रंग दी /धरती साड़ी।

4.रामनारायण पटेल रात हो गई /जुगनू कलियों में /बात हो गई।

 5.मनोज सोनकर चाँदनी नहाए /खिलखिलाए झील /निखार पाए।

  6.रा० ब० सी० राजन-बादल लेटे /पर्वतों के शीश पे /दुलारे बेटे।

7.कुँअर बेचैन किरण परी /डरी-डरी नभ से /फिर उतरी।

 8.भास्कर तैलंग हर सुबह /सूरज लिखता है /नई कहानी।

   9.सदा शिव कौतुक-संध्या सलाई /दिवस आँखों में /काजल आँजे।

 10.राम निवास पंथी– दाँतों में दाबे /नायलोनी कोहरा /उतरी धूप।

   11.रा० मो० त्रि० बन्धु समीर मंद /भोर गुनगुनाए /सुरभि छंद।

   12.बिन्दू जी  महाराज बिन्दू-लड़खड़ाता /निकला है सूरज /नशे में होगा।

   13.सतीशराज पुष्करणा– पीली सरसों /हँसकर कहती /बसंत आया।

  14.रामेश्वर काम्बोज हिमांशु1-नन्हा सूरज /भोर-ताल में कूद /खूब नहाए।

                                 2- हो गई साँझ ।धूप -वधू लजाई /ओट हो गई ।

                                3 रातरानी की  /खुल गई अलकें /खुशबू फैली ।

15.सूर्यदेव पाठक पराग– उषा सहेली /हौले गुदगुदाती /कली मुस्काती।

 16.राजकुमारी पाठक थक के खूब /हरी भरी घास पे /लेती थी धूप।

 17.हरेराम समीप धूप के पाँव /साँझ से पहले ही /थकने लगे।

  18.भावना कुँअर 1-राह तकते /पलकें करें बात /सारी ही रात।

                     2-दुल्हन झील /तारों की चूनर से/घूँघट काढ़े ।

                  3-लेटी थी धूप / सागर तट पर / प्यास बुझाने

  19.हरदीप कौर संधु-1-हर सुबह /ओस से मुँह धोए /फूल गुलाब।

                         2-याद किशोरी /मन-खिड़की खोल / करे किलोल ।

                          3-गूँगे जंगल / जार-जार रो रहे / ज़ख्मी आँचल।

   20.कमला निखुर्पा दीप ने थामी /लौ की तलवार तो /भागा अँधेरा।

                                        2- भावों का झूला / किलक झूमे  झूले / नन्हा हाइकु।

   21-जेन्नी शबनम 1-ठिठके खेत /कर जोड़ पुकारे /बरसो मेघ

                        2-सूरज झाँका /सागर की आँखों में  /रूप सुहाना ।

                         3-पाँव चूमने /लहरें दौड़ी आई /मैं सकुचाईं।

   22-रचना श्रीवास्तव-1-भोर किरण / उतरी धरती पे / नंगे ही पाँव ।

                           2-चूमा मुख जो /सुनहरी धूप ने / धरा लजाई ।

                          3-गुँथे पलाश / प्रकृति की चोटी में / अजब छटा ।

23-प्रियंका गुप्ता-1-बंद खिड़की /दरारों से झाँकती/यादें चोरटी ।

                                       2-दौड़ता आया/ धूल की गठरी ले /हवा का घोड़ा ।

                                      3-थकी-माँदी सी /टाँगे पसार कर /सोई थी धूप ।

 24-ज्योत्स्ना शर्मा -1-लो आई भोर /झाँक रहा सूरज / पूर्व की ओर।

                          2-रजनी बाला!  /कहाँ खो आई बाला / हँसिया वाला।

                          3-नन्हीं  बुंदियाँ  / ले के हाथों में हाथ / नाचतीं फिरें ।

25-ज्योत्स्ना प्रदीप-1-भरे बादल /तोड़ने आए भू का / निर्जला व्रत ।

                            2-शर्म में सूखी   / अनावृत्त शाखाएँ / लौटा दो वस्त्र ।

                             3-रात में बर्फ़ /पहाड़ पर सोई / भोर में रोई ।

26-अनिता ललित- 1-धरा है भीगी,/बादलों की आँखें भी/हुई हैं गीली।

                         2-अमलतास,/जब  बाहें फैलाए / धरा मुस्काए !

                        3-स्वर्ण- कलश /सिंधु में ढुलकाती /उषा पधारी !

 27- कृष्णा वर्मा-1-भिनसार में / टूटीं स्वप्न की साँसें / पलकें खुलीं।

                           2-ऊषा ने बाँधी / आकाश की कलाई / सूर्य की राखी।

                        3.-सर्द चाँदनी / उलीचे रात भर / भीगे चुम्बन। 

 28-रेखा रोहतगी-कोहरा ओढ़े /सूरज है ग़ायब / भोर ठिठुरे ।

  29.माधव पंडित रात बातूनी /इन्हें उन्हें पकड़े/ खोले अतीत।

30-राजेन्द्र परदेसी हवा उदास /व्यथा -भरी बावरी /खोलती गाँठ।

30.प्रगीत कुँअर- अँखियाँ भोली / उठाए फिरती है /यादों की झोली।

 31.उर्मि चक्रवर्ती झुका के सर /चुपचाप नहाए /शर्मीले पेड़।

  32.पूनम अंधड़ मेघ /कूद फांद नहाती /शोख़ डालियाँ।

    33.रमा द्विवेदीधूप घनेरी /खूब खिलखिलाए /अमलतास।

   34.अनिता कपूर शिकवा रात का /क्यों चुराए सितारे /सवेरा हँसा।

          यह सूची पृष्ठों लम्बी और पुस्तकाकार हो सकती है,परन्तु देश काल परिवेश की मर्यादा रेखा लाँघकर कोई लेखक मनोवांछित सब कुछ अपनी बाँहों में समेट तो नहीं सकता।इसलिए यह सूची यदि अव्याप्ति दोष से ग्रसित लगे (जैसा यह है भी ) तो भी लेखक को क्षमादान मिल सकता है।

          अंत में,पुनः निवेदन है कि मानवीकरण कोई अलंकार नहीं है, जो कविता-कामिनी को  पहनाया जाए। वह तो काव्य में चमत्कार और प्रभाव उत्पन्न करने का एक सहज भाषा शैली है। सहज उस अर्थ में कि भारतीय चिंतन में मानव , प्रकृति और परमात्मा अलग अलग नहीं है। उनमें अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है।प्रकृति हमारे लिए चेतना सम्पन है,प्राणवान् है । हम ,सूर्य,चन्द्र,पवन,पर्वत, नदी पेड़ पौधे (यहाँ तक कि छोटी तुलसी ) को सप्राण और महिमावान्  ही नहीं ,सर्वशक्तिमान् और प्राणप्रद मानकर पूजते है; उनसे मन्नत करते है, अपने स्वस्थ-सुखी  जीवन के लिए आशीष माँगते है।सम्पूर्ण प्रकृति हमारे लिए मानवीकृत है ; क्योंकि वह सचेतन है।इसलिए हिंदी हाइकु में मानवीकरण खोजने का अर्थ है -उसकी जीवन्तता का तत्त्व खोजना ,जो उसके शब्द शब्द और अक्षर-अक्षर में परिव्याप्त है। इसलिए मानवीकरण कोई अलंकार नहीं , हाइकु की सहज भाषा-शैली है , उसकी आत्मिक पहचान है । यह किसी प्रकार हेय  और त्याज्य नहीं,सर्वथा प्रेय और श्लाघ्य है।

                                    – नीलमेंदु सागर ,नीलम-निकुंज सधार ।पो० छितरौर ८५११२९  ,

                                    बेगूसराय (बिहार) ,मो० ०९९३१९४८७१४

                                                    -0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मार्च 28, 2017

1745

कमला घटाऔरा
1
जीवन देती
नारी जननी नहीं
है संजीवनी ।
2
तुलना कैसी
सहनशीला न्यारी
धरा लजाए ।
3
गुणों की खान
बंदिशों -तले दबी
सदा से नारी ।
4
नेह- गागर
बाँटते न अघाई
कद्र न पाई ।
5
मृत -सा तन
मिला स्पर्श प्यार का
जीवन खिला ।
-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मार्च 25, 2017

1744

प्रियंका गुप्ता

1

तुम साया थे

अँधेरा जब घिरा

गुम हो गए ।

2

रेत -से रिश्ते

मुठ्ठी में बाँधे रखे

फिसल गए ।

3

ठहर गए

अनजाने से ख़्वाब

नींद के घर ।

4

सिरहाने थी

यादों की क़तरनें

नींद में बुनी ।

5

हो जाता मन

तेरे मुस्कराने से-

गुलमोहर ।

6

दर्द के पेड़

यादों के जंगल में

उगते जाएँ ।

7

कित्ता भी काटो

बढ़ते ही जाते हैं

दर्द के पेड़ ।

8

खुशबू बहे

जो आएँ यादें तेरी

मन के द्वारे ।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 23, 2017

1743

मंजूषा मन

 1

छोटी- सी भूल

सज़ा सारी उमर

हमने झेली।

2

मन सकोरा

रहा सदा खाली ही

बही है गंगा।

3

मन की गंगा

बहती कलकल

सह के पीर।

4

पीर मन की

मन में छुपकर

लो मुस्कुराए।

5

भटका मन

चला आए वापस

खा के ठोकर।

6

थके कदम

चलते इस राह

छाँव की चाह।

7

खोके चेतना

जी पाए ये जीवन 

सरल नहीं।

8

बिछे हैं जाल

मन की चिरइया

उड़ न पाए।

9

छाँव की चाह

परिंदे की किस्मत

धूप ही धूप।

10

मन की बात

क्या कहेगा ये मन

जाने दो यार।

11

पंखो का दम

तुम तक आने में

लगता कम।

12

दिल न लगा

दुःख बहुत देता

दिल लगाना।

13

उड़ना मना

बन्धनों बँधा मन

जकड़ा तन।

14

भूला न करो

कोई जो याद करे,

कहते डरे।

15

ये व्यस्तताएँ

तुम्हें मेरे मन से

दूर ले जाएँ।

16

भूलो भले ही

भूलेंगे नहीं हम

नेह नाता ये।

17

सफर पर 

मिलते कई साथी

तुम -सा कौन!

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मार्च 23, 2017

1742

1-सीमा स्मृति

1

बूँद तरसे

जुदाई बादल से

धरती मग्न।

2

करो  संचय

हीरकहार जल

धरा तिजोरी।

3

ये नीर गीत

मानव संगीत

हो गया ताल।

0-

2-डॉ.सरस्वती माथुर

1

गौरैया उड़ी

हरी डालियों पर

मिठास घुली।

2

ओ री गौरैया

मन मधुवन में

गीत बुन जा।

3

मीठी -सी धुन

गौरैया है सुनाती

चीं चीं है गाती ।

4

आना गौरैया

मेरे घर द्वारे पे

प्रभाती गाना ।

5

तुम गौरैया

आँगन में बेटी -सी

कहाँ  जा छिपी?

6

गौरैया आओ

तुमसे है रोशन

जीवन भोर ।

7

क्यों हो री रूठी

जंगल आँगन है

मौन गौरैया।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 22, 2017

1741

पुष्पा मेहरा

 

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मार्च 19, 2017

1740

Image result for जन्मदिन की शुभकामनाएंआज आदरणीय रामेश्वर काम्बोज हिमांशु जी का जन्म दिन है। जिंदगी सालों का सफर नहीं यादों का सफर है।  यादें जो फिर साथ चलेंगी हम सफर बनकर। कहते हैं हर सफर का एक अंत होता है।
परन्तु यादों के सफर का अनंत होता है।सफर में पड़ाव है, सफर में मिलने वाले साथी है, गुजरे हुए मुकाम नहीं आते लौट के लेकिन हमेशा यादों की एक सौगात मिलती है। ऐसे ही लम्हे फिर से जीते हुए हिन्दी हाइकु परिवार आपको जन्म दिन की बधाई देता है।

वो खुद आया या महज़ उसका ख्याल था 
हवाओं पर सवार उसकी महक का कमाल था 
 
मुट्ठी से रेत 
लम्हा लम्हा फिसली
यही ज़िन्दगी। 
 
मिट्टी का तन 
क्षण भर जीवन 
लम्हा मिलन। 
डॉ हरदीप कौर सन्धु
Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मार्च 15, 2017

1739

अनिता मण्डा 

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