Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 26, 2017

1760

1-प्रीति सुराना

1

बने घरौंदा-

तिनके जुड़कर,

अकेले हम।

2

बरसा पानी-

बह गई फसलें,

भूखी धरती।

3

खुली दरारें-

सूखी धरती पर,

फटी एड़ियाँ

4

सूखी टहनी,

पतझड़ ऋतु में-

भटके पंछी।

5

अकाल मृत्यु,

छाया धरती पर-

जलसंकट।

6

नई किरण,

मेहनत की बेला-

भोर हो गई।

7

घना अँधेरा,

अब डरना कैसा-

सुबह होगी।

8

कोई टूटे तो

मत माँगना मन्नत-

भोर का तारा।

9

टूटी कलम 

कर्म ही लिखते हैं-

भाग्य का लेख।

10

जैसी करनी-

वैसे ही कर्मफल,

चुभते काँटे।

11

सूखी धरा से

उगेगी भुखमरी 

जल बचाओ।

12

नींव में भूल-

भवन में दरारें,

नी उजड़ा।

-0-

प्रीति समकित सुराना,15 नेहरू चौक,वारासिवनी (मप्र)-481331

-0-

2-रमेश कुमार सोनी ,बसना [ छत्तीसगढ़ ]

1

पानी ढूँढते

पानीपानी हो गए

पानी पूछिए

2

आग लगी है

चलो कुआँ खोद लें ?

पानी खरीदो

3

शहरी कोठी

कैद हुआ झरना

गाँवों में प्यासा

4

पानी सुस्ताते

प्याऊ की छाँव बैठे

प्यास ताकते

5

बंद कीजिए

मटका फोड़ स्पर्धा

पानी रोता है

6

अंत समय

पानी पुकारे लोग

पुराना रोग

7

पानी की ट्रेन

कभी मत ताकि

वर्षा बचा लें

8

ऐ पानी वालों

पानी बचाना सीखो

जंग ना छेड़ो

9

कैसे करोगे 

आचमन , संकल्प ?

जल पूछते

10

पानी जानती

सभ्यता की कहानी

जनता भूली

12

नीर से  पीर

पशुपक्षी भोगते

पेड़ बचाते

13

जलजले में

जल ही जल होगा

गर्मी बढ़ी है

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अप्रैल 26, 2017

1759

1-कमला घटाऔरा

1

जल अमृत

बूँद-बूँद  सँभालो

घाम कठिन ।

2

प्यासे को पानी

देता जीवन -दान

सदा मूल्यवान् ।

3

जल की खोज

आँखें नभ की ओर

सूखे के दिन ।

4

ग्रीष्म क्या आया

नद- नदी हैं सूखे

पोखर सूना ।

5

ढूँढ़े छाँव को

चर -अचर सब

धूप  का राज ।

6

पाखी तड़पें

धूल में कूदे- डूबे

चैन न पाएँ ।

7

वृक्ष जो रोपे

पहाड़ रहें हरे

पक्षी चहकें ।

-0-

2- सनी गुप्ता मदन

1

रोती है आँखें
कोई नही सहारा
बूढ़ा बेचारा।
2
बेटी जो मारे
सकल जहान को
नीचा दिखाए।
3
राधा बुलाए,
नयनों से अपने
नीर बहाए।
4
रोती डालियाँ
फल छाँव दिलाए
स्वार्थी मिटाए।
5
जीवन -पथ
नदियों-सा बहना
चुप रहना।
6
बन शीतल
पूजती है दुनिया
चाँद को जैसे।
-0-

3-सुशील शर्मा

1

सिर पे घड़ा

चिलचिलाती धूप

तलाशे पानी।

2

शीतल नीर

अमृत- सी सिंचित

मन की पीर।

3

जल का कल

यदि नहीं रक्षित

सब निष्फल।

4

उदास चूल्हे

नागफनी का दंश

सूखता पानी

5

सूखते पौधे

गमलों में सिंचित

पानी चिंतित ।

6

पानी की प्यास

माफियाओं ने लूटी

नदी उदास ।

7

जल की बूँदें

अमृत के सदृश्य

सीपी में मोती

8

जल-जंगल

मानव का मंगल

नूतन धरा।

9

पानी का मोल

खर्चना तौल-तौल

है अनमोल।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 23, 2017

1758

1-डॉ.सुषमा गुप्ता

डॉ सुषमा गुप्ता1

ये तारे ऐसे

चाँदनी की चुनरी
टँगे हो जैसे
2
चिड़िया -चोंच
दबा  रही तिनका
खोजे ठिकाना ।

3

मन -भावन
बादल बरसते
धरती तृप्त।

4

मन व्यथित
‘मुस्कान भी है झूठी’-
आँसू कहते ।

5

भोर परोसे
सुंदर- सा सपना
सूरज- थाली।

6

एक बिछौना

आधा सूखा गीला-सा

गीले सोए माँ ।

7

दर्द विशेष

अपनों की है देन

रख सँभाल ।

7

नम पलकें

है अधर मुस्कान

नारी -जीवन।

-0-

2-नरेंद्र श्रीवास्तव

1

तपन प्यासी
पानी तलाशे हारे
जान निकले।
2
लू के थपेड़े
पेट व पीठ पर
कोड़े मारते।
  3
घाम चला है
पगडंडी के रास्ते
छाँव के घर।
-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अप्रैल 23, 2017

1757

डॉ.भावना कुँअर

 डॉ.भावना कुँअर
1
21-जुलाई 11-30

कौन ले गया

पेड़ों की घनी छाँव

पानी का गाँव।
2
ताल- तलैय्या
हैं सूखे चहुँ ओर
लुप्त हैं मोर।
3
सूखा है कंठ
झरने का सपना
प्यास न कम।
-0-

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 21, 2017

1756

पृथिवी दिवस,22 अप्रैल

डॉ. सुधा गुप्ता

1

आकंठ डूपृथ्वी-3बी

प्रार्थना में पृथिवी

छेड़ना नहीं

2

चिर मातृत्व :

रचे वनस्पतियाँ

खिलाती फूल

3

वृन्त पे झुका

सद्यः खिला सुमन

प्रभु अर्पित

4.

तोड़ना नहीं

वहीं से स्वीकारेंगे

देवतापूजा

5

साकार भक्ति

भागवतरचना

पृथिवी पुण्या

6

पृथ्वी-2बाल भास्कर

ज्योतिकलश नित

अर्घ्य चढ़ाते

7

सोम देवता

औषधिपोषण से

ऊर्जा बढ़ाते

8

जननी, धात्री

कराती दुग्धपान

अमृतधार

9

पृथ्वी-1शस्य, कनक :

पोषित करती है

माँ  वसुंधरा

10

 यज्ञतन्मया

स्वयं की देती हवि

तापस बाला

11

चिर शुभदा

करुणान्विता माते

तुम्हें प्रणाम!

-0-

2-कृष्णा वर्मा

Tree with form of lungs, oxygen for the earth

ओस

 

 

 

 

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अप्रैल 21, 2017

1755

1-सुरेन्द्र वर्मा

1

खामोश रहा 

शब्द मेरे साथ था 

बोला ही नहीं 

2

हर तरफ 

धूप थी हवा भी थी 

मैं बंद रहा 

3

सो ही न पाया 

हाइकु साथ जागा 

रात बेचैन

4

बहुत चाहा 

बसर नहीं होता 

थोड़े में अब 

5

काम न आई 

कोई कैसी भी दवा 

दुआ कीजिए 

6

भले न बहें 

आँख में नमी रहे 

आँसू न सूखें 

7

ज़ख्म गहरे 

बेबसी थी होठों की 

हँसते रहे 

8

जीस्त न रुकी 

मौत से सामना था 

लड़ती रही 

9

महानगर 

इंसान हुए बौने 

भवन ऊँचे 

10

कोई न मिले 

अकेले ही चल दें 

जुड़ेंगे लोग 

11

बोया था प्यार 

उग आई नफ़रत 

कैसा तो वक्त 

 -0-१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड, –इलाहाबाद -२११००१  

 2-अनिता ललित

1

कण्ठ है सूखा

मनुष्य की आँख का

पानी भी सूखा।

2

किसकी आस!

स्वार्थ में अपनों को

मानव भूला।

3

गहरी पीर

न पानी न तिनका

उदास नीड़।

-0-

3-सुनीता काम्बोज

1.

अंतिम बूँद

टकटकी लगाए

पंछी है प्यासा ।

2

जलता कंठ

छटपटाता पंछी

बूँद भी प्यासी ।

3.

ये आत्मसात

हूँ बूँद मैं सिंधु की

ये हुआ ज्ञात ।

4.

पश्चताप अब 

बोझिल ये मनवा

नैन में मोती ।

5.

उद्वेलित है

पल-पल व्याकुल

पाहन मन ।

6

अनहोनी से

किसने कब खेली 

आँख मिचौली ।

7.

सब सहना

 कंटक चुनकर

राह बनाना ।

8.

मनवा पाखी

ढूँढे अब तुमको

भरे उड़ान ।

-0-

4-कमला निखुर्पा

1

साध मन की

पावन नेह बंधन

छूटे ना कभी 

-0-

मन्जूषा-हाइगा.png

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 20, 2017

1754

1-कमला निखुर्पा 

1

तरसा मन

स्वाति बूँद पावन

बरसा घन।

2

प्यासा कंठ 

व्याकुल है  चिरैया 

हठीली बूँद

3

जल की बूँद

रखो रे सँजोकर 

अमृत घूँट। 

4

सागर प्यास

कंठ में समाकर 

बूँद तरसी । 

-0-

2- डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

1

करूँ जतन

बुझे मन की तृष्णा

मिटे तपन ।

2

व्याकुल मन

तेरी ओर ताके हैं

मेरे नयन ।

3

कब आओगे

तड़पाए चाहत

भरे जलन ।

4

चले भी आओ !

चातक हुआ मन

न तरसाओ ।

    –०-

3-अनिता मण्डा

1

आकंठ डूबे
प्यास में सारे जीव
स्वार्थ की नदी।
2
बढ़ती जा
ज्योंज्यों सींचते तृष्णा
अंत कहीं ना !
-0-

4-मंजूषा मन

 

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अप्रैल 18, 2017

1753

डॉ भावना कुँअर

1
निहारूँ पथ
पर आए न पिया
कॉपे है जिया।
2
याद -पिटारी
एक-एक निकाली
हुई न खाली।
3
नयना थके
पथ भूले क्यों  पिया
लगे न जिया।
4
आस लगाऊँ
बसन्त जो आएगा
पी को लाएगा।
5
सूखी डाल पे
जला आस का दीया
पुकारूँ पिया।
6
कौन- सा दु:ख
साल रहा गौरैया
हुई जो चुप।
7
चिरैया सोचे-
तिनके चुन लाऊँ
नीड़ बनाऊँ।
8
सुनाती नहीं
पत्तियाँ भी संगीत
कहाँ हैं छिपीं?
9
रूठीं पत्तियाँ
हवा हुई अकेली
बजे न ताली।
10
अकेलापन
वीरान -सी डालियाँ
हारा ये मन।
11
प्रेम- कहानी
दोहराएगा कब
रूठा वो साथी।
-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अप्रैल 15, 2017

1752

ज्योत्स्ना-1ज्योत्स्ना-4ज्योत्स्ना-5

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 15, 2017

1751

1-ज्योत्स्ना प्रदीप

1

 भोली चिरैया 

रह गई है तन्हा 

हाय रे दैया !

 2 

नभ हैरान 

टहनी भी है सूखी 

पिक न कूकी ! 

3

 राग विहाग

 गा ना वनप्रिय 

भरा ह्रदय । 

4

 कहाँ हैं रंग 

ऋतुराज का छल 

सोचे विहंग !

ऊँचे मकान

मेरा नहीं रे ठौर 

पाते न बौर

6

पखेरू मौन

 ले गया हरियाली 

जाने रे कौन?

-0-

2-अनिता मण्डा
1.
सूनी शाखों पे
आये फिर बहार
आ जाओ साथी

2.
फूटी कोंपल
भूली पतझड़ को
खाली डालियाँ
3.
सूनी डालियाँ
कहाँ बने आशियाँ
सोचे गौरैया।

-0-

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