Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 15, 2018

1826

1-डॉ सुरेन्द्र वर्मा

1

नभ एकाकी 

किससे करे बात 

ताके धरती 

2

कलियाँ  खिलीं 

कचनार बेबस 

मदनोत्सव 

3

पौन पागल 

बसंत आगमन 

पुष्प स्वागत 

4

साँस फूलती

साँय-साँय करती 

हवा बैरिन 

5

बजाते ताली 

पुरवाई जो चली 

पत्ते प्रसन्न 

6

देखो तो ज़रा 

आई शर्मीली धूप 

लजाता दिन 

7

बाँसों के बीच 

फूटता है संगीत 

हवा की चोट 

8

राजा बसंत 

औचक ही आ जाता 

ऋतु परेशां 

9

किलकारते 

कोपलों से झांकते 

पत्ते नवीन 

10

वसंतागमन 

याद आता भूलता 

नृत्य,गायन 

-0--डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८),१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड 

इलाहाबाद -२११००१  

-0-

2-रामेश्वर काम्बोज  ‘हिमांशु’

1

आशा न छोड़ो

भूलो विगत दुःख

मैं हूँ संग में ।

2

मधु चुम्बन

देकर खिला दूँगा

बुलालो मुझे।

3

नेह की आँच

पाएँगे तन- मन

मुस्काओ तुम

4

स्वप्न में आऊँ

पलभर न जाऊँ

तुम्हें तजके।

5

विरह मिटे

बाँध लेना बाहों में

पूरा जीवन ।

-0-

3-प्रियंका गुप्ता

1

तन्हा था मन

आकर रुक जाते

भर सा जाता ।

2

अकेलापन

ढूँढता फिरे मुझे

मैं छिपी रहूँ ।

3

यादों की पर्ची

लिख के रख दी थी

मन के पास ।

4

वादा था किया

भुलाओगे न कभी

याद भी है क्या?

5

रात थी रोई

खूब बारिश हुई

सबने सोचा ।

6

वो साया बना

अँधेरा जब हुआ

कहीं न मिला ।

7

टपके आँसू

तकिये में जा छिपे

ढूँढे न मिले ।

8

हिम्मत बाँधी

दुनिया जब रोके-

करना; ठानी ।

9

प्रेम छलावा

बड़ा मनभावन

चोट दे जाए ।

10

कड़ी है धूप

उधार दे दोगे क्या 

नेह-चादर ?

-0-

4-सीमा सिंघल

1

प्रेम- उत्सव

मन करे शृंगार

भीगें नयन ! ।

2

प्रीत के बोल

मन की देहरी पे

शोर मचाते !

3

प्रेम- संबंध

निभाता जब कोई

प्रेम हो जाता !

4

निश्छल प्रेम

अश्कों के मोती बाँधे

आँखों के सीप !

5

प्रेम- परीक्षा

जिसका परिणाम

सिर्फ प्रेम है !

6

जीवन कहे-

पेट की भूख रोटी

मन की प्रेम !

7

धागे प्रेम के

मन से मन बाँधे

जीवन भर !

-0- सीमा सिंघल,13/20,नेहरू नगर रीवा ,मध्यप्रदेश 486001

<sssinghals@gmail.com>:

-0-

5-चन्द्र प्रकाश वर्मा
1

खिला आकाश
टिमटिमाते तारे
चाँदनी रात।
2

पुरानी टंकी
पानी से बात करे
सारी उमर।

3

अंदर जाती
बाहर जाती साँसें
एक पथिक।                    –
-0-<
bhikhubhai204@gmail.com

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Posted by: डॉ. हरदीप संधु | फ़रवरी 7, 2018

1825

1-पुष्पा मेहरा

1

हवा पछोरे

निज अंग-अंग से

हिम के कण ।

2

बदली ऋतु

धरती-सूरज की 

है साँठ-गाँठ ।

3

सुगंध भरी

खिल गईं कलियाँ

तृप्त हैं भौंरे ।

4

हँसतीं शाख

पग बढ़ाती धूप

सिंचित प्राण ।

5

बुढ़ाती शीत

गिनती,जीवन के

दो-चार दिन ।

6

सूखे पत्र हैं

झरेंगे अवश्य ये

आएँगे नए ।

7

झड़ने लगे

श्वेत बाल शीत के

आया हेमंत ।

8

घूमता चक्र

दिखा रहा क्रीड़ाएँ

छाया–धूप की ।

9

मदिरा भरे

महुओं को छूकर

हवा नशीली ।

10

राग औ रंग

जीवन के हैं अंग

कहे बसंत ।

11

पुलक भरी

धरा हुई यौवना

निखरे अंग  ।

12

नभ-हिंडोले

चढ़ी,झूल रही है

मीठी सी धूप ।

13

करे चकित

चौंध ये सतरंगी

रूप मोहनी ।

14

बुझाती प्यास

रूप,रस गंध पी

हवा नवेली ।

15

फूली लतर

ठूँठ के काँधे चढ़ी

स्वप्न देखती ।

16

प्यार के बोल

महका दें जीवन

यही बसंत ।

17

कुहा भगाते

फूल-छड़ी हाथ ले

काम पधारे ।

18

चारण भौंरे

निकले हैं काम को

देने बधावा ।

19

जन्में ना कभी

नफ़रत के बीज

फूले बसंत ।       

-0-

pushpa.mehra @gmail .com                      

-0-

2-अंजु गुप्ता

1

हैरान धरा,

उगाईं थीं फसलें,

मकान उगा !

2

सिमटे घन,

जब रूठ धरा से,

कृषक मरा !

3

छायी बदरी,

व्याकुल फिर मन,

गीला तकिया !

4

कर दमड़ी,

कसौटी पर रिश्ते,

अपना कौन?

5

नन्ही वो कली,

शायद ही मुस्काए,

रौंदी थी गई !

6

आकार लघु

गंभीरता समेटे

होते हाइकु !

7

गर्भ में कली

डरती क्या करती

की भ्रूणहत्या !

8

समन्दर तू,

मैं नदिया हूँ प्यासी,

मुकद्दर है !

9

जर्जर काया,

इच्छाएँ खंडहर,

जीने को मरे !

10

आड़ी – तिरछी ,

किस्मत की लकीरें ,

समझूँ कैसे !

11

मुठ्ठी में बन्द 

भविष्य है अपना 

बदलूं कैसे !

12

बन बैठे हो,

किसी और के तुम,

जलूँ न कैसे !

13

नम नयन,

गालों के सूखे आँसू,

पुकारें तुम्हें !

14

काँटों से भरी,

है ये प्रेम डगर,

डरे है मन !

15

सर्द हवाएँ

सियासत की भेंट

रिश्ते भी चढ़े !

16

चारदीवारी

हुई असुरक्षित 

रिश्ते विक्षिप्त

17

पिसी जिंदगी

मर्यादा-अमर्यादा

है अंतर्द्वन्द 

18

रिश्तों में छल,
पलभर का सुख,
अकेलापन !

 19

देखा दर्पण

देख खुद की छवि

सहमा अहं।

 20

छाई है धुंध,
सवाल बने रिश्ते, 
कसैले हुए !

 21

दुर्गम पथ
रख मन संबल
खिलते फूल ।

 22

रह सम्भल

गिरगिट-सा  इंसाँ 

पीठ पे वार

 23

पीहर छूटा

ससुराल पराया

अपना कौन ?

 24

हिम्मत रख

तन मन को साध

जीत लो जंग

अंजु गुप्ता

जन्मतिथि : 7 अक्तूबर

जन्मस्थान : कपूरथला

शिक्षा : एम बी ए, एम ए (इंग्लिश)

व्यवसाय : Soft Skill Trainer

सम्प्रति : हिसार

ई मेल : anju74gupta@gmail.com

सम्प्रति : हिसार

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 7, 2018

1824

1-डॉ कविता भट्ट

1

जीवन- पथ

विगत दुःख घट

आशा तुमसे।

2

नैन विकल-

लिखें पाती आँसू से

कभी तो बाँच।

3

पीत-पुष्प- सा

सुमुख मुरझाया

अब तो आओ ।

4

शीत शरद

तुम बिन बैरी हो

कटु मुस्काए।

5

मीत मन के

कभी तो आते तुम

स्वप्न बनके।

6

सलवटों -सी

मन-चादर पर

विरह -व्यथा ।

7

नित प्रयास

आँसू बाँचूँ तुम्हारे

दे दूँ मैं हास ।

-0-

2-मंजूषा मन
1
मुठ्ठी में रेत

जकड़के क्या पाया
पोरों से झरी।
2
भावुक मन
गले मिलके चाहे
फूट के रोना।
3
छूकर तुम्हें
बिखर जाए मन
चाहूँ बस ये।
4
टूटते हम
साथ न तेरा पाते
किधर जाते।
5
यादों के मोती
आँखें समन्दर हैं
खूब लुटाएँ।
6
कल ही आया
देखो लगा बीतने
नया साल भी।
7
याद न आए
तुम्हारी तुम जानो
हमें सताए।
8
भूलो जो तुम
भले ही भूल जाओ
हम न भूलें।
9
मैं याद आऊँ
नहीं ज़रूरी यह
याद सताए!
-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | फ़रवरी 3, 2018

1823

 1सुशील शर्मा

1

आया बसंत 

पतझड़ का अंत 

मधु से कंत 

2

ऋतु वसंत 

नवल भू यौवन

खिले आकंठ 

3

 शाल पलाश

रसवंती कामिनी 

महुआ गंध। 

4

केसरी धूप 

जीवन की गंध में 

है मकरंद 

5

कुहू के स्वर 

उन्मत्त  कोयलिया 

गीत अनंग। 

6

प्रीत पावनी 

पिया हैं परदेसी 

रूठा बसंत। 

7

प्रिय बसंत

केसरिया धरती

पीले गुलाबी।

0- Sushil Sharma [mailto:archanasharma891@gmail।com

 

2-ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

1
उम्र बढी। है
लौटा है बचपन
बूढ़ा है तन ॥
2
खोई मस्तियाँ
बङप्पन में मेरी
डूबी कश्तियाँ ॥
3
हूँ पचपन
हरकत ऐसी है
ज्यों बचपन ॥
4
मैँ भी हूँ जवाँ
उम्र घटती जाती
बढ़ती कहाँ ?
5

डूबता सूर्य
स्वागत करे चाँद
आ जा तू वर्ष
6
मत्त फसलें
रच दें इतिहास
यादों के दिन
7
​​​नई सौंगाते
बाँटता चला गया
नया था वर्ष।
8
क्षण ने बोई
दिन की जो फसलें
वर्ष ने काटी।
9
क्षण की आँधी
निगल गई वर्ष
यादों के साथ।
10
नहाए दिन
बन ठनके लाएँ
नया उत्कर्ष ।
11

वर्ष के पृष्ठ
लिखेगा इतिहास
यादों का पेन।
12
बुढ़ा गया है
सोलह का यौवन
आ जा सत्रह।
13
यादों के बीज
समय की भूमि पे
रचे साहित्य।
14
आओ  लिख दो!
मन की अभिलाषा
बोले ये वर्ष।
15
हाथों से रेत
फिसल गए दिन
यादों के बिन।
16

वधू लगाए
हाथों पर मेहंदी
वर मुस्काए।
17
मेहंदी रचे
मन की हथेली पे
खिले चेहरा।
-0-

ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

पोस्ट ऑफिस के पास,रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

opkshatriya@gmail।com

9424079675

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 28, 2018

1822

1-सुदर्शन रत्नाकर

1

महके फूल

जीवन- बगिया में

बेटी मुस्काई।

2

कोहरा छाया

सूरज अलसाया

ओट से झाँके ।

3

सर्द मौसम

शर्माती हुई आई

घर में धूप।

4

दुबकी बैठी

घर के आँगन में

साँझ की धूप।

5

थकी सी धूप

मुँडेर से उतरी

आँगन फैली ।

6

ओस के मोती

कोहरे की चादर

गढ़े चितेरा।

7

पथ वही है

पथिक बदलते

जीवन यात्रा।

8

जीवन साँझ

छूटे हैं सब साथी

मन अकेला ।

9

जल विहीन

मीन सम जीवन

तुम्हारे बिन।

10                  

 खिला है मन

पाकर तेरा संग

विजय पथ।

-0-

2-कृष्णा  वर्मा

1

जपें हवाएँ 

जाने क्या फागुन में 

जी धड़काएँ।

2

अनूठे पल 

भोले से परिचय 

होठो के दर।

3

प्रेम -व्यापार 

सींच रही रौनकें 

सोंधी बयार।

4

फूलों का काम 

रात भर छकना 

ओस का जाम।

5

ओ कलाकार 

अद्भुत की रचना 

भ्रांत संसार।

6

अन्न भंडार

फिर पेट भूखे हैं

ग़रीब मार।

7

कौन प्रभाव

देश भर नदियाँ

जल अभाव।

-0-

3-अनिता मण्डा

1
भटकी कश्ती
धुंध के भँवर में
दूर मंजिल।
2
चढ़ता भेंट
इतवार का दिन
अधूरे काम।
3
विद्युत-बल्ब
इर्द-गिर्द पतंगे
शवों का ढेर।
4
अभी है खाली
फिर सुनेगी डाली
पत्तों की ताली
5
पीली पत्ती से
हवा ने कुछ कहा
साथ चल दी!
6
फ़ुर्र से उड़ी
ले चिड़िया का रूप
जाड़े की धूप।
7
सजी है वेणी
महके रातरानी
देखे चाँदनी।
8
नहीं डरते
मिट्टी में मिलने से
झरते पत्ते।
9
खनक गये
फिर प्रश्नों के सिक्के
स्त्री के लिए।

-0-

4-वंशस्थ गौतम , ग़ाज़ियाबाद 

1

ज़िंदगी बीती

सपनों के जाल में 

नींद न टूटी। 

 

2

विस्तृत नभ 

सिमटा कतरे में 

मेरे आँगन। 

 

3

घर है सीला

बाहर खिली धूप

विचित्र लीला। 

4

स्वच्छंद मन 

कहना कब माने

उड़ना जाने। 

5

लो, फूँका घर

ले ली लुकाठी हाथ

चलेंगे साथ। 

-0-

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 16, 2018

1821

1-लक्ष्मीकांत मुकुल

1

आतुर बालें
निकली हैं खेतों में
ढका सिवान ।

2

बीत चुका है
समय धुंधलका
उगी है लाली ।

3

कोयल कूकी
नहीं टूटा सन्नाटा
मन माटी का ।

4

उगा पहाड़
खेतों के आँगन में
पाथर-टीला ।

5

नदी बीच में
पूरा गाँव-गिराँव
रेत किनारे ।

6

किसे  ढूंढती
फुदकती चिडिया
बॉस-वनों में ।

7

फुदकते हैं
खरहे की तरह
मेरे सपने ।

8

शिरीष-फल
बजा रहे खंजडी
बीते युग की ।

9

उड़ चले हैं
छोर से पंक्तिबद्ध
बकुल-झुंड ।

10

डाक पत्र में
नहीं अटा जीवन
मेरी व्यथा का ।

11

उड़े रूमाल
सहेजा जो सालों से
किनके नाम?

12

बिदक गई
सब दुनिया सारी
पोत डूबते।

-0-kvimukul12111@gmail.com

2-नरेंद्र श्रीवास्तव

1

रवि-रश्मियाँ
पवन-विमान से
धरा की सैर।
2
भोर से आस
साँझ से। शिकायत
यही ज़िन्दगी।
3
सूर्य किरणें
अँधेरा तलाशतीं
लौटीं निराश।
4
रात बैचेन
गगन संग चाँद
धरा अकेली।
5
रवि किरणें
धरा पर उतरीं
चित्र उकेरें।
6
उगा सूरज
सागर-दर्पण में
बिंब तुम्हारा।
-0-
पलोटन गंज ,गाडरवारा, जिला -नरसिंहपुर म.प्र.
मोबा.9993278808

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जनवरी 12, 2018

1820

पुष्पा मेहरा

1

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जनवरी 2, 2018

1819

1-नरेंद्र श्रीवास्तव

1

महकें पल
यत्र,तत्र,सर्वत्र
जीवन -पुष्प।
2
रोटी की आँच
पसीने की बूँदों से
तर दिवस।
3
दिन पहाड़
थक के सोई रात
स्वप्न देखती।
-0-पलोटन गंज ,गाडरवारा, जिला-नरसिंहपुर म.प्र.मोबा.9993278808

-0-

2-ऋतुराज दवे

1

मिलके खोज

कल्पना के हाथ में

बुद्धि की टॉर्च

2

कल्पना– घोडे़

बुद्धि हाथ लगाम

मन भी दौडे़

3

जीवन-घड़ी

घूमते कर्म काँटे

प्रेम बैटरी

4

यादों के घर

दिल के तहखाने

बिखरे पन्ने

5

प्रेम से मिल

धमनियों मैं दौड़ी

दिल की खुशी

6

भोर के संग

ऑक्सीजन निकली

बाग की सैर

7

बाग की बेंच

बीमार, बूढ़ा साथी

करती याद

8

मस्ती का ठेला

बचपन उत्सव

यारों का मेला

9

सपनों से बना

बचपन का घरौंदा

उम्र ने रोंदा

-0-

ऋतुराज दवे(7976327054),राजसमन्द,राजस्थान

-0-

3- रिदम ‘यश’ ( बाल हाइकुकार)

1

स्वेटर मेरा,

सबसे करीब है

जैसे हो दोस्त।

2

भाग -भागके

ठंड भगाता हूँ मैं

जैसे खिलाड़ी।

3

सूरज डूबा

कंबल व रजाई

झट से जागे।

4

शीतकालीन

छुट्टियाँ लग जातीं

दुबके सभी।

5

रात अँधेरी

सुबह है कुहरा

शाम रंगीन।

-0-

द्वारा-मंजूषा मन

Project Officer,Ambuja Cement Foundation,Rawan (chhattisgarh)

Mo. 98268-12299

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 2, 2018

1818

1-कमला निखुर्पा

गुजरा दिन

फिर नए साल का

तुम्हारे बिन।
-0-

2-रमेश कुमार सोनी

1

सभी कहते

पुराने दिन अच्छे

यादों में जिन्दा।

2

काँटों की राह

आओ नवल वर्ष

फूल खिलाओ ।

3

फाक़ों में बीता ,

हे नई भोर देना

भोग को दाने ||

4

वर्ष बदले

सवाल वहीं खड़े

जवाब माँगे ।

5

बीता जो वर्ष

पूर्ण विराम लिये

कहानी बना ।

6

फिर मिलेंगे

कह जाता है वर्ष

कभी ना मिला ।

-0-

3-डॉ.अखिलेश शर्मा
1

हवा हो गए
बचपन के स्वप्न
परी बनके
2

घायल नींद
सामाजिक कुरीति
बेटी सयानी
3

रचना-धर्म
कर्म प्रतिबद्धता
पंछी सिखाते।

4
शाश्वत सत्य
लयबद्ध ब्रह्माण्ड
है निराकार

5

मन है प्यासा
शोषित अभिलाषा
जीने की आशा

-0-296,कालानीनगर,एयरपोर्ट रोड़,इन्दौर

-0-

4-डॉ.पूर्णिमा राय

1
रंग-बिरंगी
अधखिली कलियाँ
नव उमंग !!
2
जग के मेले
सूर्य भी सुनहला
नवल भोर!!
3
मन की बात
कहता दिनकर
नव कली से!!
4
नव वधू-सी
उल्लासमय भोर
नववर्ष की!!
5
बीती रजनी
दिल से हो मिलन
नए साल में!!
6
चहकी धूप
मचली तितलियाँ
नवेली सोच!!
7
नव वधू-सी
किरणें उमंगों की
खिली प्रकृति।
8
हुआ सवेरा
दृढ़ संकल्प लिये
जागी चिड़िया।
9
नया उजास
द्वार खटखटाए
दिखे मुस्कान।
10
प्रेम खुश्बुएँ
आ रहीं हैं फूलों से
नव तरंग!!
-0-
डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर (पंजाब )
वेबसाइट-www.achintsahitya.com

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 28, 2017

1817

1- डा.सुरेन्द्र वर्मा

1

आँखें हैं नम 

काँप रहे हैं होंठ 

विदाई वेला 

2

गरीब बेचारा

बीरबली  खिचड़ी 

तारों से तापे 

3

गर्दिश मारे 

आसमान को ओढ़ें 

ज़मीं बिछाएँ 

4

पंख सिकोड़े 

शाल ओढ़े गौरैया 

ढूँढ़ती धूप 

5

प्रात: प्रणाम 

सूर्यास्त को भी किन्तु 

करो नमन 

6

बाज़ न आए 

सूर्य करे ठिठोली 

सर्द मौसम 

7

बेमुरव्वत 

ओढ़ कर कोहरा 

सूरज सोया 

8

रात अँधेरी 

उजेले के क़तरे 

जुगनू , तारे 

9

साँझ समेटे 

आभा अकल्पनीय 

ढलता सूर्य 

10

सुबह शाम 

सूर्य को नमस्कार

स्वागत – विदा 

-0-

डा.सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी , १, सर्कुलर रोड,  इलाहाबाद – २११००` 

-0-

2-डा.राजीव कुमार पाण्डेय

1

सिंदूरी भाल

चेहरा सुर्ख लाल

प्रेम-कमाल।

2

माथे की बिंदी

सुहाग का तिलक 

जन्मों का रिश्ता।

3

कानों की बाली

नथ की सजावट

शोभा अपार।

4

होंठ रँगीले

प्रस्फुटित अक्षर

खिलते पुष्प।

5

तिरछी दृष्टि

नयनों का काजल

पिया बुलाये।

6

कष्ट हरण

करता आजीवन 

मंगलसूत्र।

7

गले का हार

अलौकिक शृंगार

सुखी संसार।

8

दोनों कलाई

खनकती चूड़ियाँ

छेड़ती राग।

9

अँगूठी नग

शकुंतला मिलाए

भूला दुष्यंत

10

मेहँदी सजी

गोरी के हाथों पर

पिया- स्मरण

11

छटा बिखेरे

कमर करधनी

लचक चली।

10

पाँव पैंजनी

छम छम वादन

आजा साजन।

11

पडे आँगन

महावरी चरण

मनभावन।

-0-पता 220 जी रामनगर,गाजियाबाद

dr.rajeevpandey@yahoo.com

-0-

3- डा.सुरंगमा यादव

1

प्रेम रतन

आलोक किरन -सा

छिप न पाए।

तेज आँधियाँ

बुझा सकीं न दीप

तेरी यादों का।

रात अँधेरी

कर गये रंगीन

स्वप्न तुम्हारे।

-0-असि0 प्रो0 हिन्दी,महामाया राजकीय महाविद्यालय महोना,लखनऊ

 dr.surangmayadav@gmail.com

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