Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 27, 2022

2297

डॉ.कुँवर दिनेश सिंह

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Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 24, 2022

2296-मृत्यु सत्य है

 डॉ. जेन्नी शबनम

1.

शाश्वत आत्मा

अपनों का बिछोह

जेन्नी-2रोती है आत्मा।

2.

लिप्सा अनन्त

क्षणभंगुर प्राण

लोभी मानव।

3.

काम न आता

काल जब आ जाता

अकूत धन।

4.

यम कठोर

आँसू से न पिघला,

माँ-बाबा मृत।

5.

समय पूर्ण,

मनौती है निष्फल,

यम का धर्म।

6.

यम न माना

करबद्ध निहोरा

जीवन छीना।

7.

हारा मानव,

छीन ले गया प्राण

यम दानव।

8.

आ धमकता

न चिट्ठी न सन्देश

यम अतिथि।

9.

मौत का खेला

कोरोना फिर खेला

तीसरा साल।

10.

मन बेकल

जाने कौन बिछड़े

कोरोना काल।

11.

यमदूत-सा,

कोरोना प्राण लेता

बहुत डराता।

12.

कोहराम है

कोरोना के सामने

सब लाचार।

13.

थमता नहीं

कोरोना का क़हर

श्मसान रोता।

14.

मालिक प्राण

जब चाहे छीन ले

देह गुलाम।

15.

मृत्यु का पल

अब समझ आया

जीवन माया।

16.

लेकर जाती

वैतरणी के पार,

मृत्यु है यार।

17.

पितृलोक है

शायद उस पार,

सुख-संसार।

18.

दुःख अपार

मिलता आजीवन,

निर्वाण तक।

19.

धम्म से आई

लेकर माँ का प्राण

मौत है भागी।

20.

बिना जिरह

मौत की अदालत

मौत की सज़ा।

21.

वक़्त के पास

अवसान के वक़्त

नहीं है वक़्त।

22.

मौत बेदर्द

ज़रा देर न रुकी,

अम्मा निष्प्राण।

23.

आस का दीया

सदा के लिए बुझा,

मौत की आँधी।

24.

निर्दय मौत

छीन ले गई प्राण

थे अनजान।

25.

मृत्यु का खेल,

ज़रा न संवेदना

है विडम्बना।

26.

ज़रा न दर्द

मौत बड़ी बेदर्द

हँसी निर्लज।

27.

ताक़त दिखा

मौत मुस्कराकर

प्राण हरती।

28.

माँ को ले गई

डरा धमकाकर

मौत निष्ठुर।

29.

पितृधाम में

मृत्यु है पहुँचाती,

मृत्यु-रथ से।

30.

मौत ने छीने

हमारे अपनों को,

हृदय जख्मी।

31.

खींच ले चलो,

यम का फरमान

जिसको चाहे।

32.

रुला-रुलाके

तमाशा है दिखाती

मौत नर्तकी।

33.

बच्चे चीखते

हृदय विदारक,

मौत हँसती।

34.

मृत्यु सत्य है

बेखबर नहीं हैं

दिल रोता है।

35.

आ धमकती

मग़रूर है मौत

साँसें छीनती।

36.

निगल गई

मौत फिर भी भूखी

हजारों प्राण।

37.

सब भकोसा

आदमी और पैसा

भूखा कोरोना।

38.

मृत्यु की जीत

जीवन-मृत्यु खेल,

शाश्वत सत्य।

39.

मौत का यान

जबरन उठाकर

फ़ुर्र से पार।

40.

सहमी फिज़ा

ठिठकी देख रही,

मौत का जश्न।

41.

स्थायी बसेरा,

किराए  का संसार

मृत्यु का घर।

42.

हजारों मौत

असामयिक मौत,

खून के आँसू।

43.

देख संसार

मौत बना व्यापार

बेबस काल।

44.

होते विलीन

अपने या पराए,

मौत से हारे।

45.

संदेश डरी

दिल है दहलाती

मौत की पाती।

46.

मौत– कटार

दिल जिसपे आए

करती वार।

47.

निष्प्राण प्राणी

मौत से कैसे लड़े

साँसों के बिन।

48.

क्रूर नियति

मज़ाक है उड़ाती

मौत की साथी।

49.

खून ही खून

मौत है नरभक्षी,

किसकी बारी।

50.

असह्य व्यथा

सबने है समझा,

मौत निर्बुद्धि।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 17, 2022

2295

1-दिनेश चन्द्र पाण्डेय

1

निर्झर झरा

निसर्ग का वो सर्ग

रंगीला हरा

2

सर्दीली भोर

नाश्ते की मेज पर

धूप पसरी

3

झूमते फूल

तितली मदरा

रंगों का मेला

4

गरजे मेघ

भागती फिरी धुंध

पहाड़ भर

5.

सर्द दिवस

सिहरे झील पर

 तट के वृक्ष

6.

वर्षा की बूंदें

पत्ते झुक झुकके

सलामी देते

7.

मुस्कान खिली

नैनों से टूट गया

पाषाण मौन

8.

दादी का चौथा

तुलसी का बिरवा

सिधार गया

जागते गीत

स्त्रियों से दुखों पर

रोया न गया

भाई को लाने

बेटी को भेजा स्वर्ग

माता-पिता ने

-0-दिनेश चन्द्र पाण्डेय, 8/450 जानकी सदन, जेलरोड, हल्द्वानी, जनपद-नैनीताल, उत्तराखंड, पिन-263139

 -0-

 2-रश्मि विभा त्रिपाठी

 1

ओ प्यार मेरे!

मंदिर के देवता

मैं द्वार तेरे!!

2

नहीं जानती! 

ईश्वर का मैं रूप- 

तुम्हें मानती!!

3

तुम्हारी याद!

नहीं मन से जाती

छाया- सी साथी!!

4

हुई रू- ब- रू! 

तो जी उठी, दुआ- से

तुम हू-ब-हू!!

5

बैठी पिरोती 

मैं तेरी प्रतीक्षा में

तारों के मोती।

6

तुमने देखा!

बदल ही जाएगा 

भाग का लेखा।

7

आ गया अब

मुझे जीवन रास

तेरा आभास!

8

तुम हो दूर!

तो हैं बीसों फितूर 

मेरे मन में!!

9

प्रेम के मंत्र 

फूँक दो, वर्ना यंत्र 

बन जाऊँगी!

10

टूटे मन के

तार झनझनाए 

तुम जो आए!

11

गंगा की धार

खोले मोक्ष के द्वार 

तुम्हारा प्यार!

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 14, 2022

2294

डॉ. सुरंगमा यादव 

1

SURANGAM YADAVरोमन हिन्दी*
आधुनिकता भूली
हिन्दी की बिन्दी।
2
हिन्दी हमारी
हम सब हिन्दी के
गर्व से कहें।
3
भारत श्रेष्ठ
संस्कृत की दुहिता
हिन्दी है ज्येष्ठ।
4
हिन्दी का मन
‘मानस’* बनकर
सबमें व्याप्त।
5
शब्द- कमान
कोमल-कटुतम
भाव संधान।

6
हिन्दी आसान
लिखना औ’ बोलना
एक समान।
7
व्यवस्था में
अंगदी पाँव बनी
अंग्रेजी तनी।
8
न्याय की भाषा
अंग्रेजी बन बैठी
व्यवस्था कैसी!

* हिन्दी को रोमन लिपि में लिखने का चलन।
* रामचरित मानस

Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 11, 2022

2293-गुलाब तो खिलेंगे !

देअवदारु -दिनेश जी

 

1

वक्त सोने का
देवदार नहाते
चाँदनी तले!

 

 

 

 

2
आँखें छत पे
मकड़ी नहीं हिले
निद्राकुल मैं!

गुलाब

 

3

विमुख तुम
गुलाब तो खिलेंगे
समय पर!

 

 

 

 

4
स्मृति पुर में
बुराँश खिलें जहाँ
पुकारूँ तुझे!

5
उत्साह भरा
गान गा रहे पंछी
नए दिन का!

 

बाँस

 

6

आवारा हवा
बाँस गुनगुनाएँ
प्रकृति दवा!

 

 

 

 

 

 

7

रात जगी है
शहर मशग़ूल
आस लगी है!

 

 

भँवरा

8

भँवरा व्यस्त
फूलों की लंबी सूची
नशे में मस्त!

 

 

 

9
होगा अकर्म 
तितलियाँ देखना
रुचिर मुझे!

चिनार

 

10

पतझर में
हरे से सुनहरे
चिनार हुए!

 

 

 (चित्र -संयोजनःडाॅ. कुँवर दिनेश सिंह)

-0- डाॅ. कुँवर दिनेश सिंह
कवि. कथाकार. समीक्षक ,प्राध्यापक (अँग्रेज़ी) एवं संपादक: हाइफ़न
#3, सिसिल क्वार्टर्ज़, चौड़ा मैदान ,शिमला: 171004 हिमाचल

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 10, 2022

2292

प्रियंका गुप्ता

1

मन झुलसा

गरमी थी बहुत

चारों तरफ ।

2

भूल गई मैं

प्रेम की परिभाषा

याद दिला दो ।

3

थकूँगी नहीं

पथरीली डगर

जीतना ही है ।

4

रुकी थी बस

तुमने सोचा, हारी;

भ्रम था तेरा।

5

चलना पड़ा

काँटों भरी राह पे

फिर भी जीती ।

Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 4, 2022

सुख-दुःख

रश्मि विभा त्रिपाठी

7-RASHMI VIBHA TRIPATHI1

चलें चालाकी

सारे सगे- सम्बन्धी

क्या रहा बाकी?

2

कोई न चारा!

अपनों के घात से

मन ये हारा।

3

बदल गया

रिश्ते- नातों का प्यार

बना व्यापार।

4

मैंने रिश्तों को

प्यार से था तराशा

पाई हताशा।

5

हो गया प्यार

अब सबके लिए

एक बेगार!

6

मेरे ही खास

दे रहे जब त्रास

किससे आस?

7

कहाँ राहत?

हो रहा घर में ही

महाभारत।

8

घर में युद्ध

गए जैसे ही बुद्ध

निर्वाण लेने।

9

अपना प्यार

आज दुश्मन बना

बैठा तैयार।

10

क्यों न दूँ आज?

रिश्तों को तिलांजलि

कोढ़ में खाज!!

11

नहीं उपमा!

जैसा भारी सदमा

सम्बन्ध देते।

12

कैसा जुनून!

खून के रिश्ते आज

पी रहे खून।

13

जला जब जी

रिश्तों ने आग में घी

चाव से डाला!

14

पहुँच गए

संबंध कचहरी

भावना मरी!

15

स्वर्ग से पिता

देख रहे जलती

रिश्तों की चिता।

16

करूँ क्या गिला

मैं दुश्मनों से, मिला

जो अपनों से।

17

करें कपट!

भाई, बहन, माता

बचा! विधाता!!

18

करते छल!

कुछ कहा तो पड़े

माथे पे बल।

19

दुख दुसह!

नाते नौ- दो- ग्यारह

नियम यह!!

20

हम हैं साथ!

झूठमूठ की आशा

आई है हाथ।

21

मुझे दुख ने

लील लिया समूचा

किसने पूछा?

22

 कितना लड़ी!

फिर भी मुश्किलों की

टूटी न लड़ी।

23

करता जी- जी!

सच बोलने से जी

क्यों चुराता तू।

24

उमर भर!

रिश्तों से जो भी मिला

जी गया भर।

25

रिश्तों के आज

हुए हैं जो दो पाट

कैसे दें पाट।

26

कोई है भला!

आज किसी का चाहे

दिल से भला।

27

हे मेरे राम!

किसी से राम- राम

अब न रही।

27

आँखों में जल!

मन में आग भरी

रहे हैं जल।

28

रो रहे भाव!

अब नहीं पूछता

कोई भी भाव।

29

बची न शान!

उसने जुबान पे

धरी जो शान।

30

गम की हवा

रिश्ते हो गए हवा

उजाड़ बचा।

31

तुम्हारी बात!

निराशा की निशा में

शुभ प्रभात!!

32

क्या प्रतिकूल?

अँजुरी में भरे हैं

दुआ के फूल!

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 2, 2022

2290

कपिल कुमार

1

नभ में मेघ

अँगडाई तोड़ते

खाट पे पड़े। 

2

जेठ की धूप

ज्यों पुलिस-दबिश

छाँव ढूँढते। 

3

भादों ज्यों बीता

मेघ भी चल दिए,

गठरी बाँध। 

4

भादों के मेघ

मुँह को लगाम दो

या खूब पड़ो। 

5

खेतों के स्वप्न

मिट्टी में मिला दिए

मेघ तुमने। 

6

बिना वर्षा के

खेत-खलिहानों की

मिट्टी पलीद।

7

नदी-बीमार

मेघ तुम जानते

मर्ज की दवा।

8

मेघ बरसों

एक सूत्र में बाँधों

सूखी-नदियाँ।

9

खेतों का मेघ

बेड़ा पार लगाना

वक़्त पे आना। 

10

मेघ भी बने

किसानों के दुश्मन

ज्यों टिड्डीदल। 

11

भादों ज्यों बीता

खेतों का मन रहा

रीता का रीता। 

12

मेघ अबके

तेरे जाऊँ सदके

वक़्त पे आना। 

13

चाँद-चाँदनी

एक चाल चलना

तम-ऊपर। 

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 31, 2022

2289

रश्मि विभा त्रिपाठी

1
आँगन गीला
छप- छप आवाज
मन ये सीला!
2
बरखा रानी!
बादल अनुचर
ढो रहा पानी।
3
बूँदें बाँधके
पानी- जड़ी पायल
रहीं उछल।
4
बूँदों ने सही
बिजली की झिड़की
आँसू में बही।
5
बूँदें चंचल
टूटे छप्पर पर
चलातीं नल!
6
लगती मैली
काँधे लटकी थैली
नभ ने धोई!
7
गले लगा ज्यों
मौसम से सावन
आँखों में भादों।
8
बुँदिया नन्ही
आँगन में मस्ती से
नाच- गा रही।
9
सजाके साज
बूँदों ने दी आवाज
नाच लो आज।
10
बूँदें जो हँसीं
घनघोर घटाएँ
आँखों में बसीं।
11
बूँदों की थाप
दामिनी का आलाप
मेघ- मंच पे।
12
घटाएँ काली
बिजली देती गाली
वर्षा रुदाली!
13
ओ बिज्जु बाला!
अम्बर की स्लेट पे
क्या लिख डाला!!
14
सेत खड़िया!
बिजुरी की ओलम
बड़ी बढ़िया।
15
सूर्य कराहा
नभ ने भीगा फाहा
माथे पे धरा।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अगस्त 30, 2022

2288

1-कपिल कुमार

1

वक़्त ने डाले

जिंदगी के साँचे में

तम-उजाले। 

2

जीवन-चित्र

कुम्हार घड़ा गढ़े

बड़ा विचित्र। 

3

नभ में घटा

बाज चीरके कहें

ओ! दूर हटा। 

4

बजाके ढोल

नभ बूँदें बिखेरे

गोल-मटोल। 

5

मेघ ज्यों रूठे

खेतों के स्वप्न टूटे

पल्लव प्यासे। 

6

रवि ज्यों जागा

बोरी-बिस्तर उठा

तिमिर भागा। 

7

जुगनू देते

रात भर पहरा

ज्यों चौकीदार। 

8

रवि जा छुपा

आलीशान– सा घर

क्षितिज पर। 

9

बैठी थी ओस

दूब के सिरहाने

पैर दबाने। 

10

मनुष्य-देह

क्षण में उड़ती, ज्यों

चिड़िया फुर्र। 

-0-

2-श्याम सुन्दर अग्रवाल, जबलपुर
1
थकी सी आँखें
देखा जो दिखना था
ये सोना चाहें ।
2
बबूल बोया
आम नहीं उपजा
फिर क्यों रोया ।
-0-

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