Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 6, 2020

2043

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 4, 2020

2042

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 2, 2020

2041

1-कमला निखुर्पा

1

थमी जिंदगी

सरपट दौड़ेगी

कभी न कभी।

2

सूने शहर

डरी डरी गलियाँ

कनबतियाँ।

3

खुश हैं खग

कलरव करते

भरें उड़ान

4

वन विहँसे

जीव मगन मस्त

नदियाँ नाचें।

5

प्रकृति- माता

सिखलाती सबक

शिशु नादान ।

-0-

2-डॉ, सुरंगमा यादव

1

तुम्हें निहारूँ

पलकों का परदा

गिरने न दूँ ।

2

रखा सँभाल

रुमाल में लिपटा

तुम्हारा प्यार।

3

तुमको पाया

वैशाख तपन में

सावन आया।

4

अपनापन

सहज सुने मन

मौन क्रन्दन ।

5

यादों में खोयी

बिन बोले सुन लूँ

कागा की बोली ।

6

तुम जो आए

सुगंध ने आकर

दे दी दस्तक ।

7

नेह छिपाऊँ

अधरों की मुस्कान

करे बखान ।

8

चाँद -चलनी

छन रही चाँदनी

छाने यामिनी ।

9

निकला चाँद

रजत का दर्पण

नभ के हाथ ।

10

निखरा खूब

चाँद को देखकर

निशा का रूप ।

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 1, 2020

2040

1-डॉ हरदीप सन्धु

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2-सुदर्शन रत्नाकर

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Posted by: हरदीप कौर संधु | मई 31, 2020

2039

1-सीता की पीर – डॉ.जेन्नी शबनम

1.

राह अगोरे

शबरी-सा ये मन,

कब आओगे?

2.

अहल्या बनी

कोई राम न आया

पाषाण रही।

3.

चीर– हरण,

द्रौपदी का वो कृष्ण

आता न अब।

4.

शुचि द्रौपदी

पाँच वरों में बँटी,

किसका दोष?

5.

कर्ण का दान

कवच व कुंडल,

कुंती बेकल।

6.

सीता है स्तब्ध

राम से तिरस्कार

भूमि की गोद।

 7.

सीता की पीर

माँ धरा ने समेटी

दो फाँक हुई।

8.

स्पंदित धरा

फटा धरा का सीना

समाई सीता।

9.

त्रिदेव शिशु,

सती अनसूइया

आखिर हारे।

10.

सती का कुंड

अब भी प्रज्वलित,

कोई न शिव।

-0-

2-परमजीत कौर ‘रीत’

1

बहे निर्बाध

समय का झरना

रंग बदले ।

2

आज हैं दिन

कल को बड़ी रातें

समय-फेरी ।

3

सत्य कम्पास

जीवन जलयान

सुमार्ग मिले ।

4

सेंध घर में 

दीवारें  दोषहीन

घुन का खेल ।

5

मन-दरिया

दुःख-सुख कंकर

चखता चले ।

6

इंद्रधनुष

आनंदित हृदय

देखता नित्य ।

7

संत महात्मा,

टूटता हुआ तारा

मुरादें बाँटें ।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | मई 30, 2020

2038

प्रकृति के सौन्दर्य की चित्रशाला

-डॉ. लोकेश्वर प्रसाद सिन्हा

पेड़ बुलाते मेघ ‘हाइकु संग्रह, रमेश कुमार सोनी,प्रकाशक – सर्वप्रिय प्रकाशन – दिल्ली, मूल्य -310 रु.,  संस्करण 2018, आई एस बीएन 978-81-936634-4-8

            जापानी विधा की हिंदी साहित्य लेखन के लिए छत्तीसगढ़ ही नहीं वरन पूरे भारत वर्ष में बसना, एक जानी-पहचानी जगह है। ये वही स्थान है , जहाँ छत्तीसगढ़ का प्रथम हिंदी हाइकु संकलन ‘रोली अक्षत’:रमेश कुमार सोनी, सन् 2004 में  प्रकाशित हुआ। 

            रमेश कुमार सोनी का दूसरा हाइकु संग्रह – ‘पेड़ बुलाते मेघ’  की भूमिका वरिष्ठ हाइकु लेखिका – डॉ. सुधा गुप्ता – मेरठ ने लिखी है। हाइकु 5, 7, 5 = 17 वर्णों के विन्यास में  जापानी विधा की एक त्रिपदी सम्पूर्ण हिंदी कविता है; इसमें कविता के समस्त तत्त्व मौजूद होते है, इसके लिए कहा गया है कि- देखन में छोटे लगे घाव करे गंभीर …। गागर में सागर वाली कहावत भी इसके लिए लागू होती है, आजकल यह विधा किसी परिचय की मोहताज नहीं है।

            इस संग्रह में – शारदे का सहारा, चीखे बेटियाँ, वो क्या है, प्रीत नगर, सृष्टि महके, चिड़िया रानी, मौसम के अंदाज, मौसम बिगड़ा है, स्वच्छता अपनाएँ, पानी बाजार, भोर से साँझ, चौदहवीं का चाँद, उत्सव, रिश्तों की संजीवनी, जीत का बीज, किराये का मकान और दुनियादारी जैसे उपशीर्षकों में लगभग 705 हाइकु समाहित हैं; यह अब के किसी लेखक के द्वारा एकल प्रकाशित हाइकु में सबसे ज्यादा हाइकु के साथ प्रस्तुत हुआ है। डॉ. सुधा गुप्ता जी ने भूमिका में इसे – प्रकृति के सौन्दर्य की चित्रशाला…. की उपमा दी है। आपके सभी हाइकु बिलकुल नए अंदाज के साथ आपकी संवेदनाओं का अद्भुत चित्रण करते हैं, ठेठ गाँव से लेकर वैश्विक स्तर तक आपकी सोच, विचार को शब्दांकित करते हुए ये हाइकु सभी को पढ़ने के लिए बरबस ही आमंत्रित करता है। आप सभी पाठक इनके हाइकु ब्लॉग – अक्षरलीला में भी पढ़ सकते हैं। आपने अपनी नई हाइकु पीढ़ी को तैयार करने कई कार्यशालाओं का भी आयोजन अपने विद्यालय में किया है।

            अपनी साहित्यिक सक्रियता से प्रकृति के अनुभूत क्षणों का सुन्दर वर्णन इन हाइकु में एक नया सौन्दर्य बोध उत्पन्न कर रहा है-

बाँस जंगली/कमसिन हसीना/बैले नाचती।।

भुट्टे का स्वाद/भीगा मौसम जाने/पींगे बढ़ाते।।

फूल चाहते/खुशबू जिन्दा रहे/इत्र हो जाते।।

लू, बाढ़, ठण्ड/बैरी मौसम मारे/चुन-चुन के।।

            मौलिक विचारों से लैस हाइकुकार पर्यावरणीय समस्याओं का ना सिर्फ मार्मिक चित्रण करता है ; बल्कि इसके समाधान को भी प्रस्तुत कर रहा है –

चिल्लपों -शोर/बैंड,पटाखे, जोर/तमाशा मोर।।

पाखी बुलाने/पेड़ लगाया मैंने/वे जा चुके थे।।

जग बीमार/धूल, धुआँ, मच्छर/दौड़ो बचाओ।।

            आपके सामाजिक हाइकु का यहाँ कोई सानी नहीं है;  क्योंकि ये रिश्तों की मर्यादाओं को घर की चहारदीवारों से पुकार लगाते हुए वैश्विक स्तर तक इसके चित्रण को ले गए हैं; आप इन रिश्तों की अहमियत को बड़ी शिद्दत से बताने के साथ-साथ इन्हें बचाने/ सँवारने की भी अपील करते हैं-

रिश्ते निभाने/सब पीछे रहते/भुनाने आगे।।

गधे को काका/वक्त बदले रिश्ता/स्वार्थ से नाता।।

रिश्तों की खेत/प्यार सौहार्द माँगे/खुशी उगाने।।

            मौसम की मस्ती, प्रकृति का संगीत, बसंत की रंगीनियाँ, पतझड़ का शोक, परिंदों का कलरव, के अलावा नई दुनिया की समस्याएँ- कन्या भ्रण हत्या, पानी बाजार, दुनियादारी और स्वच्छता अपनाएँ जैसे ज्वलंत विषयों पर भी आपने अपनी बेबाक राय इस प्रकार रखी है-

भ्रण में कन्या/किसकी सजा भोगे/हत्यारे बचे।।

आबादी बढ़ी/‘यूज़-थ्रो प्रणाली में/आबाद कूड़ा।।

पानी महँगा/दूध की मत पूछ/छाछ बिकता।।

नेता के सगे/अधिकारी से रिश्ते/चरो बगीचे।

            इस अंक के ये हाइकु आध्यात्म की दुनिया तक हमें ले जाने में कामयाब हुए हैं –

मन परिंदा/दुनिया है पिंजड़ा/चार दिन का।।

दुःख गुर्राता/नाचे सुख नटनी/पैसों की रस्सी।।

जग पिंजड़ा/सीखता वही बोले/तोता आदमी।।

            प्रीत नगर, चौदहवीं का चाँद और उत्सव पर ग्लोबल विलेज के कारण होने वाले परिवर्तनों की भी आपकी चिंता स्पष्ट रुप से परिलक्षित हुई है –

अम्बर शय्या/पसरे फैला चाँद/देखो तो भैया।।

तन रँगने/दौड़ती सारी टोली/मन ना रंगे।।

सागर जाने/राज खारेपन का/वो नहा गई।।

            आपके हाइकु संसार में छत्तीसगढ़ के माटी की सोंधी गंध को महसूस किया जा सकता है –

गोदना फूल/चिर  शृंगार सजे/सदा महके।।

गेहूँ, सरसों/मड़ई-मेला घुमे/खुशी से झूमे।।

फुगड़ी खेले/गिलहरी-परिंदे/पेड़ गिनते।।

चोर का शोर/गायों की खड़फड़ी/चिल्लाते बोली।।

            पेड़ बुलाते मेघ के सभी हाइकु में अपनी अलग शैली की कसावट है जो पाठक को अकेला नहीं छोड़ती बल्कि ये उन्हें अपनी दुनिया में बहा कर ले जाती हैं। प्रत्येक विषयों के लिए अलग – अलग उत्कृष्ट हाइकु प्रस्तुत हैं इनमे एक अनोखे प्रकार का नयापन है जो आसानी से पाठकों के दिलों में गहराई से उतर जाने की क्षमता रखते हैं। आशा है कि ये हाइकु पाठकों को अवश्य पसंद आएगी और यह संग्रह हाइकुकार को हिंदी साहित्य के क्षेत्र में एक नयी पहचान देगा तथा इस संग्रहणीय अंक के साथ छत्तीसगढ़ को भी गौरव प्राप्त होगा।

-0-डॉ.लोकेश्वर प्रसाद सिन्हा,सहायक प्राध्यापक ,स्नातकोत्तर हिंदी विभाग ,दुर्गा महाविद्यालय रायपुर (छत्तीसगढ़)
9770197877
Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 29, 2020

2037

1-प्रियंका गुप्ता

1

पूस की ठंड

रजाई ओढ़कर

सोई थी रात ।

2

इतनी ठंड

बिना स्वेटर काँपे

सूर्य बेचारा ।

3

दर्द का मारा

ढूँढता मरहम

दिल बेचारा ।

4

ठंड की मार

घुटना- सीना एक

करे चीत्कार ।

5

फूल औ’ शूल

एक डाली पे खिले

कित्ते अलग !

6

लुढ़की पड़ी

तट पर अकेली

यादों की तरी ।

7

कौन पुकारे

परायों के देस में

तुम्हारा नाम ?

8

तक के मारे

बहेलिया समय

करूँ चीत्कार ।

9

पंछी अकेला

बहेलिए का जाल

करे चीत्कार ।

10

याद करूँ मैं

माँ के गले लिपट

लोरी सुनना ।

11

ढूँढती फिरूँ

मूँज की चारपाई

तारों की छाँव ।

12

कोई न आता

पनघट हैं सूने

वक़्त की मार ।

13

धूप गर्माई

कहाँ जाकर छिपी

ओस की बूँदें ?

14

कुकुरमुत्ते

उगे न बेवज़ह,

नमी है वहाँ ।

15

तितलियाँ भी

अब दिखती नहीं

सूने बगीचे ।

16

तूने दी चोट

मरहम न मिला

घाव गहरा ।

-0-

2-सविता अग्रवाल ‘सवि’ (कैनेडा)

1

प्रचंड गर्मी

लाओ मेघ -कहार

डोली में बिठा ।

2

सूर्य क्रोधित

दिखा रहा प्रकोप

सभी हैं त्रस्त ।

3

तृषित धरा

लिए मेघों की आस

जोहती बाट ।

4

जीव तरसें

देखें नभ की ओर

काले जलद ।

5

कोमल पात

तरु अंक समाये

हुए निहाल ।

6

मन चंचल

व्यर्थ सब प्रयास

बाँध न पाऊँ ।

7

अभिलाषाएँ

दफ़न हैं हिय में

पाँव- जंजीरें ।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | मई 27, 2020

2036

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 24, 2020

2035

Posted by: हरदीप कौर संधु | मई 22, 2020

2034

रमेश कुमार सोनी 

पेड़ कटे हैं

हल्ला-पानी पिलाओ 

लू मौत गिने । 

न्याय माँगते 

मोमबत्ती की रैली 

दरिंदे हँसे ! 

युवा गौरैया 

गोद भराती डरे 

भ्रूण की जाँच ।       

खेत लिखते 

बाज़ार ही जाँचेंगे 

भूख का पर्चा ।      

मक्के के खेत 

खो-खो खेलते तोते 

प्रेम पकता ।      

मत्स्य उमंग 

जलपरी तैरती 

आग लगाती    

जामुन फले 

पेड़ का काला टीका 

बुरी नज़र ।     

मेघ के छौने 

गगन नाप देते 

घमंड तोड़े ।  

9

सूर्य सुखाता 

उपले भित्ति टँगे 

गाँव की यात्रा ।

10 

जहाजी पक्षी 

वस्त्र बदल थका 

यात्रा एकाकी ।

11

सैन्य चयन 

शहीद की विधवा 

जौहर काँपे ।

-0-

रमेश कुमार सोनी ,जे पी रोड – बसना ,जिला – महासमुंद , छत्तीसगढ़ 

7049355476 

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