Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 18, 2017

1769

आज डॉ सुधा गुप्ता जी का जन्म दिन है। आज वे कर्मशील जीवन के 83 वर्ष पूरे करके 84वें वर्ष में प्रवेश कर रही हैं।हाइकु-ताँका सेदोका-चोका और हाइबन के क्षेत्र में वे अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी हैं।समूचे हिन्दी -जगत को आपकी प्रतिभा और कर्मठता पर गर्व है।पूरा हाइकु परिवार आपके शतायु होने की मंगलकामना करता है। इस अवसर पर आपके कुछ चुने हुए हाइकु दिए जा रहे हैं।

डॉ हरदीप कौर सन्धु -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ]

1

लाल गुलाल

पूरी देह पे लगा

हँसे पलाश ।

2

युवा वैष्णवी

जोगिया टेसू धारे

वन में खड़ी ।

3

नाज़ुक कली

आग की लपटों में

धोखे से जली ।

नीड़ बेकार

शावक उड़ गए

पंख पसार ।

5

आँख छलकी

पहाड़ी संगीत-सी

शाम टीसती ।

6

चिनार-वन

फिर से लगी आग

जी हुआ ख़ाक ।

7

यादों की फाँस

निकलती ही नहीं

किरक रही ।

8

काठ के घोड़े,

चलता तन कर

माटी-सवार ।

9

चाँदी की नाव

सोने के डाँड लगे

रेत में धँसी ।

10

चिनार पत्ते

कहाँ पाई ये आग

बता तो भला।

11

आकाश बोला-

कोई एक बादल

गोद तो भरे।

12

जोगी वे पत्ते

पेड़ों के घर छोड़

निकल पड़े ।

13

लुक-छिपके

चार-दीवारी फाँद

आ कूदा चाँद।

14

तारों की  हँसी

हँसता है आकाश

लगती भली ।

15

लुप्त हैं वापी

खो गए सरोवर

गायब  हंस ।

-0- 2 

बहुत दिनों बाद 2 अप्रैल  2017 को सुधा दीदी से  मेरठ में मिला। दीदी ने तिलक लगाकर, अक्षत न्योछवर कर , नारियल भेंट किया और शॉल ओढ़ाया।ओढ़ाया।मुँह मीठा कराया। मेरे लिए इससे बड़ा उत्सव कुछ नहीं हो सकता। उसी अवसर के कुछ पल आपसे साझा कर रहा हूँ।

रामेश्वर काम्बोज


Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 15, 2017

1768

माँ

1-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

ईश्वर कहे-

मुझसे ज़्यादा दर्द

सिर्फ़ माँ सहे।

2

माँ को सताना

इसी जन्म में तय

नरक पाना।

3

बेटी का मान

सबसे बड़ी पूजा

जीवन-स्वर्ग।

4

वासना- कोढ़

छल की ओट में तू

इसे न ओढ़।

-0-

2- पुष्पा मेहरा

1

घर-आँगन

माँ देती है रोशनी

मोमबत्ती -सी  ।

2

काँपे थे पग

माँ ने उँगली थामी

जागा विश्वास ।

3

संस्कार-बीज

माँ ने मुझमें पोसे

गहरे जमे ।

4.

आशीष-छड़ी

माँ के हाथों ने फेरी

जादू हो गया !!

5

माँ जो मुस्काई

अँधेरे को मिली है

तारों की छाँव।|

-0-

Pushpa.mehra@gmail.com

-0-

3-डॉ.सरस्वती माथुर

1

मन में बसी

हम रोए,माँ रोई

हँसें ,तो हँसी ।

2

वात्सल्य- भरी

उँगलियाँ फिराती

माँ लोरी गाती।

3

जगाती है माँ

बचपन की भोर

 प्रीत -अगोर ।

4

माँ का क्या मोल

बनी नहीं तराज़ू

वो अनमोल

5

बड़ी गहरी

सागर की लहरों में

माँ है प्रहरी ।

6

माँ है विश्वास

कितनी रहे दूर

लगती पास ।

7

माँ है रोशनी

बच्चों के जीवन का

अंधेरा पीती।

8

माँ तो पूजा है

उन जैसा  जग में

कौन दूजा है?

9

माँ को नमन

बुनकर -सी बुने

हमारा मन ।

-0-

पुराने दिन

1- प्रियंका गुप्ता

1

पुराने दिन

शाख से गिरे पत्ते

जुड़ न पाएँ ।

2

टूटी उम्मीदें

जुड़ने के आसार

फिर न दिखें ।

3

उम्मीद की लौ

डगमगाई ज़रूर

बुझ न पाई ।

4

देकर हँसी

मेरे सूने लबों को

खुद रो दिया ।

5

सूना था मन

दस्तक दी तुमने

भर ही गया ।

6

छालों -सा फूटा

पुराना दर्द कोई

बह निकला ।

7

बादल गए

गर्मी की छुट्टियों में

नानी के घर ।

8

पेड़ों के नीचे

सोई पड़ी थी छाँव

कहीं न जाए ।

9

बादल लौटे

चुपके से बरसे

छुट्टियाँ ख़त्म ।

10

ऊँघती उठी

चाँद तारों को संग

ले गई रात ।

11

तन्हा -सा घर

गर्मी की दोपहरी

खामोश पड़ा ।

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 13, 2017

1767

1-सत्या शर्मा ‘कीर्ति ‘
1
टपकी बूँदे
हर प्यासी आँखों से
वर्षा तू कहाँ ?
2
बूँद- बूँद सा
फिसलता विश्वास
जल अभाव ।
3
सूखी ये आँखें
धरती है उदास
इंद्र नाराज ।
4
चिलचिलाती
जीवन की ये धूप
नेह-जल दो !
5
बहे नदियाँ
बस कागजों पर
प्यासा है मन ।
6
नदी- तलैया
प्यासी अनवरत
बरसो मेघ ।
7
कब से प्यासे
गागर व सागर
मीन उदास ।
8
चटके तन
बरस जा बदरा
पुकारे धरा ।
-0-

2-सुशील शर्मा

1

तुम्हारी यादें

तपी दुपहरी में

स्निग्ध छाया -सी।

2

शीतल छाया

माँ का प्यारा आँचल

मन को भाया।

3

अकेला साया

जाना पहचाना- सा

तनहा चला।

4

खामोश रात

सन्नाटों की आवाज़

तेरा आना सा।

5

दर्पण बिम्ब

मन का प्रतिबिंब

सच कहता।

6

मन के भाव

धूप और छाया से

बदलें रंग।

7

स्वप्न सुरीले

तुम्हारी स्निग्ध स्मृति

मन के बिम्ब।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 12, 2017

1766

Processed with MOLDIV

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2-डॉ सुरेन्द्र वर्मा 

1

भूखे को रोटी 

नंगे तन कपड़ा 

हरि शृंगार 

2

रास्ते में खड़े 

न हों दरकिनार 

चाहते प्यार 

3

आपकी बातें 

थोड़ी सी हाँ, थोड़ी ना 

भ्रम-विभ्रम 

4

नन्हा- सा शिशु 

होठों पे स्मित हास्य 

हाइकु लास्य 

5

खाली गागर 

प्यासा ही लौट गया 

अतृप्त मन 

6

कोई बताए 

कहाँ छिपा है जल 

प्राण पिपासा

7

कमरे बंद 

दोपहर खामोश 

कर्फ्यू सूर्य का 

8

सूर्य का तेज 

सह न पाई धरा 

दरारें पडीं 

9

वाह री गर्मी 

खिलखिलाते फूल 

ताना मारते 

—डा, सुरेन्द्र वर्मा / १०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१ 

(मो,) ९६२१२२२७७८ 

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 11, 2017

1765

डॉ.जेन्नी शबनम

1

किरणें ईं

खेतों को यूँ जगा

जैसे हो माई। 

2

सूरज जागा

पेड़ पौधे मुस्काए

खिलखिलाए। 

3

झुलसा खेत

उड़ गई चिरैया

दाना पानी। 

4

दुआ माँगता 

थका हारा किसान

नभ ताकता। 

5

जादुई रूप

चहूँ ओर बिखरा

आँखों में भरो। 

6

आसमाँ रोया

खेतिहर किसान

संग में रोए। 

7

पेड़ हँसते 

बतियाते रहते,

बूझो तो भाषा?

8

बहती हवा

करे अठखेलियाँ 

नाचें पत्तियाँ। 

9

पास बुलाती

प्रकृति है रिझाती

प्रवासी मन। 

10

पाँव रोकती,

बिछुड़ी थी कबसे

हमारी माटी। 

11

चाँद उतरा

चाँदनी में नहाई

सभी मड़ई। 

12

बुढ़िया बैठी

ओसारे पर धूप

क़िस्सा सुनाती। 

13

हरी सब्ज़ियाँ 

मचान पे लटकी

झूला झूलती। 

14

आम्र मंजरी

पेड़ों पर खिलके

मन लुभा 

15

गिरा टिकोला

खट्टा मीठठिगना

मन टिके ना। 

16

रवि हारता

गरमी हर लेती

ठंडी बयार। 

17

गप्पें मारती

पूरबा छैया

गाछी पे बैठी। 

18

बुढ़िया दादी

टाट में से झाँकती

धूप बुलाती। 

19

गाँव का चौक 

जगमग करता

मानो शहर। 

20

धूल उड़ाती 

पशुओं की क़तार

गोधूली वेला। 

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 10, 2017

1764

1-सुदर्शन रत्नाकर

1      

भोर की बेला

यात्रा पर निकला

सूर्य अकेला।

2

सोती है रात

चमकता है चाँद

देता पहरा।

3

ढूँढती रही

खुशियाँ दिन-रात

देखा न मन।

4     

गले लगाया

तरु ने वल्लरी को

दिया सहारा।

5

उलझी रही

काँटों की दुनिया में

फूल देखे न।

-0-

 2- सुशीला शिवराण

1

बजें घुँघरू

मंदिर कभी कोठे

यही किस्मत ।

2

रूह की धुन

हँसी कमनसीबी

पैरों से बँधी।

3

चीखीं दीवारें

घुँघरू के शोर में

बिकी आबरू।

4

भक्ति-मुजरा

श्रद्धा कभी लांछन

घुँघरू वही।

5

पीढ़ी तरसें

आँगन में घुँघरू

कभी तो बजें।

6

खोजा बहुत

नदी-घट-नयनों में

मिला न पानी।

7

दर्पण बोला

हू-ब-हू बोला सच

फिर भी रोळा।

8

हवा बासंती

लाई पिया की पाती

हँसती-गाती।

9

लिखे प्रकृति

प्रीत के अनुबंध

फूलों के संग।

10

नेह-निर्झर

क्लांत-श्रांत जग का

ज्यों हो पुष्कर।

11

कवि का कर्म

शब्दों का ताना-बाना

भावों का मर्म ।

-0-

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 8, 2017

1763

1- विभा रश्मि

1

माँ की ममता

शिशु का अधिकार 

निःस्वार्थ  प्यार ।

2

माँ की आँखों से

टपके जब आँसू 

ईश्वर रोया ।

3

लोरी गाकर

सुलाती माँ ललना 

बाँहें पलना ।

4

रेशमी डोरी

मीठी सुनाती लोरी 

झूला झुलाके ।

5

मैया दुलारी 

चंदा -सी है बिटिया 

फुर्र ज्यों चिया ।

6

मेरी माँ सुन ! 

तू भूखी क्यों रहती 

दुख सहती ।

7

माँ अनुरागी 

ममतामयी त्यागी 

रातों  में  जागी ।

8

शीतल छाँव

माँ के आलोड़न की 

पाए  शैशव ।

9

अँगुली थामे

शिशु चलना सीखे

माँ को क्यों  त्यागे ?

10

माँ नियरे आ 

कंठ मोहे तू लगा

कन्हैया तोरा ।

11

बुढ़ापे में माँ 

सम्मान की है भूखी 

खाती है रूखी ।

 -0-

2- डॉ.पूर्णिमा राय

1

स्वप्न झिंझोड़े

सुबक रही धरा

आऊँगा माँ!!

2

पास रह माँ

तुम बिन आकुल

मेरी ये साँसें!!

3

माँ तेरी यादें 

सुझाती रही राह

उंगली थामे!!

4

पृथ्वी की पीर

देख,भरते नैन

दूर है मैया!!

5

नयन भरे

माँ असीमित प्रेम

मिले दोबारा!!

6

अश्क तुम्हारे

सारे माँ अब मेरे

रख भरोसा!!

7

सुना माँ लोरी

मृत्यु का ये तांडव

देखा न जाए!!

8

माँ की लोरी

शहनाई के जैसे

गूँजे कानों में!!

9

फोन पे गान

धुँधली सी सुधियाँ 

लोरी गाती माँ!!

10

याद आज भी

स्वर्गलोक से मैया

सुना दे लोरी!!

11

माँ बच्चों संग                              

दिखे लाड लड़ाती

भाता है गाँव!!

-0-

डॉ.पूर्णिमा राय,

शिक्षिका एवं लेखिका

अमृतसर(पंजाब)

drpurnima01.dpr@gmail.com

-0-

3-चंचला इंचुलकर सोनी

1

तपे वसुधा
प्यासा हैं पनघट
कुम्भ उतान

2

तृप्ति की खान
शीतलता- पर्याय
माटी -गागर

3

नदी किनारे
पाप पुण्य ओसारे
कुम्भ पसारे

4

मोक्ष की चाह
विराट समागम
कुम्भ की थाह

5

गागर ऋणी
अद्भुत जिजीविषा
मरु- जीवन

6

गागर-गुण
बूँद-बूँद हैं सुधा
ग्रीष्म परीक्षा

7

रीती गागर
ले चली अग्निपथ
पनिहारन

8

रेतीला पथ
गागर भरी आस
तृषा अकथ

9

मृत्तिका शिल्प
दीनो का रोजगार
कुम्भ विकल्प

10

पूर्वज मानी
आखातीज पूर्णता
कुम्भ का पानी

-0-ccsonicc@gmail.com

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 5, 2017

1762

1-ज्योत्स्ना प्रदीप

2-कृष्णा वर्मा

1

झूठा छलावा

मज़दूर दिवस

निरा दिखावा।

2

स्वेद बहाऊँ

हक हलाल की मैं

रोटी कमाऊँ।

3

राम अनोखा

केवल श्रम लिखा

भाग्य की रेखा।

4

किले बनाता

सोता खुद झुग्गी में

हँसता-गाता।

5

करे निहाल

बनाके कोठी ख़ुद

है खस्ता हाल।

6

करो जतन

श्रमिकों के बच्चे भी

देखें सपन।

-0-

3-पुष्पा मेहरा  

1

जीवन जंग

बिजली-चक्रवात

रहते संग ।

2

शब्दों की चोट

पाषाण मन को भी

चटका  देती  ।

3

शब्द तोड़ते

सारे आत्मीय बंद

शब्द जोड़ते ।

4

आए बादल

एक बूँद जल भी

नहीं दे सके ।

5

प्यासा पखेरू

नल से एक बूँद

माँगता रहा ।

6

यादों में आई

ठण्डी-ठण्डी फुहार

भीगी  मैं सारी ।

7

जीवन नद

सुख-दु:ख किनारे

साथ चलते ।

8.

मन परिंदा

जितना पंख काटो

उतना उड़े ।

9

शब्द थे मौन

नैन चित्रकार ने

भाव उकेरे ।

10

छिपा न सका

सच को कभी मौन

सूर्य को घन ।

11

यादें हमारी

विस्मृत घटाओं में

विद्युत-कौंध ।

12

लू-धूप-तपी

मन के कोठे में आ

यादें जुड़ातीं ।

13

जीवन मूल्य

मन पेटी में बंद

धन अमूल्य ।

14

श्रमिक श्वासें

जीवन रथ खींचें

थकें तो रुकें ।

15

समय-चक्र

काट रहा है पन्ने

ज़िन्दगानी के ।

16

खिली जो कली

उड़-उड़ सुगंध

हवा में बसी ।

17

नियति-हाथ

कठपुतली बने

नाचते हम ।

18

जलता हुआ

गरीब का टट्टर

तमाशा बना ।

19

अकथ कथा

कौन,कब औ कहाँ

किससे मिला !

20

मेले में आए

रहट है अदृश्य

घूमते सब ।

21

वक्त की आँधी

पेड़ों से उड़ा चली

सूखे पत्रक ।

22

बजुर्ग पेड़

नव शिशु खातिर

बाहें फैलाए ।

23

जीवन वन

सूनी पगडंडी पे

यादों का शोर ।

-0-

Pushpa.mehra@gmail.com

Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 4, 2017

1761

1-अनिता मण्डा
1

बैठा परिंदा
नेह से झुकी शाख़
हर्ष अपार !
2
जेठ निर्दय
झुलसाये बदन
रूठी पवन
3
अश्वमेघ को
छोड़े धूप का घोड़ा
जेठ निगोड़ा।
4
खिलखिलाया
रजत-वर्ण पुष्प
बाँटे सुगंध
5
काँटों में खिले
नागफ़नी का फूल
चुभन भूल। !!
6.
फूल-कलियाँ

सजाये डालियों ने
मन मोहने ।
7
देख मुस्कान
लो भागी मुसीबतें
गा रहे लम्हे।
8
तमतमाई
जेठ की दोपहरी
झुलसे तरु
9
काटे जंगल
सड़कों पे करती
गर्मी दंगल
10
उखड़ी जड़ें
मुरझाई शाखाएँ
खोई संस्कृति।
11
विवश नदी
संक्रमण की रेत
मरे सभ्यता।
12
मन्नतें  बँधी
पीपल- तने पर
आरी  से कटी।

-0-

2-डॉ.सुषमा गुप्ता

1

चंद बादल

अनगिनत प्यासे

है हाहाकार ।

2

आओ दो पल

बैठेंगें हम पास

जीवनसाथी ।

3

कम जीवन

साथ और भी कम

जियो जी भर।

4

जिंदगी सारी

खुशनुमा बहुत

बाँहे फैलाओ ।

5

हाथ में हाथ

बस रखना थामे

फिर क्या ग़म ।

 -0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 26, 2017

1760

1-प्रीति सुराना

1

बने घरौंदा-

तिनके जुड़कर,

अकेले हम।

2

बरसा पानी-

बह गई फसलें,

भूखी धरती।

3

खुली दरारें-

सूखी धरती पर,

फटी एड़ियाँ

4

सूखी टहनी,

पतझड़ ऋतु में-

भटके पंछी।

5

अकाल मृत्यु,

छाया धरती पर-

जलसंकट।

6

नई किरण,

मेहनत की बेला-

भोर हो गई।

7

घना अँधेरा,

अब डरना कैसा-

सुबह होगी।

8

कोई टूटे तो

मत माँगना मन्नत-

भोर का तारा।

9

टूटी कलम 

कर्म ही लिखते हैं-

भाग्य का लेख।

10

जैसी करनी-

वैसे ही कर्मफल,

चुभते काँटे।

11

सूखी धरा से

उगेगी भुखमरी 

जल बचाओ।

12

नींव में भूल-

भवन में दरारें,

नी उजड़ा।

-0-

प्रीति समकित सुराना,15 नेहरू चौक,वारासिवनी (मप्र)-481331

-0-

2-रमेश कुमार सोनी ,बसना [ छत्तीसगढ़ ]

1

पानी ढूँढते

पानीपानी हो गए

पानी पूछिए

2

आग लगी है

चलो कुआँ खोद लें ?

पानी खरीदो

3

शहरी कोठी

कैद हुआ झरना

गाँवों में प्यासा

4

पानी सुस्ताते

प्याऊ की छाँव बैठे

प्यास ताकते

5

बंद कीजिए

मटका फोड़ स्पर्धा

पानी रोता है

6

अंत समय

पानी पुकारे लोग

पुराना रोग

7

पानी की ट्रेन

कभी मत ताकि

वर्षा बचा लें

8

ऐ पानी वालों

पानी बचाना सीखो

जंग ना छेड़ो

9

कैसे करोगे 

आचमन , संकल्प ?

जल पूछते

10

पानी जानती

सभ्यता की कहानी

जनता भूली

12

नीर से  पीर

पशुपक्षी भोगते

पेड़ बचाते

13

जलजले में

जल ही जल होगा

गर्मी बढ़ी है

-0-

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