Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 5, 2021

2204

रश्मि विभा त्रिपाठी

1

दीप लिएले दीप- लड़ी

राम की आरती को

है ज्योत्स्ना खड़ी।

2

पूर्ण तपस्या

पा गई अमावस्या

दीप्ति का दान।

3

आए श्रीराम

अवध ज्योति- पर्व

नैनाभिराम !

4

दीप- सुहास

बीता है वनवास

खिला प्रभास ।

5

आज अमा ने

तम का तोड़ा दर्प

प्रकाश पर्व।

6

संघर्ष जिया

जूझा है आँधियों से

एकाकी दीया।

7

कौन समीप?

लड़ता तमिस्रा से

अकेला दीप।

8

श्रीराम कृपा

अमा के जागे भाग

‘लौ’ गाए राग।

9

जाने क्या सूझे?

आग भड़का हवा

दीए से जूझे ।

10

आँधी में दीप

जलकर दें सीख

धैर्य- प्रतीक।

11

हवा बिगड़ी

दीप जो छुआ ‘और’

लौ आगे बढ़ी ।

12

दीप दिलेर

देखो हो गया ढेर

तम का अहम्।

13

श्रीराम आए

सृष्टि ने स्वागत में

दीप जलाए।

14

लौटे श्रीराम

भू उतारे आरती

मग्न भारती।

15

राम– जानकी

करुणानिधान की

कृपा- दीवाली।

16

राम वैदेही

निरखत पुलके

दीप सनेही।

17

2-2सौहार्द- घृत

प्रेम- दीवा जलाएँ

पर्व मनाएँ।

18

भाव प्रबल

प्रेम- सौहार्द- दीप

रहे प्रज्वल।

19

बाँटें उजाला

बालें प्रेम- प्रदीप

पर्व निराला।

20

अमा अलापे

दिव्य दीप्ति का राग

आनन्द व्यापे।

21

दो परितोष

मेरे मन का कोश

लक्ष्मी माँ भरो।

22

उत्सव छाया

श्रीराम को निरख

दीप मुस्काया।

23

प्रिय ने बाला

द्वारे दुआ का दीप

प्रेम निराला!

24

प्रिय जलाएँ

आँखों में आशाओं की

दीपमालाएँ।

Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 4, 2021

2203

1-कमला निखुर्पा

1

कमला निखुर्पा-पिथौरागढ़है अभिलाषा

देहरी– दीप बन

तुझे निहारूँ।

2

माटी-सा मन

नेह तुमने दिया

रोशन किया।

3

नयन-दीप

नेह-जल छलका

राह निहारे।

4

नन्हा– सा दिया

तुलसी-चौरे बैठा

हवा से खेले।

5

नेह-दीपक

जगमग जीवन

रोज दीवाली।

-0-

दीवाली की अनंत शुभकामनाएँ 💐💐💐💐💐
-0-

2 मोहनलाल जाँगिड़ 

1

झिलमिलाते

हर घर आँगन

दीप जलाते

2

दीपों की माला

घर- गली -मोहल्ला 

होए उजाला 

3

खुश है बच्चे

नए वस्त्र, पटाखे

मचा है शोर 

4

सहज त्याग

स्वीकार्य वनवास

द्वेष न राग

5

देवी उर्मिला 

धैर्य तप विरला

है विरह-योग

-0-JANGIDMOHN@gmail.com

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 3, 2021

2202-नदियों का दर्द

कपिल कुमार

1

होंठो की प्यास

बुझाए अब कैसे

सूखी नदियाँ।

2

रोये किसान

नदी पार खेत में

उस रेत में।

3

पूछते वन

नदियों के पानी से

मन की बातें।

4

उधारी साँसें

लेता अब जंगल

बिन सलिल।

5

ख़ौफ़ में है ये

नदियों का जीवन

धरती पर।

6

बचा नहीं है

हिमकर नभ में

उजड़े वन।

7

सूख गए है

पहाड़ों में झरने

सब के सब।

8

ख़ुदा बचा

ये धरती– गगन

और जीवन ।

-0-

कपिल कुमार,असिस्टेंट प्रोफेसर, मिहिर भोज पी•जी• कॉलेज

दादरी, गौतम बुद्ध नगर उत्तर प्रदेश।

 kapilkb1993@gmail.com

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 28, 2021

2201

भीकम सिंह

1

कंठ है प्यासा

गाँवों के पेट खाली

हाथ में कासा।

2

खेत रात में

जाग-जागके सोते

सपने बोते।

3

कुएँ से तोला

प्यासे गाँव ने कोक

भूला ज्यों ओक।

4

गाँव ले गया

खेतों को शहर में

रात दे गया।

5

गाँव का जिस्म

बिल्डरो ने खरीदा

लगाके इत्र।

6

खेतों ने मिथ्या

आवरण उतारे

गन्नों के सारे।

7

पानी बरसा

धान के खेत-क्यारी

गए मुरझा।

8

खेत बेचके

शहर के हो गए

गाँव खो गए।

9

उदासी लेके

खेतों से लौटे गाँव

उखड़े पाँव।

10

गाँव ने हारी

हाते की सारी दूब

दारू में डूब।

-0-

कासा=प्याला/ कटोरा

Posted by: हरदीप कौर संधु | अक्टूबर 25, 2021

2200

1-डॉ. सुरंगमा यादव
1
SURANGAM YADAVपत्र नहीं ये
मन के मनकों की
किंचित राशि।
2
मन-धरा पे
तुमने बोए स्वप्न
सींच रही मैं।
3
धुँधली शाम
थके परिंदे लौटे
चाहें विश्राम।
4
चलाके तीर
फिर पूछा तुमने
कहाँ है पीर!
5
साँझ की बेला
नीड़ निहारे पंछी
बैठ अकेला।
6
जब भी रोया
धीरज के धागों में
मन पिरोया।
7
रुक लहर
रेत पे लिखा नाम
देखूँ जी भर।
8
आँसू का रेला
नयन कोर सूखी
मन है गीला।
9
बंजर धरा
उगेगा उसमें क्या?
काँटों के सिवा!
10
वक्त की धूप
कुम्हलाता ही जाता
चीजों का रूप।
11
वक्त के साथ
बीतते जाते हम
नित्य का क्रम।
12
चीजों का रूप
दिखता कुछ ऐसा
भाव हो जैसा।

-0-

2-दिनेश चन्द्र पाण्डेय

DINESH CHANDRA PANDEYकांस-बुराँस

डाली -डाली हिलांस

सजे पहाड़

2.

मंद मलय

धरती का यौवन

झलका गई

3.

खिली कलियाँ 

गाती है डाली-डाली

राग प्रेम का

4.

कुठार संग

मिली काठ की मूठ

जंगल कटे

5.

साड़ी लपेट

ढूँढे शीशे में माँ को

नन्ही बिटिया

6.

नाम है रानी

खेलने की उम्र में

भरती पानी.

7.

जब कभी भी

पत्थर दिल टूटा

झरना फूटा

8.

शब्द -रहित

ताकता है आकाश

खेत श्रमिक

9.

ब्रेल में हाथ

प्यार से शब्द छूते

अर्थ खोलते 

10.

पथिक- संग

चलता रहा रात

चाँद अकेला

11.

काल आया था

श्रमजीवी कीटों ने

कौशेय रचा

12.

पहाड़- यात्रा

सौन्दर्य की बारातें

नाचतीं आँखें

13.

घरों में बल्ब  

रात पहाड़ पर  

जुगनू जा बसे

14.

बेहद सर्दी

धुनिया की दूकान

सफ़ेद हुई

15.

मेघ- शावक

खेल मैदान बना

नील गगन

16.

नभ की कूँची

ठण्डे पहाड़ों पर

सफेदी फिरी

17.

वृद्धा का मन

भूचाल बाद ढूँढे

जीवन- धन

18.

याहू गूगल

तमाम जग खोजा

न मिला प्यार

19.

खींचा है मन

यह कौन- सा राग

खगों ने छेड़ा

नवौढा बर्फ़,

सूर्य बाबा से लजा,

ओझल हुई.

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 22, 2021

2199

1-भीकम सिंह

1

आँखों से चला

प्यार का सिलसिला

आँखों से ढला।

2

आँसू के रस्ते

निगाहों ने देखे हैं

प्यार के रस्ते।

3

मिली जो आँख

बुदबुदाए होंठ

दिल पर चोट।

4

शोख निगाहें

मुस्कानें बाँटती हैं

गाहे-बगाहे।

5

आँसू हठीले

हँसी से ना बहले

चुप बह ले।

6

पलकें आधी

करें पहरेदारी

शंका ज्यों आती।

7

संकेत आते

आँसुओं के पहले

फिर टहले।

8

घुमड़े सिन्धु

पलकों के बीच में

बिना बीच के।

9

गर्द से मिले

आँसू का मलाल क्या

और क्या गिले।

-0-

2-रश्मि विभा त्रिपाठी

1

शरत् चन्द्र

अमृत वेला में भू

उच्चारे मंत्र।

2

शरद् योग

शशि पूनम को दे

दिव्य अरोग।

3

पूर्णिमा आई

सोम- वर्षा नहाई

तृप्त भू माई।

4

आश्विन मास

गोपाल- गोपी रास

औ चन्द्र- हास।

5

हर्षित व्योम

भू- आँगन बरसा

जी भर सोम ।

6

झरे अंजोर

भीगे चूनर छोर

धरा विभोर।

7

चंदा जुन्हाई

गोपी- मन- मराला

झूमे कन्हाई।

8

रास रचाएँ

गोपी संग कन्हैया

मुग्धा जुन्हैया ।

9

शशि हर्षाए

क्षीर- प्रसादी पाए

सुधा लुटाए।

10

चन्द्र- प्रवास

लौटा धरा के पास

कौमुदी- हास ।

11

न्यारी झलक

निरखती विधु को

भू अपलक।

12

मोहे मयंक

खेले उमा के अंक

बालक स्कंद।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 20, 2021

2198

Posted by: हरदीप कौर संधु | अक्टूबर 17, 2021

2197

रश्मि विभा त्रिपाठी 

1

1-RASHMI VIBHA TRIPATHI-26-11 - Copyमन ने बाँधे 

जिनसे प्रेम-धागे

सीमाएँ लाँघे।

2

भर रहा है 

एकाकी व्हाट्स एप

रिश्तों का गैप।

3

छल- पंजों से

झपट करे सिद्ध 

मानव गिद्ध।

4

जीवन- कूल 

धारा मनोनुकूल 

कभी न बहे।

5

तुम सम्बल 

जब- जब भी हारूँ

तुम्हें पुकारूँ ।

6

निर्मम रिश्ते 

धीरे-धीरे रिसते

घाव गहरे ।

7

मुझसे बाँधा 

तूने रिश्ता निस्वार्थ

मैं हूँ कृतार्थ ।

8

आदत बुरी 

रिश्ते! देखो तो मिष्ठी 

मन में छुरी ।

9

चौपट हुआ !

खेलकर आदमी

रिश्तों का जुआ ।

10

न आएँ काम 

होता रिश्तों का काम 

फैलाना ‘झाम’ ।

11

लो पहचान 

‘बुदबुद’ ज़िन्दगी

मिथ्याभिमान !

12

अर्थपरक

दुख, दर्द, व्यथाएँ 

बोध- कथाएँ !

13

सुख- दुख में 

रिश्ते रहते साथ

स्वप्नों की बात !

14

टेढ़ी मेढ़ी सी

जीवन की डगर 

तू ध्यान धर !

15

बड़ा कठिन 

जीवन का सफर 

रहो तत्पर ।

16

रिश्तों ने मेटे 

प्रेम के अवशेष 

स्वार्थ है शेष।

17

चल रही है

रिश्तों में प्रतिस्पर्धा 

प्रेम पे पर्दा !

18

‘हम तुम्हारे’

दुख में पता लगा 

झूठे थे नारे !

19

नहीं छेड़ना

आह व आँसू जल

बड़े प्रबल !

20

उसकी बातें 

दोधारी तलवार 

असह्य वार !

21

प्राण- वर्तिका 

झंझावात में पली

फिर भी जली ।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 16, 2021

2196

डॉ. सुरंगमा यादव 
1
सत्य छिपाएँ
करके उपक्रम
SURANGAM YADAVभ्रम फैलाएँ।
2
रिश्ते हैं कम
उनमें भी तनाव
घटा लगाव।
3
स्वार्थ  सैलाब
संबंधों का बहाव
विवश व्यथा।
4
चलो मनाएँ
‘मानवता बचाएँ ‘
दिवस कभी।
5
बिखरा पड़ा
आनॅलाइन प्रेम
सच्चा या झूठा?
6
प्रेम सिंचित
सूखते न किंचित
रिश्तों के खेत।
7
तप्त तवे पे
जल-बिन्दु-सी स्वाहा
क्रोध में मति।
8
मस्ती की शाला
लगती मधुशाला
है विष कन्या।
9
मुश्किल तो है
असंभव नहीं है
लीक तोड़ना।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अक्टूबर 7, 2021

2195

1-डॉ.नीना छिब्बर,   जोधपुर
1

नीन छिब्बरकोयल गाए

बासंती अनुराग

 बरसे राग।

2

बोले चिरैया-

खोल दे खिड़की

झाँकूँ अंदर।

3

भागे ये पाखी

 देख तप्त धरती

कर तू छाँव।

4

सीखो पाखी से

चोंच भर दानों में

भरना पेट।

5

सूना गगन

मेघ भी अनमन

पंछी व्याकुल।

6

 कटा वो वृक्ष

जिस पर था वास

पंछी उदास।

7

नभ आबाद

पंछी उड़े आजाद

शुभ संकेत।

8

नन्ही चिड़िया

लाई शुभ संकेत

लौटेंगे देश।

9

जोड़े तिनके

सँजोकर उम्मीद

नीड़- निर्माण।

10

है मधुमास

छेड़े वसंतदूत

मधुरगीत।

11

सूरज आया

संग में पाखी लाया

भरा आकाश।

12

निर्मल जल

चुगे मोती का चुग्गा

हंस- युगल।

13

तिनके चुन

गौरेया रही बुन

फिर से नीड़।

14

पंछी सिखाए

ऊँची उड़ान पर

जमीं पे ध्यान।

15

चहचहाना

इंगित करता है-

नया सवेरा।

-0-

2- रश्मि विभा त्रिपाठी 

1

rashmi vibhaमन औ प्राण 

करें नित्य आह्वान 

‘शैलपुत्री’ का।

2

मन- रंजन 

मात्र अवलंबन 

मातृ- वंदन ।

3

आस्था का दीप 

शुचिता से जलाऊँ 

माँ तुम्हें ध्याऊँ।

4

प्रेम- प्रदीप 

समर्पण का घृत 

स्वीकारो व्रत ।

5

माँ मैं अजान 

मेरा व्रत- विधान

तुम्हारा ध्यान ।

6

विरोधाभास

स्त्री- स्वरूप को पूजें

निष्ठा का ह्रास । 

7

दोहरी नीति

कन्या- पग पखारें 

स्त्री को दुत्कारें ।

8

युगों से ध्यानी 

ये मन- कर्म- वाणी

कृपा! कल्याणी ।

9

है अविराम 

यह जग -संग्राम

माँ त्राहि माम् ।

10

भक्ति निष्काम 

माँ ‘शैलपुत्री’ नाम

मुक्ति का धाम ।

11

कृपा अनन्य 

मैं हुई जप धन्य 

‘शैलपुत्री’ को ।

12

कटेंगे ग्रह 

कालिका अनुग्रह 

कल्याणकारी ।

13

धन्य अपर्णा!

निस्वार्थ बाँटे छाँव 

तू सप्तपर्णा ।

14

मेरे दुख से

माता होगी उद्विग्न 

हरेगी विघ्न ।

15

टारे अरिष्ट 

माँ शैलपुत्री इष्ट

कृपा विशिष्ट। 

16

अनन्य श्रद्धा 

अस्वीकार्य पाखंड

‘व्रत अखंड’ ।

17

शुचि भाव की

मन- प्राण- आहुति

मंगल स्तुति ।

18

शत्रुनाशिनी 

माँ शैलपुत्री- स्तुति 

दुखहारिणी ।

19

माँ चाहे निष्ठा 

मन- मंदिर में हो

प्राण- प्रतिष्ठा ।

20

माँ शैलपुत्री 

दे दुख से निर्वाण 

‘शक्ति’ प्रमाण ।

21

मातृ- स्तवन

शुभ- मंगलकारी

अम्बा- अर्चन ।

-0-

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