Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 3, 2021

2214-तुषार- पात 

कृष्णा वर्मा 

1

तुषात-तुषार- पात 

धरती के आँगन 

स्वर्ग आभास। 

2

धरा का रूप 

कभी ठिठुरे-काँपे 

कभी अंगार।

3

तुषार झरे

वृक्षों पर चाँदी के

कुसुम खिलें।

4

हिम के शूल 

हँसके क़ुदरत 

करे कबूल।

5

गुम है होश 

लपेटा प्रकृति ने

जो सादापोश।

डॉ.शिवजी श्रीवास्तव

हिंदी हाइकु अब केवल भारत में ही नहीं अपितु विश्व के अनेक देशों में लोकप्रिय हो रहा है। विविध देशों के अनेक साहित्यकार हिंदी हाइकु-लेखन को नवीन ऊँचाइयाँ प्रदान कर रहे हैं। वस्तुतःहिंदी हाइकु को वैश्विक धरातल पर प्रतिष्ठित करने  में श्री रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ एवं डॉ.हरदीप कौर सन्धु द्वारा सम्पादित हिंदी हाइकु वर्डप्रेस डॉट कॉम वेब की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है, जिसने 2010 से अनवरत  हिंदी हाइकु प्रकाशित करके इतिहास रचा। इन्ही दोनों साहित्यकारों के कुशल  सम्पादन में स्वर्ण-शिखर नाम का हाइकु संग्रह प्रकाशित हुआ है, जिसमें वैश्विक धरातल पर प्रतिष्ठित चालीस हाइकुकारों के बारह सौ से अधिक हाइकु संकलित हैं। स्वर्ण-शिखर शीर्षक प्रतीक रूप में  इस बात का द्योतक है कि संकलन में शिखर पर स्थित स्वर्ण के समान कांतिवान हाइकु को संगृहीत किया गया है।

संकलन के फ्लैप- कवर पर डॉ. कविता भट्ट शैलपुत्री ने इसके महत्त्व पर विस्तार से प्रकाश डाला है।

संकलन के समस्त हाइकु विषय की दृष्टि से वैविध्य लिये हुए हैं। इन हाइकुओं मे प्रकृति के विविध रूप तो हैं ही साथ ही, मानव मन और जीवन की विविध समस्याओं के भी प्रभावी चित्र हैं। आज का जीवन निरन्तर जटिल होता जा रहा है। इस जटिलता को संग्रह के अनेक हाइकु में देखा जा सकता है, उदाहरणार्थ-अपार्टमेंट-संस्कृति ने जीवन को  कितना सीमित कर दिया है ,इसे सुदर्शन रत्नाकर जी ने इस हाइकु में कितनी सहजता से व्यक्त किया है –

आँगन छूटा/बालकनी में टँगा/आज जीवन। 

 वर्तमान की  त्रासद स्थितियों ,भूख,अभाव, भौतिक संस्कृति से उत्पन्न स्वार्थपरता इत्यादि अनेक विषयों को संग्रह के हाइकु में देखा जा सकता है यथा-

रात गुज़ारें/रोटी की चर्चा कर/भूख को मारें। (हरेराम समीप),

सेल्फी जैसे ही/मिलते एडिटेड/आज के रिश्ते।(सुशीला शील राणा),

हल्कू उदास/फिर आई बैरन पूस की रात। (डॉ. शिवजी श्रीवास्तव),

भव्य बंगला/खोजती विधवा माँ/कक्ष अपना।(सुनीता अग्रवाल नेह),

टूटा छप्पर/कम्बल न रजाई/निर्धन-कुटी।(भावना सक्सैना),

वक्त खोया है/धमाकों में बमों के/तख्त सोया है(डॉ. उमेश महादोषी).

इन हाइकु को देखकर समझा जा सकता है कि जीवन की तमाम विसंगतियों, त्रासद स्थितियों और अभावजन्य पीड़ाओं को व्यक्त करने में हाइकु विधा सक्षम है।  हाइकु अपने मूल स्वरूप में प्रकृति की कविता रही है,अतः अधिकतर हाइकुकारों का प्रिय विषय प्रकृति ही है। इस संग्रह में सम्मिलित प्रकृति सम्बन्धी विविध हाइकु को देखकर कहा जा सकता है कि प्रकृति के समस्त परम्परागत रूपों का चित्रण हाइकुकारों ने किया है; पर मानवीकरण तो प्रायः प्रत्येक हाइकुकार को प्रिय है,यथा-

थकी थी नदी/सागर की बाहों में/बेसुध गिरी।(प्रीति अग्रवाल),

चाँद उतरा/सीपियों के अँगना/सिंधु मचला।(अनिता ललित),

जेठ की गर्मी/झुरमुटों में सोई/गुस्सैल हवा।(रमेश सोनी),

ताल के गाल/रश्मि की छुवन से/हुए हैं लाल। (डॉ.पूर्वा शर्मा) 

जापान से आई इस विधा को हिंदी ने पूर्णतः आत्मसात कर लिया है इसीलिए इसके बिम्ब,प्रतिमान,मुहावरे,परिवेश सभी मे भारतीयता है। हिन्दी कविता के अन्य रूपों की भाँति हाइकु में भी सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ अलंकारों, रसों एवं शब्द शक्तियों इत्यादि का समावेश हो रहा है, उदाहरण हेतु कुछ हाइकु देखे जा सकते हैं, जिनमे सांस्कृतिक प्रतीक  आलंकारिक सौंदर्य के साथ अभिव्यक्त हुए हैं-

सूरज मोड़े/संध्या के छज्जों पे/अपने घोड़े। (भीकम सिंह),

सूर्य को अर्घ्य/आस्था के कलश की/अटूट धार।(मीनू खरे),

अम्मा ने रोपा/तुलसी का बिरवा/पावन घर।(मंजूषा मन),

डाली -पांचाली/बसन्त कृष्ण रोके/चीरहरण। (ज्योत्स्ना प्रदीप),

चिड़िया आती/कबीर के सबद/भोर में गाती।(रमेश गौतम)

इसी प्रकार के अनेक हाइकु हैं जिनका सौंदर्य भारतीय दर्शन एवं संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में ही पूर्ण रूप से प्रकट होता है ।इनके साथ ही परम्परा से प्रेम,उनके टूटते जाने की पीड़ा और अतीत-मोह के अनेक उत्कृष्ट हाइकु भी संकलन में विद्यमान हैं-

गीजर-युग/धूप में रखा पानी/यादों में दादी।(पुष्पा मेहरा),

अम्मा है रोती/सूने घर में जब/रोटियाँ पोती।(प्रियंका गुप्ता),

घर मे वृद्ध/वट-सा छतनार/मिला आश्रय।(डॉ. आशा पाण्डेय),

सूखे हैं फूल/किताबों में मिलती/प्रेम की धूल।(शशि पुरवार)

 निःसन्देह विविध विषयों एवं भाव रश्मियों से सुसज्जित वैश्विक हिंदी हाइकु का यह उत्कृष्ट संग्रह स्वर्ण- शिखर हिंदी हाइकु-इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण संग्रह सिद्ध होगा।

[स्वर्ण-शिखर (वैश्विक हाइकु-संग्रह)-सम्पादक:रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, डॉ. हरदीप कौर सन्धु,प्रथम संस्करण-2021,मूल्य:350.00रुपये, पृष्ठ:160, प्रकाशक-अयन प्रकाशन,जे 19/39,राजापुरी,उत्तम नगर,नई दिल्ली-110059]

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 30, 2021

2212-सप्तरंगःसामयिकता, माधुर्य और सरसता का संगम

डॉ. कविता भट्ट

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Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 28, 2021

2211-शैलशिखर से सुरभि बिखेरते हाइकु

ॠता शेखर ‘मधु’

उपवन में बहुत सारे फूल मिलते हैं, अपनी सुरभि बिखेरते हैं और फिर  बिखरके रह जाते हैं।  उन Sail Sikher Cover designफूलों को गुलदस्ते में करीने से सजाकर रखा जाए, तो फूलों का महत्त्व और बढ़ जाता है। गुलदस्ता सजाने में कुशल माली की आवश्यकता होती है, जो भिन्न- भिन्न रंगों और खुशबू वाले पुष्पों का संयोजन करे कि देखने वालों के मुँह से बरबस ही वआआह! निकल जाए। वैसे ही साहित्य उपवन में हर प्रकार के विधा-पुष्प बिखरे पड़े हैं । उन्हें समेटने का काम बड़े जतन का है। हाइकु -जगत् में यह विशेष कार्य बड़े मनोयोग के साथ हैं किया है

शैल शिखर वैश्विक हाइकु- संग्रह है जिसकी संपादकद्वय हैं – डॉ. हरदीप कौर संधु एवं डॉ. कविता भट्ट जी। इस पुस्तक में कुल 27 हाइकुकारों के हाइकु को समेटा गया है।

पुस्तक के आरंभ में डॉ.कविता भट्ट जी ने सारगर्भित सम्पादकीय लिखा है।

पुस्तक में सर्वप्रथम आदरणीया डॉ. सुधा गुप्ता जी के 48 हाइकु लिये गए है। हर हाइकु एक उपन्यास है। एक हाइकु जिसमें विरोधाभास का सुंदर बिम्ब लिया गया है,  उद्धृत कर रही हूँ-

दूब-सी बेटी/ नरम, नाजुक है/ जीवट- भरी

नरम भी और जीवट भरी भी…दूब-बेटी एक जैसी

अगला हाइकु रामेश्वर कम्बोज जी का है, जो मुझे आध्यात्मिकता की ओर ले जा रहा। महामिलन, शब्द स्वयं ही काफी है आत्मा-परमात्मा के मिलन की व्याकुलता गढ़ने में-

प्राण विकल/कब होगा तुमसे/ महामिलन

डॉ.कुँवर दिनेश सिंह जी ने अपने हाइकु में पूरा जीवन विस्तार लिख दिया। इहलोक से परलोक तक कि यात्रा को समेटे यह हाइकु देखें-

बहती नदी/एक लंबी कविता-/ ईश्वर रची

डॉ. हरदीप संधू के बिटिया पर रचे गए हाइकु उत्कृष्ट हैं। मैं उससे इतर वह हाइकु ले रही, जो बता रहा कि किसी एक पीढ़ी द्वारा सँजोइ गईइ वस्तुएँ अगली पीढ़ी के लिए निरर्थक ही रहती हैं-

दादी के बाद/सन्दूक व चरखा/एक कोने में

डॉ. कविता भट्ट जी के रचे हाइकु के सभी विषय , प्रतीक्षा-प्राण-झील-यादें-प्रेम, सभी भाव के सुंदर सुरभित पुष्प हैं। प्रतीक्षा की चरम अवस्था को दर्शाता यह हाइकु देखिए-

नैन सूखे है/ प्रतीक्षा है मुखर/ मूक अधर

आगे कमला निखुर्पा जी के सृजन की ओर बढ़ते हैं। उनके अधिकतर हाइकु भाई-बहन के प्यारे बंधन पर आधारित हैं, जो नेह से सराबोर कर देते हैं। झील और यादें विषय पर भी सुन्दर हाइकु है। किन्हीं भी हाइकुकार के चौंसठ हाइकु में से एक चुनना वाकई कठिन है। कमला जी का यह हाइकु जीवन दर्शन का आभास दे रहा-

चल पड़ी मैं/ संग चली सुधियाँ/ उमड़ा गाँव

डॉ.जेन्नी शबनम जी ने बहुत ही खूबसूरती से जीवन की अनिश्चितता का वर्णन किया है। कुछ भी इंसान के हाथ में नहीं होता। वह कब बदल जाये यह कौन जान सका है-

बिना बताए/जाने किधर गई/ मेरी ज़िंदगी

रश्मि विभा त्रिपाठी जी के हाइकु जीवन- सन्ध्या की जिस मार्मिक सच्चाई को बता रहे हैं, वह हाइकु में देखिए।

सन्ध्या की बेला/सागर तट बैठा/सूर्य अकेला

शशि पाधा जी का यह हाइकु मानव जीवन की विसंगतियों से जूझते मन की अनकही कहानी है-

स्याही न शब्द/अंतर्मन की पोथी/ मौन वेदना

अगले पृष्ठों पर मैं स्वयं हूँ-कृष्ण या पार्थ/ जग-कुरुक्षेत्र में/ दोनों पात्र मैं

कृष्णा वर्मा जी का यह हाइकु बिल्कुल अलग सा है। सभी हाइकु पढ़ते हुए बरबस ही यहाँ निगाह टिक गई।

ओले परेशाँ/ अम्बर से कूदके/ दे रहे जान

रचना श्रीवास्तव जी के प्रेम आधरित हाइकु मनभावन हैं। कोमल भावनाओं को छूते ये हाइकु देखिए-

मैं नर्म लता/ तुम तरु विशाल/लिपटी फिरूँ

डॉ. सुरंगमा यादव जी का यह हाइकु बेबसी, व्याकुलता और असफलता के भावों का सामंजस्य करने में बहुत सफल रहा।

कितना सींचे/ पत्थरों पर कब/ उगे बगीचे

गाँव, गुलमोहर, साँझ, यादें विषयों को लेकर रचे गए अनिता मण्डा जी के सभी हाइकु बेहतरीन हैं। इस हाइकु में नम्रता की महिमा का सुंदर परिचय है-

धारियों जैसी/पत्थरों पर बनी/ पानी की स्मृति

पूनम सैनी जी के गम्भीर हाइकु न लेकर मैं बचपन वाली शरारतों पर ले रही हूँ। कितना कुछ कह रहा यह हाइकु-

नटखट से/ बचपन के आँसू/नौटंकी भरे

नीलमेंदु सागर जी के इस हाइकु ने विकास, पलायन, अपरिमित आकांक्षाएँ, उपेक्षाएँ जैसे कितने ही भाव समेट लिये हैं-

हुआ विकास/नींव को छोड़ छतें/ चढ़ीं आकाश

डॉ.गोपालबाबू शर्मा जी के सभी हाइकु मुझे अचम्भित कर रहे हैं। समाज को आईना दिखाते सभी हाइकु बहुत ही सटीक हैं-

बात अजीब/ संपन्न बुढ़ापा भी/ अति ग़रीब

वेदना से संगीत फूटता है, इसका संप्रेषण डॉ. सुरेंद्र वर्मा जी के हाइकु में –

बाँस की ओट/संगीत का फूटना/ हवा की चोट

डॉ.उपमा शर्मा जी का बहुत प्यारा हाइकु है यह। दुआओं के  प्रभाव को रेखांकित करता हुआ-

होती कहाँ हैं/दुआएँ बेअसर/ तुम हो मिले

मुमताज खान जी के पहले हाइकु ने ही मन जीत लिया। ज्योत को दीये का सुदृढ़ संबल मिलता तभी वह अपनी छटा बिखेरती है। दीप जैसा स्नेहिल होना बहुत बड़ी बात-

नन्हा- सा दीप/ले गोद में ज्योत को/दिखाए प्रीत
प्रकृति का बिंब लिये डॉ. सुषमा गुप्ता जी हाइकु मनभावन है-

भोर परोसे/सुंदर-सा सपना/ सूरज थाली

रश्मि शर्मा का हाइकु जाने कितना कुछ बयाँ कर रहा-

कैसे कहूँ कि/ तुम्हारे न होने से/ क्या क्या बदला

प्रीति गोविंदराज का यह हाइकु मार्मिकता का चरम है-

खिलौने पोंछे/ सेठ की दुकान में/छोटू आँसू से

डॉ.शैलजा सक्सेना जी का यह हाइकु झूठे मुखौटों का विरोध कर कह उठा-

रोने भी दो न!/क्यों चिपकाऊँ व्यर्थ/झूठी मुस्कान !

सुनीता पाहुजा जी का यह आध्यात्मिक हाइकु बहुत सुन्दर है। संसार रूपी समुद्र कोई कैसे पार करे जब मन रूपी नाव मे माया मोह रूपी जल भरा हो-

कैसे हो पार/सागर ये अपार/नाव में पानी

स्मृतिशेष

*डॉ भगवती शरण अग्रवाल जी का हाइकु-मेरे घर में/ छः जने, चार दिशा/ नभ और मैं

*डॉ रमाकांत श्रीवास्तव जी-सूनी वीथी में/ शेफाली बन झरी/हँसी वन की

-0-

अपने नाम के अनुरूप शैल शिखर सा सुंदर हाइकु संकलन के लिए समस्त टीम को साधुवाद व शुभकामनाएँ।

शैलशिखर( वैश्विक हाइकु-संग्रह):सम्पादक द्वय- डॉ. हरदीप कौर सन्धु , डॉ. कविता भट्ट,पृष्ठ:160, मूल्य: 350 रुपये, प्रकाशक :अयन प्रकाशन, जे-19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 27, 2021

2210

डॉ.  सुरंगमा यादव
1
SURANGAM YADAVगढ़ न पाए
सुख की परिभाषा
खुद  ही मन।
2
खुद न जाने
किस सुख के पीछे
मन ये भागे।
3
जीवन- नभ
मन चाँद सलोना
इच्छाएँ तारे।
4
भटके मन
मृगतृष्णा जीवन
सुख दुर्लभ।
5
शाम जो ढली
सूरज ने बदली
अपनी गली।
6
निद्रा आलय
मन करता भेंट
स्वप्नों के संग।
7
शीत विलास
मद्धिम पड़ गया
धूप का हास।
8
पंक का ऋणी
पर पंक से परे
मैं पंकज हूँ।

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 22, 2021

2209

शशि पाधा  

चाँद ने बाँधी  

किरणों की लड़ियाँ  

धरा- मुँडेर।

भूलभुलैयाँ  

गगन की गलियाँ  

खो गई रात ।

हवा से कहो  

उनींदी- सी धरती  

मौन में बहो ।

शिशु -सा मन  

सुधियों का संदूक  

बीता टटोले। 

5  

मिट्टी की खुश्बू 

कल-कल झरना  

पहाड़ी गीत। 

झरते पात  

आहट शरद की  

धरती सुने ।

परछाइयाँ 

संग- संग चलतीं  

निभातीं साथ।

हवा का झोंका  

सिहर उठा तन  

माँ- सा आभास।

आँख से गिरा  

बूँद-बूँद सपना  

अधूरा प्रेम। 

10 

मत छेड़ना  

विस्थापन का  गीत  

रोएगी घाटी।

11 

खोल झरोखा  

तुम जो आन  खड़ी 

भ्रमित चाँद। 

12  

ढोलक थाप  

गाँव -गाँव मुदित  

तीज-त्योहार।

13 

कैसे मैं लाँघूँ 

बाबुल की देहरी  

तुलसी रोके।

14 

परम्पराएँ 

जीवन धरोहर  

अमोल निधि। 

15 

उड़ते पंछी  

न सीमा, न दुश्मन  

युद्ध विराम।

Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 20, 2021

2208

1-प्रेम- छाँव घनी

रश्मि विभा त्रिपाठी

1

rashmi vibhaतुमने दी है

प्रेम- छाँव घनी

अमृत बनी।

2

और क्या माँगूँ

देके प्रेम सहारा 

मुझे सँवारा।

3

मेरी झोली में

तेरे नेह के फूल

हरेंगे शूल।

4

तुम्हारा प्रेम

प्राण-मन की पूँजी

हर्षाता है जी।

-0-

2-घोंसले में परिंदे

पूनम सैनी

1

नाज़ुक पंख

punam-sainचीरती आसमान

ऊँची उड़ान।

2

आया तूफ़ान

घबराया घास का

नन्हा मकान।

3

कर्मठ चिड़ी

बटोरे चुग्गा– पानी

नन्ही– सी चोंच।

4

बाट निहारें

घोंसले में परिंदे

माँ तुम कहाँ?

5

लाड़ लड़ाती

हिम्मत का पाठ भी

माँ ही सिखाती।

-0-

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 18, 2021

2207

भीकम सिंह

1

भोर पहने

दूब से घिरा रेत

खुश हैं खेत।

2

फसलें ओढ़े

दिन भीगा खेत में

आँसू से रात।

3

ज्यों युद्ध लड़े

गाँव ख्वाबों में दिखे

खेतों में पड़े।

4

ओलों से झड़े

धान हो गए खड़े

ज्यों भाव चढ़े।

5

लेके छतरी

दूब को मान देने

ओस उतरी।

6

फसलें झड़ें

मौसम ज्यों दिल्लगी

खेतों से करें।

7

छानें उड़ा दी

आँधियों ने लिंटर

डरके छुआ।

8

ठेकों पर बैठे

छोड़के कृषि-कर्म

गाँव के धर्म।

9

ओढ़े घुटने

गाँवों ने छिपाए हैं

जिस्म अपने।

10

गाँव आ बसे

शहर मथने को

आकर फँसे।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 14, 2021

2206-करूँ प्रतीक्षा

1- अग्नि- परीक्षा!

रश्मि विभा त्रिपाठी

1

करूँ प्रतीक्षा

राम ! ये अन्तिम हो

अग्नि- परीक्षा!

2

दयाविहीन!

जग में न बजाना

व्यथा की बीन।

3

न पूछें हाल!

देख दिल- इमोजी

उठा सवाल।

4

भेजें इमोजी

मुँह पे लगा ताला

रिश्ता निराला!

5

भेजी इमोजी

मुख से नहीं बोले

वे मनमौजी।

6

अपनें रचें

कपट– चक्रव्यूह

काँपती रूह!

7

रोया घमंड!

काल की लाठी की है

मार प्रचंड।

8

कहाँ सराहा?

ईर्ष्या- अग्नि में किया

स्वयं को स्वाहा!

9

विद्वेष हावी!

जीवन का दहन

अवश्यम्भावी।

10

करे तू दाह

अपना ही जीवन

औरों से डाह!

11

कृशकाय है

करुणा- भाव- नदी

कष्ट में सदी!

12

कर विध्वंस

ईर्ष्या- पूजक बने

‘परमहंस’!

13

द्वेष के रोगी

भेजें प्रेम-इमोजी

क्या टैक्निक है?

14

देव शर्मिंदा

आँख का पानी मरा

नर क्यों जिन्दा।

15

शुरू रिश्तों में

भारी उधेड़बुन

लगा है घुन।

16

कैटरैक्ट है!

दिखे न प्रेम, बाकी

परफैक्ट है।

17

प्रेम से खाली

मन का अंतर्गृह

जाता है ढह।

18

बड़े निर्मोही

मन का गाँव भूले

रिश्ते- बटोही।

19

देख दरार

संबंधों में दीवार

दर्द में द्वार।

20

कैसा तू दोस्त

मन- प्लेट परोसा

‘छल’ का गोश्त!

21

कीर्ति पे मूक

कैसे दे दुर्भावना

शुभकामना!

-0-

2-भाई

रश्मि विभा त्रिपाठी

1

बालती दीए

बहन दुआओं के

भाई के लिए।

2

माँगूँ मैं वर

मेरा भाई ईश्वर!

चिरंजीवी हो।

3

तू मोद मना

मेरी यही है भाई

शुभकामना।

4

दुआ के फूल

तुम्हारे हेतु भाई

मैं चुन लाई।

5

दूँ उम्र वार

भैया करो स्वीकार

ये उपहार।

6

भाई चंदा- सा

सदा ही चमचमाए

झूमे, मुस्काए।

7

भाई फूल- सा

सदा खिलखिलाए

मोद मनाए।

8

खिलो फूल- से

भाई दुखी न होना

कभी भूल से।

-0-3-

प्रीति अग्रवाल

प्रीति-हाइगा

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 11, 2021

2205

दीपावली के बाद

कपिल कुमार

1

दीपक जले

घर की मुँडेर पे

सुबह तक। 

2

इस दीवाली

अमावस्या की रात

खा गई मात। 

3

सभी दिल के

दूर हुए शिकवे

गले मिलके।

4

सारी सहेली

मिलकर बनाए

रम्य रंगोली। 

5

धन-वैभव

घर पे दे दस्तक

झुके मस्तक।

6

देखें चंद्रमा

चमकती धरती

मेघों में छुप। 

7

लौटा तिमिर

हो कर पराजित

ज्यों दीप जले। 

-0-
कपिल कुमार,असिस्टेंट प्रोफेसर, मिहिर भोज पी.जी. कॉलेज

दादरी, गौतम बुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश-203207.

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