Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 13, 2022

2285

कपिल हाइगा

1-अशोक ‘आनन’

1

थिरक रहीं

मेघों की थापों पर

नन्ही—सी बूँदें।

2

आसमान में

आवारा-से घूमते

काले बादल।

3

आग लगातीं

आग लगी घटाऍं

कपासी-देह।

4

लहरें आईं

सब बहा ले गईं

प्यार न बहा।

5

रीते मेघों में

ढूँढ रहीं खुशियाँ

प्यासी अँखियाँ।

6

प्यासी धरा को

मेघ पिलाते पानी

मेहरबानी।

7

रेत के घर

ढहा देती बारिश

मासूम रोते।

8

वर्षा भी अब

भीग गई पानी में

छाता नहीं था।

9

पानी माँगा था

प्रभु! तबाही दे दी

धन्य हैं आप।

10

पाँव फिसला

नदियाँ पर्वतों से

फिसल गईं।

11

कटि लचकी

छल-छल छलकी

मेघ-मटकी

-0–Email ashokananmaksi@gmail. com

-0-

2-श्याम सुन्दर अग्रवाल, जबलपुर
1.
प्राण-आकाश
का ही ये खेल सारा
जग हमारा।
2.
मरना क्या है?
पहनो वस्त्र नये,
डरना क्या है!
3.
जाऊँगा जहाँ,
भेजने वाले को ही,
पाऊँगा वहाँ।
4.
हम लाए क्या?
खाली हाथ आये थे
ले जाएँगे क्या ?
5
साँझ सामने
लगे लौटने पंछी,
घर आपने ।
6
रात तो हुई,
चाँद नहीं निकला,
मावस जो थी।
7
बाग बगीचे,
बरखा बिछवाए,
हरे गलीचे।
-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 12, 2022

2284

रश्मि विभा त्रिपाठी

1

7-RASHMI VIBHA TRIPATHIढूँढती राखी

अंधे की वो बैसाखी

किधर गई!

2

बँधाते राखी

बस यादों के पाखी

बढ़ाते मान।

3

राखी शर्माई!

परम्परा की भी जो

हुई विदाई।

4

फर्द ही फर्द

राखी का हमदर्द

अकेलापन!

5

माथे मना लो

मेरा रक्षा- सूत्र कान्हा

तुम्ही सम्भालो!

6

हाथों से छूटी

स्नेह की डोरी की तो

किस्मत फूटी!

7

सूना था साल

सलूनो का कमाल

पूछेंगे हाल!

8

आती ही नहीं

आजकल हिचकी

राखी भी थकी!

9

बोलता नहीं

कभी छत पे काग

किसको लाग?

10

जर्जर तार

रेशम का था कभी

आज बेकार!

11

उलझा तार

नेह की डगरिया

खार ही खार!*

12

लाज बचाई!

त्योहार पे ही सही

याद तो आई।

13

पर्व-उल्लास

स्क्रीन पे समेटा

गजब डेटा!

14

थाली में पड़ा

धागा श्रद्धा में जड़ा

बन्धन बड़ा!

15

मन दरका

मेरी राखी को मिला

खाली ‘भरका’!*

 -0-*
1- ब्रज क्षेत्र में खार शब्द से तात्पर्य भारी वर्षा में मिट्टी के धँसने या कटान से बनी गहरी खाई।
*
2- जंगल, पहाड़ का गहरा गड्ढा। ( चम्बल में बहुतायत में पाया जाने वाला,वहाँ उस समय के डाकू छिपते थे, सामान्य जन का जहाँ जाना असम्भव है )
चम्बल में एक कहावत भी प्रचलित है- भरका में जाइ परौ। अर्थात कभी न लौटकर आने के लिए गुस्से में किसी को कहना।

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अगस्त 10, 2022

2283

1-श्याम सुन्दर अग्रवाल, जबलपुर

1
घोर अँधेरा
प्रकटा दिनकर,
हुआ सवेरा।
2
उमर बीती,
लड़ाई जिंदगी की,
किसने जीती ?
3
सुबहो-शाम,
हे राधा, हे राधिके,
टेरे है श्याम।
3
कुछ न बोल,
उड़ गई चिड़िया,
पिंजरा खोल।
4
कैसी बरखा,
जब कृषि सुखानी,
हिया दरका।
4
मिले न चैन,
उन संग उलझे
बावरे नैन।
5
कैसे समझें,
किसको समझाएँ,
कौन बताए?
6
पीर बढ़ेगी,
होगी जग जाहिर,
हँसी उड़ेगी।
7
प्रश्न कितने ,
सभी अनुत्तरित,
झूठे सपने।
8
अपना कौन,
सबके सब मौन,
बताए कौन?
9
गया जमाना,
आता नहीं दुबारा,
गया, सो गया।
10
बहती जाए,
नदिया जब तक,
सागर आए।
11
पंख पसार
खग, अपना नभ,
करो विहार।

-0- shyamsunderagrawal.1945@gmail.com

 2-अशोक ‘आनन ‘

पेड़ों के साथ

जब तक हैं पत्ते 

पेड़ हरे हैं ।

मेघों को देख

नदियों के मुँह में

पानी आ गया ।

बिजलियों को

अब सुहाते नहीं

काले बादल ।

दु:खियारों के

बह गए सपने

पानी के साथ ।

बिन चिंगारी

सुलग रही देह

मेघ अंगारे ।

क़हर ढातीं

कलमुँही घटाऍं

दया न आती ।

पावस – पाती

लेकर फिर आए

मेघ- डाकिए ।

जी भर रोईं

वर्षा की रुदालियाँ

सावन मास ।

बिन बारिश

भीग गया है तन

रोए इतने ।

10

वर्षा ने ताने

मेघों के शामियाने

आसमान में ।

11 

 

दिखते नहीं

काग़ज़ की कश्तियाँ

बहाते बच्चे ।

। Email : ashokananmaksi@gmail.com

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 8, 2022

2282

1-विनीत मोहन औदिच्य

1

हिंदी दिवस

लाया यक्ष प्रश्न

कैसे मनाएँ।

2

है परित्यक्ता

अभिजात्य वर्ग की

अस्पृश्य हिंदी ।

3

भू पटल हो

हिंदी विराजमान

करें संकल्प ।

4

न हो विस्मृत

दैनिक व्यवहार

सरल हिंदी ।

5

जागे जो मान

समृद्ध हिंदी प्रति

अक्षुण्ण कीर्ति ।

6

लाए उन्नति

निज भाषा गौरव

हिंदी महान ।

7

है सुशोभित

भारती भाल बिंदी

सरस हिंदी ।

8

संस्कृत- सुता

प्रसारित करती

ज्ञान प्रकाश।।

-0-सागर, मध्य प्रदेश

 -0-

2- कपिल कुमार

1

नभ से खींचे

सौदामिनी फ़ोटो, ज्यों

कैमरामैन। 

2

नभ में मेघ

घूमते मनमौजी

रेल में बैठ। 

3

नभ से धरा

प्राकृतिक फव्वारे

वर्षा उतारे। 

4

तपता रवि

नभ के वक्ष पर

जलता चूल्हा। 

5

भोर में रवि

दूध में नहाकर

नभ में चढ़ा। 

6

मेघों ने बुन

नवीन ताने-बाने

भू को भिगोया। 

7

नदी सिखाती

उत्थान-अवनति

जीवन गति। 

8

नभ में शेष

मेघों के अवशेष

बूँदों रहित। 

-0-

3-पुरुषोत्तम  श्रीवास्तव ‘पुरु’

पुरुषोत्तम पुरु

पुरुषोत्तम श्रीवास्तव ‘पुरु

1
नयन सर
स्मृति के हंसावर
किलोल करें।
2
बाँचें नयन
जहाँ लिखे अनंत
प्रेम बयन ।
3
नयन पट
अब क्यों कर खोलें
पिया हिय में।
4
नयन भाषा
पढ़ सके वही जो
निश्छल हिय।

5
नयन -प्याले
भरे नेह सुधा के
अंक पिया के।
6
नयन- दीप
जला यत्न से रख
पिय के द्वारे।
7
नयन बोलें
मन मिसरी घोलें
बंध हिय के।
8
नयन बिछा
देखे राह राम की
गुरु आशीष।
9
छवि राम की
है नयनाभिराम
अमी प्रेम की।

-0-उपमहानिदेशक (से.नि.),111/191 मध्यम ,मार्ग,  मानसरोवर,  जयपुर,  राजस्थान, भारत।

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अगस्त 2, 2022

2281

        

1-विभा रश्मि

1

शांत हो बही

कैनवस की नदी

सदियों तक ।

2

बच्चा उकेरे

पेंटिंग में तरंगें

अनवरत ।

3

जलधि शोर

साँझ से हुई भोर

सिकता – छोर ।

4

भीगे  रेत पे

क़दमों के निशान,

रेले में  बहे ।

5

सीपियाँ ढेर

सौंप देता सागर

तट की गोद ।

6

लाल ‘कोरल’

समुद्र की बस्ती में

आरामगाह ।

7

झील ने झेली

कलयुगीन मार

प्रदूषण  की ।

8

उड़ा बगुला

साइब्रेरिया छोर

सिंधु की ओर ।

9

चाँद चहेता –

रत्नाकर ठिठका

पूनो सौंदर्य  ।

10

थी जिजीविषा ,

समुद्र आजीवन

ही  हहराया  ।

11

आलता रचा

भोर सुंदरी बैठी

सर तट जा ।

12

रेत पे लिखे

प्रिया पाती पिय को

सर के तीर ।

13

रेत पे लिखे

पोरों से पाती , प्रिया

नद कूल पे।

-0-

2-अनुपमा अनुश्री, भोपाल

1

अद्भुत सारे

उन्मुक्त से नजारे

हसीं वादियाँ।

2

खिलखिलाती

 प्रस्फुटित फूलों सी

चंचल हँसी।

3

झरती बूँदें

चारु शिवाभिषेक

मनभावन।

4

काले बादल

हवाओं की लय पे

 शुभ आग़ाज।

5

बहुत ख़ूब

मौसम का ये रूप

मिली राहत।

6

तुम आज़ाद

न अब हम क़ैद

स्वयं का छंद।

7

सित वसन

हिमाद्रि तुंग शृंग

विरागी मन।

8

शुभ प्रभात

प्रमुदित पल्लव

 तुहिन वृष्टि।

-0-ashri0910@gmail.com

Posted by: हरदीप कौर संधु | जुलाई 29, 2022

2280

कपिल कुमार

हल ने चूमी

हलवाहाज्यों ही बंजर भूमि

अंकुर फूटा। 

2

नदी के पथ

मेघों ने हाँके रथ

जल में डूबे। 

3

मेघों ने भरी

ज्यों दूध की हँडिया

पगडंडियाँ। 

4

वर्षा ज्यों रूठी

नभ की धरा संग

प्रतिज्ञा टूटी। 

5

ओस ज्यों गिरी

बढ़ती मंद-मंद

मिट्टी की गंध। 

6

मंडी के दाम

खेत ज्यों पके, गिरे

सुबह-शाम। 

7

शाम ढलते

हाली मंडी से लौटें

हाथ मलते। 

8

खेत चुकाते

हँसते-कराहते

हाली का कर्ज। 

9

हाली को रोज

नश्तर– सा चुभता

कर्ज का बोझ। 

10

पढ़के मंत्र

ओले खेत रौंदे, ज्यों

कोई षड्यंत्र। 

11

गाँव देखते

पोस्टमैन की बाट

खड़े उदास। 

12

आँखों को फोड़े

धुआँ सिर पे छोड़े

ईटों के भट्टे।

13

गाँव है प्रौढ़

शहर चले हाली

उनको छोड़। 

14

गाँव बदले

अपने रंग-ढंग

बेला के संग। 

15

सूखे ज्यों खेत

फसलों की जगह

उगता रेत। 

16

खेत है रोते

सूखी नदियाँ देख

जागते-सोते।

 

-0-(हाली=हल चलाने वाला)

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जुलाई 22, 2022

2280

कपिल कुमार

1

ओस

1

आँखों को मूँदे

दूब से गले मिली

ओस की बूँदे। 

2

ओस को देखें

मेघों में छुप भानु

ज्यों गुप्तचर।

3

भोर में ओस

दूब से गले मिली

भर के जोश। 

4

ओस ने लिये

दूब से सात फेरे

साँझ-सवेरे। 

5

ओस ने किया

वसुंधरा का रुख

प्रेम की भूख। 

6

दूब समेटे

धरा पे लेटे-लेटे

ओस की बूँद। 

7

ओस ज्यों गिरी

दूब चूमने लगी

प्रेम से घिरी।

8

धूप ने छीनी

ओस ने भू को दी, जो

सुगंध भीनी। 

2

नदी

1

सूखी कटेगी

क्या इक्कीसवीं सदी

पूछती नदी। 

2

नदी ने किया

दुःख ही दुःख फील

हजारों मील। 

3

मेघों ने भरें

झरने फटाफट

नदी के तट। 

4

नदी की गति

शहरों ने की अति

मन्द हो चली। 

5

ऊँचे झरने

भू से प्रेम करने

तुंग से आएँ। 

6

नभ से मेघ

बूँदे फेंक बढ़ाते

नदी का वेग। 

7

मेघ ज्यों झरे

नदी, पोखर, झील

हो गए हरे। 

8

मेघों ने खोलें

बन्द पड़े किवाड़

गाँव में बाढ़। 

9

ज्येष्ठ की धूप

सुखाके चली गई

पोखर-कूप।

10

कुआँ-मुँडेर

बाट देखते हुई

वही पे ढेर।

3

उषा

1

रवि ज्यों जागा

बोरी-बिस्तर उठा

तिमिर भागा। 

2

उषा उड़ाती

तम के परखचे

ज्यों शत्रु सच्चे। 

3

तारों से मढ़ी

जुगनू की बारात

रात में चढ़ी।

4

झील में तारे

बच्चे पत्थर मारे

नाचते-गाते। 

5

तम का अन्त

रवि, उषा ले आता

दिग्-दिगंत।

-0-

Posted by: हरदीप कौर संधु | जुलाई 17, 2022

2279

विभा रश्मि

1

चंद्र , भास्कर 

घोलें हैं  रूपा , स्वर्ण 

झील सिंगार   । 

2

सोने के तार 

झील -वधू ने धारे

ले लो बलैयाँ ।

3

भोर से साँझ

खगकुल किलोल  

लावण्य झील ।

4

सर का पानी 

ओढ़नी ओढ़े  धानी 

मीन हैं  रानी  ।

5

टूट आ गिरा –

नभ झील में तैरा

नील है घुला  ।

6

नन्ही  की आँखें 

झील की ज्यों दो फाँकें

कौतुक भरी ।

7

झील- प्रवाह 

लहरों के तारों पे 

थिरका गीत । 

8

गाँव की झील 

सदैव  झिलमिल 

रूप गर्विता  ।

9

हम संपन्न 

गर हों स्वच्छ झीलें

वादी हरित ।

 10

नाव बाज़ार

पर्यटक आकृष्ट 

गुल – बहार ।

11

न सुखा झीलें 

नेहिल अमृतमयी

माँ  हैं  हमारी ।

12

धरा के वस्त्र 

नद झील सागर 

भरी गागर ।

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जुलाई 14, 2022

2278

  1-भीकम सिंह 

1

कल-परसूँ

कर रहे हैं मेघ –

अब -बरसूँ ।

2

टहूके मोर

बरस पड़ने के 

पक्के आसार ।

3

बरस पड़े,

सावन ने जो मेघ 

ज़ेब से काढ़े।

4

फुहारें फेंके 

खदेड़ा हुआ मेघ 

पीछे को भागे ।

5

सुदूर कहीं 

हाथ झाड़ता मेघ

ढूँढ़े ज्यों ठेक  ।

-0-

2-कपिल कुमार

1

ले दूरबीन

अमा चाँद ढूँढती

ज्यों प्यासी मीन।

2

तारों को न्योता

नभ से ही लगाते

झील में गोता।

3

तम था डरा

उषा ने पाँव धरा

पहाड़ी पीछे।

4

नभ में तारे

अँधेरे में घूमते

तंग बेचारे।

5

तारे बेखौफ़

झील में ज्यों नहाते

नाचते- गाते।

6

बैठी है प्यासी

झील, धारा, नदियाँ

बारहमासी।

7

असंख्य बूँदें

बनी नदी विशाल

संघ की चाल।

8

किरणें फूटीं

भोर ने नदियों से

सोना है लूटा।

9

इंद्रधनुष

भू सतरंगी माला

धारण किए।

Posted by: हरदीप कौर संधु | जुलाई 5, 2022

2277

अनिमा दास

1.

ANIMA DASअपूर्व धरा

प्रति ऋतु बहाती

धैर्य की धारा ।

2.

अश्रु प्लावित

हृदय जर्जरित

रुग्ण प्रश्न में ।

3.

तुम अध्वर

तुम उदधि स्वर

मैं क्लांत मौना ।

4.

पल्ली- प्रलाप

त्रस्त जीवन- तृण

मूक नगर।

5.

हे, चंद्रमल्ली!

शेष स्वप्न में निशा

मैं तपस्वी।

-0-कटक, ओड़िशा

Older Posts »

श्रेणी