Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 26, 2022

2269

डॉ पूर्वा शर्मा

पूर्वा शर्मा (2)

 

पूर्वा शर्मा (1)

 

पूर्वा शर्मा (3)

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 25, 2022

2268

1- रश्मि विभा त्रिपाठी

1

नैनों से झरी 

सपनों की मंजरी

सुरभि भरी।

2

आँखों में बोए 

तेरी यादों के बीज 

स्वप्न सँजोए!!

3

बड़ी उम्दा है

ख्वाबों की तरकीब 

छूटे करीब!!

4

स्वप्न में गाँव 

सर पे हाथ फेरे

लगूँ मैं पाँव।

5

है सपनों में

गाँव, पिकी की कूक

मन में हूक।

6

नींद में दिखें

गाँव, खेत, पीपल 

नैना सजल।

7

दूर बसेरा

पर तुम्हारा डेरा

सपना मेरा!

8

आँखों में बसी

तू छोड़के अलका 

नेह छलका!! *

9

नींद में आती

दे थपकी तू गाती

ख्वाबों की लोरी।

10

साथ तो छूटा!

ख्वाबों में गले मिले

क्रम न टूटा।

11

देवी- सी तुम

सपने में जो आतीं

प्राण जिलातीं।

-0-

*( स्व . सहोदरा सरस्वती को समर्पित )

-0-

 2-विभा  रश्मि 

1

बरखा बूँदें, 

छलक गई झील

लबालब हो ।

2

नीर प्रवाह 

सहृदया थी झील 

सदा तरला ।

3

आकाश झाँका

दर्पण – झील डूबा 

स्वयं को आँका  ।

4

चाँदनी निशा

झील झिलझिलती

लिखती पाती ।

5

झील प्रिया ने

लहरों  की नाव में  

ओढ़ी  चूँदरी  ।

6

खग तैरते

नीर को उलीच के

पंख भिगोते ।

7

शिकारे वाला

दिनभर चलाता

किस्मत – चप्पू  ।

8

फूल- सी प्रिया

झील का दिल सच्चा

देख मुस्काई  ।

-0-

3-कपिल कुमार

1

तिमिर दौड़ा 

उषा ने ज्यों लगाया

धोबीपछाड़। 

2

दीप लगाता

तम को अखाड़े में

बगलडूब। 

3

जुगनू मारे

ज्यों कलाजंग दाव

तमस चित्त। 

4

उषा ज्यों आई

तम ने भोर में ही

मुँह की खाई। 

5

भोर ने किया

तम को चेकमेट

उषा की चाल। 

6

उषा ज्यों आई

हुआ तम बेचारा

नौ-दो ग्यारह। 

7

दीप के नीचे

ज्यों आस्तीन का साँप

बैठा है तम।

8

उषा-तमाचा

भोर में तम ढूँढे

ठोर-ठिकाना।

9

भोर की बेला

पहाड़ों से निकला

रवि अकेला। 

10

भोर में रवि

खराब कर देता

तम की छवि। 

11

उषा-उजास

तम के लिए बने

गले की फाँस। 

-0-

चेकमेट:- (शतरंज में) शहमात; ऐसी स्थिति जिसमें विपक्षी अपने बादशाह को बचा न सके और हार हो जाए। 

-0-

 

 

Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 22, 2022

2267

1-अशोक  ‘आनन’

1

अशोक आनननन्हे मेघों की

खुल गईं शालाएँ

आषाढ़ मास

2

नभ में आई –

बादलों की बारात

नाचती – गाती ।

3

बूँदों के बस्ते –

लेकर शाला चले

नन्हे बादल ।

4

नदी – देह को –

ज्यों ही पानी ने छुआ –

वे पानी हुईं ।

5

बूँदें चल दीं –

मेघ-उँगली छुड़ा

धरा सींचने ।

6

प्यासी – नदियाँ –

पानी – पानी हो गईं

नैन सुखाने ।

7

बादल छाए –

मन – मयूरा नाचा

तुम न आए ।

8

पानी बरसा –

बहुत दिनों बाद

देह सुलगी।

9

बरस पड़े –

धरा की दशा देख

मेघों के नैन ।

10

साजन – घर –

चली , डोली में बैठ 

ग्रीष्म – दुल्हन ।

11

मेघों की डोली –

बूँदों की दुल्हनिया 

हवा कहार ।

12

बजने लगे –

मेघों के झुनझुने 

आषाढ़ मास।

-0-

    Email : ashokananmaksi@gmail.com

–0-

2-पुरुषोत्तम श्रीवास्तव ‘पुरु’

1
मुझे ना तोड़ो
पुरुषोत्तमजी, पूरा खिलने दो
अभी कली हूँ।

2
खिला यौवन
सतरंगी सपने
क्षण में बीते।

3
किससे बाँटे
दुख-दर्द  अपने
ठूँठ बेचारे।
4
काम-कजरी
अंतस पर छाए
विवेक जाए।
5
मन का कोना
वहाँ बैठ सोचना
कौन अपना।
6
झरता पत्ता
फिर याद दिलाए 
मृत्यु अटल।
7
दंभी बदली
कोई ढक ना सके
सूर्य अनंत
-0-
पुरुषोत्तम श्रीवास्तव ‘पुरु’
111/191 मध्यम मार्ग, मानसरोवर जयपुर
purupurujaipur@gmail.com

Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 19, 2022

2266-पिता

रश्मि विभा त्रिपाठी 

1

पिता- पराग!

बाल-भौंरे को बाग

समूचा सौंपें।7-RASHMI VIBHA TRIPATHI

2

पिता- प्रभास! 

जगें तो तम भूले

होशो-हवास।

3

पिता- प्रदीप!

करें अनोखी द्युति

तम की इति।

4

पितापिता- पूर्णिमा!

तिमिर की महिमा 

मिटाने आते।

5

पिता- माणिक!

यह दिव्य रतन 

दे तृप्ति- धन।

6

पिता- रजत!

प्रभा से सदा भरे

स्वर्ण- से खरे।

7

पिता- जुगनू! 

चलूँ तो टॉर्च चली

तम की गली।

8

पिता- शत्रुघ्न! 

प्रत्येक बाधा- विघ्न 

देखते भागे।

9

पिता देव- से!

करते अनुग्रह

काटते ‘ग्रह’।

10

पिता गीत- से! 

शाश्वत गति- लय 

शिशु अभय।

11

पिता सूर्य- से! 

स्वर्ण- किरण बाँटें 

तम को छाँटें।

12

पिता वेद- से!

पढ़के परित्राण

पा जाते प्राण।

13

पिता जेठ भी!

दिखाएँ दे के धूप 

जग का रूप।

14

पिता कहाए

निष्कपट, झूठों को

आँख न भाए।

15

परोपकार 

पितु का था एकल 

जीवन सार।

16

पिता धकेलें

दुखों के पर्वत को 

दुआ उड़ेलें।

17

पिता से मिला 

प्रत्यक्ष या परोक्ष 

मुझको मोक्ष!

18

पिता ने भरा 

मन का खाली कोष 

आशीष झरा।

19

पिता हैं फूल!

मेरे पंथ के शूल

चुनके खिले।

20

भले अदृश्य 

पर पिता अवश्य 

हाथ थामे हैं।

21

बैठे वे दूर 

बनाएँ मेरे हेतु

सुख का सेतु।

22

भले हैं दूर

पिता दुआ से करें

पीड़ाएँ चूर।

23

हैं अगोचर 

पिता पकड़े हाथ

चलते साथ।

24

पिता के संग

चली थाम उँगली 

आनन्द- गली।

25

पिता से पाऊँ 

आशीष- मकरंद 

झूमूँ सानंद।

26

दिव्य दर्शन! 

प्रेम- आनन्द- मूर्ति

करूँ वन्दन।

27

प्राय: निहारूँ

प्रेमानंद- प्रतिमा

पग पखारूँ।

28

अमंगल को

पिता टारें सदैव

निस्तब्ध ‘दैव’।

29

पिता की वाणी!

पावन वेद- ऋचा

शुभ कल्याणी।

30

पिता पथिक

विदा दे द्वार बैठे

निंदा रसिक।

31

जिनके लिए 

पिता थके न ऊबे 

‘निंदा में डूबे’।

32

पिता कोने में 

किए- धरे को बन्धु!

व्यस्त धोने में।

33

पाया जो शाप! 

पिता का एक पाप

था परमार्थ।

Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 16, 2022

2265

कमला निखुर्पा

(आज बहुत तेज हवाएँ चलीं। लगता था पेड़ उखड़ जाएँगे। गर्जन के साथ  बारिश हुई और माटी की  सोंधी महक के साथ मौसम सुहावना हो ग़या। ऐसे में  भाई का गुरुमंत्र याद आ  गया-कोई विचार आए,तो तुरंत लिख  डालो …। बस आज इस तरह ये हाइकु बनें।)मेघमाला

1

जिद्दी पवन 

धकेलती तरु को 

खेलन चलो

2

घमंडी तरु 

हो टस से न मस 

हवा बेबस

3

छुपके हँसी 

खिल-खिल बिजुरी 

डपटे घन

4

गर्जन सुन 

रोई नन्ही बदरी 

बूँदों की झड़ी

5

शीतल हुई 

जो तपन धरा की 

हवा महकी

Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 12, 2022

2264

1-कमला निखुर्पा

1

कमला निखुर्पा-पिथौरागढ़हँसती रही 

घड़ी की दो सुइयाँ 

भागी जिंदगी। 

2

बाँधती रही 

कल्पना के पंखों को 

हठीली कुर्सी ।

3

कितने किस्से

कहानियाँ कितनी

हमने बुनीं।

4

रूठी कलम

चुप अब किताबें 

कर ली कुट्टी ।

5

मन का पंछी 

उड़ चला फुर्र से 

यादों के संग।

6

पल को खोजे 

मन के गलियारे

युग आ मिले।

-0-

2- रश्मि विभा त्रिपाठी

7-RASHMI VIBHA TRIPATHI1

मिला आशीष

प्रिय- प्रेम- रूप में

कृपालु ईश!

2

ओढूँ, बिछाऊँ

मैं दुआएँ तुम्हारी

तभी जी पाऊँ!

3

अजेय हुआ

पाके तुम्हारी दुआ

मन ये मेरा।

4

पी दुआ- सोम

तृप्त है रोम- रोम

आभार प्रिये।

5

रखूँ जेब में

दुआओं का रूमाल

भीगें न गाल।

Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 9, 2022

2263

 

धूप—सुदर्शन रत्नाकर

1

लू के थपेड़े

ज्यों हो आग के गोले

झुलसें तन।

2

तपती धरा

व्याकुल पशु-पक्षी

उद्दण्ड धूप।

3

किरण-जाल

बाँध रहा संसार

थम भी जाओ।

4

हमने ही तो

काटे हैं बरगद

धूप क्या करे।

5

ताल-तलैया

सूख रहें हैं सब

प्यासी है मीन।

6

रेत के टीले

दहकते ज्यों शोले

तीव्र किरणें।

7

आग ही आग

जल रहे जंगल

भीषण ताप।

8

ज्येष्ठ मास में

आग है बरसाता

क्रोधित सूर्य

9

तपा सूरज

धरती गरमायी

व्याकुल सृष्टि।

10

बहता स्वेद

झुलस रहे तन

नहीं है छाया।

-0-

सुदर्शन रत्नाकर, ई-29, नेहरू ग्राउंड, फ़रीदाबाद 121001

Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 8, 2022

2262

1-बाँटता आग!

-रश्मि विभा त्रिपाठी

1

ये लू लपट!

अरी बरखा तू आ

इसे डपट।

2

गरमी बढ़ी!

वर्षा रानी घुमाओ

जादू की छड़ी।

3

बाँटता आग!

सूर्य के हाथ जोड़े

दीन तड़ाग।

4

पढ़ी न जाएँ

जेठ में लिखे हवा

लू की कथाएँ।

5

लू-यातनाएँ

हवा के गर्म कोड़े

सहे न जाएँ।

6

जरा जी जाएँ!

जेठ में रच हवा

सौम्य-ऋचाएँ।

7

सूर्य झील का

मृदु-गात तपाए

कौन बचाए?

8

पेड़ों का साया

यदि सर से छीना

जलते जीना!

9

सूखा जा रहा

नदी, झील, झरना

प्यासे मरना!

10

बाहर ठूँठ

घर में गुलदस्ते

देव हँसते।

11

विदीर्ण होती

ओजोन की चादर

झेलो कहर!

12

न हो विमुख

ओजोन छिद्र जैसे-

सुरसा-मुख।

13

दशा बिगड़ी!

धरा ज्वर में पड़ी

संकट-घड़ी।

14

धरती माँ का

ग्लोबल वार्मिंग से

तपता माथा।

15

पड़े फफोले!

भू का तन न देखा

हो बड़े भोले।

16

तू एक दिन

मना पृथ्वी दिवस

हुआ उरिन!

17

रख सँभाल

ओजोन की छतरी

लगा गथरी!

18

रक्षा कवच

ओजोन का जो टूटा

जीवन रूठा।

19

बैठी उन्मन!

दिन-दिन सूखता

नदी का तन।

20

भोगोगे दुख!

भड़कती ओजोन

बा रही मुख।

21

बचा ले जल!

या आचमन कर

आँसू से कल।

-0-

अनिता ललित

चाँद

Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 6, 2022

2261

डॉ. कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’

[अवधी में  अनुवाद- रश्मि विभा त्रिपाठी]

1

मेरे आँगन

प्रतीक्षा गीत गाए

प्रिय आ जाए।

 

मोरे अँगना

अगोरा गउनावै

पिय आवइ।

2

प्रिय! प्रतीक्षा

शीत- सी है चुभती

कब आओगे।

 

पिय! अगोरा

सीत अस सालहि

कबै अइहौ।

3

धरा के प्राण

अम्बर में बसते

किन्तु विलग।

 

भुई के प्रान

अम्बर माँ बसहिं

तहूँ नियार।

4

जब भी जागूँ

मन- प्राण समान

तुमको पाऊँ।

 

जब्हूँ जागहुँ

मन- परान सम

तुम्का पावहुँ।

5

घाटी- सी देह

नदी प्राण- सी बहे

गाती ही रहे।

 

घाटी-स देहीं

नदी प्रान-स बहै

गउतै रहै।

6

बहे है नीर

हुईं आँखें भी झील

झील के तीर।

 

बहइ नीर

आँखिंउँ हूँन झीलि

झीलि कै तीरे।

7

झील- सी हूँ मैं

देखो, खोजो स्वयं को

मेरे भीतर।

 

झीलि अस मैं

द्याखौ ट्वाहौ आपु का

मोरे भिंतरै।

8

यादों की बूँदें

मन- आँगन पड़ीं

सुगन्ध उड़ी।

 

सुधि कै बूँनी

ही- अँगना परिन

खुस्बू उड़िस।

9

आओ सजन

यादों के झूले पर

झूलेंगे संग।

 

आवहु कंत

सुधि कै झूला पैंहाँ

लगे झूलिबे ।

10

मन की पीर

बैठा है गाँव में ही

जमुना- तीर ।

 

मन कै पीर

बैठ गाँवइ मैंहाँ

जमुन तीर।

11

खिड़की रोई

दीवार से लिपट

मेरा न कोई।

 

खिर्की रोइसि

भितिया अँकवारि

मोर ना कौनि।

12

जब भी रोया

विकल मन मेरा

तुमको पाया।

 

जबौ रोइसि

अकुलान ही मोरा

तुमका पावा।

13

धरूँ बाहों में

तेरी बाहें सजन

सर्दी गहन।

 

धरौं बाँहीं माँ

तोरी बाँहीं साजन

जाड़ु गहन।

14

छीन न लेना

एक ही लिहाफ है

तेरी प्रीत का।

 

छिना न लीन्हौं

एकै लिहाफ हवै

तोरी प्रीत कै।

15

नेह तुम्हारा

सर्दी की धूप जैसा

उँगली फेरे।

 

नेह तुम्हार

जस घाम जाड़ा कै

अँगुरी फेरै।

16

बर्फ चादर

कली- सी सिमटती

देह की शोभा।

 

बर्फ़ जाजिम

कली अस सकिलै

देहीं कै सोभा।

17

पीपल छाँव

प्राण बसते जहाँ

कहाँ है गाँव।

 

पिपरा छाँही

प्रान बसइँ जहँ

गाँव ह्वै कहँ।

18

अलाव- सा है

सर्द रात पीड़ा में

प्रेम तुम्हारा।

 

कउरा अस

जूड़ राति पीरा माँ

नेहा तुम्हार।

-0-अनुवादक-विभा रश्मि त्रिपाठी

Posted by: हरदीप कौर संधु | जून 5, 2022

2260-पर्यावरण-दिवस

डॉ. सुरंगमा यादव
1
झरने गाते
पत्थर संग-संग
ताल मिलाते।
2
लेने दो साँसें
1-पर्यावरणजीवन भर देते
ये वृक्ष साँसें।
3
घुटने टेकें
कितनी ही व्याधियाँ
नीम के आगे।
4
पौधे लगाएँ
पाल्य समझकर
इन्हें बढ़ाएँ।
5
विटपराज
बिना पसारे हाथ
पाता समाज।
6
‘विकास’ नाम
वृक्षों का कर रहा
काम तमाम।
7
वृक्षों की बलि!
करता निज हानि
क्यों बुद्धिबली!
8
वन कटान
भविष्य का संकट
भूला इंसान।
9
वन उजाड़ें
अपने भविष्य की
जड़ें उखाड़ें।
10
सन्तान वृक्ष
आनंदित रखते
धरा का वक्ष।
11
प्रणयी वृक्ष
रचते अनुष्टुप
लता के संग।
12
धरा विदीर्ण
मेघों की मनुहार
करते वृक्ष।
13
छले भी जाते
सच्ची प्रीत निभाते
फिर भी वृक्ष।
14
भू के भूषण
नयन- सुख वृक्ष
वायु -शोधक।
2-पर्यावरण15
वैरागी वृक्ष
अपनी निधियों से
रहें विरक्त।
16
मिट्टी से जुड़े
तभी तो  तनकर
हैं वृक्ष खड़े ।
17
वन में पंछी
डाल-डाल फुदकें
करें मन की।

-0- [चित्रः गूगल से साभार]

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