Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 11, 2022

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1-भीकम सिंह 

1

नंगे हैं पाँव

गोखरूओं के गाँव 

ढूँढते ख्व़ाब

2

बमक उठा 

पगड़ण्ड़ी का मन

देख सावन।

3

गाँवों की राह 

बादलों ने पकड़ी

सीली लकड़ी।

4

मार के गोता

गाँव अपना मुँह 

नदी में धोता।

5

धूल ने ताने

हवाओं के सामने 

शस्त्र पुराने

6

रात की लाश

दिन पे टाँग गया 

कोहरा घना

-0-

2-रश्मि विभा त्रिपाठी

1 शरद की लौ 

1

शरद की लौ

आज नभ में जगी

जीवन पगी।

2

चंद्र– दर्शन 

सोम की घटा घिरी

बरसे घन।

3

शरद– राका

साँसों की लौ बढ़ती 

सोम- शलाका।

4

गगन- गंगा

चाँदनी की लहरें

मन उछंगा।

5

राका में लोक

अमृत पी रहा है

लगाके ओक। 

6

सोम का घड़ा

नभ से है छलका 

प्राण बल का।

7

रात ये खास

कान्हा का महारास

निधिवन में।

8

खूब बहाई 

चंदा ने सोम- धारा 

धरा नहाई।

9

टाँगे अंबर 

जुन्हाई की झालर

दमका घर।

10

कान्हा ने रोपी 

निधिवन में प्रीति 

प्रफुल्ल गोपी!

11

बाँटी रोशनी!

शरद का चाँद है

मन का धनी!!

12

जीवन मिला!

देखकर चाँद का

चेहरा खिला।

13

आँगन चढ़ी 

अमृत की नदिया 

नहान किया।

14

शशि की हँसी 

इसमें ही है बसी

जीवन- निधि।

-0-

2- आँखों के प्याले

1

आँखों के प्याले

सपने भरें सौ-सौ

स्वाद निराले।

2

ख़्वाब मायावी! 

आँखों के बंजर में 

बहा दी रावी!!

3

ख़्वाब में जो

तेरी की ज़ियारत

तभी राहत!

4

दुआ- से हैं! 

मुझे देते सबाब

तुम्हारे ख़्वाब।

5

तुम जो मिले!

तो रजनीगंधा- से

सपने खिले!!

6

पलकों धरी

सपनों की गठरी 

रात खोलेगी।

7

आँखों में तेरे

अनगिनत ख़्वाब 

 नहीं हिसाब।

8

ख़्वाब निगोड़े 

मैं बन्द कर हारी 

नैन- पिटारी।

9

मन आवारा!

सपनों के शहर में

फिरता मारा।

10

चले सदा ही  

ख़्याल के विपरीत 

ख़्वाबों की रीत!

11

हो जाती जड़ 

कुछ स्वप्न सुघड़ 

आँखों के पढ़।

12

सपनों में जो

गाँव के पाँव दिखें 

आँखें अर्घ्य दें।

13

इन आँखों में

कुछ स्वप्न सजाए

तूने बचाए!

14

तुम चहीते!

इसीलिए आँखों में

ख़्वाब हैं जीते।

15

पलकों पर

कुछ ख़्वाब लदेंगे 

खुशियाँ देंगे!

16

नैनों के द्वार!

सपनों की बारात

ले आया प्यार!!

17

मुझे ये चाह!

ख़्वाब की मंजिल हो 

वो हमराह!!

-0-


Responses

  1. सुंदर सृजन .. सभी हाइकु बढ़िया

    विशेषतः निम्न बिम्ब तो बहुत अद्भुत –
    मार के गोता
    गाँव अपना मुँह
    नदी में धोता।
    *
    शरद– राका
    साँसों की लौ बढ़ती
    सोम- शलाका।

    भीकम जी एवं रश्मि जी को बधाई

  2. मेरे हाइकु प्रकाशित करने के लिए सम्पादक द्वय का हार्दिक धन्यवाद, आभार ।
    रश्मि विभा त्रिपाठी जी ने कमाल के हाइकु रचे हैं, हार्दिक शुभकामनाएँ ।
    मेरे हाइकु पसन्द करने के लिए डॉ पूर्वा शर्मा जी का हार्दिक आभार ।

  3. हाइकु प्रकाशन हेतु आदरणीय सम्पादक द्वय का हार्दिक आभार।

    आदरणीय भीकम सिंह जी के हमेशा की ही तरह बहुत सुंदर हाइकु।
    अनंत शुभकामनाएँ 💐🌷

    आदरणीया पूर्वा शर्मा जी की आभारी हूँ कि आपको मेरे हाइकु पसंद आए।

    सादर

  4. अद्भुत बिम्ब, नवीन कल्पनाएँ।रचनाकार द्वय को अनेकानेक बधाइयाँ।

  5. बहुत सुंदर हाइकु। भीकम सिंह जी एवं रश्मि जी को हार्दिक बधाई।

  6. सभी हाइकु बहुत सुन्दर । भीकम सिंह जी और रश्मि विभा जी को दिली बधाइयाँ ।

  7. अलग-अलग भावो को उकेरते इन बेहतरीन हाइकु के लिए आप दोनों को बहुत बधाई


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