Posted by: हरदीप कौर संधु | जुलाई 29, 2022

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कपिल कुमार

हल ने चूमी

हलवाहाज्यों ही बंजर भूमि

अंकुर फूटा। 

2

नदी के पथ

मेघों ने हाँके रथ

जल में डूबे। 

3

मेघों ने भरी

ज्यों दूध की हँडिया

पगडंडियाँ। 

4

वर्षा ज्यों रूठी

नभ की धरा संग

प्रतिज्ञा टूटी। 

5

ओस ज्यों गिरी

बढ़ती मंद-मंद

मिट्टी की गंध। 

6

मंडी के दाम

खेत ज्यों पके, गिरे

सुबह-शाम। 

7

शाम ढलते

हाली मंडी से लौटें

हाथ मलते। 

8

खेत चुकाते

हँसते-कराहते

हाली का कर्ज। 

9

हाली को रोज

नश्तर– सा चुभता

कर्ज का बोझ। 

10

पढ़के मंत्र

ओले खेत रौंदे, ज्यों

कोई षड्यंत्र। 

11

गाँव देखते

पोस्टमैन की बाट

खड़े उदास। 

12

आँखों को फोड़े

धुआँ सिर पे छोड़े

ईटों के भट्टे।

13

गाँव है प्रौढ़

शहर चले हाली

उनको छोड़। 

14

गाँव बदले

अपने रंग-ढंग

बेला के संग। 

15

सूखे ज्यों खेत

फसलों की जगह

उगता रेत। 

16

खेत है रोते

सूखी नदियाँ देख

जागते-सोते।

 

-0-(हाली=हल चलाने वाला)


Responses

  1. गाँव, किसान व खेत से जुड़े सभी हाइकु बहुत भावपूर्ण, बधाई कपिल जी.

  2. बहुत ही भावपूर्ण हाइकु। सुंदर सृजन के लिए हार्दिक बधाई।

  3. सभी हाइकु सुन्दर, हार्दिक शुभकामनाएँ ।

  4. वाहह!!! सर,सार्थक सृजन 🙏🌹 आधुनिक जीवन शैली ने मूल जीवन मूल्य को नष्ट किया है…. 🙏साहित्य में ऐसी रचनात्मकता ही समाज को वास्तव परिस्थिति से मिलाती है। धन्यवाद सर 🙏🌹

  5. अपनी टिप्पणी देने के लिए एवं आगे भी साहित्य लिखने के लिए प्रेरित करने के लिए आप सभी का धन्यवाद।


रचनाओं से सम्बन्धित आपकी सार्थक टिप्पणियों का स्वागत है । ब्लॉग के विषय में कोई जानकारी या सूचना देने या प्राप्त करने के लिए टिप्पणी के स्थान पर पोस्ट न करके इनमें से किसी भी पते पर मेल कर सकते हैं- hindihaiku@ gmail.com अथवा rdkamboj49@gmail.com.

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