Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 18, 2021

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भीकम सिंह

1

भोर पहने

दूब से घिरा रेत

खुश हैं खेत।

2

फसलें ओढ़े

दिन भीगा खेत में

आँसू से रात।

3

ज्यों युद्ध लड़े

गाँव ख्वाबों में दिखे

खेतों में पड़े।

4

ओलों से झड़े

धान हो गए खड़े

ज्यों भाव चढ़े।

5

लेके छतरी

दूब को मान देने

ओस उतरी।

6

फसलें झड़ें

मौसम ज्यों दिल्लगी

खेतों से करें।

7

छानें उड़ा दी

आँधियों ने लिंटर

डरके छुआ।

8

ठेकों पर बैठे

छोड़के कृषि-कर्म

गाँव के धर्म।

9

ओढ़े घुटने

गाँवों ने छिपाए हैं

जिस्म अपने।

10

गाँव आ बसे

शहर मथने को

आकर फँसे।

-0-


Responses

  1. ओलों से झड़े
    धान हो गए खड़े
    ज्यों भाव चढ़े।
    बहुत ही भावपूर्ण हाइकु है सर जी।

  2. आज का सच है ये-
    ठेकों पर बैठे
    छोड़के कृषि-कर्म
    गाँव के धर्म।

    सभी हाइकु बहुत भावपूर्ण. बधाई भीकम सिंह जी.

  3. बढ़िया हाइकु हैं भीकम जी। हार्दिक शुभकामनाएँ।

  4. बहुत सुन्दर हाइकु।💐 सुन्दर विवरण

  5. एक से बढ़कर एक सुन्दर हाइकु।
    हार्दिक बधाई आदरणीय।

    सादर 🙏🏻

  6. सभी हाइकु बहुत सुंदर। हार्दिक बधाई आपको।

  7. मेरे हाइकु प्रकाशित करने के लिए सम्पादक द्वय का धन्यवाद और आप सभी का हार्दिक आभार ।

  8. बहुत अच्छे हाइकु, मेरी बधाई


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