Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जुलाई 29, 2021

2178-‘अप्रमेय’ नदी विषय पर हाइकु -संग्रह


अनिता मंडा

नदियों से जीवन है और जीवन  भी एक नदी ही है। बहुत सारे जीवन, बहुत सारी नदिया मिलकर संसार रचते हैं। aprameya-most-copyसंसार में रहते हुए अनेक प्रकार के अनुभवों की यात्रा प्राणी करता है। मानव को यह सुविधा मिली है कि वह अपनी अनुभूति की अभिव्यक्ति शब्दों के माध्यम से कर सकता है। कविता की एक विधा है ‘हाइकु’। आज विश्व की अनेक भाषाओं में इस विधा में साहित्य रचना हो रही है। 5-7-5 वर्ण के क्रम में संक्षिप्त  सार्थक भावाभिव्यक्ति करना एक चुनौती तो है, लेकिन निरन्तर साधना व संवेदनशील हृदय के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। नदी पर केंद्रित 38 रचनाकारों के 624 हाइकु समाहित किए हुए संग्रह है –‘अप्रमेय’ आया है ‘अयन प्रकाशन’ से; जिसका सम्पादन किया है भीकम सिंह जी ने। एक ही विषय पर अनेक रचनाकारों के हाइकु एक  संग्रह में पढ़ना अलहदा अहसास है। अलग अलग देशों से जुड़े रचनाकारों ने नदी को किस दृष्टि से देखा है यह देखने के लिए हम संग्रह से कुछ हाइकु लेकर बात करेंगे। एक ही रचना को पढ़ते हुए हर पाठक के अलग अलग पाठ हो सकते हैं; हम अपने अनुभवों के माध्यम से कविता तक पहुँचने की कोशिश करते हैं अतः सम्भव है मेरा पाठ कुछ अलग हो; जैसा भी मुझे समझ आया है, मैं आप सबसे साझा कर रही हूँ।

सबसे पहले हाइकु लिए गए आदरणीया डॉ. सुधा गुप्ता जी के; जो कि हिन्दी हाइकु में शिखर पर हैं; बल्कि यूँ कहिए कि हिन्दी हाइकु कविता की पर्याय हैं। सुधा जी के हाइकु मैं पहले भी पढ़ती रही हूँ। प्रकृति को देखने की जो विस्तृत दृष्टि इनके पास है, वह ताज़िन्दगी साहित्य को समर्पित रहने से ही प्राप्त की जा सकती है। 

इनके हाइकु में चित्र कितने सहजता से आते हैं देखिए : 

नदी कछार/ मँडराती चिड़ियाँ/ खोजती कीड़े।

चिड़ियों का भोजन की तलाश में नदी के कछार पर डोलते रहना, कितना सुंदर चित्र है।

ऐसे ही टिटहरी के संदर्भ में नदी का प्रसंग है : 

नदी किनारे/ टिटहरी न जाने/ किसे पुकारे!

नदी को केवल उद्गम और बहने के संदर्भ में न देखकर व्यापक रूप में देखना; गहन अनुभूति से ही सम्भव है।

इसी प्रकार नदी के मस्ती के रूप को देखना है:- 

नदी निकली/ झूमती-बलखाती/ घुमक्कड़ी पे। 

‘घुमक्कड़ी’ शब्द से जो व्यंजना निकल रही है कि नदी का बहना कोई बोझ नहीं बल्कि उसकी जीवंतता व मस्ती है।

नदी को तपस्विनी की उपमा, नदी के सूखने को रेत में सोने की उपमा, जीवनदायी नदियों के प्रदूषित होने को विष की उपमा, हिमनदों के पिघलने से मिले पानी को दान की तरह देखना समृद्ध कल्पनाएँ हैं।

नाव न माझी/ एकाकिनी तापसी/ बहती गंगा।

नदी न रोती/ सूखे हैं सारे आँसू/ रेत में सोती।

नदियों में बहनापा होता है। जब दो बहनें मिलती हैं, एक दूसरे को गले लगाती हैं। यह कितना सुंदर भाव-चित्र इस हाइकु में आया है; पाठक मन मुदित हो जाता है:-

मंदाकिनी से/ गलबाँही दे मिले/ अलकनन्दा।

नदी पर डॉ. गोपाल बाबू शर्मा जी के हाइकु नदी से आगे बढ़ने की प्रेरणा लेने का भाव जगाते हैं। यादों के दीप नदी में तैराना सुंदर बिम्ब दिया है। हरियाले खेतों में जब फ़सल पक जाती है ,  वे सोने की नदी के समान दिखती है; स्वर्ण के समान ही कीमती भी होती है। 

नदी समीप/ मन बैठा तैराता/ सुधि के दीप।

दूर तलक/ लहराई खेतों में/ सोने की नदी।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी ने नदी के बहने के स्वर को आवारा ढोरों के रँभाने के स्वर की उपमा दी है। कविता में ध्वनि को पकड़ना और लिख पाना जीवन को गहनता से देखने पर ही सम्भव है। नदियों के सिकुड़ने पर भी उनसे आकर मिलने वाली धाराओं के पद-चिह्न मिट्टी में बने रहते हैं। वे सूखी धाराएँ बिखरी हुई अलकों के सदृश दिखना एक बहुत सुंदर बिम्ब उद्घाटित करता है। पर्वतों से बूँद-बूँद जल एकत्र कर नदियाँ खेतों को सींचती हैं, जिससे कि वसुधा धन-धान्य सम्पन्न हो; जग के कल्याण को तत्पर नदियाँ सच में माँ ही हैं। ऐसा ही मानव जा मन भी होना चाहिए लेकिन दुर्भावना का विष मिलते ही मानव मन की नदी प्रदूषित हो जाती है। इतने सारे उदात्त भाव वाले हाइकु पढ़ना उर्वरक शक्ति देता है।

 उदास तट/ बिखरी हैं अलकें/ सूखी धाराएँ।

रँभाती नदी/ आवारा ढोरों-जैसी/ बस्तियाँ डूबीं।

गिरि अंक से/ बूँद-बूँद निचोड़ी/ खेतों को बाँटे।

विषैली हुई/ दुर्भावना-जल से/ मन की नदी।

डॉ. कुँवर दिनेश सिंह जी ने नदी के व्यथित रूप को अधिक चित्रित किया है। राजनीति व्यंग्य भी है परन्तु जिस हाइकु ने दृष्टि और मन को बाँध लिया वह है:- 

बहती नदी/ एक लंबी कविता/ ईश्वर- रची!

नदी को कविता की तरह देखना बहुत सुंदर भाव है। 

भीकम सिंह की के हाइकु में अद्भुत कल्पनाएँ तो हैं ही नदी के नकारात्मक व सकारात्मक दोनों पहलुओं पर विस्तृत दृष्टि डाली गई है।

सिंधु में नदियों की सभाएँ; कितनी अनोखी कल्पना है। नदियों पर चढ़ने वाले चढ़ावे लहरों के साथ बहते हुए उनके जूड़े में गूँथे हुए लगना; मौन के जंगल से गुजरते हुए मुखर बनना बहुत उम्दा भाव बिम्ब हैं। कविता में संवेदना तो श्वांस की भाँति समाहित रहती है। मानव निर्मित सभ्यता ने प्रकृति को कितनी चोट पहुँचाई है; स्वतंत्र बहने वाली नदियों पर बंधन डालने वाले बाँध नदियों के अपराजिता होने पर निरंकुशता हैं। 

सिंधु में होती/ नदियों की सभाएँ/ दौड़ती जाएँ।

नदी ने गूँथे/ लहरों के जूड़े में/ सभी चढ़ावे।

मन की नदी/ मौन के जंगल से/ मुखर बनी।

बाँध में खड़ी/ अपराजिता नदी/ द्वन्द की घड़ी।

हाइकु में मिथकों का सटीक प्रयोग बहुत सूझ-बूझ व समझ का काम है। कालिया नाग को नदी का दुःख बताना बहुत सुंदर प्रयोग है। ऐसा ही सुंदर चित्र है नदी को श्रमिक बताना; घाटियों में अनेक धाराएँ नदी में मिलती हैं यही उसकी कमाई है। नदी किनारे उगी हुई दूर्वा घास की सुंदरता ऐसी है मानो नदी ने हरे रेशमी वस्त्र धारण किये हों। कूल और दुकूल का प्रयोग मोहक है।

दुःख नदी का/ कंठ फँसा कालिया/ इस नदी का।

जल कमाने / घाटियों में उतरी/ श्रमिक नदी।

नदी के कूल/ दूब से बनाते ज्यों/ लम्बे दुकूल।

सुदर्शन रत्नाकर जी नदी को अनुशासित रूप में रचती हैं। नदी किनारे लगने वाले मेलों को भेद मिटाने वाली गतिविधि की तरह देखती हैं। नदियाँ कल्याण की वाहक हैं; संस्कृति की पोषक हैं। चोट खाकर भी मुस्कुराना नदी से सीखना होगा।

नदी की धारा/ शिला से टकराती/ पर मुस्काती।

पीहर छोड़/ अल्हड़ ज्यों युवती/ पी-घर चली

एक यह हाइकु बहुत सुंदर है; नदी पीहर से ससुराल जाने वाली अल्हड़ युवती है। युवती जो कि अभी परिपक्व नहीं है, अल्हड़ है क्योंकि पीहर के लाड़ प्यार में पली है। नदी जब पहाड़ों से उतरती है अल्हड़ युवती-सी होती है। मैदानी भागों में बहते हुए उसका अल्हड़ रूप प्रौढ़ युवती में बदल जाता है।

डॉ. कविता भट्ट जी के हाइकु कविताओं में ज़रा सा आध्यात्मिक पुट नज़र आता है। जगत और नदी में जड़ और चेतन का आरोपण कितना सुंदर है। नदी कभी जड़ नहीं हो सकती। बहना और जीवन देना नदी का मूल स्वभाव है।

जड़ जगत/ नदिया-सा जीवन/ सदा चेतन।

पुण्य-सलिला/ कृतघ्न को भी सींचे/ उदारमना।

तत्सम शब्दावली भी कविता जी के लेखन को विशिष्टता प्रदान करती है। एक अलग ही मधुरता का संचार होता है। ‘शैल मुदित’ कहने पर पत्थर भी चेतनता का आभास कराता है। 

शैल मुदित/ जन्मी जो सुंदर-सी/ बिटिया नदी।

जीवन-थार; / पिय! तुम नदिया/ अमृत-धार।

अपने प्रिय को नदी की उपमा विशिष्ट है। थार में पानी का महत्व है वही प्रिय का जीवन में है सहज ही भाव मुखरित होता है।

समाधी में रहते हुए गतिशील रहना; क्या ही सुंदर विरोधाभास अलंकार की सृष्टि हुई है:-

है गतिशील/ समाधिस्थ चलती/ कोटिश: मील

सहजता से आये तुकांत का सौंदर्य भी है।

कमला निखुर्पा जी के हाइकुओं में चित्रात्मकता मुख्य आकर्षण है। नदी जब पहाड़ों से झरनों के रूप में निकलती है उसका एक दृश्य यूँ है:- 

मैं निर्झरणी/ पहन श्वेत घाघरा/ धम्म से कूदी।

पहाड़ नदियों के पिता हैं। पिता के कँधों पर लाड़ से पुत्री का झूलना सुंदर वात्सल्य भाव की। अनुभूति देता है। 

गिरिवर के/ काँधों पर झूली मैं/ शैलजा हुई।

हुआ संगम/ गले मिली सखियाँ/ तीरथ सजे।

नदियों  को सहेलियों की भाँति बताना भी बहुत सुंदर कल्पना है।

बादलों से पानी की बूँदें जब नदी पर गिरती हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि बादल नदी को मोती से निशाना बाँध कर छेड़ रहा है; यह सुंदर चित्र दिया है डॉ. उमेश महदोषी जी ने। 

मारता मोती/ बदन पै नदी के/बादल मुआ!

ऋता शेखर ‘मधु’ जी ने नदी को विद्रोही बाला की उपमा दी है। 

हठीली नदी-/ तटबंध से पार/ विद्रोही बाला

शशि पाधा जी ने नदी को डोली व किनारों की कहार के रूप में नवीन कल्पना की है।

उठाके चले/ दो किनारे कहार/ नदी की डोली

रचना श्रीवास्तव जी ने इस क्रूर सच्चाई पर ध्यान दिलाया है:- 

चीखी थी नदी/ तट पर उसकी/ लाशों का ढेर।

डॉ. जेन्नी शबनम जी ने भी नदी की चिंता को बख़ूबी महसूस किया है:

बढ़ी आबादी/कहाँ से लाती पानी/ नदी बेचारी।

डॉ. शिवजी श्रीवास्तव ने नदी और चाँद का सुंदर सम्बन्ध दिखाया है:-

नदी में चाँद/ माँ की गोद में खेले ज्यों/ चंचल शिशु।

नदी में चाँद/ झुला रही हिंडोला/ चंचल हवा।

ज्योत्स्ना प्रदीप जी ने अनंग का उपयोग बहुत सुंदर किया है। एक चित्र नदी किनारे के वृक्षों का देख आनंद आ गया।

गुलाल-रंग/ नदी के गोरे अंग/ डाले अनंग।

वृक्ष की छाया/ करती शीर्षासन/ नदी में देखो।

डॉ. सुरंगमा यादव जी नदी में सिराए दीपों पर लिखती हैं :-

 नदी की धार/ प्रार्थनाओं के दीप/ जले हज़ार।

रमेश कुमार सोनी जी ने नदी का बाढ़ वाला रूप दिखाया है: –

सावन-संग/ नदी घूमने जाती/ गाँव लीलती।

अनिता ललित जी ने चाँद के साथ नदी का प्यारा सा चित्र खींचा है:-

चाँद दीवाना/ लहरों पे मचले/ नदी लजाए।

भावना सक्सैना जी ने नदी को आसमां का दुशाला ओढ़ाया है:

मन उमंग/ आसमां का दुशाला/ नदी ने ओढ़ा।

मीनू खरे जी ने एक हृदय दरकने वाला दृश्य गढ़ा है जो कि दुर्भाग्य से सत्य है: –

विशाल पुल/ और नीचे बहती/ सूखी-सी नदी!

रश्मि शर्मा जी ने समय को नदी कहकर सुंदर उपमा दी है:

नदी वही है/ घाट भी तो वही है/बहा समय।

डॉ. पूर्वा शर्मा जी ने नदी और नारी को समतुल्य रखा है:

लाँघती चली/ पथरीली डगर/ नदी या नारी?

प्रीति गोविंदराज जी ने नदी को नर्तकी की उपमा दी है : 

लय में बँधी/ घुँघरू कल-कल/ नर्तकी नदी

एक ही विषय पर रचनाएँ करते हुए भाव-साम्य हो जाना कोई बड़ी बात नहीं; आखिरकार हम सबकी दुनिया कमोबेश समान सी परिस्थितियों से ही निकलती है। लेकिन सबकी कल्पना-शक्ति व अनुभव अलग हैं इस कारण विविधता भी बनी हुई है। नदी पर सुंदर संग्रह के लिए सम्पादक महोदय श्री भीकम सिंह जी को बधाई। शामिल सभी रचनाकारों को बधाई व शुभकामनाएँ।


Responses

  1. “अप्रमेय”नदी विषय पर लाजवाब हाइकु सृजन । भीकम सिंह जी को बहुत बधाइयाँ । सम्मिलित सभी हाइकुकारों को सार्थक हाइकु रचने के लिये के लिये दिली बधाई ।

  2. अनिता मंडा जी ने जितने रोचक ढंग से हाइकुओं की व्याख्या करके अप्रमेय की समीक्षा की है, उससे मुझे ऐसा लग रहा है कि आप सभी के सहयोग और आदरणीय रामेश्वर कम्बोज ‘हिमांशु ‘ जी के आशीर्वाद से मेरे द्वारा भी साहित्य में थोड़ा-सा योगदान हो गया है । बेहतरीन समीक्षा करने के लिए अनिता मंडा जी को बहुत -बहुत धन्यवाद, हार्दिक आभार ।

  3. बहुत बढ़िया समीक्षा लिखी है अनीता | आदरणीय भीकम जी और तुम्हें, दोनों को हार्दिक बधाई |

  4. ‘अप्रमेय’भीकम सिंह जी द्वारा सम्पादित नदी केंद्रित हाइकुओं की महत्त्वपूर्ण कृति है।अनिता मंडा जी ने इस कृति की सम्यक एवं सारगर्भित समीक्षा की है।अनिता जी ने संकलन के विविध दृष्टियों के हाइकु उद्धृत करते हुए अभिनव दृष्टि से उनकी व्याख्या करके कृति के महत्त्व को रेखांकित किया है।अनिता जी को बधाई।आदरणीय भीकम सिंह जी को भी बधाई।

  5. बहुत सुंदर,सारगर्भित समीक्षा।अनिता मंडा जी एवं डॉ भीकम सिंह जी को बहुत बहुत बधाई।

  6. मैं आप सभी की आभारी हूँ।

  7. बहुत सुन्दर समीक्षा लिखी है!
    प्रिय अनिता एवं आद.डॉ भीकम सिंह जी को हार्दिक बधाई।

  8. इस पुस्तक को पढ़ते वक्त ऐसा लग रहा था मानो वास्तव में नदियों के जीवन वृतांत को आँखो के सामने ही उतार दिया हो !

  9. नदी पर हाइकु रचने के लिए नदी होना होता है ठीक उसी तरह सभी हाइकुकारों के मन की भावों को पढ़ने के लिए उनके जैसी ही अनुभूति में रंगना होता है-जो आपने बखूबी किया है। इस संग्रह के सभी हाइकुकारों ,संपादक एवं मार्गदर्शक को साधुवाद।
    एक अच्छी समीक्षा के लिए आपको बधाई।

  10. सारगर्भित समीक्षा के लिए अनिता जी को शुभकामनाएँ …
    सभी हाइकुकारों एवं संपादक भीकम जी को इस सुन्दर संकलन के लिए बधाइयाँ

  11. अप्रमेय ,हाइकु संग्रह में नदी विषय पर सभी हाइकु बहुत सुन्दर हैं । सभी को हार्दिक बधाई ।
    रेणु चन्द्रा माथुर


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