Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 21, 2020

2097-‘नेवाः हाइकु’ का हिन्दी हाइकु विशेषांक


आदि काल से ऋषियों-मुनियों द्वारा मंत्र, श्लोक, दोहा इत्यादि लघु आकारीय काव्य विधाओं के माध्यम से जन-हित हेतु स्वयं को अभिव्यक्त करने की सुदीर्घ एवं सशक्त परंपरा रही है। इसके पीछे चिंतन-मनन की गहराई तथा स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए कम-से-कम बोलना उनका उद्देश्य रहा है।

वर्तमान में भी लघुआकारीय विधाओं का बोलबाला है; किन्तु आज इसके कारण भिन्‍न हें। आज व्यक्ति के पास धनार्जन के चक्कर में समय ही नहीं है, अत: अपनी बात को कम-से-कम शब्दों में कहना एवं पढ़ना उसको विवशता बन गई है। यही कारण है आज गजल, गीत, दोहा,  मुक्तक, ताँका, चोका, सेदोका, रेगा, हाइकु इत्यादि काव्य विधाएँ फल-फूल रही हैं ओर इन विधाओं के विकास हेतु लोग पर्याप्त श्रम-क़र हो रहे हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं के अंक भी प्रकाश में आ रहे हें। कुछ अंक तो ऐसे आ रहे हैं जिनसे हाइकु की प्रतिष्ठा क्रमशः बढ़ती ही जा रही है। ऐसा ही

एक अंक काठमांडू से प्रकाशित नेपाली भाषा की पत्रिका ‘नेवा: हाइकु’ जो वस्तुत: नेपाली भाषा में लिखे जा रहे हाइकु-काव्य को समर्पित है, का हिन्दी हाइकु पर केन्द्रित अंक (संवत्‌ 2071 श्रावण-भाद्र) प्रकाश में आया हे जिसके यशस्वी संपादक इन्दुमाली हैं; किन्तु हिन्दी-हाइकु॒ विशेषांक के अतिथि संपादक चर्चित कवि-कथाकार रामेश्वर काम्बोज  ‘हिमांशु’ हें।

इस अंक में क्रमशः: डॉ0 सुधा गुप्ता, डॉ0 भगवतशरण अग्रवाल, डॉ0 भावना कुँअर, डॉ0 हरदीप कौर सन्धु, ज्योत्स्ना प्रदीप, कमला निखुर्पा, डॉ0 जेन्‍नी शबनम, रचना श्रीवास्तव, डॉ0 ज्योत्स्ना शर्मा, प्रियंका गुप्ता,अनिता ललित, अनुपमा त्रिपाठी, शशिपाधा, कृष्णा वर्मा, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ , भावना सक्सेना, सुशीला शिवराण, जया नर्गिस, सीमा स्मृति, सुदर्शन रत्नांकर, डॉ0 सतीशराज पुष्करणा, डॉ0 उर्मिला अग्रवाल, डॉ0 कुँवर दिनेश सिंह, डॉ0 सुधा ओम ढींगरा, जितेन्द्र ‘जौहर’ , पूर्णिमा बर्मन और अनिता कपूर के हाइकु प्रकाशित हैं। इन सभी के हाइकुओं की विशेषता यह है कि हर हाइकु स्वयं को उद्धृत कराना भी प्रबल दावेदारी रखता है। ऐसा कम ही देखने में आता है। उदाहरणार्थ डॉ0 सुधा गुप्ता का निम्न हाइकु देखें जिसमें उन्होंने प्रतीकों के माध्यम से प्रात: काल का चित्रण करने में सफलता पाई है-

उषा की माला / टूटी, बिखरे मोती / दूर्वा सहेजे  (पृष्ठ-3)

        अब आप देखें कि प्रातःकाल ओस के कण मोतियों की तरह दूब पर चिपक जाते हैं। अब इससे ज़्यादा भाव खोलने की आवश्यकता नहीं। स्वयं ही भाव हृदय तक पहुँचकर अपना वांछित प्रभाव छोड़ने में सफल हो जाता हे।

इसके अतिरिक्त अन्य जो हाइकु हृदय तक सीधी पैठ बनाते मुझे महसूस होते हैं उनमें कुछ इस प्रकार हैं-

 धन्य है वर्षा / खेतों में कविताएँ / बोए किसान (डॉ0भगवत शरण अग्रवाल) ;

रात है काली / चलो जलाएँ  दीये / लिखें दिवाली (डॉ0 सतीशराज पुष्करणा)

लजीली धूप / मुँडर चढ़ बैठी / बच्ची-सी ऐंठी (रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ )

बैठी चाँदनी / हाथ पर हाथ धरे / कुछ न करे (डॉ0भावना कुँअर)

फूल-पंखुरी / तितली के पंख-सी / नाजुक दोस्ती (डॉ0 हरदीप कौर सन्धु)

खिड़की खोली / भोर-किरण आई / उम्मीद लाई (रचना श्रीवास्तव)

छलक उठे / दोनों नैनों के ताल / मन बेहाल (कमला निखुर्पा)

झरते पात / कह गए शाख से / गा मधुमास। (सुशीला शिवराण)

इत्यादि ऐसे इस अंक में अनेक-अनेक हाइकु हैं, जो शिल्प के साथ-साथ काव्यात्मक संवेदना को लेकर सहज ही सजीव हो उठे और काव्यात्मक संवेदना के कारण ही ये हृदयस्पर्शी बन गए हें।

हाइकु मात्र 5, 7, 5 सत्रह वर्णों की त्रिपदीय कविता नहीं है उसको विषय-वस्तु के अनुकूल शिल्प के साथ-साथ काव्यात्मक संवेदना कौ सहज-स्वाभाविक उपस्थिति नितान्त अनिवार्य हे। यही कारण है अभिधात्मक हाइकुओं की अपेक्षा लक्षणा एवं व्यंजना लिए हाइकु अपेक्षाकृत अधिक प्रभावकारी बनकर हृदय में उतर जाते हैं।

इस अंक के अतिथि संपादक रामेश्वर काम्बोज  ‘हिमांशु’ ने श्रेष्ठ हाइकुओं का चुनाव करने के साथ-साथ अपने अति संक्षिप्त संपादकीय के माध्यम से हाइकु की विकास-यात्रा के साथ-साथ उसके शास्त्रीय पक्ष को भी बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत करने में सफलता पाई है। अपने इन्हीं गुणों के कारण यह ‘हाइकु अंक’ मील का पत्थर बनने की पूरी क्षमता रखता है। इस विधा में शोधकार्य करने वालों के हेतु श्रेष्ठ उदाहरण चुनने में सहायक सिद्ध होगा।

-नेवा: हाइकु (नेपाली द्विमासिक पत्रिका का हिन्दी हाइकु विशेषांक) ;संपादक: इंदु माली। इस अंक के अतिथि संपादक: रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ , पता: हाइकन, हाइकु काव्य प्रतिष्ठान, पो बॉ न-139361 काठमांडू (नेपाल) , मूल्य: ₹0 50 (नेपाल) वार्षिक

-0-अभिनव प्रत्यक्ष  नवम्बर 2014, प्रधान सम्पादक  डॉ मिथिलेशकुमारी मिश्र


Responses

  1. नेवा हाइकु पर नेपाल से हाइकु विशेषांक पर सिंधु जी का सार्थक , जानकारियों से युक्त आलेख व विशेषांक की समीक्षा बहुत सुन्दर की गई है ।संपादक द्वय व हाइकुकारों को बधाई ।

  2. नेपाली भाषा की पत्रिका में हिन्दी हाइकु विशेषांक अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है |
    अंक पहले पढ़ चुके हैं, बहुत ही सुंदर बन पड़ा है |
    सुंदर हाइकु विशेषांक की बढ़िया समीक्षा करने के लिए मिथिलेश जी को बधाइयाँ एवं शुभकामनाएँ
    सभी रचनाकारों एवं संपादक द्वय को भी ढ़ेरों बधाइयाँ
    आगे भी ऐसे अंक पढ़ने को मिलेंगे ऐसी कामना….

  3. आपकी लिखी रचना “सांध्य दैनिक मुखरित मौन में” आज रविवार 22 नवंबर नवंबर नवंबर 2020 को साझा की गई है…. “सांध्य दैनिक मुखरित मौन में” पर आप भी आइएगा….धन्यवाद!

  4. सुंदर समीक्षा।

  5. सुंदर अंक की सुंदर समीक्षा – बधाई ।

  6. बहुत सुन्दर समीक्षा. नेपाली पत्रिका में हिन्दी हाइकु का विस्तार प्रसन्नता का विषय है. हार्दिक बधाई.

  7. नेवा: पत्रिका में हिन्दी हाइकु विशेषांक अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है |
    सुंदर हाइकु विशेषांक की बढ़िया समीक्षा करने के लिए मिथिलेश जी को बधाइयाँ एवं शुभकामनाएँ | सभी रचनाकारों को बधाई |
    शशि पाधा


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