Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 11, 2020

2086-हाइकु पहेलियाँ


मुट्ठी में आकाश समा लेने वाली पहेली [ दैनिक ट्रिब्यून से साभार]

सत्यवीर नाहड़िया

नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करके आप दैनिक ट्रिब्यून में भी पढ़ सकते हैं

हाइकु पहेलियाँ

हाइकु आज जापान की सीमाएँ लाँघकर वैश्विक छंद बन चुका है। पाँच-सात-पाँच वर्णों की इस लघु कविता को आज विश्व की विभिन्न भाषाओं एवं बोलियों में विभिन्न प्रारूपों में तेजी से लिखा जा रहा है। इस लघुकाय छंद में रचना करना गागर में सागर भरना जैसा प्रयोग है। मुट्ठी में आकाश समा लेने की खूबी जिस रचनाधर्मिता में होती है, वही इस छंद के साथ न्याय कर पाती है। यदि इस छंद में पहेलियाँ रची जाएँ तो छंद के अलावा पहेलियों के प्राथमिक पक्षों को भी प्रमुखता से निर्वहन करना होता है। आलोच्य कृतियाँ हाइकु पहेलियाँ (प्रथम एवं द्वितीय अंक) में आठ सौ से ज्यादा पहेलियाँ संकलित की गई हैं, जिनमें कलम एवं कूंची से जुड़े बहुमुखी प्रतिभा के दिवंगत रचनाकार राधेश्याम जी हाइकु छंद तथा पहेलियों के सभी मूल तत्वों को निभाया है, जिसके चलते हाइकु पहेलियाँ रोचक बन पड़ी हैं। इन हाइकु रचनाओं को उनके सुपुत्र रमाकांत ने प्रकाशित करवा, उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी है। स्व. राधेश्याम जी ने हिंदी के अलावा अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू तथा संस्कृत में भी अनूठी रचनाधर्मिता से अपनी कलम का लोहा मनवाया है। प्रकृति, साहित्य, कला-संस्कृति, फल-फूल, देवी-देवता पौराणिक-ऐतिहासिक तथा सांसारिक पहलुओं पर रची इन पहेलियों में रोचकता एक विशेष तत्व है।

चार सड़क/ छोरियाँ बेधड़क/ दौड़ें कड़क (चौपड़), बावनी वाम/ राजा रानी गुलाम/चार सलाम (ताश), झोली में भरे/अजूबे खरे खरे/ बनिया फिरे(मदारी), जला तो कसा/ घी तेल में लसा/ नैनों में बसा (काजल) पिया उठाया/ मेरा भेद बताया/ नैना लजाया (घूँघट), पलटी मार/ सर पै बैठा यार/ जरा न भार (पगड़ी) जैसी पहेलियाँ हाइकु छंद में रच बस गई हैं। कुंडली मार/ चुरा मधु का प्यार/ बैठी छिनार तथा… पानी न पीता/ ताल में पड़ा जीता/ भरा न रीता नामक दोनों हाइकु क्रमश: इमरती व रसगुल्ला की पहेलियाँ हैं। इसी प्रकार हाइकुकार ने कुल्हड़ तथा चारपाई को हाइकु पहेलियों में बखूबी छंदबद्ध किया है :-

माटी का लाला/ जब काम निकाला/ घूरे पै डाला… चार तो खड़े/ वे चार लंबे पड़े/आठों ही भिड़े।

संग्रह में हाइकु के तीनों चरणों को तुकांत बनाकर हाइकुकार ने इनकी रोचकता को और बढ़ा दिया है। अर्जुन हेतु एक दो तीन/ बीबियाँ साढ़े तीन/ काठ प्रवीन, ऊधो के लिए श्याम दुलारा/ औरतों से भी हारा/ ज्ञान का तारा, कुबेर हेतु आठ रे दंतु/तीन पैर का जंतु/है धनबंतु,चाणक्य के लिए चोटी क्या खुली/ अरे गद्दी बदली/ तो नींद खुली, रावण हेतु पंडित बड़े/ नाम सोने में जड़े/ नारी ले उड़े। इसी प्रकार जड़ न जात/नभ चढ़ सुहात/ अक्षय पात (अमरबेल), कर कस ले/अधर से रस ले/खूब मसले (आम), बेचे मिठाई/ यह लंबू हलवाई/ तोड़कर खाई (खजूर), आई हाथ में/ नंगी करी बात में/नाचे दांत में (मूँगफली) आदि हाइकु पहेलियाँ प्रभाव छोड़ती हैं।

विषय विविधता, सुंदर छपाई, आकर्षक आवरण तथा दोनों कृतियों के अंत में सरलार्थ व शब्दार्थ का होना कृति की अन्य विशेषताएँ हैं। यह कृति बच्चों से बड़ों व आमजन से शोधार्थियों तक पसंद की जाएगी।

पुस्तक :हाइकु पहेलियाँ (प्रथम एवं द्वितीय अंक) रचनाकार : राधेश्याम प्रकाशक : साइबर विट. नेट, इलाहाबाद पृष्ठ : 186 व 169 क्रमश: मूल्य : रु. 250 प्रति अंक

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http://www.cyberwit.net/authors/radhey-shiam


Responses

  1. अरे वाह ! यह तो धरोहर है! बहुत बहुत आभार रामेश्वर जी हम सब तक पहुँचने के लिए।
    सादर
    मंजु मिश्रा

  2. अद्भुत हाइकु पहेलियां हैं। इतना सधा हुआ शिल्प बताता है कितनी मेहनत कितना रियाज़ है इसके पीछे।

  3. हाइकु के क्षेत्र में राधेश्याम जी को सादर नमन |

  4. हाइकु में नए प्रयोगों के लिए आदरणीय राधेश्याम जी को जाना जाएगा । आपका आशीर्वाद मुझे मिला था ।
    इस संग्रह के लिए उनके सुपुत्र को साधुवाद , बधाई । यह संग्रह हम सबके लिए गौरव की बात है ।

  5. अद्भुत! ! अनुपम नवाचार! यूनीक ! आदरणीय रधेय्श्याम का यह नया प्रयोग हाइकु जगत को अनुपम भेंट …
    रामेश्वर काम्बोज जी को हृदयतल से आभार इसे उपलब्ध कराने हेतु!

  6. बौद्धिक व्यायाम वाली पहेलीयां हैं , सम्पादक द्वय से निवेदन है कि इस संकलन से कुछ पहेलीयां और प्रकाशित करें । धन्यवाद ।

  7. वाह! ऐसा तो कभी सोचा ही नहीं!…अद्भुत प्रयोग….हम सब तक पहुंचाने के लिए सम्पादक द्वय का आभार!….कृपया कुछ और भी प्रकाशन करें! राधेश्याम जी को नमन और रमाकांत जी को बधाई!

  8. श्रद्धेय राधेश्याम जी का कार्य अद्भुत रहा है। उनके हाइकु में प्रयोग इस काव्य को नए आयाम प्रदान करते हैं। आपने उनके कार्य को देश-विदेश के हाइकुकारों के समक्ष लाकर अच्छा कार्य किया है। आप दोनों संपादकों को सादर नमन।

  9. आदरणीय राधेश्याम जी को हाइकु जगत में एक नए बेमिसाल सराहनीय कार्य के लिए सादर नमन। संपादक द्वय का हार्दिक आभार।

  10. अद्भुत हाइकु पहेलियाँ ।खुसरो की याद दिला गयीं ।पुस्तक से परिचय कराने के लिए संपादक द्वय को हार्दिक धन्यवाद ।

  11. बहुत सुन्दर कार्य है।

  12. बहुत सुंदर प्रयोग,आदरणीय राधेश्याम जी का हाइकु में उल्लेखनीय योगदान है,पहेलियों की रचना हाइकु में अनेक सम्भावनाओं के द्वार खोलती है।आपने यहाँ इन पहेलियों को प्रकाशित किया।आपको नमन।

  13. बहुत ही अलग और अद्भुत है यह. हम सभी के साथ यहाँ साझा करने के लिए धन्यवाद.

  14. लाजवाब कार्य… बहुत अच्छा लगा पढ़कर, हार्दिक बधाई आपको आदरणीय राधेश्याम जी !

  15. Kaya rahe na rahe lekin karya hamesha jeevit rhte hai
    Apko sadar naman. Is kala me Apka yogdaan atulniye h.


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