Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 15, 2020

2080-यादें, न आओ


1-डॉ.जेन्नी शबनम

1.

मीठी-सी बात

पहली मुलाक़ात

आई है याद।

2.

दुखों का सर्प

यादों में जाके बैठा

डंक मारता।

3.

गहरे खुदे

यादों की दीवार पे

जख्मों के निशाँ।

4.

तुम भी भूलो,

मत लौटना यादें,

हमें जो भूले।

5.

पराए रिश्ते

रोज याद दिलाते

देते हैं टीस

6.

रोज कहती

यादें बचपन की –

फिर से जी ले!

7.

दिल दुखाते

छोड़ गए जो नाते,

आती हैं याद।

8.

पीछा करता,

भोर-साँझ-सा चक्र

यादों का चक्र।

9.

यादों का पंछी

दाना चुगने आता

आवाजें देता।

10.

दुख की बातें,

यादें, न आओ रोज,

जीने दो मुझे।

-0-

2-डॉ. सुरंगमा यादव

1

घिरी घटाएँ

नयन गगन में

बरसीं यादें।

2

सोई थीं यादें

सावन की फुहारें

जगा ही गईं।

3

बूढ़ा संदूक

यादों की विरासत

सहेजे बैठा।

4

मन-मकान

यादों ने कर लिया

अपने नाम।

5

यादों के घन

बरसे जब-जब

भिगोया मन।

6

मन में सोई

जाग उठी स्वप्न में

याद पुरानी।

7

स्मृति- झरोखा

दूर तक दिखते

दृश्य अनेक।

8

यादों में खोई

बिन बोले सुन लूँ

कागा की बोली।

9

यादों के संग

मन का अनुबंध

नित नवीन।

10

उजली यादें

मानस-मंदिर में

जला दीप-सा

11

मन-बगिया

कलरव करते

यादों के पंछी।

12

याद-कोकिला

मन-पतझर में

लाई वसंत।

13

याद तुम्हारी

पावस बनकर

छाई नैनों में।

14

जोडूँ कड़ियाँ

यादों की तो बनतीं

लम्बी लड़ियाँ।

15

जलता रहा

आँधियों में दीपक

तेरी यादों का।

16

विचर रही

मानस-सागर में

याद-हंसिनी।

      -0-


Responses

  1. डॉ जेन्नी शबनम जीऔर डाॅ सुरंगमा यादव जी के बेहतरीन हाइकु, हार्दिक शुभकामनायें ।

  2. एक से बढ़ाकर एक हाइकु! हार्दिक बधाई जेन्नी जी एवं सुरंगमा जी!

    ~सादर
    अनिता ललित

  3. डॉ जेन्नी जी और सुरंगमा जी आप दोनों ने ही यादों पर हाइकु का सुन्दर सृजन किया है आप दोनों को हार्दिक बधाई |

  4. क्या खूब सजाई यादों की महफ़िल, जेन्नी जी और सुरँगमा जी, बहुत ही आनंद आया, आप दोनों को ढेरों बधाई!!

  5. आदरणीया डा शबनमजी, बहुत सुंदर हाइकु हैं आपके। लेकिन मुझे सर्प का डंक मारना समझ में नहीं आया।डंक मारता के स्थान पर फुफकारता नहीं आ सकता क्या?केवल समझने के लिये प्रश्न किया।अन्यथा न लीजिएगा।शेष हाइकु आपके सदा की भांति उच्च कोटि के। आपको बधाई।
    सुरंगमाजी के हाइकु भी बहुत अच्छे। यादों के गुच्छे

  6. मेरे हाइकु को पसंद करने के लिए आप सभी की हृदय से आभारी हूँ.

    आदरणीय कैलाश जी, इस हाइकु में दुःख एक सर्प के रूप में है जो यादों में बैठा हुआ है. यहाँ पर जो भाव है उसके अनुसार सर्प के डंक मारने से जैसी पीड़ा होती है, वैसी ही पीड़ा देती रहती है दुःख वाली यादें.
    फुफकारने पर भय की अनुभूति होती पीड़ा की नहीं. वैसे फुफकारना भी लिख सकते हैं, अगर दुखद यादों से भय होता हो. भाव बस अलग हो जाएँगे.
    मेरे हाइकु पसंद करने के लिए आभार आपका.


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