Posted by: हरदीप कौर संधु | फ़रवरी 23, 2020

बंद कर लो द्वार ( हाइकु- संग्रह)


  डॉ. पूर्वा शर्मा                                                                                     

हाइकु साहित्य को समृद्ध करने में अपना योगदान देने वाले रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी का तृतीय हाइकु संग्रह बंद कर लो द्वार’ हाइकु प्रेमियों के समक्ष प्रस्तुत है । हाइकु संग्रह का आवरण तो सुंदर एवं आकर्षक है ही, साथ ही अनूठा शीर्षक पढ़कर मन में एक जिज्ञासा उत्पन्न होती है – कवि द्वार बंद करने को क्यों कह रहे हैं ? क्या वह किसी को आने नहीं देना चाहते या जो आने वाले थे वह आ चुके हैं अथवा जो आने वाले थे वह अब कभी नहीं आएँगे…..शीर्षक पढ़कर इस तरह के प्रश्न पाठक के मन में उत्पन्न होने लगते हैं । इन प्रश्नों के उत्तर संग्रह में प्रस्तुत भिन्न-भिन्न हाइकु में प्राप्त होते हैं । किसी प्रिय आने के इंतज़ार में थोड़ी से आहट होने पर भी हृदय की धड़कन बढ़ने लगती हैं और मात्र पदचाप की ध्वनि से प्रसन्नता का अनुभव होने लगता है । प्रिय के आने से जीवन में उजाला छा जाता है । लेकिन जब कोई आपको छोड़कर या धोखा देकर चला जाता है तब इंतज़ार करना व्यर्थ है क्योंकि वह कभी आने ही नहीं वाला है, इसलिए अब द्वार बंद कर लेना चाहिए । भूमिका में कवि कह चुके हैं – “संबंधों के निर्वाह को मैं सर्वाधिक महत्त्व देता हूँ; लेकिन तभी तक, जब तक कोई स्वार्थमुक्त होकर व्यवहार करता है । जो केवल स्वार्थ के लिए जुड़ते हैं, हित साधने के लिए साथ चलते हैं, वे केवल अपनी सुविधा देखते हैं और सुविधा में तनिक-सी बाधा आने पर फूत्कार करने लगते हैं; वे अगर जीवन से निकल जाते हैं, तो अच्छा ही करते हैं ।” इससे स्पष्ट होता है कि ‘बंद कर लो द्वार’ से कवि का आशय है कि अब कोई नहीं है ,जिसके इंतज़ार में आपको द्वार खुला रखना पड़े । ‘बंद कर लो द्वार’ शीर्षक से संबंधित सभी हाइकु सुंदर बन पड़े हैं –

हुलसा उर / सुनी थी पदचाप / आए वे द्वार । ( पृ.123)

हुई अँजोर / बज उठी साँकल / खोलो जी द्वार । (पृ.122)

साँझ सहेली / छोड़ो ये इंतज़ार / बंद है द्वार । (पृ.112)

दिन डूबा है / बंद कर लो द्वार / बिदा दो अब । (पृ.61)

हे बंधु मेरे / बंद कर लो द्वार / लौटना नहीं । (पृ.123)

प्रस्तुत संग्रह में ‘आ जाओ द्वारे’, ‘घटा में धूप’,‘जीवन संझा’, ‘उड़ गया पखेरू’, ‘मन बावरे’, ‘अनुरागी आखर’ तथा ‘स्वप्न जल’ शीर्षक से 7 खंडों में कुल 661 हाइकु अकारादि क्रम से संगृहीत है । हाइकु मात्र प्रकृति तक ही सीमित है – यह बात वो ही कह सकता है जिसे हाइकु के बारे में ज्ञान नहीं है । जापानी हाइकु गुरु ‘बाशो’ ने स्वयं कहा है कि कोई भी विषय हाइकु के लिए उपयुक्त है । कथ्य की दृष्टि से डॉ. सत्यभूषण वर्मा ने जापानी परम्परागत हाइकु के सात भेदों (ऋतु, आकाश, धरती, बुद्ध और देवता, जीवन, पशु-पक्षी तथा अन्य-जीव) में ‘जीवन’ के अंतर्गत मानवीय कार्य व्यापार (Humanity, daily life, livelihood) का उल्लेख किया है । यहाँ पर ‘जीवन’ अर्थात् जीवन से संबंधित प्रत्येक पहलू का समावेश हो जाता है । जब जापानी हाइकु में कोई भी विषय हाइकु के लिए प्रतिबंधित नहीं है तो हिन्दी हाइकु में विषय को लेकर कोई प्रश्न चिह्न होना ही नहीं चाहिए । प्रस्तुत संग्रह में अंतः प्रकृति एवं बाह्य प्रकृति दोनों से संबंधित हाइकु है । अंतः प्रकृति अर्थात् मानव-मन के सुख-दुःख से जुड़ी भावनाओं को कवि ने बखूबी प्रस्तुत किया है ।

आ जाओ द्वारे! / भोर से शाम तक / प्राण ये पुकारें । ( पृ.9)

संग्रह में प्रस्तुत उपर्युक्त पहला ही हाइकु…. आ जाओ द्वारे! कहकर आपको अपनी ओर खींच लेता है । शृंगार रस से भरपूर कुछ सुंदर हाइकु संग्रह में प्रस्तुत किए हैं । भावों की गहनता इन सभी हाइकु में देखी जा सकती है । जिससे आप सर्वाधिक प्रेम करते हैं, उसके आलिंगन में बहुत सुकून प्राप्त होता है । प्रेमी को अपना प्रियतम कभी चाँद की तरह सुन्दर तो कभी सर्दियों की धूप की तरह मन मोहने वाला लगता है और मन बस उसी को निहारना चाहता है, यथा –

आकुल बाहें / कभी तो बँध जाओ / आलिंगन में । (पृ.16 )

अमा की रात / तुम पूर्ण चंद्रिका / उर में खिली । (पृ.12)

ठिठका चाँद / झाँका जो खिड़की से / दूजा भी चाँद । (पृ.50)

स्वर्णिम रूप / जैसे सर्दी की धूप / लगे अनूप । (पृ.119)

घटा में धूप / मोह गया मन को / तेरा ये रूप । (पृ.25 )

जैसे हो तुम / काश ऐसा ही होता ! / सारा जीवन । (पृ.46)

सात पर्दों में / तुम को यों छिपालूँ / देखूँ मैं तुम्हें । (पृ.114)

इतनी गहन प्रीत कि मन में बस प्रियतम का ही नाम है और उसकी चाहत है कि अंतिम साँस तक वह अपने प्रियतम के पास ही रहे । भौंरा सदा ही फूल के प्रेम में बंधा रहना चाहता है, उसे पंखुड़ी से मुक्ति नहीं चाहिए, कवि ने बड़ी ही सुन्दरता से मन को भौंरा कहा है । प्रेम की गहन अनुभूति को कवि ने एक से बढ़कर एक सुंदर हाइकु में पिरोया है ।

तुझको बाँचूँ / मेरे हर पन्ने में / नाम तुम्हारा । (पृ.52)

तुमको पाया / पल-पल अघाया / प्यास तुम्हीं थे । (पृ.54)

चैन न पाया / सागर तर आया / तुझमें डूबा । (पृ.38)

तन माटी का, / मन का क्या उपाय / मन में तुम । (पृ.51)

चाह इतनी – / अंतिम साँसें जब / तुम हो पास । (पृ.37)

मन का भौंरा / बंद युगों-युगों से / कैद ही चाहे । (पृ.90)

जहाँ प्रेम गहन हो तो वहाँ विरह में पीड़ा का अनुभव भी अधिक होता है । सुख के साथ दुःख तो प्राप्त होगा ही, इसी प्रकार दर्द एवं विरह तो प्रेम में भोगना ही पड़ता है । प्रिय के बिना कहीं भी मन नहीं लगता है और प्रत्येक क्षण बस उसी की प्रतीक्षा रहती है । स्वप्न जल, सौ-सौ पहरे, बर्छी-सी यादें आदि सुंदर एवं अनूठे शब्द प्रयोग से कवि ने अपने दर्द एवं विरह को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया है ।

हे मरुधर ! / स्वप्न जल ही सही, / दो बूँदें दे दो । (पृ.113)

स्नेह की बातें / फिर से याद आईं / फूटी रुलाई । (पृ.118)

कंपित हाथों / खोले हमने ख़त / जीभर चूमे । (पृ.22)

मुश्किल लाते / दर्द ऐसे अतिथि / देर में जाते । (पृ.94 )

मन बावरे! /दर्द के साथ पड़ी / तेरी भाँवरे । (पृ.77)

सौ-सौ पहरे / फिर-फिर खुलते / घाव गहरे । (पृ.118)

बर्छी-सी यादें / चुभ-चुभ जाएँ  कि / रोने भी न दें । (पृ.83)

प्राण हुए हैं / अब बोझ भारी / चले भी आओ । (पृ.80)

दर्द या विरह में आँसू खुद-ब-खुद ही आँखों से निकल पड़ते हैं । आँसू की बोली बहुत शक्तिशाली है, बिन शब्दों के ही ये अपनी गाथा सुना देते हैं । प्रिय की याद में आँसू निरंतर बहते रहते हैं, कवि ने आँसू को अरघ के रूप में समर्पित किया है । ये आँसू हथेली पर मोती की तरह दमकते हैं और भाग्यशाली प्रेमी के सीने को भिगोते हैं । आँसुओं का वर्णन करते हुए भिन्न-भिन्न हाइकु सुंदर बन पड़े हैं –

आँखों की नमी / बिना बोले कहती / क्या-क्या है कमी ! (पृ.14 )

अश्रु विकल / जब-जब बहते / तुमको सोचूँ । (पृ.13 )

कहाँ खो गए / नेह-भरे ख़त जो / आँसू से सींचे ! (पृ.23)

अश्रु थे अर्घ्य / उम्रभर चढ़ाए / माने न देव । (पृ.13 )

हथेली लिये / मोती दो दमकते / नैनों से चुए। (पृ.120)

आँसू तुम्हारे / भिगोएँ मेरा सीना / मैं बड़भागी । (पृ.16 )

मनुष्य अनेक रिश्तों में बंधा रहता है, इन्हीं रिश्तों से समाज बनता है । रिश्ते चाहे खून के हो या भावनाओं के लेकिन ये चलते सिर्फ और सिर्फ प्रेम पर ही है । प्रेम और विश्वास से यह रिश्ते मजबूत बनते हैं तो इनके बिना रिश्तों में दरार भी आ जाती है और यह शीघ्र ही दम तोड़ देते हैं । संग्रह में रिश्तों का महत्त्व दर्शाते कुछ हाइकु –

ईर्ष्या सर्पिणी / फुत्कारे अहर्निश / झुलसे मन । (पृ.18 )

उड़ा ले गई / अधूरे रिश्ते-नाते / बहकी हवा । (पृ.19 )

चुप्पी जो तोड़ी / टूट गए थे रिश्ते / उम्रभर के । (पृ.37)

हो गई साँझ / रिश्ते, नाते व प्यार / हुए फ़रार । (पृ.123)

नेह के नाते / शब्दों की पकड़ में / कभी न आते । (पृ.72)

सारे ही रिश्ते / बन मोह का फंदा / रखते जिंदा । (पृ.115)

हिचकी आए / बिछुड़ा बरसों का / मीत बुलाए । (पृ.121)

ठिठुरे रिश्ते / सुखद आँच-जैसा / स्पर्श तुम्हारा । (पृ.50)

मनुष्य को प्रेम में धोखा या रिश्तों में चोट अथवा जीवन में निराशा मिलती ही है | इस तरह की चोट, दर्द या निराशा झलने के पश्चात् भी कवि का मन बड़ा आशावादी है । कवि सभी मुसीबतों को पार करना चाहते हैं और यह आशावादी दृष्टिकोण जीने के लिए बहुत उपयोगी है ।

आँधियाँ मिलीं / हर मोड़ पे तुम्हें / तुम न झुके । ( पृ.15 )

आशा न खोना / लगा ही रहेगा ये / आँसू का मेला । ( पृ.17 )

काली छायाएँ / मिटेंगी किसी दिन / हमने ठाना । ( पृ.24 )

सिंधु तरेंगे / विश्वास की है नैया / पार करेंगे । ( पृ.115)

मर जाऊँगा / तुम्हें पाने जग में / फिर आऊँगा । ( पृ.93)

संबंधों को अधिक महत्त्व देने वाले कवि अपने युग की परिस्थिति एवं समस्याओं से भी भली-भाँति परिचित है । गरीबी, शहरीकरण, राजनीति आदि को लेकर कवि कलम कह ही उठती है –

आँधी उमड़ी / गरीब का छप्पर / दूर ले उड़ी । ( पृ.15 )

आज का गाँव / युवा हुए लापता / झींकते बूढ़े । ( पृ.17 )

गाँव भागता / भोर से साँझ तक / शहर हँसा । ( पृ.33 )

सत्ता का कुआँ / कब किसका हुआ / गिरा जो डूबा । ( पृ.109)

गुरु अनेक / परम प्रिय शिष्य / दुर्लभ एक । ( पृ.33 )

श्रम का जल / माथे पर उभरा / मोती बनता । ( पृ.108)

इन सब समस्याओं के साथ कभी-कभी कवि हृदय नीति से भरे वचन कह उठता है, तो कभी इतने रिश्तों एवं भीड़-भाड़ में भी अकेलापन महसूस करता है –

कहती हवा – / नहीं कोई पराया / बहते चलो । ( पृ.23 )

कुछ न बचा / बचे पैरों के निशाँ / सिंधु उदास । ( पृ.27 )

एकाकी मन / भीड़ भरा नगर / जाएँ किधर । ( पृ.20 )

सांध्य गगन / कर गया उदास / एकाकी मन । ( पृ.114)

फैला हुआ है / भीड़ का वन, पर / अकेलापन । ( पृ.82)

नारी के बिना संसार का अस्तित्व नहीं हो सकता । नारी की महानता एवं उसके जीवन की व्यथा को सदा ही काव्य के विषय के रूप में प्रस्तुत किया गया है । नन्हे कद वाले हाइकु में बड़ी ही सहजता से नारी के बारे में कवि ने कहा है –

अश्रु से सींचे / महाकाव्य के पन्ने / रच दी नारी । ( पृ.14 )

ईश्वर कहे – / मुझसे ज्यादा दर्द / सिर्फ़ माँ सहे । ( पृ.18 )

कर्मयोगिनी / अच्छे ही कर्म करे / दुःख ही भरे । ( पृ.22 )

जलती रही / समिधा बन नारी / राख ही बची । ( पृ.42)

मनुष्य के मन में उठ रहे विविध प्रश्नों के उत्तर देने में दर्शनशास्त्र का सहारा लेना पड़ता है । अपने अनुभव के आधार पर या जीवन में घटित घटनाओं के आधार पर कोई भी साहित्यकार जीवन को देखने का दृष्टिकोण विकसित करता है । यही दृष्टिकोण उसकी रचनाओं में दिखाई देता है । कवि ने कुछ गहरे विचार या प्रश्न अपने हाइकु के माध्यम से व्यक्त किए है । इनमें यथार्थ बोध, मृत्यु आदि से संबंधित हाइकु बहुत ही उत्कृष्ट बन पड़े हैं –

गहरी नदी / जितना डूबे हम / उतना पाए । ( पृ.32 )

जग को जाना – / कागज़ की नाव से / सिंधु तरना । ( पृ.41)

जन्मों की माया / कैसे है बाँधे जीव / मन व्याकुल । ( पृ.42)

पाल समेटे / सफ़र हुआ पूरा / द्वीप अजाना । ( पृ.46)

दो पल मौन / उड़ गया पखेरू / पूछता कौन ? ( पृ.59)

दीवारें देखीं / बाहर खिल-खिल / भीगीं भीतर । ( पृ.61)

हम पाहुने / कुछ दिन के ही थे / चलना होगा । ( पृ.120 )

डोर न तोड़ो / उड़ने दो पतंग / जीवन संग । ( पृ.51)

तट की रेत / बनाए जो घरौंदे / हुए विलीन । ( पृ.51)

दर्शन संबंधी हाइकु के साथ दोहरे अर्थ या प्रतीकों के प्रयोग से कुछ हाइकु जीवंत बन पड़े हैं । प्रकृति के इशारे से मानव जीवन के बारे में कह देने में यह हाइकु समर्थ है । प्रिय को चाँद, सुख-दुःख का प्रतीक धूप-छाँव आदि दोहरे अर्थ में अपनी बात कह जाते हैं । ‘सोया है मुसाफिर’ भी द्विअर्थक हैं एक तो यह कि मुसाफिर थका-हारा सोया है और दूसरा कि वह मृत्यु की गोद में सो गया है । इस प्रकार के सुंदर हाइकु इस संग्रह में मिलते हैं –

टूटा जो पेड़ / छोड़ गए थे पाखी / लता लिपटी । ( पृ.49)

मन को भाए / चाँद बसा है दूर / हाथ न आए । ( पृ.91)

छाँव या धूप / जीवन के दो साथी / साथ न छोड़े । ( पृ.39)

चूमना चाहे / चाँद को प्यासा सिंधु / चूम न पाए । ( पृ.38)

हौले से बोलो / सोया है मुसाफिर /अरसे के बाद । ( पृ.124)

अंतः प्रकृति के साथ कवि का मन बाह्य प्रकृति के वर्णन में भी खूब रमा है । प्रकृति का गुणगान करते बहुत से सुंदर हाइकु इस संग्रह में संगृहीत है । भारत की भौगोलिक विशेषता के कारण है यहाँ पर विभिन्न ऋतुओं को देखा जा सकता है और उसका आनंद लिया जा सकता है । गर्मी में प्रकोप से कोई नहीं बच पाया है, नदियाँ सूखने लगती है तथा प्यास के मारे कंठ सूख जाता है यहाँ तक की प्राणियों की जान भी निकल जाती है । इसी गर्मी को दूर करती शीत ऋतु ठंडक का अनुभव देती है ;लेकिन अत्यधिक ठण्ड भी ठीक नहीं । शीत ऋतु में हिमपात होने से झीलें जम जाती है एवं मनुष्य के साथ सभी पेड़ पौधे भी काँपते नज़र आते हैं । ऋतु के ऐसे ही कुछ सुंदर चित्रांकन देखिए –

बरसी आग / सूखे कूप-बावड़ी / प्यासे, तरसे । ( पृ.83)

भभका वन / हर चिड़िया प्यासी / प्राणों के लाले । ( पृ.86)

काँपे थे तारे / बरसी थी नभ से / बर्फ़ीली रूई । ( पृ.24 )

जमी है झीलें / अपत्र तरुदल / ठिठुरें, काँपे । ( पृ.42)

वर्षा ऋतु में समस्त धरा हरी-भरी नज़र आती है । तेज़ हवा एवं बादलों की गर्जना की आवाज़ वातावरण में गूँज उठती है । बादलों को हाथी, हिरन आदि की उपमा देते हुए कवि ने बहुत ही सुंदर तरीके से वर्षा का मनोहारी चित्रण किया है ।

चंचल हवा / मरोड़े टहनियाँ / छेड़ती गाछ । ( पृ.35)

बजे नगाड़े /अंबर में मेघों के /खुले अखाड़े । ( पृ.82)

धमा-चौकड़ी / करती अम्बर में / मेघमालिका । ( पृ.65)

धरती भीगी / घन घट लाए / तरु नहाए । ( पृ.65)

नभ को रौंदें / पागल हाथी बन / धूसर मेघा । ( पृ.68)

भरें कुलाँचे / न थके तनिक भी / मेघा-हिरना । ( पृ.86)

किसी भी काव्य में जितना महत्त्व कथ्य का होता है उतना ही शिल्प का भी । हाइकु शिल्प को लेकर शोध कार्य हो चुके हैं । जापानी हाइकुकार अलंकृत भाषा / मानवीकरण के प्रयोग से परहेज करता है; लेकिन जाने-अनजाने में बाशो, बुसोन, इस्सा एवं शिकी आदि हाइकु गुरुओं के काव्य में भी अलंकारों का प्रयोग देखा गया है । कुछ अलंकार काव्य में सहज ही आ जाते हैं, मानवीकरण उनमें से एक है । काव्य को प्रभावशाली बनाने की एक सहज शैली मानवीकरण है । कवि ने प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य का सूक्ष्म निरीक्षण कर अपनी अनुभूतियों को हाइकु में पिरोया है । काले बादल को काजल कहना, सिंधु-उर्मियों को हाँफते हुए चित्रित करना, नभ के गालों का सिंदूरी होना, नभ को जोगिया कहना आदि मानवीकरण के माध्यम से कुछ सुंदर चित्र देखिए –

काले बादल / नभ के नयनों में / आँजें काजल । ( पृ.24 )

जीभ निकालें / हाँफें सिंधु-उर्मियाँ / कितनी प्यासी ! ( पृ.44)

क्षितिज हँसा / कपोल थे नभ के / सिंदूरी हुए । ( पृ.29 )

उमड़े आँसू / पोंछकर चल दी / सहेली हवा । ( पृ.20 )

धान रोपती / छप- छप बदरी / अंबर क्यारी । ( पृ.66 )

शुभ्र चंद्रिका / शिशु रूप लेकर / गोद आ छुपी । ( पृ.108)

स्वर्णिम मेघ/ लुभाते गगन को / कुंचित केश । ( पृ.119)

जोगिया नभ / अनुरागी अधर / मद छलके । ( पृ.46)

मानवीकरण के अलावा और भी अलंकारों के प्रयोग से हाइकु सज उठे हैं । अम्बर-क्यारी, मेघ शिशु अंबर अथवा कमल-पाँखुरी कहकर रूपक का सुंदर एवं सहज प्रयोग देखिए –

अंबर-क्यारी / खरगोश बादल / दुबके, दौड़ें । ( पृ.13 )

खेलते खो-खो / मेघ शिशु अंबर / शोर मचाएँ । ( पृ.32 )

लरज गई / वो कमल-पाँखुरी / कुछ न बोली । ( पृ.101)

उपमा के सुंदर सहज प्रयोग को देखकर पाठक वाह किए बिना नहीं रह सकता –

राजा-से खड़े / पुआल के कूँदड़े / हाथी-से लगे । ( पृ.100)

नभ की स्मित / छिटकी रात भर / नन्हें शिशु-सी । ( पृ.68)

प्रकृति वर्णन में बिम्बों का विशेष स्थान है । हाइकु पढ़ते ही आपके आँखों के सामने चित्र प्रस्तुत हो जाते हैं । लहलहाते खेत, सितारे से भरा आकाश, नदी का बल खाते हुए बहना आदि कुछ सुंदर मोहक एवं अनूठे दृश्य बिम्ब आपको अपनी ओर आकर्षित करते हैं –

झूमीं फ़सलें / धरा ने पहने हैं / प्यारे गहने । ( पृ.49)

नभगंगा की / माँग भरके खिला / दूल्हा गगन । ( पृ.68)

नहाने आते / जब चाँद-सितारे, / तट हर्षाते । ( पृ.69)

पहाड़ी नदी / बल खाती कमर / किसी मुग्धा की । ( पृ.73)

शब्दों के नव-प्रयोग एवं सुंदर शब्दावली से प्रकृति चित्रण बहुत सुंदर बन पड़ा है । प्रकृति का सुंदर चित्रण करने वाले, प्रकृति से प्रेम करने वाले कवि प्रकृति की दुर्दशा देखकर कह उठते हैं –

उड़े पखेरू / सूख गईं डालियाँ / छाया लापता । ( पृ.19 )

झुलसा नभ / उड़ती चिंगारियाँ / व्याकुल धरा । ( पृ.48)

कैसा मौसम / झुलसी हैं ऋचाएँ / असुर हँसें । ( पृ.28 )

नदियाँ सूखी / उजड़े पनघट / गलियाँ मौन । ( पृ.67)

संग्रह में अनेक ऐसे शब्द है जो ध्यानाकर्षित करते हैं । कुछ मौलिक, अनूठे एवं सुंदर शब्दों के प्रयोग कारण हाइकु जीवंत बने हैं जैसे – लंपट, झींकते, थाती, चषक, धूसर, बैन, आँजे, अम्लान, कूँदड़े हाथी-से लगे, मरखने साँडों-से, मेघ-कुंजर, स्वप्न-जल, अश्रु-जल आदि । कथ्य एवं शिल्प दोनों की दृष्टि से संग्रह बहुत ही अच्छा है । 661 हाइकु में से कुछ को यहाँ पर प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, लेकिन संग्रह का पूरा रस लेने के लिए हाइकु प्रेमियों को संग्रह पढ़ना ही होगा ।

प्रस्तुत संग्रह में हाइकु अकारादि क्रम से प्रस्तुत किए गए हैं, यदि अलग-अलग विषय के अनुरूप संग्रह के खण्ड किए होते तो हाइकु का स्वाद लेने में और भी आनंद आता । अगर कोई हाइकुकार अपने संग्रह की संख्या बढ़ाना चाहता, तो कथ्य की दृष्टि से, अन्तः प्रकृति एवं बाह्य प्रकृति विषय को अलग करके इन हाइकु को कम से कम दो संग्रह विभाजित कर प्रकाशन कर सकते थे, लेकिन शायद काम्बोज जी ने संख्या को नहीं बल्कि गुणवत्ता को अधिक महत्त्व दिया है । एक ही संग्रह में भावों एवं शब्द का सुंदर निचोड़ तथा समन्वय प्रस्तुत किया है । जैसा कि कवि ने भूमिका में कहा है – “भाव और अनुभाव संचारी से चलकर रस के स्थायीभाव तक पहुँचने की यह यात्रा, निर्मल मन की तीर्थ यात्रा है ।” इसलिए निर्मल मन के साथ भाव-शक्ति एवं शब्द-शक्ति से भरपूर हाइकु पाठकों के मन को मोह लेते हैं । जीवन से जुड़े सुख-दुःख को लेकर रचे सभी हाइकु बहुत हमारे जीवन के करीब लगते हैं । कुल मिलाकर इस संग्रह के सभी हाइकु कथ्य-शिल्प की दृष्टि से बेजोड़ है । हाइकु प्रेमियों के लिए एवं शोधार्थियों के लिए यह संग्रह बहुत उपयोगी सिद्ध होगा । ऐसी आशा है कि भविष्य में इस हाइकु संग्रह का सही मूल्यांकन होगा एवं हाइकु जगत में इसका भव्य स्वागत होगा । इस सुंदर हाइकु संग्रह ‘बंद कर लो द्वार’ के लिए काम्बोज जी को हार्दिक शुभकामनाएँ ।

बंद कर लो द्वार ( हाइकु- संग्रह):रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’,मूल्य : 250 /- पृष्ठ : 124,संस्करण : 2019 ;

प्रकाशक : हिंदी साहित्य निकेतन , बिजनौर-246701

-0-

purvac@yahoo.com

 


Responses

  1. इस सुंदर हाइकु संग्रह के लिए आपको हार्दिक बधाई

  2. बहुत सुंदर संग्रह है, पूर्वा जी ने अच्छा लिखा , बधाई आप दोनों को। शुभकामनाएं।

  3. वाह! जितना सुंदर संग्रह , उतनी ही सरस समीक्षा। भाई साहब और पूर्वा जी, आप दोनों ही बधाई स्वीकारें।

  4. बहुत सुंदर हाइकु संग्रह है, पढ़कर आनंद आ गया !
    जितने दिल से भैया जी ने हाइकु रचे हैं, उतने ही दिल से आपने समीक्षा लिखी है पूर्वा जी !
    आप दोनों को बधाई और शुभकामनाएँ !

  5. ‘बंद कर लो द्वार’ हाइकु संग्रह हेतु
    श्री रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ को हार्दिक बधाई एवं
    समुचित समीक्षा हेतु डॉ. पूर्वा शर्मा को धन्यवाद।

  6. विस्तृत और सुन्दर समीक्षा के लिए पूर्वा जी को बहुत-बहुत बधाई ।

  7. उम्दा हाइकु संग्रह। सुंदर सरस समीक्षा। भाई काम्बोज जी तथा पूर्वा जी आप दोनों को हार्दिक बधाई।

  8. “बंद कर लो द्वार” भाई रामेश्वर कांबोज हिमांशु का तीसरा हाइकु संग्रह है । संग्रह में सतरंगी छटा / मूड के 661 बेजोड़ हाइकु हैं । आवरण चित्र सभी भावों का प्रतिनिधित्व करता लगा ।

    बानगी देखें-

    चौमुखा दिया
    बनकर जला मैं
    कभी तो आओ ।
    नये हाइकु संग्रह के लिए हार्दिक बधाई । ,💐💐

  9. “गीले आखर ” चोका संग्रह के लिए पूर्वा शर्मा और हिमांशु भाई को बधाई । सुन्दर संपादन में इक्कीस रचनाकारों के ‘चोका’ का सुन्दर गुलदस्ता तैयार हुआ है । सभी का सृजन सुन्दर , भावपूर्ण । पूर्वा शर्मा , हिमांशु भाई व चोकाकारों को दिली बधाई ।

  10. बहुत सुन्दर प्रस्तुति पूर्वा जी , दोनों को हार्दिक बधाई !

  11. भाई कम्बोज जी को उनके हाइकु संग्रह और पूर्वा शर्मा को उसकी सुन्दर अद्भुत समीक्षा के लिए हार्दिक बधाई |एक एक हाइकु अत्यंत भावपूर्ण है |समीक्षा ने पूरी तरह से पाठक का ध्यान और रूचि को अपने शब्दों के साथ बांधे रखा है|

  12. काम्बोज भाई को उनकी पुस्तक के लिए ढेरों बधाई. पूर्वा जी ने बहुत सुन्दर समीक्षा की है, उन्हें भी बधाई.


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