Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 10, 2020

सजा आकाश


डॉ.अर्पिता अग्रवाल

1

आदि न अंत

सागर हुआ मानो

शिव का अंश ।

2

धरा की कोख

हरियाली के बीज

सींचे सावन।

3

सजा आकाश

भोर के सिंदूर से

खनकी धरा ।

4

मेघों का ढोल

जीवंत प्रकृति का

वर्षा-उत्सव।

5

ऋतुराज ने

बजाई जो बाँसुरी।

नाची प्रकृति ।

6

सरसों फूली

जब कोयल कूकी

वन दहके ।

7

भटका मन

मृगछौना-सा बन

आया वसंत ।

8

फोटो: निहित सक्सेना

सिंदूरी भोर

स्वर्णिम जल-राशि

गंगा का घाट।

9

वैशाखी हवा

झरती तितलियाँ

नीम- शाख से।

-0-


Responses

  1. भटका मन
    मृगछौना-सा बन
    आया वसंत ।

    समस्त हाइकु में उत्तम भावाभिव्यक्ति। धन्यवाद।

  2. धरा की कोख, बजाई जो बाँसुरी, मृगछौना-सा बन, वन दहके…. एक से बढ़कर एक हाइकु….सभी बहुत ही मनभावन

    स्वर्णिम जल-राशि, झरती तितलियाँ – बिम्ब बहुत ही मोहक

    हार्दिक शुभकामनाएँ अर्पिता जी

  3. बहुत खूबसूरत बिम्ब व हाइकु, बधाई अर्पिता जी.

  4. सभी हाइकु बहुत सुन्दर, सरस तथा मनभावन…. हार्दिक बधाई अर्पिता जी !

  5. सुन्दर हाइकु के लिए बधाई अर्पिता जी।

  6. अर्पिता जी बहुत खूब लिखे हैं .सभी हाइकु सुन्दर सृजन हैं बधाई स्वीकारें |

  7. बहुत सुंदर हाइकु… बधाई अर्पिता जी।

  8. धरा की कोख, आदि न अंत, ऋतुराज ने बजाई जो बाँसुरी… बेहद खूबसूरत हाइकु अर्पिता जी, आपको बधाई!!

  9. प्रकृति का सौन्दर्य बिखेर रहे हैं यह हाइकु | बधाई प्रीति जी |


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