Posted by: हरदीप कौर संधु | फ़रवरी 2, 2020

निर्मल मन लिये हाइकु के सात जन्मों की यात्रा


  बंद कर लो द्वार ( हाइकु- संग्रह) : रामेश्वर कांबोज हिमांशु , प्रकाशक – हिंदी साहित्य निकेतन , बिजनौर, मूल्य – ₹250 संस्करण –  2019, पृष्ठ – 124 

हाइकु  किसी क्षण की गहन संवेदनात्मक अनुभूति की प्राकृतिक अभिव्यक्ति है जिसमें कृत्रिमता का लेशमात्र भी अंश नहीं होता । एक अच्छा हाइकु उसके अभिव्यक्त चित्र को पाठक के समक्ष प्रकट कर देते हैं  ; यह गूढ़ साधना से उपजी एक लेखन कला है, जिसमें हाइकुकार के भाव,कल्पना और विचार व्यक्त होते हैं ,  जिसने उस दृश्य को महसूस करने के बाद पूर्ण संवेदना से उसका प्रकटीकरण किया है  । इन सजीव शब्दों का सामर्थ्य और उसकी नैसर्गिकता एक अच्छा हाइकु बनाते हैं । इसमें मौलिकता एवं काव्य तत्त्व उपस्थित होते हैं ; वर्णिक अनुशासन , सौंदर्य का चित्रांकन एवं सामयिकबोध  इसके मुख्य आधार हैं ।   हाइकु , हिंदी साहित्य में अब किसी परिचय की मोहताज नहीं ; क्योंकि अब इसके कई संग्रह निकल चुके हैं तथा कई पत्रिकाओं ने इसके विशेषांक निकाले हैं । ब्लॉग्स एवं विभिन्न वेब पत्रिकाएँ भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हैं और हिंदी का सम्मान बढ़ाने  में इसका विशेष योगदान हो रहा है। हाइकु ने हिंदी  साहित्य के क्षेत्र को अन्तर्राष्ट्रीय विस्तार दिया है । 

                   मुझे रामेश्वर कांबोज हिमांशु जी का हाइकु  संग्रह – ‘बंद कर लो द्वार’ को पढ़ने का अवसर मिला इसमें उन्होंने 661 हाइकु  संगृहीत किए हैं ।  इसकी भूमिका में वे लिखते हैं  –  यह निर्मल मन की तीर्थ यात्रा है  ; आपने प्रकृति के दो प्रकार अंतः एवं बाह्य प्रकृति का उल्लेख किया है ।  हाइकु  साहित्य का परिवेश एवं  आकाश को भारतीय  हिंदी साहित्य की परंपरा बताया है । इसे उन्होंने अपने साथियों को समर्पित किया है तथा बताया है कि  इन  हाइकु  से उनका सुख-दुःख का संबंध है । यह एक उच्च कोटि का संग्रह है ,जिसमें आपकी अभिव्यक्ति एवं अनुभव  के गूढ़ निचोड़ को आपने  7 खंडों में  प्रस्तुत किया है । 

               ‘आ जाओ द्वारे’ खंड  के अंतर्गत आपने दुनियावी  रिश्ते-नाते के महत्त्व एवं उनके दरकने के कारणों को अभिव्यक्त किया है ।  प्रकृति के साथ इनका तादाम्य  अनूठा बन पड़ा है । कभी कहते हैं  – काले बादल/ नभ  के  नयनों में /आँजें काजल ,  तो कभी कहते हैं – कलेजा चीर / कह ना पाते  पीर और उमड़े आँसुओं को  सहेली हवा  पोंछ कर निकल जाती है , रिश्तो को यही बहकी हवा उड़ाकर ले भी  जाती है।   

अंबर क्यारी / खरगोश बादल /दुबके  दौड़ें । 

अपने  लूटें /किस दर पर जाएँ /लूट लिखाएँ । 

अंधी रोशनी /टटोल रही रास्ता /कोहरा घना ।

‘ घटा में धूप’ के अंतर्गत आप कहते हैं कि  कमल खिला है या तुम्हारी मुस्कान -सी भोर खिल गई  है , गाँव  के स्वर्ग  में चुनाव विष बो  गया है । च,न्चल हवा टहनियों को मरोड़कर छेड़खानी करती है-

खिला कमल / या तुम मुस्काई  हो / भोर बनके

गाँव था स्वर्ग/  आकरके चुनाव /विष बो गया

चंचल हवा / मरोड़े टहनियाँ / छेड़ती गाछ । 

              ‘ जीवन संझा ‘ में  हाइकु का नयापन एवं ताजगी महसूस की जा सकती है  ; जब वे कहते हैं  यह साँझ जोगिया भेष  में उदास लगती है  । चुप्पी ताले जड़कर खड़ी है , धरा ने फसलों के रूप में गहने पहने हैं  , पक्षी झरोखों में आशीर्वाद बाँटते चहक रहे हैं । 

ठिठका चाँद /झाँका जो खिड़की से /दूजा भी चाँद । 

तन माटी का /मन का क्या उपाय /मन में तुम । 

            ‘ उड़ गया पखेरू’ के अंतर्गत विदा माँगते साँझ से  दिन , नभ को रौंदते पागल हाथी बन धूसर मेघा  ; नीम के बौर की भीनी खुशबू बिखेरती  हँसी ,  तो कहीं पहाड़ी नदी को किसी मुग्धा की बलखाती कमर की संज्ञा आपने दी  है । आपने कभी बच्चे को नन्हा फरिश्ता माना है ,तो कहीं  प्रियतम  में ईश्वर को देखते हैं  और पक्षियों का मिल बाँटकर चुगने में एकता का संदेश देते हैं ।  ये  हाइकु पढ़ने में अद्भुत सुंदर बन पड़े हैं और इनका निखार बेजोड़ है ।  

धान रोपती/छप- छप बदरी /अंबर क्यारी । 

नेह से भरे /गंगा नहा के आए /मृदु वचन। 

         ‘मन बावरे’ खंड के अंतर्गत प्यासी मुक्त डालियों का ताल में नीर चूमना , गगन में चीलों का झपट्टा मार कबड्डी खेलना  , मेघों की तुलना हिरण के कुलाँचों  से करना तथा दर्द अतिथियों का मुश्किलें लाना और देर से जाना जैसे नव प्रयोग इस हाइकु- संग्रह की नई देन है, जो हर नव लेखकों को सीखनी चाहिए ।  हाइकुकार काम्बोज जी ने पुरानी दृश्यों पर अपनी लेखनी चलाने से परहेज किया है ; यही इस संग्रह की आत्मा है-

मन बावरे /दर्द के साथ पड़ी / तेरी भाँवरे। 

 बजे नगाड़े /अंबर में मेघों के /खुले अखाड़े। 

           ‘अनुरागी आखर’ खंड के अंतर्गत  हाइकु के शब्दों का सौंदर्य और जादू अपनी ओर खींचता है । कहीं आपके शब्द खुशबू से नहाए थे, तो कहीं आपने शब्दों के दीप जलाए ; वाणी के जादू का आलिंगन कह उठते हैं कि  लोग जलेंगे जब हम साथ मिलकर चलेंगे। मौलिकता से  भरे शब्दों का सामर्थ्य इसे सजीव बना देता हैं- 

‘ मैं’ भी मिटेगा /’तुम ‘ भी क्या रहेगा /रहेंगे ‘हम’ । 

राजा से खड़े/ पुआल के कूँदड़े /हाथी से लगे। 

रूप तुम्हारा/शुभ मुहूर्त जैसा /मन उकेरा । 

 शुभ्र चंद्रिका/ शिशु रूप लेकर /गोद आ छुपी। 

                 ‘ स्वप्न जल ‘ खंड के अंतर्गत हवाएँ सिसकती हुई पहाड़ों से नदी के रूप में उतर रही हैं , रिश्तों  का फंदा मुँह बाँध रहे हैं , यादों के घाव सौ – सौ  पहरों के  बाद भी खुल जाते हैं  जब सर्दी की धूप स्वर्णिम हो जाती है ।  यही रिश्ते बुरे वक्त यानी साँझ में फरार हो जाते हैं, जिसका वक्त गवाह है  , इसे सिर्फ अपने ऊपर बीतने से ही जाना जा सकता है। 

हौले से बोलो / सोया है मुसाफिर /अरसे के बाद। 

हम  पाहुने /कुछ दिन के ही थे/ चलना होगा । 

स्वर्णिम मेघ/लुभाते गगन को/कुंचित केश । 

                     रामेश्वर  काम्बोज ‘हिमांशु’ जी ने इस संग्रह में सात खंडों के अंतर्गत हाइकु के सात जन्म की यात्रा  करा दी है । सभी हाइकु उत्तम बने हुए हैं यहाँ सभी का उल्लेख करना मुश्किल है , मेरी सभी को सलाह है कि पाठक इस संग्रह  को पूरा पढ़ें  । यह संग्रह शोधार्थियों एवं नव लेखकों के लिए  नव द्वार खोलता है। वर्तमान में प्रचलित एवं प्रकाशित हाइकु की दुनिया से बिल्कुल नए हाइकु की प्रस्तुति  यहाँ मन मोह लेती है।  इनका सामर्थ्य इतना गहरा है की पाठकों के समक्ष उस  अनुभूत दृश्य को  तत्क्षण प्रकट करते हैं  । यह गूढ़  साधना का प्रतिफल है , निश्चित ही यह संकलन लोगों को पसंद आएगा ;  हिंदी साहित्य में  यह मील का पत्थर साबित होगा आपका यह योगदान एक बार और याद रखा जाएगा । 

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 रमेश कुमार सोनी,( राज्यपाल पुरस्कृत व्याख्याता एवं साहित्यकार) जेपी रोड , एच पी गैस के पास – बसना , जिला – महासमुंद ( छत्तीसगढ़ ) -493 554 

मोबाइल संपर्क- 70493 55 476


Responses

  1. बहुत सुंदर संग्रह है ‘बंद कर लो द्वार’
    मुझे भी पढ़ने का अवसर मिला।
    रमेश सोनी जी को बधाई कि इस पर लिखने का उनको सुयोग मिला।

  2. रमेश कुमार सोनी जी अापने बहुत ही विस्तृत एवं सुन्दर समीक्षा लिखी है। संग्रह की इतनी रोचक समीक्षा पढ़ कर अवश्य ही पाठकों के मन में संग्रह को पढऩे की इच्छा जाग्रत होगी। अादरणीय काम्बोज जी लगभग हर विधा में लिखते हैं। उनका साहित्य सदैव सकारात्मक ऊर्जा तथा जीवन के प्रति संदेश देने वाला होता है। उनके सहज सरल व्यक्तित्व की स्पष्ट छाप उनके लेखन में परिलक्षित होती है ।

  3. आदरणीय काम्बोज भाई साहब को अपने नए प्रकाशन के लिए बधाई एवं शुभकामनाएँ । रमेश कुमार सोनी जी की बेहतरीन समीक्षा, और चुने हुए हाइकु पढ़कर, पूरा संग्रह पढ़ने की बड़ी तीव्र इच्छा हो रही, आशा है यह अवसर जल्दी मिलेगा!

  4. रमेश कुमार सोनी जी की समीक्षा बहुत सुंदर,सन्तुलित एवम सारगर्भित है,उन्होंने प्रत्येक खण्ड की विशद विवेचना की है,मैं भी आजकल ‘बन्द कर लो द्वार’पढ़ रहा हूँ,आदरणीय काम्बोज जी ने विविध मनोभावों का सुंदर चित्रण किया है,उत्कृष्ट कृति है।रमेश सोनी जी एवम काम्बोज जी को बधाई।

  5. सुंदर संग्रह की सुंदर समीक्षा …
    हार्दिक शुभकामनाएँ …

  6. बहुत ही सुंदर हाइकु संग्रह है,मुझे भी पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ।उतनी ही सुन्दर और विस्तृत समीक्षा लिखी है रमेश कुमार सोनी जी ने ।रचनाकार और समीक्षक दोनों को कोटिशः बधाइयाँ ।

  7. भाई काम्बोज जी को उनके नए संग्रह के प्रकाशन तथा रमेश सोनी जी को संग्रह की बहुत सुंदर, सारगर्भित समीक्षा के के लिए हार्दिक बधाई।

  8. ‘बंद कर लो द्वार’ हाइकु पुस्तक के प्रकाशन पर श्री रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ को हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं। इस पुस्तक की रमेश कुमार सोनी द्वारा सम्यक रूप से समीक्षा की है। उद्धृत हाइकु पुस्तक का पूर्ण परिचय देने में समर्थ है। आप सभी को धन्यवाद।

  9. सद्द्य प्रकाशित हाइकु काव्य संग्रह ‘बंद कर लो द्वार के प्रकाशन और उसकी सारगर्भित समीक्षा के लिए काम्बोज भाई जी और श्री रमेश कु.सोनी जी को बहुत -बहुत बधाई स्वीकार हो |
    पुष्पा मेहरा

    .

  10. आद.भैया जी, आपको नए संग्रह ‘बंद कर लो द्वार’ के लिए तथा रमेश सोनी जी को संग्रह की बहुत सुंदर समीक्षा के लिए हार्दिक बधाई !!

  11. पुस्तक के लिए आदरणीय काम्बोज भाई को हार्दिक बधाई.
    पुस्तक को पढने का अवसर मुझे मिला. बहुत सुन्दर और भावप्रवण हाइकुओं का संग्रह है यह पुस्तक. काम्बोज भाई ने पुस्तक में सही कहा है कि इसमें कुछ हाइकु ऐसे ज़रूर मिलेंगे जिनमें हम सभी को अपनी प्रतिच्छाया दिख जायेगी.
    बहुत सुन्दर और व्यापक समीक्षा के लिए रमेश कुमार सोनी जी को बधाई.

  12. नवीन हाइकु संग्रह के लिए भैया रामेश्वर काम्बोज की को बधाई एवं रमेश जी को इतनी विस्तृत और सारगर्भित समीक्षा के लिए बधाई | समीक्षा से पता चलता है कि भैया ने प्रकृति और जीवन के विभिन्न रूपों को शब्दों में बाँधा है | जल्दी ही इसे पढने का सौभाग्य भी प्राप्त होगा |

  13. सबसे पहले आदरणीय भैया जी को ‘बंद कर लो द्वार’ हाइकु-संग्रह के लिए बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ!
    आ. रमेश कुमार सोनी जी की सारगर्भित समीक्षा पढ़कर बहुत अच्छा लगा! जिन हाइकु का उन्होंने उदाहरण दिया है, वे सभी अत्यंत ख़ूबसूरत एवं भावपूर्ण हैं! सभी हाइकु नयापन लिए हुए, मन को छूने वाले हैं! आदरणीय भैया जी की लेखनी को नमन तथा आ. रमेश कुमार सोनी जी को सुंदर समीक्षा हेतु हार्दिक बधाई!

    ~सादर
    अनिता ललित

  14. आप सबके हृदयस्पर्शी विचारों के प्रति बहुत -बहुत आभार -रामेश्वर काम्बोज

  15. हार्दिक शुभकामनाएं आदरणीय सर !
    आदरणीय रमेश सर जी के उम्दाभिव्यक्ति से सुसज्जित समीक्षा आलेख ने पुस्तक पढ़ने की इच्छा को ओर तीव्र कर दिया है। नमन

  16. bhaiya bahut hi sunder aapko punah bahut bahut badhayi
    ham sab ko aapne hi haiku ki duniya se parchit karaya hai aapke karan hi hum sabhi ne likhna shuru kiya aaj punh uskeliye abhar
    bhaiya aap aese hi aage badhte rahiye svasth rahiye khush rahiye yahi bhagvan se prarthna hai
    saader
    bahan


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