Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 29, 2019

1973


1-प्रीति अग्रवाल ‘अनुजा’

1

सर्दी की धूप

नकचढ़ी है थोड़ी

आए न आए!!

2-सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

1

सूर्य सहमा

कोहरे ने दी अदब

ठंड अकड़ी।

2

ठंडक बढ़ी 

ठिठुरी निशा पड़ी

सुकून नहीं।

3

लजाया सूर्य

ठंड देहरी लांघी

अलाव जले।

4

कोहरा छाया

दिनमान गायब

पूस महीना।

5

भोर का फेरा

टपकता कोहरा

चुभता रहा।

6

भोर का सूर्य

माँ आँचल में छुपा

जैसे मासूम।

7

कोहरा छंटा

फूलों से गिरती

सहमी बूंदे।

8

फूल पत्ती से

टपकी शबनम यूँ

नैन से अश्रु।

9

झुंड के झुंड

अलाव तापते 

गप्प मारते।

10

धुंध जो ढली

मोती सी चमकती

बूँदे ही मिली।


Responses

  1. सर्दी की धूप
    नकचढ़ी है थोड़ी
    आए न आए!!

    फूल पत्ती से
    टपकी शबनम यूँ
    नैन से अश्रु।

    प्रीति जी, सविता जी बहुत सुन्दर सृजन,
    हार्दिक बधाई आप दोनों रचनाकारों को !


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