Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 3, 2019

2052-जोगिनी गंध


वर्तमान युग परिवर्तन का युग है और परिवर्तन की यह प्रक्रिया जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में है। साहित्य भी इससे अछूता नहीं है। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि बदलते परिवेश में मानव के पास समयाभाव हुआ है और यान्त्रिकता के बाहुपाश में समाये मनुष्य के पास अब इतनी फ़ुर्सत नहीं है कि वह साहित्य को अधिक समय दे सके। ऐसे में निश्चित रुप से साहित्यकारों को ही अधिक प्रयास करने होंगे। कम शब्दों में अधिक अभिव्यक्ति भरनी पड़ेगी। ऐसे में यह युग लघुकविता या सूक्ष्मकविता का अधिक है। सूक्ष्म कविताओं में हाइकु कविता का अपना विशिष्ट स्थान है। हाइकु 5/7/5 वर्ण-क्रम में एक त्रिपदीय छन्द है। यह छन्द केवल सत्रह वर्णों की सूक्ष्मता में विराट को समाहित करने की अपार क्षमता रखता है। यह छन्द जापान से भारत आया और हिन्दी सहित अनेक भाषाओं ने इसके शिल्प को आत्मसात् कर लिया। वर्तमान में हिन्दी हाइकु के अनेक संकलन एवं संग्रह प्रकाशित हो रहे हैं। इन्हीं में से एक है-‘जोगिनी गंध’। इस हाइकु-संग्रह की सर्जक हैं- शशि पुरवार।

शशि पुरवार ; हाइकुकार

विभिन्न विधाओं के माध्यम से लेखन में सक्रिय शशि पुरवार जी एक शानदार हाइकु कवयित्री हैं। कम शब्दों में बड़ी बात कह लेने का हुनर एक अच्छे हाइकु कवि की पहली विशेषता है। 5/7/5  वर्ण-विन्यास के क्रम में कुल तीन पंक्तियों, यानी कि सत्रह वर्णों में सागर की गहराई माप लेने की क्षमता का कौशल हाइकु की अपनी विशिष्टता है। प्रकृति तक सीमित हाइकु को हिन्दी ने जीवन के प्रत्येक रंग से भर दिया है।

जोगिनी गंध के माध्यम से हाइकु कवयित्री शशि पुरवार जी ने हिन्दी हाइकु साहित्य के विस्तार में अपना योगदान भी सुनिश्चित किया है। आपके हाइकु जहाँ अपनी बात बहुत सरलता से कह देते हैं, वहीं अर्थ घनत्व की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हैं। विभिन्न विषयों के अन्तर्गत पाँच भागों में विभक्त और लगभग पाँच सौ हाइकु से सुसज्जित यह हाइकु-संग्रह स्वयं में विशिष्ट है।
देखें उनके कुछ हाइकु-
* छूटे संवाद/दीवारों पे लटके/वाद-विवाद।
* धूप सुहानी/दबे पाँव लिखती/छन्द रूमानी।
* प्रीत पुरानी/सूखे गुलाब बाँचे/प्रेम कहानी।
* जोगिनी गंध/फूलों की घाटी में/शोध- प्रबन्ध।
* रीता ये मन/ कोख का सूनापन/अतृप्त आत्मा।

प्रेम के बिना संसार गतिहीन है। प्रेम की अनुभूति शाश्वत है। प्रेम की सम्पदा अपार है। कवयित्री ने हाइकु के माध्यम से प्रेम के शाश्वत स्वरूप  और माधुर्य को  अभिव्यक्त किया है-
* नेह के गीत/आँखों की चौपाल में/मुस्काती प्रीत।
* प्रेम -अगन/रेत-सी प्यास लिये/मन-आँगन।
* आँखों में देखा/छलकता पैमाना/सुखसागर।
मन की थाह पाना सम्भव नहीं है। मन पर शशि जी का यह हाइकु विशिष्ट लगा-
* अनुगमन/कसैला हुआ मन/आत्मचिन्तन।
इसी आत्मचिन्तन से पीड़ा की छाया में स्मृतियाँ कोलाहल करती हैं-
* दर्द की नदी/लिख रही कहानी/ये नई सदी।
प्रत्येक मनुष्य प्रकृति से प्रेम करता है और जब वह प्रकृति के अनुपम सानिध्य में रहता है ,तो वह एक नई ऊर्जा से भर जाता है। यह प्रकृति की निश्छलता और अपनापन ही है। प्रकृति का अंश मनुष्य अपनी प्रत्येक आवश्यकता के लिए प्रकृति पर निर्भर है। ऐसे में शशि पुरवार जी ने पुस्तक का एक भाग प्रकृति को ही समर्पित किया है, जहाँ पर कई अच्छे हाइकु पढ़ने को मिलते हैं-
* हिम-से जमे/हृदय के जज़्बात/किससे कहूँ।
* मन -प्रांगण/यादों की चिनगारी/महकी चंपा
* सघन वन/व्योम तले अँधेरा/क्षीण किरण
* झरते पत्ते/बेजान होता तन/ठूँठ-सा वन।
* कम्पित धरा/विषैली पॉलिथीन/मानवी भूल।
हिन्दी हाइकु के वर्तमान स्वरूप के अन्तर्गत पुरवार जी ने जीवन का हर रंग भरने का सफल प्रयास किया है। यह प्रयास हाइकु के स्वरूप को स्पष्ट करता है। इस सन्दर्भ में कुछ और हाइकु-
* सूखे हैं पत्ते/बदला हुआ वक़्त/पड़ाव-अन्त।
* नहीं है भीड़/चहकती बगिया/महका नीड़।
* दिया औ’ बाती/अटूट है बन्धन/तम का साथी
* कलम रचे/संवेदना के अंग/जल तरंग।
* अधूरापन/ज्ञान के खिले फूल/खिला पलाश।
जोगिनी गंध के अन्तर्गत जापानी काव्य विधा के दो और मोती ताँका (5/7/5/7/7) और सेदोका (5/7/7/5/7/7) भी संग्रह में सम्मिलित किए गए हैं। पुस्तक में चालीस ताँका और बीस सेदोका सम्मिलित हैं। जोगिनी गंध से यह ताँका देखें-
“चंचल हवा/मदमाती-सी फिरे/सुन री सखी!/महका है बसंत/पिय का आगमन!’इसी क्रम में यह सेदोका भी उल्लेखनीय है-’मेरा ही अंश/मुझसे ही कहता/मैं हूँ तेरी छाया/जीवन भर/मैं तो प्रीत निभाऊँ/क्षणभंगुर माया।”
‘जोगिनी गंध’ कवयित्री शशि पुरवार जी का हिन्दी हाइकु-साहित्य को समृद्ध करने का सत्संकल्प है। वे आगे भी अपनी सर्जना से हिन्दी हाइकु को अभिनव आयाम एवं विस्तार देती रहेंगी, मुझे पूर्ण विश्वास है। ___________________________________
जोगिनी गंध(हाइकु संग्रह);हाइकुकार- शशि पुरवार,ISBN: 978-93-88839-30-3
पृष्ठ-144,मूल्य- ₹ 200,प्रकाशक- लोकोदय प्रकाशन, लखनऊ
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सम्पर्क: डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’, 24/18, राधा नगर, फतेहपुर (उ.प्र.)- 212601
मो.- 9839942005
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Responses

  1. एक से बढ़कर एक रचनाएँ , बधाई स्वीकारें शशि जी! शैलेष जी आपकी समीक्षा भी बेहतरीन!

  2. हाइकु और समीक्षा दोनों बहुत सुंदर। शशि जी तथा शैलेष जी को बहुत बधाई।

  3. शशि पुरवार जी अनेक विधाओं की सशक्त रचनाकार होने के साथ ही एक समर्थ हाइकुकार भी हैं, उनके हाइकु सहज एवम प्रभावी होते हैं,शैलेश वीर जी ने उनके संकलन’जोगिनी गंध’की सम्यक समीक्षा की है दोनो ही रचनाकारों को बधाई।

  4. सुंदर ‘जोगिनी गंध’ की सुंदर समीक्षा , काव्यानुभूति रस ,लय व लास्य से भरी ,शशि जी बधाई |
    पुष्पा मेहरा

  5. बहुत अच्छी समीक्षा।

  6. आप सभी मित्रों का तहे दिल से आभार लम्बे समय बाद संवाद हो रहा है , आपने मुझे अपने दिल में जगह दी है यह अनमोल है , कृष्णा जी , पुष्पा दी , प्रीति अग्रवाल , शिवजी श्रीवास्तव जी , नमस्कार

    आ कम्बोज भाईसाहब , व हरदीप सिंधु जी का तहे दिल से आभार पत्रिका में मेरी समीक्षा को शामिल किया , हाइकु परिवार में आना जैसे अपने घर लौटना है दिल से आभारी हूँ , सभी को नमस्कार

  7. ‘जोगनी गंध’ बहुत मनमोहक साथ ही समीक्षा भी बहुत बढ़िया !!
    शशि जी तथा शैलेष जी को बहुत – बहुत बधाई !!


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