Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 7, 2019

2045


 ज्योत्स्ना प्रदीप

1

तुम्हारा साथ

मन क्यों होता

जैसे अनाथ !

2

तूने छुआ था

पत्थर से मन में

कुछ न हुआ!

3

छल ही छल

‘अपने’ घूम रहे

भेस बदल !

4

कुछ नाते थे

तभी तक हम भी

इठलाते थे l

5

हँसी न आती

अधर -दहलीज

रोज़ बुलाती l

6

निर्मल -मन

तभी तो आँसू करें

रोज़ सिंचन !

7-

अपना कोई

जो हुआ न अपना,

अँखियाँ रोईं l

8

रहा मलाल

समझ नहीं पाये

लोगों की चाल!

9

एक ख़लिश

मन में सदा रही

कभी न बही !

10

दिल की सुनी

तभी तो तकलीफ़ें

हैं कई गुनी !

11

अपना कोई

होता कभी तो काश,

छूते आकाश !

12

मन अबोध

माँ नहीं ,पर बैठा

माँ की ही गोद l

-0-

 


Responses

  1. बहुत भावपूर्ण और उम्दा हाइकु…मेरी हार्दिक बधाई…|

  2. हृदय से आभार प्रियंका जी !

  3. Waah वाह बहुत सुंदर

    मन अबोध

    माँ नहीं ,पर बैठा

    माँ की ही गोद l

    On Sat, 7 Sep 2019 at 5:28 PM, हिन्दी हाइकु(HINDI HAIKU)-‘हाइकु कविताओं की वेब पत्रिका’-2010 से प्रकाशित हो रही है। आपकी हाइकु कविताओं का स्वागत है ! wrote:

    > हरदीप कौर संधु posted: ” ज्योत्स्ना प्रदीप 1 तुम्हारा साथ फिर मन क्यों > होता जैसे अनाथ ! 2 तूने छुआ था पत्थर से मन में कुछ न हुआ! 3 छल ही छल > ‘अपने’ घूम रहे भेस बदल ! 4 कुछ नाते थे तभी तक हम भी इठलाते थे l 5 हँसी न > आती ” >


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