Posted by: हरदीप कौर संधु | सितम्बर 7, 2019

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 ज्योत्स्ना प्रदीप

1

तुम्हारा साथ

मन क्यों होता

जैसे अनाथ !

2

तूने छुआ था

पत्थर से मन में

कुछ न हुआ!

3

छल ही छल

‘अपने’ घूम रहे

भेस बदल !

4

कुछ नाते थे

तभी तक हम भी

इठलाते थे l

5

हँसी न आती

अधर -दहलीज

रोज़ बुलाती l

6

निर्मल -मन

तभी तो आँसू करें

रोज़ सिंचन !

7-

अपना कोई

जो हुआ न अपना,

अँखियाँ रोईं l

8

रहा मलाल

समझ नहीं पाये

लोगों की चाल!

9

एक ख़लिश

मन में सदा रही

कभी न बही !

10

दिल की सुनी

तभी तो तकलीफ़ें

हैं कई गुनी !

11

अपना कोई

होता कभी तो काश,

छूते आकाश !

12

मन अबोध

माँ नहीं ,पर बैठा

माँ की ही गोद l

-0-

 

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Responses

  1. बहुत भावपूर्ण और उम्दा हाइकु…मेरी हार्दिक बधाई…|

  2. हृदय से आभार प्रियंका जी !


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