Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 27, 2019

1896-मन के द्वार हज़ार


ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य-        

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ 

 भाषा मानव के अस्तित्व का एक अनिवार्य और अपरिहार्य प्राण -तन्तु है, गर्भनाल से जुड़े शिशु की तरह।  निरन्तर प्रवाह भाषा की सबसे बड़ी शक्ति है । यह शक्ति सामाजिक संवाद और चिन्तन धारा के प्रवाह के कारण गहन और व्यापक होती है ।  शब्दों की सहज ग्राह्यता ,जनमानस की सबसे बड़ी शक्ति है ।यही शक्ति भाषा के रूप में हमारे सामने आती है । यही शक्ति  उन्नत होकर बोली को भाषा और अवनत होने पर भाषा को बोली तथा घोर उपेक्षा के  कारण उसे विलुप्त भी कर सकती है ।आज हम अपनी बोलियों की उपेक्षा कर रहे हैं । प्रकारान्तर  से हम अपनी भाषाओं को कमज़ोर कर रहे हैं। छोटी-छोटी जलधाराओं  को  अगर गंगा में  मिलने से रोकेंगे तो प्रवाह- गहराई और पाट का घटना शुरू हो जाएगा। सहृदय कथाकार कवयित्री रचना श्रीवास्तव भाषा की ऊर्जा , ऊष्मा और शक्ति से वाकिफ़ है । इनका शब्द चयन इनके उदार हृदय की झलक दे जाता है ।इनके काव्य का कथ्य और भाषा दोनों ही नव्यता लिये होते हैं ।   इन्होंने कुछ हिन्दी हाइकु का अवधी अनुवाद मुझे दिखाया तो मैंने दो -तीन रचनाकारों के और हाइकु का अनुवाद करने के लिए निवेदन किया ।मैं चमत्कृत हो गया । अनुवाद में  मूल हाइकु के भाव की रक्षा करते हुए छन्दविधान को भी बनाए रखा । यह काम सचमुच बहुत कठिन था।  हाइकु के क्षेत्र में इससे पूर्व भी इस तरह के प्रयास हुए हैं। डॉ सत्यभूषण वर्मा और अज्ञेय जी ने जो अनुवाद किए हैं वे केवल अनुवाद हैं , हाइकु नहीं बन सके  हैं ।

डॉ भगवत शरण अग्रवाल ने ‘अर्घ्य( 1995) में अपने 65 हिन्दी हाइकु 18 भारतीय एवं 7 विदेशी भाषाओं में प्रस्तुत किए हैं। यह अनोखा और बड़ा कार्य रहा है ।कुछ भाषाओं में अनूदित हाइकु के  अनुवाद के साथ शिल्प भी बरकरार रहा है , जैसे:-

बैठतीं टिड्डी / गेहूँ की बालियों पै / किसान सोते

तीड बेसतां / घऊँने कणसले /खेडूत सूता (गुजराती)

लेकिन सभी भाषाओं की प्रवृत्ति ऐसी नहीं है कि छन्द का अनुपालन करते हुए अनुवाद किया जा सके । यह सब अनुवादक की सामर्थ्य पर निर्भर है । काव्य का अनुवाद वैसे  भी बहुत बड़ी चुनौती है । हाइकु -जगत् ने  डॉ भगवत शरण अग्रवाल के इस बड़े कर्य का विशेष नोटिस नहीं लिया ।हिन्दी और मराठी के प्रसिद्ध कवि श्याम खरे ने ‘महक’( 2008) 24 मराठी हाइकुकारों के हाइकु का अनुवाद हिन्दी में प्रस्तुत किया । अन्य रचनाकारों का  अनुवाद सिर्फ़ अनुवाद ही बन सका  है , हाइकु नहीं ।फिर भी खरे जी ने इस दिशा में एक सकारात्मक प्रयास किया ।इनके अपने कुछ हाइकु में ही छन्द का निर्वाह हो सका है , जैसे –

अलाव जले /हम नहीं जानते  / दु:ख वृक्षों का । (श्याम खरे)

शेकोटि जळे / मानवां कां न कळे / दु:ख वृक्षांचे (श्याम खरे)

    डॉ अंजलि देवधर ने ‘भारतीय हाइकु’( 2008) में 105 हाइकुकारों के एक -एक हाइकु का  अनुवाद अंग्रेज़ी में प्रस्तुत किया । इसे भी केवल अनुवाद ही कहा जाएगा, न कि अंग्रेज़ी हाइकु ।अंग्रेज़ी  सिलेबिक (अक्षर प्रधान ) भाषा है , न कि वर्ण प्रधान  अत: छन्द का अनुपालन करते हुए  अनुवाद करना  अत्यन्त  दुरूह कार्य  है।

जापानी हाइकु के अंग्रेज़ी अनुवाद की यह दिक्कत ‘वन हण्ड्रेड  फ़्रॉग्स’ ( हिरोआकि सातो-1983) में भी देखी जा सकती है ।

डॉ हरदीप कौर सन्धु जुलाई 2010 से पंजाबी हाइकु का अनुवाद हिन्दी में करती रही हैं । इनके हिन्दी अनुवाद में मूल की भावानुभूति के साथ हाइकु का शिल्प भी सुरक्षित रहा है । जून 2012 से इन्होंने हाइकुलोक में पंजाबी में भी छन्दानुशासन की रक्षा करते हुए अनुवाद किया है ।कुछ  अनुवाद गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में साथ-साथ प्रकाशित किए हैं ताकि दोनों भाषा-भाषी इनका रसास्वादन कर सकें । यह सही अनुवाद की दिशा में किया जा रहा सराहनीय कार्य है ।

हिन्दी -रात या दिन   /   आँसुओं का मौसम    / सदा निखरा  ।     ( डॉ सुधा गुप्ता)                                                                                                                                 

पंजाबी- रात जाँ दिन /  हँझुआं दा मौसम / सदा निखरे ।

हिन्दी – घटा-सी घिरी / कमलों की सुगन्ध / वह आए क्या? (डॉ भगवत शरण अग्रवाल)

पंजाबी -छाई है घटा / कमलां दी  खुशबू / की उह आए ?

         अभी 2013  जनवरी में ही कशमीरी लाल चावला और प्रो नितनेम सिंह के द्विभाषी ( पंजाबी-हिन्दी) हाइकु-संग्रह आए  हैं । इन दोनों संग्रहों में दोनों ही कवियों ने  दोनों भाषाओं में छन्दानुशासन का पालन किया है । मूल हाइकु साधारण हैं । अनूदित हिन्दी हाइकु  में  हिन्दी भाषा  के स्तरीय और व्यावहारिक प्रयोग की कमी खटकती है ; फिर भी एक उत्साहवर्द्धक शुरुआत तो हुई है । इसका स्वागत होना चाहिए ।

इसी कड़ी में रचना श्रीवास्तव ने हिन्दी ( खड़ी बोली ) के हाइकु का अवधी में अनुवाद किया है ; वह भी 32 रचनाकारों के 538 हाइकु का । यह काम अब तक किए गए हाइकु अनुवाद के क्षेत्र में किसी अकेले रचनाकार द्वारा किया गया बड़ा कार्य है। हाइकु के भाव और छन्द की रक्षा करते हुए इस काम को करना बहुत कठिन था । लेकिन जहाँ चाह , वहाँ राह । रचना श्रीवास्तव हिन्दी काव्य जगत में एक बहुचर्चित और प्रशंसित कवयित्री है , जिनकी भाव मधुरिमा और उर्वर कल्पना का अहसास पाठक महसूस करते रहे हैं । रचना श्रीवास्तव की यह प्रतिभा अनुवाद में भी प्रभावित करती है  ।इनकी अनुवाद -प्रतिभा के कतिपय उदाहरण देखिए-

डॉ भगवत शरण अग्रवाल -भोरवा साथे / ई केकर महक /बौराय मन ।

डॉ सुधा गुप्ता -चनार -पात /कहाँ पाईस आग /बतावा जरा ।

डॉ रमाकान्त श्रीवास्तव-  गावत मोर / पिरेम कै गितिया /उषा निहाल ।
डॉ भावना कुँअर-पंछी बनि कै / घूमत रहीं यादें /भुइयाँ गिरी  ।

डॉ हरदीप सन्धु-पियारी बेटी  /भोर कै आरती ,ई /पावन  बानी  ।

डॉ सतीशराज पुष्करणा-हँसा ऐ दोस्त /रोये से ई रतिया /छोट न होई ।

कमला निखुर्पा- गील पलक  / नयन पियाला  मा  / सिन्धु छ्लके ।

डॉ जेन्नी शबनम – अधूरी  आसा / भटकत  मनवा / नाही उपाय ।

डॉ अनीता कपूर- तू जो पेडवा / हम भयन पात / अब तौ रुको ।

पूर्णिमा वर्मन- बहिंयाँ उठा/ खजूर कै कतार / हम्मै  बुलावे ।

       रचना श्रीवास्तव ने हाइकु के भाव पक्ष और कलापक्ष दोनों का निर्वाह निपुणता से किया है ।अवधी में अनूदित इन हाइकु को पढ़ने से काव्य-माधुर्य का अनुभव किया  जा सकता है । अनुवाद में भाव की रक्षा करना सबसे बड़ी चुनौती है ,जिसे रचना श्रीवास्तव ने अत्यन्त सहज भाव से स्वीकारा ही नही बल्कि निभाया है । आपका यह कार्य सचमुच ऐतिहासिक महत्त्व का है । इस संग्रह में  तीन बाल हाइकुकारों ( सुप्रीत सन्धु , ऐश्वर्या कुँअर और ईशा रोहतगी)को भी शामिल किए गया हैं ।मैं आशा करता हूँ कि सुधीजन  इस कार्य के महत्त्व को सराहेगे और इस मिशन को और आगे बढ़ाकर  हाइकु जगत् को और समृद्ध करेंगे ।

         -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’  , 26 जनवरी , 2013

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भूमिका -रचना श्रीवास्तव

 

जापानी कविता की  हाइकु से मेरा परिचय आदरणीय श्री रामेश्वर कम्बोज हिमांशु जी ने करवाया है पाँच सात पाँच की वर्णक्रम व्यवस्था में लिखी जाने वाली इस छोटी कविता पहले तो लगा कि  इतने कम शब्दों में भावों के प्रवाह को कैसे बाँधा जा सकता है ;पर भाई हिमांशु जी ने हिंदी हाइकु का लिंक भेजा ।इस लिंक पर जाकर जब मैने हाइकु के समुद्र में गोते लगाना प्रारंभ किया तब पता चला कि भावों को बाँध कर भी कितना खुला रखा जा सकता है ।इनका संसार ही निराला है  ।ये आपको बहकने नहीं देता ।लिखने वाले के भाव पढ़ने वाले तक पहुँच भी जाते हैं ।इसमें लिखा कम जाता है और समझा ज्यादा जाता है ।भाई हिमांशु जी के कहने पर ही मैने हाइकु लिखना प्रारंभ किया और कुछ ही दिनों में मुझे हाइकु लिखने में आनंद आने लगा । मै भाई हिमांशु जी का धन्यवाद कहे बिना नहीं रह सकती ; जिनके प्रोत्साहन से आज मै हाइकु लिखने लगी हूँ
हाइकु की धारा में बह ही रही थी की मेरे पर बाबा स्वर्गीय श्री रामचरित्र पाण्डेय जी की कुछ अवधी कविताएँ मेरी माँ श्रीमती विद्यावती पाण्डेय जी से मुझे पढ़ने को मिलीं । इसी से मन में विचार आया कि क्यों न हाइकु का अवधी में अनुवाद किया जाए ।यह वह भाषा है जिसको सुनकर बोल कर मै बड़ी हुई।खड़ी बोली बोली या अंग्रेजी भाषा बोली पर अवधी भाषा की मिठास मन के किसी कोने में सदा छिपी रही ।माँ को जब भी बोलते सुनती थी तो  बहुत अच्छा लगता था ।अतः हाइकुओं का अवधी अनुवाद करना प्रारंभ किया ।थोडा काम करके हिमांशु जी को दिखाया तो उन्होंने कहा “बहुत अच्छा काम किया है ;क्यों न और भी हाइकुकारों को इस में शामिल किया जाए “
उनके इस प्रोत्साहन भरे शब्दों ने मुझमे ऊर्जा भर दी और 32 हाइकुकारों के 538 हाइकु का अवधी अनुवाद का कार्य पूरा हुआ  । अनुवाद की यह यात्रा सरल न थी  । शब्दों का उचित चुनाव फिर वर्ण की गणना करना और उनका सही होना यह सब मिलाकर एक जटिल कार्य था ।अनुवाद करते समय कहीं पर जब कोई शब्द नहीं मिलता तब सोचती यदि माँ इसको कहती तो कैसे कहती और पिता जी इसका जवाब कैसे देते ।और बस मुझको शब्द मिल जाते अनुवाद की यह कठिन  यात्रा आसान होती गई ।  माता -पिता के आशीर्वाद ,परिवार के प्रेम ,भगवान की कृपा और भाई हिमांशु जी की सराहना के कारण मैं  कार्य करने में मै सफल रही ।

यहाँ एक बात और कहना चाहूँगी की संगणक(कम्प्यूटर )पर हिन्दी लिखना मुझे नहीं आता था ।करीब सात साल पहले मेरे पति श्री अविनाश श्रीवास्तव ने मेरे लिए हिंदी फॉण्ट डाउनलोड किया था और उन्ही के प्रोत्साहन से मैने संगणक पर हिंदी लिखना प्रारम्भ किया था ।अविनाश के ही कारण मेरी कविताएँ मेरी डायरी से निकल कर बाहर का संसार देख सकीं । मेरा सच्चा मार्गदर्शक होने के कारण  और मेरे हर कार्य में मेरा साथ देने के लिए मै अविनाश की प्रेरणा को मुख्य आधार मानती हूँ । सच कहूँ-पत्नी को पति का आत्मीय सहयोग मिलने से कोई काम  दुष्कर नहीं रह पाता । इनके लिए धन्यवाद शब्द   बहुत छोटा लगता है ।
डॉ श्री रमाकांत श्रीवास्तव जी ने मेरे इस अनुवाद को अपने आशीष वचनों से प्रकाशमान किया है मै उनकी आभारी हूँ आदरणीया दीदी डॉ सुधा गुप्ता जी का मुझको जो वात्सल्य मिला है , वह तो मेरे अधिकार जैसा हो गया । फ़्लैप के लिए उन्होंने मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए जितना लिख दिया , मैं उससे कभी उॠण नहीं होना चाहूँगा ।
अब यह पुस्तक आपके हाथों में हैं  ।मेरे अनुवादों की गंगा आपको सराबोर करने में कितना सफल हुई है ये तो आप गुणीजन ही बताएँगे ।आशा है अवधी भाषा को समर्पित मेरा ये छोटा सा प्रयास सफल हुआ होगा और आपके स्नेह शब्दों का हक़दार बन सकेगा ।आपके अमूल्य सुझावों  की मुझे प्रतीक्षा रहेगी ।
अब आपै कहीं कैयीसन लाग ई कितबिया ? आप सब कै आसिरवाद चाहीं।
रचना श्रीवास्तव
अमेरिका

 


Responses

  1. वआआह, हार्दिक बधाई इस ऐतिहासिक कार्य हेतु।

  2. वआआह, हार्दिक बधाई इस ऐतिहासिक कार्य हेतु।

  3. रचना जी द्वारा किये गए इस अनूठे कार्य की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है. हिन्दी हाइकु का अवधी अनुवाद जब मैंने देखा तो अचंभित हुई. यूँ मैं अवधी नहीं जानती हूँ परन्तु इसे पढ़कर इसके भाव को ज्यों का त्यों देखकर सहज अनुमान हुआ कि रचना जी ने कितना कठिन कार्य किया है. मेरे लिए ख़ुशी की बात यह भी है कि इसमें मेरे भी हाइकुओं को स्थान मिला. रचना जी को पुनः बधाई एवं धन्यवाद.
    हिन्दी हाइकु का अन्य भाषाओं और बोलियों में अनुवादित किए जाने की विस्तृत जानकारी काम्बोज भाई ने दिया, इसके लिए हृदय से आभार.

  4. इस श्रमसाध्य ऐतिहासिक कार्य के लिए रचना जी की जितनी प्रशंसा की जाये ,कम है ।हार्दिक बधाई स्वीकारें ।

  5. हाइकु के नियमों का पालन करते हुए उसके भावों को भी उसी प्रकार प्रस्तुत करना निःसंदेह बेहद कठिन कार्य है और इसको इतनी सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए रचना जी की जितने सराहना की जाए, कम है | आपको खूब सारी बधाइयाँ रचना जी…| आदरणीय कम्बोज जी को भी नमन इतनी अच्छी जानकारी देने के लिए…|

  6. ऐसे बेजोड़ कार्य के लिए रचना जी को हार्दिक बधाई।

  7. रचना श्रीवास्तव जी द्वारा अवधी में किये गए अनुवाद उत्कृष्ट हैं,इनमें मूल हाइकुओं की आत्मा को उनके शिल्प के साथ बहुत सुंदर रूप में उतारा गया है।रचना जी को बहुत बहुत बधाई

  8. रचना श्रीवास्तव जी को इस श्रमसाध्य कार्य के लिए हार्दिक बधाई |
    पुष्पा मेहरा

  9. हाइकु पर शोध कार्य करने के दौरान रचना जी के अवधी में अनूदित हाइकु पढ़े थे और अपने शोध ग्रंथ में उल्लेख भी किया | डॉ. अग्रवाल जी का एक हाइकु जो मुझे बहुत पसंद है –
    कुतर रहे / देश का संविधान / संसदी चूहे | – डॉ. भगवतशरण अग्रवाल
    उपर्युक्त हाइकु का सुंदर अवधी अनुवाद देखिए –
    कुतरत बा / देस कै संबिधान / संसदी मूस | – (अवधी अनुवाद : रचना श्रीवास्तव )
    बहुत ही श्रम साध्य एवं ऐतिहासिक कार्य के लिए बधाइयाँ रचना जी

  10. bhai himanshu ji ki prerna aur sahyog se yah kary ho saka unka saath na hota to yah sambhav hi nahi tha
    bhaiya aapka bahut bahut abhar
    aap sabhi ke sneh vachnon ka dhnyavad kahne ke liye shbad nahi hai mere paas fir bhi bahut bahut dhnyavad
    rachana

  11. साहित्यकार के बहुत आसान होता है ना को हाँ में बदलना लेकिन इस मुश्किल कार्य को कर पाना दुष्कर था । यह आसान हुआ इसके परिश्रम को सेल्यूट , हाइकु की दुनिया मे एक नया अध्याय शुरू हुआ । बधाई , शुभकामनाएं।

    रमेश कुमार सोनी , बसना , छत्तीसगढ़


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