Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 17, 2019

1890


डॉ पूर्वा  शर्मा

1

सर्द-जीवन

तेरा पश्मीना-नेह

लपेटे फिरूँ ।              

2

 माघ है आया,  

कोहरे के बुर्के में

चाँद लजाया ।

3

खूब लजाती

हिम घूँघट काढ़े

दुल्हन शीत ।   

4

सहमा तन

पौषी हिमी हवाएँ

शूल चुभाए ।

5

शीत सहती

हिम का बोझा ढोती 

नन्ही पत्तियाँ ।

6

चाँद भी काँपे

जब धरा स्वयं को

हिम से ढाँके ।

7

शीत लहर

रवि भी लपेटता

धुँध लिहाफ ।

8

पर्वत ओढ़े 

हिम का मफलर,    

सफ़ेद कोट ।

9

श्वेत वसन

पहने हिमालय  

धुनी जमाए ।

10

झूमे-थिरके  

हिम घुँघरू बाँधे  

शीत यौवना ।

11

खग काँपते

पात, तड़ाग स्तब्ध    

शीत प्रकोप ।

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Responses

  1. पर्वत ओढ़े
    हिम का मफलर,
    सफ़ेद कोट ।
    – सर्दी पर सुन्दर हाइकु! बधाई!
    – डाॅ. कुँवर दिनेश

  2. बहुत ही सुंदर , मनभावन हाइकु।
    हार्दिक बधाई

  3. बहुत सुंदर हाइकु!
    हार्दिक बधाई पूर्वा जी!

    ~सादर
    अनिता ललित

  4. सर्दियों के सुन्दर हाइकु | बधाई |

  5. सर्दियों के बहुत सुंदर हाइकु…हार्दिक बधाई।

  6. Bahut sundar purva kerp it up

  7. आँखों क सामने जैसे पूरी शीत ऋतू साकार हो गई…| बहुत बधाई…|


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