Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 13, 2019

1889


ज़िंदगी
अनिता ललित

1
थकी! आहत!
फिर भी है चलती-
यही ज़िंदगी!
2
सिली-उधड़ी
ख़ुशियों के पैबन्द
सजी ज़िंदगी।
3
किसे पुकारे
अपनों के हाथों ही
लुटी ज़िंदगी।
4
आगे न पीछे
धुँआँ ही धुँआँ बस
गुम ज़िंदगी।
5
रातों को जागे
भोर की आस नहीं
कैसी ज़िंदगी!
6
साँसों की माला
गिन-गिन के जीती
हारी ज़िंदगी।
7
दिखे है कुछ!
नक़ाबों की आड़ में
छले ज़िंदगी।
8
सूझे न राह
टूटे ख़्वाब चुनती
ज़ख़्मी ज़िंदगी।
9
है भटकती
सूनी राहों में खोई
तन्हा ज़िंदगी।
10
जल रही है
बेबसी की आग में
ज़िंदा ज़िंदगी।
-0-

 

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Responses

  1. जीवन को कितनी तरह से कहा है, वाह!! बधाई!

  2. जीवन की वेदना औए द्वंद्व को व्याख्यायित करते सशक्त हाइकु,बधाई अनीता जी को।

  3. जीवन-माला को सत्य के धागों में पिरोते हाइकु…. सुन्दर सृजन अनिता जी …बधाई स्वीकारे

  4. हार्दिक बधाई, सुन्दर हाइकु ।

  5. अनीता जी ज़िंदगी के भिन्न भिन्न रंग आपके हाइकु में पढने को मिले हार्दिक बधाई |

  6. बहुत सुंदर भावपूर्ण हाइकु… हार्दिक बधाई।

  7. हार्दिक आभार आप सभी सुधीजनों का!

    ~सादर
    अनिता ललित

  8. बहुत प्यारे हाइकु, ढेरों बधाई…|


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