Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 16, 2018

1883-पतंग


कमला  निखुर्पा

1

मैं तो पतंग

डोर तेरे हाथों में

खोजूँ अनंत ।

2

कागद अंग

लागा नेह का रंग

उड़ी पतंग ।

3

संयम डोर

थाम उड़ चली मैं

क्षितिज ओर ।

4

मन पतंग

हौसलों की उड़ान

देखे जहान।

5

हवा भी कहे

सारथी बनूँ मैं भी

झोंके जो सहे।

-0-

(15.12.2018)

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Responses

  1. पतंग को सुंदर बिम्बों में बांधा है। बधाई।

  2. बहुत ही सुंदर भाव।
    हार्दिक बधाई

  3. कमला निखुर्पा जी मेरा साधुवाद ! आपकी सरल – कोमल भावों की रचनाएं मन को छू गयीं | अति सुंदर शब्दों के माध्यम से – श्याम त्रिपाठी हिन्दी चेतना

  4. बहुत भावपूर्ण हाइकु कमला जी बधाई।

  5. संयम –डोर
    थाम उड़ चली मैं
    क्षितिज ओर ।

    मनोभावों की सुन्दर अभिव्यक्ति!
    सभी हाइकु बहुत अच्छे हैं!

    – डाॅ. कुँवर दिनेश

  6. भावपूर्ण सुंदर हाइकु ।बहुत-बहुत बधाई ।

  7. सभी हाइकु बहुत सुंदर आदरणीया कमला जी! हार्दिक बधाई!!!

    ~सादर
    अनिता ललित

  8. भावपूर्ण और सुंदर हाइकु कृष्णा जी।

  9. भावपूर्ण और सुंदर हाइकु कमला जी।

  10. धन्यवाद आपकी टिप्पणी मेरी लेखनी के लिए आशीर्वाद है ।

  11. एक से बढ़कर एक मनभावन सुन्दर हाइकु … हार्दिक बधाई

  12. कमला जी पतंग और डोर संग रचे सुन्दर हाइकु हैं हार्दिक बधाई |

  13. सभी हाइकु बहुत सुन्दर, बधाई कमला जी.

  14. कल्पना की ऊँची उड़ान और भावों गहराई ,एक साथ

  15. vaha kya baat hai bahut bahut badhai..


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