Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 4, 2018

1881-विशेषांक [160 हाइकु ]


 [वर्णक्रमानुसार]

अलाव–सा है,/सर्द रात पीड़ा में /स्पर्श तुम्हारा। डॉ.कविता भट्ट

इतनी सर्दी ! / कोहरे की बेदर्दी / झेलें गरीब । सुभाष लखेड़ा

इन्द्रधनुष / सतरंगी है  झूला / झूलती धूप । शशि पाधा

उखड़ी साँस / आफत का मारा -सा / घूमे शिशिर । डॉ.शैलजा सक्सेना

उतार फेंकी / बादल की पोशाक / क्वार नभ ने । डॉ.सुधा गुप्ता

उफ्फ ये जाड़ा / सूरज भी दुबका / ओढ़ रजाई । सुभाष नीरव

ओस की रात /मोती सम चमके / वृक्ष ,पत्तियाँ । शान्ति पुरोहित

कभी तो चखो /सर्दी में हलुवे -सी / मेरी प्रीत है। डॉ.कविता भट्ट

कम्बल ओढ़े / ठिठुरता काँपता / सूर्य झाँकता । प्रियंका गुप्ता

करती रही / धूप से गपशप / चाय की प्याली । डॉ.सुधा गुप्ता

काँपता भोला / सिमटती बुधिया / शीत- लहर । भावना सक्सेना

काँपे कोहरा /जाड़ों की दुपहरी /सूर्य न आया  । डॉ.सरस्वती माथुर

कुहासा देख / कहाँ छिपा सूरज / गर्मी का शेख  सुशीला शिवराण

कैसे कटेगी / रात फुटपाथ पे / सोचता जाड़ा । डॉ.शैलजा सक्सेना

कैसे हैं भाग / तन शीत जकड़े / उदर आग। डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

कोहरा घना / दिन है अनमना / काँपते पात। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

कोहरा छाए / भूली -बिसरी बातें / याद दिलाए । सुभाष लखेड़ा

कोहरा ढके /अठखेलियाँ सारी/प्रिय -संग की । डॉ.कविता भट्ट

खटका द्वार / थरथराता पिल्ला / माँगता ताप । पुष्पा मेहरा

खिली शारदी  / चन्द्रमा की टिकुली / लगाए माथ । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

खुश अलाव /सुनता रात भर /कथा कहानी  ।रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

खो गए पंछी / कोहरे के पथ में / ढूँढते नीड़ । शशि पाधा

गर्म लिहाफ़/ आँखों में निरन्तर/स्वप्न -शृंखला। डॉ.कविता भट्ट

गुलाबी धूप / मोहिनी धरणी का / निखरा रूप । सुशीला शिवराण

चाकू चलातीं / ये पहाड़ी हवाएँ / चुभें तन में । रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

चाय की प्याली / मीत बनी सबकी / इठला रही । रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

चूमें तुषार / कोमल कुसुमों के / नर्म कपोल  । कृष्णा वर्मा

छाया कुहरा /प्रभात से है रूठा /आज रवि । डॉ.क्रान्ति कुमार

छीन न लेना /एक ही लिहाफ है  / तेरी प्रीत का। डॉ.कविता भट्ट

छुईमुई-सी / चुप मिले अकेली / धूप सहेली । डॉ.हरदीप कौर सन्धु

छोटे- से दिन / पलक छूमंतर / बीते न रात । शशि पाधा

जाड़े की धूप / गुनगुनाए गीत / कुनकुने- से । डॉ. हरदीप कौर सन्धु

जाड़े की रात / खुद को पा अकेला / चाँद भी रोया । ॠता शेखर ‘मधु’

जाड़े में रंक / फुटपाथ पे सोया / चुप से रोया । ॠता शेखर ‘मधु’

जीवन भर / अँगीठी -सी सुलगी /मन क्यों सीला। डॉ.कविता भट्ट

झील दर्पण / सिंगार कर झाँकी / शरद लक्ष्मी । डॉ.सुधा गुप्ता

टूटा छप्पर / कम्बल न रजाई / निर्धन कुटी । भावना सक्सेना

ठंड का हुक्म / धूप हुई घर में / नज़रबंद । रचना श्रीवास्तव

ठिठुरन में / सुख दे गई खूब / पूस की धूप । डॉ.सतीशराज पुष्करणा

ठिठुरा तन / एक प्याली चाय से / तृप्त है मन। ॠता शेखर ‘मधु’

ठिठुरी धरा /जम गईं नदियाँ /वायु -पहरा। गुंजन अग्रवाल

ठिठुरी धूप / मुँडेर चढ़ बैठी / बच्ची-सी ऐंठी। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु

ठिठुरी रात / किटकिटाती दाँत / कब हो प्रातः। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

डालता चौक / आँसू भीगी पातियाँ / माघ डाकिया। डॉ.सुधा गुप्ता

तिल की बर्फी / तिलकुट सम्भार / माघ त्योहार। डॉ.सुधा गुप्ता

तुम्हारा आना / सर्दी में लिहाफ-सा/साँसें दहकी। डॉ.कविता भट्ट

तुम्हारा प्रेम- / गरीब को अलाव  / मात्र सहारा। डॉ.कविता भट्ट

दिखे न कहीं / धूप ने ली शायद / आज की छुट्टी । रचना श्रीवास्तव

दिन चढ़ा है / शीत -डरा सूरज /सोया पड़ा है । डॉ.सुधा गुप्ता

दिन सिहरा / बादलों की चादर / छिड़कें बूँदें । अनिता ललित

दुबकी बैठी / घोंसले में गौरैया / पंख दबाए । डॉ.भावना कुँअर

देश की धूप / थपथपाए तन/ माँ का प्यार । डॉ.सुधा ओम ढींगरा

देश-रक्षा में /सर्द- शृंगार मेरा/मन तपता । डॉ.कविता भट्ट

दौड़ लगाएँ / धूप के खरगोश / हाथ न आएँ । डॉ.भावना कुँअर

धरती ने ली / शीत से फुरहरी / माँगा दोशाला । डॉ.सुधा गुप्ता

धरा ने बाँधी  / सफ़ेद नर्म गाती /  आस्माँ से माँगी । डॉ.जेन्नी शबनम

धुंध का घेरा / चढ़कर सूर्य पे / खाए उजाला । डॉ. हरदीप कौर सन्धु

धुंध ही धुंध  / बजती घंटियाँ दें / दिशा का बोध । रेखा रोहतगी

धूप आवारा / छुप करके बैठी / हाथ न आए । रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

धूप का रंग / चमकता आँखों में / सपना बन । तुहिना रंजन

धूप -जल में / आँखें मूँद नहाते / ठिठुरे पंछी । डॉ.सुधा गुप्ता

धूप जाँचती / ॠतुओं की शाला में / जाड़े की कॉपी। पूर्णिमा वर्मन

धूप -टुकड़ा / नैनों में सींच लिया / अंकुर फूटा । कमलेश चौरसिया

धूप सेंकती / गठियाए घुटने / वृद्धा सर्दी  के । डॉ. उर्मिला अग्रवाल

नदियाँ क्लांत / ओढ़े श्वेत लिहाफ /शांत हो सोईं । कृष्णा वर्मा

नभ से गिरी / पुष्प के होंठ छूने / बिंदास ओस । ज्योत्स्ना प्रदीप

नहीं दिखता / क्यों अपना पराया / कोहरा घना । अनुपमा त्रिपाठी

निखरी धूप /जाती हुई ज़िन्दगी /फिर  जी उठी । गुंजन अग्रवाल

नेह गायब / ठिठुरते सम्बन्ध / हम अकेले । डॉ.शैलजा सक्सेना

नेह तुम्हारा /सर्दी की धूप जैसा/उँगली फेरे। डॉ.कविता भट्ट

पड़ा है पाला / फसलें बेरौनक / चिन्ता गहरी । रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

पर्वत श्रेणी / धारे हैं हिम टोप / खेलें धुंध से । पुष्पा मेहरा

पसर गई /सरसों फूली शय्या / माघ की धूप । डॉ.भगवतशरण अग्रवाल

पाँव अकड़े / घुटने भी जकड़े / शीत डराए । रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

पीली साड़ी में / माघ मेला घूमेगी / लाडो सरसों । डॉ.सुधा गुप्ता

पूष की रातें/पिया तू सीमा पर /सिहरें तन । डॉ.कविता भट्ट

पूस की रात / ठिठुरती हवाएँ / दस्तक देतीं । डॉ.भगवतशरण अग्रवाल

पूस की रात / न बीती आज तक / बीते सौ पूस । प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

पौष की भोर / हरे शनील पर / बिखरे मोती । डॉ.सुधा गुप्ता

प्रेम-अगन/अनोखे आलिंगन/बर्फीली सर्दी। डॉ.कविता भट्ट

फिर बुनूँगी / याद के धागों से / स्वेटर अनूठे । डॉ.शैलजा सक्सेना

फोड़ी किसने / कोहरे की गागर / जीना दूभर । डॉ.भावना कुँअर

बंद तिजोरी / सूरज -हाथ चाबी / जाड़े की धूप । शशि पाधा

बच्चों को भाए /रूई -सा हिम,रचें /हिम मानव। –डॉ. सुधा ओम ढींगरा

बर्फ  की पाल/ बिछाके गया कौन / सब हैं मौन । डॉ.भावना कुँअर

बर्फ  -लिहाफ़/ ओढ़ खड़े पर्वत /संत- से लगे । डॉ.सरस्वती माथुर

बर्फ़ गिरे /शीशे -जड़ी प्रकृति /छुई न जाए। डॉ. सुधा ओम ढींगरा

बर्फ -चादर/ कली– सी सिमटती/देह की शोभा। डॉ.कविता भट्ट

बर्फीली भोर/ प्रिय-उष्णता–रश्मि/ कली-सी खिले । डॉ.कविता भट्ट

बर्फीली वर्षा /शीशे -सी चमका दे /सर्दी में धरा । डॉ. सुधा ओम ढींगरा

बर्फीली हवा / लो आ गई सताने / ले के बहाने । डॉ.भावना कुँअर

बर्फीली हवा/ पेड़ों पे कृशदेह/लटकी -झूले । डॉ.कविता भट्ट

बूढ़ा मौसम / लपेटे है कम्बल / घनी  धुंध का । रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

भोर ने ओढ़ा / कोहरे का दुपट्टा / धूप नाराज़ । कृष्णा वर्मा

मंजिले वही /कुहासे  ने निगले /डगर सभी । सुनीता अग्रवाल

मन पाषाण / बर्फीली संवेदना / कोहरा घना । कमला निखुर्पा

माघ आह्लाद / ताजा गुड़ की गंध / गाँव आबाद । डॉ.सुधा गुप्ता

माघ की छटा / नाच रहीं फसलें / घूँघट उठा । डॉ.सुधा गुप्ता

माघ की माया / नवान्न से भर दी / खेतों की काया । डॉ.सुधा गुप्ता

माघ की वर्षा / धराशायी हो गई / चना-फसल। डॉ.सुधा गुप्ता

माघ तरुण / ले मटर दुल्हिन / आया है घर । डॉ.सुधा गुप्ता

माघ बेचारा / कोहरे की गठरी / उठाए फिरे। डॉ.सुधा गुप्ता

माघ महिमा / शिल्पी तराश रहा / नव्य प्रतिमा। डॉ.सुधा गुप्ता

माघ हरषा / हरे शाक-पत्र की / कर दी वर्षा । डॉ.सुधा गुप्ता

माघ है क्रोधी / बर्फ  से नहलाई / धरती रो दी । डॉ.सुधा गुप्ता

माघ-अम्बर / उड़ी फिरें पतंगें / भरें उमंगें। डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

माघ-कटार  / निष्प्राण कर गई / फूल क्यारियाँ। डॉ.सुधा गुप्ता

मौसम संग / बदले अपने रंग / दम्भी सूरज । सुशीला शिवराण

रात काँपती / रजाई में दुबकी / भोर ठिठकी । डॉ.जेन्नी शबनम

रातों ने ओढ़ी / कोहरे की चादर / चाँद ठिठुरा । कमला निखुर्पा

रुई के फ़ाहे / ढाँपी प्रकृति सारी  /सर्दी का हिम । डॉ. सुधा ओम ढींगरा

रूठ के बैठा / बिसराकर  सुध/सूर्य है ऐंठा । गुंजन अग्रवाल

रूठा है रवि / छुपें लोग ग्रीष्म में / अब प्यार क्यों ? ज्योतिर्मयी पन्त

रूठी है धूप / बादलों में छुपी / मनाऊँ कैसे ? अनुपमा त्रिपाठी

रोती रहती / बिन माँ की बच्ची- सी / पूस की धूप । डॉ.सुधा गुप्ता

लजाई धूप/पलकें ना उठाए/नव वधू -सी. । डॉ.कविता भट्ट

लजीली धूप / सिमटी सिकुड़ी सी / बैठी ओसारे । डॉ.उर्मिला अग्रवाल

लपेटे हुए / कोहरे की चादर / धूप सो रही । प्रियंका गुप्ता

लाठी टेकता / सूरज यूँ गुजरा / ज्यों बूढ़ा बाबा । डॉ.जेन्नी शबनम

लिपटी धुंध / भयावह लगती / जाड़े की रात । ॠता शेखर ‘मधु’

शर्मीली धूप / कोहरे में से छने / सिंदूरी रंग । डॉ. हरदीप कौर सन्धु

शांत निर्मल / ज्यों सज्जन का मन / क्वार- गगन । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

शिकारे मौन / हो गए हैं उदास /जमी झील में । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

शीत आतंक / हवा रूप बदले / मारती डंक । कृष्णा वर्मा

शीत ॠतु में / बारिश की बौछारें / चुभें शूल -सी । अनिता ललित

शीत की धूप / माँ -सी लिपटकर / दे कोसा प्यार । कृष्णा वर्मा

शीत की मारी / पेट में घुटने दे / सोई है रात । डॉ.सुधा गुप्ता

शीत के दिनों / सर्प -सी फुफकारें /चले हवाएँ । डॉ.हरदीप सन्धु

शीत -प्रकोप /डरे, छुपे रवि के /सातों ही घोड़े । डॉ.क्रान्ति कुमार

शीत लहर / अदरक की चाय / गरम चुस्की । शशि पुरवार

शीत शरद /तुम बिन बैरी हो /कटु मुस्काए। डॉ.कविता भट्ट

शीतनिशा है /जीवन का संघर्ष  /तू रवि- रश्मि॥ डॉ.कविता भट्ट

शैतान जाड़ा / सबको है रुलाए / फिर भी भाए । डॉ.जेन्नी शबनम

श्वेत पंखुरी / रूई -सा झरे हिम / पूजे धरा को । ज्योतिर्मयी पन्त

सरकाकर / कोहरे का परदा / झाँके सूरज । रचना श्रीवास्तव

सर्द जंगल   / फुफकारती हवा / माघ नागिन । नीलमेन्दु सागर

सर्द रातों में / ओढ़ लेती है हवा / बर्फ ही बर्फ  । मंजु मिश्रा

सर्द लहर / ठिठुरती है काया / कहाँ हो धूप ? अनिता ललित

सर्द विरह,/सैनिक-प्रियतम/सर्दी की धूप । डॉ.कविता भट्ट

सर्द हवाएँ /करती  अट्टहास /काँपती धरा। सुनीता अग्रवाल

सर्दी की धूप / शरमाकर झाँकती / छिप-छिपके । अनिता ललित

सर्दी की धूप / शीतल तुम बिन / बर्फ  के जैसी । उमेश मोहन धवन

सर्दी की भोर / सहमी शरमाई / नव वधू-सी । मंजु मिश्रा

सर्दी में ली थी / गरमी में लौटाई /उसने धूप । डॉ.कविता भट्ट

सिहरी काँपी / बदली -सी वेदना / आज बरसी । शशि पाधा

सीना तान के / बर्फ  ओढ़के खड़ा / मौन शिखर । देवी नागरानी

सूरज ओट / छिप गईं किरनें / आँख-मिचौली । शशि पाधा

सूरज कहाँ ? / खोजते हलकान / सुबहो- शाम । रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

सूर्य को ढाँपे / एक मोटा बादल / खुद भी काँपे । डॉ.कुँवर दिनेश सिंह

सूर्य से कुट्टी / खोल दी है धुँध ने / गुस्से में मुट्ठी । डॉ.भावना कुँअर

सोच में बैठी / कैसे लाऊँ मैं दाना / ऐ धुंध जा ना । डॉ.भावना कुँअर

सोयी कलियाँ /सुख -भरी निंदिया/धुंध रजाई । सुनीता अग्रवाल

स्पर्श तुम्हारा  / भिखारी को कम्बल  / शीत-प्रतीक्षा। डॉ.कविता भट्ट

हँसी-ठहाके / कभी बिसरी यादें / आँखों में पानी । रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

हठीली धूप / भाव खाए कितना / पाकर रूप । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

हवा उड़ाए /कोहरे की चादर /सर्दी की भोर। डॉ.सरस्वती माथुर

हाथ में चाय / ओढ़ कम्बल , टोपी / बुढ़ापा बैठा । देवी नागरानी

हिम उतरा / ठुमक-ठुमक के / घाटी की गोद । कृष्णा वर्मा

हिम रुई -सा /बर्फ शीशे- सी दिखे / फिसलें ,गिरें । डॉ.सुधा ओम ढींगरा

हुआ लाचार / तन-मन पे भारी / चिल्ले की मार । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

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Responses

  1. वाह!बेहतरीन विशेषांक । बधाई सभी साथियों को ।

  2. सभी साथियों को हार्दिक बधाई, मुझे स्थान प्रदान करने हेतु संपादकों को सादर धन्यवाद।

  3. बहुत ही सुंदर

  4. सभी हाइकु बहुत ही बेहतरीन ।
    सभी हाइकुकार एक माला में गूंथे हुए ।आप सभी को हार्दिक बधाई

  5. अतिसुन्दर! एक से बढ़कर एक सभी हाइकु!
    सभी हाइकुकारों को हार्दिक बधाई!
    मेरे हाइकु को भी स्थान मिला, इस हेतु सम्पादक द्वय का हार्दिक आभार!

    ~सादर
    अनिता ललित

  6. अति सुन्दर … सभी को हृदय तल से बधाई !!
    सम्पादक द्वय का तहे दिल से आभार !!8

  7. बहुत सुंदर !
    हार्दिक बधाई और बहुत आभार 💐🙏

  8. बहुत सुंदर विशेषांक। मुझे स्थान देने के लिए सम्पादक द्वय का हार्दिक आभार।

  9. वाह
    अकारान्त क्रम में सर्दी के हाइकु…. बिल्कुल नया विचार… सृजनशील संपादकों को बधाई।

  10. वाह ! मज़ा आ गया ! जाड़े की हर रंगत को यूँ एक साथ विभिन्न सशक्त कलमों से साकार होता हुआ देख के बहुत अच्छा लगा। सबको बहुत बधाई और आदरणीय काम्बोज जी और हरदीप जी का बहुत आभार इतना सार्थक अंक देने के लिए…।

  11. ठिठुरन में
    गरमाहट देती
    हाइकु-धूप |

    सर्दी की ठिठुरन में इतनी प्यारी हाइकु-धूप के लिए धन्यवाद
    इतने सारे हाइकु और इतने सारे हाइकुकार एक ही स्थान पर…वाह
    इस श्रम साध्य कार्य के लिए संपादक-द्वय को हार्दिक बधाई

  12. मज़ा आ गया एक साथ सभी को पढ़कर. भाव एक रूप अनेक, सभी हाइकु बहुत सुन्दर. सभी हाइकुकारों को बधाई. काम्बोज भाई और हरदीप जी ने बहुत मेहनत करके इस विशेषांक का संपादन किया, आप दोनों को हार्दिक बधाई.
    मेरे हाइकुओं को इस विशेषांक में स्थान मिला, आप सम्पादक-द्वय का हार्दिक आभार.

  13. संकलन कर्ता सम्पादक द्वय को, परिश्रम ,लगन व अपने ध्येय के प्रति निष्ठा हेतु बधाई स्वीकार हो |
    पुष्पा मेहरा

  14. एक सर्दी, इतने विचार वाह!!!
    बहुत सुंदर विशेषांक। मुझे स्थान देने के लिए सम्पादक द्वय का हार्दिक आभार।

  15. सर्दी के बेजोड़ हाइकु ।सभी एक से बढ़कर एक । सभी रचनाकारों व संपादक द्वय को ढेर बधाइयाँ ।

  16. सभी रचनाकारों के हाइकु अति उत्तम हैं सभी को मेरी हार्दिक बधाई |


रचनाओं से सम्बन्धित आपकी सार्थक टिप्पणियों का स्वागत है । ब्लॉग के विषय में कोई जानकारी या सूचना देने या प्राप्त करने के लिए टिप्पणी के स्थान पर पोस्ट न करके इनमें से किसी भी पते पर मेल कर सकते हैं- hindihaiku@ gmail.com अथवा rdkamboj49@gmail.com.

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