Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 5, 2018

1873-यादों के पंछी


यादों के पंछी : आश्वस्त करते हाइकु

डा. सुरेन्द्र वर्मा

[यादों के पंछी : डा. सुरंगमा यादव,प्रकाशक :नमन प्रकाशन ,4231/1,अंसारी रोड,दरियागंज,नई दिल्ली-110002;पृष्ठ 108;मूल्य 250/-, वर्ष -2018 ]

डा. सुरंगमा यादव एक उभरती हुई हाइकुकार हैं। उनका यह पहला हाइकु संग्रह है। उनके कुछ हाइकु मैंने ‘सत्रह आखर’ वाट्स-एप पर भी देखे। मैं उन्हें पढ़कर पूरी तरह आश्वस्त हुआ हूँ।

यादों के पंछीमूलत: जापान की हाइकु काव्य-विधा अब भारत में पूरी तरह प्रतिष्ठित हो गई है। यह तीन पंक्तियों की 5-7-5 वर्ण-क्रम में  छोटी कविता है, जिसमें कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक बात कहने की कोशिश की जाती है। यों तो हाइकु के लिए कोई भी विषय अछूता नहीं है, लेकिन विशेषकर प्रकृति और प्रेम हाइकु काव्य के मुख्य प्रेरक रहे हैं।

डा. सुरंगमा ने हाइकु विधा की मर्यादा का पूर्ण पालन करते हुए, अपनी हाइकु कविताओं में प्रकृति के सौन्दर्य को बखूबी उभारा है। प्रकृति अनेक रूपों में प्रकट होती है। ऋतुओं के रूप में, रात्रि, प्रात, दोपहर और संध्या काल के रूप में, पेड़ पौधों, फूल, पत्तियों के रूप में, चाँद सितारों के रूप में–और भी न जाने कितने ही अन्य रूपों में …

ग्रीष्म ऋतु के बाद जब वर्षा आती है तो जहाँ वह एक ओर भीषण गरमी और कड़ी धूप की तपन से छुटकारा दिलाती है, वहीं वह आंसुओं की भाँति मानो मन का मैल भी धो देती है। मानसिक से लेकर भौतिक, पूरा परिवेश ही बदल जाता है। कवयित्री कहती है–

हवा बदली / छाई जब बदली / हुई सुहानी

घन घनेरे / घन घोर गर्जन / सहमी ग्रीष्म

ग्रीष्म उत्पात / उमड़ी बरसात / दुष्ट दमन

बरसों मेघ / धुले मन मलिन / पात सरीखा

बसंत तो हमेशा से ही प्रेम का सन्देश लेकर आता है। प्रेम और वसंत को जोड़ते हुए सुरंगमा जी कहती हैं, “बसंत आया / लगी फूलों की हाट / भटका भौंरा।” इसी प्रकार हेमंत ऋतु में भी उत्कट प्रेम से व्याकुल होकर प्रतीक्षारत नायिका अपने प्रिय के स्वागत के लिए बेचैन हो उठती है–

खंजन नैन / स्वागत को बेचैन / हेमंत पिया।

प्रेम एक ऐसी भावना है जो प्राय: शब्दों में प्रकट नहीं हो पाती। ऐसे में उसे कभी  आँसुओं में, कभी इशारों में, कभी स्वप्न में तो कभी स्मृति में संजो के रखा जाता है-

तेरे सपने / लेकर सोई-जागी / ऐसी लौ लागी

याद तुम्हारी / पावस बनकर / छाई नैनों में

मादक स्मृति / सिन्धु सरीखे नैन / डूबा सो पार

शब्द नहीं तो / कह दो संकेतों में / तुम मेरे हो

उत्कट प्रेम कभी मरता नहीं। स्मृतियों में सुरक्षित रहता है। यादों के पंछी कलरव करते रहते हैं और यादें एक-दो नहीं होतीं। कड़ी दर कड़ी अनेकानेक स्मृतियों की लड़ियाँ बन जाती हैं।

मनन बगिया / कलरव करते / यादों के पंछी

जोरूँ कड़ियाँ / यादों की तो बनती / लम्बी लड़ियाँ

विचर रही / मानस सागर में / याद हंसिनीं

स्मृतियों का निवास स्थान, ज़ाहिर है, व्यक्ति का मन ही होता है। मन हमारा सतरंगी यादों का इंद्र धनुष है। भूली-बिसरी, खट्टी-मीठी सभी यादें मन में ही तो रहती हैं। मन यादों का संगम है। किसी की कोई स्मृति जब मन में बस जाती है तो वह उस प्रिय पात्र से भी अधिक प्यारी हो जाती है जिसकी कि वह याद है-

याद तुम्हारी / लागे तुमसे प्यारी / आके ना जाती

इंद्र धनुष / सतरंगी यादों का / छाया मन में

भूली-बिसरी / खट्टी-मीठी यादों का / मन संगम

कवयित्री के अनुसार मनुष्य का मन केवल यादों का घर ही नहीं है, वह हमारे जीवन-नाटक का कुशल निर्देशक भी है। हमारी सारी दैहिक गतिविधियाँ उसी के इशारे पर चलती हैं। सच पूछा जाए तो वही हमारी नाव का खेवैया है और यही मेरा मन है ,जो कभी वैराग्य धारण कर ले तो केवल ‘मेरा’ नहीं रहता, सबको अपना बना लेता है।

मन है ऐसा / निपुण निदेशक / देह नचाए

मन नाविक / तन नौका लेकर / फिरे घूमता

मन वैरागी / सब जग लगता / अपना जैसा

डा, सुरंगमा के हाइकु काव्य में इस प्रकार के दार्शनिक भाव भी जगह-जगह बिखरे पड़े हैं। मनुष्य केवल वाह्य नेर्त्रों से ही नहीं देखता, यदि वह अन्दर झाँककर अपने अंतर चक्षुओं से देखे तो उसे पारमार्थिक सता के अनंत रूप दिखाई दे सकते हैं। वह कहती हैं–

अंतर चक्षु / खोल निहारे मन / रूप अनंत।

जब सब कुछ बिखर जाता है तो कभी-कभी आदमी को ऐसा लगता है ,मानों सब समाप्त ही हो गया। लेकिन सकारात्मक सोच की वकालत करने वाली हमारी कवयित्री निराश नहीं होती। सुबह कभी तो आएगी। बेशक आज अँधेरा है और यह रात जिद्दी भी हैं-हटीला तम / छिपा दीपक तले / षड्यंत्रकारी–लेकिन यह षड्यंत्र सफल होने वाला नहीं है। चोट खाकर और फिर सभलकर ही आदमी कुछ बन पाता है। सुरंगमा जी अपने काव्यात्मक अंदाज़ में स्पष्ट कहती हैं—

निराश नं हो / बाद रात्रि के प्रात / चलता क्रम

सूर्य अस्त / समापन नहीं ये / अल्प विराम 

सभल गया / चोट सह पत्थर / बना देवता

हिन्दी में इसलिए प्राय: उन रचनाओं को भी, जो हाइकु के अनुशासन का पालन करके राजनैतिक-सामाजिक विषयों पर टीका-टिप्पणी करती हैं, हाइकु के अंतर्गत ही ले लिया गया है। डा. सुरंगमा यादव अपने सामाजिक और राजनीतिक परिवेश के प्रति उदासीन नहीं हैं और उन्होंने  ऐसी अनेक हाइकु रचनाएँ की हैं जो परिस्थितियों पर काव्यात्मक टिप्पणियाँ हैं। इस प्रकार नारी की दयनीय स्थिति, बाढ़ का प्रकोप, दूषित हो रही नदियों की चिंता, बुजुर्गों की मानसिकता, आदि विषयों पर भी उन्होंने सुन्दर हाइकु रचे हैं। उनके हाइकु संसार में कोई विषय ऐसा नहीं है जो हाइकु विधा के लिए निषिद्ध हो।

मैं डा. सुरंगमा यादव की काव्य क्षमताओं पर पूरी तरह आश्वस्त हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि वे अवश्य ही कुछ ही अरसे में हिन्दी साहित्य में एक बड़ी हाइकुकार होकर उभरेंगीं।

डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो। 9621222778)

10, एच आई जी / 1, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद-211001

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Responses

  1. मैंने भी डॉ सुरंगमा जी की रचनाएँ पढ़ी हैं, बहुत अच्छा लिखती हैं। आदरणीय डॉ सुरेंद्र वर्मा जी द्वारा सुन्दर समीक्षा की गई। दोनों को ही हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

  2. सुंदर समीक्षा से सुरंगमा जी की कृति से परिचय हुआ। धन्यवाद।

  3. बहुत ही सुंदर भावपूर्ण -सरस हाइकु संग्रह की सुंदर समीक्षा | आ.वर्मा जी को मेरा नमन |
    पुष्पा मेहरा

  4. आदरणीय सुरेन्द्र वर्मा सर के प्रति हृदय तल से आभारी हूँ।
    आदरणीय अग्रज रामेश्वर कम्बोज जी ने ‘हिन्दी हाइकु’ में मेरी कृति को स्थान देकर जो गौरव प्रदान किया है,उसके लिए मैं उन्हें कोटिशः धन्यवाद देती हूँ।
    कविता जी, अनिता जी और पुष्पा जी उत्साहवर्धन के लिए आपको पुनः पुनः धन्यवाद एवं आभार।

  5. Sundr sameksha hetu bahut bahut badhai

  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति , आदरणीय डॉ. सुरेन्द्र वर्मा जी एवं डॉ. सुरंगमा यादव जी को हार्दिक बधाई !

  7. सुन्दर संग्रह की सुन्दर समीक्षा !आदरणीय डॉ. सुरेन्द्र वर्मा जी एवं डॉ. सुरंगमा यादव जी को हृदय -तल से बधाई !


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