Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 4, 2018

1868


अनिता मंडा

 1

जा मिली धूप

साँझ के आलिंगन

मिटी थकन।

2

दुख ने फिर
चिलम सुलगाई
साँझ बिताई

3

शब्दों का खेल
अधरों पर मधु
मन में मैल।

4

डूबा सूरज
रेत के सागर में
थार की साँझ ।

5

हुआ है नम
भीगकर ओस से
थार का मन।

6

थार की रातें
तारों से जगमग
वीरान राहें।

7

हवा उकेरे
रेत पर माँडनें
सजाए धोरे।

8

रोहिड़ा-पुष्प
बिराग धरे मन
खिले थार में।

9

थार का जोगी
पहने केसरिया
रुँख रोहिड़ा

10

थार को लाँघ
ढल गया सूरज
रक्तिम नभ

-0-

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Responses

  1. अनुपम अभिव्यक्तियाँ

  2. दुख ने फिर
    चिलम सुलगाई
    साँझ बिताई
    क्या बात है ! बहुत सुन्दर हाइकु हैं सभी…| बहुत बधाई…|

  3. चिलम सुलगाई.. उम्दा,
    थार का अच्छा चित्रण…..
    अनिता जी सुन्दर हाइकु सृजन के लिए अभिनन्दन

  4. सुन्दर हाइकु सभी , ‘दुःख ने फिर’ , ‘शब्दों का खेल’ विशेष .. बधाई !

  5. दुख ने फिर \ चिलम सुलगाई \साँझ बिताई |सुंदर हाइकु
    पुष्पा मेहरा

  6. आदरणीया पुष्पा जी , ज्योत्स्ना दी, प्रियंका दी, पूर्वा जी, विजय आनन्द जी बहुत आभार। आभार हाइकू परिवार।

  7. रोहिड़ा-पुष्प
    बिराग धरे मन
    खिले थार में।

    – बिराग धरे पुष्प का थार में खिलना गहन अर्थ लिए है।

    सुन्दर रचना।
    बधाई!

  8. sundar prstuti bahut bahut badhai.

  9. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति…बधाई

  10. बहुत ही सुंदर, भावपूर्ण हाइकु ।
    हार्दिक बधाई आपको अनिता जी

  11. बहुत ही सुंदर , भावपूर्ण हाइकु
    हार्दिक बधाई अनिता जी

  12. बहुत अच्छे हाइकु अनिता जी


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