Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 28, 2018

1867-दुःख


दुःख

डॉ.जेन्नी शबनम

1.

दुःख का पारा

सातवें आसमाँ पे

मन झुलसा

2.

दुःख का लड्डु

रोज -रोज यूँ खाना

बड़ा ही भारी

3.

दुःख की नदी

बेखटके दौड़ती

बे रोक-टोक।

4.

साथी है दुःख

साथ है हरदम

छूटे न दम।

5.

दुःख की वेला

कभी तो गुजरेगी

मन में आस।

6.

दुःख की रोटी

भरपेट है खाई

फिर भी बची।

7.

दुःख अतिथि

जाने की नहीं तिथि

बड़ा बेहया।

8.

दुःख की माला

काश ये टूट जाती

सुकून पाती।

9.

मस्त झूमता

बड़ा ही मतवाला

दुःख है योगी।

-0-

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Responses

  1. दुःख की रोटी
    भरपेट है खाई
    फिर भी बची।
    Bahut sundar haiku bahut bahut badhai aapko.

  2. दुःख अतिथि
    जाने की नहीं तिथि
    बड़ा बेहया।
    हाँ सच्ची, बहुत बेहया होता है दुःख…| लाख भगाओ पर फिर भी जब देखो, मुँह उठाये चला आता है और भगाये नहीं भागता…|
    इन सभी बेहतरीन हाइकु के लिए हार्दिक बधाई आपको…|

  3. बहुत ही अच्छे ढंग से दुःख को समझाया। हार्दिक बधाई।

  4. दुःख के कितने रूप फिर भी इसको कोई समझ न पाया | कहते भी हैं न –जो तन लागे , सो तन जाने | बहुत अच्छे हाइकु जेन्नी जी |

    शशि पाधा

  5. दुख को कितनी तरह से कहा है, वाह जेन्नी शबनम जी।

  6. दुःख की वेला
    कभी तो गुजरेगी
    मन में आस
    बहुत ही भावपूर्ण और बेहतरीन हाइकु के लिए हार्दिक बधाई जेन्नी शबनम जी

  7. दुख है योगी….. क्या बात है जेन्नी जी, बहुत खूब।

  8. जेन्नी जी दुख के अनेक रंगों से सजे आपके हाइकु अच्छे लगे ।बहुत बहुत बधाई ।

  9. ‘दुःख’ पर सुन्दर .. या कहिए सुख देते हाइकु , बहुत बधाई जेन्नी जी !

  10. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति, सभी हाइकु एक से बढ़कर एक | दुःख की रोटी…, दुःख अतिथि….. तो बहुत ही हृदय स्पर्शी |
    बहुत-बहुत अभिनंदन.. जेन्नी जी |

  11. दुख को परिभाषित करते बहुत सुंदर हाइकु

  12. दुख के रूप अनेक
    कितना अनोखा

  13. बेहतरीन भावनाएं

  14. सुंदर भावपूर्ण हाइकु… बहुत बधाई जेन्नी जी।

  15. आप सभी का हृदय तल से आभार, मेरे हाइकु को आप सभी की सराहना मिली.


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