Posted by: हरदीप कौर संधु | अगस्त 1, 2018

1847


कृष्णा वर्मा

1

मेघ बरसे

चिट्टा दिन हो गया

धुँधली साँझ।

2

मचाए शोर

बादल मुँहजोर

धरा विभोर ।

3

लगीं नाचने

मोरपंखी इच्छाएँ

पर फैलाए।

4

मेघों ने घेरा

पावन उजाले को

रोया सवेरा।

5

मेघ दहाड़े

सूखे की आशंकाएँ

हुईं निर्मूल।

6

बूँदों ने धोया

दलिद्दर समूचा

धरती तृप्त।

7

घिर के छाए

बरस नहीं पाए

यादों के मेघ।

8

भीगें नयन

बरखा में प्रिय को

तरसे मन।

-0-

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Responses

  1. वाह वाह सुंदर कोमल बरखा के रंग हाइकु के संग हार्दिक बधाई

    On Tue, 31 Jul 2018 at 5:53 PM, हिन्दी हाइकु(HINDI HAIKU)-‘हाइकु कविताओं की
    वेब पत्रिका’-2010 से प्रकाशित हो रही है। आपकी हाइकु कविताओं का स्वागत है ! wrote:

    > हरदीप कौर संधु posted: “कृष्णा वर्मा 1 मेघ बरसे चिट्टा दिन हो गया धुँधली
    > साँझ। 2 मचाए शोर बादल मुँहजोर धरा विभोर । 3 लगीं नाचने मोरपंखी इच्छाएँ पर
    > फैलाए। 4 मेघों ने घेरा पावन उजाले को रोया सवेरा। 5 मेघ दहाड़े सूखे की
    > आशंकाए”
    >

  2. बहुत सुन्दर-सुन्दर हाइकु, बधाई कृष्णा जी.

  3. सुंदर भावपूर्ण हाइकु।

  4. बहुत सुन्दर हाइकु हैं, बहुत बधाई…|


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