Posted by: डॉ. हरदीप संधु | फ़रवरी 7, 2018

1825


1-पुष्पा मेहरा

1

हवा पछोरे

निज अंग-अंग से

हिम के कण ।

2

बदली ऋतु

धरती-सूरज की 

है साँठ-गाँठ ।

3

सुगंध भरी

खिल गईं कलियाँ

तृप्त हैं भौंरे ।

4

हँसतीं शाख

पग बढ़ाती धूप

सिंचित प्राण ।

5

बुढ़ाती शीत

गिनती,जीवन के

दो-चार दिन ।

6

सूखे पत्र हैं

झरेंगे अवश्य ये

आएँगे नए ।

7

झड़ने लगे

श्वेत बाल शीत के

आया हेमंत ।

8

घूमता चक्र

दिखा रहा क्रीड़ाएँ

छाया–धूप की ।

9

मदिरा भरे

महुओं को छूकर

हवा नशीली ।

10

राग औ रंग

जीवन के हैं अंग

कहे बसंत ।

11

पुलक भरी

धरा हुई यौवना

निखरे अंग  ।

12

नभ-हिंडोले

चढ़ी,झूल रही है

मीठी सी धूप ।

13

करे चकित

चौंध ये सतरंगी

रूप मोहनी ।

14

बुझाती प्यास

रूप,रस गंध पी

हवा नवेली ।

15

फूली लतर

ठूँठ के काँधे चढ़ी

स्वप्न देखती ।

16

प्यार के बोल

महका दें जीवन

यही बसंत ।

17

कुहा भगाते

फूल-छड़ी हाथ ले

काम पधारे ।

18

चारण भौंरे

निकले हैं काम को

देने बधावा ।

19

जन्में ना कभी

नफ़रत के बीज

फूले बसंत ।       

-0-

pushpa.mehra @gmail .com                      

-0-

2-अंजु गुप्ता

1

हैरान धरा,

उगाईं थीं फसलें,

मकान उगा !

2

सिमटे घन,

जब रूठ धरा से,

कृषक मरा !

3

छायी बदरी,

व्याकुल फिर मन,

गीला तकिया !

4

कर दमड़ी,

कसौटी पर रिश्ते,

अपना कौन?

5

नन्ही वो कली,

शायद ही मुस्काए,

रौंदी थी गई !

6

आकार लघु

गंभीरता समेटे

होते हाइकु !

7

गर्भ में कली

डरती क्या करती

की भ्रूणहत्या !

8

समन्दर तू,

मैं नदिया हूँ प्यासी,

मुकद्दर है !

9

जर्जर काया,

इच्छाएँ खंडहर,

जीने को मरे !

10

आड़ी – तिरछी ,

किस्मत की लकीरें ,

समझूँ कैसे !

11

मुठ्ठी में बन्द 

भविष्य है अपना 

बदलूं कैसे !

12

बन बैठे हो,

किसी और के तुम,

जलूँ न कैसे !

13

नम नयन,

गालों के सूखे आँसू,

पुकारें तुम्हें !

14

काँटों से भरी,

है ये प्रेम डगर,

डरे है मन !

15

सर्द हवाएँ

सियासत की भेंट

रिश्ते भी चढ़े !

16

चारदीवारी

हुई असुरक्षित 

रिश्ते विक्षिप्त

17

पिसी जिंदगी

मर्यादा-अमर्यादा

है अंतर्द्वन्द 

18

रिश्तों में छल,
पलभर का सुख,
अकेलापन !

 19

देखा दर्पण

देख खुद की छवि

सहमा अहं।

 20

छाई है धुंध,
सवाल बने रिश्ते, 
कसैले हुए !

 21

दुर्गम पथ
रख मन संबल
खिलते फूल ।

 22

रह सम्भल

गिरगिट-सा  इंसाँ 

पीठ पे वार

 23

पीहर छूटा

ससुराल पराया

अपना कौन ?

 24

हिम्मत रख

तन मन को साध

जीत लो जंग

अंजु गुप्ता

जन्मतिथि : 7 अक्तूबर

जन्मस्थान : कपूरथला

शिक्षा : एम बी ए, एम ए (इंग्लिश)

व्यवसाय : Soft Skill Trainer

सम्प्रति : हिसार

ई मेल : anju74gupta@gmail.com

सम्प्रति : हिसार

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Responses

  1. पुष्पा जी बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति ……तृप्त हैं भौरें, हँसतीं शाख पग बढ़ाती धूप, बुढ़ाती शीत, झड़ने लगे श्वेत बाल,…..ये हाइकु तो अत्यंत ही सुन्दर…
    अंजु जी सभी हाइकु बहुत ही सुन्दर बन पड़े हैं … हैरान धरा, सिमटे घन, चारदीवारी, पीहर छूटा… अतिसुन्दर

  2. आदरणीया पुष्पा जी के हाइकु प्रकृति का सूक्ष्म विश्लेषण लिए हुए हैं।। बहुत अच्छे लगे।

  3. अंजू जी के विविध रंगी हाइकु उम्दा.

  4. आ.पुष्पा दी के ऋतु – विशेष मनभावन हाइकु । सभी एक से बढ़कर । बधाई स्वीकारें ।
    बदली ऋतु
    धरती-सूरज की
    है साँठ-गाँठ ।
    मंजु गुप्ता जी के जीवन संबंधी सुन्दर हाइकु । बधाई ।
    दुर्गम पथ
    रख मन संबल
    खिलते फूल ।

  5. पुष्पा मेहरा जी ,अंजु गुप्ता जी आप दोनों को हार्दिक बधाई। सभी हाइकु बहुत सुंदर ।

  6. बहुत सुंदर मनमोहक हाइकु….पुष्पा जी, अंजु गुप्ता जी आप दोनों को बहुत-बहुत बधाई।

  7. अंजू जी की लेखनी निसंदेह बहुत प्रभावी है…| हिन्दी हाइकु परिवार में आपका स्वागत है |
    बेहतरीन हाइकु के लिए पुष्पा जी और अंजू जी आप दोनों को बहुत बधाई…|

  8. आदरणीया, पुष्पा एवं प्रिय अंजू जी की सुंदर रचनाएं, बधाई

  9. बहुत मनमोहक हाइकु…. आदरणीया, पुष्पा जी एवं प्रिय अंजु गुप्ता जी, आप दोनों को बहुत-बहुत बधाई।

  10. वाह वाह बहुत सुन्दर हाइकु सभी रचनाकारों को बधाई

  11. प्रकृति का मनभावन चित्रण ..बहुत सुन्दर हाइकु आ.पुष्पा दीदी ,बधाई !

    जीवन की सच्चाई कहते सुन्दर हाइकु अंजु जी ..अभिनन्दन !!

  12. उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रिया हेतु उपरोक्त वरिष्ठ रचनाकारों का आभार |
    पुष्पा मेहरा


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