Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जुलाई 2, 2017

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1-कृष्णा वर्मा

1

वर्षा का ज़ोर

भिगोया हवाओं का

लो पोर-पोर।

2

मेघों की अदा

मनवा की बिजुरी

देते चमका।

3

किसने बोई

प्रेम धुन भीतर

दीखे ना कोई।

4

सावन रस

झरती जब बूँदें

मन बेबस।

5

बाँकी है रुत

बाँचे प्रेम कथाएं

भीगी बेसुध।

6

छिटके मेह

खिल-खिल महके

फूलों की देह।

7

छेड़ें ,चिढ़ाएँ

छितराए बौछार

तेज़ हवाएँ।

8

बूँदें क्या झड़ीं

कर गईं गीली आ

नैनों की गली।

9

देती धमकी

सावन पुरवैया

बूँदें बरसीं।

10

मेघ की चाल

सूरज को गुम कर

रुलाए ताल।

11

नए-पुराने

छप्पर का सच तो

सावन जाने।

12

लिखें धरा के

उर्वर आँचल पे

बूँदें उल्लास।

13

बूँदें क्या झरीं

बंधन तोड़ बौरी

नदिया बही।

14

हिया निहाल

सुन खपरैल पे

बूँदों की ताल।

15

शैतान मेह

सुनहरी धूप की

भिगोए देह।

16

बदली घिरी

जियरा में सलेटी

उदासी तिरी।

17

कहे किसान-

‘बरस जा बादल

बाकी लगान।’

18

मेघ बेदर्दी

करता मनमर्ज़ी

माने ना अर्ज़ी।

19

मेघा बरस

नदी के होंठ सूखे

खा रे तरस।

20

हठ का मारा

सूर्य को घेरे खड़ा

मेघ आवारा।

-0-

2-पुष्पा मेहरा

1

आई बरखा

हवा के ढोल बजे            

ताल दें पत्ते ।

2

दूर गगन

सतरंगी धनुक

धरा से मिला ।

3

ताप से जले

शीतल जल ओढ़े

आये बादल ।

4

साँस न लेते

टूटे बाँध से रोते

नभ के नैना ।

5

घिरी बदरी

जंगल में मंगल

मनाते पाखी।

6 ।

अँकवे फूटे ।

देखके बादल का

प्यार अनूठा ।

7

सोंधी सुगंध

कण-कण मुखर

प्रेम की पाती ।

8

आई है वर्षा

हँस रहे महल

रोते छप्पर ।

9

धुआँ विषैला

फैला है चारों ओर

नभ रुआँसा ।

10

सूखी नदियाँ

सीना धरा का चाक

पक्षी भी रूठे ।

11

वर्षा से भीगी

सोंधी गंध लपेटे

जागी धरती ।    

12

करें किलोल

डाल-डाल पखेरू

टूटी खुमारी ।

  13

नन्ही बुँदियाँ

बेला के तन पर

टैटू बनातीं ।

 14

पीकर जल

अघाई माँ धरती

हवा जुड़ाती ।

15

झुण्ड बनाके

गरजे जो बादल

दुबका सूर्य ।

16

घटाओं बीच     

मूक चाँद बाँचता

बंदी की पीड़ा ।

17

शीतल तट

तालाब से निकल

मेंढक मस्त ।

 18

आई पावस

रंगीन एलबम

धरा ने खोली ।

19

मस्ती में घन

पट-खोल-दिखाते

स्वर्ण-हँसुली ।

20

आया सावन

पेड़ों पे झूले पड़े   

झूले पे गोरी ।

-0-

Pushpa .mehra @gmail .com        

-0-

3- सुभाष चंद्र लखेड़ा

 

1

फटना नहीं 

बरसना प्यार से 

बादल पिया। 

2

तू बरसना 

जरूरत जितनी 

यही विनती।  

3

मन हरषे 

जब भी तुम आओ 

प्यास मिटाओ। 

4

खेती हो खूब 

फलें फूलें किसान 

रखना ध्यान। 

-0-

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Responses

  1. Shandaar…Jabardast lekhan…👌👌👌👌

  2. संपादक द्वय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए में कृष्णा वर्मा जी और पुष्पा मेहरा जी को सुन्दर – सामयिक हाइकु सृजन के लिए बधाई देता हूँ। हार्दिक शुभकामनाएँ ! – सुभाष चंद्र लखेड़ा

  3. बहुत सुन्दर सृजन… पुष्पा मेहरा जी, सुभाष लखेड़ा जी हार्दिक बधाई।

  4. बारिश के मौसम को सुहाना बनाते सुन्दर-सुन्दर हाइकु. कृष्णा जी, पुष्पा जी और सुभाष जी को बहुत बधाई.

  5. सुंदर हाइकु हेतु कृष्णा व सुभाष जी को बधाई |
    पुष्पा मेहरा


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