Posted by: डॉ. हरदीप संधु | दिसम्बर 6, 2016

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मन व्यथा का सच – मैं सागर सी

शिव डोयले

 साहित्य की विधाओं में से हाइकु  सत्रह वर्ण का जापानी छन्द है ,जिसमे  पाँच, सात पाँच में त्रिपदिक वृत्त में किसी भाव को बाँधना कौशल कवि कर्म है। हाइकु अब काव्य विधा में लोकप्रियता की और अग्रसर होता जा %e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82रहा।

हाइकु देखने में लघु परन्तु अर्थ में गहन होते हैं कम शब्दों में सार्थक प्रस्तुति है। इस विधा में काव्य साधना में रत प्रतिष्ठित कवयित्री मंजूषा मन का हाइकु-ताँका संग्रह “मैं सागर सी…” प्रकाशित हुआ है ।इसमे विषय- वैविध्य हैं, जीवन जगत् का बहुआयामी चित्रण समाहित है ,जिसमें मन के हर भाव पर रचे 405 हाइकु एवं 40 ताँका हैं।  हाइकु को पांच खंड में विभक्त किया गया है – प्रथम खण्ड में ‘करूँ वंदन’ द्वितीय में ‘पीर हमारी’ तृतीय में ‘प्रकृति रूप’ चतुर्थ में ‘मन के नाते’ पंचम खंड ‘सागर मन’ शीर्षक  लिखे गए हैं ।

प्रथम खंड ‘करूँ वंदन’ से शुभारम्भ किया है- ‘प्रथम पूज्य/लम्बोदर गणेश/शुभागमन।’

इस खंड में 21 हाइकु हैं, जो शुभ शुरुआत  का शुभ संकेत हैं:-

“गीता सुना दे/कृष्ण अब मुझे भी/जीना सीखा दे।”

द्वितीय खंड पीर हमारी सबसे बड़ा खंड है जिसके शीर्षक से ही अंदाज लग जाता है कि इसमें मन जी के जीवन के खट्टे- मीठे अनुभव की अनुभूति होगी। कहीं दर्द की कसक है तो कहीं व्यथाएँ बोलती  –

“यह जीवन /किस तरह बाँचूँ/ कोरा कागज।”

“गीली लकड़ी/बन धधकी साँसे/जली न बुझी।”

इस प्रकार के हाइकु सच का बयान हैं; जिन्हें लिखने में बनावट ,अनावश्यक शाब्दिक वाग्जाल से परे सहज गाम्भीर्य भावों से लिखे हैं, भावनाएँ मचलतीं रहीं, सुख दुख की भाँति तट से पाने की आस में खाली दु:खी हो लौट आती है तभी तो सार्थक शीर्षक दिया- ‘मैं सागर सी…’ कवयित्री का कोमल हृदय ‘मन’ आपदाएँ, विपदाएँ सहन करता हैं-

“मैं सागर सी/गहरे राज छुपा/मोती लुटाऊँ।”

“शब्द- संसार/ एक यही है मेरा/ जीवन सार।”

 अतीत की मधुरिम यादें कैलेंडर की तरह सहेजे हुए शब्द संसार में खो जाती है, दर्द की, वियोग की स्मृतियाँ, संघर्षशील, सम्वेदनाओं को प्रेम व्यथा में टूटता जीवन आँसू की स्याही से लिखे गये हैं मार्मिक भावपूर्ण हैं यथा-

उमर भर/पीते ही रहे आँसू/ प्यासे ही रहे।”

“प्यासा था मन/आँसू खूब मिले हैं/पीने के लिए।”

“जीवन गाथा/लिखी आँसू की स्याही/न बाँची जाए।”

आहत हृदय, टूटते सपनो  में भी आशा की किरण, जीने की चाह कुछ खोकर पाने की लालसा प्यार भरे शब्दों में अपनापन मिल जाये वन्दनवार सजाकर स्वागत को आतुर हैं। सूखी धरा हरी हो जाए चाहत इन हाइकुओं में देखी जा सकती है-

“फूलों की चाह/काँटों सँग हमने/किया निबाह।”

“स्वाति की बूँद/एक जो मिल जाती/मोती गढ़ते।”

रुमाल नहीं/दो मीठे बोल चाहें/भीगी पलकें।”

“मन साँकल/खोलो तुम आकर/सुख के पल।”

“भरे उड़ान/आसमान की ओर/पाएँगे छोर।”

उपर्युक्त हाइकु के बिम्ब और प्रतीक मन को छू जाते हैं। छोटी छोटी खुशियों को रेजगारी की तरह व्यक्त करती, जुलाहे की तरह बुना गया ताना -बाना आदि ऐसे हाइकु जिनका सौंदर्य मौलिकता अनूठी है। कहीं कहीं दार्शनिक भाव से रचित हैं-

ताना -बाना ये/कैसे बुना जुलाहे/मुझे सिखा दे।”

प्रकृति रूप तृतीय खण्ड में है जिसमें भोर, किरण, वृक्ष, सूरज, चाँद आदि को लेकर हाइकु रचे गए हैं , जिनमें मानवीकरण भी दिखाई देता है उदाहरणार्थ-

“प्यासी धरती/फ्ला न फूला कुछ/मन बंजर।”

“चाँद की प्याली/दूध से लबालब/मुन्नी मचली।”

“झील में चाँद/ज्यों लगे बड़ा प्यारा/प्यार तुम्हारा।”

 प्रेम प्यार में डूबी भावनाएँ एक असीम आनन्द को व्यक्त करतीं हैं प्रेम में बिछोह दुःख देता है। चतुर्थ खंड “मन के नाते” रिश्तों से जुड़ता है बेटी, मायका, ससुराल, माँ, ममता, रिश्ते नाते, प्रेम आदि कही  कहीं सन्देश की तरह आगाह करते, सचेत करते-

“नाता कागजी/क्यों निभाते  हो तुम/तोड़ो इसे भी।”

“माँ का आँचल/धूप हो या बारिश/बचाए सदा।

इस प्रकार की बात भुक्त भोगी ही कह सकता है, अनुभव की कलम से लिखा गया है। पंचम खंड में “सागर मन” शीर्षक को नई उम्मीद आशावादी विचारों की सहज अभिव्यक्ति है-

पंख पसारूँ/एक बार उड़ के/नभ निहारूँ।”

“दुआ कुबूल/नया साल लाएगा/नए ही फूल।”

 टूटे मन को जुड़ जाने की उमंग नई दिशा का बोध कराती है, सच है आज नहीं तो कल सुखद दिन आएँगे। हाइकु के पश्चात् पुस्तक में चालीस ताँका छन्द लिखे गए हैं जो 5-7-5-7-7 का वर्णिक छन्द होता है। कवयित्री ने ताँका भी भली प्रकार रचे हैं, इनमें रचनाकार का स्वाभिमान दिखाई देता है, दर्द को भी सुख की तरह अंगीकार करना उसका आत्मबल नारी का हौसला तारीफ के काबिल है-

“आँखों को मेरी/एक तो स्वप्न दे दो/पूरा जीवन/जी लूँ इस चाह में/सच ही ये सपना।

इस चाह को लेकर जिन खूबी है सराहनीय है कवयित्री का जीवन संघर्षों से भरा है वह इतनी थक चुकी है कि सुख सुविधाएं मुफ्त में भी मिलें तो स्वीकार नहीं। खुद्दारी को इस प्रकार ताँका में पढ़ा जा सकता है-

“भले कष्ट हो/सुख न लूँ भीख में/सह लूँ दु;ख/खुश रह लूँ ऐसे/दुःख में भी सुख ज्यों।”

“आँखों को मेरी/एक तो स्वप्न दे दो/पूरा जीवन/जी लूँ इस चाह में/सच हो ये सपना।”

मैं सागर सी… कृति हाइकु विधा की शृंखला में एक विशेष स्थान पा सकती है। रचनाएँ पाठकों के मन में छवि छोड़ने में समर्थ है , स्तरीय हैं, हल्कापन एवं कोरी कल्पना से रची नहीं गईं है। एकाकीपन की पीड़ा, टूटे मन की व्यथा को अनुभव की कलम से लिखा गया है ।यथार्थपरक रचनाएँ सदैव प्रभावकारी होतीं हैं॥मंजूषा मन ने इन्हें जी कर लिखा है, जिजीविषा है, एक प्यास की ललक प्रेम की आकांक्षाओं ने पुस्तक का रूप लिया है ।सागर सी गहराई में खोजने की कोशिश है मोती मिलना तय है।

कृति में हाइकु के साथ दिए गए चित्र -रेखांकन सुंदर हैं, जो चार चाँद लगा देते हैं। आवरण पृष्ठ मनमोहक है जिसमें नारी मन का सागर -सा फैलाव दिखाई देता है। चित्र -रंग का संयोजन खूबसूरत है ।मुद्रण भी साफ सुथरा है। संग्रह से हिंदी हाइकु साहित्य समृद्ध होगा, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है। पाठकों को अवश्य पसन्द आएगा।

“मैं सागर सी ( हाइकु-ताँका संग्रह): मंजूषा मन,.मूल्य – 140/- ;पृष्ठ – 96;प्रकाशक – पोएट्री बुक बाजार प्रकाशन, लखनऊ

-0-झूलेलाल कॉलोनी, हरिपुरा,विदिशा – 464001 (म.प्र.)

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Responses

  1. आ. शिव जी बहुत सुन्दर सार्थक समीक्षा ….मंजूषा जी और आप दोनों को हार्दिक बधाई…मंजूषा जी आपके हमेशा हाइकु बहुत शानदार होते है

  2. sundar uddharanon ke saath bahut sundar ,saarthak sameeksha aa.shiv doyale ji
    aap dono ko haardik badhaai !

  3. “मैं सागर सी ( हाइकु-ताँका संग्रह): मंजूषा मन ji haardik badhaai

  4. एक खूबसूरत संग्रह की बेहद गहन और सार्थक समीक्षा…| शिव जी और मंजूषा जी आप दोनों को हार्दिक बधाई…|

  5. बहुत सुन्दर सार्थक समीक्षा। शिव डोयला जी, मंजूषा जी आप दोनों को बहुत बधाई!

  6. शिव डोयला जी ने मंजूषा जी के हाइकु संग्रह की बहुत सुन्दर समीक्षा की है |आप दोनों को ही हार्दिक बधाई और शुभ कामनाएं |

  7. शिव डोयले की समीक्षा मंजूषा मन की पुस्तक ‘मैं सागर सी ‘ को पढ़ने में प्रेरित करने में काफी सफल रही है । शिव डोयले और मंजूषा जी आप दोंनों को बधाई

  8. मैं सागर सी के लिए मंजूषा जी आपको बहुत बहुत बधाई तथा सुंदर समीक्षा के लिए शिव डोयलेजी को बधाई। रेणु चन्द्रा


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