Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | दिसम्बर 5, 2016

1701


1-डॉ ज्योत्स्ना शर्मा

1

 मोह या माया ?

समझ ही न पाए

क्या खोया ,पाया ?

2

घुप्प अँधेरा

उजली किरन सा-

है साथ तेरा                       

3

 थी तेरी आस

क्यों मिली भटकन

प्यास ही प्यास ।

4

माना ,था बुरा

मैंने दिल तपाया

हुआ न खरा ?                       

5

 चल दी साँझ

सिंदूरी आँचल में

सूरज बाँध ।                       

6

प्यासे को सिंधु

क्या जल देगा थोड़ा ?

खारा निगोड़ा ।                       

7

ओ मनमीत !

तुम बिन हमारे

रुँधे हैं गीत ।                       

8

 एक छुअन

यादों की खराशें हैं

व्याकुल मन ।                       

9

 नन्ही बच्चीसी

आशा मन में झाँके

सीधी-सच्ची सी ।                       

10

 रजत थाल

सुरमई तिपाई

ख़ाली क्यों धरा ?                       

11

जी तो ये करे

जी लें ऐसे मिलके

कि, जी ना भरे ।

12

ओ मनमीत !

हो तुम दूर ,मेरे

रुँधे हैं गीत ।

-0-

2-मंजूषा मन

1

रख जो आ
मनन्दिदीप
मिटा अँधेरा

2
लड़ता दीप
घने अँधेरे बीच
उजियारा दे

3
नया सवेरा
सुख लेकर आया
मन को भाया

4
लो उपहार
निर्धन से प्रेम ही
और न कुछ

5

मेरा ये प्रेम

बस यही है पास
छोटा संसार

6

प्रेम लाई हूँ

और न कुछ मेरा
मैं क्या दे सकूँ

7

जी कर जाना
कितना कठिन है
जी का लगाना

8

जी कर देखें
जीवन का जहर
पी कर देखें

9

प्रिय राधिका
प्रेम की वो मूरत
कृष्ण साधिका

10

हृदय बसी
श्याम की ही मूरत
प्यारी सूरत

-0-

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Responses

  1. बहुत सुंदर हाइकु ‘मन’ जी👌
    जी कर जाना …विशेष …हार्दिक बधाई आपको !

  2. मेरी रचनाओं को यहाँ स्थान देने के लिए बहन हरदीप जी
    एवम् भाई काम्बोज जी का बहुत-बहुत धन्यवाद 💐🙏💐

  3. आ.ज्योत्सना जी एवं मंजूषा जी ..बहुत खूब…सुंदर मनोरम हाइकु

  4. ज्योत्सना जी, मंजूषा जी .सुंदर सृजन।

    ज्योत्सना जी,
    चल दी साँझ
    सिंदूरी आँचल में
    सूरज बाँध । ………… बहुत सुंदर

  5. वाह ज्योत्सना जी मंजूषा जी सभी हाइकु बहुत सुन्दर है हार्दिक बधाई

    2016-12-05 18:29 GMT+05:30 हिन्दी हाइकु(HINDI HAIKU)-‘हाइकु कविताओं की वेब
    पत्रिका’-2010 से प्रकाशित हो रही है। आपकी हाइकु कविताओं का स्वागत है ! :

    > रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ posted: “1-डॉ ज्योत्स्ना शर्मा 1 मोह या माया ?
    > समझ ही न पाए क्या खोया ,पाया ? 2 घुप्प अँधेरा उजली किरन सा- है साथ तेरा
    > । 3 थी तेरी आस क्यों मिली भटकन प्यास ही प्यास । 4
    > माना ,था बुरा मैंने दिल तपाया हुआ न खरा ? ”
    >

  6. ज्योत्स्ना जी ,मंजूषा जी आप दोनों के हाइकु पढ़के बहुत आनंद आया गज़ब लिखती हैं आप दोनों ..हार्दिक बधाई आप दोनों को

  7. sabhi haiku sunder bhavon se bhare hain .Jyotsna va Mnjusha ji badhai .

    pushpa mehra

  8. बहुत सुन्दर सभी हाइकु…ज्योत्स्ना जी, मंजूषा जी बधाई!

  9. ज्योत्स्ना जी, मंजूषा जी सभी हाइकु बहुत सुंदर हैं। आपको बहुत बहुत बधाई। रेणु चन्द्रा

  10. jyutsna ji aur manjusha ji bahut sunder haiku hai aap dono ko badhai
    rachana

  11. चल दी साँझ
    सिंदूरी आँचल में
    सूरज बाँध ।
    क्या बात है…|

    जी कर जाना
    कितना कठिन है
    जी का लगाना।
    बहुत सुन्दर…|

    आप दोनों को बहुत बधाई…|


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