Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 22, 2016

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डॉ.सुरेन्द्र वर्मा कृत ‘दहकते पलाश’ के प्रति मेरे भाव

पुष्पा मेहरा

dehakte-palashदर्शनशास्त्र के वरिष्ठ अध्येता,कवि,चिन्तक,लेखक,व्यंग्यकार,समीक्षक ,रेखाकार,हाइकुकार आदि विशेषणों से सर्वमान्य वर्मा जी का हाइकु-संग्रह ‘दहकते पलाश’ हाथ में आते ही सर्वप्रथम मन प्रश्न पूछने लगा कि रंग और गुणों से सम्पन्न,बसंत और फाग के रंग में फूला पलाश आखिर कवि मन को दाहक क्यों लगता है ,क्या एक ओर इसका गुनगुना सा मादक रंग,खिला –निखरा –निष्कलुष रूप, इसका तिर्यक भ्रूविलास और दूसरी ओर माया जनित सौन्दर्य और गुणों –अवगुणों के दर्पण को निहारता मानव मन स्वाभाविक स्पर्धा वश ईर्ष्या की आग में दहक उठता है ! ये सारे प्रश्न जो मेरे मन को कुरेद रहे थे उनके उत्तर मुझे इस संग्रह रूपी सागर में अवगाहन करने से स्वमेव ही प्राप्त हो गए।

वास्तव में यह हाइकु-संग्रह, एक कुशल सम्वेदनशील रचनाकार के मनोभावों ,गहन विचार ,गम्भीर सोच का, नाना बिम्बों –प्रतिबिम्बों के माध्यम से गढ़ा देश व समाज का स्पष्ट आइना है। पलाश का फूल एक साधारण फूल नहीं वह तो पुष्पराग है उसका स्वरूप तथा उसमें स्वयं को पूर्णतया समा लेने की मानव मन की अतिशय अप्राप्य लालसा ही मन को दग्ध करती है , तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो सारा जड़ –चेतन यानि कि सारा संसार चकित कर देने वाले विरोधाभास से गुज़र रहा है। एक  ओर यह संसार हँसते –खिलखिलाते पलाशवन की भाँति मोहक है तो दूसरी ओर प्रकृति,परिवार और समाज की नाना प्राकृतिक व स्वपोषित विसंगतियों से भरा पड़ा है जो कभी हमें उनसे निपटने का सुलझा मार्ग सुझाती हैं तो कहीं हमें असहाय बना के छोड देती हैं। प्रकृति समाज और उसकी इकाई इन्सान यहाँ तक की पशु –पक्षी,वन्य प्राणी सभी तो इसी घेरे में आबद्ध-संघर्षरत हैं इन्हीं भावों का चित्रण वर्मा जी ने ८ खंडों और उपखंडों में विभाजित इस हाइकु संग्रह में कुशलता से किया है। शेष रहा परिशिष्ट तो वह तो उनकी अन्य रचनाओं के प्रति वरिष्ठ साहित्यकारों के अभिमत की गूँज है। संक्षेपत: वर्मा जी ने जीवन-जगत के हर पक्ष को अपने हाइकु के माध्यम से वाणी दी है ,मैंने  इन्हीं तथ्यों पर प्रकाश डालने का,दूसरे शब्दों में रचनाकार की अनुभूतियों को स्वयं भी हृदयंगम कर उनको उकेरने का छोटा सा प्रयास किया है।

जन्मदात्री माँ की तरह धरती भी तो हमारी माँ ही है वह तो स्वर्ग से भी महान है, पूज्य है,सर्वोपरि है अत: वर्मा जी सर्वप्रथम धरती माँ की दयनीय स्थिति को याद करते हुए यह बताना नहीं भूलते कि नाना दु:खों को सहती-सदा शांत रहने वाली धरती दारुण दुःख का आघात पा जब कभी काँप कर अपनी पीड़ा का हमें अहसास करा देती है। शांति का साकार रूप धरा जब, प्राकृतिक आपदा भूकम्प के असह्यआघातसे अपनी प्रतिक्रिया दिखाती है तो मानवीय सम्वेदना की अनुभूति मन को उसकी मूक पीड़ा का अहसास कराने से नहीं चूकती, निम्न हाइकु मानवीकरण का उत्कृष्ट उदाहरण है –

  • भूकंप आया /शांत धरा का दुःख/समझ पड़ा।

ग्रीष्मऋतु की विभीषिका,गर्म लू के थपेड़े, जलाभाव से संत्रस्त पशु –पक्षी की व्यथा चंद वर्णों में मुखरित हो रही है। दहकती गर्मी का दृश्य प्रस्तुत करता मर्म भेदी निम्न हाइकु मन को हिला रहा है –

गर्म हवाएँ/ धरती पर निढाल /  हाँफता कुत्ता।

 चिड़िया प्यासी / नल की सूखी टोंटी /चोंच मारती।

सिक्के के दो पहलू की भाँति जीवन के भी दो पहलू की ओर इंगित करता अनुभवों की लड़ी पिरोता निम्न हाइकु जीवन की सच्चाई बता रहा है-

  • कुछ कड़वी/ निबौली सी ज़िन्दगी/कुछ मीठी सी।

पर्यावरण के प्रति जागरूक कवि जब देखता है कि जंगल कटते जा रहे हैं,मनुष्यों में बहशीपन बढ़ता जा रहा है, मनुष्य मानवीय आचरणों को भूल अमानुषिक व्यवहार करने पर उतारू है तो सहृदय मन चीत्कार कर स्वयं से और हम सबसे प्रश्न पूछता है कि बताओ तो ज़रा-

जंगल कटा/जंगलीपन बढ़ा/कैसा विकास।

उद्धृत है मौसम पर आश्रित घटते-बढ़ते समय की उपमा रबर से कर नया  उपमान प्रस्तुत करता निम्न हाइकु –

यह वक्त है/रबर सा खिंचता /सिकुड़ता है।

आज की स्वार्थी दुनिया में सभी अपने में खोए हैं ,एक दूसरे के दुःख –दर्द को सुनने –समझने व बाँटने वाला कोई भी नहीं है ,ऐसे आत्मकेंद्रित समाज की करुणा जगाने वाली स्थिति का दृश्य मात्र नन्हे हाइकु में समा कर इसकी गूढ़ता को दुगना –चौगुना कर रहा है –

  • सिमट रहे / घरों में लोग ,चीखें/बुलाती रहीं।

एक चिंतन शील विचारक जब जीवन –जगत से जुड़ा डगमगाती सामाजिक  स्थिति,अराजकता,बेरोजगारी,अशिक्षा,संकीर्णता,आतंक,हत्या-आगजनीसी भयावह स्थितियों के अनुभवों से गुजरता है तो उसके सारे अनुभव शब्दों में ढल कर प्रश्न बन जाते हैं और उत्तर खोजता –असहाय समाज नि:शब्द रह जाता है डॉ.वर्मा जी का निम्न हाइकु इसी का प्रमाण है –

  • कहाँ खो गयी /दिलों में इंसानों के /इंसानियत।

भरोसे की कमी ही परस्पर नाते –रिश्तों में फूट डालने का काम करती है और आपसी उदासीनता का कारण भी ,साथ में सदा सर चढ़ बोलने वाला अहंकार हर असंयमित व्यक्ति के मन की कोठरी से उछल –उछल कर उसी प्रकार बाहर आ जाता है जिस प्रकार हाथ की उँगली में पहनी गयी हीरे की अँगूठी की चमक–झलक छिप ही नहीं पाती ,ऐसे बिंब प्रधान हाइकु तो आम व्यक्ति के मनोभावों को सहजता से खोल कर रख देते हैं देखिये –

  • ऐसे या वैसे / भरोसा ही न रहा /जुड़ते कैसे।

  • कैसे छिपाऊँ/ अहं हीरे की कनी /अँगूठी जड़ी|

डॉ.वर्मा जी का दार्शनिक मन मायावी चकाचौंध में फँसे, जीवन-जगत की लुभावनी सच्चाई से अनभिज्ञ- अज्ञानी लोगों को सचेत करते हुए कहता है कि सुनो तो जिसे हम देख- सुन रहे हैं, जिसे हम सत्य मान रहे हैं वह सत्य नहीं है  –

  • देखा जो भी/केवल सत्याभास /सत्य नहीं था।

एक अज्ञात रहस्य में जीता, माया के चक्रव्यूह में फँसा व्यक्ति सत्य –असत्य का भेद नहीं समझ पाता ,जो दृश्यमान है वह सत्य नहीं है इस तथ्य को या तो जानता ही नहीं है या जानकर भी नहीं समझता कि ‘ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या,’ भ्रममें भूला ये मानव मन ही तो है जो मुझे भी लिखने को बाध्य कर है रहा कि सदा – ‘पालता भ्रम\रस्सी में साँप का\हमारा मन’।

     वास्तव में जग की रीति यही है कि कर्म कोई करता है और उस कर्म से प्राप्त सुख का उपभोग कोई अन्य ही करता . दूसरे शब्दों में कुआँ कोई खोदता है पानी कोई पीता है , मंच कोई सजाता है, स्क्रिप्ट कोई लिखता है और अभिनय कोई दूसरा ही करता है|  वस्तुत:वर्मा जी के जिस हाइकु को मैं उद्धृत कर रही हूँ वह उस छोटी सी बंद डिबिया की तरह है जिसको खोलने से कई झिलमिलाते रंग छिटक जाते हैं , प्रस्तुत है बहु भावार्थी हाइकु –

  • कोई उठाए /पालकी और बैठे /पालकी कोई।

   क्षमा कीजिएगा उपरोक्त हाइकु को पढ़ कर मैं स्वयं इसके दार्शनिक पक्ष की ओर बढ़ती हुई लिखने को विवश हो रही हूँ कि –

  • जगत मंच / मन के नेपथ्य में / है सूत्रधार।

 हर सजग कवि या कहानीकार सामयिक प्राकृतिक विषमताओं के अच्छे  – बुरे प्रभावों से प्रभावित अपनी मन:स्थिति के अनुरूप अपनी रचना की विषय-वस्तु अवश्य चुनता है, यही कारण है कि पर्यावरण के विनाश से उत्पन्न भयावह स्थितियों का सामना करते कवि मन की सम्वेदना निम्न हाइकु में उभर कर आई है –

बाढ़ दुर्भिक्ष / तूफ़ान ज़लज़ला/घर उजड़े।

बुद्धि चातुर्य के लिए साक्षर होना आवश्यक नहीं है यह मानना अनुचित न होगा कि साक्षरता बुद्धि को माँजती भर है बहुत सी अनपढ़ नारियाँ विद्वान पुरुषों को हर क्षेत्र में पीछे पछाड़ने की क्षमता रखती रही हैं और रखती भी हैं,निम्न हाइकु इसी भाव को दर्शा रहा है –

  • अनपढ़ स्त्री /साक्षर पुरुषों पे /पड़ती भारी।

शब्दों में संसार को समाहित करने की शक्ति होती है, बाजारवाद के इस युग में अर्थ के बिना सब व्यर्थ है इस पर व्यंग्य कसते हुए कवि का कहना है –

  • ईश्वर नहीं /है सर्वशक्तिमान /पैसा,बाज़ार।

वर्मा जी ने जहाँ मूल्यों के अवमूल्यन को स्वीकारा है वहीं माता –पिता के रिश्तों की गरिमा,भावनात्मक स्तर पर अपनी संतानों के प्रति उनका अटूट जुड़ाव तथा स्थायित्व का जो उत्कृष्ट उदाहरण निम्न हाइकु के माध्यम से चित्रित किया है वह परोक्ष रूप से माता –पिता के प्रति कर्तव्यबोध कराता बार –बार पढ़ने,समझने व से उन्हें हृदय से लगाये रखने की प्रेरणा दे रहा है –

  • ऊँचा गम्भीर / अचल हिमालय / पिता सरीखा।

  • बदला वख्त/ माता और पिता श्री / कब बदले।

 जिस प्रकार खादी का कम्बल शुरू में तो शरीर को चुभन देता है किन्तु धीरे-धीरे वही शीत से ठिठुरती काया को गर्मी का सुख देता है उसी प्रकार माता –पिता द्वारा दी गयी नैतिक शिक्षाएँ भी स्वतंत्र विचारों वाली संतानों को आरम्भ में तो बुरी अवश्य लगेंगी किन्तु जीवन के मैराथन में कहीं न कहीं सहायक होती हैं। निम्न हाइकु में इस भाव की लाक्षणिक अभिव्यंजना ग्राह्य है –

  • खादी कम्बल /चुभता तो बेशक /गरमी देता

     पारिवारिक सम्बन्धों में भाई –भाई के सम्बन्धों के विघटन से उद्वेलित मन से उपजा अनुत्तरित प्रश्न पाठक की सोच को झिन्झोरता है पर प्रश्न का उत्तर तो मानसिक तनाव के चक्रव्यूह से निकल ही नहीं पाता, उसने तो चक्रव्यूह भेदना सीखा ही नहीं, भाव की सहज अभिव्यंजना निम्न हाइकु में व्यंजित हो रही है –

  • एक जगह /हम पले–बढ़े,क्यों /अलग खड़े।

पुस्तकें जो हमारे ज्ञान का श्रोत हैं, नैतिक शिक्षा- प्राप्ति का उपलब्ध साधन हैं उनसे प्राप्त सतज्ञान को जीवन में अपनाने की प्रेरणा देता निम्न हाइकु आदर्श वाक्य की तरह प्रस्तुत है –

  • ढंग जीने का/सीखा जो पुस्तक से /उसे उतारो।

    हम सदैव दीपक से प्रकाश की अपेक्षा करते हैं अर्थात् सारे आदर्शों को हम   दूसरे में ही देखना चाहते हैं परन्तु मानव मूल्यों व सिद्धांतों की लीक का स्वयं  अनुपालन  करते हुए समाज के सम्मुख आदर्श प्रस्तुत करने की चाह करते भावों से भरी आवाहन करती लेखनी कहती है – 

  • स्नेह उड़ेलो/स्वयं ही बनो दीप /उजियारा दो।

श्रम का महत्व तथा एकता में बल का सकारात्मक संदेश देते अकर्मण्यता व अलगावबाद के वरोधी हाइकु समाज को सही दिशा सुझा रहे हैं देखिये –

  • गहरा खोदो /पाओगे जल मीठा / कर्मठ ज्ञान।

  • कंधे से कंधा / मिला करके चलें / पहुँच जाएँ।

    साक्षरता और ज्ञान मनुष्य की बुद्धि का विकास कर पशुओं से ऊँचा उठा, उन्हें तर्क संगत दृष्टिकोण देता है, पशुओं का तो बौद्धिक विकास ही पूरा नहीं हो पाता , उनके लिए ज्ञान का होना न होना बराबर है,निम्न हाइकु इंसानों के लिए शिक्षा के महत्व का संकेत कर रहा है –

  • पशु समान / यह मानव देही/ बिना ज्ञान के।

  • लीक-अलीक / दोनों ही पथ खुले / चुनना तुम्हें।

 डॉ.वर्मा जी के शब्द –शब्द में उनके अनुभवों की गहरी खनक है ,प्रस्तुत है अनुभूत सम्वेदना का निम्न भाव –

  • रोगी समाज /कहीं भी रखो हाथ/दर्द ही दर्द।

उपर्युक्त हाइकु नानक साहब के कहे शब्दों की कड़ी में कड़ी बन जुड़ रहा है कि ‘नानक दुखिया सब संसारा’।

भाग्य व नियति को हम सभी मानते हैं और यह भी समझते हैं कि हम कितना ही पंडितों से, घटने वाली अच्छी –बुरी घटनाओं के पल –छिन, दिन वा समय की जानकारी लेना चाहें किन्तु सम्भव नहीं हो पाता ना ही होनी को कोई टाल ही पाता है, जो होना है वह तो चुपचाप हो कर ही रहेगा,नियति की महिमा बताता तथा उस पर विश्वास करता वर्मा जी का हाइकु कहता है कि –

  • चुपचाप ही/ होता है सब कुछ /अपने आप।

 दुःख में अपने ही काम आते हैं दूसरे नहीं ,अपनेपन की आँच को गह्माता अपनत्व के बंधन में मन को बाँधने का सहज आग्रह करता हाइकु, कवि मन की निष्कलुष-सरल छवि उभार रहा है।प्रस्तुत है सत्यता पर टिका हाइकु जो पाठकों को भटकने से रोकना चाहता है –

  • कोई न आया / हाथ अपना ही था /वो काम आया।

परिवार ,समाज तथा राजनेताओं पर तीखा व्यंग्य बाण छोड़ता निम्न हाइकु अपनी अभिव्यंजना का सानी नहीं रखता –

  • चुपड़ी रोटी /लूट खाई पराई/मानो न मानो।

समाज में जाति व वर्ग गत भेदभाव का विरोधी कवि मन निम्न हाइकु के माध्यम से बता रहा है की हम सब इन्सान एक समान हैं, कोई भी छोटा या बड़ा नहीं है, भाव की लाक्षणिक अभिव्यक्ति मन को कुछ सोचने के लिए विवश करती है –

  • पाँचों उँगली/सभी एक नाप की /मानो न मानो।

जिस प्रकार वर्मा साहब जी के हाइकु में आपके भावों –अनुभावों की गूँज है उसी प्रकार ताँका व सेदोका में भी उनके अनुभवों का ताप है,तभी तो बर्फ़ का ठंडा शांत–निर्लिप्त टुकड़ा भी मानवी स्पर्श पा द्रवित हो ही जाता है,अर्थात स्नेहिल  सम्बन्धों की ऊष्मा हर शांत-तटस्थ मन को भी पिघला देती है। उदाहरण के रूप में प्रस्तुत है निम्न ताँका –

  • बर्फ़ का ठंडा /टुकड़ा ही क्यों न हो/शांत –निर्लिप्त /मानवी स्पर्श पाके /पिघल ही जाता है।

निम्न ताँका में नदी से प्रेरणा लेकर निरंतर आगे बढ़ कर ही लक्ष्य की प्राप्ति करना,अर्थात् अंतिम मंजिल पाने के लिए संघर्षों से टक्कर लेते हुए गति को ही जीवन की सार्थकता मानते हुए कवि ने लिखा है –

  • नदी बहती /कंकड़ों से जूझती /लक्ष्य पा जाती /क्यों न मैं आगे बढूँ /झंझटों से क्यों डरूँ

अंतिम सृजन खंड में मानवीय सम्वेदना से अभिभूत मन, मानवी अत्याचारों से रूँधी – गूँधी मौन,सहनशील ऊपर से कठोर पर भीतर से कोमल धरती से ही प्रश्न करता है कि बताओ तो –

  • धरती तुम /सतह पर सख्त/अंदर नीर –भरी, /कितने आँसू /रखे सुरक्षित हो /कोई नहीं जानता।

उपर्युक्त सेदोका मानवीकरण का सुंदर उदाहरण होने के साथ ही हर सहृदय मन को अभिभूत करने में पूर्णत: समर्थ है ,मुझे यह लिखने में संकोच नहीं हो रहा कि हमारी जीती –जागती माँ की भाँति यह धरती जितनी ऊपर से शांत,स्थिर व दृढ़ दिखती है भीतर से उतनी ही कोमल व सहृदय है,सदानीरा धरती की पीड़ा उसी की तरह अथाह है , उसके भीतर कितने आँसुओं का समन्दर समाया है हममें से कोई भी नहीं जान सकता, शायद शोषण से आहत की पीड़ा अव्यक्त ही रहती है ! 

निष्कर्षत: मैं इतना ही कहना चाहूँगी कि सम्माननीय डॉ.वर्मा जी का हाइकु संग्रह ‘दहकते पलाश‘आपके अनमोल भाव रंगों का सागर है,चाँदनी रात में जिसकी  तरंगों के साथ जीवन के ज्वार –भाटे के अनुभवों को आपने भरपूर जिया ही नहीं अपितु अपनी काव्य मंजूषा में सम्पूर्ण रूप से परत दर परत सहेज कर रख दिया, यही कारण है कि इस मंजूषा की जो भी परत खुलती है उससे एक कुशल–जागरुक शब्द शिल्पी का संदेश उभर कर आता है। सारांशत: –

  • अनुपम हैं /दहकते पलाश /रंग ही रंग।

-0-

दहकते पलाश’, (हाइकु-संग्रह):डॉ. सुरेन्द्र वर्मा ; प्रकाशक:अयन प्रकाशन – 1/20, महरौली ,नई दिल्ली 110030 ; संस्करण: 2016;  पृष्ठ :104 , मूल्य:220   रुपये

पुष्पा मेहरा , बी-201, सूरजमल विहार , दिल्ली-110092  फ़ोन :011-22166598

pushpa .mehra @gmail .com

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Responses

  1. बेहद सटीक अभिव्यक्ति!!आ.पुष्पा मेहरा जी..
    कितनी बारीकी से आपने पुस्तक के पन्नों पर लेखक द्वारा जिये क्षण क्षण की अनुभूति को परत दर परत खोलकर रख दिया जिससे संग्रह को पढ़ने की पाठकीय उत्सुकता को तो बढ़ावा मिलता ही है वहीं डॉ.वर्मा जी जैसे सिद्धहस्त शब्द शिल्पी का सजीव आकलन कर उनकी शख्सियत की गरिमा में भी चार चाँद लगाकर एक कुशल समीक्षक होने का परिचय दिया….बधाई
    आ.डॉ.सुरेन्द्र वर्मा जी आपको” दहकते पलाश” हाइकु संग्रह हेतु हार्दिक बधाई..

  2. आ. डा० सुरेन्द्र वर्मा जी को उनके हाइकु संग्रह ” दहकते पलाश” हेतु हार्दिक बधाई।
    बेहद सुन्दर बेजोड़ समीक्षा के लिए आ. पुष्पा मेहरा जी आपको बहुत-बहुत बधाई।

  3. दहकते पलाश के समीक्षक ने कवि की रचनाओं की बहुत सुन्दर व्याख्या की है । कवि के भावों और उनकी समाज के प्रति सोच को इतनी सुन्दरता से प्रस्तुत किया है कि पुस्तक पढ़ने की उत्सुक्ता जगा दी ।

  4. एक सिद्धहस्त आलोचक की तरह पुष्पा मेहरा जी ने दहकते पलाश की पुस्तक समीक्षा लिखकर मुझे उपकृत किया है | मैं अविभूत हूँ | उन्हें हार्दिक बधाई | धन्यवाद, आभार |
    -सुरेन्द्र वर्मा |

  5. आदरणीय सुरेंद्र जी दहकते पलाश हाइकु संग्रह के लिए हार्दिक बधाई …आ. पुष्पा जी बहुत शानदार सार्थक समीक्षा हार्दिक बधाई

  6. पुष्पा मेहरा जी ने बहुत ही सुंदर एवं सधे हुए ढंग से आदरणीय सुरेन्द्र वर्मा सर जी के हाइकु-संग्रह ‘दहकते पलाश’ की समीक्षा की है !
    पुष्पा जी एवं आ. सुरेन्द्र सर को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ!!!

    ~सादर
    अनिता ललित

  7. जीवन के विविध रंगों को समेटे हाइकु संग्रह ‘दहकते पलाश’ की बहुत सारगर्भित समीक्षा !
    उत्कृष्ट उद्धरण और उनकी सहज ,सरल व्याख्या पुस्तक की सुन्दर झलक प्रस्तुत करती है |
    आदरणीय डॉ. वर्मा जी एवं पुष्पा दीदी को बहुत-बहुत बधाई ..हार्दिक शुभ कामनाएँ !!

  8. आदरणीय सुरेन्द्र जी को बहुत बहुत बधाई इस पठनीय संग्रह के लिए…|
    आदरणीय पुष्पा जी ने बहुत सारगर्भित समीक्षा करके पाठको के मन में इस संग्रह को पढने की सहज अभिलाषा जाग्रत कर दी…| आपको भी बहुत बधाई…|

  9. मेरी लिखी समीक्षा को प्रकाशित करने हेतु मा. कम्बोज भाई जी का तथा चंद शब्दों को मान देने हेतु आदरेय वर्मा जी ,प्रिय पूर्णिमा जी ,कृष्णा , कमला ,सुनीता ,ज्योत्स्ना,अनीता व प्रियंका जी का हार्दिक आभार |
    पुष्पा मेहरा


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