Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अक्टूबर 17, 2016

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हाइकु रचनाओं का एक भरा-पूरा संसार                                                                  

 डा. सुरेन्द्र वर्मा 

25-2-man-pnchi-sa-215x300-copyसुदर्शन रत्नाकर एक वरिष्ठ रचनाकार हैं ।मुख्यत: एक कहानीकार के रूप में वे जानी जाती हैं । हरियाणा साहित्य अकादमी से उनकी कई कहानियाँ पुरस्कृत हो चुकी हैं। किन्तु कविता की ओर भी सुदर्शन जी का खासा रुझान है । उनके दो हाइकु संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । ‘मन पंछी -सा’ उनका दूसरा हाइकु-संग्रह है ।

     हाइकु बेशक एक कठिन विधा है । इसमें कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक बात कहनी होती है । अपने मन के भावों, विचारों को काव्य-सौष्ठव के साथ तीन पंक्तियों एवं सत्रह वर्णों में कहना सरल नहीं होता । लेकिन यह असंभव भी नहीं है ।  “हाइकु विधा इसका ज्वलंत उदाहरण है”,कहती हैं सुदर्शन जी । श्री रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ से प्रेरणा लेकर सुदर्शन जी1989 से बराबर हाइकु लेखन कर रही हैं , और आज उनकी यह प्रिय विधा बन चुकी है ।

    ऐसा शायद की कोई हाइकुकार हो जिसने प्रकृति को केंद्र में रखकर हाइकु न लिखे हों । सुदर्शन जी भी इसका अपवाद नहीं है । वस्तुत: प्रकृति ही उन्हें हाइकु लेखन के लिए सर्वाधिक प्रेरित करती है ।‘मन पंछी- सा’, संग्रह, की आधे से अधिक रचनाएँ  प्रकृति- आधारित हैं । उनकी प्रकृतिपरक इन रचनाओं में प्रकृति का केवल आलंबन ही नहीं मिलता, बल्कि इनमें प्रतीकों की उपस्थिति  तथा मानवीकरण का उपयोग, रचनाओं को और भी आकर्षक और काव्यगुण संपन्न बनाता है । प्रात:काल को चित्रित करतीं उनकी इन रचनाओं का आस्वादन करें –

*स्वर्ण कलश /सजा आसमान में / भोर हुई तो

*छाई लालिमा / क्षितिज से झांकता / सूर्य निकला

       दिन होता है तो ज़ाहिर है रात भी आएगी ही । सूर्य के अस्त होने का गम रात को भी कोई कम नहीं होता । इसका स्पष्ट सुबूत उसके आँसू है, जिन्हें धरती समेट लेती है । जाड़ों के दिनों में हर कोई अपने अपने घरों के भीतर घुस जाता है, लेकिन ज़रा चाँद को देखिए, बेचारा अकेला खुले आसमान में जागता रहता है और सूर्य की अनुपस्थिति खलने नहीं देता ।

 *रात रोई थी / धरती ने समेटे / उसके आंसू

 *सर्दी की रात / लोग सोए भीतर / चाँद अकेला

प्रकृति के जितने भी सुन्दर रूप हैं कवियित्री के मन को उद्वेलित करते हैं । ओस की बूँदें, कलियों का मुस्कराना, साँझ वेला, हरी दूब का मखमली कालीन, दूध केसर घुला सवेरा, झिलमिलाती धूप, मँडराते बादल, लहरों की अठखेलियाँ और उनका नर्तन, बहते झरने -सभी ने उनकी रचनाओं में सम्मानजनक स्थान प्राप्त किया है ।

* चाँद ने झाँका / बादलों की ओट से / धरा मुस्कराई

* वर्षा की बूँदें / बुलबुले उठते / फूल खिलते

* सावन भादों / आँखों में हैं बादल / भावनाओं के

* मन में बसी / मंजरी की महक / फागुन आया 

फूलों का तो कहना ही क्या है ? मधुमालती, रजनीगन्धा, गुलमोहर, लाल गुलाब, हरसिंगार, कचनार, कमल, मोगरा, चमेली, अमलतास, – अपनी धरती का शायद ही कोई ऐसा फूल बचा हो जिसपर कवि की दृष्टि न पडी हो –

*रजनीगंधा  / रात भर महकी / दिन में सोई

* फूलों के गुच्छे / लटके झूमर से / अमलतास

* चांदनी रात / खिली मधुमालती / दूध केसर

* मधुमालती / बिखरा ज्यों सिंदूर / रजनी माथे

* बहती हवा / हरसिंगार झरे / सजती धरा

* गुलमोहर / आभा है बिखरी ज्यों / स्वर्ण कलश

        प्रकृति के बहाने सुदर्शन जी अपनी रचनाओं में अनेक जीवन सूत्र पिरोने से भी चूकी नहीं है । उनके काव्य में ऊंचे, आसमान छूते,पहाड़- इंसान के पक्के इरादों का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं, तो समुद्र अपने अथाह जल के बावजूद उन्हें प्यासा का प्यासा दिखाई देता है  (तुलना करें उन धनवानों की जिनकी पैसे की तृष्णा कभी मिटती नहीं ) ।पतझड़ के आते ही वृक्ष के पत्ते तक उसका साथ छोड़ देते है  ( बुरे दिनों में भला कौन , किसका साथ देता है! )

*ऊँचे पहाड़ / आसमान छूते / इरादे पक्के

* अथाह जल / अकूत है संपदा / सागर प्यासा

* जग की रीत / पतझड़ के आते ही / रूठे हैं मीत

वस्तुत: ये सारे के सारे जीवन सत्य हैं जिन्हें प्रकृति की सम्वृत्तियों से जोड़ कर कवि ने बखूबी संप्रेषित किया है । कहीं कहीं इसी प्रकार के जीवन-सत्यों को सुदर्शन जी साफ़ साफ़ शब्दों में भी स्पष्ट करती दिखाई देती हैं  । क्या अजीब विडम्बना है कि मनुष्य जीवन भर खुशियों के पीछे भागता फिरता है, और वे खुशियाँ जो उसके आसपास ही बिखरी पडी हैं, उनकी ओर उसका ध्यान ही नहीं जाता । वह आसमान में उड़ता है और ज़मीन को अनदेखा कर देता है । जब कि आवश्यकता इसकी है कि बेशक हम ऊपर भले ही देखें किन्तु नीचे धरती पर भी अपनी निगाहें  टिकाए रखें ।किस्मत का मारा बेचारा इंसान हमेशा एक तनाव में, एक कशमकश में जीता है  –

* उड़ते रहो / आसमान में ऊँचे / नज़रें नीचे

* भागती रही / खुशियों के पीछे / वे सामने थीं

* कशमकश / जीवन में चलती / ना कोई अंत

       मनुष्य भारी तनाव में जीता है । यह तनाव एक आतंरिक कशमश है । हम सामाजिक प्राणी हैं लेकिन भीड़ में अकेलापन महसूस करते हैं । जब अकेले होते हैं तो शिकायत करते हैं कि कोई साथ नहीं देता । अपनापन ढूँढ़ते हैं और जब वह नहीं मिलता तो बेहद अकेलापन अनुभव रते हैं ।

*दर्द अकेला / किसे सुनाएँ  दास्ताँ /सभी हैं व्यस्त

* अपना साया / साथ नहीं निभाता / वाह विधाता

* कुछ न कहो / सह कर तो देखो / एकाकीपन

* अपनापन  / ढूँढा बहुत, मिला / एकाकीपन

* बहुत ढूँढा / अपनों की भीड़ में / अपनापन

        वस्तुत: मन को किसी तरह चैन नहीं है। वह चंचल है। उसकी फितरत में ही ठहराव नहीं है।भटकते बादल की तरह, भंवरे की तरह, उसका स्वभाव है ।

*मन हो जैसे / भटकता बादल / उड़ता यों ही

* मिटती नहीं / विष्णाएँ  भीतर की / मन भंवरा

       यों तो हमारा मन बाहर से बड़ा चंचल और अस्थिर सा प्रतीत होता है लेकिन यही मन हमारे गहरे दुःख और सुख के अनुभवों को सहेज कर भी खूब रखता है – वर्षों तक और कभी कभी आजीवन तक । हम भूलना चाहें तो भी भूल नहीं पाते । हमें हमारी यादें दुलराती भी हैं और कचोटती भी हैं –

बड़ा गहरा / यादों का भँवर / निकलूँ कैसे

परछइयां / पीछा नहीं छोड़तीं / तेरी यादों की 

और यदि आप कहीं परदेस में हैं तब तो – “ रुला जाती है / बड़ी याद आती है / माटी देश की !

          दुःख दर्द का रिश्ता, बड़ा और अटूट होता है ।  जो हमारे दुःख-दर्द में साथ देता है उसी से हमारा निकटतम सम्बन्ध बना रहता है । लेकिन स्वयं दर्द कितना ही गहरा क्यों न हो वह अनचाहे अतिथियों की तरह आता है और चला जाता हैं । सुदर्शन जी की रचनाएँ  इसी बात को तो दुहरा रही हैं

*सबसे बड़ा / दुःख दर्द का रिश्ता / अटूट होता

* दुःख दर्द हैं / अनचाहे अतिथि / चले जाएँगे

      कुछ रिश्ते बनाए जाते हैं, कुछ बने बनाए मिलते हैं । मित्र बनाए जाते हैं , लेकिन माता पिता का रिश्ता एक ऐसा-सा रिश्ता है जो हमें बनाना नहीं पड़ता । यह नि:स्वार्थ प्रेम का एक ऐसा अनूठा रिश्ता है जिसकी कोई सानी नहीं । –

*पिता के कंधे / कितने मज़बूत / झूला झुलाएँ

*वट का पेड़ / सुखद ठंडी छाँव / पिता का साथ

* धरा सहती / उफ़ नहीं करती / वैसी माँ होती

* मेरी बिटिया / देवों का उपहार / सुखी संसार

     सुदर्शन रत्नाकर के हाइकु-संग्रह में हमें एक भरा पूरा संसार मिलता है । यहाँ प्रकृति की छटा भी है और समाज की निकटता भी ; रिश्तों का दुःख-दर्द है, और एकाकीपन की रिक्तता भी ; यादों का अटूट सिलसिला है तो भटकता हुआ एक भावुक मन भी है काव्य प्रतिभा की सराहना करते हुए मैं “मन पंछी सा” के साहित्य समाज में स्वागत की कामना करता हूँ ।

-0-

पुस्तक- समीक्षा – “मन पंछी सा”, (हाइकु –संग्रह,) सुदर्शन रत्नाकर, अयन प्रकाशन, 1/20 महरौली ,नई-दिल्ली-110030 संस्करण: 2016 ; पृष्ठ-98;मूल्य रु. २००/ -)

-डा. सुरेन्द्र वर्मा -१० / १ सर्कुलर रोड , इलाहाबाद – २११००१

मो. ९६२१२२२७७८ 

 

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Responses

  1. मन पंछी सा हाइकु संग्रह के लिए सुदर्शन रत्नागर जी को बहुत-बहुत बधाई । आ. सुरेन्द्र भाई की समीक्षा सदा की तरह बहुत सुंदर व सटीक है ।आपको बधाई ।

  2. आदरणीया सुदर्शन रत्नाकर जी को हाइकु संग्रह के लिए हार्दिक बधाई! डाॅ. सुरेन्द्र वर्मा जी को सारगर्भित समीक्षा के लिए साधुवाद!

  3. हमेशा की तरह बहुत ही मनभावन हाइकु समीक्षा डाॅ सुरेंद वर्मा की
    सुदर्शन रत्नाकर जी बहुत ही सुंदर शीर्षक रचा है- “मन पंछी सा ”
    वाह सही कहा-
    अथाह जल
    अकूत है संपदा
    सागर प्यासा ।
    और यह बिंब भी सच ग़ज़ब
    कशमकश
    जीवन में चलती
    ना कोई अंत ।
    सुदर्शन रत्नाकर जी बधाई व ढेरों शुभकामनाएँ

  4. सुन्दर पुस्तक की बहुत सुन्दर समीक्षा …आदरणीया सुदर्शन दीदी एवं आदरणीय डॉ. सुरेन्द्र वर्मा जी को हार्दिक बधाई !

  5. ‘ मन पंछी सा ‘ हाइकु संग्रह हेतु सुदर्शन जी को तथा सुंदर समीक्षा हेतु आदरेय वर्मा जी को हार्दिक बधाई |
    पुष्पा मेहरा

  6. बहुत सुंदर समीक्षा आ. सुरेन्द्र सर के द्वारा और जब संग्रह की लेखिका आ. सुदर्शन रत्नाकर दीदी हों तो फिर बात ही क्या !
    आप दोनों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ !!!

    ~सादर
    अनिता ललित

  7. “मन पंछी सा” बहुत सुन्दर हाइकु संग्रह के लिए सुदर्शन रत्नाकर जी तथा उम्दा समीक्षा के लिए आ. सुरेन्द्र वर्मा जी को बहुत बधाई!

  8. मन पछी- सा पुस्तक ले लिए आदरणीया सुदर्शना जी को हार्दिक बधाई ….सार्थक समीक्षा के लिए आदरणीय सुरेंद्र जी को हार्दिक बधाई .

  9. सुन्दर पुस्तक की बहुत सुन्दर समीक्षा …आदरणीया सुदर्शन जीएवं आदरणीय डॉ. सुरेन्द्र वर्मा जी को हार्दिक बधाई !!!

  10. बहुत सार्थक समीक्षा है…| आदरणीय सुदर्शन जी और सुरेन्द्र वर्मा जी को हार्दिक बधाई…|


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