Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 27, 2016

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डॉ सरस्वती माथुर

1

कठिन रास्ता 
मिली जब मंज़िल

सुगम हुआ।
2
भूली है रस्ता
बाँस- झुरमुट में 
पगली हवा ।
3.
मंज़िल मिली 
आशाओं के अंकुर
फूटने लगे।
4
गाँवों का रास्ता 
शहर जो पहुँचा, 
कहाँ खो गया ?
5
मंज़िल दूर 
पथ मिल जाए तो 
लौटना नहीं।

5

आदि ना अंत 
समय गतिमान 
बहे अनंत ।
6
बेलगाम है 
समय का घोड़ा भी
रुकता कहाँ !
7
मन -सुमन 
समय की तितली 
हाथ ना आए । 

-0-

2-प्रदीप कुमार दाश ‘दीपक’
1
झरे निर्झर
गाते वे झर-झर
गिरि गौरव ।
2
लिखा माँ नाम
कलम बोल उठी
है चारों धाम ।
3
धान के फूल
खिले देख मुस्काए
खुश किसान ।
4
ऊषा सुंदरी
स्वच्छ जल में निज
देखती छवि ।
5
झरते पत्ते
गीत गाते विदा के
सच रो पड़े ।
-0-साँकरा, जिला- रायगढ़ (छ.ग.)
मोबा 7828104111

-0-

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Responses

  1. बेलगाम है
    समय का घोड़ा भी
    रुकता कहाँ !
    सरस्वती जी सभी हाइकु बहुत सुंदर हार्दिक बधाई

    लिखा माँ नाम
    कलम बोल उठी
    है चारों धाम ।
    प्रदीप जी सभी सार्थक भावपूर्ण हार्दिक बधाई

  2. बेलगाम है
    समय का घोड़ा भी
    रुकता कहाँ !
    बहुत सुन्दर…बधाई…|

    झरते पत्ते
    गीत गाते विदा के
    सच रो पड़े ।
    बेहतरीन…मेरी बधाई…|

  3. Bahut sundar !

  4. सुंदर हाइकु – प्रदीप जी को बधाई।
    मेरे हाइकु प्रकाशित करने के लिये संपादक द्वय का बहुत बहुत आभार ।

  5. विविध भाव भरे बहुत ही सुन्दर हाइकु …डॉ. सरस्वती माथुर जी एवं प्रदीप कुमार दाश ‘दीपक’ जी को हार्दिक बधाई


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