Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जुलाई 3, 2016

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डॉ राजीव गोयल
1

तोड़ लेता मैं
रोज़ ही प्रकृति से
एक कविता

2

खड़ा पलाश
ले कर सर पर
आग का घड़ा

3

चीखे चिल्ला
फँ
स कर बाँसों में
आवारा हवा

4

कोहरा आया
सुबह से सूरज
बन्दी बनाया

5

घरों से आई
रोटियों की सुगंध
साँझ की बेला

6

लाया बसंत
हर वृक्ष के वास्ते
नई पौशाक

7

बारिश पड़ी
उठा धरा घूँघट
झाँका अंकुर

8

बन के काल
आया है जंगल में
ड़हारा

9

वर्षा जो गिरी
पेड़ों पर लटकीं
बूँ
दों की लड़ी

10

आई शहर
गाँव की पगडण्डी
हस्ती ही खो दी। गुम हो गई

11

लाँघी है सीमा
जब जब नदी ने
आया सैलाब

12

चाँद बहा
चाँदनी की नदिया
रात नहा

13

जीतके हारी
सिंधु से मिल नदी
हो गई खारी

-0-

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Responses

  1. Lajwab haiku

  2. राजीव गोयल जी विविधता पूर्ण हाइकु।वाह।

  3. राजीव जी सुन्दर प्रकृति दर्शन है आपके हाइकु में बधाई हो |

  4. aik se badhkar aik haiku

    चाँद बहाए
    चाँदनी की नदिया
    रात नहाए

    जीतके हारी
    सिंधु से मिल नदी
    हो गई खारी
    ati sundar …
    prakrati ki anuthee khoobsurtee darshanen ke liye haardik badhai …..

  5. धन्यवाद दोस्तों

  6. bahut achhe lage haiku bahut bahut badhai…

  7. सभी हाइकु बहुत अच्छे हैं, पर यह बहुत अच्छा लगा…|
    तोड़ लेता मैं
    रोज़ ही प्रकृति से
    एक कविता ।
    हार्दिक बधाई…|


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