Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 21, 2016

1620


 माटी की नाव: क्षण भंगुर जीवन की यही कथा है

डा.सुरेंद्र वर्मा

माटी की नाव कागज़ की नावहिन्दी में एक प्रचलित मुहावरा है. कागज़ की नाव ज्यादह देर तक तैर नहीं सकती. कागज़ गल जाता है और नाव पानी में डूब जाती है. रामेश्वर काम्बोज हिमांशुने अपने हाइकु संग्रह का नाम माटी की नाव’ (पृष्ठ;120 मूल्य-220 रुपये , संस्करण-2013,अयन प्रकाशन,1/ 20 , महरौली नई दिल्ली-110030 2013, पृष्ठ;120 मूल्य-220 रुपये) रखकर एक नया मुहावरा गढ़ा है. और इसलिए इस संग्रह  के 680 हाइकु  पढ़ते हुए पाठक का ध्यान सबसे पहले संग्रह के शीर्षक पर ही जाता है. आखिर कवि माटी की नावजैसे पदबंध से क्या कहना चाहता है?

सामान्यत: भारत में यह प्रथा है कि किसी भी काम की शुरूआत हम अपने आराध्य देव का स्मरण करके करते हैं. कोई माता सरस्वती का स्मरण करता है, तो कोई राम और / या कृष्ण को याद करता है. कोई सीधे-सीधे प्रभु / ईश्वर का ही नाम लेता है. लेकिन यह ध्यान देने की बात है कि रामेश्वर जी धरती माता की याद करते हैं. वह धरती को वसुंधरा, विश्वम्भरा, प्राणदायिनी, सुमनरूपा, मधुजा, शस्यश्यामला, माँ  मेदिनी आदि कहकर संबोधित करते हैं और उसके स्नेह निर्झर की कामना करते हैं. लघुकथाकार और हाइकुकार पारस दासोत जिनका हाल ही में असमय निधन हो गया है, भी अपने एक हाइकु संग्रह, ‘आ..गाँव चलेंमें पुस्तक के आरम्भ में अपनी धरती को ही नमन करते हैं. – ‘प्यारी से प्यारी / माँ  ..गाँव की माटी माँ  /तुझे नमन”. धरती के पास सिर्फ माटी ही तो है. और यही माटी उसे माँ  बना देती है.

बच्चन ने अपना परिचय देते हुए एक जगह लिखा है, ‘मिट्टी का तन, मस्ती का मन क्षण भर जीवन मेरा परिचयहम सभी माटी के ही तो बने हैं. माटी नए नए रूप धरती है और अंतत: ये सभी माटी में ही समा जाते हैं. माटी हमें हमारे जीवन की क्षणभंगुरता की और संकेत करती है. जीवन की इसी क्षणभंगुर नौका को लेकर हमें भवसागर पार करना है. यह सोच सोच कर कवि काम्बोज का मन काँप काँप जाता है.

दूर है गाँव /तैरनी है नदिया /माटी की नाव ।

गहरा जल /तूफ़ान है उमड़ा/काँपता मन।

अंतत: माटी को घुल कर जल समाधि ले ही लेनी है. ऐसे अंत को कोई रोक नहीं सकता.

घुली है माटी /ली है जल समाधि/खो गयी नाव ।

हमारे क्षण भंगुर जीवन की यही कथा है.

डा. सुधा गुप्ता ने माटी की नावको जीवन का ककहराठीक ही कहा है. इसमें जीवन के विविध रूपों का काव्यात्मक निरूपण हुआ है. इसमें जहां प्रकृति के म्लान-अम्लान, सोम्य-रौद्र रूप हैं वहीं चिड़ियों का कलरव है, नियाग्रा फाल है और फूलों की गंध-सुगंध भी है. इसमें जहां अनुरागी मन है, वहीं सुधियों की ज्योति भी है. रिश्तों की एक पूरी दुनिया है. बहिन और माँ  का प्यार है, तो भाल पर बिंदिया सजाए पत्नी का सौभाग्य भी है. रिश्ते खून के ही नहीं, मित्रता और दोस्ती के सम्बन्ध भी हैं. माटी की नाव के अंतर्गत आशा निराशा से खेलता मानव मन है तो बुझी हुई उमंगें भी हैं. मन आँगन भले ही डूबता उतराता रहे कवि का उदात्त भावनाओं से लहलहाता एक सकारात्मक सोच बराबर बना रहता है.

वनस्पति जगत मुख्यत: अपने पुष्प-पत्रों से जाना जाता है, हर मौसम के अपने फूल हैं और अपने ही पत्ते होते हैं. होली के आसपास पलाश के सारे पत्ते झर जाते हैं और पेड़ लाल पुष्पों से लद जाता है. होली रंगों का त्यौहार है और एक दूसरे पर रंग-जल डाल कर खेला जाता है. लेकिन पलाश को देखिए. कवि कल्पना कहती है

आग की पाग/बाँध कर पलाश/खेलता फाग ।

सुबह होती है और सूर्य धीरे धीरे धरती पर उतरता है. ज़रा इसकी उतरने की उतावली तो देखिए

चढी छत पे/छज्जे उतरी धूप/गिरी घास पे ।

जो लोग पहाड़ पर या ठण्डे मौसम में रहते हैं उनके लिए धूप नियामत है. जब,

            धरती ओढ़े/पूरे बदन पर/बर्फ की शाल (तब)

धूप का रूप/गुनगुना लगता है/हिमपात में ।

धूप निकलते ही हिमपात का बर्फ उड़ने लगता है. कवि कहता है,

निकली धूप/उडी हिम-चिड़ियाँ/आँगन गीला ।

धूप आवारा /घुमक्कड़ी करती /हाथ न आए ।

खेले है धूप /कोहरे के कुञ्ज में /आँख मिचौली ।

धूप बिटिया/खेले आँख-मिचौली/हाथ न आए ।

सर्दी की धूप/गोदी में आ बैठी/नन्ही शिशु सी ।

पल में उड़ी/चंचल तितली –सी/फूलों को चूम ।

धूप के ही नहीं, सुबह, शाम के वे चित्र भी जो हिमांशुजी की कलम से उतरे हैं, इतने ही मन भावन हैं. भोर की लाली में वह अपनी प्रियतमा की आँखों में आशा की लाली देखते हैं और साँझ गए, सूर्य अपने मेंहदी रचे पाँव (रजनी के) द्वार पर रखता है.

तिरे नैनों में/आशा की रंगत ले/भोर की लाली।

भोर के होंठ/खुले तो ऐसा लगा-/तुम मुस्कराए ।

नभ अधर/हुए जो मुकुलित/उषा पधारी ।

संझा जो आए/मेंहदी रचे पाँव/द्वार लगाए ।

पाखी चहके/नभ हुआ मुखर/संध्या वंदन ।

मानव मन को छूतीं इस प्रकार की उत्तंग, उदात्त कल्पनाएँ काम्बोज जी के काव्य में बिखरी पड़ी हैं. किन्तु प्रकृति का रौद्र रूप भी अनदेखा नहीं रहा है. सुनामी और भूकम्प जैसी संघटनाएँ  प्रलय रूप हैं और हाहाकार मचा देती हैं. गरमी की लू-लपट तक कभी कभी जानलेवा हो जाती है.

निगल गई/अजगर-लहरें/उगता सूर्य ।

अचानक ही/डूबे कई सूर्य/कुछ पल में।

हुए लापता/कलेजे के टुकड़े/कम्पित धरा ।

नदी सी बहें/लू लपटें लपेटे/छाँव झुलसे ।

यह तो बात रही प्रकृति के अपने नैसर्गिक रौद्र रूप की जिसमें मनुष्य को चकित/ भ्रमित किया है, लेकिन मनुष्य ने भी अपने स्वार्थ के चलते प्रकृति को कोई कम नहीं रौंधा है.

काट ही डाला/छतनार पाकड़/उगी कोठियाँ।

पेड़ निष्प्राण/सीमेंट के जंगल/उगे कुरूप ।

हाइकु काव्य को प्रकृति और प्रेम का काव्य माना गया है. काम्बोज जी के अनुरागी मन ने भी अपनी हाइकु रचनाओं में प्रेम को खासी वरीयता दी है.

झुके नयन/झील में झिलमिल/नील गगन ।

तुम अभागे/हम मिले अभागे/तो भाग जागे ।

तुम्हारा रूप/निद्रित शिशु हो या/सर्दी की धूप।

साँस कातके/है बुननी चादर/नई नकोर ।

बरसों बाद/तुम मिल गए तो/सवेरा हुआ।

भीगा है मन/सुरभित जीवन/तुम चन्दन।

मोम– सा मन/आँच मिली किसी की/पिघल गया ।

मन-बाँसुरी/जितना दर्द भरे/उतनी बजे.।

इत्यादि, हाइकु कवि के अनुरागी मन के सहज प्रमाण हैं. यादों में भी काम्बोज जी ने अपने अनुरागी क्षणों को ही सहेज रखा है. क्षण की अनुभूति तो क्षणभंगुर है. अनुभूति के बाद वह पल तो विदा हो जाता है लेकिन यादें उसे टेरती रहती हैं. ठीक ऐसे ही जैसे हम विदा होते अपने किसी प्रिय जन को अपना रूमाल हिला कर प्रेम व्यक्त करते रहते हैं. हम अपनी स्मृतियों को दबा नहीं सकते. वे आवारा हैं, दबे पाँव आती हैं. वे हमारे मनके शजर से लताओं की तरह लिपटी रहती हैं, कसमसाती रहतीं हैं, और सबसे बड़ी बात यह कि मन के किसी भी कोने में प्रकाश की तरह वे आबाद रहती हैं.

 रहीं/हिलते रूमाल सी/व्याकुल यादें।

बँधती नहीं/कभी किसी पाश में /आवारा यादें।

आहट आई/आँगन में यादों की/दुबके पाँव ।

गीली सुधियाँ/लताओं से लिपटी/उर-तरु से।

छोड़ न पाएँ/दो पल भी तरु को/कसमसाएँ ।

तुम्हारी याद/अँधेरे में दीप-सी/रही आबाद ।

प्रेम का अर्थ ही है दूसरों के लिए हमारा कंसर्न’, हमारी चिंता. प्रेम से ही पराए अपने बन जाते हैं. खून का रिश्ता तो अपना है ही, लेकिन जो खून का रिश्ता नहीं भी है वह मित्रता में बदल जाता और मित्रता कभी कभी खून के रिश्तों से भी बड़ी हो जाती है. रामेश्वर कामबोज हिमांशु अपना प्रेम सभी को बाँटते हैं. बहन का प्यार, पत्नी/प्रेमिका का प्यार, माँ  का प्यार और इन खून के रिश्तों से अलग दोस्ती का विश्वास और प्रेम. सभी बहुमूल्य हैं. प्रेम एक ऐसी भावना है जिसका

शब्दार्थ गंध/रचे नवल छंद/प्राणों में बसे ।

कच्चे हैं धागे/है प्रेम गाँठ पक्की/खुले न कभी।

कवि वैदिक प्रार्थना, सर्वे भवन्तु सुखिन:, की तरह कामना करता है,

सब हों सुखी/प्यार की वर्षा से हो/आँगन हरा।

बहना मेरी/है नदिया की धारा/भाई किनारा ।

मान सिंदूर/भाल पर बिंदिया/आँखों में चाँद।

माँ की याद/ज्यों मंदिर में जोत/जलती रहे ।

दोस्ती का रिश्ता तो सबसे अलग ही तरह का रिश्ता है. न तो यह रक्त-सम्बन्ध है और न ही यह कोई कानूनी अनुबंध है. पूरी तरह प्रेम / विश्वास पर टिका यह सम्बन्ध वस्तुत: एक अनोखा ही सम्बन्ध है. खून के रिश्ते तो प्राय: खून के आँसू रुलाते हैं लेकिन

कोई न नाम/इतना रहा ऊँचा /दोस्ती है जैसा।

               न अनुबंध/न हिसाब किताब/मैत्री सम्बन्ध।

रामेश्वर काम्बोज हिमांशुसकारात्मक सोच के कवि हैं. आशावादी हैं. बेशक जीवन में उतार-चढाव आते हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं की हम सदा के लिए मुँह फुला कर बैठ जाएँ ,चुप. बैठ जाना किसी समस्या का कोई हल नहीं है

                न इनायत/न कोई शिकायत/चुप्पी ने मारा।

चुप से अच्छा/नफ़रत ही करो/दो बातें कहो ।

बात तो करनी ही पड़ेगी. हाँ, अपने आँसुओं को ज़रूर बचा कर रखना होगा –

            धोना पड़े जो/कभी मन आँगन/आँसू बचाना।

              तरल करें/जब जब भी बहें/दर्द के आँसू।

कवि का परामर्श है कि तूफ़ान भी आएँ तो भी सर न झुकाएँ. उदास होने की कोई आवश्यकता नहीं है. रात में भी किसी न किसी रूप में रोशनी साथ रहती है

तूफ़ान आएँ/नहीं सर झुकाएँ/रोशनी लाएँ

न हो उदास/संग चाँद औतारे/होगा ही प्रात:।

रामेश्वर जी हालाँकि इस बात से सहमत दिखाई देते हैं कि हाइकु काव्य का मुख्य आग्रह प्रकृति और प्रेम पर है किन्तु वह यह भी जानते हैं की कवि अपने सामाजिक सरोकारों और वस्तुस्थितियों से जिनसे उसकी मुठभेड़ प्रतिदिन होती ही रहती है, मुंह नहीं मोड़ सकता. एक हाइकुकार भी ऐसा नहीं कर सकता. आखिर हाइकुकार भी समाज का ही एक अंग है. वह अनावश्यक रूप से हाइकु और सेंर्यु में भेद नहीं करते. उनके हाइकु जिनमें स्पष्ट: सामाजिक सन्दर्भ है, इसके प्रमाण हैं. वह अपने समाज की स्थिति को देखकर व्यथित होते हैं. –‘चौराहों पर / घूमता साँडजैसा / बेख़ौफ़ डरउन्हें भी डराता है. फूँस का घर / या कि घूस का घर / भक से जलतादेख उन्हें भी निराशा और अप्रसन्नता होती है और वह इसे बेलाग अपनी हाइकु रचनाओं में अभिव्यक्ति देते हैं. उनके यहाँ कोई भी विषय हाइकु रचनाओं के लिए वर्जित नहीं प्रतीत होता. मुझे प्रसन्न्ता है कि उन्हें इन रचनाओं में हास्य और व्यंग्य परोसने में भी मज़ा आता है. कुछ छुटभइयों की स्थिति का जायज़ा लेते हुए वह कहते हैं,

न बने मूँछ/कुछ तो बनाना था/बने हैं पूँछ।

-0-

डा.सुरेंद्र वर्मा

10, एच आई जी /1,सर्कुलर रोड इलाहाबाद -211001

मो. 96९६२१२२२७७८ ब्लॉग – surendraverma389.blogspot.in

 

Advertisements

Responses

  1. आदरणीय डॉ. वर्मा द्वारा लिखी गयी सुन्दर समीक्षा!
    कम्बोज सर बहुत-बहुत बधाई!!

  2. सुन्दर समीक्षा ! बहुत-बहुत बधाई!!

  3. वाह एक तो काम्बोज भैया के लाजवाब हाईकु उस पर आदरणीय सुरेन्द्र वर्मा जी की समीक्षा ये माटी की नाव तो मस्त दौड़ने लगी। किस किस हाइकू का उदाहरण दूँ। सभी एक से बढ़ कर एक है । भैया को हार्दिक बधाई । ☺

  4. कम्बोज भाई को माटी की नाव जैसी सुन्दर कृति के लिये और डॉ वर्मा जी को उसकी इतनी उत्तम समीक्षा करने के लिए हार्दिक बधाई ।

  5. ‘माटी की नाव ‘ की सार्थक समीक्षा के लिए आ.सुरेन्द्र वर्मा जी व सुंदर हाइकु संग्रह के लिए काम्बोज भाई को अनेकानेक बधाई । बहुत सुंदर , सटीक समीक्षा की है । बहुत उम्दा, भावपूर्ण हाइकु पढ़ने को मिले । बधाई ।

  6. बहुत सुंदर शीर्षक ” माटी की नाव “-एक संग्रहणीय हाइकु की पुस्तक -हर इाइकु लाजवाब … …स्नेही हिमांशु भाई को ह्रदय से बधाई।
    डाँ सुरेन्द्र वर्मा जी ने बहुत ही सुंदर, सटीक भावपूर्ण समीक्षा की …हार्दिक बधाई।

  7. “माटी की नाव” हाइकु संग्रह की गूढ़, गम्भीर बेहद सुन्दर समीक्षा के लिए डा० सुरेन्द वर्मा जी तथा बेहतरीन हाइकु रचयिता भाई काम्बोज जी को मेरी हार्दिक बधाई।

  8. सुंदर सारगर्भित संग्रह हेतु काम्बोज भाई जी को बधाई व दिए गये हाइकु के शब्द -शब्द की विस्तृत -गूढ़ समीक्षा हेतु माननीय सुरेन्द्र भाई जी की जितनी भी प्रशंसा की जाय कम है आपके द्वारा की गयी हर समीक्षा गहरे में पैठ कर मोती निकाल लाती है |

    पुष्पा मेहरा

  9. Mati ki naav bahut sundr krti hai verma ji ne kamal ki samiksha likhi hai unko hardik badhai,,,,kamboj ji ne to haiku likhne men bahut gahri soch ka parichya diya hi hai,,,,

  10. भाई रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ने अपने हाइकु संग्रह ‘ ‘माटी की नाव’ ‘ में अपनी संवेदनाओं की रूह से हाइकु में मानव जीवन का , प्रकृति के बहुरूपात्मक छवियों का , सामाजिक सरोकार और मानवीय रिश्ते जो प्रेम पर टिके हैं का सत्य उदघाटित किया है . . ‘ ‘माटी की नाव’ ‘ में कल्पना की उड़ाने विश्व साहित्य जगत में अपना परचम लहराएगी .

    प्रतिभा – संपन्न माननीय सुरेन्द्र भाई जी की ‘ ‘माटी की नाव’ ‘ में विस्तृत -गूढ़ , बारीकियों को समझकर की गई समीक्षा ने पुस्तक को सत्यं – शिवं – सुन्दरम् – सा पूर्ण वैभव , साहित्यिक सौन्दर्य दिया है .
    आप दोनों को हार्दिक बधाई .

  11. कम्बोज जी भाई साहब को माटी की नाव के लिए तथा डॉ.सुरेन्दर वर्मा जी को इतनी सुन्दर समीक्षा हेतु बहुत बहुत बधाई ।

  12. काम्बोज जी आप की ‘माटी की नाव’ पुस्तक की समीक्षा और उसमें उदाहरण स्वरूप दिये गये हाइकुयों पर पन्ने के पन्ने लिखे जा सकते हैं । गहरी अनुभूतियों से लिखी गई पुस्तक और उसकी समीक्षा काबिले तारीफ है ।आप दोनों को हार्दिक बधाई , शुभकामनायें ।

  13. हिमांशुजी जी के हाइकु तो हैं ही लाजवाब साथ ही सुरेन्द्र वर्मा जी की समीक्षा भी बहुत सुन्दर है |आप दोनों को हार्दिक बधाई , शुभकामनायें ।

  14. बहुत सुन्दर, सारगर्भित और सार्थक समीक्षा लिखी है सुरेन्द्र जी ने…| इतनी अच्छी समीक्षा के लिए हार्दिक बधाई…|


रचनाओं से सम्बन्धित आपकी सार्थक टिप्पणियों का स्वागत है । ब्लॉग के विषय में कोई जानकारी या सूचना देने या प्राप्त करने के लिए टिप्पणी के स्थान पर पोस्ट न करके इनमें से किसी भी पते पर मेल कर सकते हैं- hindihaiku@ gmail.com अथवा rdkamboj49@gmail.com.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

श्रेणी

%d bloggers like this: