Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 9, 2016

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डा. सुरेन्द्र वर्मा 

 1

माता का साया 

‘सब ठीक हो जाएगा’ 

कहाँ खो गया ।

2

माता की चिंता

‘खाना क्यों नहीं खाया’ 

भूख जगाती 

3

माता क्या गई 

आँगन ही खो गया 

घर न रहा 

4

कैसी भी चोट 

रहम लगाता 

माता का स्पर्श 

5

माता का प्यार 

‘हार मत मानना’ 

हौसला देता 

6

ज्ञान बढाते 

अनुभव में पगे 

माता के बोल 

-0-

2- सुनीता अग्रवाल 

माँ जल जैसी

मिले जा जो पात्र

ढलती वैसी ।

2

पंख ही नहीं

दिशा व हिम्मत भी

माँ ने ही दि

3

पूत ,कपूत

जो थे  नयनतारे

मैया दुलारे ।

4

भव्य बँगला

खोजती  विधवा माँ

अपना कोना ।

5

भीषण सूखा

सूखा  ना पाई धूप

ममत्व धार।
-0-

3-डॉ सरस्वती माथुर

1

माँ का मन

अथाह सागर_ सा

हम नदी से ।

2

माँ धूप बन

जीवन सूरज से

तम हरती।

3

जननी  है  तू

आँगन वन तेरा

हम हैं छौंने।

4

माँ की लोरियाँ

गूँजें मन आँगन

घोलें मिठास।

-0-

 4-अशोक आनन

1

फिर उकेरे

धूप ने पसीने के

चित्र देह पे।

2

ग्रीष्म का भाड़

 भुने जड चेतन

चारा न कोई ।

3

सजाए बैठा

प्रतिष्ठान धूप का

अपना सूर्य।

4

नावों की पीडा

चुभे पाँवों में रेत

अंगार दिन ।

-0-                      

 

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Responses

  1. सरे हाइकु बहुत प्यारे हैं … विधवा माँ का अपने लिए कोना खोजना , बहुत मार्मिक ..मन को कचोट गया |

    भव्य बँगला
    खोजती विधवा माँ
    अपना कोना ।

    रचनाकार की संवेदनशीलता को नमन

  2. डॉ सुरेन्द्र जी ,सुनीता जी ,सरस्वती जी और अशोक जी सभी के द्वारा रचे माँ पर अपने अपने भावों से सजे सुन्दर और कुछ मार्मिक हाइकू पढ़ने को मिले हार्दिक बधाई।

  3. सुरेन्द्र जी आप का हर हाइकु माँ के प्यार की छबि अंकित करता लघु नाटिका का आनंद दे गया ।बधाई । सुनीता जी माँ की महिमा गाते बहुत सुन्दर हाइकु लगें ।यह वाला तो माँ की दारुण कथा कह गया …भव्य बँगला / खोजती विधवा माँ /अपना कोना । हार्दिक बधाई ।
    सरस्वती जी आप की माँ की लोरी मन का आँगन गुँजा गई । बाकी भी बहुत सुन्दर हैं ।आपको भी बधाई । अशोक जी आप के हाइकु नये बिम्ब लेके आये ।शुभ कामनायें और बधाई ।
    मैं तो यह कहूँगी … माँ क्या बनाई / बिधाता तू ही आया / लुटाने प्यार ।

  4. आदरणीय वर्मा जी ,आदरणीया सरस्वती दी के हाईकु तो सदैव ही मन को छु जाते है ।और विषय जब माँ हो तो कहना ही क्या एक से बढ़ कर एक बिम्ब एवं भाव उभर के सामने आये है अशोक आनन् जी ने भी नए बिम्ब के साथ सुन्दर हाइकु रचे है अ
    सभी को बधाई ।
    माता की चिंता
    ‘खाना क्यों नहीं खाया’
    भूख जगाती
    3
    माता क्या गई
    आँगन ही खो गया
    घर न रहा

    जननी है तू
    आँगन वन तेरा
    हम हैं छौंने।
    4
    माँ की लोरियाँ
    गूँजें मन आँगन
    घोलें
    फिर उकेरे
    धूप ने पसीने के
    चित्र देह पे।
    मेरी रचना को स्थान देने हेतु कंबोज भैया एवं दीदी का हार्दिक आभार एवं आप सभी के प्रोत्साहन पूर्ण कमेंट के लिए आभार दिल से ☺

  5. आदरणीय सुरेन्द्र जी ,सुनीता जी ,सरस्वती जी और अशोक जी सभी के हाइकू सुन्दर औरजीवन के यथार्थ में पगे… मार्मिक !
    1
    माता की चिंता
    ‘खाना क्यों नहीं खाया’
    भूख जगाती
    2
    भव्य बँगला
    खोजती विधवा माँ
    अपना कोना ।
    3
    जननी है तू
    आँगन वन तेरा
    हम हैं छौंने।
    4
    नावों की पीडा
    चुभे पाँवों में रेत
    अंगार दिन
    शुभ कामनायें और बधाई ।
    -0-

  6. आदरणीय वर्मा जी ,आदरणीया सरस्वती जी के माँ के लाजवाब हाईकु तो माँ दिवस की गरिमा बढा रहे हैं अशोक जी गर्मी रोष यथार्थ लगा रहा है
    बधाई .

  7. माँ पर गढ़े बेहतरीन हाइकु आ० सुरेन्द्र वर्मा जी, सुनीता जी, सरस्वती जी एवं अशोक जी को हार्दिक बधाई।

  8. ma par sunder hai ku sunita ji surendra ji saraswati ji ashok ji bahut bahut badhai
    rachana

  9. संवेदनशील…सारगर्भित हाइकु के लिए आप सभी को बधाई…|


रचनाओं से सम्बन्धित आपकी सार्थक टिप्पणियों का स्वागत है । ब्लॉग के विषय में कोई जानकारी या सूचना देने या प्राप्त करने के लिए टिप्पणी के स्थान पर पोस्ट न करके इनमें से किसी भी पते पर मेल कर सकते हैं- hindihaiku@ gmail.com अथवा rdkamboj49@gmail.com.

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