Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 4, 2016

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1- सुनीता शर्मा 

1

रिसते दर्द 

खुरचते क्यों लोग ?

मन में जंग

2

बेरहम  क्यों ?

जीवन है प्रवासी 

मिलते  रहो 

3

आंसू पोंछता 

स्नेहिल रिश्ता  सदा 

यही तो मज़ा 

4

 दर्द – बेदर्द 

नींद-चैन हरता

दुःख  बढ़ाता 

5

मन पर घात

उपहास बनाते

अपने लोग

6

तीज -त्योहार 

आधे – अधूरे आज

खोखले मन

-0-

2-सविता अग्रवाल ‘सवि’

1

अरमाँ सजे

बसंत की आहट

दुःख भी घटे ।

2

बसंत आया

नवपात निकले 

बरसा नेह ।

3

बादल  छँटा

सूरज क्या निकला

अन्धेरा घटा ।

4

मंगल गाती

उड़ रही मगन

पक्षी की टोली ।

5

बहार छाई

बजी शहनाइयाँ

उल्लास लाई ।

6

उगी सरसों

ले आई जीवन में

ई खुशियाँ ।

7

बसंत ऋतु

धरती मुस्कराई

वृक्ष भी हँसे ।

-0-

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Responses

  1. दुःख अपने ही दे जाते हैं… सुनीता जी ! मार्मिक हाइकु ! विशेषकर–मन पर घात/उपहास बनाते/अपने लोग बहुत अच्छा लगा !
    वासन्ती छटा लिए सभी हाइकु अत्यन्त भावपूर्ण… सविता जी !

    आप दोनों को हार्दिक बधाई!!!

    ~सादर
    अनिता ललित

  2. bahut bhaav poorn …badhaaii !

  3. सम्पादक द्वय का बहुत बहुत आभार मेरे हाइकु को यहां स्थान देने के लिए । प्रिय अनीता और ज्योत्सना जी का भी धन्यवाद मेरे हाइकू पसंद करने के लिए । सुनीता शर्मा को भी सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बधाई ।

  4. बहुत सुन्दर हाइकु!
    सुनीता जी, सविता जी….बधाई!

  5. बहुत सुन्‍दर हाइकु सुनीता जी सवि जी
    हार्दिक बधाई

  6. मन को छूते सुन्दर हाइकु के लिए बहुत बधाई…|

  7. bahut bhaav poorn haiku sunita ji evam savita ji ko haardik badhaaii !

  8. savita ji sunita ji sunder bhav bhari abhivyakti
    rachana


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