Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 2, 2016

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जापान के चार हाइकु सिद्ध

जापान के चार हाइकु सिद्ध

काव्य का काव्य में अनुवाद बहुत दुष्कर कार्य है। उससे भी दुष्कर है काव्य का उसी काव्य-रूप में अनुवाद। जापानी –हाइकु के काव्य अनुवाद (हाइकु में नहीं) तो मिलेंगे; लेकिन हाइकु की व्यवस्था में अनुवाद नहीं मिलते। कुँवर दिनेश ने जापानी के चार हाइकुकारों के हाइकु का अनुवाद  भी हाइकु में किया है। लय आदि का अनुपालन बहुत कठिन कार्य है; लेकिन कुँवर दिनेश जी इसमें पूर्णतया सफल हुए हैं। जापान के चार हाइकु सिद्ध संग्रह से ‘मत्सुओ बाशो’ के हाइकु का अनुवाद आज ‘हिन्दी हाइकु’ में प्रस्तुत है –

-0-

मत्सुओ बाशो

(अनुवाद –कुँवर दिनेश )
1

मैं चाहता हूँ
संसार की धूल को
ओस में धो लूँ
2
अमावस में
पौन मिलती गले
देवदारों से
3
देखो मेरी सू
इस ख़िज़ां की शाम
मैं अकेला हूँ।
4
रूहों के मेले
फिर उठा है धुँआ
मरघट से।
5
बात करते
शिशिर की वात में
होंठ भी जमे।
6
इस राह में
साथ नहीं है कोई
पतझड़ में।
7
किसान _बच्चा
धान ओसाता थका
निहारे चंदा
8
वसंत जाए
मीन आँसू बहाए
खग चिल्लाए।
9
है हरीभरी
वाह! रहे ऐसी ही
मिर्च की फली।
10
साँझ की बेला
एक नंगी शाख पे
कौआ अकेला
11
ऊपर उठा
बंधनों से मुक्ति पा
गाता है लवा।
12
ताल पुराना:
दादुर की डुबकी
जलतराना।
13
गुल दाऊदी:
पत्थरों के बीच में
बहार खिली।
14
पतझर हवा
एक मधुर गीत
निर्लिप्तता का।
15
ग्रीष्म है आया
लहरबालहर
झील पे छाया।
16
पत्ता हिले
ग्रीष्म से विस्मित हैं
कुंज पेड़ों के
17
ग्रीष्म घास में
पुराने योद्धाओं के
शाही सपने।
18
दिन तपता
ले गई मोरगामी
सिंधु में बहा।
19
राह किनारे
वो जंगली गुलाब
घोटक चरे।
20
शीत बाहर
सुरक्षित भीतर
साथ सो कर।
21
रात में जगा
वो मद्धिम सा दिया
तेल भी जमा।
22
शीत लहर
सारस भीगा भीगा
पुलिन पर।
23
जुगनू चौंका
नाविक है नशे में
नशे में नौका।
24
बर्फ पहली
नरगिस पत्तों को
झुका के गई।
25
झींगुर गाते
कोई संकेत नहीं
मौत के आते
26
नीरवता में
झींगुरों की आवाज़ें
चट्टानें बींधें
27
शान्त है सर
एक मेंढक कूदा
छपाक स्वर!
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Responses

  1. बहुत सुन्दर मोहक प्राकृतिक चित्रों से सज्जित सभी हाइकु लययुक्त के साथ साथ अनुवादक की कुशलता भी दर्शाते हैं ।बहुत मन को भाये ।बधाई जापानी भाषा के हाइकुयों के भावों से परिचय कराने के लिये कुँवर दिनेश सिंह जी ।

  2. मत्सुओ बाशो के हाइकु का कुँवर दिनेश जी द्वारा हिंदी में किये अनुवाद के लिए उनकी जितनी भी प्रशंसा की जाए, वह कम ही प्रतीत होगी। बहुत ही उम्दा अनुवाद के लिए हार्दिक बधाई।

  3. प्रकृति के एक- एक बिंब को उभारता श्रेष्ठतम अनुवाद ,कुँवर दिनेश सिंह जी को हार्दिक बधाई |
    पुष्पा मेहरा

  4. कुंवर दिनेश जी ने मात्सुओ बाशो जी के हाइकू का बहुत खूबसूरत अनुवाद किया है सभी हाइकु प्रकृति का सुन्दर दरशन कराते हैं उन्हें हार्दिक बधाई ।

  5. सभी बिम्ब सुन्दर…मूल रचना के भाव उद्धृत कर पाठकों को सहज अभिव्यक्ति के रूप में देने के लिए कुँवर दिनेश जी को हार्दिक बधाई !

  6. कुंवर दिनेश जी का सराहनीय कदम है ये हिंदी हाइकु लिखने वालो के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभाएगा ये | इसके लिए उन्हें हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाये |
    पर अतीव संकोच एवं क्षमा प्रार्थी होते हुए एक शंका जो उत्तपन हुयी मन में उसका संधान चाहूंगी
    साँझ की बेला
    एक नंगी शाख पे
    कौआ अकेला ।
    इस हाइकु में autumn के लिए कोई शब्द प्रयोग नही किया गया है जैसा की गुरुदेव रविन्द्र नाथ जी ने भी इस हाइकु के बंगला अनुवाद में किया
    पचा डाल
    एकटा को
    शरत्काल

    (हिन्दी भावानुवाद)
    सूखी डाल
    एक कौआ
    शरत्काल
    या नंगी डाल के द्वारा उसकी पूर्ति हो गयी ओर जरुरत नही रही लिखने की ..ऐसा में केवल सिखने के कर्म में जानना चाहती हूँ | सादर ___/\__

  7. बहुत सुन्दर हाइकु. कुशल अनुवाद के लिए कुँवर दिनेश जी को हार्दिक बधाई.

  8. प्रोत्साहन एवम् सराहना के लिए सभी का हार्दिक आभार!

    सम्माननीया सुनीता अग्रवाल जी की शंका तर्कसंगत है; उक्त हाइकु में शरत् का उल्लेख अपेक्षित है, किंतु काव्य अनुवाद की सीमाएं देखते हुए,वर्णिक छंद का प्रयोग करते हुए, ‘एक नंगी शा’ से ही शरत्काल को बिंबित करने का प्रयास किया है, तदपि एक और रूपांतर संभव है :

    शरत् सन्ध्या
    एक नंगी शाख पे
    कौआ है बैठा।

    इसमें autumn, evening, withered branch, crow सभी को स्थान मिल गया है।

    आपकी एवम् अन्य हाइकुकारों की टिप्पणी का स्वागत है ।

    धन्यवाद!
    – डाॅ कुँवर दिनेश, शिमला

  9. आदरणीय डाॅ कुँवर दिनेश जी ने मात्सुओ बाशो जी के हाइकू का बहुत ही सुंदरता एवं कुशलता से अनुवाद किया है | बेशक ये एक सराहनीय कदम है |इन्होनें जापानी भाषा के हाइकू के भावों से हमारा परिचय तो कराया ही है साथ ही अनुवाद की बारीकियों को बड़ी ही कुशलता के साथ पेश किया है … ये कोई आसान कार्य नहीं है| कुँवर दिनेश सिंह जी को इस कार्य के लिए ढेर सारी बधाईयाँ एवं शुभकानाएँ !!

  10. ‘एक नंगी शाख’ सही प्रयोग है।

  11. गुरुदेव का अनुवाद केवल अनुवाद है , अनुवाद के रूप में हाइकु नहीं है। यह बात इस अंक के प्रारम्भ में ही बताई गई है। कुँवर दिनेश जी के हाइकु सिर्फ़ अनुवाद नहीं, बल्कि अनुवाद के बाद हाइकु भी हैं्।

  12. जापान की अनूठी काव्य विधा की गहराई से हम सब को अवगत कराने और प्रकृति के विहंगम से विहंगम और सूक्ष्म से और सूक्ष्म दृश्यों का बिंबों से साक्षात्कार कराने के लिए कुंवरजी का आभार

  13. मूल रचना के अंतर्भाव को जिस ख़ूबसूरती से आपने अनुवाद कर व्यक्त किया है, बहुत प्रशंसनीय। कुँवर दिनेश जी आपको बहुत-बहुत बधाई।

  14. अद्भुत कार्य, बधाई।

  15. सभी हाइकु प्रेमियों का हार्दिक आभार!

  16. bahut sundar , prabhaavee prastuti !

    bhaav aur shilp ka samyak nirvahan karte bahut sundar haiku ..haardik badhaaii ..aabhaar !

  17. अदभुत…इस तरह का अनुवाद कितना श्रमसाध्य रहा होगा, यह कोई भी समझ सकता है…| पर साथ ही इतना सरस और सजीव भावानुवाद, वह भी हाइकु के नियमों से समझौता किए बगैर करने के लिए कुँवर दिनेश जी बधाई के पात्र हैं…|


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