Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मार्च 18, 2016

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   कोमल भावनाओं का पारिवारिक कोलाज़

डा.सुरेन्द्र वर्मा

  1-कवर--Parinde Kab Laute यादें पीछा नहीं छोड़तीं । याद परिंदे हैं,बार बार लौटते हैं । याद घटाएँ  हैं, घटाओं की तरह घुमड़ती  हैं और यदि आप कवि हैं तो आपकी कविताओं में बरस पड़ती हैं ।डा.भावना कुँअर के साथ भी यही हुआ है । ‘परिदे कब लौटे उनका पहला चोका संग्रह है । इस संग्रह में उन्होंने अपने मन के कोमल भावों को जो उनकी यादों में समाए हुए हैं, वाणी दी है । इन भावनाओं में एक पारिवारिक रिश्ता है । इनमें मीठी यादों के गहरे कुएँ हैं, अम्मा का गाँव है, मधुर मिलन है और दुखी सलवटें भी हैं । सच्चा गहरा प्रेम है, और दर्द भरी कहानी भी है । नन्हीं सी परी है और एक नन्हा टाइलर भी है । मतलब जितने भी प्रीत के रंग हो सकते हैं, इन यादों में हैं । प्यार का पूरा एक घर-परिवार है । दुखदर्द है, पीड़ा है, खट्टी-मीठी संवेदनाएँ  हैं, खुशियाँ हैं गम हैं । कवयित्री ने अच्छे-बुरे, खट्टे-मीठे अपने सभी अनुभव इस संग्रह में अंकित किए हैं । उनका विश्वास है कि ये भाव केवल उनके ही नहीं, हम सबके हो सकते हैं; देश काल की सीमा से परे किसी के भी हो सकते हैं ।

  36 चोकों से संपन्न यह संग्रह, ‘परिंदे कब लौटे’, हाइकु परिवार की एक शैली, चोका”, में रचा गया है । इसका शिल्प भी वर्ण-क्रमानुसार है । 575-7 वर्ण-क्रम में लिखे गए चोके में कई चरण हो सकते हैं । बस, अंतिम दो चरणों में 7-7 अक्षर होते हैं । डा.भावना कुँअर  कहती हैं, “मुझे चोका लिखना हाइकु लिखने की ही तरह प्रिय लगा । पांच-सात-पांच-सात-पाँच… आप तबतक लिखते जाइए, जबतक आपके भाव आपका साथ देते हैं । और फिर एक ताँका जोड़िये या अंत में सात की एक अतिरिक्त पंक्ति से चोका का समापन कीजिए …” भावना जी बताती हैं कि उन्होंने काम्बोज जी और डा. हरदीप संधु के साथ एक चोका संग्रह “उजास साथ रखना” का सम्पादन 2013 में किया था और तब से चोका लिखना शुरू कर दिया । क्रम जारी है ।

    चोका से मेरा अपना परिचय सबसे पहले मनोज सोनकर के “चोका चमन” (2013) नाम के चोका संग्रह से हुआ था । उस चमन में घुसते ही मैंने अभ्यासवश कुछ हाइकु-पुष्प चुरा लिये थे । हर चोके  में यदि आप ध्यान दें कुछेक सुन्दर हाइकु अवश्य मिल जाएँगे । और मेरी धृष्टता देखिए, उन्हीं को आधार बना कर मैंने चोका-चमन के सौन्दर्य को उजागर करने की कोशिश की थी ।’परिंदे कब लौटे’ संग्रह में भी परिंदों के साथ उड़ते हुए मेरी नज़र कुछ सुन्दर हाइकु-पुष्पों पर पड़ ही गई । अत: अवसरानुसार, क्षमा याचना के साथ, उन्हें उद्धृत करने में इस बार भी मैंने परहेज़ नहीं किया है ।

   कौन सी ऐसी स्त्री है जो माँ नहीं बनना चाहेगी ? माँ बनते ही स्त्री का सारा संसार ही बदल जाता है । उसकी झोली में खुशियाँ ही खुशियाँ भर जाती हैं । तमन्नाएँ  झूमने लगती हैं, बुझा सा मन रोशन हो जाता है । लोरियां गाने लगती है माँ ! संग्रह की पहली कविता – नन्हीं सी परी – इसी वात्सल्य की भाव-भूमि पर रची गई है । अन्जाने ही इसकी शुरूआत एक हाइकु से हुई है, हाइकु नहीं कहना चाहिए, एक दुमदार हाइकुसे हुई है । हिन्दी में दोहे होते हैं न दुमदार, वैसे ही इसे एक दुमदार हाइकु कहें तो क्या हर्ज है –

नन्हीं सी परी

गुलाब पंखुरी-सी

आई ज़मी पे…..  झूम उठा आँगन । (पृष्ठ 13)

इसी भाव को जारी रखते हुए दूसरी कविता का आरम्भ भी एक दुमदार हाइकु से ही होता है –

बरसों बाद

  मेरे मन आँगन

महका प्यार…  झूम उठा आसमां (पृष्ठ 15)

मैं जानता हूँ, मैं ज्यादती कर रहा हूँ । इन उद्धरणों को कविता से अलग करके दुमदार हाइकु के रूप में देख रहा हूँ जब कि ये वास्तव में ५-७-५-७ वर्ण क्रम में चोका की पंक्तियाँ ही हैं । इन चोका रचनाओं में भाव की दृष्टि से कवयित्री का वात्सल्य हर वस्तु में -कोयल की आवाज़, वर्षा की धुन, भौरों की गुन-गुन में- गा उठाता है ।

खिला संसार/ मन की कलियाँ भी/ खिलने लगीं/ चहरे पे रंगत/ दिखने लगी/ कोयल की आवाज़/ वर्षा की धुन / भौंरों की गुनगुन/ हवा के गीत/ झरनों का संगीत….खुशबुओं का/ मदहोश करना/ सब भाने लगा है ।    (पृष्ठ15-16)  

एक प्रेमिका वर्षों से अपने प्रिय से मिल नहीं पाई है । वह उसे आमंत्रण देती है । जानते बूझते कि मिलन शायद ही हो पाए, या शायद अधूरा ही रहे, फिर भी –

शाम के वक्त / सूरज के कदम / हौले हौले से / जब लौटने लगें —

शोख लहरें / अँधेरे की ओट ले / बिना आहट / सागर की बाहों में / मचल कर / जब सामने लगें     चंचल भौंरे / फूलों से छिपकर / बंद होने का / बहुत बेसब्री से / यूं इंतज़ार / करने लगें —

उस समय / तुम मिलने आना—

बरसों बाद / वो अधूरा मिलन

प्यार से भरी / कहानियाँ मन की / लिखकर जाएगा  (पृष्ठ1921)

  हमारे मन में यादों का एक कुआँ है जिसमें मीठी स्मृतिया लबालब भरी हुई हैं । हम उनमें से किसी मधुर मिलन की सुनहरी सी याद का कोई मोती हौले से निकाल कर अपने पलकों पर बैठा लेते हैं (मीठी यादों के कुएँ) । हमारे पास यादों के परिंदे हैं –

कहाँ से आए

ये उड़तेउड़ाते

याद परिंदे   —हम कैसे बताएँ  !  (पृष्ठ,26)

याद-परिंदे / निश्चित तिथियों में / बिन बुलाए / न जाने क्यों आ जाते  (पृष्ठ 33)

बीते वो दिन / बस यादों-बसे हैं / पीपल छाँव …   

मुट्ठी में बंद / जुगुनुओं के तन / टिमटिमाते ….

मीठी सी बातें / पलकों पे झूलते / हज़ारों ख़्वाब ….  (पृष्ठ 26)

इन्हीं यादों की बस्ती में –

हौले से आया

दबे पाँव लेकर

ख़्वाबों में मेरे   ….मेरी अम्मा का गाँव – (पृष्ठ 30)

मकई रानी / ओढ़ कर दुशाला / शान से खड़ी….

पोई की बेल / छत पे चढ़कर / नीचे न आती ..

मीठी बुझिया / खोया ओढ़े घेवर / है इतराए….

नीम के पेड़ /चलती थी उन पे / झूलों की रेल …

अगले साल / उस गाँव आऊंगी / बिना  बताए …  (पृष्ठ 3132)

  कितने सुहाने दिन थे वे,

याद आ रहे / पापा आप बहुत / आपका प्यार …अपना परिवार ।

चिंता न फ़िक्र / आपकी स्नेही छाया । माँ से भी खूब / था ममता को पाया…

बड़े जो हुए / भर गई मन में / पीर ही पीर   (पृष्ठ 39)

   कितनी दर्द भरी कहानी है –

मासूम परी / जो जीना चाहती थी / बनी शिकार

-वहशी दरिंदों का

  जूझती रही / ज़िंदगी व मौत से / लड़ती रही / आखीर तक / खामोश थी जुबान  (पृष्ठ 35)

   आखिर कौन कितना सहे, अब थक चुकी हूँ –

ढूँढ़ती ही रही / कुछ रिश्तों में प्यार- / कभी न आया….

 लगाए गए / इल्जाम पे इल्जाम / सहती गयी ….

ज़ालिम रिश्ते / बींधते रहे मुझे / छलनी हुई…..

कितना सहा / कोई न जान पाया / मरती रही …

 नफ़रत की / बिना कसूर क्यों मैं / पाती हूँ सज़ा ?…

सामने मौत / पुकार रही मुझे / थक चुकी हूँ   (पृष्ठ ४६-४८)

   जीवन कभी कभी बेरंग लगाने लगता है । कई सवाल मथने लगते है, आखिर आदमी को खुद को मिटा कर मिलता ही क्या है? सच्चा, पवित्र प्यार ही सदा संघर्ष और त्याग क्यों करे ? जीवन अभिशाप क्यों बने? क्या हैं हमारे जीवन मूल्य ? (ये बेरंग जीवन) । कितनी ही गहरी क्यों न फंसी हो पीड़ा की फांस, भले ही उसे हिम्मत से, जतन से उस दर्द को अपना ही क्यों न लिया हो, पर हार तो किसी भी हालत में मानना ही नहीं है । (हार मानी ही नहीं)  

कितनी बार/रिर्श्तों को चटकते/देखा है मैंने   /पर हार नहीं मानी (पृष्ठ ७८)

   भले ही डा. भावना कुँअर  को हार न मानने के लिए कोई विश्वसनीय दलील न मिल पाई हो, लेकिन कुल मिलाकर वे हार मानने के लिए तैयार नहीं हैं । शायद इसके पीछे उनका अटूट प्यार और विश्वास है जिसे वे लारीकाटकीट जोड़े और नन्हें टेलर तक में भी देख पाई हैं ।-

हर सुबह /ये लारीकीट जोड़ा /आवाज़ देता /मैं दौड़ी दौड़ी जाती /क्या-क्या कहता /समझ नहीं आता आकर मेरे /चक्कर जो लगाता /झट मैं जाती /हाथों में दाने भर / झट आ जाती ।….

हौले-हौले फिर वो / दाना हैं खाते / डरते ना डराते…. (पृष्ठ ६९)

ये है दुलारा / प्यारा सा टाइलर / जब से आया / बदल गया रूप / मेरे घर का  

सुख औ दुःख / ये खूब समझता / खाएँ  जो हम / तब ही बस खाता / वरनाचुप  (पृष्ठ ८२)

जानवर है / जाने कैसे ये, दर्द / समझ जाता  

सीखें कुछ तो / इन बेज़ुबाहों से /

हैं बेहतर / मासूम भोले प्यारे / ये स्वार्थी इंसानों से  ((पृष्ठ ८३)

    डा. भावना कुँअर  का चोका संग्रह “परिदे कब लौटे” हमें एक ऐसे संसार की सैर कराता हैं जो विचार से संपन्न तो है ही, पर जिसमें भावों की उड़ान भी है । इसमें मानव मूल्यों की रक्षा के लिए निहित आह्वान है । साथ ही साथ यह एक नई विदेशी (जापानी) काव्य विधा को हिन्दी कविता में प्रतिष्ठित करने के लिए उठाया गया आत्मविश्वास से भरा कदम भी है

    मुझे पूरा भरोसा है कि हिन्दी का काव्य साहित्य इस सुन्दर रचना का खुले दिल से स्वागत करेगा । डा. भावना कुँअर  को शुभकामनाएँ  ।-0-

    ‘ परिंदे कब लौटे (चोका-संग्रह) / डा. भावना कुँअर  / अयन प्रकाशन , 1/20,महरौली नई दिल्ली-110030,पृष्ठ:88, मूल्य: 180 रुपये, संस्करण :2016

-0-

*डा. सुरेन्द्र वर्मा   10 , एच आई जी / 1, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद / 211001

  ( मो. ९६२१२२२७७८)

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Responses

  1. सुंदर उद्धरणों के साथ बहुत सुंदर समीक्षा आदरणीय !
    डॉ. भावना जी एवम् डॉ. वर्मा जी को हार्दिक बधाई …सादर नमन !

  2. sunder samiksha likhi hai surendra ji aapne bhawna ji aap likhti bahut achchha hai aapki kitab bahut achchhi hai
    badhai aapdono ko
    rachana

  3. आपका चोका संग्रह पढ़ा, सदैव की भांति बहुत सुन्दर लेखन। डा० भावना कुँअर जी…. हार्दिक बधाई।
    उम्दा समीक्षा के लिए आ० डा० सुरेन्द्र वर्मा जी को बहुत-बहुत बधाई।

  4. सुंदर चोका संग्रह व सुंदर समीक्षा हेतु माननीय वर्मा जी व भावना कुँवर जी को बधाई |

    पुष्पा मेहरा

  5. BHAWNA JI AAPKA CHOKA SANGRAH PADHA BAHUT ACHCHA LAGA SAATH HI AADARNIY DR.SURENDRA VERMA JI KI SAMIKSHA BHI SUNDER HAI .
    AAP DONON KO HAARDIK BADHAI !

  6. सुंदर समीक्षा … पूरा संग्रह जीवंत हों उठा है समीक्षा में .. बधाई रचनाकार और समीक्षाकार दोनों की कलम को |

  7. sabse pahle surenddddra ji ka bahut bahut aabhar unhone itni achhi samikasha likhi fir sabhi mitron ka jo unko meri pustak pasand aayi mera lekhn saarthak ho gaya yun hi sneh banaye rakhiyega…

  8. भावना जी को उनके चोका संग्रह के प्रकाशन पर हार्दिक बधाई ।श्री सुरेन्द्र जी को उसकी सुन्दर समीक्षा करने पर बहुत बहुत बधाई ।

  9. भावना जी के इस खूबसूरत चोका संग्रह की उतनी ही सुन्दर समीक्षा…|
    भावना जी को पुस्तक प्रकाशन की और सुरेन्द्र जी को इस सुन्दर समीक्षा की बहुत बहुत बधाई…|

  10. UMDA CHOKA SANGRAH ..BADHAYI EVAM SHUBHKAMNAYE 🙂

  11. सुन्दर समीक्षा के लिए सुरेन्द्र जी को बहुत-बहुत बधाई.
    चोका संग्रह के प्रकाशन के लिए भावना जी को बहुत बधाई.
    अभी ही भावना जी का सेदोका संग्रह ‘जाग उठी चुभन’ पढी. सभी सेदोका बहुत उम्दा है. भावना जी को पुनः बधाई.

  12. बहुत सुंदर समीक्षा ….सुरेंंद जी व भावना जी को हार्दिक बधाई।

  13. सुन्दर समीक्षा ऐसी कि तुरंत पुस्तक पढ़ने को मन करे। सही समीक्षा ही पढ़ ने की जिज्ञासा जगाती है


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