Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 16, 2016

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विचार-वाहक हाइकु

डा. सुरेन्द्र वर्मा

    विभा रश्मि जी का ‘कुहू तो बोल’ हाइकु संग्रह उनका पहला ही संग्रह है, लेकिन वे हाइकु लिख कई वर्षों से रही हैं | पत्र Untitled-1पत्रिकाओं में तो उनकी रचनाएँ छपती ही रहीं हैं, फेसबुक और वेब पत्रिकाओं में भी वे प्रकाशित होती रहीं है | हाइकु परिवार बड़ा समृद्ध है – हाइकु के अलावा इसमें ताँका, सेदोका, हाइगा, हाइबन जैसी काव्य विधाएँ भी सम्मिलित हैं | हाइकु तो वे लिखती ही हैं, सत्रह आखर की ये सुन्दर रचनाएँ वे तलाश किए गए समानांतर चित्रों के साथ भी प्रस्तुत करती हैं | इन्हें ‘हाइगा’ कहा गया है | आजकल उनकी विशेष अभिरुचि हाइगा रचनाओं पर ही अधिक है | जहाँ तक प्रस्तुत हाइकु संग्रह, ‘कुहू तू बोल’ का प्रश्न है, यह प्रथम संग्रह होने के बावजूद भी एक  विचार प्रधान संकलन है जिसमें प्रकृति और प्रेम तो ही ही, चिंतन, मनन, दर्शन ओर विचार, समाज और स्त्री-विमर्श, आदि, भी अपने पूरे गाम्भीर्य के साथ विद्यमान है |

    वैसे यह संकलन मन-प्रीत के प्रेम से ही आरम्भ होता है | यदि ह्रदय में किसी की छबि बस ही गई है तो वह चैन से नहीं रहने देती | उसे पा लेने की चाहत पलकें में सजी रहती है |फक्कड़ दिल  बंजारे की तरह इक-तारे पर बस, उसी के गान गाता रहता है | उसी की यादें पखेरू बनकर फडफडाती रहती है |

चितचोर की / चाहतें बटोर के / हँसी फिसली

आ गया तेरा / अहसास, आहट / दिल के पास

 फक्कड़ी गान / गाता इक-तारे पे / दिल बंजारा

पिया बटोही / पलकों के पांवड़े / सजाए गोरी

यादें पखेरू / पंख फडफड़ाती / फिरें उड़ती

ऐसी मनोदशा लगभग हर प्रेमी/प्रेमिका की रहती है, लेकिन जिस बेबाकी से इसका काव्यमय वर्णन रश्मि जी ने अपने हाइकुओं में किया है, देखते ही बनता है |

   प्रेम ही वो जज्बा है जिससे परिवार बनता है और स्वर्ण सम्बन्ध कायम होते हैं | लेकिन जब हम रिश्तों में अपनी अधिक चतुराई दिखाने लगते लगते हैं और अपने ही तराजू में उन्हें तोलने लगते हैं तो कुछ न कुछ खोंट निकाल ही लेते है, और इससे गलतफहमियाँ उत्पन्न पैदा हो जाती हैं |

रिश्ते घायल / तो गलतफहमियाँ / गला दबातीं

सोने से रिश्ते / तोलो तराजू में / मिलेगी खोट

   रश्मि जी जहां प्रेम की उपासक हैं, वहीं प्रकृति के रंग भी उन्हें बहुत लुभाते हैं | यों तो सभी प्रहर अपनी अपनी शोभा के लिए अद्वितीय हैं, लेकिन प्रात:काल का समय अद्भुत होता है | सूर्य, जैसा कि मिथक है, किरणों के रथ पर बैठ कर फर्राटे भरता हुआ आता है और भोर रात के आंसूओं को, जो पेड़-पौधों की फुनगियों पर मोती से पड़े रहते हैं, बटोर कर पोंछ देती है | पूरा आलम मानो खुशी से भर उठता है |

सूर्य ने थामी / सप्त अश्व लगाम / दौड़े फर्राटे

रात के आँसू / मोती फुनगियों  पे / भोर बटोरे 

   चिड़ियाँ जाग जाती हैं और अपने तथा अपने शिशु-चिड़ियों के लिए दाना-पानी का इंतज़ाम करती हैं | शाम ढले पुन: अपने घोंसलों में आकर बच्चों की चोंच में दाने डालकर संतोष पाती है | मनुष्य इन चिड़ियों से बहुत कुछ सीख सकता है | आसमान में उड़ते हुए परिन्दे मनुष्य को नई सोच के लिए अपने परों से मानों हवा देते हैं, प्रेरित करते हैं |

लौटे विहग / सांझ ढले नीड में / दाने चोंच में

पधारे देस / प्रवासी खग प्यारे / मीठा संदेस

नई सोच को / डैनों से हवा देते / नभ में खग

     यों तो ऋतुएँ छह  बताई गईं हैं और सभी पर रश्मि जी ने अपनी कलम चलाई है किन्तु प्रतीत ऐसा होता है कि उनका सर्वाधिक प्रिय मौसम बरसात का मौसम है | रिमझिम बारिश में उन्हें लगता है, मानो पानी की बूंदें पत्तों पर झूल रही हैं | वर्षा थमते ही उसका आनंद लेने सभी पशु पक्षी, विशेष कर वीरबहूटियाँ, घर से निकल पड़ते हैं | दृश्य साफ़ हो जाता है | बादल हट जाता है |

बरखा बूँदें / हँस- हँस फिसलीं / पत्तों पे झूलीं

बादल हटा / धुंध नेत्रों से हटा / दृश्य साफ़ था

बीरबहूटी / चली लेने आनंद / ऋतु बरखा

निर्झर फूटा / पर्वतों की गोद से / धरा ने लूटा

 प्रकृति ही नहीं, विभा जी की सोच में समाज भी कम नहीं है | हमारे अपने त्योहार, अपनी परम्पराएं, अपनी होली-दीवाली और रक्षा बंधन जैसे पर्व हमें न सिर्फ एकता में बाँधे रखते हैं बल्कि शाश्वत मूल्यों से भी अवगत कराते है | दीपावली आती है तो धरती और आसमान दोनों चमक उठते हैं | दीपक के प्रज्ज्वलित होते ही अमावस का अन्धकार डरकर भाग जाता है | आलोक फैल जाता है| रात भर रोशनी देने के लिए दरियादिल दिया जागता रहता है | यह ठीक ऐसे ही है कि जैसे मनुष्य में आस का दीपक जब टिमटिमाता है तो नैराश्य दूर भाग जाता है |

सितारों भरा / धरती आसमान / दोनों चमके

आलोक फैला / दीपक प्रज्ज्वलित / तम भी डरा

प्यारी रोशनी / देने को जिया, दिया / दरिया दिल

दूर नैराश्य / आस दीपक जब / टिमटिमाया

   दीपावली का दीप यदि नैराश्य पर विजय पाने के लिए हमें प्रेरित करता है तो रक्षा-बंधन भाई- बहिन के सम्बन्ध को सुदृढ़ करने का आह्वाहन करता है | यह सम्बन्ध वासनाओं की दुर्गन्ध से मुक्त, पवित्र और संदल सा सुवासित है | “रक्षा बंधन / संदल सा सम्बन्ध / मही सुवासित” |

   आज जब नारी अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो रही है तो विभा जी भी इस स्त्री-विमर्श में पीछे नहीं हैं | बेशक हमारे मिथकों में, परी-कथाओं में, बेटियों को अत्यंत सुकोमल भले ही बताया गया हो, किन्तु बेटियों की नई कहानी कुछ अलग ही है | अब बेटी शिक्षित, स्वाभिमानी और सक्षम है | नारी अपनी जीवन-यात्रा के संघर्ष में हौसले और हिम्मत से आगे बढ़ रही है | वह अपनी रक्षा खुद करना जान गई है | वह स्वयंसिद्धा है |

परी कथा से / निकली सुकोमल / तनया प्यारी

नव्य कहानी / शिक्षिता स्वाभिमानी / बेटी सक्षम

नारी हौसला / है पर्याय, संघर्ष / जीवन यात्रा

आत्म सुरक्षा / दुलारी सीख, रक्षा- / तू स्वयंसिद्धा

लेकिन इतना सब होते हुए भी यह दुर्भाग्य पूर्ण है कि वह कन्या जो पियरी ओढ़े, अपने नयनों में हज़ार स्वप्न सँजोये जब पिता के घर से बिदा होती है तो इसके लिए दहेज़ के रूप में उसके पिता को अधिकतर खासा मूल्य भी चुकाना पड़ता है | आर्थिक सुरक्षा के अभाव में आज भी नारी बेजान गुड़ियों की तरह बाज़ार में बेंची जा रही है | “नन्हीं गुड़िया / जान बेजान, दोनों / बिकीं बाज़ार” | अभी बहुत काम बाक़ी है | ये स्थितियां बदलना चाहिए |

   हम स्वतंत्रता, भ्रातृत्व ओर समानता की बातें चाहे जितनी करते रहें, हमारा समाज अभी भी इन प्रजातांत्रिक मूल्यों को अपना पाने में सफल नहीं हुआ है | स्त्री और पुरुष में तो सामाजिक-आर्थिक भेदभाव किया ही जाता है, समाज में आर्थिक विषमता भी इतनी गहरी है कि गरीब और अमीर के बीच खाई दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है | और इसका एक बड़ा कारण अपनी रोटी कमाने के लिए शरीर-श्रम की अवहेलना है | गांधी जी ने शरीर श्रम के महत्त्व को समझा था | उन्होंने कहा था कि जो बिना शरीर-श्रम किए रोटी खाता है वह वस्तुत: दूसरे की रोटी चुराता है | अपने श्रम से कमाई रोटी ही सर्वाधिक स्वादिष्ट होती है | रश्मि जी – “रोटी में स्वाद / खुरदरे हाथों से / पोएँ श्रमिक” | श्रम के महत्त्व को समझते हुए विभा जी स्पष्ट कहती हैं,- “गुनगुनाती /श्रम सीड़ियाँ चढी /धरती बेटी”

    कवयित्री विभा रश्मि के हाइकु सोच को प्रेरित करते हैं | वे मुख्यत: विचार वाहक हैं | उनका चिंतन, दर्शन मूल्याधारित है | यह केवल तटस्थ तर्क और तर्कों को वरीयता नहीं देता बल्कि ह्रदय के भावों को भी मूल्यवत्ता प्रदान करता है | आजकल हम विचार के स्तर पर ही आधुनिक भले ही बन गए हों किन्तु हमारे भाव और आचरण में कोई अंतर नहीं आया है | इसीलिए जीवन के सूत्रों को स्पष्ट करते हुए वे कहती हैं-

आधुनिकता / सोच में ला, ह्रदय / भर भावों से

मन चरखा / नेहिल सूत कात / ताना वितान

सांत्वना फाहा / दर्द का मरहम / ढके घाव को  

   दर्शन में नियति और पुरुषार्थ के बीच विवाद बड़ा पुराना है | रश्मि जी भी इस विवाद को कोई स्पष्ट दिशा नहीं दे पाई हैं | उनका मन कभी पुरुषार्थ की ओर तो कभी नियति की और झुकता दिखाई देता है | एक जगह वे कहती हैं, “खिलौना इंसा / ईश्वर मन चाहा / खेल खेलता” (नियति), तो कभी पुरुषार्थ का पक्ष लेते हुए कर्म पर बल देने लगती हैं –

शुभ मुहूर्त / न ढूँढ़, रख आस्था / कर्म से वास्ता

हौसला देख / हुई नतमस्तक / कठिन घड़ी

    बहुत कुछ दार्शनिक अंदाज़ में उनके कुछ हाइकु हमारे अंतर को उद्वेलित करने में सफल हुए हैं-

आत्मा परिंदा / फड़फड़ाता, काटे / उम्र कैद

लहरें नाव / खेले ज़िंदगी दांव / कम न चाव

फांस दिल की / खतरनाक, पग / चुभे कांटे सी

भाग्योदय ने / है तान दिया तम्बू / उजियारे का                

कामना करता हूँ कि कवयित्री विभा रश्मि का भी भाग्योदय हो और वे भी हाइकु जगत में उजियारे का एक तम्बू तान सकें |

कुहू तू बोल (हाइकु-संग्रह) /विभा रश्मि /विश्व हिन्दी साहित्य परिषद् /दिल्ली /2016 /मूल्य- रु. 150/-

-0-

डा. सुरेन्द्र वर्मा

10, एच आई जी / 1, सर्कुलर रोड ,इलाहाबाद – 211001 

मो. 9621222778

-0-

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Responses

  1. Samikasha bahut achhi likhi pustak bhi nishchit rup se achhi hogi meri hardik badhai dono rachnakaron ko…

  2. adarniiy varma ji dvara likhi bhavpurn sameeksha ‘kuhu tu bol ‘ haiku kavy
    sangrh ki ek – ek kali ki bharpur sugandh bikher rahi hai . sunder ameeksha aur vibha ji ki sunder bhavabhivaykti hetu donon ko hardik badhai.

    pushpa mehra

  3. कुहू तू बोल (हाइकु-संग्रह) विभा रश्मि ka hindi saahitay shikhar ko chuegaa . डा. सुरेन्द्र वर्माki samikshaa gahan u, utkrisht hae .
    aap dono ko badhai .

  4. आ.काम्बोज भाई व डॉ.हरदीप संधु जी को बहुत साधुवाद ।मेरे हाइकु संग्रह ‘कुहू तू बोल ‘की सुन्दर पुस्तक समीक्षा के लिए डॉ.सुरेन्द्र वर्मा जी की हृदयतल से आभारी हूँ।पुस्तक समीक्षा के लिए उन्होंने कीमती वक़्त दिया ।डॉ.भावना,पुष्पामेहरा जी वमंजू गुप्ता जी को मेरा प्रोत्साहन बढ़ाने के लिए हार्दिक आभार ।

  5. इस सुंदर समीक्षा हेतु आदरणीय सुरेन्द्र सर जी को नमन एवं शुभकामनाएँ !
    विभा रश्मि जी को इस संग्रह के प्रकाशन हेतु हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ !!!
    ~सादर
    अनिता ललित

  6. surendra samiksha surendra ji dhnyavad
    vibha ji haiku sangrah ke prakshan ke liye bahut bahut badhai
    rachana

  7. बहुत सारगर्भित समीक्षा है…जिसके लिए सुरेन्द्र जी निश्चय ही बधाई के पात्र हैं…|
    विभा जी को इस संग्रह के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ…|

  8. प्रियंका जी,रचना जी,अनिता ललित जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद संग्रह की समीक्षा पसंद करने व मेरा उत्साह वृद्धि करने के लिए ।


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