Posted by: डॉ. हरदीप संधु | दिसम्बर 8, 2015

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मंजूषा ‘मन’

1

सन्नाटा चीखा

मन के द्वार पर

हुई दस्तक।

2

आहट बोली-

कोई नहीं आएगा

हवा है डोली।

3

तन्द्रा टूटी है

जागे तो पाया यह-

आशा झूठी है।

4

ख़ामोशी बोले-

ये कैसी आहट जो

साँकल खोली।

5

तन्हाई कहे-

हम थे चुप रहे

सब ही सहे।

6

ऊब गए हैं

इन साँसों से हम

घुटता दम।

6

कविता लगा-

मन का दर्द उन्हें,

हमने कहा।

7

साँस धौंकनी

चले अनवरत

आस झुलसे

-0-

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Responses

  1. मंजूषा जी बहुत अच्छे हाइकु। बधाई।

  2. बहुत अच्छी कविताएँ हैं ,मंजूषा जी बधाई|
    पुष्पा मेहरा

  3. सुन्दर हाइकु, मञ्जूषा जी शुभकामनाएँ!

  4. हाइकु.के माध्यम से वैयक्तिक दर्द टीस को ब्याँ करके समाज में आई नैतिक गिरावट को दर्शाने का सफल प्रयास ।।
    बधाई मंजूषा जी!!

  5. बहुत उम्दा हाइकु…| मेरी हार्दिक बधाई…|

  6. सुन्दर हाइकु, मञ्जूषा जी शुभकामनाएँ!

  7. मंजूषा जी अच्छा सृजन है हार्दिक बधाई |

  8. मंजूषा जी बहुत ही उम्‍दा हाइकु । मनस्थिति के भिन्‍न रूप लिए हाइकु । सार्थक रचना के लिए हार्दिक बधाई।

  9. आप सभी को हार्दिक आभार हमारे प्रयास को सराहने के लिये। प्रेरणा देते रहैं।

    आभार

  10. बहुत भावपूर्ण ,बधाई !


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