Posted by: डॉ. हरदीप संधु | नवम्बर 8, 2015

1523


1-कृष्णा वर्मा

1

खौफज़दा से

चौकें हर आहट

सहमे पत्ते।

2

देख खिज़ाएं

पत्तापत्ता भय से

सिकुड़ा जाए।

3

निगल गई

बगिया की रौनकें

निठुर खिज़ा।

4

चली वो हवा

चमन की बहारें

हो गईं ख़फा।

5

खिज़ाओं ने आ

माटी चिनीं खुशियाँ

वनस्पति की।

6

रूखी ऋतु आ

मचाए खलबली

वन जीवन।

7

निगोड़ी ऋतु

सह ना पाई खुशी

कायनात की।

8

खिज़ा दे शूल

प्यार पेड़ पत्तों का

कहाँ कबूल।

9

रूठीं लताएं

कंगन उतारे क्यूँ

पतझड़ ने ।

10

कैसी जल्लाद

खिज़ाएं दख़्तों की

छीने औलाद ।

-0-

2-अनिता मण्डा

1

बहाती नीर

बैठी है हृदय में

मूक सी पीर।

2

खिला है मन

बनकर  सुमन

फैली सुवास।

3

रख दो वक़्त

हाथ से उतार के

सुबह तक।

-0-

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Responses

  1. बहार पर तो काफी कुछ लिखा गया है, लेकिन खिजाओं की तरफ हाइकुकारों का ध्यान थोड़ा कम ही गया है. पर कृष्णा वर्मा की ये रचनाएं पतझड़ पर ही केन्द्रित हैं और बड़ी मार्मिक हैं.
    कैसी जल्लाद / खिजाएँ, दरख्तों की / छीने औलाद
    साधुवाद . -सुरेन्द्र वर्मा

  2. कृष्णा जी और अनीता जी खूबसूरत हाइकु सृजन के लिए हार्दिक बधाई .

  3. मेरे हाइकु को यहां स्थान देने हेतु आभार।
    कृष्णा जी सारे हाइकु बहुत अच्छे लगे। विशेष
    कैसी जल्लाद
    खिज़ाएं दरख़्तों की
    छीने औलाद ।

    बधाई।

  4. बहाती नीर
    बैठी है हृदय में
    मूक– सी पीर। बहुत सुंदर अनीता जी , सभी हाइकु भावपूर्ण . बधाई आपको |

    रूठीं लताएं
    कंगन उतारे क्यूँ
    पतझड़ ने । खिजाओं पर सुन्दर भाव प्रस्तुत किए हैं आपने | बधाई |
    रूठीं लताएं
    कंगन उतारे क्यूँ
    पतझड़ ने । कंगन का बिम्ब अच्छा लगा |

  5. प्रकृति का मार्मिक चित्रण!!कृष्णा वर्मा जी!! उम्दा हाईकु

  6. रूठीं लताएं
    कंगन उतारे क्यूँ
    पतझड़ ने ।
    sundar! meri badhai..
    बहाती नीर
    बैठी है हृदय में
    मूक– सी पीर।

    bahut khub! badhai..

  7. sundr prastuti .
    donon ko badhai..

  8. प्रेरक प्रतिक्रिया के लिए आ० सुरेन्द्र वर्मा जी एवं आप सभी की हृदय से आभारी हूँ।

    बहाती नीर
    बैठी है हृदय में
    मूक– सी पीर।…..बहुत सुन्दर। बधाई अनीता जी।

  9. रूठीं लताएं
    कंगन उतारे क्यूँ
    पतझड़ ने ।
    ..
    बहाती नीर
    बैठी है हृदय में
    मूक– सी पीर।
    कृष्णा जी और अनीता जी खूबसूरत हाइकु सृजन के लिए हार्दिक बधाई .

  10. रूठीं लताएं
    कंगन उतारे क्यूँ
    पतझड़ ने ।
    बहुत सुन्दर…|

    रख दो वक़्त
    हाथ से उतार के
    सुबह तक।
    क्या बात है…|
    आप दोनों को बहुत बधाई…|


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