Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अक्टूबर 29, 2015

सागर -सा मन


समीक्षा

1-sagar man– डॉ•सुरेन्द्र वर्मा

     जापानी काव्य-विधा, हाइकु, हिन्दी साहित्यालोक में आज खूब फल-फूल रही है. तरह तरह से इसे परिभाषित किया गया है. जैसे यह एक थोड़े में बड़ी बात कहने वाली विधा है. यह एक 5-7-5 अक्षरों वाली केवल तीन पंक्तियों की कविता है. यह मूलत: प्रकृति को अपने काव्य का विषय बनाती है, इत्यादि. लेकिन एक बात जिसपर लोगों का ध्यान कम ही गया है वह यह है कि हाइकु एक मुक्तक काव्य है जिसमें हर हाइकु केवल एक बात कहकर अपनी पूर्णता प्राप्त कर लेता है. हाइकु काव्य बड़े बड़े गीत नहीं रचता, कहानियां नहीं सुनाता. महाकाव्यों की रचना नहीं करता. थोड़े में ही संतुष्ट रहता है. प्रश्न यह है कि ये छोट छोटे काव्यरत्न उसे कहाँ से मिलते है कि जिन्हें वह अपनी नन्हीं सी देहयष्टि में सजा लेता है.

     कवयित्री पुष्पा मेहरा ने इसका उत्तर ढूँढ़ निकाला है और उत्तर है, ‘सागर-मन’ । हमारा मन सागर की तरह है. इस मन में न जाने कितनी मणियाँ छिपी पडी हैं. मन की उद्दाम लहरों के साथ वे कभी कभी ऊपर आजाती हैं और हाइकु उन्हें लपक लेता है. ज़रा सुनिए, क्या कहती हैं पुष्पा जी –

          हाइकु विधा / सागर की लहर / उमड़ चली

          हाइकु बाग़ / सुन्दरतम बाढ / यह भावों की

          सरोवर ये / खिले रहें कमल / हर रंग के

आशय यह है कि पुष्पा जी हाइकु को हर रंग में देखना चाहिती हैं. उसे वे किसी एक रंग में नहीं रँगना चाहतीं हमारे सागर मन मे न जाने कितनी भावनाएं – एक दूसरे से पूर्णत: स्वतन्त्र – उमड़ती-घुमड़ती रहती हैं और वे सभी एक एक कर हाइकु-अणुओं में सजाई जा सकती हैं. सजाई जाना चाहिए. रामेश्वर काम्बोज’ हिमांशु’ ने इस हाइकु-संग्रह के लिए अपनी प्रस्तावना में ठीक ही कहा है – “सागर मन’काव्य का बीज मन्त्र है।” ।

    काम्बोज जी ने नि:संकोच सागर-मन की कवयित्री, पुष्पा मेहरा, के लिए यह भी लिखा कि ‘हिन्दी हाइकु  जगत की इस विनम्र साधिका ने सात दशक पूरे करने के बाद हाइकु रचना शुरू किया’. मैंने यह संग्रह बड़े ध्यानपूर्वक पढ़ा है और मैं अधिकार पूर्वक कह सकता हूँ कि हाइकु लेखन इतनी देर से शुरू करने के कारण हिन्दी-जगत को बड़ी हानि हुई. वह वर्षों पुष्पा जी की प्रतिभा से महरूम रहा.

   पुष्पा जी हाइकु के सम्बन्ध में बेशक एक उदार दृष्टि अपनाती हैं और ‘हर रंग के’ हाइकुओं की पक्षधर हैं किन्तु सागर मन पड़ने के बाद इसमें भी कोई संदेह नही कि उन्होंने अपने सर्वश्रेष्ठ हाइकु प्रकृति को लेकर ही लिखे हैं. प्रकृति के प्रहर, ऋतुएँ, उसकी पल पल बदलती छटाएं उन्हें मुग्ध कर देती हैं. प्रकृति के चारों याम – सुबह, दोपहर, साँझ और रात्रि – सभी के मनोरम दृश्य उनके मन पर गहरी छाप छोड़ते हैं ।पुस्तक का पहला खंड (प्रकृति के) ‘रूप हैं न्यारे’ में सबसे पहले उन्होंने सूर्य के उगने से लेकर उसके अस्त होने तक के विविध रूपों का काव्यात्मक उल्लेख किया है. सुबह होते ही माँ (वि)भोर होकर अपनी गोद में अपने लाडले तारे – शुक्र तारे- को उठा लेती है. वही तो उसका राज दुलारा है ! सारी पृथ्वी ‘भैरवी’ (सुबह का राग) गाने लगती है, चिड़ियाँ कलरव करने लगती हैं. फूल खिल उठते हैं.

          भोर की गोद / बैठा है शुक्र तारा / राजदुलारा /

          बजी भैरवी / जाग उठा सूरज / धरा पे आया

          मुखर भोर / चहके पक्षी दल / खिले कमल

सुबह की यह भैरवी जागरण की भैरवी है. मौज मस्ती के लिए नहीं है. यह कर्म का आह्वाहन है –

          तापस सूर्य /दिनरात करता / कर्म निष्काम.

          इसी सूर्य से प्रेरणा लेकर   

          सुहानी प्रात / ले हल और बैल / चला किसान

कवयित्री समर्पण भाव से कर्म के लिए निरंतर प्रेरित करती प्रतीत होती है. ‘सागर की लहरें’ खंड में भी वह अपने दार्शनिक अंदाज़ में यह कहने से नहीं चूकती की यह कर्म ही है जो अकर्म के जाल को काट सकता है. अत: पौधा रोपने के लिए चलो खुरपी ले आएं.

          कर्म कुदाल / काटती नित नित / अकर्म शाख

          चलें मेले में / खरीद लें खुरपी / रोप दें पौधा

दिन चढता चला जा रहा है. सूर्य का ताप और तेजस्विता अपने चरम पर आ जाती है. ‘दमक रहा / लाल टीका सोने का / तेज से पूर्ण’ । लेकिन यह तेज चिरस्थाई नहीं है. सूर्य तो अतिथि की तरह आता है और चला जाता है – ‘अतिथि था वो / धीरे से जाने लगा / पश्चिम गली’ . जैसे जैसे  ‘धीरे से सूर्य / सागर के दिल में / समाता गया’ रात घिर आई. और तब,

          नभ मोहल्ला / नक्षत्र दें पहरा / सोई है रात

          आई चांदनी / छोड़ चाँद का घर / धरा से मिली

    जिस तरह कवयित्री को दिन के चारों प्रहर न केवल सुन्दर लगते हैं बल्कि सन्देश देते प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार एक दूसरे के बाद क्रम से आती ऋतुएँ, बदलते मौसम, भी उन्हें अति आकर्षित करते हैं. . वसंत ऋतु ऋतुराज है. वह ‘धूम मचाती, रंग उडाती’ ‘नार छबीली’-सी आती है और हर किसी को अपने मोह जाल में फांस लेती है. –

          खेलेंगे होली / आज कान्हा रसिया / भीगेगी राधा

          स्वर्ण किरण / रंग पिचकारी ले / सबको रंगे

          स्वर्ण चिरैया / मन मन रीझती / उड़ती फिरे

          उड़े तितली / पी-पी कुसुम मधु / चूमती कली

          इठला रही / प्रकृति, काम-घर / आज ज्योनार

पुष्पा मेहरा ने जी रूमानी अंदाज़ से वसंत ऋतु में प्रकृति का वर्णन किया है, वह संस्कृत भाषा के प्राचीन कवियों की याद दिला देता है. वसंत के बाद ग्रीष्म ऋतु आती है. यह गरमी का मौसम है और अधिकतर लोगों को रास नहीं आता. लेकिन करिश्मा देखिए, इस भीषण गरमी में भी

          पुष्प थाल ले / गुलमोहर हँसे / दिल खोल के

यही तो जीवन्तता है.   

      गरमी से बेहाल धरती वर्षा का शिद्दत के साथ इंतज़ार करती है. कब वर्षा की बूँदें पड़ें और कब धरती का ह्रदय शांत हो, कब फुहारें पड़ें और कब सावन के झूले डाले जाएं. धरती हरियाती है तो मन हर्षित हो उठाता है.

          बूँदों ने चूमा / हवा ने सहलाया / विभोर धरा

          ठंडी फुहारें / हिंडोला सावन का / यादें पिया की

          हरी चूड़ियाँ / हरी हरी धरती / हरा है मन

     वर्षा समाप्त हुई नहीं कि रजत रुपहला शरद आ धमकता है. आकाश से सारे बादल गायब हो जाते हैं. सब कुछ स्वच्छ और पारदर्शी. चन्द्रमा अपनी उज्जवल चादनी से धरती पर छाए अन्धकार को हर लेता है.

          चाँद पूनों का / चूनर चाँदनी की / धरा ने ओढ़ी

          रजत-स्रोत / झर रहा अटूट / मुग्ध है धरा

          दूधिया चाँद / माथे दिठौना लगा / खड़ा छौना -सा   

कितने ही औषध-पौधे शरद ऋतु में ही फलते फूलते है. पुष्पा मेहता ‘तुलसी’ को विशेषकर याद करती हैं. विष्णु की प्रिया, तुलसी को ‘वृंदा’ भी कहा जाता है –

          खान गुणों की / तुलसी मन भाई / विष्णु की प्रिया

          जीवित वृंदा / कार्तिक-मास हरी / पीकर जल

शरद और शिशिर, ये दोनों ही ऋतुएँ सर्दी का मौसम लाती हैं. शीत ऋतु में पहाड़ों पर बर्फ जम जाती है और लगता है कि –

          तापस वेशी / बर्फानी बाबा हैं ये / धूनी रमाए

          साधे हैं मौन / हिम वस्त्र धारे हैं / ऊँचे शिखर

ऐसा प्रतीत होता है की रोशनी और कोहरे में दौड़ की एक प्रतिद्वंद्विता -सी चल रही है. कभी कोहरा उजेले की राह रोकता है तो कभी तो कभी प्रकाश धुंध को धक्का देकर धरती पर उतर आता है. कोहरे और किरण की यह खींचा-तानी देखते ही बनती है  —

          हारी रोशनी / बिछा शीतल पाटी / लेटा कोहरा

          शीत धुनकी / फैलाती धरा पर / पाले की रुई

          चेता सूरज / धुंध को धक्का दे के / उतारा नीचे

          देखते रहे / कोहरे किरण की / भी खींचा-तानी 

    शीत ऋतु के कुछ चित्र तो बेहद मनमोहक हैं. कहाँ काँटों की कठिन नोक और कहाँ ओस की तरल बूंद और फिर दोनों का मिलाप. इसी तरह ओस की ठंडी बूंदों का बिजली के गरम तारों पर कतार बाँध कर सज जाना. –

          शूलों की नोक / ओस बूँदें आ रुकीं / हीरे से सजी

          ओस की बूँदें / बिजली के तारों पर / पोत सी सजीं.

    शीत के बाद और वसंत से पहले आने वाला पतझर का मौसम अधिकतर नकारात्मक विचारों का वाहक होता है. – ‘हरे थे पत्ते / उजड़ गया रूप / शिशराघात’ – लेकिन कवयित्री का सकारात्मक सोच देखिए. वह कहतीं हैं –

          पत्ते जो गए / वे कहके गए थे / ‘आएँगे फिर’

    कवयित्री की कल्पना हर जगह अपना ठौर ढूँढ़ लेती है. मन है कि बार बार कल्पना के पीछे पीछे भागता है  – (‘मन अहेरी / घूम घूम पकडे / कल्पना परी’) लेकिन कवयित्री ये भी जानती है कि केवल कल्पना से ही काम चलने वाला नहीं है. कल्पना तो नदी की तरह है जो तरह तरह के रूपों में प्रकट होती है और बदलती रहती है, (कल्पना नदी / अनेक मुद्राओं में / बदले रूप ) स्वप्न के इन बदलते रूपों में हमारा पलायन हमें अपने ठोस यथार्थ से काट देता है. अत: पुष्पाजी कहती हैं –

          सोने न देती / सपनों की दुनिया / रातों जगाती

          छोड़ो देखना / स्वप्न छली बहुत / जी लो यथार्थ   

    अत; वे स्वप्न व कल्पना को छोड़ कर सामाजिक धरातल पर उतर आती हैं. सामाजिक स्तर पर उन्हें सबसे महत्वपूर्ण नाते-रिश्ते ही दिखाई देते हैं.

          रिश्तों की डोर / रेशमी सतरंगी / बांधती मन

          सम्बन्ध सूत्र / ज्यो बट रस्सी बटे / बँटे ही रहे

कुछ सम्बन्ध बनाए जाते हैं कुछ बने-बनाए मिलते हैं. मित्र ज़ाहिर है, बने बनाए नहीं मिलते. यह तो विश्वास का रिश्ता है. इसी प्रकार प्रियतम / प्रियतमा का सम्बन्ध भी है, जो प्यार पर टिका है. –

          रिश्ता दोस्ती का / विश्वास पर ही टिका / वक्त पारखी

          सुनो तो प्रिय / रिश्ता हमारा प्यारा / सात जन्मों का

सारे के सारे रिश्ते इस प्यार और विशवास की धुरी पर ही टिके हैं. जहां विश्वास टूटा और प्यार को ठेस लगी रिश्तों में दरार आ जाती है. ऐसे में कितना ही जोड़ते रहो ‘टूटी धुरी रिश्तों की / जुडी ही नहीं !

    बेटे-बेटियाँ, माता-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी, नाना-नानी – ये सारे सम्बन्ध खून के रिश्ते हैं. ये हमें बने बनाए मिलते हैं. पुष्पा मेहरा इन रिश्तों का वर्णन बहुत संवेदनशीलता से करती हैं, बेटी –

          माँ की आँखों में / अश्रुधारा देखे तो / चुन्नी से पोंछे

          खिली है कली / नम्र डालियाँ झूमीं / हंसी जो बेटी

          झूलती बेटी / यादों के पालने में / सदा मन में

   माँ का प्रेम तो अतुल्य है. माँ कितनी ही दूर रहे सदैव मन में बसी रहती है. उसकी सुगंध तो अंग अंग में बसी है. कष्ट के समय यदि वह वास्तव में अनुपस्थित भी है तो स्वप्न में राहत देने आ खडी होती है –

          कौन न जाने / प्रेम की परिभाषा / माँ स्पष्ट व्याख्या

          लबों से सटी / बसी है शिराओं में / नहीं है दूर

          मधु सुगंध / भरे अंग अंग, माँ / मलय गंध

          काँटा जो चुभा / माँ सपनों में आई / निकाल गई

    शायद ही कोई ऐसा हाइकुकार हो जिसने ‘यादों’ को याद न किया हो. २-३ वर्ष पहले ही ‘यादों के पाखी’ शीर्षक, एक हाइकु संकलन में लगभग ५० रचनाकारों के याद-सम्बंधित हाइकु प्रकाशित हुए थे. पुष्पा मेहरा ने भी यादों को भुलाया नहीं है. ‘सागर-मन’ में यादें शीर्षक से पूरा एक खंड है जिसमें यादें उनके लिए कभी चिड़िया या तो कभी हिरनी की तरह उड़ती, चौकड़ी मारती आती हैं; कभी वे वर्षा की बूँदें बन जाती हैं तो कभी धूप तो कभी चांदनी हो जाती हैं; कभी बिछौने की तरह बिछ जाती हैं तो कभी कोई किताब की तरह खुल जाती है जिसे बिछौने पर लेट कर पढ़ा जा सके –

          याद चिरैया / ढूँढ़-ढूँढ़ लाती है / खोई सौगातें

          चौकड़ी भरें / मन उपवन में / हिरणी-यादें

          वर्षा की बूँदें / मन-चषक भरें / यादों के मोती

          यादें निगोड़ी / कभी ताप सूरज / कभी चांदनी

          धागे यादों के / बिछौना बना लेटी / मैं उम्र भर

          खोली किताब / मुरझाया गुलाब / ताज़ा हो गया  

    यथार्थ के धरातल पर उतर कर पुष्पा जी बाल श्रम, भिखारी और पर्यावरण पर भी निगाह डालती हैं. उन्हें अत्यंत दुःख होता है जब वह मासूम बच्चों को बर्तन मांजते, झाडू लगाते या फिर भीख माँगते, दर दर भटकते  देखती हैं. निरीह वृक्षों को कटते हुए देखना भी उतना ही कष्टदायक है –

          ढेर बर्तन / माँजती है गुरिया / मार भूख की

          लिए कटोरा / दर दर भटके / अम्मा का चाँद

          खामोश वृक्ष / चाहते हैं जानना / भेद कर्तन

    जीवन जब काँटों की सेज बन जाता है, उस समय हमारे अपने आंसू ही एकमात्र साथी रह जाते हैं.

          खामोश आँखें / दर्द बाँटने चलीं / बहने लगीं

          भाव मधुर / हुए लावण्यमय / बहे जो आँसू

          अश्रु सरिता / डूबती-उतराती / मीन-पुतली

          पुस्तक का आख़िरी खंड – ‘सागर की लहरें’ जीवन और जगत के प्रति समर्पित है. इसमें आचरण संबंधी  कुछ सत्य निरूपित किए गए हैं जो सहज ही मन में घर कर जाते हैं. वह स्पष्ट देखती हैं कि ज़िंदगी एक ऐसे बाज़ार की तरह है जिसमें सुख-दुःख का व्यापार अपना जाल फैलाए है. हमारा शरीर एक हवेली है जिसमें मन पक्षी स्वतंत्रता के लिए फडफड़ा रहा है. यहाँ अफवाहें आग की तरह फैलती हैं. हर जगह भागमभाग है, और हमारा मन शान्ति के लिए आकुल-व्याकुल है. यहाँ शिकारी पग-पग पर घात लगाए बैठे हैं, फिर भी जीव-जंतु नि:शंक घूमते फिरते हैं. हर तरफ आग ही आग है, और हर इंसान अपना दामन बचाता फिरता है. इत्यादि.

          फैलाए जाल / व्यापार-सुख-दुःख / जीवन हाट

          फड़फडाए / सदा पखेरू मन / हवेली तन

          बढ़ती गई / फ़ैल कर आग सी / बात ज़रा सी

          भागमभाग / कहाँ जा बसी शान्ति / आकुल मन

          पशु नि:शंक / शिकारी पग-पग / लगाए घात

          आग ही आग / पल्लू बचाता फिरे / हर इंसान

          ऐसे, और न जाने कितने सांसारिक सत्य सागर मन में उथल-पुथल मचाए हुए हैं, जिन्हें समर्थ कवयित्री वाणी देने में सफल हुई है.    

    सागर मन पुष्पा मेहरा का प्रथम हाइकु संकलन है. लेकिन इसका सोच और शिल्प परिपक्व है. ये हाइकु अपने काव्यात्मक गुणों और सटीक अभिव्यक्ति के लिए जाने-पहचाने जाएंगे. सागर-मन की इस लेकिका को मेरा प्रणाम और अभिनन्दन.

सागर- मन / पुष्पा मेहरा / अयन प्रकाशन, 1/20 , महरौली नई दिल्ली -110030, संस्करण: 2015 / मूल्य, रु. 220/-  पृष्ठ:104

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Responses

  1. आ०पुष्पा जी “सागर मन” हाइकु संग्रह हेतु बहुत बहुत बधाई।

    डॉ०सुरेन्द्र वर्मा जी द्वारा की गई समीक्षा हाइकु संग्रह का प्राणतत्व है।बेहद खूबसूरत हाइकु और उतनी ही गहन समीक्षा दृष्टि सोच के दायरे को विशालता की ओर ले जाती है।

    शुभकामनाएं।।

  2. वरिष्ठ कवयित्री पुष्पा जी को सागर – मन के लिए, समीक्षक डा , सुरेन्द्र जी , प्रस्तवना लिए भाई हिमांशु जी को हार्दिक बधाई .

    सभी ने अपनी विद्वता का परिचय दिया
    वास्तव में सागर – मन के मंथन से भावो के बेशकीमती हाइकु मोती लाजवाब हैं

    डा सुरेन्द्र जी समीक्षा से गागर में सागर भर दिया .
    यह किताब विश्व साहित्य जगत में मिल का पत्थर साबित हो .

  3. सुरेन्द्र वर्मा जी आपने पुष्पा मेहरा जी की सागर-मन की जो समीक्षा की है वह सराहनीय है |पुष्पा जी को हार्दिक बधाई के साथ साथ भाई सुरेन्द्र जी को भी हार्दिक बधाई |

  4. sundar pustak kii bahut sundar sameekshaa …padhakar mn aanand se bhar gayaa . aadaraniyaa pushpaa ji evam dr. varma ji ko haardik badhaii !

  5. आदरणीय पुष्प वर्मा जी को “सागर-मन” के लिए कोटि कोटि बधाई। शुभकामनायें

    सागर -मन की जो समीक्षा डॉ. सुरेन्द्र वर्मा जी ने की है उसे पढ़कर लगा ज्यो मन का सागर आँखों के सामने आ गया। मन पूरी पुस्तक पढ़ने के लिए लालायित हो उठा। सुरेन्द्र जी को हार्दिक बधाई

  6. माननीय वर्मा जी ‘ सागर- मन’ की समीक्षा लिख कर पुस्तक को मान दिया मैं उनकी आभारी हूँ, साथ ही पूर्णिमा जी,मंजू जी,सविता जी,ज्योत्स्ना जी व मञ्जूषा जी से प्राप्त प्रशंसा समीक्षा के माध्यम से पुस्तक को मिला बेशकीमती उपहार है , मा. वर्मा जी की
    लेखनी को नमन तथा हाइकु परिवार से जुड़े उपरोक्त रचनाकारों को धन्यवाद|

    पुष्पामेहरा

  7. आदरणीय “पुष्पा मेहरा जी सागर-मन” के लिए कोटि कोटि बधाई। शुभकामनायें
    सुरेन्द्र वर्मा जी आपने पुष्पा मेहरा जी की सागर-मन की जो समीक्षा की है वह सराहनीय है |शुभकामनाएं।

  8. sagar man ke liye bahut bahut badhai…samiksha bhi bahut achhi likhi aapko bhi bahut bahut badhai..

  9. बहुत सुन्दर और सार्थक समीक्षा कर दी है सुरेन्द्र वर्मा जी ने…पुष्पा जी के साथ साथ आपको भी बहुत बधाई…|


रचनाओं से सम्बन्धित आपकी सार्थक टिप्पणियों का स्वागत है । ब्लॉग के विषय में कोई जानकारी या सूचना देने या प्राप्त करने के लिए टिप्पणी के स्थान पर पोस्ट न करके इनमें से किसी भी पते पर मेल कर सकते हैं- hindihaiku@ gmail.com अथवा rdkamboj49@gmail.com.

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