Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 18, 2015

हाइकु की सुगंध


                               हाइकु की सुगंध

                                डा.सुरेन्द्र वर्मा

संतोष कुमार सिंह का हाइकु संग्रह हाइकु सुगंधा मेरे समक्ष है. इस संग्रह में उनके 280 हाइकु संकलित हैं. विषय-वस्तु की दृष्टि से अधिकतर हाइकु आज के सामाजिक परिवेश पर समीक्षात्मक टिप्पणियाँ हैं. किन्तु ये टिप्पणियाँ haiku-sugandhaप्राय: प्रकृति के बहाने प्रस्तुत की गई हैं. संतोष कुमार जी स्वयं ही अपने प्राक्कथन, ‘हाइकु कविता : एक दृष्टि’ में कहते हैं की प्रकृति के साथ हाइकु का अनन्य सम्बन्ध है. किन्तु वे हाइकु को प्रकृति काव्य नहीं मानते, अपितु प्रकृति के माध्यम से ‘मानव जीवन में नित्य अनुभूत शाश्वत सत्यों की अभिव्यक्ति’ के रूप में उसे देखते हैं. हिन्दी हाइकु साहित्य में ‘हाइकु’ और ‘सेन्र्यू’ का भेद अब धुंधला पड़ चुका है. सेन्र्यू शुद्ध लौकिक धरातल पर जगत की विषमताओं और दुर्बलताओं को अपना विषय बनाता है. किन्तु इस प्रकार की रचनाएँ भी हिन्दी में “हाइकु” ही कहलाती हैं. ‘हाइकु सुगंधा’ में हमें प्राय: इसी प्रकार की रचनाएँ मिलती हैं.

    संतोष जी अपने संकलन का आरम्भ माँ के आशीर्वाद से करते हैं और हर माँ अपने बच्चे को यही आशीर्वाद देती है कि – ‘रहो फूल से / बिखरो सुगंध से / हर दिशा में |’

    माँ के लिए तो उसका बच्चा कैसा भी हो उसे अत्यंत प्यारा होता है. इस बात को कवि ने बड़े रंगीन अंदाज़ में कहा है, – ‘गोरा न काला / मैया के लिए बेटा / होता है लाल |’ लेकिन आज की विडम्बना देखिए कि बड़े होकर यही बच्चा अपनी माँ को पूछता तक नहीं. कभी कभी तो, जैसा कि कवि ने कहा है, ऐसी स्थिति तक आ जाती है की “माँ हुई राख / फिर भी नहीं आया / कोख का जाया” इससे अधिक दु:खद और क्या हो सकता है! भले ही ऐसी स्थितियाँ  अपवाद ही क्यों न हों लेकिन वे समाज के विमूल्यों की ओर संकेत तो करती ही हैं. वस्तुत: आज का समाज इतना खुदगर्ज़ हो गया है कि

        प्रेम के धागे / टूटते चट चट / स्वार्थ के आगे

    राजनीति में आज विकास की बड़ी बड़ी बातें की जाती हैं ; लेकिन जिस तरह का विकास हो रहा है, उसे देख कर हर कोई आश्चर्य चकित है. कवि अपने ही अंदाज़ में यही बात कुछ इस तरह कहता हैं. –

        सड़कें चौड़ी / दिल हुए हैं तंग / ईश्वर दंग

हमारा समाज आज इतना असंवेदनशील हो गया है कि वह श्रमिक का श्रम अनदेखा कर देता है. कोठी बनाने वाले का पसीना कोठी में बैठे लोग नहीं देख पाते

देखा किसने है? / श्रमिक का पसीना / किसी कोठी में

    पत्नी की एक मुस्कान सारी थकान दूर कर देती है, -‘मेरी थकान / दूर करे पत्नी की / एक मुस्कान’- लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो चंद पैसों और भौतिक मांगों की पूर्त्ति के लिए घर की बहू पर बेतहाशा ज़ुल्म ढाते हैं –

        बहू की चीखें / चीर गईं सन्नाटा / काँपी दिशाएँ

आज के समय में पराए तो पराए हैं ही, अपने खून के रिश्तों का भी कोई लिहाज़ नहीं रह गया है. संकीर्ण स्वार्थ ने सब कुछ नष्ट- भृष्ट कर दिया है. हमारे रिश्ते इतने उलझ गए हैं कि सुलझाने का नाम ही नहीं लेते. स्वार्थ की आंधी कुछ ऐसी चली है कि सम्बन्ध जड़ से उखड गए हैं. और इसपर तुर्रा यह है हमारे रिश्तों को कोई पराया नहीं बल्कि अपने लोग ही बिगाड़ रहे हैं —

        गिर रहा है /प्रत्येक मौसम में /रिश्तों का पारा

        पराए नहीं/ अपने ही करते हैं/ रिश्तों का खून

        गैर न देते / देता है दर्द ज़्यादा / अपना खून

        बन गए हैं / उलझे हुए धागे / रिश्ते हमारे

        उखड़ जाती / स्वार्थ की आँधी में / रिश्तों की जड़ें

        डाल देता है / सम्बन्धों में दरार / स्वार्थी भूकम्प  

पारस्परिक सम्बन्धों को किसी भी कीमत पर बिगड़ने से बचाना ही होगा. कवि संतोष कुमार सिंह इसीलिए हमें सलाह देते हैं कि रिश्तों को स्वार्थ की कड़ी धूप से बचाने हेतु

        प्यार से सींचो / मुरझाने न पाएँ / रिश्तों के पौधे   

         विकास आज एक नारा बन कर रह गया है. विकास के नाम पर खेत हड़पे जा रहे हैं. किसानों की छाती पर मूँग दली जा रही है. गाँव उजड़ गए हैं. गावों में पानी की टंकियाँ  बना दी गईं हैं ;लेकिन पानी नहीं है. बड़े बड़े शहर और नगर बसाए जा रहे हैं ,वहाँ बड़े बड़े आलीशान मकान तो बन गए हैं, लेकिन रहने वालों के दिलों में आत्मीयता ख़त्म हो गयी है –

        हर विकास / खेतों की छाती पर / मूँग दलता

        खेतों की छाती / काली काली सड़कें / साँसी लेटीं

        ड़ी उदास / गाँव में ही प्यासी / पानी की टंकी

        बड़ा शहर / मकान तो बहुत / घर हैं थोड़े

इन महानगरों में कोई सुरक्षित नहीं है. हम किसी पर यहाँ विश्वास नहीं कर सकते. हम जिन्हें ख़ास अपना समझते हैं वे ही धोका दे जाते हैं. बहू बेटियों को बचाने व़ाला यहाँ कोई नहीं रहा –

        पाले हैं तूने / विश्वास के परिंदे / वे ही दरिन्दे                                                                          

        शूलों से नहीं / मानव देख काँपे / डाली के फूल

      चीखती रही / चिड़िया थी अकेली / घेरे थे बाज़   

      परिस्थितियाँ नि:संदेह बहुत विषम हैं किन्तु कवि को अपने ऊपर बहुत विश्वास है. उसे पता है कि –

        बोती कलम / दमन के विरुद्ध / क्रान्ति के बीज, 

        शान के लिए / लडे हैं रातभर / तम से दिए,       

        भगा देता / चाँद को तालाब से / एक कंकड़  

     संतोष कुमार सिंह जी अपनी हाइकु रचनाओं में सामाजिक दुःख-दर्द से जूझते हैं; लेकिन वह अपनी काव्यात्मक तरलता को भी बचाकर रखे हुए हैं. उन्होंने अपनी पुस्तक का नाम ‘हाइकु सुगंधा’ रखा है. वह अपनी रचनाओं के जरिए खुशबू बिखेरना चाहते हैं न कि दुर्गन्ध. वे जब भी प्रकृति की ओर उन्मुख होते हैं, वह उसके सौन्दर्य से अविभूत हो जाते हैं. वे अनुभव करते हैं कि फूलों की सुगंध को वायु चारों तरफ फैलाती है, कि रात की रानी रात भर अपने महकते गीत गुनगुनाती है, कि अमलतास अपने बदन पर हल्दी लगाकर दूल्के का रूप धारण कर लेता है, कि, बरखा रानी पायल बाँध कर धरती पर उतर आती है, कि शर्मीली लताओं को ज़रा प्यार से छू तो लीजिए वे झट से सिमट-सिमट जाती हैं –

        बाँटती फिरे / सुमनों की सुगंध / हवा निर्द्वंद्व

        रात की रानी / रातभर सुनाए / गंध गीत के

        दूल्हा बना है / तन हल्दी लगाए / अमलतास

        बरखा रानी / पायलिया बजाती / उतरे धरा

        प्यार से छुआ / सिमट गई झट / शर्मीली लता

   जेठ की दोपहर सूर्य अपने ताप से, जो भी सामने आ जाए, उसे जला डालने में कोई कसर नहीं छोड़ता. उसकी गरमी से टेसू का शरीर दहकने लगता है. लेकिन आश्चर्य देखिए, टेसू जलता नहीं. और भला जले भी क्यों? सूर्य तो उसके साथ वस्तुत: होली खेल रहा है! वह तो बस ढाक के वृक्ष को सुर्ख लाल रंग से रंग भर रहा है!  —

        दहक उठी / सूरज के ताप से / टेसू की देह

        जलते नहीं / दहकते बहुत / लू में पलाश

        जेठ में सूर्य / होली खेले ढाक से / रंग दे सुर्ख

   सूर्य की गरमी झेलने वाले पत्तों को तो देखिए, वे तो धूप को भी मात दे देते हैं और

        बना देते हैं / ये जादूगर पत्ते / धूप को साया

   सारी की सारी प्रकृति मूलत: लोक-संग्रह के लिए है. वह विनाशकारी तभी होती है जब उसे नियमों को तोड़ने के लिए मजबूर किया जाता है. ऐसे में क्या पानी और क्या पेड़-पौधे सभी का विकराल रूप देखा जा सकता हैं,-

        पानी जियाए / पानी करे विनाश / तोड़ मर्यादा

    हम वनों को अंधा-धुन्ध काटे जा रहे हैं. यों बाँस लाठी बन कर बुढ़ापे का सहारा होता है, – कवि तंज कसते हुए पूछता है, ‘भाग्य में कौन? / बुढ़ापे का सहारा / बेटा या बाँस’ – लेकिन मनुष्य की करतूतों को देख कर बाँस भी कब तक सहन करें –

        बाँस लड़ते / क्रोध में फूटे ज्वाला / वन जलते

        पीड़ा दें बाँस / घुसे जब तन में / बाँस की फाँस  

   हमें बाँस को,जो बुढापे की लाठी भी है, फूल-पत्तों को, धरती और पानी को, सुगंध और हवा को बचाना ही होगा अन्यथा यदि इन्होंने अपना विकराल रूप धारण कर लिया तो हमारा अस्तित्व भी निश्चित ही खतरे में पड़ जाएगा. यह कोरा कथन नहीं ,चेतावनी है,.       

   हम संतोष कुमार सिंह की नई किताब हाइकु सुगंधा का ह्रदय से स्वागत करते हैं और उम्मीद करते हैं कि उनकी कलम हमें भविष्य में और भी अधिक सुन्दर रचनाएँ रसास्वादन के लिए प्रदान करेगी.

हाइकु सुगंधा : संतोष कुमार सिंह , चित्र-संयोजन-जितेन्द्र सिंह सेंगर; प्रकाशक: साहित्य संगम प्रकाशन , मोती  कुंज एक्सटेंशन, मथुरा-281001, संस्करण:2015 ,  मूल्य , 50 रुपये,पृष्ठ संख्या:60

(डा.)सुरेन्द्र वर्मा

10, एच आई जी /1, सर्कुलर रोड                                                                      

इलाहाबाद – 211001 

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Responses

  1. डा. सुरेन्द्र वर्मा जी ने संतोष कुमार की पुस्तक ‘हाइकु-सुगंधा’ पर बहुत ही सारगर्वित व्याख्या की है जो पुस्तक पढ़ने को प्रेरित करती है। मानव जीवन में अनुभूत शाश्वत सत्यों की अभिव्यक्ति जब प्रकृति के माध्यम से होती है तो उसमे रस रंग और सुगंध स्वतः आ जाती है। दर्द भी आभासित होता है रिश्तों की मर्यादा जब टूटती है। जैसे उन्होंने लिखा है। … पानी जिलाये /पानी करे विनाश /तोड़ मर्यादा। हार्दिक बधाई सुरेन्द्र वर्मा जी इस व्याख्या के लिए। संतोष कुमार सिंह जी को भी अनेक शुभ कामनायें। इस पुस्तक के लिए।

  2. बहुत सारगर्भित और सार्थक व्याख्या…| डॉ सुरेन्द्र वर्मा जी और संतोष कुमार जी को मेरी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ…|

  3. बहुत ही सार्थक और सारगर्भित व्याख्या की है डॉ. सुरेन्द्र वर्मा जी ने। पुस्तक इतना सुन्दर चित्रण किया की पुस्तक पढ़ने जैसा आनन्द प्राप्त हुआ और मन पुस्तक को पढ़ने के लिए उतावला हो उठा।

    बहुत बहुत बधाई डॉ. सुरेन्द्र वर्मा जी

    बहुत बहुत बधाई संतोष कुमार जी

  4. sundar ,saarthak v saargarbhit vyakhya hai ………..pustak ko ..padhne ke liye man jighyasu o utha i ….aadarniy surendra ji evam santosh ji ko haardik badhai .!

  5. mananiy verma ji dwara’ haiku ki sugandh ‘ki bahut hi sargarbhit sameexa ki gayi hai. diye gaye udaharnon se gyat ho raha hai ki kavi ne jan -jeevan ki
    visangatiyon ko haiku ki nanhi – nanhi ungaliyon dwara ukera hai.saty ke dharatal par racha aur vistret vyakhya se prakashit kavy sangrah hetu
    adarniy verma ji va santosh ji ko hardik badhai.
    pushpa mehra.

  6. बहुत बहुत बधाई डॉ. सुरेन्द्र वर्मा जी और संतोष कुमार जी !

  7. उत्कृष्ट समीक्षा हेतु बधाई डॉ. सुरेन्द्र वर्मा जी

    ‘हाइकु सुगंधा’ के लिए बधाई संतोष कुमार जी

  8. बधाई !संतोश कुमार जी।

    उम्दा समीक्षा डॉ०सुरेन्द्र वर्मा जी।


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