Posted by: डॉ. हरदीप संधु | सितम्बर 20, 2015

कोरा कागज़


रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

यह जीवन

किस तरह बाँचूँ

कोरा काग़ज़ ।

-मंजूषा मन

हाइकु  की प्रथम और अन्तिम शर्त यदि कुछ है तो वह है उसका काव्य होना। छान्दस्  शरीर दूसरे स्थान पर है।  इस हाइकु में जीवन ,कागज़ और बाँचना तीनों एक दूसरे में पूर्णतया अनुस्यूत हैं।  संसार के सारे धर्म ,दर्शन और साहित्य  जीवन को लेकर ही  हैं । ये सभी जीवन की व्याख्या करने में और उसको समझने में ही लगे हैं ; लेकिन क्या अभी तक पूर्ण व्याख्या कर पाए हैं या समझ पाए हैं? जीवन के तीन मुख्य आयाम हैं , जिनको सार्वभौम कहा जा सकता है भूत , वर्त्तमान और भविष्य । भूत जो बीत गया , हमने भोग लिया , देख लिया ; क्या हमने उसको बाँच लिया या समझ लिया ? समझा, लेकिन आंशिक । संसार को जाने दीजिए, हमारे अपने जीवन के बहुत सारे रहस्य अनसुलझे ही रह गए । अकारण बहुत से हमारे परिजन नाराज़ हो गए , बिछुड़ गए, शत्रुता निभाते रहे ; क्या हम उनको समझ पाए ? बिल्कुल नहीं । आज जो हमारे सामने वर्त्तमान है , हम उसको कितना बाँच पाए ? सम्भवत: बहुत कम । हो सकता है कल पता चले कि जो बीसों साल से हमारे साथ हैं, एकदम प्राणों की तरह, वे मन में हमारे लिए घृणा पाल रहे हों। हम उनके  बाहरी  अपनेपन को सब कुछ समझते रहें और बाद में पता चले कि वे तो बहुत बड़ा धोखा कर रहे थे । यह ऐसा कटु सत्य है कि मैं या आप सब इस तरह के अनुभव कर चुके हैं । जानते हैं, ठगे जाने पर  सहते हैं; बस चुप रहते हैं, किसी को कह भी नहीं पाते कि हमारा बाँचना व्यर्थ गया।

रही बात भविष्य की ,उसे न कोई जान पाया है , और न जान पाएगा। त्रिकाल की संघर्ष-कथा यही सिद्ध करती है कि जीवन अगर कुछ है तो वह सिर्फ़ कोरा काग़ज़ ही है । उसको बाँचूँ भी तो कैसे ? उसे बाँचना इतना आसान नहीं है।

 यदि कर्मों के सिद्धान्त में विश्वास करें तो पूर्वजन्म की भी मान्यता है और परलोक की भी । अच्छे कर्म करने पर भी जब हम नित्य-प्रति की  दुर्घटनाएँ घटित होते हुए देखते हैं ,तो कह उठते हैं कि यह पूर्वजन्मों का कोई भोग रहा होगा। आज भी अगर कुछ अच्छा करते हैं ,तो साथ ही यह भी सोचते हैं कि हमारा परलोक सुधर जाए।  वह परलोक भी किसने देखा है !

मंजूषा मन का यह हाइकु बहुत सारे शाश्वत प्रश्नों को लिये हुए है। हाइकु की यही विशेषता होती है कि उसमें जितना प्रकटत: कथित होता है , उससे अधिक अनकहा होता है, सागर में तैरते हिमशैल की तरह । वह अनकहा पाठक या प्रमाता  की ग्रहणशीलता पर निर्भर है ।कूजे की और घड़े की ग्रहणशीलता अलग-अलग है। कभी-कभी कोरे कागज में भी कुछ ऐसा ज़रूर रहता है , जो उद्वेलित किए बिना नहीं रहता।  जिस प्रिय को आखिरी  ख़त आया हो, उसके बाद कोई भी सन्देश न आना हो , तो उसके लिए वह ख़त कितना महत्त्वपूर्ण हो जाता है! किसी अज्ञात शाय्रर का यह शेर देखिए-

वो भी शायद रो पड़े वीरान कागज देखकर
मैंने उसको आख़्ररी ख़त में लिखा कुछ भी नहीं ।

अब इस रोने के बहुत सारे अर्थ निकाले जा सकते हैं

 -0-

डॉ सुधा गुप्ता

पत्र सुधा जी

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Responses

  1. काम्बोज भाई आपने सत्रह वर्णों के इस जीवन सम्बन्धी मंजूषा जी के हाइकु की बहुत सुन्दर शब्दों में व्याख्या कर| पूरा जीवन दर्शन हमारे समक्ष रख दिया है भूत ,वर्तमान और भविष्य सभी जीवन के अंग हैं | इसको किस तरह बांचूं | बहुत ख़ूबसूरती से भाव पिरोये हैं |मंजूषा जी को हार्दिक बधाई |

  2. यह जीवन
    किस तरह बाँचूँ
    कोरा काग़ज़ ।

    हिमांशु जी ने समीक्षा से मंजूषा जी के इस जीवन दर्शन हाइकु में गागर में सागर भर दिया .
    दोनों को बधाई .

  3. श्री रामेश्वर जी आप ने कोरा कागज पर जो व्याख्या की है बहुत ही सारगर्भित एवं ग्रहणीय है हाइकु की विस्तृत जानकारी देने वाली। मंजूषा जी का हाइकु तो श्रेषठ है ही उस पर आप की व्याख्या ने मोह लिया। श्रेषठ हाइकु में इतने गुण होने ही चाहिए। तभी पढ़ने का आनंद है। और प्रकाशित करने का भी।
    हार्दिक बधाई।

  4. कितने सरल शब्दों में जीवन के अटूट सत्य को हाइकु में समेटा मंजूषा जी ने और उत्कृष्ट व्याख्या कर भाई हिमांशु जी ने और भी बेहद ख़ूबसूरत कर दिया। आप दोनों को हार्दिक बधाई।

  5. bahut achhi vayakhya ki hai…bahut bahut badhai…

  6. Behad sundar!

  7. वाह…!!! कितनी सुन्दर व्याख्या कर दी आपने इस एक हाइकु की…समग्र जीवन-दर्शन समेट लिया इसमें…|
    बहुत बधाई और आभार…|

  8. utkrisht vyakhya ! haiku apne aap mein behad sundar hai hi par vyakha ka bhi javaa nahin …jeevan darshan ko samahit kar liya hai ismein….bahut bahut badhai bhaiya ji aur manjusha ji ko ….

  9. bhaiji va sudha didi dwara ki gayi, uparokt haiku ki vyakhya jiye gaye jeevan ,
    jeete hue jeevan va bhavishy ke moh mein doobe anpaye ,anjane -anabanche jeevan -satya ko darshata hua darshan ki seedhii chadh raha hai. vastav mein sargarbhit haiku ki ati sargarbhit vyakhya to man mein sanjo rakhane yogya hai.apdono ki lekhani ko naman.
    pushpa mehra.

  10. बहुत खूबसूरत।बधाई

  11. बहुत गहरा अर्थ समेटे सुन्दर हाइकु ..और ..पर्त-दर-पर्त उसे उद्घाटित करती सरल व्याख्या !!
    अनुपम प्रस्तुति …बहुत बधाई मंजूषा जी को और आदरणीया सुधा दीदी एवं भैया जी के प्रति सादर नमन वंदन !!

  12. भाव पूर्ण हाइकु एवं उसकी बहुत सुन्दर व्याख्या । मंजूषा जी को बहुत बधाई। सुधा दीदी एवं कम्बोज जी भाई साहब को नमन ।

  13. आभार कोटि कोटि आभार।

    आदरणीय रामेश्वर जी की व्याख्या ने हमारे साधारण से प्रयास में जान डाल दी।

    आदरणीय सुधा के इस प्रेम के लिए हम जीवन भर आभारी रहेंगे। आपने हमारी लेखनी को सफल बना दिया।

    आप सब से यूँ ही सदैव सीखने मिलता रहे यही आशा है।

    पुनः आभार


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