Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जुलाई 31, 2015

चित्रित हाइकु रचनाएँ


                                  चित्रित हाइकु रचनाएँ  

     कवयित्री  रेखा रोहतगी ने हाइकु परिवार के लगभग सभी सदस्यों से हाथ मिलाया है. वह हाइकु तो लिखती ही रहीं हैं, उन्होंने ताँका और सेदोका विधा में भी रचनाएँ  की हैं।

   ‘हाइगा-वीथि’ रेखा जी अपनी भूमिका के अंत में स्वयं भी कहती हैं,

ये काव्य कृति  /है प्रथम प्रयास/ हाइगा-वीथि

   सचित्र-हाइकु हाइगा कहलाता है. इसे आप चित्रित-हाइकु भी कह सकते हैं. ‘हाइ’ हाइकु का संक्षेप है और जापानी भाषा में ‘गा’ का अर्थ रंग-चित्र से है. हाइगा इस प्रकार एक ऐसा हाइकु है जिसके साथ (उससे सम्बंधित) चित्र भी समाविष्होट हो। हाइकु चित्र के दायरे यह चित्र रंगीन हो सकता है और रंगीन नहीं भी हो सकता है. हाइकुकार स्वयं इसे बना सकता है या अपने किसी हाइकु पर किसी अन्य चित्रकार से भी बनवा सकता है. कभी कभी किसी भी चित्र पर   जो हाइकुकार को लगे कि वह उसके हाइकु के भाव को प्रकट कर रहा है, हाइकु चस्पां कर दिया जाता है और वह हाइगा बन जाता है. आजकल अंतरजाल के माध्यम से तमाम ऐसे सुन्दर रंगीन चित्र उपलब्ध हैं ,जिन्हें हाइगा के लिए काम में लाया जा सकता है. हाइकु रचने में इस प्रकार काफी उदारता बरती गई है. हाइकु का संबंध खुशनवीसी से भी है. कभी कभी कोई हाइकुकार जिस कलम या जिस ब्रश से हाइकु लिखता है उसी से, साथ ही में चित्र भी बना देता है. इसमें कवि की अपनी मौलिकता झलकती है. हाइगा के अंतर्गत हाइकु और चित्र में बहुत कुछ पारस्परिक सम्बन्ध है. चित्र हाइकु को अधिक अर्थवान बनाता है और उसमें गहराई लाता है. इसी प्रकार चित्र में छिपे अर्थ भी हाइकु उजाकर कर सकता है.  

    हर हाइकु में कोई न कोई भाव रहता है. यह भाव निराकार होता है. लेकिन रेखा रोहतगी का कहना है, मन का कोई भाव ऐसा नहीं है जो आकार में न बँध पाए. ज़ाहिर है, किसी भी हाइकु के भाव को जब हम मूर्तिमान् करने की कोशिश करते हैं, (जैसे, उसे रेखाओं में चित्रित करते हैं) तो वह एक आकार पा जाता है. अत: रेखा जी ने भी अपनी कुछ हाइकु रचनाओं को चित्रात्मक रूप देकर ‘हाइगा’ बनाना चाहा और लेखनी के संग तूलिका भी उठा ली. उन्होंने अपने इस प्रयत्न को अपनी ‘आत्मजा-सरीखी सखी’ शची शर्मा को बताया. शशि शर्मा ‘चित्र-कला निपुण’ हैं. और वह रेखा जी के हाइकुओं से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने रोहतगी जी के हाइकुओं के साथ चित्र बनाने का दायित्व स्वयं ले लिया! और इस तरह रेखा जी के हाइकुओं का चित्रण निपुण हाथों में चला गया. शची शर्मा ने रेखा जी के हाइकुओं में व्यक्त –

     मैंने श्रीमती रेखा रोहतगी के तांका-संग्रह ‘घन सघन’ की भूमिका लिखी थी. कुछ हेर-फेर के साथ मैं उसके कुछ हिस्से को फिर से दुहराना चाहूँगा. रेखा जी एक बहु आयामी साहित्यकार हैं. शिक्षा शास्त्री हैं. शिक्षिका रही हैं. उन्होंने विभिन्न संकायों से कई विषयों में स्नातकोत्तर उपाधियाँ प्राप्त की हैं और उनका यह अध्ययन उनके लेखकीय कार्य पर विद्वत्ता का प्रभाव डाले बिना नहीं रहता. किन्तु रेखा जी मूलत: एक कवयित्री  हैं और एक कवयित्री  में जो संवेदनशीलता होनी चाहिए वह उनकी कविताओं में स्पष्ट परिलक्षित होती है. वे अपने छोटे छोटे हाइकु में भी बड़ी बात कह जाती हैं. आत्मालोचन, आत्मविश्लेषण, मन के सरोवर में उठती छोटी छोटी तरंगों को सूक्ष्मता से देखना उन्हें प्रिय है. लेकिन वह अपने परिवेश के प्रति भी सजग हैं.

    ‘हाइगा-वीथि’ में उनके हाइकु मेरे उपर्युक्त मूल्यांकन के अपवाद नहीं हैं. प्रेम से पगी स्मृतियाँ सुखद तो होती ही हैं लेकिन बहुत परेशान भी करती हैं. ज़ाहिर है ऐसी यादों को व्यक्ति भुला देना चाहता है. किन्तु ‘चाहना’ अपनी जगह है, उसको क्रिया-रूप देना बिलकुल अलग बात है. रेखा जी बड़े सहज भाव से कहती हैं,

कैसे भुलाऊँ / तुम्हें कैसे बुलाऊँ / सोच न पाऊँ.

यही तो मुश्किल है. इंसान भुलाना भी चाहता है और जिसे भुलाना चाहता है उसे अपने पास बुलाना भी चाहता है. दिमाग जवाब दे जाता है, ‘सोच न पाऊँ’ !

    जब व्यक्ति अपने प्रिय के साथ होता है वह समझ नहीं पाता कि उसने प्रिय के व्यक्तित्व में स्वयं को  विलीन कर अपने को खो दिया या प्रिय को पाकर वह और समृद्ध हो गया. यही तो असमंजस है –

पाती कि खोती / खुद को तेरे संग / जान न पाती.

    व्यक्ति के साथ सुख और दुःख जुड़े हुए है, बारी-बारी से आते जाते हैं. रेखा जी को लगता है की सारी ज़िंदगी सुख-दुःख के इन्हीं तागों से बुनी गई है. ऐसी विरोधाभासी स्थितियाँ केवल सुख-दुःख की ही नहीं, अन्य भी हो सकती हैं. रात-दिन भी तो बारी बारी से आते हैं. रात अंतत: प्रात को जगह देती है और हर सुबह शाम में बदल जाती है. इसी सनातन सत्य को रेखा जी, कबीर की याद दिलाते हुए, अपने ही अंदाज़ में कहती हैं-  

काल जुलाहा / बुनता ताना बाना / रात दिन का

     वर्षा के दिनों में कुछ ज्यादह ही सालती है प्रिय की अनुपस्थिति. आँखे भर आती है. उधर बादल भी भरे बैठे हैं. दोनों स्थितियां ‘अब बरसें कि तब बरसें’ जैसी है. लेकिन कवयित्री  के अनुसार –

होड़ लगाई / बादलों ने आँखों से / तो मात खाई !

रेखा रोहतगी अपने परिवेश को लेकर भी काफी चिंतित हैं. हमारे समाज में कथनी और करनी में बड़ा फर्क है. जिसे पूज्य मानते हैं उसी को कष्ट देते हैं और इस विरोधाभास पर हमारा ध्यान भी नहीं जाता. नारी को हम देवी कहते हैं ;लेकिन हमारा उसके लिए बर्ताव देवी क्या, मानवी तक नहीं है, पाशविक है. इसी तरह जिसे हम ‘महत्तर’ (महत् से भी बढ़कर) कहते हैं, वह आज भी सामाजिक रूप से अस्पृश्य है. अत: रेखा जी ठीक ही कहती हैं –  

कष्ट है पाती / गाय – गंगा – धरती / माँ कहलाती

    रेखा जी ने ठीक ही कहा है, ‘एक एक हाइकु के कथ्य- तथ्य -सत्य की संवेदना को ग्रहण कर’ शशि शर्मा ने चित्रों में अपनी हाइकु मर्मज्ञता दिखाई है. सभी चित्र हाइकुओं से मेल खाते बहुत सुन्दर बन पड़े हैं।

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हाइगा वीथि/ रेखा रोहतगी / पलाश प्रकाशन, शहादरा, दिल्ली / २०१५ / आवरण और चित्रांकन, शची शर्मा

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      डा. सुरेन्द्र वर्मा /१०, एच आई जी / १ सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१

(मो – ०९६२१२२२७७८

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Responses

  1. रेखा रोहतगी ki kriti हाइगा वीथि ki saargarabhit , satik smaalochnaatmak samikshaa sidhd hast saahitykaar डॉ.सुरेन्द्र वर्मा, ji ki bhaashaai jaadu ka chamtkaar dikhaai detaa . haiku – haaigaa ki ni jaankaari bhi mili .

    nisvaarth शशि शर्मा ‘चित्र-कला निपुण’ unhone sundr chitraankn kiyaa . sone men suhaagaa

    sabhi ko badhaai

  2. sundar pustak par bahut saaargarbhit prastuti ! pustak ke marm ko udghaatit kartii abhivyakti !
    aadaraneeyaa rekhaa ji evam adaraneey dr. varma ji ko haardik badhaii !

  3. aalekh achha laga meri hardik shubhkamnayen…

  4. rekha ji” haiga -veethee” mein haiku ke adhar par chitron mein laxit bhav –
    niroopan har haiku ko apani alag pahchan de raha hai. nana bimbpradhan
    haiku mananiya varama ji dvara ki gayi samixa pakar aur adhik sunder roop mein ubhar kar aye hain.rekha ji apko badhai tatha varma ji ki lekhni ko naman.
    pushpa mehra.

  5. बहुत सुंदर समीक्षा !
    हार्दिक बधाई आदरणीय सुरेन्द्र वर्मा जी !
    निश्चित रूप से हाइगा वीथि भी बहुत सुंदर है !
    रेखा रोहतगी जी इस पुस्तक प्रकाशन हेतु हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ !

    ~सादर
    अनिता ललित

  6. हाइगा वीथि की समी क्षा की प्रस्तुति
    के लि ए सम्पादक द्वय का हृदय से आभार
    सटीक सुन्दर समी क्षा के लि ए डाॅ.वर्मा का
    बहुत बहुत धन्यवाद । मंजु जी डाॅ ज्योत्स्ना
    डाॅ भावना पुष्पा मेहरा जी एवम् अनिता
    ललित जी का हार्दिक आभार ।

  7. रेखा जी आपको आपकी पुस्तक के प्रकाशन के लिए हार्दिक बधाई

  8. हाइगा वीथि पुस्तक प्रकाशन के लिए रेखा जी को बहुत -बहुत बधाई एवं डॉ सुरेन्द्र वर्मा जी ने बहुत सारगर्भित समीक्षा की है तथा संपादक द्वय ने हमारे अवलोकनार्थ यहाँ प्रकाशित किया है ,,,सभी को बधाई एवं शुभकामनाएं …..

  9. बहुत सुन्दर और सार्थक समीक्षा…| रेखा जी को पुस्तक के लिए बहुत बधाई…|


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