Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जुलाई 16, 2015

एक सम्पन्न हाइकु -संसार


                                    डासुरेन्द्र वर्मा       

      ओस नहाई भोर डाज्योत्स्ना शर्मा का प्रथम हाइकु संग्रह है। किन्तु हाइकु और हाइकु परिवार की अन्य विधाओं से 10-OS NAHAI BHORउनका परिचय नया नहीं है। वह इससे पहले एकाधिक हाइकु, सेदोका, और चोका के संपादित संग्रहों में शिरकत कर चुकी हैं। कई पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ  प्रकाशित हो चुकी हैं।डा• शर्मा की रचनाओं में उनकी अध्ययनशील पृष्ठभूमि का सहज परिचय भी मिलता है। वह संस्कृत साहित्य में डाक्टरेट की उपाधि से विभूषित हैं और नाट्यशास्त्र का अध्ययन भी उन्होंने किया है। इसका रचनात्मक प्रभाव ज्योत्स्ना जी के काव्य में स्पष्ट देखा जा सकता है। कालिदास के साहित्य में प्रकृति, शृंगार और प्रेम जिस तरह मुख्य रूप से छाए हैं उसी तरहडा•शर्मा की हाइकु रचनाओं में भी हमें प्रकृति के तत्त्वों में एक मधुर-भाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। बेशक इसका यह अर्थ नहीं कि उनका हाइकु काव्य-वितान यहीं तक ही सीमित है। सच तो यह है कि उन्हें किसी भी विषय को काव्य की अंतर्वस्तु बनाने में कोई हिचक नहीं है। वह प्रकृति, प्रकृति और मनुष्य का परस्पर सम्बन्ध, रिश्ते-नाते, यादें और स्मृतियाँ, यहाँ तक कि वर्त्तमान समय के विरोधाभास भी अपने हाइकु-काव्य में उठाने से परहेज़ नहीं करतीं ; किन्तु उनका आग्रह-बिंदु मधुर-प्रेम ही है ; जिसे वह प्रकृति पर आरोपित करने में हिचकती नहीं।  लेकिन इससे पहले कि हम इसकी चर्चा करें, वह अपने आराध्य और पूजनीय जनों के प्रति अपना नमन और आभार आवश्यक मानती हैं।

   डा• ज्योत्सना शर्मा एक आस्तिक और आस्थावान् व्यक्ति हैं। वह अपने ईश्वर और उन सभी देवी-देवताओं को, कोई भी काम शुरू करने से पहले, स्मरण करना भूलती नहीं। वह प्रभु के पावन और प्यारे रूप को नमन करती हैं; वह भगवान कृष्ण को अपने ‘मन-आँगन’ में बैठाती हैं; और वह एक आराधिका के रूप में एकमात्र वर बस यही  माँगती हैं कि वे निरंतर एक साधिका बनी रहें –

       *अति पावन / प्यारा रूप प्रभु का / करूँ नमन

            *हुई बावरी / कहाँ बिठाऊँ कान्हा / मन-आँगन

            *मै आराधिका / वर दें पद्मासना / रहूँ साधिका।

    उनका यह पूजा-भाव पुस्तक के अंत तक अभिव्यक्त होता रहता है। पूजा की सुगन्धित कलियाँ वह जगह जगह बिखराती चलती हैं। कभी वह विघ्न-हर्ता गणेश का स्मरण करती हैं ,तो कभी सरस्वती का स्वागत करती दिखाई देती हैं। समर्पण की ये तरंगें निरंतर प्रवाहित होती रहती हैं। –

       विराजे सदा / श्री के संग गणेश / मिटाएँ  क्लेश

            वरदायिनी / शुभदा, सिन्धु-सुता / स्वागत करूँ।   इत्यादि।

     ज्योत्स्ना जी का यह पूजा- भाव अपनी जगह है, इसमें उनके सौम्य और शालीन व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति है ,न कि काव्यात्मकता की। हाइकु रचनाओं में काव्यात्मक अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने मूलत: प्रकृति को चुना है। प्रकृति को वह अपनी सखी मानती हैं। और सखी से भला दुराव क्या? लेकिन उनकी प्रकृति भी तो कोई कम पुजारिन नहीं है। आभार और समर्पण का भाव उसमें भी कूट कूट कर भरा है –

       *भोर किरन / उतरी है धरा के / छूने चरन

  इसी तरह उनके काव्य में संध्या-वंदन के लिए भी पृथ्वी से आकाश तक ज्योति-दीप जल जाते हैं  –

       *संध्या वंदन / ज्योति दीप जलाएँ  / धरा गगन।

   ज्योत्स्ना जी की रचनाओं में कुछ प्रकृति –चित्र तो देखते ही बनते हैं –

       *दिवस कथा / ढलती धूप लिखे / अकथ कथा

            *जोगन संझा / बैठी बैराग लिये / पंथ निहारे

            *सूरज थका / डूब डूब नहाए / गहरे नीर    

       *वर्षागमन / सप्तरंग है खिला / गगन मन    इत्यादि।   

    जैसा कि आरम्भ में ही संकेत दिया जा चुका है, कवयित्री प्रकृति के विभिन्न तत्त्वों के बीच प्राय: एक शृंगारिक मधुर संबंथ आरोपित कर उसे अधिक मानवीय और आकर्षक बनाने का निरंतर प्रयास करती है। –  

       *निशा माननी / ओढ़ कर सो गई / काली चूनरी

            *शृंगारिक हैं / सुनहरी अलकें / रक्त पुष्प से

      कवयित्री के लिए धरती तो लगभग सभी की प्रिया बन जाती है –

       *हर सिंगार / धरा प्रिया का करें / झर सिंगार

            *रवि निर्मोही / जला गया क्यों हिया / धरा-प्रिया का  

            *कान्त बसंत / चिर-विरहन-सी / उमगी धरा

            *मुग्धा मुस्काए / अंग-अंग थिरका / धरा लजाए

            *जा रे बरस / विरहिन धरा पे / खा रे तरस

            *खिले पलाश / रँगी तेरे रंग में / जोगन हुई

            *दुकूल धानी / दे गए सजनवा / धरा दीवानी

            *सरस रहे / धरा सजन संग / गाए मल्हार  

     और आवारा हवा का तो कहना ही क्या है! वह नन्हीं नन्हीं कलियों को जगाती फिरती है। कभी मुग्धा नायिका की तरह पिया मिलन को चल पड़ती है। कभी दरवाज़े- दरवाज़े (अपने प्रिय को ढूँढ़ती हुई)झाँकती फिरती है,

       *हवा बावरि / चली पीया मिलन / मुग्धा नायिका

            *अल्हड़ हवा / चले चाल मस्तानी / छेड़े तरु को

            * झाँकती फिरे / द्वार -द्वार हवा / ढूँढ़ती है क्या!

            *झूमते तरु / सुवासित है  हवा / बौराई फिरे

            *गुस्ताख़ हवा / नहीं माने, जगाए / नन्हीं कली को

    डा• ज्योत्स्ना शर्मा को जहां प्रकृति के बीच एक मधुर सम्बन्ध दिखाई देता है वहीं उन्हें वहाँ, जिसे भारतीय दर्शन में ‘आवागमन का सिद्धांत’ कहा गया है, भी परिलक्षित होता है। – ‘समय रथ / ऋतुएँ आएँ-जाएँ  / जीना सिखाएँ ’’। ध्यान देने की बात यह है कि आवागमन के इस चक्र में निराशा के लिए कोई स्थान नहीं है

       *पत्ता जो गिरा / मुस्कराकर कहे / फिर आऊँगा

            *रवि मुस्काया / डूबा कल, क्या हुआ / मैं लौट आया

            *झरे पात सा / जीवन भी झरता / फिर उगता

            *परिभाषा है- / पतझर के पार / नई आशा है   

      कुम्भकार (रचयिता / ईश्वर) तो हमेशा रोशनी करने वाले दिए ही रचता है। – ‘चाक घुमाए / लेकर माटी रचे / उजले दिए’, वह कामना करती हैं कि उनकी रचनाएँ  भी सदैव कल्याणकारी हों –

*मुदित मन / कलम करे सदा / शुभ सृजन  !

    लेकिन ज्योत्स्ना जी यह भी कहती हैं कि-  ‘दिए  तो जले / कौन बताए कहो / मन उजले!’ बेशक आपके मन को उजला रखना तो कुम्भकार का काम नहीं है। अपना मन तो व्यक्ति को स्वयं ही स्वच्छ रखना होगा।

  डा• ज्योत्स्ना शर्मा एक आस्थावान्और शालीन व्यक्तित्व की धनी हैं। वह सद्गृहस्थ भी हैं। वह जानती हैं कि संबंधों को कैसे निभाया जाए। वह अपने माता-पिता, भाई-बहन, सभी के प्रति अपना आभार प्रकट करती हैं जिन्होंने उन्हें पाला-पोसा और उनका ख्याल रखा है –

       *बातें पुरानी / संग, प्यारी दादी से / सुनें कहानी

            *माँ प्यार तेरा / कहीं भी रहूँमैं / मेरा सवेरा

            *पापा की प्यारी / एक सोपान चढ़े / हों बलिहारी

    इसी तरह भाई के लिए भी, वह भले ही विदेश में बस गया हो, बहन के नाते रक्षाबंधन पर अपना सन्देश भेजना वह नहीं भूलतीं और उसे अपनी मातृभूमि की याद दिलाती हैं –

       *भैया हमारा / मायके की माला है / मनका प्यारा  

            *बसे विदेश / बहना राखी संग / भेजे सन्देश

            *रखना लाज / भैया मातृभूमि की / कर सम्मान

     जहाँ तक पति का प्रश्न है उसका तो मन में विशेष स्थान है ही। मधुर भावों से वह उन्हें लक्षित कर कहती हैं –    

       *न आँसू तुम / कजरा भी नहीं हो / नैनों में बसे

            *बात तुम्हारी / कालिका पे थिरकी / बूंद ओस की

            *नैनों से दूर / तेरी याद कजरा / प्रीत में हरी

            *ज़रा सँभाल / जीना मुश्किल करे / तेरा खयाल

      आज का समय विस्मृति का समय है। अपना काम निकल जाने के बाद कोई किसी को याद नहीं करता। लेकिनडा• ज्योत्स्ना शर्मा की हाइकु-बगिया में यादों के फूल खिलते रहते हैं। उनकी मन-मुंडेर पर यादों के पंछी रोज़ आ बैठते हैं। उनका एकाकी-मन यादों के हज़ार साथी ढूँढ़ लाता है। वह कभी एकाकी भी रह जाएँ  तो भी अकेली नहीं रहतीं। यादों के चराग जलते रहते हैं –

       *मन-बगिया / खिलते रहें सदा /यादों के फूल

            *मन-मुंडेर / तेरी यादों के पंछी / आ बैठें रोज़

            *एकाकी मन / ढूँढ़ लाया यादों के /साथी हज़ार

            *अकेले कहाँ? / यादों के ये चिराग / जलते यहाँ

     अपने गाँव, अपने शहर की खट्टी-मीठी यादें कवयित्री की स्मृति में सुरक्षित हैं। –

       *रोया है नीम / बाँट दिए आँगन / माँ तकसीम

            *गर्म गुड की / मोहक महक है / मन में बसी

            *जिह्वा पे स्वाद / हैं कहाँ ऐसे भाग / हांडी का साग

            *पुराने हुए / चक्की छींके छड़ियाँ / फ़साने हुए

            *दुपहरियाँ / तोड़ लाए छुपके / कच्ची केरियाँ

    डा• ज्योत्स्ना शर्मा केवल प्रकृति और स्मृति की ही हाइकुकार नहीं है। उनकी नज़र कुचक्रों, विरोधाभासों और विषमताओं पर भी पडी है। वह पर्यावरण के प्रति चिंतित हैं और सामाजिक असमानता उन्हें उद्वेलित करती है। वह आश्चर्य करती हैं –

       *कैसा कुचक्र / छेड़ दिया किसने / नियति चक्र?

            *नाचेगा मोर? / बचा ही न जंगल / ये कैसी भोर?

            *अरे मानव / कैसे हुआ दानव / धरा पे बोझ

     वन वृक्ष पशु पक्षी सभी आकुल व्याकुल हैं। वह मानव के मानवी पक्ष से आग्रह करती हैं कि वातावरण में विष न घोला जाए और सबकी सुविधा का ख्याल रखा जाए। –

       *कराहें सभी / वन वृक्ष कलियाँ / रोती है धरा

            *न घोलो विष / जन जीवन व्याकुल / है प्यासी धरा

            *काटें न वृक्ष / व्याकुल नदी-नद / धरा कम्पित  

     कवयित्री को मानवता पर पूरा विश्वास है। वह हार मानने वाली नहीं हैं। आंधियाँउन्हें डिगा नहीं सकती। जिन्होंने सत्य का पथ पकड़ा है वे न कभी झुके हैं न टूटे हैं।-

       *हारेंगे नहीं / मिलजुल सँवारें / सन्नाटा तोड़ें

            *अरी आँधियों / अडिग अचल हैं / इरादे मेरे

            *सत्य के पथ / झुकें न टूटें कभी / सीखा ही नहीं।

    अभी तक मैनें महिला हाइकुकारों के जितने भी संग्रह देखे हैं ;उनमें मुझे एक भी ऐसा संग्रह नहीं मिला जिसमें स्त्रियों के दुःख और उनके ऊपर की जा रहीं ज्यादतियों का रोना न रोया गया हो। लेकिनडा• ज्योत्स्ना शर्मा के इस हाइकु संग्रह में स्त्री विमर्श से सम्बंधित एक भी हाइकु नहीं है। मुझे यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। ऐसा तो नहीं हो सकता कि उनके संवेदनशील मन में पुरुष वर्चस्व से उत्पन्न स्त्रियों की शोचनीय दशा की अनुभूति का दर्द उठा ही न हो। लेकिन, मुझे लगता है कि इसका अलग से उल्लेख किया जाना उन्हें रुचिकर न लगा हो  और स्त्री के दुःख और उसकी दुर्बलताओं को रेखांकित कर वे उसे दया का पात्र न बनाना चाहती हों। इसीलिए उन्होंने स्त्री और पुरुषों में भेद न करके सत्य के पथ पर सभी को टिके रहने के लिए आह्वान किया है। मिलजुल कर, अपने आत्मविश्वास को बनाए रखते हुए, वांछित परिवर्तन की दिशा में कार्यरत रहने के लिए आमंत्रित किया है।

     कविता को अलग से तो परिभाषित किया ही जाता रहा है; लेकिन कविता को कविता में ही परिभाषित करने के प्रयत्न भी आदि काल से होते आए हैं। इन कविताओं का एक अलग ही वर्ग है। इसे ‘मैटा-पोइट्री’ (कविता के पार कविता) कहा जा सकता है। हाइकु रचनाओं में भी यह अनुपस्थित नहीं है। हाइकुकारों ने अपनी न जाने कितनी हाइकु रचनाओं में हाइकु को परिभाषित करने की कोशिश की है। एक कवि ने तो ऐसे हाइकुओं की पूरी एक पुस्तक ही प्रकाशित करवा दी है जिसमें सभी रचनाएँ  हाइकु को परिभाषित करने में जुटी हैं।डा• ज्योत्स्ना शर्मा ने भी कुछ हाइकु ऐसे रचे हैं जो वस्तुत:“हाइकु” को परिभाषित करने के बहाने कवि की सोच और उसकी भाव-भूमि को अधिक दर्शाते हैं।

       *गीत हाइकु / मधुर-राग-वीणा / गुंजित प्राण

            *दीप हाइकु / भासित करे जग / आलोक दिव्य

            *बूँद हाइकु / अविरल कविता / सागर हुई

            *हाइकु रचा / मन-अँगना गूँजे / पावन ऋचा     

     ओस नहाई भोर की रचनाएँ  प्रकृति, स्मृति, नाते-रिश्ते, और पर्यावरण की काव्यात्मक अभिव्यक्तियाँ तो हैं ही , वे कवि की आस्था और विश्वास उसके सकारात्मक सोच, उसकी आशावादिता, की भी चुगली किए बिना नहीं रहतीं। मुझे विश्वास है की इस हाइकु- संग्रह का सुधी जनों द्वारा दिल से स्वागत किया जाएगा।

             ‘ओस नहाई भोर (हाइकु संग्रह), कवयित्री,डा ज्योत्स्ना शर्मा, अयन प्रकाशन,1/20 महरौली, नई दिल्ली-110030 ;पृष्ठ:120 ; मूल्य:240रुपये( सजिल्द); संस्करण: 2015,

-0-

डासुरेन्द्र वर्मा ,

10, एच आई जी, 1, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद (उ प्र) -211001

मो ०९६२१२२२७७८

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Responses

  1. bahut sunder samiksha hai jyutsna ji aapki kitab bahut hi achchhi hogi me janti hoon kyuki aap bahut hi achcvhha likhti hai aur samiksha padh kar ye pata bhi chalta hai
    badhai
    rachana

  2. samiksha bahut achhi lagi pustak bhi achhi sabhi haiku bahut arthpurn hain aapko bahut bahut badhai…

  3. सारपूर्ण हाइकु… बहुत बढ़िया समीक्षा….बहुत-बहुत बधाई!

  4. सारपूर्ण समीक्षा ने पुस्तक पढ़ने की उत्कण्ठा जगा दी। आदरणीय ज्योत्स्ना जी हार्दिक बधाई। समीक्षक जी आपको भी
    धन्यवाद के साथ बधाई।

  5. ‘ओस नहाई भोर’ पर आदरणीय डॉ. सुरेन्द्र वर्मा जी द्वारा प्रस्तुत समीक्षा पढ़कर भाव विह्वल हूँ |कितनी तन्मयता से पुस्तक के मनोभावों को उद्घाटित किया आपने |एक-एक पहलू पर आपका विश्लेषण मुझे अभिभूत कर गया | आस्तिक मन . स्मृतियों का संसार , प्रकृति ,परिवेश सभी पर व्यापक चर्चा की गई है ,उद्धरणों सहित …

    इस स्नेह भाव ,अनुग्रह के लिए आभार कहना पर्याप्त नहीं | विनीत मन सदैव उनके स्नेहाशीष की कामना करता है !

    सादर नमन के साथ
    ज्योत्स्ना शर्मा

  6. हिंदी हाइकु ,संपादक द्वय की भी हृदय से आभारी हूँ जिनके प्रोत्साहन ,प्रेरणा से पुस्तक अपना आकार ले सकी !
    प्रिय सखी रचना जी , भावना जी ,कृष्णा जी ,अनिता जी के प्रति भी बहुत-बहुत धन्यवाद !

  7. “os nahaai bhor’ kii ek-ek kiraN ke rangon ka vishleshaN karati samiixaa bahut sunder hai. haiku sangrah to kavya- maadhurya se ot-prot haihii. aadaaniiya varma ji ko naman va jyotsna ji ko badhai.
    pushpa mehra.

  8. जितना प्यारा संग्रह है, उतनी ही प्यारी एवं सटीक समीक्षा की है… आदरणीय डॉ सुरेन्द्र वर्मा जी ने!
    आप दोनों को हार्दिक बधाई !

    प्रिय सखी ज्योत्स्ना जी… अभी ऐसे कई और संग्रह निकालने हैं आपको ! अपनी लेखनी से यूँ ही भावों की मधुर वर्षा करते रहिये, सृजन करते रहिये ! माँ सरस्वती की कृपा सदैव आप पर बनी रहे-यही हमारी प्रार्थना है ईश्वर से, यही हमारी शुभकामनाएँ हैं आपके लिए !

    सादर/सस्नेह
    अनिता ललित

  9. Pooree kitab ko sundar tareeke se sameeksha Kar prastut kiya hai haardik badhai

  10. ‘ओस नहाई भोर’ पुस्तक पर डॉ. सुरेन्द्र वर्मा जी की समीक्षा पढ़ी बहुत अच्छी लगी।
    काव्य पुस्तक का प्रभावशाली विश्लेषण पढ़ कर कोई भी साहित्य रसिक पुस्तक पढ़े बिना नही रह सकता। ओस नहाई भोर भी ऐसी पुस्तक बन पड़ी है। समीक्षक ने पुस्तक के हर पहलू पर अपनी राय दी है। उदाहरण पढ़ कर उन में भरे भावों को पढ़ कर ज्योत्स्ना जी के आंतरिक व्यक्तित्व से हम रूबरू हुयें हैं। उच्च कोटि की भाव व्यंजना उच्च कोटि का कवि ही कर सकता है। हार्दिक वधाई ज्योत्स्ना जी।

  11. aadarniya dr.surendra verma ji ko sadar naman…bahut sunder tatha sateek samiksha likhi hai aapne…aapki samikshayen man ko chootee hai ..prabhu kare aap par ma sarswatiji ka aashirvaad isi tarah bana rahe…shubhkaamnayen!
    sadar naman jyotsna ji …aapke khoobsurat haiku hi’ oos nahai bhor’
    ka pata de rahe hain…aap sadaiv hi pyara likhti hai…ishver aap par bhi ye kripa hamesha banaye rakkhe.. shubhkaamnaye.!

  12. बहुत सार्थक और सारगर्भित समीक्षा…हार्दिक बधाई…|


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