Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 27, 2015

अंतस् में साँझ


सपना मांगलिक

1

गूँगा– सा दिन

चीखे क्यों दोपहरी

साँझ बहरी ।

2

अंतस् में साँझ

है बाहर उजास

कोरा दिखावा ।

3

महकी भोर

नाचे मन का मोर

रोक लूँ साँझ ।

4

27-साँझकेश बिखेरे

लो संध्या घर आई

भोर विदाई ।

5

हुई संध्या तो

उर -दीप जलाओ

तम हटाओ ।

6

हो गयी साँझ

अब नीड़ पुकारे

लौट के आ रे !

7

आँखे दिन की

क्यों काँटे रही चुन

साँझ बाट से ।

8

नापें जो सिन्धु

टूटें वही कश्तियाँ

साँझ ढलते ।

9

जिए न जाते

अश्रु भरे ये दिन

साँझ तू खिल ।

10

साँझ के केश

सितारों से सजा

प्रेमी राकेश

11

साँझ के माथे

लगी रवि– बिंदिया

सुर्ख कपोल

12

लगा लो अंग

लील ले न ये साँझ

ख़ुशी के रंग ।

13

प्रेम दीवानी

तके राह रात की

साँझ दीवानी

14

साँझ -पिंजरा

कैद दिन का पंछी

रीत न अच्छी ।

15

बीत गए जो

दिन थे मजबूर

साँझ है दूर ।

16

चुका न कर्ज

किराए के दिन थे

संध्या गिरवी ।

17

दिन सजा लूँ

प्रेम गीत मैं गा लूँ

है साँझ बाकी ।

18

मन अश्व सा

बाँध सका न कोई

हो गयी साँझ ।

19

हुई संध्या तो

उर दीप जलाओ

तम हटाओ ।

20

ढला जो दिन

सोचूँ किया क्या काम

जीवन– शाम ।

21

करे शशि से

रात्रि -सेज घूँघट

साँझ  दुल्हन

22

कितना भोला !

रवि आग का गोला

देखो शाम को

23

बूढ़ी- सी रात

दिन बच्चे सा खेले

साँझ के मेले ।

24
निशा घर में

खड़ा चाँद प्रहरी

संझा-देहरी ।

25

जीवन साथी

दीपक और बाती

मिले साँझ को

26

कातिल खोजे

संध्या की कचहरी

पीर गहरी

27

साज शृंगार

करती इन्तज़ार

साँझ शशि का

28

चाँद से खेले

भरे तारे चुटिया

साँझ बिटिया

29

धूप से सूखा

साँझ प्यास बुझाए

पूरी सृष्टि की।

30

तारों के बेर

साँझ छड़ी से तोड़े

चपल दिन

31

 पिया की आस

रहती है उदास

साँझ प्रेयसी ।

32

निशा ही बूझे

सखी साँझ का मन

बन दर्पण

33

दो पलड़ों में

दिन रात को तोले

तुला साँझ की ।

34

साँझ मायावी

मुँह रवि छिपाए

शशि मुस्काए ।

35

साँझ की बेला

फिर दिल अकेला

कोई न साथी

36

पन्थ निहारे

लगें साँझ  को प्यारे

ये चाँद तारे

37

चली  गोधूली

पग फेरे करने

धूप बावली ।

38

गेरुआ चीर

धारे संझा जोगिन

करे तपस्या

39

नभ गुलाबी,

मदमाते नयन,

साँझ जो खोले ।

40

दुनिया रँगी

नभ– डिबिया खोले

साँझ आहिस्ता ।

41

साँझ के मुख

कलंक रात लगा

आई न हाथ

42

साँझ के द्वारे

खेले चाँद सितारे

निशा दुलारे

43

साँझ है आई,

चोंच खोलते चूजे,

माँ खाना लाई

44

आतुर भौंरा,

कली गले लगाई

साँझ विदाई ।

45

तू क्यों अकेला

लगा नभ में मेला

ओ सांध्य तारे !

-0-

( चित्र: गूगल से साभार)

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Responses

  1. बहुत सुन्दर सपना। बधाई।

  2. सपना जी सारे हाइकु बहुत सुंदर।बधाई।

  3. sabhi utkrisht haaiku
    badhaai

  4. sabhi haiku bahut achhe hain.sapana badhai.
    pushpa mehra.

  5. अंतस में साँझ सपना जी बहुत भावपूर्ण हाइकु हैं। बहुत अनोखा लगा। … तारों के बेर /साँझ छड़ी से तोड़े।/चपल दिन /
    मुबारक बहुत सुंदर रचनाये लिखती हैं ,पढ़ कर खूब आनंद आता है।

  6. साँझ के विविध रूप दिखाते सुन्दर हाइकु ..हार्दिक बधाई सपना जी !

  7. sanjh ke kesh…. prem se sajaye……..premi rakesh…………..
    vaah kya baat hai, sundar ati sundar……..
    aur rachnayen bhi acchi ….

  8. गूँगा– सा दिन
    चीखे क्यों दोपहरी
    साँझ बहरी ।

    Bahut pasand aaya ye haiku vaise sabhi achhe hain bahut bahut badhai…

  9. Sabhi haiku bahut rochak aur sunder hain ,

  10. सुन्दर, प्राकृतिक रंगों का मेला है आपके सभी हाइकु में | बधाई सपना जी |

    शशि पाधा

  11. इस हाइकु-सरिता में गोता लगा मन प्रसन्न हो गया जैसे…हार्दिक बधाई…|


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