Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जून 18, 2015

पर्वत जागा


1-डॉ  सुधा गुप्ता

सूर्योदय1

भोर  ने छुआ

मेंहदी- रचे करों

पर्वत जागा ।

2

बिलख चलीं

पर्वतों की बेटियाँ

मायका छूटा

3

काग़ज़कश्ती

पहाड़व्यथा ढोती

चलती रही ।

4

जमा के जल

बोझ ढोता पहाड़

भूतृषा बुझे ।

-0-

2-कमला निखुर्पा

1

इक पहाड़

छुपा मन भीतर

बर्फ से ढका ।

2

पिघल जाए

बर्फीला एहसास

नदिया बहे ।

छाया : डॉ नूतन गैरोला
छाया : डॉ नूतन गैरोला

3

फूटे झरने

पहाड़ों की कोख से

अमृत बहे ।

4

पहली वर्षा

पहाड़ों ने ओढ़े हैं

दुशाले हरे ।

5

पर्वत पार

परियों को खोजती

नन्हीं बिटिया ।

6

नन्हे बादल

खेले गिरि काँधों पे

चाँद खिलौना ।

7

मेघों की पाग

पहन छवि निहारे

दर्पण झील ।

-0-

3-डॉ ज्योत्स्ना शर्मा

छाया: अमित अग्रवाल

छाया: अमित अग्रवाल

1

नदी को डर

पर्वत से उतर

जाए किधर ?

2

बींधा है तन

कैसे नहीं डोलता

गिरि का मन ।

3

वृक्ष विहीन

ये सूखे से पर्वत

हुए श्रीहीन ।

4

ये तरुवर

बनें वस्त्र भूषण

सजें शिखर !

5

गिरि से गिरी

लौट  आना मिलने

बन बदरी !

    -0-

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Responses

  1. सभी बहुत भाव पूर्ण हाइकु ..लेकिन “भोर ने छुआ ” , ” बिलख चलीं ” और ‘पर्वत पार’ मन को अलग अनुभूति से भर गए ….आदरणीया सुधा दीदी और कमला जी की सुघढ़ लेखनी को शत-शत नमन !

    मुझे भी स्थान देने के लिए संपादक द्वय को बहुत-बहुत धन्यवाद !

    सादर
    ज्योत्स्ना शर्मा

  2. सभी हाइकु बेहतरीन हैं और बहुत अच्छे लगे । आप सभी को बधाई और शुभकामनाएं !

  3. सारे हाइकु बहुत सुन्दर!
    सभी रचनाकारों का हार्दिक अभिनन्दन!!
    मेरे छायाचित्र को स्थान देने लिए सम्पादक द्वय को धन्यवाद!

  4. सुधा जी ,कमला निखुर्पा जी एवं ज्योत्स्ना जी आज के पहाड़ पर आये आप सब के हाइकु। बड़े मोहक हैं जैसे -भोर ने छुआ /मेहँदी रचे करों। पर्वत जागा /… पर्वत के मिस। … बेटिओं की विदाई का चित्र बहुत खूब। और पर्वत को भू प्यास बुझाने वाला हाइकू और भी सुंदर।
    कमला निखुर्पा जी आपने तो पहाड़ों की कोख से अमृत बहा दिया। सुंदर यह भी -मेघों की पाग /पहने छवि निहारे /दर्पण झील।
    ज्योत्स्ना जी बहुत भाया -गिरि से गिरी /लौट आना मिलो /बन बदरी। … बींधा है तन /कैसे नही डोलता /गिरी का मन /
    वधायी आप सब को।

  5. sudha didi ,kamla va jyotsna ji ke haiku bahut achhe hain . sabhi ko badhai.
    pushpa mehra.

  6. naye bhavon ke saah utkrisht abhivykti .

  7. भोर के मेहँदी रचे हाथ, मन के भीतर का पहाड़, गिरि के काँधों पर खेलते नन्हे बादल , नदी का डर , बिंधा हुआ तन …. सभी मन मोहने वाले हाइकु सीधे मन में उतर गए। चित्र भी बहुत सुंदर!

    सुधा दीदी जी एवं उनकी लेखनी को सादर नमन !
    कमला जी एवं ज्योत्स्ना जी को हार्दिक बधाई !

    ~सादर/सप्रेम
    अनिता ललित

  8. मनमोहक हाइकु सुन्दर चित्रण! सुधा दीदी, कमला जी, ज्योत्स्ना जी को बधाई!

  9. Subject: Re: हिन्दी हाइकु में आज

    Parvat par haiku padhe.sunder kalpnaEn hain.teeno hIkukaron ko merit bdhai.

  10. बिलख चलीं
    पर्वतों की बेटियाँ
    मायका छूटा

    फूटे झरने
    पहाड़ों की कोख से
    अमृत बहे

    गिरि से गिरी
    लौट आना मिलने
    बन बदरी !kamaal ki kalpnaye ! bahut hi khoobsurat…aadarniya sudha ji ,kamla ji tatha jyotsna ji ko dil se naman sunder srajan kar man ko sukhi karne ke liye .

  11. बहुत सुन्दर रचनाएँ।बधाई।

  12. बिलख चलीं
    पर्वतों की बेटियाँ
    मायका छूटा

    पर्वत पार
    परियों को खोजती
    नन्हीं बिटिया ।

    नदी को डर
    पर्वत से उतर
    जाए किधर ?

    ye haiku khaskar achhe lage vaise to sabhi manmohak hain sabko meri bahut bahut badhai…deri se aane ke liye mafi chahti hun… 😦

  13. सभी हाइकु बहुत सुन्दर हैं

  14. बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण हाइकु…मन मोह लिया…|
    हार्दिक बधाई…|


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