Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जून 8, 2015

सम्भावनाओं के द्वार खोलते– खिले हैं शब्द


                                      डॉशिवजी श्रीवास्तव

‘हाइकु’ हिन्दी साहित्य में एक लोकप्रिय विधा के रूप में अपनी सत्ता स्थापित कर चुकी है।कुल तीन पंक्तियों और सत्रह खिले हैं शब्दवर्णों वाली यह जापानी विधा विगत कुछ वर्षों में हिन्दी में तेजी से लोकप्रिय हुई है तथा अनेक नये पुराने रचनाकार हाइकु लेखन की ओर प्रवृत्त हुए हैं और अनेक संकलन सामने आए हैं,इन्हीं संकलनो में से एक है डॉ• आशा पाण्डेय का–‘खिले हैं शब्द’

 डॉ• आशा  पाण्डेय का यह प्रथम हाइकु संग्रह है,इसके पूर्व उनके दो कहानी– संग्रह, एक यात्रा–वृत्तान्त एवम् एक कविता संग्रह प्रकाश में आ चुके हैं हाइकु से उनका परिचय अभी नया ही है जैसा कि उन्होंने  संग्रह की भूमिका में  ही लिखा है–‘‘मई 2012 का तीसरा सप्ताह था …मैं दिल्ली गई थी। एक दिन मैं सुजाता जी से मिलने गई ,बातचीत के बीच उन्होंने मुझे अपने कुछ हाइकु दिखाए जो किसी संग्रह में प्रकाशित हुए थे……’’ यह हाइकु से उनका प्रथम परिचय था,उसके बाद उन्होंने हाइकु के शिल्प–विधान का अध्ययन करके इस क्षेत्र में कदम रखा जिसका परिणाम–‘खिले हैं शब्द’ संग्रह के रूप में सामने है।

    जापान में हाइकु मूलत: प्रकृति की कविता है,प्राकृतिक दृश्यों का मन पर जैसा प्रभाव अंकित होता है वैसा ही हाइकु में अभिव्यक्त होता है, प्रारम्भ में भारत में भी हाइकुकारों ने प्राकृतिक दृष्यों का ही अधिक अंकन किया है पर  शनै: शनै: अन्य विशयों को भी वे हाइकु में चित्रित करने लगे।  डॉ• आशा  पाण्डेय ने भी विविध विषयों को हाइकु में उतारा हैे, इन विषयों को उन्होंने अलग–अलग शीर्षकों में विभक्त करके रखा है,ये शीर्षक हैं–जीवन, माँ, प्रकृति ,बेटी, प्रेम, समाज, नारी, मौसम,बसन्त,गर्मी,ठंडी, रिश्ते, गंगा,केदारनाथ,दामिनी/निर्भया,औंर विविध।ये सोलह शीर्षक इस बात के सूचक हैं कि कवयित्री का अनुभव–संसार व्यापक है और वे हर विषय को हाइकु में उतारने का प्रयास कर रही हैं।

      यद्यपि आशा  जी ने अनेक विषयों का स्पर्श किया है पर उनका मन भी प्रकृति चित्रण में अधिक रमा है उनके शीर्षक–प्रकृति, मौसम, बसन्त, गर्मी, ठंडी, गंगा, केदारनाथ, प्रकृति के ही विविध रूपों के विस्तार हैं।प्रकृति का विविध छटाओं को उकेरने वाले ये हाइकु कहीं प्रकृति का यथातथ्य वर्णन करते हैं,कहीं उद्दीपन रूप में तो कहीं आलंकारिक रूप में।हाइकु का सौन्दर्य बिम्ब ग्रहण और आलंकारिकता में ही अधिक निखरता है,इस बात का बोध कवयित्री को है इसीलिए यथातथ्य वर्णन कम ही हैं, यथा–‘‘आकाश लाल/चहचहाते पक्षी/सुबह हुई।……..‘‘जामुन काली/रसभरी मधुर/पेड़ों में लदी ।”..….ऐसे अभिधात्मक चित्र कम ही हैं अधिकतर चित्र लाक्षणिक,व्यंजनात्मक एवम आालंकारिक हैं,विशेषत: बसंत वर्णन के चित्र में सुन्दर बिम्बों का प्रयोग दिखता है,बसंत ऋतुराज है उसका आगमन ही प्रकृति में मादकता का संचार कर देती है–

‘‘बजी सांकल/आ गया ऋतुराज/महके फूल ।”

   बसंत राजा है अत: उसके आगमन पर बंदनवार सजाए जाते हैं,मंगलगीत गाए जाते हैं तथा सारी प्रकृति उल्लास से नाचने लगती है…इन सारे बिम्बों को आशा  जी नें बड़ी सहजता के साथ चित्रित किया है–‘‘आम की डाली/सजा बंदनवार/देवी की पूजा।.तथा ‘‘गेंहू की बाली/नाच रही खेत में/झूमें किसान” प्रकृति की समृद्धि को ये बिम्ब समग्रता में चित्रित कर रहे हैं।अन्य ऋतुओं के चित्र भी इसी प्रकार मोहक एवम चित्ताकर्षक हैं सर्दियों में प्रात: सूर्य के ताप में प्रखरता नहीं होती कवयित्री को वह सूर्य दुर्बल- सा प्रतीत होता है–‘‘भोर का सूर्य/कड़कती ठंड में/दुर्बल दिखा।‘‘ या फिर वर्षा में उमड़ती नदियाँ मर्यादा तोड़ती प्रतीत होती हैं–‘‘उमड़ी नदी/दौड़ रही विकल/मर्यादा तोड़।‘‘ये बिम्ब बड़े ही प्रतीकात्मक हैं।

प्रकृति से इतर विषयों पर भी आशा  जी ने सुन्दर हाइकु रचे हैं।एक स्त्री होने के नाते उन्हें नारी–जीवन के विविध रूपों,उनके दायित्वो, और उनके सुख–दु:ख की स्थितियों का सहज अनुभव है,ये अनुभव उनके हाइकु में प्रतिबिम्बित हैं।रिश्तों के विविध रूपों को वे बड़े सहज भाव से व्यक्त कर देती हैं देखिये–‘‘जानती दर्द/लगाती मलहम/बिटिया माँ को ।” माँ बेटी के परस्पर प्रेम को उद्घाटित करने के लिए इससे सहज और क्या बात हो सकती है…इसी प्रकार बेटी का होना घर को कितने उल्लास से भर देता है इसे इस हाइकु में बड़ी सहजता से व्यक्त किया है–‘‘घर में बेटी/खिड़की में गौरैया/चहके घर ।” बेटी की तरह ही माँ का होना भी घर को आनन्द से भर देता है–‘‘हँसते फूल/महक रहा घर/ माँ है घर में ।”   कवयित्री सारे प्रतीक,सारे बिम्ब ,सारे विषय आस पास के जीवन से उठाती हैं और उसे नया अर्थ प्रदान कर देती हैं। देखिये प्रेम की कोमल संवेदना को किस कोमलता के साथ व्यक्त करती हैं–‘‘मन महके/रातरानी से ज्यादा/कैसे हुआ ये।”

   सामाजिक सराकारों के प्रति भी कवयित्री सजग हैं गरीबी, मंहगाई, नारी–सुरक्षा, धर्म के नाम पर पनपने  वाले ढोंगी संत, केदारनाथ की तबाही इत्यादि अनेक विषयों को उन्होंने स्पर्श किया है। दामिनी /निर्भया का अलग शीर्षक नारी के प्रति होने वाले अपराधों के प्रति उनकी चिन्ता को ही प्रकट करता है, इस चिन्ता को व्यक्त करता हुआ एक हाइकु देखें–‘‘मरी दामिनी/दोष बस इतना ही/चढ़ी बस में ।”….इसी प्रकार–‘‘बुझे भले ही/शोक की मोमबत्ती/जलेगा दिल ।”                

     अन्य सामाजिक चिन्ताओं को भी वे बड़ी गंभीरता के साथ उठाती हैं–‘‘बजट आया/महँगाई के साथ/करो स्वागत।‘‘…‘‘कैसा विकास/भारत का बाजार/चीन का कब्जा ।”….‘‘आज की भोर/पेट्रोल रहे सस्ता/यही प्रार्थना ।” कुछ हाइकु एकदम तात्कालिक विषयों पर भी हैं यथा–‘‘जेल में लालू/पचायें अब चारा/करें जुगाली ।”…….‘‘महिला वैद्य/आशाराम की चाह/कैसी बीमारी ।” ….यदि इस प्रकार के विषयों पर हाइकु–लेखन से बचा जा सके, तो उचित होगा ;क्योंकि इनका तात्कालिक प्रभाव तो हो सकता है ,पर लम्बे अंतराल में ये प्रभावहीन हो सकते हैं।

 एक दो अपवादों को छोड़ दें तो सभी हाइकु प्रभाव छोड़ते हैं।हाइकु ऐसी विधा है जिसमें केवल वर्ण ही गिने जाते हैं और वर्ण भी सीमित होते हैं ; अत: प्रत्येक हाइकुकार हो सजग रहने की आवश्यकता होती है,अति उत्साह या शीघ्रता में चूक हो जाती है,ऐसी चूक इस संकलन में भी हुई है एक बहुत अच्छा हाइकु एक वर्ण से वंचित रह गया–‘‘मंगलगान/हवाओं ने गाया/बसन्त आया ।”  आशा  है आशा  जी दूसरे संस्करण में इसे परिमार्जित कर लेंगी।

  समग्रत: डॉ• आशा  पाण्डेय का यह प्रथम हाइकु संग्रह भाषा ,भाव और अभिव्यक्ति सभी दृष्टियों से प्रभाव छोड़ता है और आश्वस्त करता है कि हाइकु–संसार में नई संभावनाओं को तलाशती हुई यह  कवयित्री भविष्य में भी शब्दों के नए–नए फूल खिलाती रहेगी।

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खिले हैं शब्द (हाइकु- संग्रह ):डॉ•आशा  पाण्डेय ,पृष्ठ:112, मूल्य:85 रुपये , बोधि प्रकाशन, एफ़-77, सेक्टर-9 , रोड नं-11,करतापुरा ,इण्डस्ट्रियल एरिया-जयपुर-302006, संस्करण: अगस्त-2014

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डॉशिवजी श्रीवास्तव

2,विवेक विहार,मैनपुरी(उ0प्र0)–205001

 मो0–9412069692

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Responses

  1. खिले हैं शब्द (हाइकु- संग्रह ):डॉ•आशा पाण्डेय ko haardik badhaai .
    डॉ•शिवजी श्रीवास्तव ki smikshaa kaa ayaam yathaarth ke dharatl pr gahraai lie hue hae , badhaai

  2. pustak ka naam bahut sunder hai iski samiksha shiva ji ne bahut sunder likhi gayi hai .asha ji aapke haiku bahut achchhe hain aap ko bahut bahuut badhai
    Rachana

  3. डॉ आशा जी आपको आपकी पुस्तक “खिले हैं शब्द “के लिए अनेक हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई |डॉ शिवजी श्रीवास्तव जी ने उनकी पुस्तक की समीक्षा बखूबी लिखी है |प्रत्येक विषय पर लिखे गए हाइक का सुन्दर सजीव वर्णन किया है |एक बार फिर से बधाई |

  4. समीज्ञा बहुत चंगी है । हर पहलू
    विचार किया गया है । आशा और शिवा जी को बधाई ।

  5. samiksha bahut achhi lagi rachnayen badhne ki utsukta badhati hai…meri hardik badhai…

  6. सुन्दर हाइकु संग्रह ‘खिले हैं शब्द’ और सारगर्भित समीक्षा हेतु डॉ. आशा पाण्डेय जी एवं डॉ. शिवजी श्रीवास्तव जी को हार्दिक बधाई ..मंगल कामनाएँ !!

  7. सुंदर हाइकु संकलन की सुंदर समीक्षा ।सखी आशा पांडे व भाई शिवजी को ढेरों बधाईयाँ व शुभकामनायें !

  8. आप सभी सुधी जनो का मैं दिल सेआभार व्यक्त करती हूं.आपसभी ने मेरे हाइकु पढे.मुझे प्रोत्साहित किया.धन्यवाद.डॉ़ शिवजी श्रीवास्तव जी का भी मै आभार मानती हूं अपनी समीक्षा से वे पाठको मे इस पुस्तक को पढ़ने की जिज्ञासा पैदा करतेहै पुनः सबका आभार.

  9. बहुत अच्छी और सार्थक समीक्षा है…बहुत बधाई आशा जी और डा. शिवजी को…|


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