Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 4, 2015

नदी से सुनो


रमेश गौतम

1

छाया: अमित अग्रवाल
छाया: अमित अग्रवाल

नदी से सुनो

मौन प्रार्थनाओं का

जीवन राग

2

नदी में जाल

नदी की अस्मिता का

अपहरण

3

नदी  उमड़ी

माँ की अश्रुधारा सी,

समझो, पढ़ो

4

भोर का सूर्य

नदी के सिंगार का

शुभ मुहूर्त

5

नदी के पास

बैठी  हमारी प्यास

कब निस्वार्थ

6

पहाड़ रो

ब्याह कर नदी को

यूँ मैदानों से

7

महानगर

पी गये सारा जल

नदी से छल

9

बूढ़ी हो गई

आसमान ताकती

सूखी धरती

10

हुई लापता

मेघों की धरा तक

अंधी यात्राएँ

11

धरती क्वाँरी

मानसून हठीला

आया न द्वार

12

ग्राम्य बालाएँ

करती रतजगे

ढूँढती पानी

13

हरियाली की

अनन्त सम्भावना

फिर बेघर

-0-


Responses

  1. All are absolutely beautiful, Gautam sahab, felicitations!
    “पहाड़ रोए
    ब्याह कर नदी को
    यूँ मैदानों से”…is awesome!
    Thank you dear editors for giving my capture a place here 🙂

  2. सुंदर हाइकु !
    हार्दिक बधाई रमेश गौतम जी !

    ~सादर
    अनिता ललित

  3. पहाड़ रोए
    ब्याह कर नदी को
    यूँ मैदानों से…….बहुत खूब……बधाई रमेश गौतम जी!

  4. sabhi rachanayen sundar hain ..lekin ..
    पहाड़ रोए

    ब्याह कर नदी को

    यूँ मैदानों से….mn bhigo gayaa !!!

  5. ग्राम्य बालाएँ
    करती रतजगे
    ढूँढती पानी ।
    bahut sahi likha hai aunder shabdon me
    rachana

  6. सभी हाइकु बेहतरीन हैं। रमेश गौतम जी को बधाई और शुभकामनाएं !

  7. महानगर
    पी गये सारा जल
    नदी से छल ।

    Bahut payara haiku…hardik badhai…

  8. बूढ़ी हो गई
    आसमान ताकती
    सूखी धरती ।
    अनोखा सा लगा…बहुत सुन्दर हाइकु…
    बधाई…|


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